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                <title>India Politics - दैनिक जागरण</title>
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                <title>बंगाल की सियासत में बड़ा उलटफेर, TMC के तीन पूर्व राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल</title>
                                    <description><![CDATA[राज्यसभा उपचुनाव से पहले भाजपा ने सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बराइक को बनाया उम्मीदवार, टीएमसी में बढ़ी राजनीतिक हलचल।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/big-upheaval-in-bengal-politics-three-former-tmc-rajya-sabha/article-58360"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/tmc-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के तीन पूर्व राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बराइक ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया है। भाजपा ने पार्टी में शामिल होते ही तीनों नेताओं को राज्यसभा की रिक्त सीटों पर होने वाले उपचुनाव के लिए अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस राजनीतिक बदलाव को पश्चिम बंगाल की बदलती सियासी तस्वीर और आगामी राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है। राज्यसभा उपचुनाव से ठीक पहले हुए इस घटनाक्रम ने बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। तीनों नेताओं ने कुछ सप्ताह पहले ही राज्यसभा सदस्यता और तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा दिया था। उस समय उन्होंने पार्टी नेतृत्व पर मनमाने तरीके से फैसले लेने और वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी करने के आरोप लगाए थे। अब भाजपा में शामिल होने के बाद उनके राजनीतिक भविष्य को नई दिशा मिलने की संभावना जताई जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">भाजपा ने इन तीनों नेताओं को जिस तेजी से राज्यसभा उपचुनाव का उम्मीदवार बनाया है, उससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि पार्टी बंगाल में अपने संगठन को और मजबूत करने के लिए अनुभवी नेताओं पर भरोसा जता रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल राज्यसभा चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों की रणनीति का भी हिस्सा हो सकता है। राज्यसभा की इन तीन रिक्त सीटों के लिए 24 जुलाई को मतदान और मतगणना होगी। निर्वाचन कार्यक्रम के अनुसार 14 जुलाई तक नामांकन दाखिल किए जाएंगे, जबकि 15 जुलाई को नामांकन पत्रों की जांच होगी। ऐसे में अगले कुछ दिनों तक बंगाल की राजनीति पूरी तरह इन उपचुनावों और दल-बदल की चर्चाओं के इर्द-गिर्द घूमती रहेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">भाजपा में शामिल होने के बाद सुखेंदु शेखर राय ने अपने इस्तीफे के पीछे की वजह भी सार्वजनिक रूप से बताई। उन्होंने कहा कि आरजी कर अस्पताल रेप और हत्या मामले में उन्होंने सबूतों से कथित छेड़छाड़ और प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए थे। इसके बाद उन्हें लगातार जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं। उन्होंने दावा किया कि उनके परिवार के सदस्यों के अपहरण की धमकी भी दी गई। सुखेंदु के अनुसार उन्होंने पुलिस आयुक्त और अस्पताल प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग की थी, लेकिन उनकी बात पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया। यहां तक कि खराब स्वास्थ्य के बावजूद उन्हें पुलिस मुख्यालय बुलाया गया, जिसके बाद उन्हें न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;">सुष्मिता देव ने भी भाजपा में शामिल होने के बाद अपने बयान से राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा और त्रिपुरा जैसे राज्यों में भाजपा की लगातार बढ़ती ताकत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जनता के विश्वास को दर्शाती है। उन्होंने असम में लगातार तीसरी बार भाजपा सरकार बनने को इसकी बड़ी मिसाल बताया। साथ ही उन्होंने टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा पर भी निशाना साधते हुए कहा कि अन्य राजनीतिक दल उन्हें अपने साथ नहीं लेना चाहते, इसलिए वे अब भी टीएमसी में हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने इन इस्तीफों और भाजपा में शामिल होने की घटना को ज्यादा महत्व देने से इनकार किया है। टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने कहा कि तीनों नेता पहले से ही भाजपा के संपर्क में थे। उनके अनुसार अब भाजपा ने केवल अपनी राजनीतिक जरूरत के कारण उन्हें उम्मीदवार बनाया है। उन्होंने दावा किया कि इससे तृणमूल कांग्रेस को कोई राजनीतिक नुकसान नहीं होगा और भाजपा को भी कोई बड़ा लाभ मिलने वाला नहीं है। सौगत रॉय का कहना है कि दल बदलने वाले नेताओं का राजनीतिक प्रभाव सीमित होता है और जनता ऐसे नेताओं को अधिक महत्व नहीं देती।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर लगातार असंतोष की खबरें सामने आती रही हैं। कई नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने पार्टी छोड़ दी या अलग गुट बना लिया। उपलब्ध राजनीतिक आंकड़ों के अनुसार लोकसभा में टीएमसी के सांसदों की संख्या में भी कमी आई है। राज्यसभा में भी कई सांसदों के इस्तीफे के बाद पार्टी की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रही।</p>
