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                <title>US News - दैनिक जागरण</title>
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                <title> स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच उच्च स्तरीय कूटनीतिक वार्ता शुरू</title>
                                    <description><![CDATA[ ईरान ने परमाणु बम न बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई, लेकिन संवर्धन अधिकार को बताया अटूट।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/us-iran-switzerland-talks-begin-amid-lebanon-crisis/article-56595"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-iran-high-stakes-four-party-talks-begin-in-switzerland;-iran-assures-no-bomb-but-call-enrichment-non-negotiable-(2).jpg" alt=""></a><br /><p dir="ltr">अमेरिका और ईरान के बीच अत्यंत संवेदनशील और उच्च स्तरीय राजनयिक वार्ता रविवार दोपहर कड़ी सुरक्षा के बीच स्विट्जरलैंड के बर्गनस्टॉक में आधिकारिक तौर पर शुरू हो गई। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बगेर गालिबफ की अगुवाई में हो रही इस चार-पक्षीय शिखर बैठक में पाकिस्तान और कतर के उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं।</p>
<p dir="ltr">यह महत्वपूर्ण बैठक हाल ही में हस्ताक्षरित 'इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन' (MoU) के बाद आयोजित की जा रही है, जिसका मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच जारी सैन्य संघर्ष को रोकना है। हालांकि, दोनों पक्ष 60 दिनों के अस्थाई युद्धविराम के साये में बातचीत की मेज पर आए हैं, लेकिन दोपहर के सत्र से पहले ही ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया। तेहरान ने साफ कहा कि उसका यूरेनियम संवर्धन (Nuclear Enrichment) का अधिकार पूरी तरह से संप्रभु और गैर-परक्राम्य (जिस पर कोई समझौता न हो सके) है, हालांकि वह यह लिखित आश्वासन देने को तैयार है कि वह कभी भी परमाणु बम नहीं बनाएगा।</p>
<p dir="ltr">स्विस विदेश मंत्रालय के अनुसार, राजनयिक कार्यक्रम की शुरुआत बंद कमरे में हुई द्विपक्षीय बैठकों से हुई, जहां ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थ टीमों के साथ बातचीत की रूपरेखा तैयार की। इन तकनीकी वार्ताओं के बाद—जिसमें पाकिस्तान के थल सेनाध्यक्ष फील्ड मार्शल सैयद असीम मुनीर की अचानक मौजूदगी ने सबको चौंका दिया—दोपहर बाद आधिकारिक चार-पक्षीय पूर्ण सत्र (Plenary Session) की शुरुआत हुई।</p>
<h3 dir="ltr">लेबनान संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य एजेंडे में सबसे ऊपर</h3>
<p dir="ltr">मूल रूप से यह बैठक अमेरिका-ईरान अंतरिम शांति समझौते की तकनीकी बारीकियों को तय करने के लिए बुलाई गई थी, लेकिन क्षेत्र में तेजी से बिगड़ते हालातों के कारण चर्चा का दायरा तुरंत बढ़ा दिया गया। दोनों प्रतिनिधिमंडलों के सूत्रों ने पुष्टि की है कि लेबनान में जारी संघर्ष की आपातकालीन समीक्षा को बैठक के प्राथमिक एजेंडे के रूप में शामिल किया गया है।</p>
<p dir="ltr">मध्य पूर्व में सुरक्षा स्थिति इस समय बेहद नाजुक बनी हुई है। सप्ताहांत में दक्षिणी लेबनान के कफ़र तेबनित के पास हिजबुल्लाह के रॉकेट और ड्रोन हमलों में कम से कम छह इजरायली सैनिक मारे गए और 20 अन्य घायल हो गए। इसके साथ ही लेबनान के पश्चिमी बेका और टायर क्षेत्रों में इजरायली हवाई हमलों में एक बच्चे और महिला सहित कम से कम सात नागरिकों की जान चली गई। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्विट्जरलैंड पहुंचने से पहले कहा था कि लेबनान में स्थाई युद्धविराम सुनिश्चित करना वाशिंगटन की तात्कालिक प्राथमिकता है। वहीं, ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघेई ने इजरायल पर लेबनान में अपनी प्रतिबद्धताओं को बार-बार तोड़ने का आरोप लगाया।</p>
<p dir="ltr">सैन्य तनाव के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लेन (समुद्री व्यापार मार्ग) को लेकर भी विवाद गहरा गया है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े फार्स न्यूज ने संकेत दिया है कि रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) अगले आदेश तक अनधिकृत वाणिज्यिक जहाजों के लिए पूरी तरह बंद रहेगा। इस समुद्री नाकेबंदी ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों में हड़कंप मचा दिया है, जिसके कारण कतर को खाड़ी देशों की ओर से सुबह के सत्र में आक्रामक रूप से हस्तक्षेप करना पड़ा, क्योंकि खाड़ी देशों की तेल और गैस आपूर्ति श्रृंखला इस बंदी के कारण सीधे तौर पर ठप हो गई है।</p>
<h3 dir="ltr">अरबों डॉलर का वित्तीय और कूटनीतिक गतिरोध</h3>
<p dir="ltr">बर्गनस्टॉक शिखर सम्मेलन के आर्थिक दांव बेहद ऊंचे हैं। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने रविवार को घोषणा की कि इस प्रारंभिक समझौते का एक मुख्य हिस्सा कतरी खातों में फ्रीज (जब्त) किए गए 6 अरब डॉलर के ईरानी फंड की तत्काल रिहाई है। पेज़ेशकियन ने दावा किया कि इस समझौते की शर्तें पूरी तरह से तेहरान के पक्ष में हैं, और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उन अधिकारों को स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा है जिन्हें वाशिंगटन पहले दबाना चाहता था।</p>
