मणिपुर में बढ़ा तनाव, गांवों में सुरक्षा बलों की एंट्री पर नई शर्त

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नगा गांव में हमले के बाद विलेज अथॉरिटी का फैसला, बिना सूचना सुरक्षा बलों और ड्रोन की एंट्री पर आपत्ति

मणिपुर में पिछले तीन वर्षों से जारी जातीय हिंसा के बीच एक बार फिर हालात तनावपूर्ण होते दिखाई दे रहे हैं। कांगपोकपी जिले के पोंग्रिंगलॅान्ग रोंग्मेई नगा गांव में हुई गोलीबारी की घटना के बाद राज्य के कई नगा संगठनों और ग्रामीण संस्थाओं ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। इसी बीच नोने जिले के लोंग्जांग और ठंगाल गांव की विलेज अथॉरिटी ने राज्य पुलिस, असम राइफल्स और सीआरपीएफ को नोटिस जारी कर कहा है कि गांवों में प्रवेश करने से पहले स्थानीय प्रशासन और विलेज अथॉरिटी को सूचना देना अनिवार्य होगा। इस फैसले ने राज्य में पहले से चल रहे तनाव को और बढ़ा दिया है।

सोमवार को कांगपोकपी जिले में स्थित पोंग्रिंगलॅान्ग रोंग्मेई नगा गांव में हथियारबंद लोगों द्वारा गोलीबारी की घटना सामने आई थी। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक इस हमले के बाद चुन्जांग्लुंग पान्मेई नामक एक नगा विलेज गार्ड लापता हो गया था। बाद में उसका शव आसपास के जंगलों से बरामद किया गया। अधिकारियों के अनुसार उसके सिर में गोली लगी थी। घटना के बाद इलाके में दहशत का माहौल बन गया और सुरक्षा बलों ने आसपास के क्षेत्रों में तलाशी अभियान शुरू किया।

नगा संगठनों का आरोप है कि हमले के पीछे कुकी उग्रवादी समूहों का हाथ है। कुछ संगठनों ने केंद्र सरकार और सुरक्षा एजेंसियों पर भी पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि राज्य में चल रही हिंसा के दौरान कुछ समुदायों को विशेष संरक्षण दिया जा रहा है जबकि दूसरे समुदायों की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त कदम नहीं उठाए जा रहे। हालांकि इन आरोपों पर अभी तक संबंधित एजेंसियों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

घटना के कुछ घंटों बाद चिंग मामांग गांव में भी गोलीबारी की खबर आई। बताया जा रहा है कि अज्ञात हथियारबंद लोगों ने अचानक फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें एक व्यक्ति घायल हो गया। घायल को स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां मामले की जांच कर रही हैं, लेकिन अब तक किसी संगठन ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है।

इसी बीच नोने जिले की विलेज अथॉरिटी ने सुरक्षा बलों को लेकर नया निर्देश जारी किया है। नोटिस में कहा गया है कि गांवों के भीतर किसी भी प्रकार की तलाशी, छापेमारी, गश्त या गिरफ्तारी अभियान चलाने से पहले संबंधित गांव की अथॉरिटी को सूचित करना होगा। साथ ही बिना पूर्व जानकारी के ड्रोन उड़ाने पर भी आपत्ति जताई गई है। ग्रामीण प्रतिनिधियों का कहना है कि यह कदम स्थानीय लोगों के अधिकारों और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।

विलेज अथॉरिटी का दावा है कि मणिपुर हिल एरियाज विलेज अथॉरिटी एक्ट, 1956 के तहत गांवों की आंतरिक व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़े कई अधिकार उन्हें प्राप्त हैं। ऐसे में किसी भी सरकारी कार्रवाई से पहले स्थानीय संस्थाओं को विश्वास में लिया जाना चाहिए। हालांकि सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में इस तरह की शर्तें सुरक्षा अभियानों को प्रभावित कर सकती हैं और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में नई चुनौतियां पैदा कर सकती हैं।

