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                <title>ओपीनियन - दैनिक जागरण</title>
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                <description>ओपीनियन RSS Feed</description>
                
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                <title>बच्चों की जिंदगी सोशल मीडिया पर कितनी शेयर करें माता-पिता? ‘शेरेंटिंग’ ने खड़ा किया डिजिटल प्राइवेसी का सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[फैमिली व्लॉग से लेकर इंस्टाग्राम रील्स तक बच्चों का बचपन बन रहा ऑनलाइन कंटेंट, बिना सहमति तस्वीरें और निजी पल साझा करने पर अधिकार, कमाई और भविष्य की डिजिटल पहचान को लेकर बढ़ी बहस]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/6a5de6746f018/article-59278"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/sharenting-debate.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">सोशल मीडिया के दौर में बच्चों का बचपन अब सिर्फ घर की एल्बम तक सीमित नहीं रहा। जन्म के कुछ मिनट बाद की तस्वीर से लेकर पहला कदम, स्कूल का पहला दिन, जन्मदिन, बीमारी, रोना, डांट, परीक्षा के नंबर और परिवार के निजी पल तक इंटरनेट पर पहुंच रहे हैं। कई माता-पिता इसे अपने जीवन की सामान्य झलक साझा करना मानते हैं, लेकिन जब यही तस्वीरें और वीडियो हजारों या लाखों लोगों तक पहुंचने लगें और उनसे कमाई होने लगे, तब सवाल केवल सोशल मीडिया पोस्ट का नहीं रह जाता। यहां बच्चे की निजता, उसकी सहमति और भविष्य की डिजिटल पहचान का मुद्दा जुड़ जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">माता-पिता द्वारा अपने बच्चों से जुड़ी जानकारी लगातार सोशल मीडिया पर साझा करने के लिए ‘शेरेंटिंग’ शब्द इस्तेमाल किया जाता है। यह ‘शेयरिंग’ और ‘पेरेंटिंग’ से मिलकर बना है। सामान्य पारिवारिक तस्वीर साझा करने से शुरू होने वाली यह आदत कई मामलों में बच्चे के पूरे जीवन का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार कर देती है। फर्क इतना है कि यह रिकॉर्ड खुद बच्चे ने नहीं बनाया होता। उसके माता-पिता उसके लिए यह डिजिटल पहचान पहले ही तैयार कर चुके होते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">फैमिली व्लॉगिंग ने इस बहस को और गंभीर बनाया है। कई सोशल मीडिया चैनलों पर बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी ही मुख्य कंटेंट बन चुकी है। कैमरा सुबह उठने से लेकर स्कूल जाने, खाना खाने, छुट्टी मनाने और पारिवारिक झगड़ों तक उनका पीछा करता है। कुछ परिवारों के लिए ऐसे वीडियो मनोरंजन के साथ आय का बड़ा जरिया भी बन चुके हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">यहीं सबसे बड़ा सवाल उठता है—माता-पिता को अपने परिवार और जीवन के बारे में ऑनलाइन साझा करने का अधिकार कहां तक होना चाहिए? क्या वह अधिकार उस समय सीमित हो जाना चाहिए, जब पोस्ट का केंद्र ऐसा बच्चा हो जो यह समझने की उम्र में ही नहीं है कि उसकी तस्वीर या वीडियो दुनिया के सामने क्यों डाला जा रहा है?</p>
<p class="isSelectedEnd">छोटे बच्चे ‘डिजिटल फुटप्रिंट’ का अर्थ नहीं समझ सकते। तीन या चार साल का बच्चा कैमरे के सामने मुस्कुरा सकता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वह इंटरनेट पर लाखों लोगों द्वारा देखे जाने की सहमति दे रहा हो। वह यह भी नहीं समझ सकता कि आज रिकॉर्ड हुआ वीडियो कई साल बाद स्कूल, कॉलेज या नौकरी के समय भी खोजा जा सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यही कारण है कि बच्चों की सहमति इस पूरी बहस का केंद्रीय मुद्दा बन रही है। किसी बच्चे का कैमरे के सामने सहज होना और उसकी सूचित सहमति होना दो अलग बातें हैं। वास्तविक सहमति के लिए यह समझना जरूरी है कि कंटेंट कहां जाएगा, कौन देखेगा, कितने समय तक उपलब्ध रहेगा और उसका भविष्य में क्या असर पड़ सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">कई माता-पिता बच्चों की तस्वीरें केवल रिश्तेदारों और दोस्तों के साथ खुशी साझा करने के लिए पोस्ट करते हैं। ऐसे मामलों और व्यावसायिक फैमिली व्लॉगिंग के बीच अंतर करना भी जरूरी है। हर पारिवारिक फोटो को बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन कहना व्यावहारिक नहीं होगा, लेकिन पोस्ट की मात्रा, उसमें मौजूद निजी जानकारी और उससे होने वाली कमाई जोखिम को बदल देती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">समस्या तब ज्यादा गंभीर हो सकती है जब बच्चे के बेहद निजी पल सार्वजनिक किए जाएं। बीमारी, अस्पताल में इलाज, रोते हुए वीडियो, सजा मिलने के दृश्य, खराब परीक्षा परिणाम, मानसिक परेशानी या ऐसी घटनाएं जिन्हें बड़ा होने के बाद बच्चा निजी रखना चाहे—इनका इंटरनेट पर स्थायी रिकॉर्ड बन सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">कई बार माता-पिता इसे मजेदार या भावुक कंटेंट समझकर पोस्ट करते हैं। बच्चे के लिए वही वीडियो कुछ वर्षों बाद शर्मिंदगी या परेशानी का कारण बन सकता है। स्कूल में दूसरे बच्चे उसे खोज सकते हैं, स्क्रीनशॉट साझा किए जा सकते हैं और पुरानी घटना को मजाक या बुलिंग का आधार बनाया जा सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इंटरनेट की एक बड़ी समस्या यह भी है कि पोस्ट हटाना हमेशा उसका अस्तित्व खत्म करना नहीं होता। तस्वीर या वीडियो का स्क्रीनशॉट लिया जा सकता है, उसे डाउनलोड करके दूसरी जगह अपलोड किया जा सकता है या अलग संदर्भ में इस्तेमाल किया जा सकता है। एक बार सार्वजनिक हुई सामग्री पर परिवार का नियंत्रण धीरे-धीरे कम हो जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक तकनीक ने इस चिंता को नया आयाम दिया है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तस्वीरों और वीडियो का इस्तेमाल बिना अनुमति बदली हुई या नकली सामग्री बनाने में किया जा सकता है। बच्चों की बड़ी संख्या में हाई-क्वालिटी तस्वीरें ऑनलाइन मौजूद होने से यह जोखिम और बढ़ सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">सुरक्षा का दूसरा पहलू व्यक्तिगत जानकारी से जुड़ा है। माता-पिता कई बार अनजाने में बच्चे का पूरा नाम, जन्मतिथि, स्कूल, यूनिफॉर्म, घर के आसपास की लोकेशन, रोज का रूटीन और पसंदीदा जगह जैसी जानकारियां पोस्ट कर देते हैं। अलग-अलग पोस्ट को जोड़कर किसी अनजान व्यक्ति के लिए बच्चे के बारे में काफी विस्तृत जानकारी जुटाना संभव हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि तस्वीर प्यारी है या वीडियो वायरल होगा। यह भी देखना जरूरी है कि बैकग्राउंड में स्कूल का नाम तो नहीं दिख रहा, घर की लोकेशन का अंदाजा तो नहीं लग रहा या पोस्ट से बच्चे की नियमित दिनचर्या उजागर तो नहीं हो रही।</p>
<p class="isSelectedEnd">फैमिली इन्फ्लुएंसर और व्लॉगिंग की दुनिया में मामला आर्थिक अधिकार तक पहुंच जाता है। अगर किसी चैनल की लोकप्रियता का बड़ा हिस्सा बच्चों की मौजूदगी पर निर्भर है और उसी कंटेंट से विज्ञापन, ब्रांड डील या प्लेटफॉर्म रेवेन्यू मिल रहा है, तो सवाल उठता है कि उस कमाई पर बच्चे का अधिकार कितना होना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd">पारंपरिक फिल्म और टेलीविजन इंडस्ट्री में बाल कलाकारों के काम को लेकर कई जगह नियम होते हैं। काम के घंटे, शिक्षा, अभिभावक की मौजूदगी और कमाई की सुरक्षा जैसे विषय नियमन के दायरे में आ सकते हैं। लेकिन घर के अंदर रिकॉर्ड होने वाले फैमिली व्लॉग में काम और सामान्य पारिवारिक जीवन की सीमा धुंधली हो जाती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">अगर बच्चा रोज कैमरे के सामने है, वीडियो के लिए खास गतिविधियां कर रहा है, ब्रांड प्रमोशन में शामिल हो रहा है और उसकी मौजूदगी से परिवार की आय बन रही है, तो क्या उसे बाल कलाकार की तरह सुरक्षा मिलनी चाहिए? यह डिजिटल अर्थव्यवस्था के सामने उभरता बड़ा सवाल है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यहां एक और जटिल स्थिति बनती है। कैमरा बंद करने का फैसला भी अक्सर माता-पिता के हाथ में होता है। बच्चा थका हुआ है, नाराज है या रिकॉर्ड नहीं होना चाहता, फिर भी परिवार की आय उस कंटेंट पर निर्भर होने के कारण शूटिंग जारी रखने का दबाव पैदा हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसका अर्थ यह नहीं कि हर फैमिली व्लॉगर बच्चों का शोषण कर रहा है। कई परिवार सीमाएं तय करते हैं, बच्चों की निजी जानकारी छिपाते हैं और उनकी इच्छा का सम्मान करते हैं। बहस उन परिस्थितियों को लेकर है जहां बच्चे का निजी जीवन धीरे-धीरे सार्वजनिक मनोरंजन और व्यावसायिक उत्पाद में बदल जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">‘डिजिटल सहमति’ को उम्र के साथ बदलने वाला अधिकार मानने की मांग भी बढ़ रही है। छोटा बच्चा पूरी तरह सूचित फैसला नहीं कर सकता, लेकिन उम्र बढ़ने पर उससे पूछा जा सकता है कि कौन-सी तस्वीर पोस्ट की जाए। किशोर अवस्था में उसकी आपत्ति को ज्यादा महत्व मिलना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd">एक व्यावहारिक सिद्धांत यह हो सकता है कि माता-पिता पोस्ट करने से पहले खुद से पूछें—अगर यही तस्वीर या जानकारी मेरे बारे में कोई दूसरा व्यक्ति मेरी अनुमति के बिना सार्वजनिक करे तो क्या मैं सहज रहूंगा? दूसरा सवाल यह कि क्या बच्चा 15 साल बाद भी इस पोस्ट को देखकर सहज महसूस करेगा?</p>
<p class="isSelectedEnd">बाथरूम, कपड़े बदलने, मेडिकल स्थिति, अनुशासन, निजी बातचीत या भावनात्मक संकट जैसे क्षणों को सार्वजनिक करने में विशेष सावधानी जरूरी है। ऐसे दृश्य ज्यादा व्यूज ला सकते हैं, लेकिन बच्चे की गरिमा और निजता की कीमत पर मिलने वाली लोकप्रियता लंबे समय में समस्या पैदा कर सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">माता-पिता का अपना अभिव्यक्ति का अधिकार भी इस बहस का वास्तविक हिस्सा है। पेरेंटिंग जीवन का बड़ा अनुभव है और लोग अपनी मुश्किलें, खुशियां और सीख ऑनलाइन साझा करना चाहते हैं। नए माता-पिता सोशल मीडिया समुदायों से मदद भी पाते हैं। इसलिए समाधान पूर्ण प्रतिबंध जितना सरल नहीं है।</p>
<p class="isSelectedEnd">सीमा वहां बनती दिखाई देती है जहां माता-पिता अपने अनुभव की जगह बच्चे की निजी पहचान को मुख्य कंटेंट बनाने लगते हैं। उदाहरण के लिए, ‘आज बच्चे को स्कूल भेजना मुश्किल था’ कहना और बच्चे का रोते हुए पूरा वीडियो, स्कूल का नाम और निजी बातचीत पोस्ट करना अलग स्तर की शेयरिंग है।</p>
<p class="isSelectedEnd">एक विकल्प ‘प्राइवेसी बाय डिजाइन’ का हो सकता है। बच्चे का चेहरा न दिखाना, वास्तविक नाम की जगह उपनाम इस्तेमाल करना, स्कूल और लोकेशन छिपाना, लाइव लोकेशन पोस्ट न करना और बेहद निजी क्षण रिकॉर्ड न करना जोखिम कम कर सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">फैमिली व्लॉगिंग में कमाई होने पर अलग वित्तीय सुरक्षा की जरूरत भी चर्चा में है। बच्चे की मौजूदगी से होने वाली आय का एक हिस्सा उसके नाम सुरक्षित रखने, काम के समय जैसी सीमाएं बनाने और बड़े होने पर पुराने कंटेंट को हटाने या नियंत्रित करने का अधिकार देने जैसे मॉडल पर विचार किया जा सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ यानी पुराने डिजिटल रिकॉर्ड को हटवाने का अधिकार बच्चों के मामले में खास महत्व रखता है। जिस सामग्री के प्रकाशन का फैसला बच्चे ने खुद नहीं किया, उसे वयस्क होने पर हटाने या उसकी पहुंच सीमित करने का प्रभावी विकल्प मिलना चाहिए—यह डिजिटल अधिकारों से जुड़ी बहस का अहम हिस्सा बनता जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">शेरेंटिंग का मुद्दा आखिरकार कैमरा या सोशल मीडिया इस्तेमाल करने के खिलाफ बहस नहीं है। असली टकराव दो अधिकारों के बीच है—माता-पिता का अपने जीवन और परिवार के अनुभव साझा करने का अधिकार और बच्चे का अपनी पहचान, गरिमा तथा निजी जीवन पर भविष्य में नियंत्रण रखने का अधिकार।</p>