<p dir="ltr">दूसरी ओर, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वाशिंगटन से इस पूरे मामले में एक नया और विवादित मोड़ जोड़ दिया है। ट्रंप ने पुष्टि की कि 60 दिनों के युद्धविराम के दौरान जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने के लिए कोई शुल्क नहीं देना होगा, लेकिन भविष्य में यह मुफ्त आवाजाही सशर्त होगी। उन्होंने संकेत दिया कि यदि कोई व्यापक समझौता नहीं होता है, तो मध्य पूर्व की सुरक्षा में अमेरिका द्वारा निभाई गई "गार्जियन एंजेल" (रक्षक) की भूमिका और सुरक्षा खर्चों की भरपाई के लिए अमेरिका जहाजों पर ट्रांजिट फीस (टोल) लगा सकता है।</p>
<p dir="ltr">"अमेरिका के साथ किसी भी अंतिम शांति समझौते की असली परीक्षा कागजों पर नहीं, बल्कि तेल क्षेत्र में होगी। हम वैश्विक भागीदारों के लिए सैकड़ों निवेश परियोजनाएं खोलने को तैयार हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब पश्चिमी देश प्रतिबंधों में ढील देने के अपने वादों का पूरी तरह पालन करेंगे।" — मोहसेन पाकनेजाद, ईरानी तेल मंत्री</p>
<h3 dir="ltr">कड़ा घरेलू विरोध और संशय के बादल</h3>
<p dir="ltr">स्विट्जरलैंड में चल रही इस कूटनीतिक कवायद के बावजूद, दोनों देशों के भीतर घरेलू स्तर पर राजनीतिक विरोध तेज हो गया है। वाशिंगटन में डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने भू-राजनीतिक गतिरोध से निपटने के राष्ट्रपति ट्रंप के तरीकों पर चौतरफा हमला बोला है। मैरीलैंड के डेमोक्रेटिक सांसद जॉनी ओल्शेवस्की ने सोशल मीडिया पर इस पहल की कड़ी आलोचना करते हुए इसे "समझौते के रूप में पेश किया गया एक दिखावटी युद्धविराम" करार दिया, जो लागू होने से पहले ही बिखरना शुरू हो गया है।</p>
<p dir="ltr">ऐसा ही असंतोष यरूशलेम (इजरायल) में भी देखने को मिल रहा है। हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ जेरूसलम और अगाम इंस्टीट्यूट द्वारा जारी एक व्यापक जनमत संग्रह (Poll) से पता चला है कि 92.1% इजरायलियों का मानना है कि इस हालिया संघर्ष और अमेरिकी समझौते से ईरान और मजबूत होकर उभरा है। इसके अलावा, 82.9% उत्तरदाताओं को लगता है कि इससे इजरायल की दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ गंभीर समझौता हुआ है।</p>
<p dir="ltr">इस कड़े रुख को दोहराते हुए इजरायल के दक्षिणपंथी वित्त मंत्री बेजलेल स्मोट्रिच ने रविवार को दोटूक कहा कि जब तक हिजबुल्लाह पूरी तरह से अपने हथियार नहीं डाल देता, तब तक इजरायली सेना दक्षिणी लेबनान से "एक मिलीमीटर भी पीछे नहीं हटेगी"। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि अमेरिका समय से पहले पीछे हटने की मांग करता है, तो इजरायल वाशिंगटन के दबाव के आगे नहीं झुकेगा।</p>
<p dir="ltr">फिलहाल, अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी हटाने के बाद ईरान ने अपने खार्ग द्वीप निर्यात टर्मिनल से कच्चे तेल की लोडिंग दोबारा शुरू कर दी है। आर्थिक मोर्चे पर यह समझौता राजनीतिक सहमति की तुलना में कहीं अधिक तेजी से आगे बढ़ रहा है। हालांकि, ईरान के सर्वोच्च नेता के वरिष्ठ सलाहकारों, जिनमें मोहसेन रजाई और मोहम्मद मोखबर शामिल हैं, ने अपने वार्ताकारों को अमेरिकी हस्ताक्षरों पर अत्यधिक भरोसा न करने की चेतावनी दी है। उन्होंने साफ कहा है कि यदि वाशिंगटन अपने आर्थिक वादों से मुकरता है, तो मध्य पूर्व के ऊर्जा गलियारों को एक बार फिर तत्काल व्यवधानों का सामना करना पड़ेगा।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 21 Jun 2026 17:24:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[दैनिक जागरण]]></dc:creator>
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                <title>अमेरिका ने इंडो-पैसिफिक कमांड से हटाया ‘इंडो’, भारत की भूमिका पर उठे सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[2018 में चीन को संतुलित करने की रणनीति के तहत जोड़ा गया था ‘इंडो’, अब नाम बदलकर फिर से यूएस पैसिफिक कमांड करने पर विशेषज्ञों के बीच नई बहस शुरू हो गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/america-removes-indo-from-indo-pacific-command-questions-raised-on-indias/article-56234"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-pacific-command.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिका ने अपनी सबसे महत्वपूर्ण सैन्य कमांड में से एक के नाम में बड़ा बदलाव करते हुए ‘इंडो’ शब्द हटा दिया है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि अब यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड (USINDOPACOM) को फिर से यूएस पैसिफिक कमांड (USPACOM) के नाम से जाना जाएगा। इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह कदम अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं का संकेत है और क्या इससे भारत की रणनीतिक भूमिका को लेकर कोई नया संदेश जा रहा है। वर्ष 2018 में तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन ने इस सैन्य कमांड का नाम बदलकर यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड किया था। उस समय यह फैसला केवल एक नाम परिवर्तन नहीं माना गया था, बल्कि इसे अमेरिका की नई एशिया रणनीति का अहम हिस्सा बताया गया था। अमेरिका ने तब स्पष्ट किया था कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर अब एक-दूसरे से जुड़े रणनीतिक क्षेत्र बन चुके हैं। ऐसे में भारत को क्षेत्रीय संतुलन और सुरक्षा व्यवस्था में प्रमुख भागीदार के रूप में देखा जा रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने नाम परिवर्तन की घोषणा करते हुए कहा था कि हिंद महासागर का महत्व लगातार बढ़ रहा है और वैश्विक व्यापार, समुद्री सुरक्षा तथा क्षेत्रीय स्थिरता के लिए इसकी भूमिका बेहद अहम हो चुकी है। इसी सोच के तहत कमांड के नाम में ‘इंडो’ शब्द जोड़ा गया था ताकि भारत और हिंद महासागर क्षेत्र की बढ़ती अहमियत को दर्शाया जा सके।