<p style="text-align:justify;">विधानसभा में भी पार्टी के सामने चुनौती बढ़ी है। चुनाव में बड़ी जीत हासिल करने के बावजूद कई विधायक अलग गुट का हिस्सा बन चुके हैं। इससे ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी के सामने संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने की चुनौती और बढ़ गई है। हालांकि पार्टी नेतृत्व लगातार दावा कर रहा है कि संगठन पूरी तरह मजबूत है और कुछ नेताओं के जाने से उसके जनाधार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। पश्चिम बंगाल में दल-बदल की राजनीति नई नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में इसकी रफ्तार काफी बढ़ी है। भाजपा और टीएमसी दोनों एक-दूसरे के नेताओं को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इससे राज्य की राजनीति लगातार अधिक प्रतिस्पर्धी होती जा रही है। राज्यसभा उपचुनाव के नतीजे भले ही सीमित सीटों तक हों, लेकिन उनका राजनीतिक संदेश आने वाले चुनावों के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाएगा। भाजपा बंगाल में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए ऐसे नेताओं को प्राथमिकता दे रही है जिनका प्रशासनिक अनुभव और राजनीतिक पहचान मजबूत हो। वहीं टीएमसी अपने संगठन को मजबूत रखने और असंतुष्ट नेताओं को रोकने की कोशिश में जुटी हुई है। आने वाले महीनों में दोनों दलों के बीच राजनीतिक संघर्ष और तेज होने की संभावना है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 10:41:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>TMC नेता जहांगीर खान की पत्नी गिरफ्तार, फालता थाने पर हमले का आरोप</title>
                                    <description><![CDATA[जहांगीर खान को छुड़ाने की कोशिश का आरोप, हिंसक प्रदर्शन मामले में पुलिस की कार्रवाई तेज]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/tmc-leader-jahangir-khans-wife-arrested-for-attack-on-falta/article-56486"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/sarina-bibi-arrested.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) नेता जहांगीर खान से जुड़े मामले में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए उनकी पत्नी सरीना बीबी को गिरफ्तार कर लिया है। शनिवार सुबह हुई इस गिरफ्तारी के बाद इलाके में एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। पुलिस का आरोप है कि सरीना बीबी ने फालता पुलिस स्टेशन के बाहर बड़ी संख्या में समर्थकों को इकट्ठा कर विरोध प्रदर्शन कराया था और इसी दौरान पुलिस तथा केंद्रीय सुरक्षा बलों पर हमला करने की कोशिश की गई। जांच एजेंसियों का दावा है कि प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और कानून व्यवस्था बिगाड़ने में उनकी भूमिका सामने आई है। गिरफ्तारी के बाद उन्हें डायमंड हार्बर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू की गई।</p>
<p style="text-align:justify;">पूरा मामला 16 जून को फालता थाने के बाहर हुए विरोध प्रदर्शन से जुड़ा हुआ है। पुलिस के अनुसार जहांगीर खान की गिरफ्तारी के बाद उनके समर्थक बड़ी संख्या में थाने के बाहर जमा हो गए थे। इसी दौरान प्रदर्शन उग्र हो गया और भीड़ ने सुरक्षाबलों पर पथराव शुरू कर दिया। पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों ने न केवल कानून व्यवस्था बाधित की बल्कि पुलिस हिरासत में मौजूद जहांगीर खान को छुड़ाने की भी कोशिश की। घटना के बाद पुलिस ने इलाके में लगे सीसीटीवी कैमरों और अन्य वीडियो फुटेज की जांच शुरू की थी। इन्हीं फुटेज के आधार पर कई लोगों की पहचान की गई और अब तक 27 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। जहांगीर खान का नाम पिछले कुछ महीनों से लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। वह दक्षिण 24 परगना जिले के फालता क्षेत्र में टीएमसी के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में उन्हें टीएमसी महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता है। विधानसभा चुनाव के दौरान भी उनका नाम कई बार चर्चा में आया था। उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान खुद को फिल्म ‘पुष्पा’ के किरदार की तरह पेश किया था और सार्वजनिक सभाओं में कई बार फिल्म का चर्चित संवाद दोहराया था। इसी वजह से वह स्थानीय स्तर पर काफी चर्चित हो गए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि चुनाव के बाद हालात तेजी से बदले। फालता विधानसभा सीट पर मतदान के दौरान गड़बड़ियों के आरोप सामने आए थे। चुनाव आयोग को मतदान रद्द कर दोबारा वोटिंग करानी पड़ी थी। दोबारा मतदान से ठीक पहले जहांगीर खान ने चुनावी मैदान छोड़ने का ऐलान कर दिया था। इसके बाद राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई थीं। चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा ने इस सीट पर बड़ी जीत दर्ज की और उसी समय से जहांगीर खान सार्वजनिक रूप से कम दिखाई देने लगे। इस बीच उनके खिलाफ कई गंभीर आरोप भी सामने आए। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार फालता थाने में उनके खिलाफ सात अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई थीं। इन मामलों में अवैध वसूली, धमकी देने, लोगों को डराने और महिलाओं को गैंगरेप की धमकी देने जैसे गंभीर आरोप शामिल थे। आरोप लगने के बाद वह लंबे समय तक पुलिस की पकड़ से दूर रहे। पुलिस का कहना है कि वह लगातार अपना ठिकाना बदल रहे थे और गिरफ्तारी से बचने की कोशिश कर रहे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">आखिरकार 8 जून को पश्चिम बंगाल पुलिस ने उन्हें नेपाल सीमा के पास से गिरफ्तार कर लिया। पुलिस के मुताबिक वह देश छोड़ने की कोशिश कर रहे थे। गिरफ्तारी के बाद उन्हें राज्य में लाया गया और पूछताछ शुरू की गई। इसके बाद पुलिस ने उन्हें फालता क्षेत्र में कई जगहों पर ले जाकर घटनास्थलों की पहचान कराई। इसी दौरान उनकी सार्वजनिक परेड भी कराई गई, जिसकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए। इन वीडियो में जहांगीर खान लोगों के सामने कान पकड़कर और हाथ जोड़कर माफी मांगते दिखाई दिए। एक वीडियो में वह हथकड़ी लगाए नजर आए, जबकि दूसरे वीडियो में उनकी कमर में रस्सी बंधी हुई थी। इन तस्वीरों को लेकर राजनीतिक बहस भी शुरू हो गई। विपक्षी दलों ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए, जबकि प्रशासन का कहना था कि यह जांच प्रक्रिया का हिस्सा है और कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई की गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">फालता थाने पर हुए हमले के बाद राज्य सरकार ने भी सख्त रुख अपनाया। मुख्यमंत्री ने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिए कि हिंसा में शामिल किसी भी व्यक्ति को बख्शा न जाए। इसके बाद पुलिस ने वीडियो फुटेज के आधार पर आरोपियों की पहचान का अभियान शुरू किया। पुलिस का दावा है कि आने वाले दिनों में और भी गिरफ्तारियां हो सकती हैं क्योंकि जांच अभी जारी है। हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल में कई टीएमसी नेताओं के खिलाफ जनता का विरोध खुलकर सामने आया है। कहीं नेताओं का घेराव किया गया तो कहीं उन पर भ्रष्टाचार और अवैध वसूली के आरोप लगे। ऐसे माहौल में जहांगीर खान और उनकी पत्नी से जुड़ा यह मामला राज्य की राजनीति में नया मोड़ लेकर आया है। सरीना बीबी की गिरफ्तारी के बाद पुलिस पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि फालता थाने पर हुए हमले और हिंसा में शामिल सभी लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 14:55:41 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>सीएम हाउस हाई लेवल बैठक पर साय का बयान, अटकलों पर जवाब</title>