<p>यह सीमा संभवतः उस बिंदु पर पार होती है जहां पोस्ट बच्चे के हित से ज्यादा वयस्क की लोकप्रियता या कमाई के लिए की जाने लगे, जहां बच्चा मना करने की स्थिति में न हो, जहां संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक हो और जहां आज की पोस्ट उसके भविष्य पर ऐसा असर डाल सकती हो जिसे वह बाद में नियंत्रित न कर सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 15:33:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Priyanka ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड पर टैक्स की बहस: सेहत बचाने का हथियार या गरीब परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ?</title>
                                    <description><![CDATA[डायबिटीज, मोटापा और दिल की बीमारियों के बढ़ते खतरे के बीच ज्यादा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों पर टैक्स लगाने की मांग तेज हो रही है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/debate-over-tax-on-ultra-processed-food-a-weapon-to-save/article-59174"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/ultra-processed-food-tax.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">दुनियाभर में मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल से जुड़ी बीमारियों का बढ़ता बोझ सरकारों के सामने बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। इस समस्या के पीछे बदलती जीवनशैली के साथ खान-पान की आदतों को भी महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। खास तौर पर ऐसे पैकेज्ड खाद्य और पेय पदार्थों को लेकर बहस बढ़ी है, जिनमें अक्सर ज्यादा मात्रा में चीनी, नमक या अस्वास्थ्यकर वसा होती है और जिन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखने या स्वाद बढ़ाने के लिए कई औद्योगिक प्रक्रियाओं से गुजारा जाता है।</p>
<p>इन्हें व्यापक रूप से <strong>अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड यानी UPF</strong> की श्रेणी से जोड़कर देखा जाता है। कई तरह के मीठे पेय, इंस्टेंट स्नैक्स, कुछ रेडी-टू-ईट भोजन, मिठाइयां और अत्यधिक प्रोसेस्ड पैकेज्ड उत्पाद इस चर्चा के केंद्र में रहते हैं। हालांकि हर प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ को समान रूप से अस्वास्थ्यकर मानना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। असली बहस इस बात पर है कि सरकार टैक्स के लिए किन उत्पादों को किस पोषण मानदंड के आधार पर चुने।</p>
<p>इसी बीच एक विवादास्पद नीति प्रस्ताव सामने आता रहा है—<strong>क्या स्वास्थ्य के लिए ज्यादा नुकसानदेह माने जाने वाले खाद्य पदार्थों पर अतिरिक्त टैक्स लगाया जाना चाहिए?</strong></p>
<p>इस विचार के समर्थकों का मानना है कि अगर ज्यादा चीनी, नमक या अन्य अस्वास्थ्यकर पोषण प्रोफाइल वाले उत्पाद महंगे होंगे तो लोग उनका सेवन कम कर सकते हैं। कंपनियों पर भी अपने उत्पादों को बेहतर बनाने का दबाव पड़ेगा। लेकिन विरोधियों का तर्क है कि यह समाधान जितना सरल दिखाई देता है, वास्तविक जिंदगी में उतना नहीं है। कम आय वाले परिवार अक्सर सस्ता, आसानी से उपलब्ध और लंबे समय तक टिकने वाला भोजन खरीदते हैं। ऐसे में टैक्स सीधे उनकी जेब पर ज्यादा असर डाल सकता है।</p>
<h5><strong>आखिर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड इतना लोकप्रिय क्यों है?</strong></h5>
<p>इस बहस को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि लोग ऐसे खाद्य पदार्थ खरीदते ही क्यों हैं। इसका जवाब केवल स्वाद नहीं है।</p>
<p>शहरों में लंबे काम के घंटे, खाना बनाने के लिए कम समय, छोटे परिवार, आसान होम डिलीवरी और हर जगह उपलब्ध पैकेज्ड फूड ने खाने की आदतें बदल दी हैं। कम आय वाले परिवारों के लिए एक और महत्वपूर्ण कारण कीमत है। कई बार ऐसा भोजन सस्ता पड़ता है, लंबे समय तक खराब नहीं होता और तुरंत खाया या तैयार किया जा सकता है।</p>
<p>इसके विपरीत ताजे फल, सब्जियां, गुणवत्तापूर्ण प्रोटीन और संतुलित भोजन कई परिवारों के लिए अपेक्षाकृत महंगा पड़ सकता है। कुछ क्षेत्रों में समस्या सिर्फ कीमत की नहीं, उपलब्धता की भी होती है। यदि किसी परिवार के आसपास पौष्टिक भोजन के विकल्प सीमित हैं, लेकिन पैकेज्ड स्नैक्स और मीठे पेय आसानी से मिल रहे हैं, तो केवल टैक्स लगाकर व्यवहार बदलना मुश्किल हो सकता है।</p>
<p>यही इस पूरी बहस का सबसे बड़ा सामाजिक पहलू है।</p>
<h5><strong>टैक्स के समर्थक क्या कहते हैं?</strong></h5>
<p>समर्थकों का तर्क है कि सरकार पहले से कई ऐसी चीजों पर टैक्स लगाती है जिनके इस्तेमाल से समाज पर स्वास्थ्य या अन्य प्रकार का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। इसी सिद्धांत के आधार पर ज्यादा चीनी वाले पेय और अत्यधिक अस्वास्थ्यकर खाद्य उत्पादों पर टैक्स लगाने की बात की जाती है।</p>
<p>इस नीति का पहला उद्देश्य कीमत के जरिए मांग को प्रभावित करना है। अगर कोई मीठा पेय या अत्यधिक नमक वाला स्नैक सामान्य विकल्प की तुलना में महंगा हो जाता है, तो कुछ ग्राहक उसकी खरीद कम कर सकते हैं।</p>
<p>दूसरा उद्देश्य खाद्य कंपनियों के व्यवहार को बदलना है। यदि टैक्स किसी निश्चित मात्रा से ज्यादा चीनी, नमक या संतृप्त वसा वाले उत्पादों पर लागू होता है, तो कंपनियां टैक्स से बचने के लिए अपनी रेसिपी बदल सकती हैं। इससे बाजार में बेहतर पोषण प्रोफाइल वाले विकल्प बढ़ सकते हैं।</p>
<p>तीसरा तर्क सरकारी राजस्व से जुड़ा है। टैक्स से मिलने वाली रकम का इस्तेमाल स्वास्थ्य कार्यक्रमों, स्कूलों में पौष्टिक भोजन, बच्चों के पोषण, डायबिटीज स्क्रीनिंग या गरीब परिवारों को स्वस्थ भोजन उपलब्ध कराने में किया जा सकता है।</p>
<p>यहीं से टैक्स का डिजाइन सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि सरकार केवल पैसा वसूलती है तो नीति गरीबों पर बोझ बन सकती है। लेकिन वही पैसा स्वस्थ भोजन सस्ता करने में लगाया जाए तो तस्वीर बदल सकती है।</p>
<h5><strong>विरोधियों का सबसे बड़ा सवाल—गरीब क्या खाएगा?</strong></h5>
<p>अल्ट्रा-प्रोसेस्ड या अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों पर टैक्स का सबसे मजबूत विरोध आर्थिक असमानता के आधार पर होता है।</p>
<p>मान लीजिए किसी कम आय वाले परिवार का मासिक खाद्य बजट पहले ही सीमित है। परिवार ऐसा भोजन चुनता है जो कम कीमत में ज्यादा लोगों का पेट भर सके और जल्दी खराब भी न हो। अगर सरकार उसी भोजन पर अतिरिक्त टैक्स लगा देती है, लेकिन फल, सब्जियां, दालें, दूध और अन्य पौष्टिक विकल्प सस्ते नहीं करती, तो परिवार के पास बेहतर विकल्प जरूरी नहीं कि उपलब्ध हो जाए।</p>
<p>उसे वही उत्पाद अधिक कीमत देकर खरीदना पड़ सकता है।</p>
<p>इस स्थिति में टैक्स व्यवहार बदलने के बजाय घरेलू बजट पर अतिरिक्त बोझ बन जाएगा। अर्थशास्त्र में ऐसे टैक्स को लेकर अक्सर यह चिंता जताई जाती है कि कम आय वाले परिवार अपनी आय का अपेक्षाकृत बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करते हैं, इसलिए कीमत में छोटी वृद्धि भी उनके बजट पर ज्यादा असर डाल सकती है।</p>
<p>यही कारण है कि आलोचक कहते हैं—<strong>अस्वास्थ्यकर भोजन को महंगा करने से पहले स्वस्थ भोजन को सुलभ और किफायती बनाना जरूरी है।</strong></p>
<h5><strong>क्या सरकार तय करेगी कि कौन सा खाना ‘अनहेल्दी’ है?</strong></h5>
<p>यह दूसरा बड़ा विवाद है।</p>
<p>‘अल्ट्रा-प्रोसेस्ड’ एक व्यापक श्रेणी है। किसी उत्पाद पर सिर्फ इसलिए टैक्स लगाना कि वह औद्योगिक रूप से प्रोसेस्ड है, कई व्यावहारिक समस्याएं पैदा कर सकता है। कुछ पैकेज्ड खाद्य पदार्थ सुविधाजनक होने के साथ पोषण की दृष्टि से उपयोगी भी हो सकते हैं।</p>
<p>इसलिए टैक्स लगाने की स्थिति में स्पष्ट मानदंड जरूरी होंगे।</p>
<p>नीति केवल ‘प्रोसेसिंग’ के स्तर पर आधारित होगी या उसमें अतिरिक्त चीनी, सोडियम, संतृप्त वसा, कैलोरी घनत्व और पोषण गुणवत्ता भी देखी जाएगी? क्या बच्चों के लिए बेचे जाने वाले उत्पादों के नियम अलग होंगे? क्या छोटे स्थानीय उत्पादकों और बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर समान नियम लागू होंगे?</p>
<p>गलत वर्गीकरण से अच्छे और खराब उत्पाद एक ही टैक्स श्रेणी में आ सकते हैं।</p>
<h5><strong>सिर्फ टैक्स से समस्या खत्म नहीं होगी</strong></h5>
<p>खान-पान की आदतें केवल कीमत से तय नहीं होतीं। विज्ञापन, उपलब्धता, शिक्षा, काम का समय, सामाजिक वातावरण और बच्चों पर मार्केटिंग का असर भी महत्वपूर्ण होता है।</p>
<p>यदि किसी स्कूल के आसपास सबसे सुलभ विकल्प मीठे पेय और पैकेज्ड स्नैक्स हैं, तो सिर्फ टैक्स से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी।</p>
<p>इसके लिए कई नीतियां साथ चल सकती हैं—फ्रंट-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन लेबलिंग को स्पष्ट बनाना, बच्चों को लक्षित भ्रामक विज्ञापनों पर नियंत्रण, स्कूलों में बेहतर भोजन, कम आय वाले परिवारों के लिए पौष्टिक खाद्य सब्सिडी और स्थानीय बाजारों तक ताजे खाद्य पदार्थों की पहुंच बढ़ाना।</p>
<p>इस मॉडल में टैक्स अकेला हथियार नहीं, बल्कि बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम का एक हिस्सा होगा।</p>
<h5><strong>‘अनहेल्दी पर टैक्स’ के साथ ‘हेल्दी पर सब्सिडी’</strong></h5>
<p>इस विवाद का एक संभावित संतुलित मॉडल यह हो सकता है कि सरकार टैक्स और सब्सिडी दोनों को साथ लागू करे।</p>
<p>यदि ज्यादा चीनी वाले पेय या तय पोषण सीमा से बाहर के उत्पादों से अतिरिक्त राजस्व मिलता है, तो उस रकम को फल, सब्जियां, दालें और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ सस्ते करने में लगाया जा सकता है।</p>
<p>उदाहरण के तौर पर कम आय वाले परिवारों को हेल्दी फूड वाउचर दिए जा सकते हैं। स्कूलों में मुफ्त पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जा सकता है। गरीब इलाकों में ताजा खाद्य बाजारों के लिए सहायता दी जा सकती है।</p>
<p>इससे नीति का संदेश बदल जाता है।</p>
<p>सरकार केवल यह नहीं कहती कि ‘गलत खाना महंगा कर रहे हैं’, बल्कि साथ में यह भी सुनिश्चित करती है कि ‘बेहतर खाना सस्ता और आसानी से उपलब्ध हो।’</p>
<h5><strong>कंपनियों की जिम्मेदारी पर भी सवाल</strong></h5>
<p>पूरी बहस में उपभोक्ता को ही जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं है। खाद्य उद्योग की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।</p>
<p>कंपनियां उत्पादों के स्वाद, पैकेजिंग, कीमत और विज्ञापन पर भारी निवेश करती हैं। बच्चों और युवाओं को आकर्षित करने वाली मार्केटिंग खरीद के फैसलों को प्रभावित कर सकती है।</p>
<p>अगर सरकार वास्तव में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधारना चाहती है तो केवल ग्राहक से अतिरिक्त टैक्स लेना पर्याप्त नहीं होगा। कंपनियों को स्पष्ट लेबलिंग, जिम्मेदार विज्ञापन और बेहतर फॉर्मूलेशन के लिए भी जवाबदेह बनाना होगा।</p>
<p>ऐसी टैक्स व्यवस्था अधिक प्रभावी हो सकती है जिसमें उत्पाद की पोषण संरचना सुधारने पर कंपनी टैक्स से बच सके। इससे उद्योग के पास सुधार करने का आर्थिक कारण पैदा होगा।</p>
<h5><strong>व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम सार्वजनिक स्वास्थ्य</strong></h5>
<p>यह बहस एक दार्शनिक सवाल भी खड़ा करती है—लोग क्या खाएं, इसमें सरकार को कितना हस्तक्षेप करना चाहिए?</p>
<p>एक पक्ष कहता है कि व्यक्ति को अपने भोजन का चुनाव करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति जोखिम जानते हुए भी कोई उत्पाद खरीदना चाहता है, तो सरकार को उसे महंगा करके रोकने का अधिकार क्यों हो?</p>
<p>दूसरा पक्ष कहता है कि खान-पान से जुड़ी बीमारियों का खर्च केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। डायबिटीज, मोटापा और हृदय रोग बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य व्यवस्था और परिवारों पर आर्थिक दबाव डालते हैं। ऐसे में सरकार रोकथाम के लिए आर्थिक नीतियों का इस्तेमाल कर सकती है।</p>
<p>सवाल इसलिए सिर्फ टैक्स लगाने या न लगाने का नहीं है। असली मुद्दा है कि नीति <strong>किस पर टैक्स लगाती है, कितना लगाती है और उससे मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल कहां करती है।</strong></p>