अब आठ साल बाद इस फैसले को पलटते हुए अमेरिका ने फिर से पुराना नाम अपनाने का निर्णय लिया है। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि यूएस पैसिफिक कमांड नाम ऐतिहासिक रूप से जुड़ा हुआ है और इसका सैन्य विरासत से गहरा संबंध रहा है। मंत्रालय के अनुसार यह नाम कई महत्वपूर्ण अभियानों, युद्धों और सैन्य उपलब्धियों का प्रतीक है। इसलिए इसे वापस लाने का फैसला किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि पेंटागन ने साफ किया है कि केवल नाम बदला गया है। कमांड की जिम्मेदारियों, अधिकार क्षेत्र, सैन्य रणनीति और संचालन में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ इस कदम को केवल औपचारिक बदलाव मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि कूटनीति और सुरक्षा नीति में प्रतीकों का भी बड़ा महत्व होता है और ऐसे फैसले अक्सर व्यापक रणनीतिक संकेत देते हैं। जब 2018 में ‘इंडो’ शब्द जोड़ा गया था, तब अमेरिका चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर काफी चिंतित था। उस समय भारत को अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति का केंद्रीय साझेदार माना जा रहा था। क्वाड जैसे मंचों को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना गया, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इस समूह का उद्देश्य क्षेत्र में नियम आधारित व्यवस्था को मजबूत करना और चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन बनाना था।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान बदलाव से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अमेरिका अब अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव कर रहा है। कुछ विशेषज्ञ इसे ट्रम्प प्रशासन की नई विदेश नीति सोच से जोड़कर देख रहे हैं। माना जा रहा है कि अमेरिका अब अपने संसाधनों और सैन्य फोकस को अलग तरीके से व्यवस्थित करना चाहता है। हालांकि आधिकारिक तौर पर किसी रणनीतिक बदलाव की पुष्टि नहीं की गई है। इस फैसले पर भारत में भी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया पर अमेरिकी आदेश की तस्वीर साझा करते हुए सवाल उठाया कि क्या यह क्वाड के भविष्य के लिए कोई संकेत है। उन्होंने टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या यह क्वाड के ताबूत में एक और कील साबित हो सकती है। थरूर की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है जब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा और सामरिक साझेदारियों पर लगातार चर्चा हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">यूएस पैसिफिक कमांड अमेरिका की सबसे बड़ी सैन्य कमांडों में गिनी जाती है। इसका क्षेत्र एशिया-प्रशांत के विशाल हिस्से तक फैला हुआ है। यह कमांड चीन, उत्तर कोरिया, दक्षिण चीन सागर, ताइवान जलडमरूमध्य और कई अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों की निगरानी करती है। इसी वजह से इसके नाम में होने वाला बदलाव भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रहा है। आने वाले महीनों में अमेरिका की विदेश और सुरक्षा नीति के अन्य फैसलों पर नजर रखनी होगी। तभी यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह कदम केवल ऐतिहासिक नाम की वापसी है या फिर इसके पीछे कोई व्यापक रणनीतिक सोच काम कर रही है। फिलहाल अमेरिका ने यह जरूर कहा है कि उसके सहयोगी देशों के साथ संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा प्रतिबद्धताओं में कोई बदलाव नहीं होगा। इसके बावजूद भारत, क्वाड और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से जुड़े देशों में इस फैसले को लेकर चर्चा जारी है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 18:39:40 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>अमेरिका-इजराइल जासूसी विवाद से बढ़ा तनाव, DIA का अलर्ट ‘क्रिटिकल’ स्तर पर</title>
                                    <description><![CDATA[ट्रम्प सरकार और नेतन्याहू के बीच मतभेद गहराए, खुफिया एजेंसियों में असाधारण चेतावनी जारी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/tension-increases-due-to-us-israel-spying-dispute-dias-alert-at/article-55143"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-israel-spy-controversy.