                                    <description><![CDATA[रात 10 बजे से डेढ़ बजे तक चली बैठक, मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चा पर सीएम साय ने दी सफाई]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/6a36398f862d5/article-56466"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/cm-sai-statement.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ में सीएम हाउस रायपुर में हुई सीएम हाउस हाई लेवल बैठक एक बार फिर सियासी हलकों में चर्चा का बड़ा मुद्दा बन गई है। गुरुवार देर रात मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने वरिष्ठ मंत्रियों और संगठन के शीर्ष नेताओं के साथ लंबी बैठक की, जो रात करीब 10 बजे शुरू होकर 1:40 बजे तक चली। इस बैठक के बाद जहां राजनीतिक अटकलों का दौर तेज हो गया, वहीं मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि यह कोई आपात बैठक नहीं थी और न ही इसे किसी तात्कालिक संकट के तौर पर देखा जाना चाहिए। मुख्यमंत्री साय ने मीडिया से बातचीत में कहा कि सरकार लगातार अपने कामकाज की समीक्षा कर रही है और यह बैठक भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा थी। उन्होंने बताया कि केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के 12 साल पूरे होने पर चल रहे कार्यक्रमों की समीक्षा की गई है। “12 साल विश्वास के, विकास के और 12 साल बेमिसाल” जैसे अभियानों के तहत सभी मंत्रियों और विधायकों को जिम्मेदारियां दी गई हैं, जिनकी प्रगति पर चर्चा हुई है। इसी क्रम में विभागीय कामकाज का फीडबैक भी लिया गया। सीएम ने यह भी स्पष्ट किया कि बैठक को लेकर जो भी अटकलें लगाई जा रही हैं, उनका कोई ठोस आधार नहीं है और यह पूरी तरह सामान्य समीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा था।</p>
<p style="text-align:justify;">रात करीब साढ़े पांच घंटे चली इस सीएम हाउस हाई लेवल बैठक में उपमुख्यमंत्री, वरिष्ठ मंत्री और संगठन के कई बड़े नेता मौजूद रहे। सूत्रों के मुताबिक, बैठक में सरकार के अब तक के ढाई साल के कार्यकाल की समीक्षा की गई और आने वाले समय की रणनीति पर भी चर्चा हुई। विभागों के प्रदर्शन, योजनाओं की प्रगति और जमीनी स्तर पर कामकाज की स्थिति पर मंत्रियों से सीधा फीडबैक लिया गया। इस दौरान कई अहम योजनाओं की गति और क्रियान्वयन को लेकर भी सवाल उठे और सुधार की जरूरत पर जोर दिया गया। इधर बैठक के समय और देर रात तक चलने को लेकर राजनीतिक गलियारों में मंत्रिमंडल फेरबदल की अटकलें तेज हो गई थीं। कई स्तरों पर यह चर्चा रही कि सरकार अपने मंत्रिमंडल में बदलाव या विस्तार को लेकर कोई बड़ा फैसला ले सकती है, हालांकि मुख्यमंत्री के बयान के बाद फिलहाल इन अटकलों पर विराम लगाने की कोशिश की गई है। बैठक में मौजूद नेताओं ने भी इसे नियमित समीक्षा बैठक बताया, लेकिन अंदरखाने चर्चाएं अभी भी शांत नहीं हुई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सीएम साय ने यह भी जानकारी दी कि महाराष्ट्र के कुछ विधायकों का एक दल छत्तीसगढ़ दौरे पर आया था और उन्होंने सीएम हाउस में मुलाकात की। यह दल यहां धान खरीदी की प्रक्रिया और राज्य की कृषि व्यवस्था को समझने के लिए आया था। मुख्यमंत्री ने कहा कि दूसरे राज्यों के प्रतिनिधियों का इस तरह अध्ययन के लिए आना सकारात्मक संकेत है और इससे छत्तीसगढ़ की नीतियों की पहचान बढ़ती है। इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने यूसीसी यानी समान नागरिक संहिता को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि प्रदेश में यूसीसी लागू करने की दिशा में काम चल रहा है और इसके लिए कमेटी का गठन किया गया है, लेकिन इसे इस मानसून सत्र में लाना संभव नहीं होगा। उन्होंने संकेत दिया कि यह एक लंबी प्रक्रिया है और सभी पहलुओं पर विचार के बाद ही आगे कदम उठाया जाएगा। रायपुर स्थित सीएम हाउस में हुई यह देर रात की बैठक भले ही सरकार की नियमित समीक्षा प्रक्रिया बताई जा रही हो, लेकिन इसके राजनीतिक मायने लगातार निकाले जा रहे हैं। खासकर जिस तरह से वरिष्ठ मंत्रियों और संगठन के नेताओं की मौजूदगी रही और देर रात तक मंथन चला, उसने सियासी हलचल को और बढ़ा दिया है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 13:47:36 +0530</pubDate>
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                <title>ममता के साथ खड़ी हुईं महुआ, बोलीं- वही असली तृणमूल</title>
                                    <description><![CDATA[पार्टी की वैधता, पहचान और जनाधार ममता बनर्जी से जुड़ा; अभिषेक बनर्जी का भी किया बचाव, बीजेपी पर साधा निशाना]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/mahua-stood-with-mamata-and-said-she-is-the/article-55667"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mahua-moitra.