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                <title>पर्व त्यौहार - दैनिक जागरण</title>
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                <description>पर्व त्यौहार RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर धूमधाम से मनी जन्माष्टमी</title>
                                    <description><![CDATA[मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर जन्माष्टमी का पर्व भक्ति और उत्साह के साथ मनाया गया। ‘हरि बोल’ के जयकारों के बीच महाआरती 12:10 बजे तक हुई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/festival-festival/janmashtami-celebrated-with-great-pomp-at-shri-krishnas-birthplace-in/article-63182"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-09/n-(31).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर आधी रात तक भजन-कीर्तन और नृत्य से भक्तिमय रहा माहौल। शनिवार तड़के श्रद्धालुओं ने ‘हरि बोल’ के जयकारों के साथ भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया।</p>
<p class="isSelectedEnd">भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा में जन्माष्टमी का पर्व शुक्रवार देर रात और शनिवार तड़के पूरे उत्साह एवं धार्मिक श्रद्धा के साथ मनाया गया। <strong>श्रीकृष्ण जन्मस्थान</strong> परिसर में ढोल, मंजीरे और मृदंग की धुन के साथ ‘हरि बोल’ के जयकारे गूंजते रहे। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भक्ति गीतों पर नृत्य करते हुए भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव में हिस्सा लिया।</p>
<p class="isSelectedEnd">श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान कृष्ण के जन्म की स्मृति में मनाई जाती है। हिंदू धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान कृष्ण को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। मथुरा में इस पर्व का विशेष धार्मिक महत्व है, क्योंकि इसे भगवान कृष्ण की जन्मस्थली माना जाता है।</p>
<h4><strong>आधी रात तक चला उत्सव</strong></h4>
<p class="isSelectedEnd">श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर जन्माष्टमी समारोह शुक्रवार देर रात शुरू हुआ। जैसे-जैसे मध्यरात्रि का समय नजदीक आया, मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भक्ति और उत्साह बढ़ता गया।</p>
<p class="isSelectedEnd">भक्तों ने सामूहिक रूप से भजन और कीर्तन किया। ढोल, मंजीरे और मृदंग की आवाज के बीच श्रद्धालु नृत्य करते नजर आए। पूरे परिसर में धार्मिक उल्लास का माहौल बना रहा।</p>
<h4><strong>‘हरि बोल’ के जयकारे गूंजे</strong></h4>
<p class="isSelectedEnd">समारोह के दौरान श्रद्धालुओं ने लगातार <strong>‘हरि बोल’</strong> का उद्घोष किया। भक्ति संगीत और जयकारों से श्रीकृष्ण जन्मस्थान का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया।</p>
<p class="isSelectedEnd">देर रात तक चले कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने भगवान कृष्ण के प्रति अपनी आस्था प्रकट की और जन्मोत्सव के विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया।</p>
<h4><strong>12:10 बजे तक हुई महाआरती</strong></h4>
<p class="isSelectedEnd">श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान के सचिव <strong>कपिल शर्मा</strong> ने बताया कि शुक्रवार देर रात हुए समारोह के बाद शनिवार रात 12:10 बजे तक <strong>महाआरती</strong> की गई।</p>
<p class="isSelectedEnd">महाआरती जन्माष्टमी समारोह का प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान रही। इसके दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे और उन्होंने भगवान कृष्ण की आराधना की।</p>
<h4><strong>कृष्ण जन्मोत्सव का विशेष महत्व</strong></h4>
<p class="isSelectedEnd">जन्माष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार उनका जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में हुआ था।</p>
<p class="isSelectedEnd">मथुरा और आसपास के ब्रज क्षेत्र में जन्माष्टमी का विशेष महत्व है। यहां मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।</p>
<h4><strong>मथुरा में भक्तिमय माहौल</strong></h4>
<p class="isSelectedEnd">श्रीकृष्ण जन्मस्थान के अलावा मथुरा और ब्रज क्षेत्र के अन्य धार्मिक स्थलों पर भी जन्माष्टमी को लेकर उत्साह देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने मंदिरों में पहुंचकर पूजा-अर्चना की और भगवान कृष्ण के दर्शन किए।</p>
<p class="isSelectedEnd">जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिरों को विशेष रूप से सजाया गया और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए तैयारियां की गईं।</p>
<h4><strong>रात में बढ़ा श्रद्धालुओं का उत्साह</strong></h4>
<p class="isSelectedEnd">जन्माष्टमी समारोह में मध्यरात्रि का समय सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। जैसे-जैसे कृष्ण जन्म का समय करीब आया, श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर भक्तों का उत्साह और बढ़ गया।</p>
<p class="isSelectedEnd">ढोल और मृदंग की थाप के बीच श्रद्धालु नृत्य करते रहे और भक्ति गीतों में शामिल हुए। महाआरती के साथ समारोह का प्रमुख धार्मिक चरण संपन्न हुआ।</p>
<h4><strong>आस्था का प्रमुख केंद्र</strong></h4>
<p class="isSelectedEnd">मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मस्थान देश और दुनिया के कृष्ण भक्तों के लिए प्रमुख धार्मिक केंद्रों में शामिल है। जन्माष्टमी के अवसर पर यहां आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं।</p>
<p>इस बार भी देर रात तक चले जन्मोत्सव ने परिसर को भक्ति, संगीत और धार्मिक उत्साह से भर दिया। ‘हरि बोल’ के जयकारों और महाआरती के साथ भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव श्रद्धा के साथ संपन्न हुआ।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>पर्व त्यौहार</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/festival-festival/janmashtami-celebrated-with-great-pomp-at-shri-krishnas-birthplace-in/article-63182</link>
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                <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 12:56:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sandeep.P]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कल से शुरू होगी गुप्त नवरात्रि, जानिए घटस्थापना का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और नौ दिनों का धार्मिक महत्व</title>