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">अमेरिका और इजराइल के बीच रिश्तों में एक बार फिर तनाव की स्थिति बनती दिखाई दे रही है। इस बार मामला सीधे जासूसी और खुफिया जानकारी से जुड़ा हुआ है, जिसने वॉशिंगटन और तेल अवीव दोनों में हलचल बढ़ा दी है। अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) के भीतर यह चिंता जताई जा रही है कि इजराइल अमेरिकी अधिकारियों और ट्रम्प सरकार की अंदरूनी जानकारियों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकता है। यह दावा एक अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट में सामने आया है, जिसके बाद सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी निगरानी और सतर्कता बढ़ा दी है। हालांकि इजराइल ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है और इसे पूरी तरह झूठा बताया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">NBC न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) ने हाल ही में इजराइल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस खतरे के स्तर को बढ़ाकर ‘क्रिटिकल’ कर दिया है। यह एजेंसी का सबसे गंभीर अलर्ट माना जाता है और आमतौर पर बेहद असाधारण परिस्थितियों में ही जारी किया जाता है। रिपोर्ट में दो मौजूदा और एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि यह फैसला अचानक नहीं बल्कि कई घटनाओं और आकलनों के आधार पर लिया गया है। हालांकि किसी एक बड़े सुरक्षा उल्लंघन की पुष्टि अब तक नहीं हुई है, लेकिन लगातार मिल रही सूचनाओं ने अमेरिकी एजेंसियों को सतर्क कर दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">सूत्रों के अनुसार, इस अलर्ट का सीधा असर उन अमेरिकी अधिकारियों पर पड़ सकता है जो इजराइल की यात्रा करते हैं या वहां के अधिकारियों से नियमित संपर्क में रहते हैं। ऐसे मामलों में सुरक्षा प्रोटोकॉल को और कड़ा किया गया है। बताया जा रहा है कि अमेरिकी अधिकारी विदेश यात्राओं के दौरान अपने निजी फोन और लैपटॉप का इस्तेमाल करने से बचते हैं और उनकी जगह अस्थायी डिवाइस का उपयोग किया जाता है। कई बार संवेदनशील बैठकों को भी ऐसे स्थानों पर रखा जाता है जहां निगरानी का जोखिम कम हो। यह स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि अमेरिका इजराइल की खुफिया क्षमता को लेकर सतर्क रुख अपना रहा है, भले ही दोनों देश लंबे समय से रणनीतिक साझेदार रहे हों।</p>
<p class="isSelectedEnd">इजराइली दूतावास ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उनका देश किसी भी सहयोगी देश की जासूसी नहीं करता। दूतावास का कहना है कि इजराइल की खुफिया एजेंसियां केवल उन देशों और समूहों पर नजर रखती हैं जिन्हें वह सुरक्षा खतरा मानता है। दूसरी तरफ अमेरिकी अधिकारी भी यह स्वीकार कर रहे हैं कि किसी एक घटना के कारण यह कदम नहीं उठाया गया, बल्कि कई सूचनाओं के आधार पर जोखिम का आकलन किया गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और इजराइल के बीच ईरान को लेकर पहले से ही मतभेद बढ़े हुए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रम्प प्रशासन ईरान के साथ नए समझौते की कोशिश कर रहा है, जबकि इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस पर सख्त रुख अपनाए हुए हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह को लेकर भी दोनों देशों की रणनीति अलग-अलग मानी जा रही है। इसी बीच ट्रम्प और नेतन्याहू के बीच फोन पर हुई कथित तीखी बातचीत ने भी राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। इस विवाद में एक और परत तब जुड़ी जब यह जानकारी सामने आई कि ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि उन्होंने नेतन्याहू के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया था। इससे दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत और राजनीतिक तनाव की अटकलें और तेज हो गई हैं। यह स्थिति सिर्फ कूटनीतिक मतभेद नहीं बल्कि रणनीतिक असहमति का संकेत भी हो सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">अमेरिका और इजराइल के बीच जासूसी के आरोप नए नहीं हैं। इतिहास में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिन्होंने दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित किया है। 1985 का जोनाथन पोलार्ड केस सबसे चर्चित उदाहरणों में से एक है, जिसमें एक अमेरिकी नौसेना अधिकारी पर इजराइल को गोपनीय जानकारी देने का आरोप लगा था। इस मामले ने दोनों देशों के बीच लंबे समय तक तनाव बनाए रखा था। इसी तरह 2008 में बेन-अमी कादिश केस में भी संवेदनशील रक्षा दस्तावेज लीक करने के आरोप लगे थे।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसके अलावा 2019 में ‘स्टिंगरे डिवाइस’ को लेकर भी विवाद सामने आया था, जिसमें आशंका जताई गई थी कि व्हाइट हाउस के आसपास मोबाइल डेटा की निगरानी की गई। हालांकि उस समय भी इजराइल ने सभी आरोपों से इनकार किया था और किसी भी तरह की संलिप्तता से साफ इनकार किया गया था। मौजूदा विवाद ने एक बार फिर अमेरिका-इजराइल संबंधों की जटिलता को सामने ला दिया है। भले ही दोनों देश रणनीतिक साझेदार हों, लेकिन खुफिया और सुरक्षा मामलों में अविश्वास की परतें समय-समय पर उभरती रही हैं। DIA का यह नया अलर्ट आने वाले समय में दोनों देशों के बीच सहयोग और निगरानी दोनों को प्रभावित कर सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 17:38:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>न्यूयॉर्क मेयर ममदानी ने ईरान युद्ध का विरोध किया, बोले- आम लोग कीमत चुका रहे</title>
                                    <description><![CDATA[सोशल मीडिया पोस्ट में युद्ध खत्म करने की मांग, कहा- बिना मंजूरी शुरू हुए संघर्ष ने हजारों परिवारों को प्रभावित किया]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/new-york-mayor-mamdani-opposed-the-iran-war-and-said/article-54508"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/iran-war-news.jpg" alt=""></a><br /><p dir="ltr">न्यूयॉर्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी ने ईरान युद्ध को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने इस पूरे संघर्ष का खुलकर विरोध करते हुए कहा कि यह युद्ध अब खत्म होना चाहिए, क्योंकि इसकी सबसे ज्यादा कीमत आम लोग चुका रहे हैं। ममदानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक लंबी पोस्ट करते हुए कहा कि पिछले तीन महीनों में जिस तरह हालात बिगड़े हैं, उसने हजारों परिवारों को प्रभावित किया है। उन्होंने यह भी कहा कि इस युद्ध के लिए किसी आम नागरिक ने वोट नहीं किया था, लेकिन सबसे ज्यादा असर उन्हीं लोगों पर पड़ा जिनकी इसमें कोई सीधी भूमिका नहीं थी।</p>