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी उथल-पुथल और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर बढ़ती अंदरूनी खींचतान के बीच कृष्णानगर से सांसद महुआ मोइत्रा ने पार्टी नेतृत्व के पक्ष में खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने साफ कहा कि तृणमूल कांग्रेस की असली पहचान, वैधता और राजनीतिक ताकत उसकी संस्थापक ममता बनर्जी से जुड़ी हुई है और कोई भी बागी या अलग गुट खुद को “असली तृणमूल” नहीं कह सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">एक साक्षात्कार के दौरान महुआ मोइत्रा ने पार्टी में चल रहे असंतोष और कुछ नेताओं द्वारा अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिशों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जब तक ममता बनर्जी सक्रिय राजनीति में हैं, तब तक तृणमूल कांग्रेस की असली पहचान उन्हीं के साथ रहेगी। उन्होंने कहा कि पार्टी की स्थापना ममता बनर्जी ने की थी और जनता का जनादेश भी उसी नेतृत्व को मिला है। ऐसे में किसी भी बागी गुट का दावा राजनीतिक रूप से स्वीकार्य नहीं माना जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">महुआ मोइत्रा का यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम बंगाल में बदलते राजनीतिक समीकरणों के कारण तृणमूल कांग्रेस लगातार चुनौतियों का सामना कर रही है। हाल के दिनों में पार्टी के कुछ सांसदों और नेताओं के इस्तीफों ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। विपक्षी दल इन घटनाओं को तृणमूल के कमजोर पड़ते जनाधार से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि पार्टी नेतृत्व इसे अस्थायी राजनीतिक परिस्थितियों का हिस्सा बता रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">महुआ ने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल की पहचान दो प्रमुख आधारों पर टिकी होती है—उसके संस्थापक नेता और चुनाव चिह्न। उनके अनुसार, बागी नेताओं के पास न तो पार्टी का मूल नेतृत्व है और न ही आधिकारिक चुनाव चिह्न, इसलिए वे तृणमूल कांग्रेस की वास्तविक विरासत का दावा नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि पार्टी का आकार छोटा या बड़ा होना अलग बात है, लेकिन इससे उसकी वैधता समाप्त नहीं होती।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने उन दावों को भी खारिज किया जिनमें कुछ नेताओं द्वारा अलग संसदीय समूह बनाने या बड़ी संख्या में सांसदों के समर्थन का दावा किया जा रहा है। महुआ ने संकेत दिया कि ऐसी गतिविधियां राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश हो सकती हैं, लेकिन इससे पार्टी की मूल पहचान प्रभावित नहीं होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">साक्षात्कार के दौरान महुआ मोइत्रा ने तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी का भी बचाव किया। हाल के समय में पार्टी की चुनौतियों और चुनावी झटकों के लिए अभिषेक बनर्जी को जिम्मेदार ठहराने वाली आलोचनाओं पर उन्होंने कहा कि यह एकतरफा दृष्टिकोण है। उनके मुताबिक अभिषेक ने संगठन को मजबूत करने के लिए कई संरचनात्मक बदलाव किए हैं और पार्टी के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।</p>
<p style="text-align:justify;">महुआ ने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल में कठिन समय आने पर नेतृत्व को निशाना बनाना आसान होता है, लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक जटिल होती है। उन्होंने दावा किया कि अभिषेक बनर्जी ने संगठनात्मक स्तर पर जो ढांचा तैयार किया है, उसने पार्टी को मजबूत बनाने में योगदान दिया है। इसलिए उन्हें केवल नकारात्मक दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस दौरान उन्होंने पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती सक्रियता पर भी टिप्पणी की। महुआ ने आरोप लगाया कि राज्य की राजनीति में कुछ नेताओं का मुख्य उद्देश्य अभिषेक बनर्जी को राजनीतिक रूप से कमजोर करना है। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ चल रहे राजनीतिक अभियानों के पीछे व्यक्तिगत और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी काम कर रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> उन्होंने स्पष्ट किया कि विचारधारात्मक स्तर पर वह बीजेपी को अपना प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानती हैं और भविष्य में भी उनकी राजनीति का केंद्र यही रहेगा। उनके अनुसार देश में लोकतांत्रिक मूल्यों और बहुलतावादी सोच की रक्षा के लिए मजबूत विपक्ष की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">महुआ ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस में चाहे जितनी भी चुनौतियां हों, फिर भी यह बीजेपी के खिलाफ संघर्ष का सबसे मजबूत मंच है। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीति में बने रहने का उनका उद्देश्य केवल सत्ता नहीं बल्कि वैचारिक संघर्ष है। इसलिए वे पार्टी छोड़ने या राजनीतिक जीवन से दूर होने की किसी संभावना को नहीं देखतीं।</p>
<p style="text-align:justify;">पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीतिक वापसी को लेकर भी महुआ ने विश्वास जताया। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी एक बार फिर मजबूती हासिल कर सकती है और बंगाल की राजनीति में अपना प्रभाव कायम रख सकती है। उनके मुताबिक पार्टी के कार्यकर्ता और समर्थक अब भी ममता बनर्जी के नेतृत्व पर भरोसा रखते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">महुआ मोइत्रा का यह बयान केवल व्यक्तिगत निष्ठा का प्रदर्शन नहीं बल्कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर एक स्पष्ट संदेश भी है। ऐसे समय में जब पार्टी को अंदरूनी असंतोष और बाहरी राजनीतिक दबाव दोनों का सामना करना पड़ रहा है, वरिष्ठ नेताओं की सार्वजनिक एकजुटता संगठन के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। महुआ मोइत्रा के बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर एक बड़ा वर्ग अब भी ममता बनर्जी के नेतृत्व को ही पार्टी की असली पहचान और भविष्य का आधार मानता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 17:52:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मीनाक्षी नटराजन के नामांकन पर फैसला बाकी, कांग्रेस का उपवास जारी</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली में कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने निर्वाचन आयोग से मुलाकात की, भोपाल में कार्यकर्ताओं ने मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया। आयोग की औपचारिक प्रतिक्रिया का इंतजार जारी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/congress-fast-continues-pending-decision-on-meenakshi-natarajans-nomination/article-55549"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/meenakshi-natarajan-(1).