                                    <description><![CDATA[मां दुर्गा की गुप्त उपासना का विशेष पर्व, साधना, मंत्र जाप और कलश स्थापना से पूरी होती हैं मनोकामनाएं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/gupt-navratri-will-start-from-tomorrow-know-the-auspicious-time/article-58716"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/gupt-navratri-2026.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">सनातन धर्म में नवरात्रि का विशेष महत्व माना जाता है, लेकिन वर्ष में आने वाली <strong>गुप्त नवरात्रि</strong> को साधना, तप और देवी उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। आषाढ़ और माघ मास में आने वाली गुप्त नवरात्रि विशेष रूप से तांत्रिक साधना, शक्ति आराधना और आध्यात्मिक उन्नति का पर्व मानी जाती है। इस दौरान मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की गुप्त रूप से पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि इन नौ दिनों में श्रद्धा और विधि-विधान से की गई पूजा से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस वर्ष गुप्त नवरात्रि का शुभारंभ <strong>कल से</strong> हो रहा है। भक्त पूरे नौ दिनों तक व्रत रखकर मां भगवती की आराधना करेंगे। मंदिरों के साथ-साथ घरों में भी घटस्थापना कर अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाएगी। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस अवधि में देवी पूजा, मंत्र जाप, यज्ञ, हवन और आध्यात्मिक साधना का विशेष महत्व होता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>घटस्थापना का महत्व</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">गुप्त नवरात्रि की शुरुआत घटस्थापना यानी कलश स्थापना से होती है। कलश को सुख-समृद्धि, शुभता और देवी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार विधिपूर्वक कलश स्थापना करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">घटस्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थान को साफ कर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाया जाता है। इसके बाद मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं और उसके ऊपर जल से भरा कलश स्थापित किया जाता है। कलश में गंगाजल, सुपारी, सिक्का, अक्षत और पंचरत्न डालने की परंपरा भी है। कलश के ऊपर आम के पत्ते रखकर नारियल स्थापित किया जाता है और फिर मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>गुप्त नवरात्रि में कैसे करें देवी पूजा</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">गुप्त नवरात्रि के दौरान प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान पर दीपक जलाएं और मां दुर्गा का ध्यान करें। इसके बाद रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और फल अर्पित करें। दुर्गा सप्तशती, देवी कवच, अर्गला स्तोत्र और सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि संभव हो तो पूरे नौ दिनों तक अखंड ज्योति जलाएं। मां दुर्गा के बीज मंत्रों का जाप भी इस अवधि में विशेष फलदायी माना जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार एक समय भोजन या फलाहार कर सकते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>नौ दिनों का धार्मिक महत्व</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">गुप्त नवरात्रि के प्रत्येक दिन देवी शक्ति के अलग-अलग स्वरूप की पूजा की जाती है। पहले दिन मां शैलपुत्री, दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन चंद्रघंटा, चौथे दिन कूष्मांडा, पांचवें दिन स्कंदमाता, छठे दिन कात्यायनी, सातवें दिन कालरात्रि, आठवें दिन महागौरी और नौवें दिन सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है।</p>
<p style="text-align:justify;">धार्मिक मान्यता है कि इन नौ दिनों में देवी के प्रत्येक स्वरूप की आराधना करने से जीवन के विभिन्न कष्ट दूर होते हैं और साधक को आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>साधना और मंत्र जाप का विशेष महत्व</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">गुप्त नवरात्रि को विशेष रूप से साधकों और तांत्रिक उपासकों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि सामान्य श्रद्धालु भी पूरी श्रद्धा से मां दुर्गा की आराधना कर सकते हैं। इस दौरान किए गए मंत्र जाप, हवन और ध्यान को अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। कई लोग इस अवधि में अपने इष्ट देवी-देवता की विशेष साधना भी करते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>व्रत रखने वाले रखें इन बातों का ध्यान</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">गुप्त नवरात्रि में व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को सात्विक भोजन करना चाहिए। लहसुन, प्याज, मांसाहार और नशे से पूरी तरह दूर रहना चाहिए। मन, वचन और कर्म की पवित्रता बनाए रखना भी आवश्यक माना गया है। क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से बचने की सलाह दी जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">व्रत के दौरान फल, दूध, मखाना, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू का आटा, साबूदाना और सूखे मेवों का सेवन किया जा सकता है। पर्याप्त पानी पीना और स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>घर में ऐसे बनाएं सकारात्मक वातावरण</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">नवरात्रि के दौरान घर की नियमित साफ-सफाई करें और पूजा स्थान को विशेष रूप से स्वच्छ रखें। सुबह और शाम दीपक जलाकर आरती करें। घर में देवी भजन, मंत्र और धार्मिक वातावरण बनाए रखने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। परिवार के सभी सदस्यों को पूजा में शामिल होने के लिए प्रेरित करें।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>कन्या पूजन का महत्व</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">नवमी के दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन छोटी कन्याओं को मां दुर्गा का स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है। उन्हें भोजन, फल, मिठाई और उपहार देकर सम्मानित किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इससे मां दुर्गा प्रसन्न होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष पर्व</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">गुप्त नवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का भी अवसर है। इन नौ दिनों में व्यक्ति अपने भीतर सकारात्मक ऊर्जा विकसित करने, आत्मविश्वास बढ़ाने और मानसिक शांति प्राप्त करने का प्रयास करता है। श्रद्धा, अनुशासन और विधि-विधान से की गई देवी आराधना जीवन में नई ऊर्जा और विश्वास का संचार करती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>पूजा पाठ</category>
                                            <category>पर्व त्यौहार</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/gupt-navratri-will-start-from-tomorrow-know-the-auspicious-time/article-58716</link>
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                <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 14:32:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भौमवती अमावस्या 2026: कब है शुभ तिथि, जानें पूजा-विधि, महत्व और इस दिन किए जाने वाले विशेष उपाय</title>