<p>अगर बिना सस्ते विकल्प दिए रोजमर्रा के खाद्य पदार्थ महंगे कर दिए जाएं तो इसका सबसे ज्यादा असर गरीब परिवारों पर पड़ सकता है। वहीं यदि टैक्स बहुत स्पष्ट पोषण मानकों पर आधारित हो, कंपनियों को बेहतर उत्पाद बनाने के लिए प्रेरित करे और उससे मिली पूरी या बड़ी राशि स्वस्थ भोजन को सस्ता तथा सुलभ बनाने में लगाई जाए, तो यही नीति सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधारने का एक प्रभावी साधन बन सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/debate-over-tax-on-ultra-processed-food-a-weapon-to-save/article-59174</link>
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                <pubDate>Sun, 19 Jul 2026 14:37:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Priyanka ]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>Soft Life Trend: सुकून की तलाश या समाज से दूरी? नई पीढ़ी की ‘आराम वाली जिंदगी’ पर छिड़ी बहस</title>
                                    <description><![CDATA[काम, पैसा और लगातार आगे निकलने की दौड़ से थकी युवा पीढ़ी ‘Soft Life’ चुन रही है, लेकिन सवाल है—क्या खुद को बचाने की कोशिश हमें समाज और जिम्मेदारियों से दूर कर रही है?]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/soft-life-trend-search-for-comfort-or-distance-from-society/article-59095"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/soft-life-trend.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">सुबह उठते ही ऑफिस की भागदौड़ नहीं, हर वक्त प्रमोशन की चिंता नहीं, वीकेंड पर काम के मैसेज नहीं और जिंदगी का हर फैसला ज्यादा पैसा या बड़ा पद हासिल करने के हिसाब से नहीं। सोशल मीडिया पर इसे ‘Soft Life’ कहा जा रहा है। यानी ऐसी जिंदगी जिसमें लगातार संघर्ष और उपलब्धियों की दौड़ के बजाय शांति, आराम, मानसिक सुकून, रिश्तों और निजी समय को ज्यादा अहमियत दी जाए। खासकर युवाओं के बीच यह सोच तेजी से जगह बना रही है कि जीवन का मतलब हर समय ‘हसल’ करना नहीं है। अच्छी नौकरी जरूरी हो सकती है, लेकिन उसके लिए नींद, सेहत, रिश्ते और मन की शांति खो देना जरूरी नहीं। पहली नजर में यह बदलाव एक स्वस्थ प्रतिक्रिया जैसा दिखता है। वर्षों तक ‘Hustle Culture’ ने ज्यादा काम करने, कम सोने और हमेशा व्यस्त रहने को सफलता की पहचान बनाया। अब उसी के जवाब में एक पीढ़ी कह रही है—हमें ऐसी सफलता नहीं चाहिए जिसकी कीमत पूरी जिंदगी हो। लेकिन इसी बहस का दूसरा पहलू भी सामने आ रहा है। अगर ‘Soft Life’ का अर्थ धीरे-धीरे हर कठिन जिम्मेदारी से बचना बन जाए, तो क्या हम परिवार, मोहल्ले, समाज और नागरिक जीवन से भी पीछे हटने लगेंगे?</p>
<p>‘Soft Life’ कोई औपचारिक जीवन-दर्शन नहीं है। सोशल मीडिया पर इसका मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग है। किसी के लिए इसका अर्थ बेहतर work-life balance है, किसी के लिए toxic workplace छोड़ना, सीमाएं तय करना और अपने लिए समय निकालना। कुछ लोग इसे कम उपभोग, धीमी जिंदगी और अनावश्यक प्रतिस्पर्धा से दूरी के रूप में देखते हैं। समस्या तब शुरू होती है जब आराम को जीवन की प्राथमिकता बनाने और असुविधा से पूरी तरह बचने के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। मनोविज्ञान के लिहाज से self-care को केवल इंटरनेट का फैशन मानना भी गलत होगा। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन self-care को मानसिक स्वास्थ्य और resilience यानी मुश्किल परिस्थितियों से उबरने की क्षमता से जोड़ती है। लगातार तनाव में रहने वाला व्यक्ति आखिर कितने समय तक अपने परिवार, नौकरी या समाज के लिए उपलब्ध रह सकता है? आराम, नींद, रिश्ते और निजी सीमाएं कई बार पीछे हटना नहीं, बल्कि खुद को लंबे समय तक टिकाए रखने की जरूरत होती हैं।</p>
<p>यहीं से असली सवाल उठता है—क्या ‘Soft Life’ हमें स्वस्थ बना रही है या धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से गायब भी कर रही है? आधुनिक शहरी जिंदगी में बहुत से काम ऐसे हैं जिनका तत्काल निजी फायदा नहीं मिलता। मोहल्ले की समस्या के लिए आवाज उठाना, किसी स्थानीय समूह से जुड़ना, बच्चों या बुजुर्गों की सामुदायिक मदद करना, मतदान से आगे नागरिक मुद्दों में भाग लेना, किसी संस्था में volunteer करना या जरूरत पड़ने पर पड़ोसी के लिए समय निकालना—इन सबमें मेहनत लगती है। कई बार विवाद भी झेलना पड़ता है। अगर जीवन का मूल नियम यह बन जाए कि ‘जो मेरी शांति बिगाड़े, उससे दूरी बना लो’, तो civic life सबसे पहले कमजोर हो सकती है। क्योंकि समुदाय सुविधा से नहीं बनता। उसमें समय देना पड़ता है, दूसरे लोगों की समस्याएं सुननी पड़ती हैं और कभी-कभी ऐसी जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है जिससे व्यक्तिगत आराम कम होता है।</p>
<p>दुनिया पहले ही सामाजिक दूरी और अकेलेपन की बड़ी समस्या से जूझ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में लगभग हर छह में से एक व्यक्ति अकेलेपन से प्रभावित है। WHO ने मजबूत सामाजिक संबंधों को बेहतर स्वास्थ्य और लंबी जिंदगी से जोड़ा है। OECD ने भी सामाजिक जुड़ाव को केवल व्यक्तिगत खुशी का मामला नहीं माना, बल्कि इसे community resilience और civic engagement से जोड़कर देखा है। यानी यह मुद्दा सिर्फ इतना नहीं कि हमारे कितने दोस्त हैं। सवाल यह भी है कि क्या हम ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां लोग एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं, जरूरत में मदद करते हैं और साझा समस्याओं के लिए साथ खड़े होते हैं।</p>
<p>इस लिहाज से ‘Civic Void’ यानी नागरिक भागीदारी का खालीपन एक वास्तविक चिंता बन सकता है। कल्पना कीजिए, एक शहर में हर व्यक्ति अपनी निजी जिंदगी बहुत अच्छे से संभाल रहा है। घर सुंदर है, काम सीमित घंटों का है, छुट्टियां तय हैं, तनाव पैदा करने वाले लोगों से दूरी है। लेकिन उसी शहर में पार्क खराब हैं, स्थानीय संस्थाएं कमजोर हैं, पड़ोसियों के बीच संपर्क नहीं है और सार्वजनिक मुद्दों पर कोई समय नहीं देना चाहता। व्यक्तिगत स्तर पर सब अपनी ‘peace’ बचा रहे हैं, लेकिन सामूहिक स्तर पर समाज कमजोर हो रहा है। ऐसी स्थिति में ‘Soft Life’ अनजाने में उस विचार को मजबूत कर सकती है जिसमें हर समस्या का जवाब निजी retreat बन जाता है—नौकरी खराब है तो छोड़ दो, पड़ोस परेशान करता है तो अलग हो जाओ, राजनीति खराब है तो उससे दूरी रखो, समाज तनाव देता है तो अपना छोटा सुरक्षित दायरा बना लो। हर बार यह विकल्प गलत नहीं है, लेकिन अगर पूरी पीढ़ी का default response withdrawal बन जाए तो सार्वजनिक जगह खाली होने लगती है।</p>
<p>हालांकि इसका पूरा दोष ‘Soft Life’ को देना भी आसान और अधूरा निष्कर्ष होगा। कई युवा सामाजिक जिम्मेदारियों से इसलिए दूर नहीं हुए कि वे आलसी या स्वार्थी हैं, बल्कि इसलिए कि उनके पास समय और ऊर्जा ही कम बची है। महंगे शहर, अस्थिर नौकरियां, लंबी यात्राएं, डिजिटल काम का लगातार पीछा करना और आर्थिक अनिश्चितता ने लोगों की दिनचर्या बदल दी है। जब कोई व्यक्ति दिन का बड़ा हिस्सा नौकरी और आने-जाने में खर्च कर देता है, तो उससे शाम को community meeting में सक्रिय रहने की उम्मीद करना आसान नहीं। ऐसे में ‘Soft Life’ कई लोगों के लिए luxury नहीं बल्कि burnout के खिलाफ प्रतिक्रिया है। यह कहना कि युवा ambition छोड़ रहे हैं, शायद पूरी तस्वीर नहीं है। वे ambition की परिभाषा बदल रहे हैं—बड़ी सैलरी के साथ समय भी चाहिए, करियर के साथ रिश्ते भी और उपलब्धियों के साथ मानसिक शांति भी।</p>
<p>लेकिन इंटरनेट ने इस विचार को एक दूसरा रूप भी दिया है। सोशल मीडिया पर ‘Soft Life’ अक्सर सुंदर घरों, शांत सुबह, महंगी यात्राओं, skincare routines, कैफे, आरामदायक कपड़ों और ‘protect your peace’ जैसे संदेशों के साथ दिखाई देती है। इससे यह भ्रम बन सकता है कि बेहतर जिंदगी का रास्ता समाज से जुड़ने के बजाय निजी comfort खरीदने में है। जबकि वास्तविक सामाजिक जुड़ाव अक्सर aesthetic नहीं होता। पड़ोसी की मदद करना इंस्टाग्राम पर सुंदर नहीं दिखता, स्थानीय समस्या पर तीन घंटे की बैठक आरामदायक नहीं होती और किसी सामुदायिक संस्था में लगातार काम करना ‘slow morning’ जैसा आकर्षक कंटेंट नहीं बनता। फिर भी यही छोटे काम किसी शहर या समाज के भीतर भरोसा पैदा करते हैं। OECD की 2025-26 की रिपोर्टिंग में भी social infrastructure—यानी वे स्थान और संस्थाएं जहां लोग मिलते-जुलते हैं—को सामाजिक जुड़ाव और belonging मजबूत करने का अहम हिस्सा बताया गया है।</p>
<p>इस बहस में शायद ‘Soft Life’ और civic duty को एक-दूसरे का दुश्मन मानना ही सबसे बड़ी गलती है। आराम और जिम्मेदारी साथ चल सकते हैं। कोई व्यक्ति 70 घंटे काम करने से इनकार कर सकता है और फिर भी अपने मोहल्ले में सक्रिय रह सकता है। वह corporate ambition को सीमित कर सकता है, लेकिन पर्यावरण, शिक्षा या स्थानीय मुद्दों के लिए समय दे सकता है। संभव है कि कम burnout वाला व्यक्ति समाज के लिए ज्यादा उपलब्ध हो। अगर नौकरी हमारी पूरी ऊर्जा नहीं खाती, तो वही बचा हुआ समय परिवार, दोस्तों, पड़ोस और नागरिक गतिविधियों में लगाया जा सकता है। इस अर्थ में ‘Soft Life’ civic life की विरोधी नहीं, उसकी मददगार भी बन सकती है—बशर्ते ‘peace’ का मतलब isolation न हो।</p>
<p>खतरा वहां है जहां self-care धीरे-धीरे self-absorption बन जाए। हर असहमति को ‘toxic’, हर जिम्मेदारी को ‘emotional labour’ और हर असुविधा को अपनी शांति पर हमला मानने की आदत समाज को छोटे-छोटे निजी द्वीपों में बांट सकती है। समुदाय तभी बनता है जब लोग कभी-कभी अपनी सुविधा से बाहर निकलते हैं। किसी बीमार पड़ोसी के लिए खाना पहुंचाना, मतदान करना, स्थानीय समस्या पर सवाल उठाना, बच्चों के लिए सार्वजनिक जगह बचाने की कोशिश करना या किसी मुश्किल समय में दोस्त के साथ बैठना—इनमें से बहुत कुछ ‘soft’ नहीं है। लेकिन यही सामाजिक जीवन की बुनियाद है। अमेरिकी Surgeon General की social connection advisory ने भी चेताया था कि कमजोर सामाजिक जुड़ाव का असर केवल व्यक्ति के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता; स्कूलों, कार्यस्थलों और civic organizations में भागीदारी और प्रदर्शन भी प्रभावित हो सकते हैं।</p>
<p>इसलिए नई बहस शायद ‘Soft Life बनाम Hard Life’ की नहीं, बल्कि <strong>Soft Life बनाम Disconnected Life</strong> की है। थकान को उपलब्धि समझना जरूरी नहीं। हर समय महत्वाकांक्षी दिखना भी जरूरी नहीं। लेकिन निजी शांति ऐसी दीवार भी नहीं बननी चाहिए जिसके बाहर समाज की हर समस्या किसी और की जिम्मेदारी हो जाए। आराम जरूरी है, सीमाएं जरूरी हैं और अपनी जिंदगी पर नियंत्रण भी। उसी के साथ किसी समुदाय का हिस्सा बने रहना, दूसरों के लिए थोड़ा समय निकालना और साझा जिम्मेदारियों से पूरी तरह पीछे न हटना भी उतना ही जरूरी होता जा रहा है—खासकर उस दौर में जब दुनिया अकेलेपन और सामाजिक अलगाव को सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामुदायिक मजबूती से जुड़ी चुनौती मान रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 13:36:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Priyanka ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>क्या दिमागी निजता के लिए नए संवैधानिक अधिकार की जरूरत? न्यूरल डिवाइस और AI के दौर में तेज हुई बहस</title>
