ब्रह्मोस कूटनीति: कैसे वियतनाम समझौता इंडो-पैसिफिक में भारत की रणनीतिक पहुंच बढ़ा रहा है

ओजस्व तिवारी -अतिथि लेखक

भारत और वियतनाम के बीच हुआ लगभग 629 मिलियन डॉलर (करीब ₹5,200 करोड़)का ब्रह्मोस मिसाइल समझौता केवल एक रक्षा निर्यात नहीं, बल्कि भारत की उभरती सामरिक और कूटनीतिक शक्ति का प्रतीक है। जून 2025 में अंतिम रूप दिए गए इस समझौते ने भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार के रूप में स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम दिया है।

ब्रह्मोस विश्व की सबसे तेज़ परिचालन सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलों में से एक है, जिसे भारत और रूस के संयुक्त सहयोग से विकसित किया गया था। लगभग 290–450 किलोमीटर की मारक क्षमताऔरमैक 2.8 से 3.0 की गतिवाली यह मिसाइल भूमि, समुद्र और वायु—तीनों प्लेटफॉर्म से दागी जा सकती है। इसकी उच्च गति, सटीकता और दुश्मन की वायु रक्षा प्रणालियों को भेदने की क्षमता इसे विश्व के सबसे प्रभावशाली मिसाइल प्रणालियों में शामिल करती है।

यही कारण है कि वियतनाम का ब्रह्मोस खरीदना केवल एक सैन्य निर्णय नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी है। दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों और क्षेत्रीय दावों ने वियतनाम सहित कई दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाया है। ऐसे में ब्रह्मोस जैसी उन्नत मिसाइल प्रणाली वियतनाम की प्रतिरोधक क्षमता (deterrence capability) को मजबूत करती है।

इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका दीर्घकालिक सामरिक प्रभाव है। यदि वियतनाम में ब्रह्मोस की तैनाती सफल रहती है, तो यह इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस और थाईलैंड जैसे देशों के लिए भी भारत के रक्षा उद्योग की विश्वसनीयता को बढ़ाएगा। इससे भारत को केवल हथियार बेचने का अवसर नहीं मिलेगा, बल्कि सैन्य प्रशिक्षण, संयुक्त अभ्यास, तकनीकी सहयोग और रक्षा कूटनीति के माध्यम से पूरे क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत करने का अवसर मिलेगा।

रक्षा निर्यात सामान्य व्यापार से अलग होते हैं। किसी भी देश द्वारा उन्नत हथियार प्रणाली खरीदने का अर्थ है दशकों तक रखरखाव, प्रशिक्षण, अपग्रेड और रणनीतिक सहयोग। इस प्रकार ब्रह्मोस भारत को दीर्घकालिक राजनीतिक और सैन्य साझेदारियां बनाने का अवसर प्रदान करता है। यह भारत की "एक्ट ईस्ट नीति" को केवल आर्थिक सहयोग से आगे बढ़ाकर सुरक्षा सहयोग के नए चरण में ले जाता है।

हालांकि, इस समझौते का उद्देश्य चीन का प्रत्यक्ष मुकाबला करना नहीं है। बल्कि यह क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने और छोटे देशों को अपनी सुरक्षा क्षमताएं बढ़ाने का विकल्प प्रदान करता है। भारत स्वयं को एक ऐसे जिम्मेदार शक्ति केंद्र के रूप में प्रस्तुत कर रहा है जो क्षेत्रीय स्थिरता और नियम-आधारित व्यवस्था का समर्थन करता है।

ब्रह्मोस-वियतनाम समझौता इसलिए केवल एक मिसाइल सौदा नहीं है। यह भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसके माध्यम से वह पूर्वी एशिया और इंडो-पैसिफिक में अपने प्रभाव, साझेदारियों और सामरिक महत्व को लगातार बढ़ा रहा है।

अब प्रश्न यह है कि क्या भारत इस सफलता को व्यापक रक्षा साझेदारियों में बदल पाएगा, या ब्रह्मोस केवल एक सफल निर्यात सौदा बनकर रह जाएगा? इसका उत्तर आने वाले वर्षों में भारत की रक्षा कूटनीति तय करेगी।