                                    <description><![CDATA[मंगलवार को पड़ने वाली अमावस्या को भौमवती अमावस्या कहा जाता है। इस दिन पितरों का तर्पण, दान-पुण्य, हनुमान जी की पूजा और पीपल वृक्ष की परिक्रमा का विशेष महत्व माना जाता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/when-is-bhaumvati-amavasya-2026-know-the-auspicious-date-importance/article-58649"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/fifa-world-cup-2026-(18).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">भौमवती अमावस्या हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। जब अमावस्या तिथि मंगलवार के दिन पड़ती है, तब उसे भौमवती अमावस्या कहा जाता है। 'भौम' का संबंध मंगल ग्रह से माना जाता है और मंगलवार भगवान हनुमान तथा मंगल देव को समर्पित होता है। ऐसे में जब अमावस्या और मंगलवार का संयोग बनता है तो इसे विशेष फलदायी योग माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">साल 2026 की भौमवती अमावस्या श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक साधना, पितृ तर्पण, दान-पुण्य और विशेष पूजा-अर्चना का महत्वपूर्ण अवसर लेकर आएगी। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने और जरूरतमंदों की सहायता करने से पितृ दोष, ग्रह दोष और जीवन की कई बाधाओं से राहत मिल सकती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>कब है भौमवती अमावस्या 2026?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">पंचांग के अनुसार, 2026 में भौमवती अमावस्या मंगलवार के दिन पड़ेगी। इस दिन सूर्योदय से लेकर अमावस्या तिथि समाप्त होने तक स्नान, दान, तर्पण और पूजा का विशेष महत्व रहेगा। श्रद्धालु सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदी या घर में गंगाजल मिले जल से स्नान कर पूजा की शुरुआत करते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भौमवती अमावस्या का धार्मिक महत्व</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अमावस्या तिथि पितरों को समर्पित होती है। इस दिन पितरों का स्मरण, तर्पण और श्राद्ध करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलने की मान्यता है। वहीं मंगलवार का संबंध मंगल ग्रह और भगवान हनुमान से होने के कारण इस दिन हनुमान जी की विशेष पूजा भी की जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">कहा जाता है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने वाले व्यक्ति को मानसिक शांति, परिवार में सुख-समृद्धि और कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। कई लोग इस दिन व्रत रखकर दिनभर भगवान का स्मरण करते हैं और शाम को पूजा के बाद व्रत का पारण करते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>इस दिन कैसे करें पूजा?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">भौमवती अमावस्या के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर में दीपक जलाकर भगवान गणेश, भगवान शिव, भगवान विष्णु और हनुमान जी की पूजा करें। हनुमान चालीसा, सुंदरकांड या बजरंग बाण का पाठ करना भी शुभ माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके बाद पितरों के निमित्त जल अर्पित करें और यदि संभव हो तो किसी नदी या तालाब के किनारे तर्पण करें। घर में पीपल के वृक्ष की पूजा कर उसकी सात या 108 परिक्रमा करने की भी परंपरा है। पूजा के दौरान सरसों के तेल का दीपक जलाना और काले तिल अर्पित करना शुभ माना जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>दान-पुण्य का विशेष महत्व</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">भौमवती अमावस्या पर दान करने का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किया गया दान कई गुना फल प्रदान करता है। श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार भोजन, वस्त्र, काला तिल, गुड़, चावल, अनाज, फल, जल, छाता या अन्य आवश्यक वस्तुएं जरूरतमंद लोगों को दान करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">गाय, कौवे, कुत्ते और अन्य जीव-जंतुओं को भोजन कराना भी पुण्यदायी माना जाता है। कई लोग इस दिन गरीबों को भोजन करवाते हैं और मंदिरों में सेवा कार्य करते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>पितृ दोष से मुक्ति की मान्यता</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष होता है, उनके लिए अमावस्या का दिन विशेष माना जाता है। इस दिन तर्पण, पिंडदान और पूर्वजों का स्मरण करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होने की मान्यता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, धार्मिक मान्यताएं आस्था पर आधारित होती हैं और इनका वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। श्रद्धालु अपनी परंपरा और विश्वास के अनुसार इन अनुष्ठानों का पालन करते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>मंगल ग्रह से जुड़े उपाय</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">चूंकि भौमवती अमावस्या मंगलवार को पड़ती है, इसलिए इस दिन मंगल ग्रह से जुड़े उपाय भी किए जाते हैं। कई लोग हनुमान मंदिर में जाकर सिंदूर, चमेली का तेल और लाल फूल अर्पित करते हैं। वहीं मसूर की दाल, लाल वस्त्र या तांबे का दान भी शुभ माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी मान्यता है कि इन उपायों से मंगल दोष शांत हो सकता है और साहस, आत्मविश्वास तथा सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>क्या करें और क्या न करें?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">भौमवती अमावस्या के दिन धार्मिक कार्यों, दान-पुण्य और पूजा-पाठ को प्राथमिकता देने की सलाह दी जाती है। इस दिन क्रोध, विवाद, अपशब्द और किसी का अपमान करने से बचना चाहिए। जरूरतमंदों की सहायता करना और बुजुर्गों का सम्मान करना शुभ माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि व्रत रख रहे हैं तो पूरे दिन सात्विक भोजन का पालन करें और नशे या तामसिक भोजन से दूरी बनाए रखें। घर और मंदिर की साफ-सफाई कर सकारात्मक वातावरण बनाए रखना भी शुभ माना जाता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>पूजा पाठ</category>
                                            <category>पर्व त्यौहार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 17:32:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>गुरु पूर्णिमा 2026: 5 जुलाई, रविवार को मनाया जाएगा गुरु श्रद्धा और ज्ञान का महापर्व</title>
                                    <description><![CDATA[5 जुलाई 2026, रविवार को देशभर में गुरु पूर्णिमा श्रद्धा और आस्था के साथ मनाई जाएगी। इस दिन गुरु पूजन, दान, सत्संग और आध्यात्मिक साधना का विशेष महत्व माना जाता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/festival-festival/guru-purnima-2026-the-great-festival-of-guru-shraddha-and/article-57455"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/guru-purnima-2026.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सदैव सर्वोच्च माना गया है। गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन की सही दिशा दिखाने वाला मार्गदर्शक भी होता है। इसी गुरु परंपरा को सम्मान देने के लिए हर वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि पर गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। वर्ष 2026 में गुरु पूर्णिमा 5 जुलाई, रविवार को मनाई जाएगी। इस अवसर पर देशभर के मंदिरों, आश्रमों, मठों और धार्मिक स्थलों में विशेष पूजा-अर्चना, सत्संग, भजन-कीर्तन और गुरु वंदना के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। लाखों श्रद्धालु अपने गुरु का आशीर्वाद लेने के लिए विभिन्न धार्मिक स्थलों पर पहुंचेंगे और ज्ञान, सेवा तथा संस्कार की परंपरा को आगे बढ़ाने का संकल्प लेंगे। सनातन धर्म में गुरु को भगवान से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। प्रसिद्ध श्लोक <em>"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः"</em> गुरु की महिमा का वर्णन करता है। मान्यता है कि गुरु ही वह शक्ति हैं, जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। गुरु के बिना जीवन अधूरा माना जाता है, क्योंकि सही मार्गदर्शन ही व्यक्ति को सफलता, संस्कार और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास ने चारों वेदों का संकलन किया, महाभारत की रचना की और अठारह पुराणों का संपादन किया। भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यवस्थित स्वरूप देने में उनका योगदान अतुलनीय माना जाता है। इसलिए इस दिन उन्हें आदिगुरु के रूप में भी याद किया जाता है और