                                    <description><![CDATA[ब्रेन वेव पढ़ने वाले पहनने योग्य उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल ने 'कॉग्निटिव लिबर्टी' और 'कॉग्निटिव प्राइवेसी' को लेकर नई कानूनी और संवैधानिक चर्चा शुरू कर दी है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/is-there-a-need-for-a-new-constitutional-right-for/article-58986"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/cognitive-liberty-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">आज दुनिया तेजी से ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जहां इंसान और तकनीक के बीच की दूरी लगातार कम होती जा रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) और वेयरेबल न्यूरल डिवाइस जैसी तकनीकें अब केवल वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुंच रही हैं। ऐसे हेडबैंड और न्यूरल बैंड विकसित किए जा रहे हैं, जो मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि यानी ब्रेन वेव्स को रिकॉर्ड कर सकते हैं। इनका इस्तेमाल गेमिंग, ध्यान (Meditation), हेल्थ मॉनिटरिंग, शिक्षा और कार्यस्थल पर उत्पादकता बढ़ाने जैसे उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है। लेकिन इन तकनीकों के साथ एक बड़ा सवाल भी सामने आया है—क्या इंसान के विचार, मानसिक गतिविधियां और ब्रेन डेटा को भी उतनी ही कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए, जितनी उसकी निजी जानकारी या बायोमेट्रिक डेटा को मिलती है?</p>
<p class="isSelectedEnd">इसी बहस के केंद्र में दो नए शब्द तेजी से चर्चा में हैं—<strong>कॉग्निटिव लिबर्टी (Cognitive Liberty)</strong> और <strong>कॉग्निटिव प्राइवेसी (Cognitive Privacy)</strong>। कॉग्निटिव लिबर्टी का अर्थ है कि हर व्यक्ति को अपने विचारों, मानसिक प्रक्रियाओं और निर्णयों पर पूर्ण नियंत्रण का अधिकार हो। वहीं कॉग्निटिव प्राइवेसी का मतलब है कि किसी व्यक्ति के दिमाग से जुड़ा डेटा उसकी स्पष्ट अनुमति के बिना न तो एकत्र किया जाए और न ही उसका विश्लेषण या व्यावसायिक इस्तेमाल किया जाए।</p>
<p class="isSelectedEnd">विशेषज्ञों का कहना है कि आज के समय में स्मार्टवॉच, फिटनेस बैंड और मोबाइल फोन पहले से ही लोगों की लोकेशन, हार्ट रेट, नींद और स्वास्थ्य संबंधी डेटा इकट्ठा करते हैं। यदि भविष्य में ब्रेन वेव रिकॉर्ड करने वाले उपकरण आम हो जाते हैं, तो तकनीकी कंपनियों के पास लोगों की भावनाओं, तनाव, एकाग्रता, मानसिक स्थिति और संभावित व्यवहार से जुड़ी अत्यंत संवेदनशील जानकारी भी पहुंच सकती है। यही कारण है कि कई कानूनी विशेषज्ञ इस डेटा को दुनिया का सबसे निजी डेटा मान रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">कार्यस्थलों पर भी इस तकनीक को लेकर बहस तेज हो रही है। कुछ कंपनियां भविष्य में ऐसे उपकरणों का उपयोग कर्मचारियों की एकाग्रता, थकान या कार्य क्षमता को मापने के लिए करना चाहेंगी। समर्थकों का तर्क है कि इससे कार्यस्थल अधिक सुरक्षित और उत्पादक बन सकते हैं। उदाहरण के लिए, खदानों, विमानन या भारी मशीनों से जुड़े कार्यों में यदि किसी कर्मचारी की मानसिक थकान का समय रहते पता चल जाए, तो दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है। दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि यदि नियोक्ता कर्मचारियों के मानसिक डेटा तक पहुंचने लगें, तो इससे निजता, स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">गेमिंग और मनोरंजन उद्योग में भी न्यूरल डिवाइस तेजी से विकसित किए जा रहे हैं। कई कंपनियां ऐसे हेडसेट बना रही हैं जो खिलाड़ी की मानसिक प्रतिक्रिया के आधार पर गेम का अनुभव बदल सकते हैं। इसी तरह शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी इन उपकरणों से नई संभावनाएं पैदा हो रही हैं। हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इन तकनीकों से मिलने वाले लाभों के साथ-साथ इनके दुरुपयोग की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसी वजह से दुनिया के कई देशों में यह चर्चा शुरू हो चुकी है कि क्या मौजूदा गोपनीयता कानून भविष्य की इन तकनीकों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि वर्तमान डेटा संरक्षण कानूनों के दायरे को बढ़ाकर न्यूरल डेटा को भी संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी की श्रेणी में रखा जा सकता है। वहीं कुछ संवैधानिक विशेषज्ञों का मत है कि मानसिक स्वतंत्रता इतनी मूलभूत है कि इसके लिए अलग संवैधानिक सुरक्षा की आवश्यकता हो सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">भारत में भी यह विषय आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण हो सकता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। वर्ष 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने <em>के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ</em> मामले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना था। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यदि न्यूरल डेटा का व्यापक उपयोग होने लगे, तो अदालतों के सामने यह प्रश्न आ सकता है कि क्या मानसिक गतिविधियों और ब्रेन डेटा की सुरक्षा भी इसी अधिकार के दायरे में आती है या इसके लिए अलग कानूनी व्यवस्था की जरूरत होगी।</p>
<p class="isSelectedEnd">कुछ तकनीकी विशेषज्ञ यह भी सुझाव दे रहे हैं कि न्यूरल डेटा के लिए विशेष नियम बनाए जाएं। इनके अनुसार किसी भी कंपनी या संस्था को व्यक्ति की स्पष्ट और सूचित सहमति (Informed Consent) के बिना ब्रेन डेटा एकत्र करने, साझा करने या व्यावसायिक उपयोग की अनुमति नहीं होनी चाहिए। साथ ही नागरिकों को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे अपने न्यूरल डेटा को कभी भी हटाने या उसके उपयोग पर रोक लगाने की मांग कर सकें।</p>
<p>हालांकि इस मुद्दे पर अभी कोई वैश्विक सहमति नहीं बनी है। कुछ देशों में इस दिशा में प्रारंभिक कानूनों और नीतियों पर विचार किया जा रहा है, जबकि कई जगह यह बहस अभी अकादमिक और नीति स्तर तक सीमित है। तकनीकी कंपनियां भी कहती हैं कि उनके अधिकांश वर्तमान उपभोक्ता उपकरण सीमित प्रकार की ब्रेन गतिविधि रिकॉर्ड करते हैं और उनसे किसी व्यक्ति के विचारों को पढ़ना संभव नहीं है। दूसरी ओर विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे तकनीक अधिक उन्नत होगी, कानूनी ढांचे को भी उसी गति से विकसित करना होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 13:47:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Priyanka ]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>‘वन नेशन, वन इलेक्शन’: भारत के लोकतंत्र को मजबूत करने वाला बड़ा सुधार</title>
                                    <description><![CDATA[एक साथ चुनाव से समय, धन और संसाधनों की होगी बचत; तेज विकास और बेहतर शासन की दिशा में साबित हो सकता है महत्वपूर्ण कदम]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/%E2%80%98one-nation-one-election%E2%80%99-is-a-major-reform-to-strengthen/article-58575"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/one-nation-one-election-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और यहां चुनाव लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया माने जाते हैं। देश में हर साल किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं। लोकसभा चुनाव, विधानसभा चुनाव, नगर निकाय और पंचायत चुनावों की लगातार प्रक्रिया के कारण सरकार, प्रशासन और राजनीतिक दलों का काफी समय चुनावी गतिविधियों में चला जाता है। ऐसे में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ यानी देश में लोकसभा और सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का विचार एक महत्वपूर्ण सुधार के रूप में सामने आया है। मेरे विचार से यदि इसे सही योजना और संवैधानिक व्यवस्था के साथ लागू किया जाता है, तो यह भारत के लोकतंत्र और विकास व्यवस्था को मजबूत करने वाला कदम साबित हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि बार-बार होने वाले चुनावों पर खर्च होने वाले सरकारी धन की बचत होगी। चुनाव प्रक्रिया में बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारी, सुरक्षा बल, प्रशासनिक अधिकारी और अन्य संसाधन लगाए जाते हैं। हर चुनाव के दौरान करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। यदि चुनाव एक साथ आयोजित किए जाते हैं तो इस खर्च को काफी हद तक कम किया जा सकता है। बचाए गए धन का इस्तेमाल देश के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने में किया जा सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसके अलावा, बार-बार चुनाव होने से सरकारों को कई बार आचार संहिता लागू करनी पड़ती है। चुनाव आचार संहिता लागू होने के दौरान सरकारें नई योजनाओं की घोषणा या कई महत्वपूर्ण फैसले लेने से बचती हैं। इसका सीधा असर विकास कार्यों की गति पर पड़ता है। अगर देश में एक साथ चुनाव होंगे तो सरकारों को लंबे समय तक बिना चुनावी बाधाओं के काम करने का अवसर मिलेगा। इससे विकास योजनाओं को समय पर पूरा करने में मदद मिल सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का एक बड़ा फायदा प्रशासनिक व्यवस्था को भी मिलेगा। चुनाव के दौरान बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारियों को चुनावी ड्यूटी में लगाया जाता है। इससे सामान्य सरकारी काम प्रभावित होते हैं। कई बार स्कूलों के शिक्षक, सरकारी अधिकारी और सुरक्षाकर्मी चुनावी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो जाते हैं। यदि चुनाव एक साथ होंगे तो प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा और सरकारी विभाग अपने नियमित कार्यों पर अधिक ध्यान दे पाएंगे।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से भी यह व्यवस्था लाभकारी हो सकती है। चुनावों के दौरान बड़ी संख्या में पुलिस बल और केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ती है। बार-बार चुनाव होने से सुरक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बढ़ता है। एक साथ चुनाव होने से सुरक्षा बलों की तैनाती अधिक प्रभावी तरीके से की जा सकती है और उन्हें अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के लिए उपलब्ध रखा जा सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसके अलावा, मतदाताओं के लिए भी यह प्रक्रिया अधिक सुविधाजनक हो सकती है। देश के नागरिकों को बार-बार चुनावों में हिस्सा लेने के लिए मतदान केंद्रों तक जाना पड़ता है। एक साथ चुनाव होने से मतदाता एक ही समय में लोकसभा और विधानसभा के लिए मतदान कर सकेंगे। इससे मतदान प्रक्रिया सरल हो सकती है और लोगों की भागीदारी भी बढ़ सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">एक साथ चुनाव कराने से राजनीतिक स्थिरता को भी बढ़ावा मिल सकता है। कई बार लगातार चुनावी माहौल के कारण राजनीतिक दल अपना अधिक ध्यान चुनावी रणनीति पर केंद्रित रखते हैं। इससे नीतिगत फैसलों और विकास के मुद्दों पर चर्चा कम हो जाती है। अगर चुनाव एक निश्चित समय पर होंगे तो राजनीतिक दलों को भी जनता से जुड़े मुद्दों और दीर्घकालिक योजनाओं पर अधिक ध्यान देने का अवसर मिलेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हालांकि, ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को लागू करना आसान नहीं होगा। भारत एक विशाल और विविधताओं वाला देश है, जहां अलग-अलग राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियां अलग होती हैं। कई बार किसी राज्य की विधानसभा समय से पहले भंग हो सकती है या किसी सरकार को बहुमत नहीं मिल सकता है। ऐसे मामलों के लिए मजबूत संवैधानिक व्यवस्था और स्पष्ट नियमों की आवश्यकता होगी। साथ ही, इस विषय पर सभी राजनीतिक दलों और राज्यों के बीच सहमति बनाना भी जरूरी है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कुछ लोगों का यह भी मानना है कि एक साथ चुनाव होने से राष्ट्रीय मुद्दों का प्रभाव राज्य के मुद्दों पर अधिक पड़ सकता है। लेकिन उचित व्यवस्था, जागरूक मतदाता और निष्पक्ष चुनाव प्रणाली के माध्यम से इन चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है कि किसी भी सुधार को सभी पक्षों की सहमति और पारदर्शिता के साथ लागू किया जाए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मेरे विचार से ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ भारत के लिए एक सकारात्मक और दूरदर्शी पहल हो सकती है। यह केवल चुनाव कराने की व्यवस्था में बदलाव नहीं है, बल्कि प्रशासनिक सुधार और बेहतर शासन की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है। इससे समय, धन और संसाधनों की बचत होगी तथा सरकारों को विकास कार्यों पर अधिक ध्यान देने का अवसर मिलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में चुनाव व्यवस्था को मजबूत, सरल और प्रभावी बनाना समय की जरूरत है। यदि ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ को सभी संवैधानिक प्रावधानों, लोकतांत्रिक मूल्यों और राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए लागू किया जाता है, तो यह देश के विकास और सुशासन के लिए एक ऐतिहासिक बदलाव साबित हो सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Jul 2026 18:10:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सरकारी योजनाओं से आम आदमी को मिल रही नई उम्मीद, बदलाव की रफ्तार बढ़ाने की जरूरत</title>