Writer Profile: ओजस्व तिवारी, 20, अंतरराष्ट्रीय संबंधों का छात्र, शिव नाडार यूनिवर्सिटी, दिल्ली एनसीआर

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09 Jun 2026 By दैनिक जागरण

ब्रह्मोस कूटनीति: कैसे वियतनाम समझौता इंडो-पैसिफिक में भारत की रणनीतिक पहुंच बढ़ा रहा है

ओजस्व तिवारी -अतिथि लेखक

ब्रह्मोस विश्व की सबसे तेज़ परिचालन सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलों में से एक है, जिसे भारत और रूस के संयुक्त सहयोग से विकसित किया गया था। लगभग 290–450 किलोमीटर की मारक क्षमताऔरमैक 2.8 से 3.0 की गतिवाली यह मिसाइल भूमि, समुद्र और वायु—तीनों प्लेटफॉर्म से दागी जा सकती है। इसकी उच्च गति, सटीकता और दुश्मन की वायु रक्षा प्रणालियों को भेदने की क्षमता इसे विश्व के सबसे प्रभावशाली मिसाइल प्रणालियों में शामिल करती है।

यही कारण है कि वियतनाम का ब्रह्मोस खरीदना केवल एक सैन्य निर्णय नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी है। दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों और क्षेत्रीय दावों ने वियतनाम सहित कई दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाया है। ऐसे में ब्रह्मोस जैसी उन्नत मिसाइल प्रणाली वियतनाम की प्रतिरोधक क्षमता (deterrence capability) को मजबूत करती है।

इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका दीर्घकालिक सामरिक प्रभाव है। यदि वियतनाम में ब्रह्मोस की तैनाती सफल रहती है, तो यह इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस और थाईलैंड जैसे देशों के लिए भी भारत के रक्षा उद्योग की विश्वसनीयता को बढ़ाएगा। इससे भारत को केवल हथियार बेचने का अवसर नहीं मिलेगा, बल्कि सैन्य प्रशिक्षण, संयुक्त अभ्यास, तकनीकी सहयोग और रक्षा कूटनीति के माध्यम से पूरे क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत करने का अवसर मिलेगा।

रक्षा निर्यात सामान्य व्यापार से अलग होते हैं। किसी भी देश द्वारा उन्नत हथियार प्रणाली खरीदने का अर्थ है दशकों तक रखरखाव, प्रशिक्षण, अपग्रेड और रणनीतिक सहयोग। इस प्रकार ब्रह्मोस भारत को दीर्घकालिक राजनीतिक और सैन्य साझेदारियां बनाने का अवसर प्रदान करता है। यह भारत की "एक्ट ईस्ट नीति" को केवल आर्थिक सहयोग से आगे बढ़ाकर सुरक्षा सहयोग के नए चरण में ले जाता है।

हालांकि, इस समझौते का उद्देश्य चीन का प्रत्यक्ष मुकाबला करना नहीं है। बल्कि यह क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने और छोटे देशों को अपनी सुरक्षा क्षमताएं बढ़ाने का विकल्प प्रदान करता है। भारत स्वयं को एक ऐसे जिम्मेदार शक्ति केंद्र के रूप में प्रस्तुत कर रहा है जो क्षेत्रीय स्थिरता और नियम-आधारित व्यवस्था का समर्थन करता है।

ब्रह्मोस-वियतनाम समझौता इसलिए केवल एक मिसाइल सौदा नहीं है। यह भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसके माध्यम से वह पूर्वी एशिया और इंडो-पैसिफिक में अपने प्रभाव, साझेदारियों और सामरिक महत्व को लगातार बढ़ा रहा है।

अब प्रश्न यह है कि क्या भारत इस सफलता को व्यापक रक्षा साझेदारियों में बदल पाएगा, या ब्रह्मोस केवल एक सफल निर्यात सौदा बनकर रह जाएगा? इसका उत्तर आने वाले वर्षों में भारत की रक्षा कूटनीति तय करेगी।

Writer Profile: ओजस्व तिवारी, 20, अंतरराष्ट्रीय संबंधों का छात्र, शिव नाडार यूनिवर्सिटी, दिल्ली एनसीआर

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