श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। गुरु पूर्णिमा का महत्व केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से भी बहुत बड़ा है। इस दिन विद्यार्थी अपने शिक्षकों का सम्मान करते हैं, उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं और उनसे जीवन में आगे बढ़ने का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। कई स्कूलों, कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों में गुरु सम्मान समारोह आयोजित किए जाते हैं। विद्यार्थी अपने शिक्षकों को शुभकामनाएं देते हैं और उनके मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद व्यक्त करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">देशभर के प्रमुख आश्रमों और आध्यात्मिक केंद्रों में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर विशेष आयोजन किए जाते हैं। सुबह से ही श्रद्धालु स्नान कर पूजा की तैयारी करते हैं। भगवान विष्णु, महर्षि वेदव्यास और अपने गुरु का पूजन किया जाता है। फूल, फल, दीपक, धूप और प्रसाद अर्पित कर आशीर्वाद लिया जाता है। कई श्रद्धालु इस दिन व्रत भी रखते हैं और जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र तथा अन्य आवश्यक सामग्री का दान करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि गुरु पूर्णिमा पर किया गया दान और सेवा विशेष पुण्य प्रदान करता है। बौद्ध धर्म में भी गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान बुद्ध ने इसी दिन सारनाथ में अपने प्रथम पांच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था। इसे धर्मचक्र प्रवर्तन दिवस भी कहा जाता है। इसलिए बौद्ध अनुयायी इस दिन ध्यान, प्रार्थना और धर्म उपदेश के कार्यक्रम आयोजित करते हैं। जैन धर्म में भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आचार्यों और साधु-संतों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आधुनिक समय में गुरु पूर्णिमा का स्वरूप कुछ बदला जरूर है, लेकिन इसकी भावना आज भी वैसी ही बनी हुई है। आज लोग अपने गुरु, शिक्षक और मार्गदर्शक को सोशल मीडिया, वीडियो कॉल और डिजिटल माध्यमों से भी शुभकामनाएं भेजते हैं। कई धार्मिक संस्थाएं ऑनलाइन प्रवचन और लाइव सत्संग का आयोजन करती हैं, जिनमें देश-विदेश से श्रद्धालु जुड़ते हैं। इससे यह पर्व नई पीढ़ी तक भी प्रभावी ढंग से पहुंच रहा है। गुरु पूर्णिमा केवल पूजा-पाठ का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन और सीखने का अवसर भी है। यह पर्व हमें विनम्रता, अनुशासन, सेवा और ज्ञान का महत्व समझाता है। गुरु का सम्मान केवल एक दिन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धा मानी जाती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">गुरु पूर्णिमा के दिन कई लोग नए कार्यों की शुरुआत भी करते हैं। आध्यात्मिक साधना, योग, ध्यान और धार्मिक अध्ययन प्रारंभ करने के लिए भी यह दिन शुभ माना जाता है। कई आश्रमों में नए शिष्यों को दीक्षा दी जाती है और आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत कराई जाती है। इस दिन किए गए संकल्पों को विशेष फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरु पूर्णिमा पर पीले वस्त्र पहनना, भगवान विष्णु की पूजा करना, केले के पेड़ की पूजा करना और ब्राह्मणों या जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र, फल और दक्षिणा का दान करना शुभ माना जाता है। साथ ही अपने गुरु या शिक्षकों का सम्मान करना और उनका आशीर्वाद लेना भी इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य माना गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">5 जुलाई 2026, रविवार को मनाई जाने वाली गुरु पूर्णिमा एक बार फिर पूरे देश में श्रद्धा, भक्ति और ज्ञान का संदेश लेकर आएगी। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन में सफलता पाने के लिए केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन भी उतना ही आवश्यक है। गुरु का सम्मान, उनके प्रति कृतज्ञता और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प ही इस पर्व की वास्तविक भावना है। भारतीय संस्कृति में सदियों से चली आ रही गुरु-शिष्य परंपरा आज भी समाज को संस्कार, नैतिकता और ज्ञान की दिशा में आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है और गुरु पूर्णिमा इसी अमूल्य परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण उत्सव है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>पर्व त्यौहार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 00:00:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पौष पुत्रदा एकादशी 30 या 31 दिसंबर? जानिए सही व्रत तिथि, महत्व और विधि</title>
                                    <description><![CDATA[पंचांग गणना के अनुसार वर्ष 2025 की अंतिम एकादशी 30 दिसंबर को, संतान सुख और समृद्धि से जुड़ा है व्रत]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/paush-putrada-ekadashi-30th-or-31st-december-know-the-correct/article-40972"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2025-12/dharm-(33).jpg" alt=""></a><br /><p>हिंदू धर्म में एकादशी व्रतों का विशेष स्थान है और पौष मास में आने वाली पुत्रदा एकादशी को संतान सुख से जोड़कर देखा जाता है। वर्ष 2025 में इस व्रत की तिथि को लेकर श्रद्धालुओं के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि व्रत 30 दिसंबर को रखा जाएगा या 31 दिसंबर को। पंचांग और शास्त्रीय नियमों के आधार पर इसकी स्थिति अब स्पष्ट मानी जा रही है।</p>
<p>धार्मिक पंचांग के अनुसार, पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 30 दिसंबर 2025 को सुबह 6 बजकर 38 मिनट से आरंभ होगी और इसका समापन 31 दिसंबर को सुबह 4 बजकर 48 मिनट पर होगा। शास्त्रों में एकादशी व्रत को उदयकाल के आधार पर मान्य बताया गया है। चूंकि 30 दिसंबर की सुबह उदयकाल में एकादशी तिथि उपस्थित रहेगी, इसलिए इसी दिन पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा जाना शास्त्रसम्मत माना गया है। 31 दिसंबर को यह तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएगी, इसलिए उस दिन व्रत का विधान नहीं है।</p>
<p>पुत्रदा एकादशी का संबंध भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा से माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत विशेष रूप से उन दंपतियों के लिए महत्वपूर्ण होता है जो संतान प्राप्ति की इच्छा रखते हैं। वहीं जिनके घर में संतान है, वे इस व्रत को संतान के स्वास्थ्य, उन्नति और दीर्घायु की कामना से करते हैं। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखने से पारिवारिक सुख, धन-धान्य और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।</p>
<p>धर्माचार्यों के अनुसार वर्ष 2025 की यह अंतिम एकादशी होने के कारण इसका आध्यात्मिक महत्व और बढ़ जाता है। माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु की उपासना करने से जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कई श्रद्धालु इस व्रत को पूरे दिन निर्जल या फलाहार के रूप में करते हैं।</p>
<p><strong>पूजा विधि</strong> की बात करें तो पुत्रदा एकादशी के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ और हल्के रंग के वस्त्र पहनने की परंपरा है। इसके बाद पूजा स्थल पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। पंचामृत से अभिषेक कर धूप, दीप, पुष्प और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। विष्णु सहस्त्रनाम या एकादशी कथा का पाठ किया जाता है और अंत में आरती कर प्रसाद वितरित किया जाता है।</p>