                                    <description><![CDATA[सरकारी योजनाओं का उद्देश्य तभी पूरा होता है जब उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक समय पर और पारदर्शी तरीके से पहुंचे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/the-common-man-is-getting-new-hope-from-government-schemes/article-58448"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/government-schemes.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">सरकारें किसी भी देश में केवल कानून बनाने या प्रशासन चलाने के लिए नहीं होतीं, बल्कि उनका सबसे बड़ा दायित्व आम लोगों के जीवन को बेहतर बनाना भी होता है। इसी सोच के साथ समय-समय पर केंद्र और राज्य सरकारें अलग-अलग योजनाएं शुरू करती हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य गरीब, किसान, मजदूर, महिला, युवा, बुजुर्ग, छात्र और छोटे कारोबारियों जैसे हर वर्ग तक सुविधाएं पहुंचाना होता है। मेरा मानना है कि अगर सरकारी योजनाओं को सही तरीके से लागू किया जाए और पात्र लोगों तक बिना किसी बाधा के उनका लाभ पहुंचे, तो वे करोड़ों लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं। पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसी योजनाएं सामने आई हैं, जिनका असर गांव से लेकर शहर तक देखने को मिला है। हालांकि चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन यह भी सच है कि योजनाओं ने लाखों परिवारों के लिए नई उम्मीद जगाई है।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे बड़ा सकारात्मक पक्ष यह है कि सरकारी योजनाएं आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सहारा देने का काम करती हैं। जब किसी गरीब परिवार को इलाज के लिए आर्थिक मदद मिलती है, किसान को खेती के लिए सहायता मिलती है या किसी छात्र को छात्रवृत्ति मिलती है, तो उसका सीधा असर उसके जीवन पर पड़ता है। कई परिवार ऐसे हैं जिनके लिए सरकारी सहायता किसी संकट के समय सबसे बड़ा सहारा साबित होती है। यही कारण है कि सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं का महत्व लगातार बढ़ा है। यदि कोई परिवार आर्थिक कठिनाइयों से गुजर रहा हो और उसे समय पर सरकारी सहायता मिल जाए, तो वह मुश्किल दौर से आसानी से बाहर निकल सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मेरा मानना है कि सरकारी योजनाओं का दूसरा बड़ा फायदा यह है कि वे समाज में समान अवसर देने की दिशा में काम करती हैं। हर व्यक्ति की आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं होती। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह कमजोर वर्ग को आगे बढ़ने का मौका दे। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और स्वरोजगार से जुड़ी योजनाएं लोगों को आत्मनिर्भर बनने में मदद करती हैं। जब किसी युवा को कौशल प्रशिक्षण मिलता है या किसी महिला को अपना छोटा व्यवसाय शुरू करने के लिए सहायता मिलती है, तो उसका लाभ केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं का महत्व और भी अधिक दिखाई देता है। गांवों में सड़क, बिजली, पानी, आवास, शौचालय, सिंचाई और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ी योजनाओं ने लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने की कोशिश की है। पहले जिन सुविधाओं के लिए लोगों को वर्षों तक इंतजार करना पड़ता था, अब कई जगहों पर उनमें तेजी आई है। हालांकि हर क्षेत्र की स्थिति एक जैसी नहीं है, लेकिन जहां योजनाओं का सही क्रियान्वयन हुआ है, वहां बदलाव साफ दिखाई देता है। यही वजह है कि विकास की चर्चा में सरकारी योजनाओं की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण मानी जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">डिजिटल तकनीक के बढ़ते उपयोग ने भी योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने में मदद की है। आज कई योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थियों के बैंक खाते में पहुंच रहा है। इससे बिचौलियों की भूमिका कम हुई है और पारदर्शिता बढ़ी है। ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल सत्यापन और समय-समय पर निगरानी जैसी व्यवस्थाओं ने प्रक्रिया को पहले की तुलना में अधिक आसान बनाया है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग अब डिजिटल सेवाओं का उपयोग करना सीख रहे हैं, जिससे सरकारी योजनाओं तक उनकी पहुंच बेहतर हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि केवल योजना बनाना ही पर्याप्त नहीं है। मेरा मानना है कि किसी भी योजना की असली सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। कई बार जानकारी के अभाव, दस्तावेजों की कमी, तकनीकी दिक्कतों या प्रशासनिक देरी के कारण पात्र लोगों को समय पर लाभ नहीं मिल पाता। कुछ दूरदराज के इलाकों में आज भी लोग यह नहीं जानते कि वे किन योजनाओं के लिए पात्र हैं और आवेदन कैसे करें। इसलिए सरकार के साथ-साथ स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की भी जिम्मेदारी है कि वे लोगों तक सही जानकारी पहुंचाएं और प्रक्रिया को सरल बनाएं। यह भी जरूरी है कि योजनाओं की समय-समय पर समीक्षा हो। बदलती जरूरतों के अनुसार उनमें सुधार किया जाए और लोगों से मिलने वाले सुझावों को भी महत्व दिया जाए। यदि किसी योजना में कमी दिखाई देती है तो उसे स्वीकार कर बेहतर बनाया जाना चाहिए। इससे न केवल योजनाओं की विश्वसनीयता बढ़ेगी बल्कि आम लोगों का भरोसा भी मजबूत होगा। पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमित निगरानी किसी भी सरकारी योजना की सफलता के सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मेरी राय में सरकारी योजनाएं केवल आर्थिक सहायता देने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे लोगों को सम्मान के साथ आगे बढ़ने का अवसर भी देती हैं। जब कोई छात्र अपनी पढ़ाई पूरी करता है, कोई किसान बेहतर उत्पादन करता है, कोई महिला अपना व्यवसाय शुरू करती है या किसी गरीब परिवार को पक्का घर मिलता है, तो यह केवल एक व्यक्ति की सफलता नहीं होती बल्कि पूरे समाज के विकास की दिशा में उठाया गया कदम होता है। इसलिए जरूरी है कि योजनाओं का लाभ बिना किसी भेदभाव के हर पात्र व्यक्ति तक पहुंचे। अंततः मेरा मानना है कि सरकारी योजनाएं आम आदमी के जीवन में बड़ा बदलाव लाने की क्षमता रखती हैं। उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वे कितनी ईमानदारी, पारदर्शिता और गति के साथ लागू की जाती हैं। यदि सरकार, प्रशासन और नागरिक मिलकर अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से पालन करें, तो सरकारी योजनाएं केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि देश के विकास और लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने का मजबूत आधार बनेंगी। यही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जानी चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 00:02:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>आखिर क्यों आज की युवा पीढ़ी को 90 के दशक के गाने और कव्वालियां ज्यादा पसंद आ रही हैं?</title>
                                    <description><![CDATA[तेज रफ्तार जिंदगी, मानसिक तनाव और सुकून की तलाश के बीच पुराना संगीत फिर बन रहा युवाओं की पहली पसंद, सोशल मीडिया ने भी बढ़ाई इसकी लोकप्रियता।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/after-all-why-is-todays-young-generation-liking-the-songs/article-58304"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/music-trends.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आज अगर आप सोशल मीडिया खोलें या किसी लंबी ड्राइव पर निकलें, तो एक दिलचस्प बदलाव आसानी से दिखाई देता है। पहले जहां नई रिलीज़ होने वाली फिल्मों के गाने लोगों की प्लेलिस्ट पर छाए रहते थे, वहीं अब बड़ी संख्या में लोग 90 के दशक के गाने, पुराने रोमांटिक गीत, सूफी संगीत और कव्वालियां सुनना पसंद कर रहे हैं। चाहे कार में सफर हो, रात का सन्नाटा हो या फिर काम के बीच कुछ पल सुकून के चाहिए हों, लोग बार-बार उन्हीं पुराने गीतों की ओर लौट रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मेरी राय में इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि पुराने गानों में भावनाएं ज्यादा और दिखावा कम होता था। उस दौर का संगीत केवल मनोरंजन के लिए नहीं बनाया जाता था, बल्कि हर गीत के पीछे एक कहानी, एक एहसास और एक संदेश होता था। गीतों के बोल इतने सरल और गहरे होते थे कि सुनने वाला खुद को उनसे जोड़ लेता था। आज भी जब कुमार सानू, उदित नारायण, अलका याज्ञनिक, लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार या जगजीत सिंह की आवाज़ सुनाई देती है, तो मन अपने आप शांत हो जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में लोगों के पास तनाव पहले से कहीं ज्यादा है। नौकरी का दबाव, पढ़ाई की प्रतिस्पर्धा, सोशल मीडिया की तुलना और भविष्य की चिंता हर उम्र के लोगों को प्रभावित कर रही है। ऐसे माहौल में पुराने गाने और कव्वालियां मानसिक शांति देने का काम करते हैं। इनमें शोर कम और सुकून ज्यादा होता है। शायद यही वजह है कि युवा भी अब इन्हें सुनने लगे हैं, जबकि उन्होंने वह दौर देखा भी नहीं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कव्वालियों की लोकप्रियता बढ़ने के पीछे भी यही कारण है। सूफी संगीत और कव्वालियां केवल धार्मिक संगीत नहीं हैं, बल्कि इनमें इंसानियत, मोहब्बत, आत्मिक शांति और जीवन के गहरे अर्थ छिपे होते हैं। जब कोई व्यक्ति नुसरत फ़तेह अली खान, साबरी ब्रदर्स या अज़ीज़ मियां की कव्वाली सुनता है, तो वह केवल संगीत नहीं सुन रहा होता, बल्कि भावनाओं के एक अलग संसार में प्रवेश कर जाता है। यही अनुभव आज की पीढ़ी को आकर्षित कर रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सोशल मीडिया ने भी इस बदलाव में बड़ी भूमिका निभाई है। इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और फेसबुक वीडियो पर पुराने गानों के नए संस्करण, रीमिक्स और स्लो-रीवर्ब वर्जन खूब वायरल हो रहे हैं। कई युवा पहले इन गानों को किसी वीडियो के बैकग्राउंड में सुनते हैं और फिर पूरा गाना खोजकर अपनी प्लेलिस्ट में जोड़ लेते हैं। यानी डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पुरानी धुनों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम किया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मेरे अनुसार एक और बड़ा कारण यह है कि आज के कई गानों में तकनीक का इस्तेमाल तो बहुत होता है, लेकिन भावनात्मक गहराई कम महसूस होती है। बीट्स तेज़ हैं, म्यूजिक आधुनिक है, लेकिन ऐसे गाने कम हैं जो वर्षों तक लोगों की यादों में बने रहें। इसके विपरीत 90 के दशक के गाने आज भी शादी, यात्रा, त्योहार और पारिवारिक आयोजनों में उसी उत्साह के साथ बजते हैं, जैसे पहली बार रिलीज़ हुए हों।