<p dir="ltr">ममदानी ने अपनी पोस्ट में लिखा कि युद्ध के दौरान हजारों नागरिकों की जान जा चुकी है। उन्होंने दावा किया कि 13 अमेरिकी सैनिक भी इस संघर्ष में मारे गए हैं और वे अब कभी अपने परिवारों के पास वापस नहीं लौट पाएंगे। उन्होंने कहा कि युद्ध की असली मार हमेशा आम परिवारों पर पड़ती है, चाहे वह किसी भी देश के हों। उनके मुताबिक संघर्ष सिर्फ सीमा क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर दुनियाभर की अर्थव्यवस्था और लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर दिखाई देने लगता है।</p>
<p dir="ltr">मेयर ने कहा कि अमेरिका में भी इसका सीधा असर देखने को मिल रहा है। पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है और खाने-पीने की चीजें महंगी हो गई हैं। इससे मिडिल क्लास और वर्किंग क्लास परिवारों का बजट बिगड़ रहा है। उन्होंने कहा कि लोग पहले से महंगाई और आर्थिक दबाव झेल रहे थे, ऐसे में युद्ध ने हालात और मुश्किल बना दिए हैं। ममदानी के मुताबिक विदेश नीति के फैसलों का बोझ आखिरकार आम टैक्स देने वाले लोगों पर ही आता है।</p>
<p dir="ltr">उन्होंने आरोप लगाया कि यह संघर्ष अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस की मंजूरी के बिना शुरू किया गया। ममदानी ने कहा कि विदेश में जाने वाली हर जान और अमेरिका के भीतर आम परिवारों पर पड़ने वाला हर आर्थिक बोझ एक लापरवाह फैसले की कीमत है। उनके इस बयान के बाद अमेरिकी राजनीति में भी नई बहस शुरू हो गई है। कई लोग उनके बयान का समर्थन कर रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे से जोड़कर आलोचना भी कर रहे हैं।</p>
<p dir="ltr">इस बीच ईरान और अमेरिका के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले 24 घंटों में कई बड़े घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने हालात को और गंभीर बना दिया है। अमेरिका ने ओमान को चेतावनी दी है कि अगर उसने होर्मुज स्ट्रेट में ईरान की नई टोल वसूली व्यवस्था का समर्थन किया तो संबंधित देशों, कंपनियों और लोगों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। माना जा रहा है कि यह चेतावनी तेल व्यापार और समुद्री मार्गों को लेकर बढ़ती चिंता के कारण दी गई है।</p>
<p dir="ltr">उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ईरान नीति पर भी सवाल उठने लगे हैं। डेमोक्रेटिक सीनेटर क्रिस मर्फी ने कहा कि ट्रम्प प्रशासन लगातार गलत फैसले ले रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि ओमान को दी गई धमकी यह दिखाती है कि ईरान युद्ध धीरे-धीरे नियंत्रण से बाहर जा रहा है। अमेरिकी विपक्ष का कहना है कि हालात संभालने के बजाय और ज्यादा तनाव पैदा किया जा रहा है।</p>
<p dir="ltr">ईरान की तरफ से भी लगातार तीखे बयान सामने आ रहे हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला मुजतबा खामेनेई ने अमेरिका और इजराइल पर आरोप लगाया कि दोनों देश सैन्य मोर्चे पर नाकाम रहने के बाद अब ईरान को अंदर से कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विदेशी ताकतें ईरान के भीतर अस्थिरता पैदा करना चाहती हैं। खामेनेई के बयान के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है।</p>
<p dir="ltr">दूसरी ओर अमेरिका ने ईरान की नई पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। अमेरिका का आरोप है कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलने की तैयारी कर रहा है और इसके जरिए क्षेत्रीय दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है और यहां किसी भी तरह का तनाव वैश्विक बाजार को प्रभावित कर सकता है।</p>
<p dir="ltr">इसी बीच ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड यानी IRGC ने दावा किया है कि उसने अमेरिकी एयरबेस पर मिसाइल हमला किया। ईरान के मुताबिक यह हमला बंदर अब्बास एयरपोर्ट के पास हुए अमेरिकी हमले के जवाब में किया गया। हालांकि अमेरिका की तरफ से इस दावे पर अभी आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन इन घटनाओं ने साफ कर दिया है कि दोनों देशों के बीच तनाव कम होने के बजाय लगातार बढ़ता जा रहा है।</p>
<p dir="ltr">दुनियाभर में अब इस युद्ध को लेकर चिंता बढ़ रही है। कई अंतरराष्ट्रीय संगठन और नेता लगातार शांति की अपील कर रहे हैं। न्यूयॉर्क मेयर जोहरान ममदानी का बयान भी ऐसे समय आया है जब आम लोग युद्ध के असर को सीधे महसूस कर रहे हैं। आने वाले दिनों में हालात किस दिशा में जाएंगे, इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 29 May 2026 16:12:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ट्रंप का बड़ा दावा- ईरान समझौते के करीब, खुल सकता है होर्मुज मार्ग</title>