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव को लेकर चल रहा घटनाक्रम बुधवार को भी चर्चा का केंद्र बना रहा। कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र रद्द होने के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली में निर्वाचन आयोग पहुंचा और पूरे मामले में अपना पक्ष रखा। आयोग के साथ हुई बैठक के बाद कांग्रेस नेताओं ने कहा कि उन्होंने नामांकन निरस्त किए जाने के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है। हालांकि देर शाम तक निर्वाचन आयोग की ओर से कोई अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं किया गया था। ऐसे में राजनीतिक हलकों में पूरे दिन इस मुद्दे को लेकर चर्चाएं जारी रहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">दिल्ली में आयोग से मुलाकात करने वाले प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता शामिल थे। बैठक के बाद नेताओं ने मीडिया से बातचीत में कहा कि नामांकन रद्द किए जाने के पीछे जिन तथ्यों का उल्लेख किया गया है, उन पर आयोग से विस्तृत चर्चा की गई है। पार्टी का कहना है कि कानूनी प्रक्रिया और चुनावी नियमों की व्याख्या को लेकर उनका अलग दृष्टिकोण है, जिसे आयोग के सामने रखा गया है। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग पूरे मामले से जुड़े दस्तावेजों और नियमों का अध्ययन कर रहा है। आयोग की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बीच भोपाल में भी राजनीतिक गतिविधियां तेज रहीं। कांग्रेस कार्यकर्ता मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय पहुंचे और शांतिपूर्ण तरीके से अपना विरोध दर्ज कराया। कई कार्यकर्ताओं ने सामूहिक उपवास भी रखा। प्रदेश कांग्रेस नेताओं का कहना है कि वे लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत अपनी बात रख रहे हैं और आयोग के निर्णय का सम्मान करेंगे। प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन और पुलिस की टीम भी मौके पर मौजूद रही। पूरे घटनाक्रम पर राजनीतिक दलों और आम लोगों की नजर बनी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">नामांकन रद्द होने का मामला हलफनामे में दी गई जानकारी से जुड़ा हुआ है। जांच के दौरान चुनाव अधिकारियों ने कुछ तथ्यों को लेकर आपत्ति दर्ज की थी, जिसके बाद रिटर्निंग ऑफिसर ने नामांकन को अमान्य घोषित कर दिया। चुनाव प्रक्रिया में रिटर्निंग ऑफिसर की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है और उनके निर्णय चुनावी नियमों के आधार पर लिए जाते हैं। यही कारण है कि मामला अब निर्वाचन आयोग के समक्ष पहुंचा है, जहां सभी पक्षों के तर्कों और उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण किया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस नेताओं का कहना है कि संबंधित कानूनी मामले की स्थिति को लेकर उनकी अलग व्याख्या है। उनका तर्क है कि जिस मामले का जिक्र किया जा रहा है, वह अभी प्रारंभिक स्तर पर था और उसे लेकर आवश्यक कानूनी प्रक्रियाएं पूरी नहीं हुई थीं। इसी आधार पर पार्टी ने आयोग से फैसले की समीक्षा करने का अनुरोध किया है। वहीं  ऐसे मामलों में आयोग सभी दस्तावेजों और नियमों का गहराई से अध्ययन करने के बाद ही कोई निष्कर्ष निकालता है। राज्यसभा चुनावों में नामांकन पत्रों की जांच एक बेहद महत्वपूर्ण चरण होता है। कई बार तकनीकी या कानूनी पहलुओं को लेकर विवाद उत्पन्न हो जाते हैं और ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय संबंधित चुनावी प्राधिकरणों द्वारा ही लिया जाता है। वर्तमान मामले में भी सभी पक्ष आयोग के निर्णय का इंतजार कर रहे हैं। फिलहाल किसी भी तरह की अटकलों से बचते हुए सभी की नजर चुनाव आयोग की अगली घोषणा पर टिकी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">उधर राज्यसभा चुनाव से जुड़े अन्य राज्यों के घटनाक्रम भी चर्चा में हैं। झारखंड में एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी के नामांकन को वैध माना गया है। वहां भी जांच प्रक्रिया के दौरान कुछ तकनीकी सवाल उठे थे, लेकिन बाद में संबंधित अधिकारियों ने उपलब्ध दस्तावेजों की समीक्षा के बाद नामांकन को स्वीकार कर लिया। इससे यह स्पष्ट होता है कि चुनावी प्रक्रिया में प्रत्येक दस्तावेज और कानूनी बिंदु की सावधानीपूर्वक जांच की जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश में भी राजनीतिक दल अब आयोग के अंतिम निर्णय का इंतजार कर रहे हैं। राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सक्रियता बढ़ गई है और सभी दल अपने-अपने स्तर पर तैयारियों में जुटे हुए हैं। निर्वाचन आयोग के सामने प्रस्तुत तथ्यों और नियमों के आधार पर जो भी निर्णय आएगा, वह आगे की प्रक्रिया को तय करेगा। फिलहाल पूरे मामले में कानूनी और संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन किया जा रहा है और सभी पक्ष आयोग के निष्पक्ष निर्णय की अपेक्षा कर रहे हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। ऐसे मामलों में आयोग का निर्णय केवल एक उम्मीदवार या एक दल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भविष्य में समान परिस्थितियों के लिए भी एक संदर्भ बनता है।  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 17:29:07 +0530</pubDate>
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                <title>मोदी बने सबसे लंबे निर्वाचित पीएम, नेहरू का रिकॉर्ड टूटा</title>