<p>धार्मिक विशेषज्ञ मानते हैं कि पुत्रदा एकादशी केवल व्रत नहीं बल्कि संयम, श्रद्धा और पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक है। आज भी बड़ी संख्या में लोग इस व्रत को पूरी आस्था के साथ निभाते हैं, जिससे यह हर वर्ष धार्मिक और सामाजिक चर्चा का विषय बन जाता है।</p>
<p>यह जानकारी पंचांग, धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार पूजा और व्रत से पहले विद्वान से परामर्श करना उचित माना जाता है।</p>
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                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>पर्व त्यौहार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 Dec 2025 09:35:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कब है 2025 की सफला एकादशी जानें, शुभ मुहूर्त, व्रत और पारण का पूरा मार्गदर्शन</title>
                                    <description><![CDATA[पौष कृष्ण पक्ष की इस एकादशी पर जानें पूजा का सही समय, राहुकाल और व्रत का महत्व]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/when-is-saphala-ekadashi-in-2025-know-the-auspicious-time/article-39378"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2025-12/dharm.png" alt=""></a><br /><p>इस वर्ष सफला एकादशी 2025 पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत और भगवान विष्णु की पूजा करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है, पापों का नाश होता है और कार्यों में सफलता मिलती है।</p>
<p>पंचांग के अनुसार, सफला एकादशी 14 दिसंबर शाम 6:49 बजे से प्रारंभ होकर 15 दिसंबर रात 9:19 बजे तक रहेगी। ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि इस दिन व्रत और पूजा के लिए शोभन योग का होना अत्यंत लाभकारी है, जिससे व्रत का पुण्य अधिक होता है।</p>
<p><strong>पूजा और ब्रह्म मुहूर्त</strong><br />सफला एकादशी पर ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5:17 से 6:12 बजे तक रहेगा, जो स्नान और व्रत प्रारंभ करने के लिए उत्तम समय माना जाता है। पूजा के लिए दो शुभ मुहूर्त हैं – पहला सुबह 7:06 से 8:24 बजे और दूसरा सुबह 9:41 से 10:59 बजे तक। इस दौरान भगवान विष्णु की पूजा और व्रत कथा सुनना अत्यंत लाभकारी है।</p>
<p><strong>राहुकाल और सावधानियां</strong><br />ज्योतिष के अनुसार, राहुकाल सुबह 8:24 से 9:41 बजे तक रहेगा। इस दौरान किसी भी शुभ कार्य से बचना चाहिए। यह सावधानी व्रत और पूजा के शुभ प्रभाव को सुनिश्चित करती है।</p>
<p><strong>व्रत का पारण समय</strong><br />जो श्रद्धालु सफला एकादशी का व्रत रखते हैं, वे पारण 16 दिसंबर को सुबह 7:07 से 9:11 बजे तक कर सकते हैं। उस दिन द्वादशी तिथि रात 11:57 बजे समाप्त होगी। सही समय पर पारण करने से व्रत का लाभ और अधिक बढ़ जाता है।</p>
<p><strong>धार्मिक और मानसिक लाभ</strong><br />सफला एकादशी का व्रत केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। संयम और उपवास से मानसिक स्थिरता बढ़ती है और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। व्रत के दिन कथा सुनना और पूजा करना व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाता है।</p>
<p>विशेषज्ञों के अनुसार, शोभन योग और शुभ मुहूर्त के कारण इस वर्ष का व्रत विशेष रूप से लाभकारी है। पारिवारिक और सामूहिक पूजा करने से व्रत का पुण्य और अधिक बढ़ जाता है।</p>
<p>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत रखने से घर में सुख-शांति, आर्थिक समृद्धि और कार्यों में सफलता सुनिश्चित होती है। इस वर्ष सफला एकादशी का व्रत अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त में करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव और आध्यात्मिक लाभ अधिक मिलता है।</p>
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                                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>पूजा पाठ</category>
                                            <category>पर्व त्यौहार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Dec 2025 18:18:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
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                <title>संकष्टी चतुर्थी 2025: शिवलिंग पर चढ़ाएं ये चीजें, मिलेगा विशेष कल्याण</title>
                                    <description><![CDATA[7 दिसंबर को अखुरथ संकष्टी चतुर्थी का व्रत, भगवान गणेश और शिव की कृपा पाने के सरल उपाय]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/69325f4ed9dcd/article-39203"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2025-12/dharm-(6).jpg" alt=""></a><br /><p>7 दिसंबर, 2025 को आने वाली <strong>अखुरथ संकष्टी चतुर्थी</strong> इस महीने की महत्वपूर्ण तिथि है, जो भगवान गणेश को समर्पित होती है। इस दिन व्रत रखने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और कार्यों में सफलता मिलती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि साधक इस दिन शिवलिंग पर कुछ विशेष वस्तुएं अर्पित करें, तो भगवान शिव और गणेश दोनों की कृपा प्राप्त होती है।</p>
<h5><strong>संकष्टी चतुर्थी का महत्व</strong></h5>
<p>संकष्टी चतुर्थी हर महीने आती है और इसे व्रत का शुभ अवसर माना जाता है। पौष महीने में आने वाली चतुर्थी को <strong>अखुरथ संकष्टी चतुर्थी</strong> कहा जाता है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस दिन व्रत रखने और भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ कम होती हैं और सुख-समृद्धि बढ़ती है।</p>
<h5><strong>शिवलिंग पर चढ़ाने योग्य 5 प्रमुख चीजें</strong></h5>
<p><strong>1. बिल्व पत्र और दूर्वा</strong><br />बिल्व पत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय हैं, जबकि दूर्वा भगवान गणेश को। इन दोनों का एक साथ शिवलिंग पर अर्पण करने से दोनों देवताओं की कृपा प्राप्त होती है। यह उपाय जीवन की कठिनाइयों को दूर करने में मदद करता है।</p>
<p><strong>2. शहद मिश्रित जल</strong><br />शिवलिंग का अभिषेक शहद और जल से करने से जीवन में मिठास और शांति आती है। तांबे के पात्र में शुद्ध जल, थोड़ा सा शहद और गंगाजल मिलाकर अभिषेक करने से रोग दूर होते हैं।</p>
<p><strong>3. काले तिल</strong><br />चतुर्थी और पौष महीने में काले तिल का विशेष महत्व है। तिल का दान और शिवलिंग पर चढ़ाना <strong>शनि दोष</strong> और <strong>कालसर्प दोष</strong> से मुक्ति दिलाता है।</p>
<p><strong>4. कच्चा दूध</strong><br />कच्चे दूध से शिवलिंग का अभिषेक मानसिक शांति और सुख-समृद्धि प्रदान करता है। अभिषेक के समय ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है।</p>
<p><strong>5. गुड़</strong><br />शिवलिंग पर गुड़ अर्पित करने या गुड़ मिश्रित जल से अभिषेक करने से धन-संपत्ति में वृद्धि होती है और व्यापार में उन्नति मिलती है।</p>
<h5><strong>कैसे करें व्रत</strong></h5>
<p>विशेषज्ञों का कहना है कि संकष्टी व्रत के दौरान दिनभर हल्का आहार या उपवास रखकर भगवान गणेश और शिव की पूजा करनी चाहिए। शिवलिंग पर उपरोक्त पांच चीजों का समर्पण करना और मंत्र जाप करना शुभ फल देता है।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>पूजा पाठ</category>
                                            <category>पर्व त्यौहार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Dec 2025 11:24:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आंवला नवमी 2025 की तारीख को लेकर दुविधा खत्म! जानिए इस दिन के पीछे की पौराणिक कहानी</title>