                                    <description><![CDATA[डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान और कई देशों के बीच समझौता लगभग तय है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जल्द खुलने की उम्मीद जताई गई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/trumps-big-claim-hormuz-passage-may-open-closer-to/article-54126"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/donald-trump-iran-middle-east-strait-of-hormuz.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मिडिल ईस्ट में पिछले कई महीनों से चल रहे तनाव के बीच</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा बयान देकर सबका ध्यान खींच लिया है। उन्होंने कहा है कि ईरान और क्षेत्र के कुछ देशों के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता लगभग तय है। ट्रंप का कहना है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह से फिर से खोलने की प्रक्रिया अब अंतिम चरण में है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जल्द ही इस पर औपचारिक घोषणा की जा सकती है। उनके इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">ट्रंप ने सोशल मीडिया पर बताया कि हाल में उन्होंने मिडिल ईस्ट और खाड़ी क्षेत्र के कई प्रमुख नेताओं से बातचीत की है। उनके अनुसार</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">सऊदी अरब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संयुक्त अरब अमीरात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कतर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुर्की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिस्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जॉर्डन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान और बहरीन के नेताओं के साथ इस मुद्दे पर लंबी चर्चा हुई है। ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और सभी पक्ष तनाव कम करने के लिए राजी हैं। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने समझौते की सभी शर्तें बताने से परहेज किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इतना बताया कि बातचीत का अंतिम दौर चल रहा है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">ट्रंप ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ हुई बातचीत का भी जिक्र किया। उनका कहना था कि दोनों नेताओं के बीच डील के अंतिम पहलुओं पर चर्चा हुई है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">और बहुत जल्द इस समझौते को दुनिया के सामने लाया जाएगा। यह बताया जा रहा है कि बातचीत में क्षेत्रीय सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समुद्री व्यापार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और संघर्ष विराम जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं। लेकिन इजरायल और ईरान की तरफ से ट्रंप के दावों पर अभी तक आधिकारिक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर दुनिया हमेशा चिंतित रही है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और हमलों के कारण यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। कई देशों ने सुरक्षा को लेकर अपनी चिंताएं जताई हैं। अगर यह समझौता होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो अंतरराष्ट्रीय बाजार पर इसका असर देखा जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खासकर तेल की कीमतों और व्यापारिक गतिविधियों में राहत मिलने की उम्मीद है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">दिलचस्प बात यह है कि कुछ दिन पहले अमेरिका की तरफ से ईरान पर फिर से सैन्य कार्रवाई की संभावना जताई जा रही थी। ऐसे में अचानक बातचीत और समझौते की खबरों ने राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया है। ट्रंप ने अपने बयान में ईरान के परमाणु कार्यक्रम या संवर्धित यूरेनियम का सीधा जिक्र नहीं किया</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कई सवाल उठ रहे हैं। वहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान ने शनिवार को कहा कि वह अमेरिका के साथ तनाव कम करने और संघर्ष समाप्त करने के लिए एक </span>‘<span lang="hi" xml:lang="hi">मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">पर काम कर रहा है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">फिलहाल</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया की नजर इस संभावित समझौते पर है। अगर बातचीत सफल रहती है तो मिडिल ईस्ट में लंबे समय से चल रहे तनाव में कुछ राहत मिल सकती है। आने वाले दिनों में इस पर आधिकारिक घोषणा होने की संभावना है।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 24 May 2026 15:05:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>वॉशिंगटन फायरिंग पर PM मोदी की प्रतिक्रिया, ट्रंप सुरक्षित</title>
                                    <description><![CDATA[होटल हिल्टन गोलीबारी के बाद ट्रंप और अन्य नेताओं के सुरक्षित होने पर जताई राहत, हमलावर हिरासत में]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/pm-modis-reaction-on-washington-firing-trump-safe/article-52156"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/pm-modi-(12).jpg" alt=""></a><br />
<div class="text-base my-auto mx-auto pb-10 [--thread-content-margin:var(--thread-content-margin-xs,calc(var(--spacing)*4))] @w-sm/main:[--thread-content-margin:var(--thread-content-margin-sm,calc(var(--spacing)*6))] @w-lg/main:[--thread-content-margin:var(--thread-content-margin-lg,calc(var(--spacing)*16))] px-(--thread-content-margin)">