राजधानी इम्फाल में भी सोमवार को बड़ी संख्या में महिलाएं सड़कों पर उतरीं। करीब 14 नागरिक संगठनों के संयुक्त आह्वान पर निकाली गई महारैली में हजारों महिलाओं ने हिस्सा लिया। यह रैली लगभग पांच किलोमीटर तक चली। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लागू करने, कथित अवैध घुसपैठियों की पहचान करने और उन्हें राज्य से बाहर करने की मांग उठाई। महिलाओं के हाथों में तख्तियां और बैनर थे, जिन पर विभिन्न मांगें लिखी गई थीं।

प्रदर्शन में शामिल महिलाओं का कहना था कि राज्य में लंबे समय से जारी अस्थिरता और जनसांख्यिकीय बदलाव को लेकर लोगों में चिंता बढ़ रही है। उनका मानना है कि एनआरसी लागू होने से वास्तविक नागरिकों की पहचान स्पष्ट होगी और अवैध घुसपैठ को रोका जा सकेगा। हालांकि इस मांग को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर अलग-अलग राय सामने आती रही हैं।

मणिपुर में हिंसा और तनाव का असर अब भी हजारों परिवारों पर दिखाई दे रहा है। राहत शिविरों में रहने वाले लोगों की संख्या बड़ी है और कई परिवार अब तक अपने घरों को नहीं लौट पाए हैं। हाल ही में सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त आंकड़ों में सामने आया कि पिछले तीन वर्षों में विस्थापन और उससे जुड़ी परिस्थितियों के कारण 731 लोगों की मौत हुई है। इनमें सबसे अधिक मौतें चूराचांदपुर जिले में दर्ज की गई हैं। इसके अलावा बिष्णुपुर और कांगपोकपी जिलों में भी बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है।

आंकड़ों के अनुसार राज्य के नौ जिलों में अभी भी 43 हजार से अधिक लोग विस्थापित जीवन जी रहे हैं। राहत शिविरों में रहने वाले इन लोगों को आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। राज्य सरकार और केंद्र सरकार लगातार हालात सामान्य करने की बात कह रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी है। नगा गांव में हालिया हमले, सुरक्षा बलों की एंट्री को लेकर नई शर्त और एनआरसी की मांग को लेकर हुए बड़े प्रदर्शन ने साफ संकेत दिया है कि मणिपुर में शांति बहाली की प्रक्रिया अभी लंबी और चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। 

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09 Jun 2026 By Vaishnavi.J

मणिपुर में बढ़ा तनाव, गांवों में सुरक्षा बलों की एंट्री पर नई शर्त

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मणिपुर में पिछले तीन वर्षों से जारी जातीय हिंसा के बीच एक बार फिर हालात तनावपूर्ण होते दिखाई दे रहे हैं। कांगपोकपी जिले के पोंग्रिंगलॅान्ग रोंग्मेई नगा गांव में हुई गोलीबारी की घटना के बाद राज्य के कई नगा संगठनों और ग्रामीण संस्थाओं ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। इसी बीच नोने जिले के लोंग्जांग और ठंगाल गांव की विलेज अथॉरिटी ने राज्य पुलिस, असम राइफल्स और सीआरपीएफ को नोटिस जारी कर कहा है कि गांवों में प्रवेश करने से पहले स्थानीय प्रशासन और विलेज अथॉरिटी को सूचना देना अनिवार्य होगा। इस फैसले ने राज्य में पहले से चल रहे तनाव को और बढ़ा दिया है।

सोमवार को कांगपोकपी जिले में स्थित पोंग्रिंगलॅान्ग रोंग्मेई नगा गांव में हथियारबंद लोगों द्वारा गोलीबारी की घटना सामने आई थी। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक इस हमले के बाद चुन्जांग्लुंग पान्मेई नामक एक नगा विलेज गार्ड लापता हो गया था। बाद में उसका शव आसपास के जंगलों से बरामद किया गया। अधिकारियों के अनुसार उसके सिर में गोली लगी थी। घटना के बाद इलाके में दहशत का माहौल बन गया और सुरक्षा बलों ने आसपास के क्षेत्रों में तलाशी अभियान शुरू किया।

नगा संगठनों का आरोप है कि हमले के पीछे कुकी उग्रवादी समूहों का हाथ है। कुछ संगठनों ने केंद्र सरकार और सुरक्षा एजेंसियों पर भी पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि राज्य में चल रही हिंसा के दौरान कुछ समुदायों को विशेष संरक्षण दिया जा रहा है जबकि दूसरे समुदायों की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त कदम नहीं उठाए जा रहे। हालांकि इन आरोपों पर अभी तक संबंधित एजेंसियों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