                                    <description><![CDATA[धार्मिक मान्यताओं में कार्तिक माह का विशेष महत्व बताया गया है। इसी महीने आने वाली आंवला नवमी या अक्षय नवमी को ऐसा दिन माना जाता है, जब सतयुग की शुरुआत हुई थी। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन किए गए शुभ कर्मों का फल कभी क्षय नहीं होता।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/the-dilemma-regarding-the-date-of-amla-navami-2025-is/article-36588"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2025-10/dainik-jagarn-mpcg-.jpg" alt=""></a><br /><p>लेकिन इस बार लोगों में भ्रम है कि <strong>आंवला नवमी 30 अक्टूबर को है या 31 अक्टूबर को?</strong> आइए जानते हैं सही तिथि, पूजा विधि और इस पवित्र पर्व का धार्मिक महत्व।</p>
<hr />
<h3><strong>आंवला नवमी 2025 कब है?</strong></h3>
<p>पंचांग के अनुसार —</p>
<ul>
<li>
<p><strong>अक्षय नवमी 2025 की तिथि:</strong> <strong>31 अक्टूबर 2025, शुक्रवार</strong></p>
</li>
<li>
<p><strong>नवमी तिथि प्रारंभ:</strong> 30 अक्टूबर सुबह <strong>10:06 बजे</strong></p>
</li>
<li>
<p><strong>नवमी तिथि समाप्त:</strong> 31 अक्टूबर सुबह <strong>10:03 बजे</strong></p>
</li>
<li>
<p><strong>पर्व का शुभ मुहूर्त:</strong> 31 अक्टूबर को <strong>सुबह 6:32 से 10:03 बजे तक</strong></p>
</li>
</ul>
<p>यानी, <strong>आंवला नवमी का व्रत और पूजा 31 अक्टूबर, शुक्रवार को की जाएगी।</strong></p>
<hr />
<h3><strong>क्यों मनाई जाती है आंवला नवमी?</strong></h3>
<p>पुराणों के अनुसार, इसी दिन <strong>सतयुग का प्रारंभ</strong> हुआ था। इसलिए इसे “अक्षय नवमी” कहा जाता है — यानी ऐसा दिन, जब पुण्य कर्मों का क्षय नहीं होता। मान्यता है कि इस दिन <strong>भगवान विष्णु ने कूष्माण्ड नामक दैत्य का वध किया था</strong>, जिसके शरीर से “कूष्माण्ड” (कद्दू) की उत्पत्ति हुई। इसी कारण यह दिन <strong>कूष्माण्ड नवमी</strong> के नाम से भी प्रसिद्ध है।</p>
<p>आंवला वृक्ष को विष्णु जी का प्रिय माना गया है, इसलिए इस दिन <strong>आंवला पेड़ की पूजा और परिक्रमा</strong> करने का विशेष महत्व बताया गया है।</p>
<hr />
<h3><strong>आंवला नवमी पर क्यों की जाती है आंवला वृक्ष की पूजा?</strong></h3>
<p>शास्त्रों में कहा गया है कि आंवला वृक्ष में भगवान विष्णु, लक्ष्मी जी और देवी तुलसी का वास होता है।<br />इस वृक्ष की पूजा करने से —</p>
<ul>
<li>
<p>मनुष्य के <strong>पाप नष्ट</strong> होते हैं</p>
</li>
<li>
<p><strong>संतान सुख और दीर्घायु</strong> प्राप्त होती है</p>
</li>
<li>
<p>परिवार में <strong>शांति और समृद्धि</strong> बनी रहती है</p>
</li>
</ul>
<p>इस दिन आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करने और कथा सुनने का भी विशेष विधान है। इसे <strong>आंवला भोज</strong> कहा जाता है।</p>
<hr />
<h3><strong>आंवला नवमी की पूजा विधि</strong></h3>
<ol>
<li>
<p>प्रातः स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।</p>
</li>
<li>
<p>भगवान विष्णु और आंवला वृक्ष की पूजा करें।</p>
</li>
<li>
<p>जल, अक्षत, पुष्प, दीप और गंध अर्पित करें।</p>
</li>
<li>
<p>विष्णु सहस्रनाम या विष्णु मंत्र का जाप करें।</p>
</li>
<li>
<p>गरीबों को भोजन, वस्त्र या फल का दान करें।</p>
</li>
<li>
<p>अंत में परिवार सहित आंवले के पेड़ की परिक्रमा करें।</p>
</li>
</ol>
<p>अगर तीर्थ यात्रा संभव न हो, तो घर में गंगाजल मिलाकर स्नान करने से भी अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।</p>
<hr />
<h3><strong>इस दिन के अन्य नाम और क्षेत्रीय महत्व</strong></h3>
<p>आंवला नवमी को अलग-अलग स्थानों पर अलग नामों से जाना जाता है —</p>
<ul>
<li>
<p><strong>अक्षय नवमी</strong> (उत्तर भारत)</p>
</li>
<li>
<p><strong>कूष्माण्ड नवमी</strong> (पूर्वी भारत)</p>
</li>
<li>
<p><strong>आरोग्य नवमी</strong> (स्वास्थ्य के लिए शुभ)</p>
</li>
<li>
<p><strong>धात्री नवमी</strong> (आंवला वृक्ष का दूसरा नाम ‘धात्री’ होने के कारण)</p>
</li>
</ul>
<p>उड़ीसा में इस दिन <strong>मां जगद्धात्री</strong> की विशेष पूजा की जाती है। वहीं मथुरा में इसी दिन से <strong>मथुरा प्रदक्षिणा</strong> का शुभारंभ होता है, जो 21 दिनों तक चलती है।</p>
<hr />
<h3><strong>आंवला नवमी का धार्मिक महत्व</strong></h3>
<p>इस पर्व का सार यही है कि कर्म, भक्ति और सेवा के माध्यम से ही सच्चा सुख प्राप्त होता है। सतयुग की शुरुआत जिस दिन हुई थी, वह दिन हमें याद दिलाता है —</p>
<blockquote>
<p>“सच्चे कर्म ही जीवन को अक्षय बनाते हैं।”</p>
</blockquote>
<p>जो व्यक्ति इस दिन विष्णु जी और आंवले के वृक्ष की पूजा करता है, उसे स्वास्थ्य, धन, संतति और मोक्ष के चारों फल प्राप्त होते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>पूजा पाठ</category>
                                            <category>पर्व त्यौहार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Oct 2025 17:35:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गुरु नानक जयंती 2025: क्या आप जानते हैं इस दिन के पीछे की सच्ची कहानी?</title>
                                    <description><![CDATA[भारत की पावन भूमि सदियों से महान संतों और गुरुओं की जन्मस्थली रही है। इन्हीं में से एक हैं  सिख धर्म के संस्थापक और मानवता के अग्रदूत  गुरु नानक देव जी। हर साल उनकी जयंती को पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ गुरुपुरब या गुरु नानक जयंती के रूप में मनाया जाता है। यह सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि प्रेम, समानता और सेवा की भावना का प्रतीक पर्व है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/guru-nanak-jayanti-2025-do-you-know-the-true-story/article-36582"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2025-10/dharam--(2).jpg" alt=""></a><br /><h3><strong>गुरु नानक जयंती 2025 कब है?</strong></h3>
<p>साल <strong>2025 में गुरु नानक जयंती 5 नवंबर (बुधवार)</strong> को मनाई जाएगी। यह दिन <strong>कार्तिक पूर्णिमा</strong> के पवित्र अवसर पर आता है। देशभर के गुरुद्वारों में इस दिन <strong>नगर कीर्तन</strong>, <strong>कीर्तन दरबार</strong>, और <strong>लंगर सेवा</strong> का आयोजन होता है। भक्त प्रभात फेरियां निकालते हैं और गुरु नानक जी के उपदेशों को जीवन में अपनाने का संकल्प लेते हैं।</p>
<hr />
<h3><strong>कौन थे गुरु नानक देव जी?</strong></h3>
<p>गुरु नानक देव जी का जन्म <strong>1469 ई.</strong> में <strong>तलवंडी (अब पाकिस्तान का ननकाना साहिब)</strong> में हुआ था। उनके पिता का नाम <strong>मेहता कालू चंद</strong> और माता का नाम <strong>माता तृप्ता</strong> था। बचपन से ही वे असाधारण बुद्धिमत्ता और आध्यात्मिकता के धनी थे।</p>
<p>उन्होंने समाज में फैले <strong>भेदभाव, अंधविश्वास और जात-पात की प्रथा</strong> का विरोध किया और सिखाया कि —</p>
<blockquote>
<p>“ईश्वर एक है और वह हर प्राणी में विद्यमान है।”</p>
</blockquote>
<p>उनका प्रसिद्ध उपदेश —</p>
<blockquote>
<p><strong>“एक ओंकार सतनाम, करता पुरख, निर्भउ, निरवैर।”</strong><br />आज भी सिख धर्म की नींव का आधार है।</p>
</blockquote>
<hr />
<h3><strong>गुरु नानक जयंती कैसे मनाई जाती है?</strong></h3>