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<div class="markdown prose dark:prose-invert w-full wrap-break-word light markdown-new-styling">
<p>अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में एक होटल में हुई गोलीबारी की घटना पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस घटना की निंदा करते हुए स्पष्ट कहा कि लोकतंत्र में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। साथ ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, फर्स्ट लेडी और उपराष्ट्रपति के सुरक्षित होने की जानकारी को राहत भरी खबर बताया।</p>
<p>प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि इस तरह की घटनाएं लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हैं और इन्हें पूरी तरह खारिज किया जाना चाहिए। उन्होंने अमेरिकी नेतृत्व के सुरक्षित रहने की कामना भी की। यह बयान ऐसे समय आया है जब वॉशिंगटन में आयोजित एक प्रमुख कार्यक्रम के दौरान अचानक गोलीबारी की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।</p>
<p>घटना वॉशिंगटन के प्रतिष्ठित हिल्टन होटल में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हुई, जहां बड़ी संख्या में राजनेता, पत्रकार और अन्य गणमान्य लोग मौजूद थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, अचानक गोलियों की आवाज सुनाई दी, जिससे कार्यक्रम स्थल पर अफरा-तफरी मच गई। सुरक्षाबलों ने तुरंत कार्रवाई करते हुए स्थिति को नियंत्रण में लिया और लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला।</p>
<p>सूत्रों के मुताबिक, हमलावर ने कई राउंड फायरिंग की थी और उसके पास अत्याधुनिक हथियार था। सुरक्षा एजेंसियों ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उसे मौके पर ही हिरासत में ले लिया। पूछताछ जारी है और हमले के पीछे की मंशा की जांच की जा रही है।</p>
<p>घटना के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने भी प्रतिक्रिया देते हुए सुरक्षा एजेंसियों और सीक्रेट सर्विस की तत्परता की सराहना की। उन्होंने कहा कि समय रहते कार्रवाई होने से बड़ा नुकसान टल गया। साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि इस तरह के आयोजनों में सुरक्षा प्रोटोकॉल को और मजबूत करने की आवश्यकता है।</p>
<p>बताया जा रहा है कि गोलीबारी के दौरान एक सुरक्षाकर्मी घायल हुआ, हालांकि उसकी हालत स्थिर बताई जा रही है। घटना के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं, जिससे पूरे घटनाक्रम की गंभीरता सामने आई है।</p>
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                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 17:10:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
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                <title>ट्रम्प इनसाइडर ट्रेडिंग विवाद: ऐलान से पहले करोड़ों की कमाई पर सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[ट्रम्प इनसाइडर ट्रेडिंग विवाद में बड़े ऐलानों से पहले संदिग्ध ट्रेडिंग पैटर्न, निवेशकों के भरोसे पर असरबड़े फैसलों से पहले बाजार में असामान्य गतिविधि ने शक बढ़ाया है। विशेषज्ञों ने इसे संभावित इनसाइडर ट्रेडिंग से जोड़ा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/questions-on-earning-crores-of-rupees-before-trump-insider-trading/article-51703"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/business---2026-04-21t082432.568.jpg" alt=""></a><br /><p>अमेरिका में पूर्व राष्ट्रपति <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Donald Trump</span></span> के दूसरे कार्यकाल के दौरान ट्रम्प इनसाइडर ट्रेडिंग विवाद ने तूल पकड़ लिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कई ट्रेडर्स ने बड़े सरकारी ऐलानों से ठीक पहले करोड़ों डॉलर के दांव लगाए और भारी मुनाफा कमाया। मीडिया विश्लेषण में सामने आया है कि ट्रम्प के प्रमुख बयानों और घोषणाओं से कुछ मिनट या घंटों पहले ही बाजार में असामान्य तेजी या गिरावट दर्ज की गई। इस पैटर्न ने यह आशंका पैदा की है कि कहीं गोपनीय जानकारी पहले ही कुछ चुनिंदा लोगों तक तो नहीं पहुंच रही थी। मामले ने निवेशकों के भरोसे और बाजार की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।</p>
<p>रिपोर्ट्स के मुताबिक, अलग-अलग वित्तीय बाजारों के डेटा में यह देखा गया कि महत्वपूर्ण राजनीतिक या आर्थिक घोषणाओं से पहले अचानक बड़े पैमाने पर ट्रेडिंग शुरू हो जाती थी।फरवरी 2026 में ईरान पर अमेरिकी कार्रवाई से पहले कुछ नए अकाउंट्स ने भारी दांव लगाए और घोषणा के बाद करोड़ों का मुनाफा कमाया। इसी तरह जनवरी 2026 में वेनेजुएला से जुड़े घटनाक्रम में भी एक अकाउंट ने सटीक अनुमान लगाकर बड़ी कमाई की और तुरंत निष्क्रिय हो गया।</p>
<p>विश्लेषण में पाया गया कि कई बार मिनटों के भीतर बाजार में बड़े उतार-चढ़ाव से पहले ट्रेडिंग वॉल्यूम असामान्य रूप से बढ़ जाता था।<br />मार्च 2026 में तेल की कीमतों में गिरावट से पहले शॉर्ट सेलिंग के जरिए भारी दांव लगाए गए, जिससे कुछ निवेशकों को करोड़ों का फायदा हुआ।</p>