                                    <description><![CDATA[कन्या, मकर और कुंभ राशि वालों के लिए दिन खास, करियर में नई संभावनाएं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/modi-becomes-longest-elected-pm-nehrus-record-broken/article-55464"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/narendra-modi.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">नई दिल्ली, 10 जून। राजधानी दिल्ली में आज का राजनीतिक माहौल सुबह से ही काफी गर्म है और हर तरफ एक ही चर्चा चल रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब देश के सबसे लंबे समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है। 26 मई 2014 को पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से उनका कार्यकाल अब 4399 दिनों तक पहुंच चुका है और इसी के साथ उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 4398 दिनों के निर्वाचित कार्यकाल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं माना जा रहा, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लंबे राजनीतिक सफर में एक बड़ा मोड़ बताया जा रहा है। सुबह से ही सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस बात की चर्चा तेज है कि यह उपलब्धि देश की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत है, हालांकि इस पर अलग-अलग राजनीतिक मत भी सामने आ रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">दिल्ली में आज दोपहर होने वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की अहम बैठक को लेकर भी हलचल तेज है। भारत मंडपम में होने वाली इस बैठक में केंद्र सरकार के सहयोगी दलों के साथ-साथ विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता शामिल हो रहे हैं। जहां आने वाले समय की नीतियों और विकास योजनाओं पर विस्तृत चर्चा होगी। बैठक में प्रधानमंत्री के इस नए रिकॉर्ड को लेकर एक औपचारिक प्रस्ताव के जरिए बधाई भी दी जाएगी। इसके साथ ही ‘विकसित भारत 2047’ के विजन डॉक्यूमेंट पर विस्तार से चर्चा होगी और केंद्र तथा राज्यों के बीच बेहतर समन्वय को लेकर भी कई सुझाव रखे जाएंगे। सुबह से ही भारत मंडपम के आसपास सुरक्षा व्यवस्था भी बढ़ा दी गई है और मीडिया की मौजूदगी लगातार बनी हुई है।</p>
<p class="isSelectedEnd">अगर पिछले बारह वर्षों के राजनीतिक घटनाक्रम को देखा जाए तो प्रधानमंत्री मोदी का कार्यकाल कई बड़े और ऐतिहासिक फैसलों के लिए जाना जाता है। डिजिटल सेवाओं का विस्तार, जीएसटी जैसी एकीकृत कर प्रणाली का लागू होना, नोटबंदी का फैसला, सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक जैसी सैन्य कार्रवाइयां, तीन तलाक कानून, अनुच्छेद 370 में बदलाव और कोरोना महामारी के दौरान बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान जैसे कदम देश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था पर गहरा असर डालते हैं। इन सभी फैसलों के बीच सरकार को कई बार आलोचनाओं और विरोध का भी सामना करना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद लगातार तीन आम चुनावों में सत्ता में वापसी ने राजनीतिक स्थिरता की एक अलग तस्वीर भी पेश की है। 2014, 2019 और 2024 के चुनावों में जनता के जनादेश ने इस नेतृत्व को लगातार मजबूत आधार दिया और इसी वजह से यह रिकॉर्ड और अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह उपलब्धि सिर्फ एक व्यक्तिगत रिकॉर्ड नहीं है बल्कि भारतीय लोकतंत्र में नेतृत्व की निरंतरता और जनसमर्थन की प्रवृत्ति को भी दर्शाती है। हालांकि इस पर विपक्ष का नजरिया अलग है और वह इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं और बहस के संदर्भ में देखता है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति किस दिशा में जाएगी। क्या यह नेतृत्व इसी तरह आगे भी मजबूत बना रहेगा या फिर राजनीतिक परिदृश्य में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। भाजपा के भीतर भी नए नेताओं के उभरने और राज्यों में नए चेहरों के सामने आने को लेकर चर्चाएं तेज हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अभी भी किसी एक स्पष्ट विकल्प की तस्वीर सामने नहीं आई है। ऐसे में आने वाले समय में नेतृत्व और संगठन दोनों की परीक्षा मानी जा रही है।</p>
<p>इसी बीच दिल्ली की सियासत में यह भी चर्चा है कि 2029 के आम चुनाव तक राजनीतिक समीकरण किस तरह बदल सकते हैं। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती नीतियों के क्रियान्वयन के साथ-साथ जनता के भरोसे को बनाए रखने की होगी। वहीं विपक्ष भी अपनी रणनीति को मजबूत करने में जुटा है। मौजूदा स्थिति को देखते हुए कहा जा सकता है कि भारतीय राजनीति एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है जहां नेतृत्व, नीतियां और जनभावनाएं सभी मिलकर भविष्य की दिशा तय करेंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 12:02:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>INDIA ब्लॉक की बैठक में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग, SIR पर CJI को पत्र लिखेगा गठबंधन</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली में दो साल बाद हुई विपक्षी गठबंधन की बैठक में पांच प्रमुख मुद्दों पर बनी सहमति, NEET-CBSE विवाद, चुनावी पारदर्शिता और महंगाई पर सरकार को घेरने की रणनीति]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/alliance-will-write-letter-to-cji-demanding-resignation-of-education/article-55315"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/india-bloc-meeting-(2).jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली में सोमवार को विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें देश के विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया। करीब दो साल बाद हुई इस बैठक को विपक्षी राजनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है। बैठक में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट), नेशनल कॉन्फ्रेंस समेत कई दलों के नेता शामिल हुए। कुछ नेता ऑनलाइन माध्यम से जुड़े, जबकि कई वरिष्ठ नेताओं ने बैठक में प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया। लगभग दो घंटे से अधिक समय तक चली चर्चा में कई राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया और आगामी राजनीतिक रणनीति को लेकर सहमति बनाने की कोशिश की गई।</p>
<p>बैठक के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि गठबंधन के नेताओं ने पांच प्रमुख मुद्दों पर एकमत होकर निर्णय लिया है। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे NEET और CBSE से जुड़े विवादों का जिक्र करते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा। खड़गे ने कहा कि इन मामलों में सामने आई गड़बड़ियों ने लाखों छात्रों और उनके परिवारों को प्रभावित किया है। उनका आरोप था कि शिक्षा व्यवस्था में लगातार सामने आ रही समस्याओं की जवाबदेही तय होनी चाहिए। इसी संदर्भ में उन्होंने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग भी उठाई और कहा कि युवाओं के भविष्य से जुड़े मामलों में गंभीरता और पारदर्शिता आवश्यक है।</p>