<p>गुरु नानक जयंती से दो दिन पहले ही <strong>अखंड पाठ</strong> की परंपरा शुरू होती है, जिसमें 48 घंटे तक लगातार <strong>गुरु ग्रंथ साहिब</strong> का पाठ किया जाता है। जयंती के दिन सुबह-सुबह श्रद्धालु <strong>प्रभात फेरियां</strong> निकालते हैं। भजन-कीर्तन और ढोल-नगाड़ों के बीच नगर भ्रमण किया जाता है।</p>
<p>गुरुद्वारों में दिनभर <strong>लंगर सेवा</strong> चलती है, जहाँ हर धर्म और वर्ग के लोग एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। यह गुरु नानक जी के समानता और भाईचारे के संदेश का जीवंत उदाहरण है।</p>
<hr />
<h3><strong>गुरु नानक जयंती का महत्व</strong></h3>
<p>गुरु नानक देव जी का पूरा जीवन मानवता के कल्याण के लिए समर्पित था।<br />उन्होंने सिखाया कि सच्ची पूजा केवल मंदिर या गुरुद्वारे में नहीं, बल्कि <strong>दूसरों की सेवा और प्रेम में</strong> है।</p>
<p>उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है —</p>
<blockquote>
<p>“ना कोई हिन्दू, ना मुसलमान — सब इंसान हैं।”</p>
</blockquote>
<p>यह पर्व हमें याद दिलाता है कि धर्म से पहले इंसानियत आती है।</p>
<hr />
<h3><strong>गुरु नानक देव जी के प्रेरणादायक उपदेश</strong></h3>
<ol>
<li>
<p><strong>सत नाम:</strong> सच्चाई ही ईश्वर है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>सेवा और सिमरन:</strong> निस्वार्थ सेवा और ईश्वर का स्मरण जीवन का आधार है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>समानता:</strong> सभी मनुष्य एक समान हैं, चाहे उनका धर्म, जाति या लिंग कुछ भी हो।</p>
</li>
<li>
<p><strong>कर्म:</strong> बिना स्वार्थ के सच्चे मन से कर्म करना ही पूजा है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>प्रेम और करुणा:</strong> दूसरों के दुख को समझना ही सच्ची भक्ति है।</p>
</li>
</ol>
<hr />
<h3><strong>गुरु नानक देव जी के जीवन से सीख</strong></h3>
<p>गुरु नानक जी ने अपने जीवन में चार प्रमुख यात्राएँ कीं, जिन्हें <strong>‘उदासियाँ’</strong> कहा जाता है। इन यात्राओं के दौरान उन्होंने मानवता, प्रेम और एकता का संदेश दूर-दूर तक फैलाया। उन्होंने सिखाया कि भगवान केवल मंदिरों या मस्जिदों में नहीं, बल्कि हर इंसान के हृदय में बसता है।</p>
<hr />
<h3><strong>गुरुपुरब पर किए जाने वाले शुभ कार्य</strong></h3>
<ul>
<li>
<p>प्रभात फेरी में भाग लें और कीर्तन करें।</p>
</li>
<li>
<p>जरूरतमंदों की सहायता करें।</p>
</li>
<li>
<p>गुरुद्वारे में सेवा या लंगर में योगदान दें।</p>
</li>
<li>
<p>गुरु नानक जी के उपदेशों को पढ़ें और जीवन में उतारें।</p>
</li>
</ul>
<hr />
<h3><strong>गुरु नानक जयंती 2025 की भावना</strong></h3>
<p>यह दिन हमें सिखाता है कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है। गुरु नानक देव जी के विचार आज भी समाज में प्रेम, समानता और भाईचारे की भावना को जीवित रखते हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि अगर मन में करुणा और सत्य है, तो कोई भी अंधकार हमारे जीवन में स्थायी नहीं रह सकता।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>पूजा पाठ</category>
                                            <category>पर्व त्यौहार</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/guru-nanak-jayanti-2025-do-you-know-the-true-story/article-36582</link>
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                <pubDate>Wed, 29 Oct 2025 17:35:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>क्या आप हनुमान चालीसा पढ़ते समय ये गलतियां कर रहे हैं?</title>
                                    <description><![CDATA[हनुमान चालीसा का पाठ केवल एक धार्मिक कर्म नहीं बल्कि भक्ति, शक्ति और आत्मविश्वास का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक इसका पाठ करता है, उसके जीवन की सभी कठिनाइयाँ धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं और बजरंगबली की कृपा सदैव बनी रहती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/are-you-making-these-mistakes-while-reading-hanuman-chalisa/article-36577"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2025-10/dharam--(1).jpg" alt=""></a><br /><p>लेकिन बहुत से लोग बिना नियम जाने ही पाठ करते हैं, जिससे उन्हें पूरा फल नहीं मिल पाता। अगर आप भी रोज या कभी-कभी हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो इन ज़रूरी बातों को ज़रूर जान लें।</p>
<hr />
<h3><strong>हनुमान चालीसा पाठ का महत्व</strong></h3>
<p>हनुमान चालीसा में भगवान हनुमान के पराक्रम, भक्ति और सेवा भाव का वर्णन है। इसका पाठ करने से न केवल भय और संकट दूर होते हैं बल्कि मन को स्थिरता और शांति मिलती है। जो व्यक्ति नियमित रूप से इसका पाठ करता है, उसके जीवन में आत्मबल बढ़ता है और नकारात्मकता समाप्त होती है।</p>
<hr />
<h3><strong>पाठ शुरू करने से पहले क्या करें</strong></h3>
<ol>
<li>
<p><strong>शुद्धता का पालन करें</strong> – पाठ से पहले स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।</p>
</li>
<li>
<p><strong>पवित्र स्थान चुनें</strong> – जहां शांति हो, वहीँ आसन बिछाकर बैठें।</p>
</li>
<li>
<p><strong>दीपक जलाएं</strong> – हनुमान जी के सामने दीपक जलाना शुभ माना गया है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>जल रखें पास में</strong> – एक पात्र में जल रखें और पाठ के बाद इसे प्रसाद रूप में ग्रहण करें।</p>
</li>
<li>
<p><strong>मन को एकाग्र करें</strong> – पाठ से पहले कुछ क्षण ध्यान लगाएं ताकि मन स्थिर रहे।</p>
</li>
</ol>
<hr />
<h3><strong>इन गलतियों से अवश्य बचें</strong></h3>
<ul>
<li>
<p><strong>बिना ध्यान के पाठ</strong> – मन भटकने पर पाठ का पूरा फल नहीं मिलता।</p>
</li>
<li>
<p><strong>बीच में रुकना या उठना</strong> – पाठ के दौरान किसी से बात न करें और बीच में न उठें।</p>
</li>
<li>
<p><strong>नकारात्मक सोच</strong> – पाठ के समय क्रोध, ईर्ष्या या नकारात्मक विचारों से दूर रहें।</p>
</li>
<li>
<p><strong>जल्दबाज़ी में पाठ</strong> – जल्दी-जल्दी पाठ करने की बजाय भावपूर्वक शब्दों पर ध्यान दें।</p>
</li>
<li>
<p><strong>फोन या बातचीत में ध्यान लगाना</strong> – मन विचलित होने से पाठ अधूरा माना जाता है।</p>
</li>
</ul>
<h3><strong>हनुमान चालीसा पाठ का सही समय</strong></h3>
<p>हनुमान चालीसा का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन <strong>सुबह ब्रह्म मुहूर्त (4 से 5 बजे)</strong> का समय सबसे शुभ माना गया है।<br />अगर यह संभव न हो, तो शाम के समय सूर्यास्त से पहले या बाद में भी पाठ किया जा सकता है।</p>
<hr />
<h3><strong>मंगलवार और शनिवार का विशेष महत्व</strong></h3>
<p>हनुमान जी को मंगलवार और शनिवार का दिन विशेष प्रिय है। इन दिनों में हनुमान चालीसा का पाठ करने से न सिर्फ हनुमान जी की कृपा मिलती है बल्कि शनिदेव की अनुकंपा भी प्राप्त होती है।<br />यह नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव को कम करता है और कार्यों में सफलता लाता है।</p>
<hr />
<h3><strong>हनुमान चालीसा पाठ के लाभ</strong></h3>
<ul>
<li>
<p>भय, चिंता और तनाव से मुक्ति मिलती है।</p>
</li>
<li>
<p>जीवन की बाधाएं और दुर्भाग्य समाप्त होते हैं।</p>
</li>
<li>
<p>आत्मविश्वास और मानसिक शक्ति बढ़ती है।</p>
</li>
<li>
<p>हनुमान जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।</p>
</li>
<li>
<p>परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है।</p>
</li>
</ul>
<hr />
<h3><strong>सफल पाठ के कुछ सरल उपाय</strong></h3>
<ol>
<li>