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पुराने गाने लोगों को उनकी यादों से भी जोड़ते हैं। किसी को अपना बचपन याद आता है, किसी को स्कूल के दिन, किसी को कॉलेज का प्यार और किसी को परिवार के साथ बिताए पल। संगीत केवल कानों तक नहीं पहुंचता, बल्कि यादों को भी जगा देता है। यही वजह है कि पुराने गीतों का असर आज भी वैसा ही बना हुआ है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हाल के वर्षों में लाइव कव्वाली नाइट्स और रेट्रो म्यूजिक कॉन्सर्ट्स में भी युवाओं की भीड़ बढ़ी है। पहले माना जाता था कि ऐसे कार्यक्रम केवल बड़ी उम्र के लोग पसंद करते हैं, लेकिन अब कॉलेज के छात्र और युवा प्रोफेशनल्स भी बड़ी संख्या में इनमें शामिल हो रहे हैं। इससे साफ होता है कि अच्छी धुन और अर्थपूर्ण गीत कभी पुराने नहीं होते।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि आज का संगीत अच्छा नहीं है। आज भी कई कलाकार बेहतरीन और अर्थपूर्ण गाने बना रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पुराने दौर में ऐसे गानों की संख्या अधिक थी, जबकि आज तेज़ी से बदलते ट्रेंड के कारण कई गाने कुछ महीनों बाद ही लोगों की यादों से गायब हो जाते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मेरी नजर में यह बदलाव सकारात्मक है। अगर नई पीढ़ी पुराने संगीत, कव्वालियों और क्लासिक गीतों की ओर लौट रही है, तो यह केवल एक ट्रेंड नहीं बल्कि अच्छी कला की पहचान है। अच्छा संगीत समय की सीमा में नहीं बंधता। वह पीढ़ियां बदलने के बाद भी लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाए रखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आखिर में मैं यही कहना चाहूंगा कि संगीत का कोई युग नहीं होता। जो धुन दिल को छू जाए, वही सबसे अच्छी होती है। अगर आज का युवा 90 के दशक के गाने और कव्वालियां सुनकर सुकून महसूस करता है, तो यह इस बात का प्रमाण है कि सच्चा संगीत कभी पुराना नहीं होता। बदलते दौर में भी भावनाएं वही रहती हैं और शायद इसी वजह से पुराने गीत आज भी नई पीढ़ी के दिलों पर राज कर रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 15:43:59 +0530</pubDate>
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                <title>क्या मोबाइल फोन कपल्स के बीच सबसे बड़ा तीसरा व्यक्ति बन गया है? रिश्तों में बढ़ती दूरी पर सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[एक ही कमरे में साथ रहने के बावजूद स्क्रीन में खोए रहते हैं लोग, क्या स्मार्टफोन रिश्तों की गर्माहट कम कर रहा है?]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/has-mobile-phone-become-the-biggest-third-person-among-couples/article-58117"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/relationship-advice.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">आज के दौर में मोबाइल फोन जिंदगी का जरूरी हिस्सा बन चुका है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक ज्यादातर लोगों का समय किसी न किसी स्क्रीन के साथ गुजरता है। फोन ने जहां लोगों के काम आसान किए हैं, वहीं रिश्तों पर भी इसका असर दिखाई देने लगा है। खासकर कपल्स के बीच अब एक नई तरह की समस्या सामने आ रही है, जहां एक ही घर में रहने वाले लोग भी एक-दूसरे से ज्यादा समय मोबाइल स्क्रीन के साथ बिताने लगे हैं। कई रिश्तों में अब शिकायत यह नहीं होती कि पार्टनर समय नहीं देता, बल्कि यह होती है कि पार्टनर साथ होकर भी मौजूद नहीं रहता। बातचीत के बीच बार-बार फोन देखना, खाने की टेबल पर मोबाइल चलाना या सोने से पहले घंटों सोशल मीडिया पर लगे रहना धीरे-धीरे रिश्तों में दूरी पैदा कर सकता है।  किसी भी रिश्ते की मजबूती बातचीत, ध्यान और भावनात्मक जुड़ाव पर निर्भर करती है। जब मोबाइल लगातार ध्यान खींचता रहता है तो पार्टनर के साथ बिताया जाने वाला समय कम होने लगता है। यह छोटी-छोटी आदतें आगे चलकर बड़े मतभेद का कारण बन सकती हैं। पहले कपल्स अपने खाली समय में एक-दूसरे से बातें करते थे, दिनभर की बातें साझा करते थे और साथ में समय बिताते थे। लेकिन अब कई बार दोनों लोग एक ही जगह बैठे होते हैं और अपनी-अपनी स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। बाहर से देखने पर सब सामान्य लगता है, लेकिन अंदर ही अंदर रिश्ते में भावनात्मक दूरी बढ़ सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मोबाइल फोन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह धीरे-धीरे आदत में बदल जाता है। शुरुआत में कुछ मिनट के लिए फोन देखना सामान्य लगता है, लेकिन कब यह घंटों में बदल जाता है, इसका पता नहीं चलता। सोशल मीडिया, वीडियो स्ट्रीमिंग और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन इंसान का ध्यान बार-बार अपनी ओर खींचते हैं। कई कपल्स में यह भी देखा गया है कि फोन को लेकर शक और असुरक्षा की भावना बढ़ने लगी है। पार्टनर ज्यादा समय मोबाइल पर बिताता है तो दूसरा व्यक्ति खुद को नजरअंदाज महसूस कर सकता है। कभी-कभी फोन की प्राइवेसी को लेकर भी रिश्तों में तनाव पैदा हो जाता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मोबाइल फोन रिश्तों का दुश्मन है। सही इस्तेमाल किया जाए तो यही तकनीक रिश्तों को मजबूत भी कर सकती है। दूर रहने वाले कपल्स वीडियो कॉल और मैसेज के जरिए जुड़े रह सकते हैं। समस्या मोबाइल नहीं, बल्कि उसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल है। रिश्तों में संतुलन बनाए रखने के लिए कई विशेषज्ञ "नो फोन टाइम" की सलाह देते हैं। जैसे खाना खाते समय फोन दूर रखना, सोने से पहले कुछ समय सिर्फ बातचीत के लिए निकालना और हफ्ते में एक दिन बिना ज्यादा स्क्रीन टाइम के साथ बिताना रिश्ते को बेहतर बना सकता है। कपल्स के लिए जरूरी है कि वे एक-दूसरे की मौजूदगी को महत्व दें। कई बार पार्टनर को महंगे गिफ्ट या बड़े सरप्राइज से ज्यादा जरूरत होती है कि सामने वाला उसकी बात ध्यान से सुने। रिश्ते छोटे-छोटे पलों से मजबूत होते हैं और इन पलों की जगह अगर हमेशा मोबाइल ले ले तो दूरी बढ़ना स्वाभाविक है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज मोबाइल हमारी जिंदगी का हिस्सा है, लेकिन रिश्तों में उसकी जगह तय करना जरूरी है। तकनीक का इस्तेमाल सुविधा के लिए होना चाहिए, रिश्तों के बीच दीवार बनाने के लिए नहीं। एक-दूसरे के साथ बिताया गया समय ही किसी भी रिश्ते की असली ताकत होता है। बदलते समय में सवाल यह नहीं है कि मोबाइल रखना चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या हम मोबाइल को इतना समय दे रहे हैं कि अपने करीबी रिश्तों के लिए समय कम पड़ जाए। अगर जवाब हां है, तो शायद रिश्तों को बचाने के लिए स्क्रीन से थोड़ा दूरी बनाना जरूरी हो गया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 16:39:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>क्या नकदी का दौर खत्म होने की ओर है? कैशलेस अर्थव्यवस्था पर दुनिया में तेज हुई नई बहस</title>
                                    <description><![CDATA[डिजिटल पेमेंट और UPI के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के बीच सवाल उठ रहे हैं कि क्या पूरी तरह Cashless व्यवस्था आर्थिक पारदर्शिता बढ़ाएगी या फिर इससे गरीब, ग्रामीण आबादी और वित्तीय गोपनीयता पर बड़ा असर पड़ेगा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/is-the-era-of-cash-coming-to-an-end-new/article-58015"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/caseless-.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">कुछ साल पहले तक किसी भी खरीदारी का मतलब जेब से नोट निकालकर भुगतान करना होता था। किराने की दुकान, सब्जी मंडी, बस का टिकट, अस्पताल की फीस या रेस्त्रां का बिल—हर जगह Cash सबसे सामान्य और भरोसेमंद माध्यम माना जाता था। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। आज एक QR कोड स्कैन करते ही कुछ सेकेंड में भुगतान हो जाता है। भारत समेत दुनिया के कई देशों में डिजिटल पेमेंट ने लोगों की जीवनशैली बदल दी है। ऐसे में एक बड़ा सवाल सामने आ रहा है कि क्या आने वाले समय में Cash पूरी तरह खत्म हो जाएगा, या फिर Cashless Society का सपना समाज के एक बड़े वर्ग के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर सकता है।</p>
<p>भारत में डिजिटल पेमेंट का विस्तार अभूतपूर्व रहा है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI ने बैंकिंग व्यवस्था को आम लोगों तक पहले से कहीं ज्यादा आसान बना दिया है। छोटे दुकानदार, ऑटो चालक, सड़क किनारे चाय बेचने वाले, फल विक्रेता और बड़े कारोबारी—आज लगभग हर कोई डिजिटल भुगतान स्वीकार कर रहा है। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने भुगतान की प्रक्रिया को इतना आसान बना दिया है कि कई लोग अब अपने साथ Cash रखना भी जरूरी नहीं समझते। यही वजह है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य डिजिटल लेनदेन का है।</p>
<p>सरकारें भी Cashless Economy को बढ़ावा देने के पक्ष में हैं। उनका मानना है कि डिजिटल भुगतान से हर ट्रांजैक्शन का रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है, जिससे टैक्स चोरी पर नियंत्रण लगाने में मदद मिलती है। काले धन, फर्जी लेनदेन और मनी लॉन्ड्रिंग जैसी गतिविधियों पर भी निगरानी आसान हो जाती है। इसके अलावा सरकार को नकदी छापने, उसकी सुरक्षा, परिवहन और वितरण पर होने वाला भारी खर्च भी कम करना पड़ता है। यही कारण है कि कई देशों ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएं और नीतियां बनाई हैं।</p>
<p>लेकिन इस पूरी बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कई अर्थशास्त्रियों और सामाजिक विशेषज्ञों का कहना है कि पूरी तरह Cashless व्यवस्था हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयोगी नहीं हो सकती। आज भी करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है, इंटरनेट की नियमित सुविधा नहीं है या वे डिजिटल बैंकिंग का उपयोग करने में सहज नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग, बुजुर्ग नागरिक, दिहाड़ी मजदूर और कम आय वाले परिवार अब भी Cash पर अधिक निर्भर हैं। यदि भविष्य में Cash का इस्तेमाल बहुत सीमित हो जाता है तो यह वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है।</p>
<p>विशेषज्ञों का कहना है कि Cash केवल भुगतान का माध्यम नहीं बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता का भी प्रतीक है। यदि मोबाइल नेटवर्क बंद हो जाए, बैंक सर्वर काम न करें, बिजली चली जाए या किसी तकनीकी कारण से डिजिटल भुगतान रुक जाए, तो Cash ही एकमात्र विकल्प बचता है। प्राकृतिक आपदा, युद्ध, साइबर हमले या बड़े तकनीकी संकट के दौरान दुनिया के कई देशों में Cash की उपयोगिता फिर सामने आई है। इसलिए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी देश को पूरी तरह Cashless बनने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।</p>
<p>एक और बड़ा मुद्दा Financial Privacy यानी वित्तीय गोपनीयता का है। जब हर भुगतान डिजिटल माध्यम से होगा तो व्यक्ति की खरीदारी, यात्रा, इलाज, खान-पान और आर्थिक गतिविधियों का विस्तृत डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होगा। इससे यह सवाल उठता है कि इस डेटा तक किसकी पहुंच होगी और इसका उपयोग किस तरह किया जाएगा। डिजिटल अधिकारों पर काम करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि यदि डेटा सुरक्षा मजबूत नहीं होगी तो लोगों की निजी आर्थिक जानकारी का दुरुपयोग भी हो सकता है। यही वजह है कि कई देशों में डेटा प्रोटेक्शन कानूनों को लगातार मजबूत किया जा रहा है।</p>
<p>दूसरी ओर तकनीकी विशेषज्ञों का तर्क है कि डिजिटल भुगतान पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित हो चुका है। बैंक अब मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन, एन्क्रिप्शन और फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। यदि किसी व्यक्ति का मोबाइल खो भी जाए तो बैंक खाते को तुरंत ब्लॉक किया जा सकता है, जबकि Cash चोरी होने या खो जाने पर उसे वापस पाना लगभग असंभव होता है। इसलिए उनके अनुसार तकनीक के साथ सुरक्षा भी लगातार मजबूत हो रही है।</p>