<p>बैठक में चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई। विपक्षी नेताओं ने SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर चिंता व्यक्त की। खड़गे ने कहा कि विपक्ष इस विषय को गंभीरता से उठा रहा है और चुनावी पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए देश के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने का निर्णय लिया गया है। उनका कहना था कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा होना बेहद जरूरी है और इस विषय पर गठबंधन एकजुट होकर आगे बढ़ेगा।</p>
<p>बैठक के दौरान महंगाई, बेरोजगारी और अर्थव्यवस्था की स्थिति भी चर्चा के केंद्र में रही। विपक्षी नेताओं का मानना है कि ये ऐसे मुद्दे हैं जिनका सीधा असर आम लोगों के जीवन पर पड़ रहा है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में खड़गे ने कहा कि गठबंधन ने फैसला किया है कि इन विषयों पर नियमित रूप से चर्चा और रणनीति बनाई जाएगी। उन्होंने बताया कि हर दो महीने में इस तरह की बैठक आयोजित की जाएगी ताकि राष्ट्रीय मुद्दों पर संयुक्त रुख तैयार किया जा सके और सरकार को जवाबदेह बनाया जा सके।</p>
<p>बैठक में शामिल नेताओं ने आगामी संसद सत्र को लेकर भी विचार-विमर्श किया। सूत्रों के अनुसार विपक्ष संसद के भीतर और बाहर कई मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी कर रहा है। नेताओं का मानना है कि संसद लोकतांत्रिक संवाद का सबसे बड़ा मंच है और जनता से जुड़े सवालों को मजबूती से उठाया जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से मानसून सत्र के दौरान भी विपक्षी दलों के बीच समन्वय बनाए रखने पर सहमति बनी है।</p>
<p>राजनीतिक गतिविधियों के बीच दिल्ली में सोमवार को एक और घटनाक्रम चर्चा में रहा। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पार्टी के खिलाफ लगाए गए कुछ पोस्टरों को लेकर विवाद सामने आया। राजधानी के अकबर रोड क्षेत्र में लगे इन पोस्टरों में कांग्रेस और राहुल गांधी को लेकर टिप्पणियां की गई थीं। बाद में यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता मौके पर पहुंचे और पोस्टरों को हटा दिया। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना रहा। हालांकि पोस्टर लगाने वालों की पहचान स्पष्ट नहीं हो सकी।</p>
<p>बैठक के दौरान विपक्षी दलों के बीच एकता बनाए रखने के मुद्दे पर भी जोर दिया गया। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) के प्रमुख शरद पवार ने कहा कि मौजूदा समय में गठबंधन की मजबूती सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने माना कि विभिन्न दलों के बीच समय-समय पर मतभेद सामने आते हैं, लेकिन संवाद के माध्यम से उनका समाधान निकाला जा सकता है। पवार ने कहा कि गठबंधन में शामिल वरिष्ठ नेताओं के साथ चर्चा कर सभी मुद्दों का रास्ता निकाला जाएगा। उनका मानना है कि आने वाले वर्षों में विपक्षी दलों के लिए एकजुट रहना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होगा।</p>
<p>इस बैठक का एक बड़ा उद्देश्य विपक्षी दलों के बीच समन्वय को मजबूत करना भी था। पिछले कुछ वर्षों में गठबंधन से कुछ दलों की दूरी बढ़ी है, जिससे विपक्षी एकता पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में दिल्ली में आयोजित यह बैठक विपक्षी दलों के लिए शक्ति प्रदर्शन और संगठनात्मक मजबूती का अवसर भी मानी जा रही है। नेताओं ने सार्वजनिक रूप से यह संदेश देने की कोशिश की कि राष्ट्रीय मुद्दों पर विपक्ष एक साथ खड़ा है और आने वाले समय में भी साझा रणनीति के साथ आगे बढ़ेगा।</p>
<p>बैठक में यह भी तय किया गया कि अगली बैठक 8 अगस्त को हैदराबाद में आयोजित होगी। इस दौरान विभिन्न राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियों, आगामी चुनावी रणनीतियों और राष्ट्रीय मुद्दों पर फिर से चर्चा की जाएगी। नियमित संवाद से गठबंधन की एकजुटता मजबूत होगी और जनता के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया जा सकेगा।</p>
<p>दो साल बाद हुई इस बैठक ने यह संकेत दिया है कि विपक्ष आगामी राजनीतिक चुनौतियों के लिए खुद को तैयार करने में जुट गया है। NEET और CBSE विवाद से लेकर चुनावी पारदर्शिता, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर विपक्ष ने संयुक्त रुख अपनाने की कोशिश की है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 18:06:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जनता के हक के लिए जेल भी जाना पड़े तो पीछे मत हटना: संजय सिंह</title>
                                    <description><![CDATA[रायपुर कार्यकर्ता सम्मेलन में आप सांसद का केंद्र और राज्य सरकार पर हमला, कार्यकर्ताओं से संगठन मजबूत करने और जनता के मुद्दों पर संघर्ष का आह्वान]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/raipur/even-if-you-have-to-go-to-jail-for-public/article-55290"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/sanjay-singh.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">राजधानी रायपुर में आयोजित आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलन में रविवार को पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कार्यकर्ताओं को संघर्ष और संगठन का संदेश दिया। शहीद स्मारक भवन में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि राजनीति का असली उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं को उठाना और उनके अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करना होना चाहिए। उन्होंने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि यदि जनता के हितों की लड़ाई लड़ते हुए जेल भी जाना पड़े तो उससे घबराना नहीं चाहिए। उनके इस बयान पर सम्मेलन में मौजूद कार्यकर्ताओं ने जोरदार समर्थन जताया और पूरे सभागार में नारेबाजी का माहौल बन गया।</p>