<p>पाठ से पहले हनुमान जी को सिंदूर, तेल और गुड़ का भोग लगाएं।</p>
</li>
<li>
<p>‘ॐ हनुमते नमः’ का 11 बार जाप करें।</p>
</li>
<li>
<p>प्रत्येक मंगलवार या शनिवार को मंदिर में दीपक जलाएं।</p>
</li>
<li>
<p>यदि संभव हो तो हनुमान चालीसा का पाठ 7, 11 या 108 बार करें।</p>
</li>
</ol>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>पूजा पाठ</category>
                                            <category>पर्व त्यौहार</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/are-you-making-these-mistakes-while-reading-hanuman-chalisa/article-36577</link>
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                <pubDate>Wed, 29 Oct 2025 16:51:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शाम के वो अनमोल 48 मिनट — जो बदल सकते हैं आपकी किस्मत</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में दिन के हर पहर का एक आध्यात्मिक अर्थ होता है। सुबह का ब्रह्म मुहूर्त जितना शुभ माना गया है, उतना ही शाम का संध्या काल भी पवित्र माना जाता है। प्रेमानंद महाराज के अनुसार, सूर्यास्त से पहले और बाद के कुल 48 मिनट ऐसे होते हैं जब व्यक्ति को भोजन नहीं करना चाहिए — क्योंकि यह समय सिर्फ आध्यात्मिक साधना और आत्मचिंतन के लिए बना है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/mantras-of-life/those-precious-48-minutes-of-the-evening-%E2%80%93-which-can/article-36584"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2025-10/add-a-heading.jpg" alt=""></a><br /><p> </p>
<h3><strong>क्या है ये 48 मिनट का रहस्य?</strong></h3>
<p>प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि <strong>सूर्यास्त के 24 मिनट पहले और 24 मिनट बाद</strong> का समय "धर्मशाम" कहलाता है।<br />यह समय दिन और रात के संधिकाल का प्रतीक है — जब <strong>प्रकृति परिवर्तन की अवस्था में होती है</strong>।<br />इस दौरान न तो पूर्ण दिन होता है, न पूर्ण रात्रि, इसलिए इसे "मौन क्षण" कहा गया है।</p>
<p>महाराज जी कहते हैं —</p>
<blockquote>
<p>“इन 48 मिनटों में भोजन, क्रोध, वासना या लोभ जैसे कार्यों से बचना चाहिए।<br />यह समय आत्मा से जुड़ने, भगवान को याद करने और जीवन को शुद्ध करने का अवसर है।”</p>
</blockquote>
<hr />
<h3><strong>इस समय क्या करें?</strong></h3>
<p>इन 48 मिनटों के दौरान महाराज जी सलाह देते हैं कि व्यक्ति को —</p>
<ul>
<li>
<p><strong>भगवान सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए</strong></p>
</li>
<li>
<p><strong>गायत्री मंत्र</strong> या <strong>गुरु मंत्र जप</strong> करना चाहिए</p>
</li>
<li>
<p>शांत मन से <strong>प्रार्थना या ध्यान</strong> में बैठना चाहिए</p>
</li>
<li>
<p>परिवार के साथ <strong>सत्संग या कीर्तन</strong> करना अत्यंत शुभ होता है</p>
</li>
</ul>
<p>इस समय किए गए जप और ध्यान का फल कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि उस वक्त वातावरण पूरी तरह <strong>सात्त्विक और ऊर्जावान</strong> होता है।</p>
<hr />
<h3><strong>क्यों नहीं करना चाहिए भोजन?</strong></h3>
<p>महाराज जी के अनुसार, सूर्यास्त के समय शरीर का <strong>पाचन तंत्र धीमा</strong> पड़ने लगता है। इस समय भोजन करने से न केवल शरीर पर असर पड़ता है, बल्कि मन भी भारी हो जाता है। यही कारण है कि प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इस समय <strong>भोजन, सहवास या नकारात्मक चर्चा</strong> को वर्जित बताया है।</p>
<blockquote>
<p>“जो व्यक्ति संध्या काल में भोजन से बचकर नाम जप करता है,<br />उसके जीवन में मानसिक शांति और आध्यात्मिक बल बढ़ता है।” — <em>प्रेमानंद महाराज</em></p>
</blockquote>
<hr />
<h3><strong>शाम के बाद क्या करना चाहिए?</strong></h3>
<p>संध्या के इन 48 मिनटों के बाद व्यक्ति को हल्का भोजन या फल ग्रहण करना चाहिए।<br />फिर रात में <strong>राम नाम जप</strong> या <strong>सुखपूर्वक ध्यान</strong> करने से मन शांत होता है और नींद गहरी आती है।</p>
<hr />
<h3><strong>प्रेमानंद महाराज से कैसे मिलें?</strong></h3>
<p>प्रेमानंद महाराज से मिलने के लिए भक्तों को <strong>वृंदावन स्थित ‘श्री हित राधा केलि कुंज आश्रम’</strong> जाना होता है।<br />यहाँ प्रतिदिन सुबह <strong>6:30 बजे से एकांतिक वार्तालाप</strong> शुरू होता है।<br />भक्तों को मिलने के लिए <strong>सुबह 9 बजे से टोकन</strong> दिए जाते हैं।<br />इसके लिए केवल <strong>आधार कार्ड से पंजीकरण</strong> करना होता है।</p>
<hr />
<h3><strong>जीवन में अपनाएं यह 48 मिनट की साधना</strong></h3>
<p>अगर आप रोज शाम इन 48 मिनटों को भोजन छोड़कर भगवान के नाम में बिताते हैं,<br />तो धीरे-धीरे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, शांति और दिव्यता बढ़ती जाती है।<br />प्रेमानंद महाराज कहते हैं —</p>
<blockquote>
<p>“यह समय शरीर को नहीं, आत्मा को पोषित करने का है।”</p>
</blockquote>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>जीवन के मंत्र</category>
                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>पूजा पाठ</category>
                                            <category>पर्व त्यौहार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Oct 2025 16:51:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गोपाष्टमी 2025: भगवान कृष्ण ने गाय चराना कब शुरू किया?</title>
                                    <description><![CDATA[गोपाष्टमी का त्योहार हिंदू धर्म में भगवान कृष्ण और गौ माता को समर्पित है। इस दिन लोग व्रत रखते हैं और गायों की पूजा करते हैं। मान्यता है कि गोपाष्टमी पर गायों की पूजा करने से व्यक्ति के सभी पाप धुल जाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/gopashtami-2025-when-did-lord-krishna-start-grazing-cows/article-36570"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2025-10/dharam-.jpg" alt=""></a><br /><h3> गोपाष्टमी क्यों मनाई जाती है</h3>
<p>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान कृष्ण केवल 7 वर्ष के थे, तब उनके पिता ने उन्हें गायों का पालन सौंपा। पहले वे सिर्फ बछड़ों की देखभाल करते थे, लेकिन गोपाष्टमी के दिन यानी कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से उन्होंने <strong>गौ माता को चराना शुरू किया</strong>। यही कारण है कि इस दिन को गोपाष्टमी के रूप में मनाया जाने लगा।</p>
<hr />
<h3>गोपाष्टमी की पौराणिक कथा</h3>
<p>कथा के अनुसार, जब बाल गोपाल 7 साल के हुए, उन्होंने माता यशोदा से कहा कि वे अब बछड़ों के बजाय <strong>गायों को चराने</strong> जाएंगे। यशोदा माता ने सलाह दी कि पहले पिता से पूछ लें।</p>
<p>भगवान कृष्ण नंद बाबा के पास गए और अपनी इच्छा व्यक्त की। नंद बाबा ने कहा कि गौ चारण के लिए <strong>शुभ मुहूर्त</strong> देखा जाए। कृष्ण बालक तुरंत पंडित जी के पास गए। पंचांग देखकर शुभ समय तय हुआ और नंद बाबा ने बाल कृष्ण को गौ-पालन की अनुमति दे दी।</p>
<p>तब से ही कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी के रूप में मनाया जाने लगा, क्योंकि उसी दिन भगवान कृष्ण ने गौ-पालन का संकल्प लिया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>पूजा पाठ</category>
                                            <category>पर्व त्यौहार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Oct 2025 15:22:57 +0530</pubDate>
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