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रायगढ़ में हाथी शावकों की मौत का खुलासा, संक्रमण बना वजह
रायगढ़,(छ.ग.)
25 दिनों में चार शावकों की मौत से बढ़ी चिंता, देहरादून और बरेली लैब की रिपोर्ट में हेपेटाइटिस व सेप्टिसीमिया की पुष्टि
रायगढ़ और धरमजयगढ़ वन मंडलों में पिछले कुछ सप्ताह से हाथी शावकों की लगातार हो रही मौतों के मामले में अब जांच रिपोर्ट सामने आ गई है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जिन शावकों की मौत हुई, उनमें से एक की जान हेपेटाइटिस यानी लिवर संक्रमण और दूसरे की मौत सेप्टिसीमिया यानी गंभीर रक्त संक्रमण के कारण हुई। इससे पहले एक अन्य शावक की मौत निमोनिया से होने की पुष्टि हो चुकी थी। महज 25 दिनों के भीतर एक ही हाथी दल के चार शावकों की मौत ने वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है। मामले को गंभीर मानते हुए विभाग ने विशेषज्ञों की मदद से जांच कराई थी और अब रिपोर्ट आने के बाद मौतों के पीछे की वजह काफी हद तक साफ हो गई है।
8 मई से 1 जून के बीच रायगढ़ और धरमजयगढ़ क्षेत्र के जंगलों में अलग-अलग स्थानों पर हाथी शावकों के शव मिले थे। शुरुआती स्तर पर यह स्पष्ट नहीं था कि मौतों की वजह क्या है। कई मामलों में शावकों के शव जल स्रोतों और तालाबों के आसपास पाए गए थे, जिससे वन अमले के सामने कई सवाल खड़े हो गए थे। चूंकि सभी शावक एक ही हाथी दल से जुड़े बताए जा रहे थे, इसलिए संक्रमण फैलने की आशंका भी जताई जा रही थी। अधिकारियों के अनुसार पोस्टमॉर्टम के दौरान आवश्यक नमूने एकत्र किए गए और उन्हें जांच के लिए देहरादून तथा बरेली स्थित प्रयोगशालाओं में भेजा गया था। अब आई रिपोर्ट में दो अलग-अलग तरह के संक्रमण की पुष्टि हुई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हेपेटाइटिस ऐसा संक्रमण है जो सीधे लिवर को प्रभावित करता है। इसके कारण शरीर की कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं प्रभावित होने लगती हैं। दूसरी ओर सेप्टिसीमिया एक गंभीर स्थिति होती है जिसमें रक्त संक्रमित हो जाता है और संक्रमण पूरे शरीर में फैलने लगता है। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक छोटे शावकों में ऐसी बीमारियां तेजी से असर दिखाती हैं और समय पर इलाज या पहचान नहीं होने पर जान का खतरा बढ़ जाता है। यही वजह है कि हाथी शावकों की मौत के मामलों को लेकर विभाग अब पहले से ज्यादा सतर्क नजर आ रहा है।
लगातार सामने आ रही घटनाओं के बाद वन विभाग ने हाल ही में एक विशेष कार्यशाला का आयोजन भी किया। दो दिन तक चले इस कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों से आए वैज्ञानिकों, वन्यजीव विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने हिस्सा लिया। कार्यशाला के दौरान हाथियों में होने वाली बीमारियों, संक्रमण के कारणों, स्वास्थ्य निगरानी और बचाव के उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई। अधिकारियों और मैदानी कर्मचारियों को भी यह बताया गया कि जंगलों में किसी हाथी या शावक के असामान्य व्यवहार को कैसे पहचानना है और बीमारी की आशंका होने पर तत्काल क्या कदम उठाने चाहिए।
बताया जा रहा है कि रायगढ़ और धरमजयगढ़ के जंगलों में इस समय कुल 137 हाथी मौजूद हैं। इनमें 37 नर, 62 मादा और 35 शावक शामिल हैं। शावकों की लगातार मौत के बाद विभाग ने विशेष निगरानी अभियान शुरू कर दिया है। हाथी मित्र दल, ट्रैकर्स और वनकर्मियों की टीमें लगातार जंगलों में सक्रिय हैं। हाथियों के मूवमेंट पर नजर रखने के लिए ट्रैप कैमरों और ड्रोन का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। रात के समय थर्मल ड्रोन की मदद से हाथियों की लोकेशन और गतिविधियों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है ताकि किसी भी तरह की समस्या का समय रहते पता लगाया जा सके।
वन अधिकारियों का मानना है कि जंगलों में रहने वाले हाथियों के स्वास्थ्य की निगरानी आसान नहीं होती। कई बार बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखाई नहीं देते और जब तक स्थिति स्पष्ट होती है तब तक काफी देर हो चुकी होती है। ऐसे में तकनीक और विशेषज्ञों की मदद से निगरानी बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। विभाग का उद्देश्य सिर्फ मौतों के कारणों की पहचान करना नहीं बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकना भी है।
डीएफओ जितेंद्र उपाध्याय ने बताया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की मौजूदगी में पोस्टमॉर्टम कराया गया था। जांच रिपोर्ट में एक शावक की मौत हेपेटाइटिस और दूसरे की मौत सेप्टिसीमिया के कारण होने की पुष्टि हुई है। उन्होंने कहा कि विभाग अब एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार कर रहा है ताकि हाथी शावकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और जंगलों में संक्रमण से जुड़े मामलों की समय रहते पहचान हो सके।
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रायगढ़ में हाथी शावकों की मौत का खुलासा, संक्रमण बना वजह
रायगढ़,(छ.ग.)