<p>हालांकि साइबर अपराधों में भी तेजी आई है। फर्जी कस्टमर केयर नंबर, फिशिंग लिंक, QR कोड स्कैम, स्क्रीन शेयरिंग ऐप, OTP फ्रॉड और बैंकिंग धोखाधड़ी के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। डिजिटल भुगतान जितनी तेजी से बढ़ा है, उतनी ही तेजी से साइबर अपराधियों ने भी नए तरीके विकसित किए हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल साक्षरता और साइबर जागरूकता बढ़ाना अब सरकारों और बैंकिंग संस्थानों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन गई है।</p>
<p>दुनिया के कई देशों में अब यह चर्चा भी चल रही है कि क्या नागरिकों को हमेशा Cash में भुगतान करने का अधिकार मिलना चाहिए। स्वीडन और नॉर्वे जैसे देशों में डिजिटल भुगतान का प्रतिशत दुनिया में सबसे अधिक है, लेकिन वहां भी कई विशेषज्ञ और सामाजिक संगठन यह मांग कर रहे हैं कि Cash का विकल्प पूरी तरह समाप्त नहीं होना चाहिए। उनका तर्क है कि आपातकालीन परिस्थितियों में Cash सबसे विश्वसनीय माध्यम साबित होता है।</p>
<p>भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में यह बहस और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां करोड़ों लोग अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में रहते हैं। शहरों में डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ा है, लेकिन गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों में अभी भी Cash का महत्व बना हुआ है। कई छोटे व्यापारी दोनों विकल्प रखते हैं ताकि ग्राहक अपनी सुविधा के अनुसार भुगतान कर सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत पूरी तरह Cashless बनने की बजाय "Less Cash Economy" की दिशा में आगे बढ़ सकता है, जहां डिजिटल भुगतान प्रमुख होगा लेकिन Cash की भूमिका भी बनी रहेगी।</p>
<p>केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) जैसे नए प्रयोग भी इसी बदलाव का हिस्सा माने जा रहे हैं। कई देशों के केंद्रीय बैंक अपनी डिजिटल मुद्रा विकसित कर रहे हैं ताकि भुगतान प्रणाली और अधिक तेज, सुरक्षित और पारदर्शी बन सके। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल करेंसी आने के बाद भी Cash की उपयोगिता पूरी तरह समाप्त नहीं होगी, क्योंकि यह केवल तकनीक का नहीं बल्कि सामाजिक व्यवहार और व्यक्तिगत पसंद का भी विषय है।</p>
<p>आज दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां यह बहस केवल भुगतान के तरीके तक सीमित नहीं रह गई है। यह नागरिकों की स्वतंत्रता, वित्तीय समानता, डेटा सुरक्षा और तकनीकी पहुंच से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुकी है। एक तरफ डिजिटल भुगतान से सुविधा, पारदर्शिता और तेज लेनदेन का रास्ता खुल रहा है, वहीं दूसरी तरफ यह चिंता भी बनी हुई है कि कहीं तकनीकी बदलाव की इस दौड़ में समाज का कमजोर वर्ग पीछे न छूट जाए। यही वजह है कि नीति निर्माता, अर्थशास्त्री और तकनीकी विशेषज्ञ अब ऐसे मॉडल की तलाश में हैं जिसमें डिजिटल प्रगति भी जारी रहे और Cash का विकल्प भी पूरी तरह खत्म न हो।</p>
<p>-----</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 15:16:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Priyanka ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सोशल मीडिया की दुनिया में खोती नई पीढ़ी</title>
                                    <description><![CDATA[डिजिटल लाइफस्टाइल बढ़ने से युवाओं का रुझान आभासी दुनिया की ओर बढ़ा, वास्तविक जीवन की चुनौतियों से दूरी और मानसिक दबाव की स्थिति]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/new-generation-getting-lost-in-the-world-of-social-media/article-57581"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/social-media-impact.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आज अगर किसी भी सार्वजनिक जगह पर कुछ मिनट रुककर लोगों को देखा जाए तो एक बात साफ नजर आती है। बस स्टैंड हो, कॉलेज का कैंपस, मेट्रो, पार्क, कैफे या फिर घर का ड्राइंग रूम—अधिकांश लोगों की नजर मोबाइल स्क्रीन पर होती है। खासकर युवाओं की दिनचर्या का बड़ा हिस्सा अब सोशल मीडिया के इर्द-गिर्द घूमने लगा है। ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का माध्यम है। यह जानकारी, शिक्षा, रोजगार और संवाद का भी बड़ा प्लेटफॉर्म बन चुका है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर क्यों आज की युवा पीढ़ी वास्तविक जीवन की चुनौतियों का सामना करने के बजाय सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में ज्यादा समय बिताना पसंद कर रही है?</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस सवाल का जवाब केवल तकनीक में नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक माहौल, पारिवारिक परिस्थितियों और मानसिक दबावों में भी छिपा है। आज का युवा पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रतिस्पर्धा, अपेक्षाओं और अनिश्चितताओं के बीच जी रहा है। पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन, अच्छी नौकरी, आर्थिक स्थिरता और सफल करियर का दबाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में सोशल मीडिया उसे कुछ समय के लिए इस तनाव से बाहर निकलने का आसान रास्ता देता है। कुछ मिनटों के लिए वीडियो देखना या दोस्तों की पोस्ट पर प्रतिक्रिया देना उसे वास्तविक समस्याओं से दूर ले जाता है। धीरे-धीरे यही अस्थायी राहत आदत बन जाती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सोशल मीडिया का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि यहां हर व्यक्ति अपनी पसंद की दुनिया बना सकता है। वह वही देखता है जो उसे अच्छा लगता है। उसकी टाइमलाइन पर वही कंटेंट आता है जिससे उसे खुशी, मनोरंजन या रोमांच मिलता है। वास्तविक जीवन में जहां असफलता, आलोचना और संघर्ष का सामना करना पड़ता है, वहीं सोशल मीडिया पर सब कुछ अधिक आकर्षक और नियंत्रित दिखाई देता है। शायद यही वजह है कि कई युवा वास्तविक चुनौतियों का सामना करने के बजाय आभासी दुनिया में अधिक सहज महसूस करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">एक और महत्वपूर्ण कारण तुलना की संस्कृति है। सोशल मीडिया पर लोग अपनी जिंदगी के सबसे अच्छे पल साझा करते हैं। महंगी कार, विदेशी यात्रा, नई नौकरी, शानदार कपड़े और खुशहाल तस्वीरें देखकर देखने वाले को लगता है कि बाकी सभी लोग उससे बेहतर जीवन जी रहे हैं। यह तुलना कई युवाओं में हीन भावना और असंतोष पैदा करती है। फिर वे भी वैसी ही तस्वीरें और वीडियो साझा करने की कोशिश करते हैं ताकि उन्हें भी सराहना मिले। धीरे-धीरे वास्तविक जीवन से ज्यादा महत्व ऑनलाइन छवि को मिलने लगता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">'लाइक', 'कमेंट' और 'फॉलोअर्स' भी एक तरह का मनोवैज्ञानिक पुरस्कार बन चुके हैं। जब किसी पोस्ट पर अधिक प्रतिक्रिया मिलती है तो खुशी महसूस होती है, जबकि अपेक्षा से कम प्रतिक्रिया मिलने पर निराशा होती है। यह स्थिति बताती है कि कई लोगों का आत्मविश्वास अब वास्तविक उपलब्धियों के बजाय डिजिटल स्वीकार्यता पर निर्भर होने लगा है। यह प्रवृत्ति लंबे समय में मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हालांकि पूरी जिम्मेदारी सोशल मीडिया पर डाल देना भी उचित नहीं होगा। परिवार और समाज की बदलती भूमिका भी इसके लिए जिम्मेदार है। पहले संयुक्त परिवारों में बातचीत, सामूहिक गतिविधियां और रिश्तों में अधिक समय दिया जाता था। अब अधिकांश परिवारों में सभी सदस्य अपने-अपने काम और स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। जब घर में संवाद कम हो जाता है तो युवा अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए ऑनलाइन दुनिया का सहारा लेने लगते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई और घर से काम करने की व्यवस्था ने भी डिजिटल जीवन को सामान्य बना दिया। उस समय सोशल मीडिया ने लोगों को जोड़ने का काम किया, लेकिन महामारी खत्म होने के बाद भी कई लोग उसी डिजिटल जीवनशैली से बाहर नहीं निकल पाए। यह आदत अब रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह भी सच है कि सोशल मीडिया के कई सकारात्मक पहलू हैं। आज हजारों युवा इसी माध्यम से नए कौशल सीख रहे हैं, अपना व्यवसाय बढ़ा रहे हैं, रोजगार के अवसर तलाश रहे हैं और सामाजिक मुद्दों पर अपनी आवाज उठा रहे हैं। कई छोटे कारोबार सोशल मीडिया की मदद से बड़े बने हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और करियर से जुड़ी उपयोगी जानकारी भी अब कुछ ही सेकंड में उपलब्ध हो जाती है। इसलिए समस्या सोशल मीडिया नहीं, बल्कि उसका असंतुलित उपयोग है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जरूरत इस बात की है कि युवा डिजिटल और वास्तविक जीवन के बीच संतुलन बनाना सीखें। परिवारों को भी बच्चों और युवाओं के साथ अधिक समय बिताना चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में डिजिटल साक्षरता के साथ मानसिक स्वास्थ्य और समय प्रबंधन पर भी खुलकर चर्चा होनी चाहिए। युवाओं को खेल, पढ़ाई, सामाजिक गतिविधियों और प्रत्यक्ष संवाद के लिए भी समय निकालना होगा। वास्तविक रिश्ते, अनुभव और संघर्ष ही व्यक्ति को मजबूत बनाते हैं, न कि केवल ऑनलाइन पहचान।</p>
<p style="text-align:justify;">आखिरकार सोशल मीडिया एक साधन है, जीवन नहीं। इसका उपयोग ज्ञान, संवाद और अवसरों के लिए किया जाना चाहिए, लेकिन यदि यही हमारी दुनिया बन जाए तो हम धीरे-धीरे वास्तविक अनुभवों से दूर होते चले जाते हैं। नई पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती तकनीक से दूरी बनाना नहीं, बल्कि उसका समझदारी और संतुलन के साथ उपयोग करना है। जो युवा इस संतुलन को समझ लेंगे, वे डिजिटल दुनिया का लाभ भी उठा सकेंगे और वास्तविक जीवन की चुनौतियों का सामना भी अधिक आत्मविश्वास के साथ कर पाएंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 00:36:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>क्या युवा अब दोस्तों से ज्यादा ChatGPT पर करने लगे हैं भरोसा?</title>
                                    <description><![CDATA[AI चैटबॉट्स से बढ़ती बातचीत केवल तकनीक का प्रभाव नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली, अकेलेपन, गोपनीयता और बिना जजमेंट के सुने जाने की चाह का भी संकेत है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/have-youth-now-started-trusting-chatgpt-more-than-friends/article-57470"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/ai-and-youth.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पिछले कुछ वर्षों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने लोगों के काम करने, सीखने और जानकारी हासिल करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। लेकिन अब एक नया बदलाव भी तेजी से देखने को मिल रहा है। कई युवा केवल पढ़ाई, नौकरी या जानकारी के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी भावनाएं, उलझनें, रिश्तों की समस्याएं और जीवन से जुड़े सवाल भी ChatGPT जैसे AI चैटबॉट्स से साझा कर रहे हैं। यह सवाल अब अक्सर उठने लगा है कि क्या आज की युवा पीढ़ी इंसानों से ज्यादा AI के साथ अपने मन की बात करने में सहज महसूस करती है? इसका जवाब पूरी तरह "हां" या "नहीं" में देना आसान नहीं है, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि AI ने युवाओं के लिए संवाद का एक नया माध्यम तैयार किया है। इसके पीछे कई सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और तकनीकी कारण हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>बिना जजमेंट के अपनी बात कहने की आजादी</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आज का युवा सबसे ज्यादा जिस चीज की तलाश में है, वह है ऐसा व्यक्ति या माध्यम जो उसकी बात बिना टोके, बिना आलोचना किए और बिना किसी पूर्वाग्रह के सुने। कई बार परिवार, दोस्त या रिश्तेदार सलाह देने से पहले ही निर्णय सुना देते हैं। इससे कई युवा अपनी भावनाएं दबाकर रखना बेहतर समझते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">AI के साथ बातचीत में उन्हें ऐसा महसूस होता है कि उनकी बात को बिना किसी व्यक्तिगत राय के सुना जा रहा है। यही कारण है कि वे कई बार ऐसी बातें भी लिख देते हैं, जो शायद किसी करीबी से कहने में हिचकिचाते।