<p>इनसाइडर ट्रेडिंग वह स्थिति होती है जब किसी व्यक्ति को गोपनीय जानकारी पहले से मिल जाती है और वह उसी आधार पर बाजार में निवेश करता है। अमेरिका में यह 1933 से गैरकानूनी है और समय-समय पर नियमों को और सख्त किया गया है।</p>
<p>नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Paul Krugman</span></span> ने आरोप लगाया कि ट्रम्प के करीबी लोगों ने अंदरूनी जानकारी का फायदा उठाकर कमोडिटी बाजार में लाभ कमाया हो सकता है।हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि सभी मामलों को सीधे इनसाइडर ट्रेडिंग नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कुछ अनुभवी ट्रेडर्स राजनीतिक संकेतों को पहले से समझने में सक्षम होते हैं।</p>
<p>ट्रम्प इनसाइडर ट्रेडिंग विवाद ने वैश्विक निवेशकों के बीच चिंता बढ़ा दी है।अगर इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह वित्तीय बाजारों की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर असर डाल सकता है।</p>
<p>इस मामले में जांच की मांग तेज हो रही है और नियामक एजेंसियों की भूमिका अहम मानी जा रही है। ट्रम्प इनसाइडर ट्रेडिंग विवाद आने वाले समय में अमेरिकी बाजार और नीति पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 08:25:17 +0530</pubDate>
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                <title>अमेरिका में न्यूक्लियर और स्पेस रिसर्च से जुड़े वैज्ञानिकों की गुमशुदगी और मौतों पर बढ़ा रहस्य, व्हाइट हाउस ने जांच का दिया आश्वासन</title>
                                    <description><![CDATA[2023 से अब तक 10 से अधिक मामलों में वैज्ञानिक या तो लापता या संदिग्ध हालात में मृत मिले, हाई-सिक्योरिटी लैब्स से जुड़े मामलों ने बढ़ाई चिंता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/mystery-increases-over-the-disappearance-and-deaths-of-scientists-associated/article-51372"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/us-scientists.jpg" alt=""></a><br /><p>अमेरिका में न्यूक्लियर और स्पेस रिसर्च से जुड़े वैज्ञानिकों की रहस्यमय गुमशुदगी और मौतों के मामलों ने सरकार और सुरक्षा एजेंसियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। 2023 से अब तक ऐसे 10 से अधिक मामले सामने आए हैं, जिनमें वैज्ञानिक या तो अचानक लापता हो गए या फिर संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाए गए।</p>
<p>इस पूरे घटनाक्रम को लेकर पहली बार व्हाइट हाउस ने आधिकारिक प्रतिक्रिया दी है। प्रेस ब्रीफिंग के दौरान प्रेस सचिव ने कहा कि यदि ये तथ्य सही पाए जाते हैं, तो यह निश्चित रूप से गंभीर मामला है और इसकी जांच आवश्यक होगी। उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित एजेंसियों से जानकारी जुटाई जाएगी और जल्द ही स्थिति स्पष्ट की जाएगी।</p>
<h5><strong>हाई-सिक्योरिटी रिसर्च संस्थानों से जुड़े मामले</strong></h5>
<p>रिपोर्ट्स के अनुसार, ये सभी मामले अमेरिका की प्रमुख रिसर्च संस्थाओं से जुड़े हैं, जिनमें परमाणु अनुसंधान प्रयोगशालाएं, अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र और रक्षा से जुड़े वैज्ञानिक प्रोजेक्ट शामिल हैं। इन संस्थानों में काम करने वाले वैज्ञानिकों की भूमिका राष्ट्रीय सुरक्षा और अत्याधुनिक तकनीकी विकास से जुड़ी बताई जाती है।</p>
<p>कई मामलों में सामने आया है कि वैज्ञानिक अचानक अपने घरों से निकले और फिर वापस नहीं लौटे। कुछ मामलों में उन्होंने मोबाइल फोन, पहचान दस्तावेज और निजी सामान घर पर ही छोड़ दिया, जिससे जांच एजेंसियों की चिंता और बढ़ गई है।</p>
<h5><strong>गुमशुदगी और मौतों का पैटर्न</strong></h5>
<p>रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि कई वैज्ञानिकों की गुमशुदगी एक समान पैटर्न दिखाती है। कुछ लोग पैदल ही घर से निकले, कुछ मामलों में मानसिक असंतुलन की आशंका जताई गई, जबकि कुछ मौतें अब तक स्पष्ट कारणों से परे हैं।</p>
<p>एक पूर्व सैन्य अधिकारी के लापता होने का मामला भी इन घटनाओं में शामिल है, जिसने सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच गंभीर चर्चा को जन्म दिया है। इसके अलावा कई वैज्ञानिक परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष तकनीक और एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स से जुड़े हुए थे।</p>
<p>व्हाइट हाउस ने कहा है कि अभी तक सभी मामलों की पूरी जानकारी एकत्र नहीं की गई है, लेकिन यदि किसी प्रकार का पैटर्न या साजिश सामने आती है, तो व्यापक जांच की जाएगी। सुरक्षा एजेंसियों को भी इस विषय पर सक्रिय किया गया है।</p>
<p>हालांकि, अब तक किसी भी आधिकारिक जांच में इन घटनाओं के बीच प्रत्यक्ष संबंध साबित नहीं हुआ है। कुछ मामलों में मौत को प्राकृतिक या व्यक्तिगत कारणों से जुड़ा बताया गया है, जबकि कुछ मामलों में जांच जारी है।</p>
<p>इन घटनाओं के सामने आने के बाद वैज्ञानिक समुदाय और सुरक्षा विश्लेषकों के बीच चिंता बढ़ी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह जरूरी है कि सभी मामलों की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच हो, ताकि किसी भी तरह की गलतफहमी या अफवाहों को रोका जा सके।</p>
<p>फिलहाल अमेरिकी एजेंसियां सभी मामलों की समीक्षा कर रही हैं। आने वाले दिनों में सरकार की ओर से विस्तृत रिपोर्ट या आधिकारिक बयान जारी किए जाने की संभावना है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 16:26:51 +0530</pubDate>
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