रायगढ़ और धरमजयगढ़ वन मंडलों में पिछले कुछ सप्ताह से हाथी शावकों की लगातार हो रही मौतों के मामले में अब जांच रिपोर्ट सामने आ गई है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जिन शावकों की मौत हुई, उनमें से एक की जान हेपेटाइटिस यानी लिवर संक्रमण और दूसरे की मौत सेप्टिसीमिया यानी गंभीर रक्त संक्रमण के कारण हुई। इससे पहले एक अन्य शावक की मौत निमोनिया से होने की पुष्टि हो चुकी थी। महज 25 दिनों के भीतर एक ही हाथी दल के चार शावकों की मौत ने वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है। मामले को गंभीर मानते हुए विभाग ने विशेषज्ञों की मदद से जांच कराई थी और अब रिपोर्ट आने के बाद मौतों के पीछे की वजह काफी हद तक साफ हो गई है।
8 मई से 1 जून के बीच रायगढ़ और धरमजयगढ़ क्षेत्र के जंगलों में अलग-अलग स्थानों पर हाथी शावकों के शव मिले थे। शुरुआती स्तर पर यह स्पष्ट नहीं था कि मौतों की वजह क्या है। कई मामलों में शावकों के शव जल स्रोतों और तालाबों के आसपास पाए गए थे, जिससे वन अमले के सामने कई सवाल खड़े हो गए थे। चूंकि सभी शावक एक ही हाथी दल से जुड़े बताए जा रहे थे, इसलिए संक्रमण फैलने की आशंका भी जताई जा रही थी। अधिकारियों के अनुसार पोस्टमॉर्टम के दौरान आवश्यक नमूने एकत्र किए गए और उन्हें जांच के लिए देहरादून तथा बरेली स्थित प्रयोगशालाओं में भेजा गया था। अब आई रिपोर्ट में दो अलग-अलग तरह के संक्रमण की पुष्टि हुई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हेपेटाइटिस ऐसा संक्रमण है जो सीधे लिवर को प्रभावित करता है। इसके कारण शरीर की कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं प्रभावित होने लगती हैं। दूसरी ओर सेप्टिसीमिया एक गंभीर स्थिति होती है जिसमें रक्त संक्रमित हो जाता है और संक्रमण पूरे शरीर में फैलने लगता है। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक छोटे शावकों में ऐसी बीमारियां तेजी से असर दिखाती हैं और समय पर इलाज या पहचान नहीं होने पर जान का खतरा बढ़ जाता है। यही वजह है कि हाथी शावकों की मौत के मामलों को लेकर विभाग अब पहले से ज्यादा सतर्क नजर आ रहा है।
लगातार सामने आ रही घटनाओं के बाद वन विभाग ने हाल ही में एक विशेष कार्यशाला का आयोजन भी किया। दो दिन तक चले इस कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों से आए वैज्ञानिकों, वन्यजीव विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने हिस्सा लिया। कार्यशाला के दौरान हाथियों में होने वाली बीमारियों, संक्रमण के कारणों, स्वास्थ्य निगरानी और बचाव के उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई। अधिकारियों और मैदानी कर्मचारियों को भी यह बताया गया कि जंगलों में किसी हाथी या शावक के असामान्य व्यवहार को कैसे पहचानना है और बीमारी की आशंका होने पर तत्काल क्या कदम उठाने चाहिए।
बताया जा रहा है कि रायगढ़ और धरमजयगढ़ के जंगलों में इस समय कुल 137 हाथी मौजूद हैं। इनमें 37 नर, 62 मादा और 35 शावक शामिल हैं। शावकों की लगातार मौत के बाद विभाग ने विशेष निगरानी अभियान शुरू कर दिया है। हाथी मित्र दल, ट्रैकर्स और वनकर्मियों की टीमें लगातार जंगलों में सक्रिय हैं। हाथियों के मूवमेंट पर नजर रखने के लिए ट्रैप कैमरों और ड्रोन का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। रात के समय थर्मल ड्रोन की मदद से हाथियों की लोकेशन और गतिविधियों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है ताकि किसी भी तरह की समस्या का समय रहते पता लगाया जा सके।
वन अधिकारियों का मानना है कि जंगलों में रहने वाले हाथियों के स्वास्थ्य की निगरानी आसान नहीं होती। कई बार बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखाई नहीं देते और जब तक स्थिति स्पष्ट होती है तब तक काफी देर हो चुकी होती है। ऐसे में तकनीक और विशेषज्ञों की मदद से निगरानी बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। विभाग का उद्देश्य सिर्फ मौतों के कारणों की पहचान करना नहीं बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकना भी है।
डीएफओ जितेंद्र उपाध्याय ने बताया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की मौजूदगी में पोस्टमॉर्टम कराया गया था। जांच रिपोर्ट में एक शावक की मौत हेपेटाइटिस और दूसरे की मौत सेप्टिसीमिया के कारण होने की पुष्टि हुई है। उन्होंने कहा कि विभाग अब एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार कर रहा है ताकि हाथी शावकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और जंगलों में संक्रमण से जुड़े मामलों की समय रहते पहचान हो सके।