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>गोपनीयता का एहसास</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">डिजिटल युग में प्राइवेसी एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है। युवाओं को अक्सर यह चिंता रहती है कि कहीं उनकी निजी बातें किसी और तक न पहुंच जाएं। AI के साथ बातचीत करते समय उन्हें अपेक्षाकृत अधिक गोपनीयता का अनुभव होता है। यही वजह है कि वे रिश्तों, करियर, आत्मविश्वास, तनाव या भविष्य से जुड़े सवाल खुलकर पूछते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, यह भी जरूरी है कि उपयोगकर्ता किसी भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अत्यधिक संवेदनशील या व्यक्तिगत जानकारी साझा करते समय सावधानी बरतें।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>हर समय उपलब्ध रहने की सुविधा</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">इंसानी रिश्तों की अपनी सीमाएं होती हैं। हर दोस्त, परिवार का सदस्य या सलाहकार हर समय उपलब्ध नहीं हो सकता। लेकिन AI दिन हो या रात, किसी भी समय बातचीत के लिए तैयार रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">रात के दो बजे अगर कोई छात्र परीक्षा के तनाव में हो या कोई युवा अपने करियर को लेकर परेशान हो, तो उसे तुरंत बातचीत का अवसर मिल जाता है। यही सुविधा AI को अलग बनाती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>डिजिटल पीढ़ी की नई आदतें</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आज की पीढ़ी बचपन से ही इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बीच बड़ी हुई है। उनके लिए चैट करके अपनी बात कहना कई बार आमने-सामने बातचीत से भी आसान होता है। यही वजह है कि AI के साथ संवाद उन्हें स्वाभाविक लगता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह केवल तकनीक की आदत नहीं, बल्कि बदलती संचार शैली का भी हिस्सा है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>क्या AI सचमुच दोस्त बन सकता है?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। AI बातचीत कर सकता है, जानकारी दे सकता है, विचारों को व्यवस्थित करने में मदद कर सकता है और कई बार प्रेरित भी कर सकता है। लेकिन वह इंसान की तरह भावनाओं को महसूस नहीं करता।</p>
<p style="text-align:justify;">AI के पास न व्यक्तिगत अनुभव होते हैं और न ही वास्तविक संवेदनाएं। वह आपके शब्दों को समझने की कोशिश करता है, लेकिन आपके जीवन को उसी तरह महसूस नहीं कर सकता, जैसे कोई करीबी मित्र या परिवार का सदस्य कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए AI को एक सहायक संवाद माध्यम माना जा सकता है, लेकिन वास्तविक रिश्तों का विकल्प नहीं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में AI</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आज मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता पहले की तुलना में काफी बढ़ी है। कई लोग शुरुआती स्तर पर अपनी चिंता, तनाव या भावनात्मक उलझनों को समझने के लिए AI से बातचीत करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आत्मचिंतन और अपनी भावनाओं को शब्द देने में मददगार हो सकता है। लेकिन यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय से अवसाद, अत्यधिक चिंता, आत्महत्या के विचार या गंभीर मानसिक परेशानी हो, तो केवल AI पर निर्भर रहना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक या भरोसेमंद व्यक्ति से संपर्क करना आवश्यक होता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>क्या युवा रिश्तों से दूर हो रहे हैं?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">कई लोगों का मानना है कि AI के बढ़ते उपयोग से इंसानी रिश्ते कमजोर हो रहे हैं। लेकिन इसे पूरी तरह सही नहीं कहा जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">असल में युवा ऐसे माहौल की तलाश में हैं जहां उन्हें बिना डर, बिना शर्म और बिना आलोचना के अपनी बात रखने का अवसर मिले। यदि परिवार, मित्र और समाज ऐसा सुरक्षित वातावरण प्रदान करें, तो शायद AI केवल एक सहायक माध्यम बनकर रह जाएगा, मुख्य सहारा नहीं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भविष्य में क्या होगा?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आने वाले समय में AI और इंसानी रिश्ते एक-दूसरे के विरोधी नहीं होंगे। AI जानकारी, मार्गदर्शन, योजना बनाने और शुरुआती भावनात्मक सहायता में उपयोगी साबित हो सकता है। वहीं, जीवन की वास्तविक खुशियां, अपनापन, विश्वास, प्रेम और कठिन समय में साथ केवल इंसानी रिश्ते ही दे सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">तकनीक जितनी भी विकसित हो जाए, एक सच्चे दोस्त की मुस्कान, माता-पिता का स्नेह, भाई-बहन का साथ या किसी प्रिय व्यक्ति का हौसला आज भी किसी मशीन से कहीं अधिक मूल्यवान है।</p>
<p style="text-align:justify;">AI ने युवाओं को अपनी बात कहने का एक नया और सुविधाजनक मंच दिया है। बिना जजमेंट के बातचीत, हर समय उपलब्धता और डिजिटल सहजता इसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि AI इंसानी भावनाओं का विकल्प नहीं बन सकता। सबसे बेहतर रास्ता यही है कि AI का उपयोग सीखने, समझने और आत्मचिंतन के लिए किया जाए, जबकि जीवन के सबसे महत्वपूर्ण रिश्तों को भी उतना ही समय और महत्व दिया जाए। आखिरकार, तकनीक सुविधा दे सकती है, लेकिन अपनापन, विश्वास और सच्चा साथ आज भी इंसानों से ही मिलता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 00:00:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डी-लिस्टिंग सामाजिक न्याय, धर्मांतरण और आरक्षण व्यवस्था पर पुनर्विचार का समय     </title>
                                    <description><![CDATA[ भारत  देना नहीं था, बल्कि उन समुदायों को अवसर प्रदान करना था जो सदियों से सामाजिक भेदभाव, अस्पृश्यता और वंचना का शिकार रहे। यही कारण है कि संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान किए। लेकिन आज एक महत्वपूर्ण प्रश्न राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है । ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/6a435d2877b34/article-57382"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/डी-लिस्टिंग-सामाजिक-न्याय,-धर्मांतरण-और-आरक्षण-व्यवस्था-पर-पुनर्विचार-का-समय.jpg" alt=""></a><br /><p>क्या धर्म परिवर्तन के बाद भी आरक्षण और विशेष संवैधानिक लाभ उसी प्रकार मिलते रहने चाहिए? इसी प्रश्न से जुड़ा है “डी-लिस्टिंग” का मुद्दा।डी-लिस्टिंग का अर्थ है कि यदि कोई व्यक्ति उस धार्मिक और सामाजिक पहचान को छोड़ देता है जिसके आधार पर उसे विशेष संवैधानिक लाभ मिले थे, तो उसे संबंधित सूची से हटाया जाए। समर्थकों का तर्क है कि यह किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के पक्ष में उठाया गया प्रश्न है।</p>
<p>आखिर डी-लिस्टिंग की मांग क्यों?देश के अनेक सामाजिक संगठनों और जनजातीय मंचों का मानना है कि आरक्षण का लाभ उन्हीं लोगों तक पहुंचना चाहिए जो आज भी उसी सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थिति में जीवन जी रहे हैं जिसके कारण आरक्षण की व्यवस्था बनाई गई थी।</p>
<p>उनका तर्क है कि यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद भी पुराने वर्ग के सभी लाभ प्राप्त करता रहे, तो सीमित संसाधनों और अवसरों पर दबाव बढ़ता है। परिणामस्वरूप वास्तविक जरूरतमंद परिवार पीछे छूट जाते हैं।विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में यह बहस अधिक तेज हुई है। कई संगठनों का दावा है कि धर्मांतरण के बाद भी यदि आरक्षण और अन्य लाभ यथावत बने रहें, तो यह अप्रत्यक्ष रूप से धर्म परिवर्तन को प्रोत्साहित कर सकता है।धर्मांतरण और सामाजिक वास्तविकता</p>
<p>भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद का धर्म स्वीकार करने की स्वतंत्रता देता है। यह अधिकार लोकतंत्र की मूल आत्मा है। लेकिन डी-लिस्टिंग समर्थक यह प्रश्न उठाते हैं कि यदि धर्म परिवर्तन के साथ धार्मिक पहचान बदल जाती है, तो क्या सामाजिक पहचान और उससे जुड़े संवैधानिक लाभों की भी समीक्षा नहीं होनी चाहिए?उनका कहना है कि आस्था व्यक्तिगत विषय है, लेकिन आरक्षण एक सार्वजनिक नीति है जिसका उद्देश्य सीमित संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण करना है।</p>
<p>अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का अंतर दिलचस्प तथ्य यह है कि अनुसूचित जातियों के मामले में धर्म का प्रश्न पहले से मौजूद है। वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार ईसाई और मुस्लिम धर्म स्वीकार करने पर अनुसूचित जाति का दर्जा लागू नहीं रहता। जबकि अनुसूचित जनजातियों के मामले में ऐसी स्पष्ट व्यवस्था नहीं है।यही कारण है कि डी-लिस्टिंग की बहस विशेष रूप से जनजातीय समुदायों के संदर्भ में उभर रही है। कई आदिवासी संगठन मांग कर रहे हैं कि जनजातीय पहचान को केवल जातीय नहीं बल्कि सांस्कृतिक और पारंपरिक पहचान के रूप में भी देखा जाए।डी-लिस्टिंग के संभावित लाभ</p>
<p>डी-लिस्टिंग के समर्थक इसके कई लाभ गिनाते हैं—<br />पहला, आरक्षण का लाभ वास्तविक और मूल पात्रों तक पहुंचेगा।दूसरा, सीमित सरकारी अवसरों और सीटों पर दबाव कम होगा।<br />तीसरा, लालच, प्रलोभन या संस्थागत दबाव के आधार पर होने वाले धर्मांतरण की संभावनाएं कम होंगी।</p>
<p>चौथा, जनजातीय और पारंपरिक सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने में मदद मिलेगी।पांचवां, सामाजिक न्याय की मूल भावना को मजबूत किया जा सकेगा।विरोधी पक्ष की दलीलहालांकि इस विषय का दूसरा पक्ष भी है। विरोधियों का तर्क है कि धर्म परिवर्तन से सामाजिक भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता। इसलिए केवल धर्म बदलने के आधार पर सभी लाभ समाप्त कर देना उचित नहीं होगा।</p>
<p>यही कारण है कि यह मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक और सामाजिक विमर्श का विषय भी है।क्या डी-लिस्टिंग समय की मांग है?भारत तेजी से बदल रहा है। आरक्षण, पहचान और सामाजिक न्याय से जुड़े प्रश्न भी नए रूप में सामने आ रहे हैं। ऐसे में डी-लिस्टिंग पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर, तथ्यपरक और निष्पक्ष चर्चा आवश्यक हैयदि आरक्षण का उद्देश्य वास्तविक वंचितों तक अवसर पहुंचाना है, तो यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि उसके लाभ उन्हीं तक पहुंचें जिनके लिए वह व्यवस्था बनाई गई थी।</p>
<p>डी-लिस्टिंग का प्रश्न किसी धर्म विशेष के विरोध का प्रश्न नहीं है। यह सामाजिक न्याय, संवैधानिक संतुलन और सीमित संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण का प्रश्न है।एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में भारत को इस विषय पर भावनाओं के बजाय तथ्यों, आंकड़ों और संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर निर्णय लेना होगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि डी-लिस्टिंग की बहस अब हाशिए का विषय नहीं रही। आने वाले वर्षों में यह देश की सामाजिक और राजनीतिक दिशा तय करने वाले प्रमुख मुद्दों में से एक बनने जा रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/6a435d2877b34/article-57382</link>
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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 11:50:48 +0530</pubDate>
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