घटना के कुछ घंटों बाद चिंग मामांग गांव में भी गोलीबारी की खबर आई। बताया जा रहा है कि अज्ञात हथियारबंद लोगों ने अचानक फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें एक व्यक्ति घायल हो गया। घायल को स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां मामले की जांच कर रही हैं, लेकिन अब तक किसी संगठन ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है।

इसी बीच नोने जिले की विलेज अथॉरिटी ने सुरक्षा बलों को लेकर नया निर्देश जारी किया है। नोटिस में कहा गया है कि गांवों के भीतर किसी भी प्रकार की तलाशी, छापेमारी, गश्त या गिरफ्तारी अभियान चलाने से पहले संबंधित गांव की अथॉरिटी को सूचित करना होगा। साथ ही बिना पूर्व जानकारी के ड्रोन उड़ाने पर भी आपत्ति जताई गई है। ग्रामीण प्रतिनिधियों का कहना है कि यह कदम स्थानीय लोगों के अधिकारों और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।

विलेज अथॉरिटी का दावा है कि मणिपुर हिल एरियाज विलेज अथॉरिटी एक्ट, 1956 के तहत गांवों की आंतरिक व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़े कई अधिकार उन्हें प्राप्त हैं। ऐसे में किसी भी सरकारी कार्रवाई से पहले स्थानीय संस्थाओं को विश्वास में लिया जाना चाहिए। हालांकि सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में इस तरह की शर्तें सुरक्षा अभियानों को प्रभावित कर सकती हैं और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में नई चुनौतियां पैदा कर सकती हैं।

राजधानी इम्फाल में भी सोमवार को बड़ी संख्या में महिलाएं सड़कों पर उतरीं। करीब 14 नागरिक संगठनों के संयुक्त आह्वान पर निकाली गई महारैली में हजारों महिलाओं ने हिस्सा लिया। यह रैली लगभग पांच किलोमीटर तक चली। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लागू करने, कथित अवैध घुसपैठियों की पहचान करने और उन्हें राज्य से बाहर करने की मांग उठाई। महिलाओं के हाथों में तख्तियां और बैनर थे, जिन पर विभिन्न मांगें लिखी गई थीं।

प्रदर्शन में शामिल महिलाओं का कहना था कि राज्य में लंबे समय से जारी अस्थिरता और जनसांख्यिकीय बदलाव को लेकर लोगों में चिंता बढ़ रही है। उनका मानना है कि एनआरसी लागू होने से वास्तविक नागरिकों की पहचान स्पष्ट होगी और अवैध घुसपैठ को रोका जा सकेगा। हालांकि इस मांग को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर अलग-अलग राय सामने आती रही हैं।

मणिपुर में हिंसा और तनाव का असर अब भी हजारों परिवारों पर दिखाई दे रहा है। राहत शिविरों में रहने वाले लोगों की संख्या बड़ी है और कई परिवार अब तक अपने घरों को नहीं लौट पाए हैं। हाल ही में सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त आंकड़ों में सामने आया कि पिछले तीन वर्षों में विस्थापन और उससे जुड़ी परिस्थितियों के कारण 731 लोगों की मौत हुई है। इनमें सबसे अधिक मौतें चूराचांदपुर जिले में दर्ज की गई हैं। इसके अलावा बिष्णुपुर और कांगपोकपी जिलों में भी बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है।

आंकड़ों के अनुसार राज्य के नौ जिलों में अभी भी 43 हजार से अधिक लोग विस्थापित जीवन जी रहे हैं। राहत शिविरों में रहने वाले इन लोगों को आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। राज्य सरकार और केंद्र सरकार लगातार हालात सामान्य करने की बात कह रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी है। नगा गांव में हालिया हमले, सुरक्षा बलों की एंट्री को लेकर नई शर्त और एनआरसी की मांग को लेकर हुए बड़े प्रदर्शन ने साफ संकेत दिया है कि मणिपुर में शांति बहाली की प्रक्रिया अभी लंबी और चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। 

https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/tension-increases-in-manipur-new-condition-on-entry-of-security/article-55452

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