<p style="text-align:justify;">सम्मेलन में संजय सिंह ने केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार दोनों पर तीखे राजनीतिक हमले किए। उन्होंने कहा कि प्रदेश में विकास के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखाई देती है। उनका आरोप था कि आम लोग महंगाई, बेरोजगारी और स्वास्थ्य सेवाओं की समस्याओं से जूझ रहे हैं, जबकि सरकारें अपनी उपलब्धियों का प्रचार करने में व्यस्त हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों और खनिज संपदा का लाभ आम जनता तक नहीं पहुंच रहा है। इसके बजाय संसाधनों का उपयोग कुछ चुनिंदा लोगों के हित में किया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">संजय सिंह ने अपने संबोधन के दौरान भाजपा और कांग्रेस दोनों को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि वर्षों से प्रदेश की राजनीति इन दोनों दलों के बीच घूमती रही है, लेकिन जनता की मूल समस्याएं आज भी जस की तस बनी हुई हैं। किसानों की स्थिति को लेकर उन्होंने चिंता जताई और कहा कि कृषि आधारित राज्य होने के बावजूद किसान आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि युवाओं को रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे हैं और बड़ी संख्या में पढ़े-लिखे युवक नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में कई स्कूल बंद कर दिए गए हैं, जिससे गरीब और ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है। उनका कहना था कि शिक्षा किसी भी समाज के विकास का आधार होती है और यदि स्कूलों की संख्या घटेगी तो इसका सीधा असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए, लेकिन वर्तमान स्थिति इससे अलग दिखाई देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अपने भाषण में उन्होंने दिल्ली सरकार के कार्यों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पिछले दस वर्षों में दिल्ली में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढांचे में सुधार किया गया और स्वास्थ्य सेवाओं को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए कई योजनाएं शुरू की गईं। उन्होंने दावा किया कि इन प्रयासों की चर्चा देशभर में होती है और यही मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है। इस दौरान उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि वे लोगों तक पार्टी की नीतियों और योजनाओं की जानकारी पहुंचाएं।</p>
<p style="text-align:justify;">सम्मेलन में संगठन विस्तार को लेकर भी विशेष जोर दिया गया। संजय सिंह ने कार्यकर्ताओं से कहा कि आने वाले समय में पार्टी को गांव-गांव और बूथ स्तर तक मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत उसका संगठन होता है और मजबूत संगठन के बिना जनता तक पहुंचना संभव नहीं है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से लगातार जनसंपर्क करने, लोगों की समस्याएं सुनने और स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की अपील की।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने दावा किया कि प्रदेश की जनता अब पारंपरिक राजनीतिक विकल्पों से निराश होती जा रही है और एक नए विकल्प की तलाश कर रही है। उनके अनुसार आम आदमी पार्टी इस भूमिका को निभाने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि आने वाले चुनावों में पार्टी संगठन और जनाधार दोनों को मजबूत करने पर ध्यान देगी। उनका मानना है कि यदि कार्यकर्ता ईमानदारी से लोगों के बीच काम करेंगे तो पार्टी को प्रदेश में बेहतर राजनीतिक अवसर मिल सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कार्यकर्ता सम्मेलन के बाद संजय सिंह माना-तूता क्षेत्र स्थित उस धरना स्थल पर भी पहुंचे, जहां लंबे समय से डीएड अभ्यर्थी अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। वहां उन्होंने अभ्यर्थियों से मुलाकात की और उनकी समस्याओं को विस्तार से सुना। अभ्यर्थियों ने उन्हें अपनी मांगों और लंबे समय से चल रहे आंदोलन की जानकारी दी। संजय सिंह ने कहा कि कठिन मौसम और परिस्थितियों के बावजूद आंदोलन कर रहे युवाओं की बात सरकार को गंभीरता से सुननी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने आंदोलनरत अभ्यर्थियों को सुझाव दिया कि वे अपनी ओर से एक प्रतिनिधिमंडल तैयार करें और सरकार के साथ बातचीत का प्रयास करें। साथ ही उन्होंने यह भरोसा भी दिलाया कि आवश्यकता पड़ने पर वह इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का प्रयास करेंगे। उनके इस आश्वासन के बाद आंदोलनकारियों में कुछ उम्मीद दिखाई दी। कार्यक्रम में पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और पदाधिकारी भी मौजूद रहे। प्रदेश प्रभारी मुकेश अहलावत, सह-प्रभारी सौरभ झा, समर कुमार, कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष उत्तम जायसवाल, अभिषेक मिश्रा, देवलाल नरेटी, प्रदेश महासचिव वदूद आलम और प्रमुख प्रवक्ता सूरज उपाध्याय सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता सम्मेलन में शामिल हुए। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>रायपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 14:32:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>जंतर-मंतर में CJP के प्रदर्शन को JCCJ का समर्थन, अमित जोगी बोले- देश को चाहिए तीसरा राजनीतिक विकल्प</title>
                                    <description><![CDATA[राष्ट्रीय परीक्षा अनियमितताओं के मुद्दे पर आयोजित प्रदर्शन में शामिल होगी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे), छात्रों के सवालों पर जवाबदेही की मांग तेज।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/raipur/jccj-supports-cjps-demonstration-in-jantar-mantar-amit-jogi-said/article-55088"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/cjp-protest.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर शनिवार को होने वाले कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन को अब राजनीतिक समर्थन भी मिलने लगा है। जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) ने घोषणा की है कि उसके प्रतिनिधि और कार्यकर्ता इस प्रदर्शन में शामिल होंगे। पार्टी का दावा है कि वह देश की पहली मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी है जिसने खुलकर इस आंदोलन का समर्थन किया है। यह प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी और प्रवेश परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर आयोजित किया जा रहा है, जिसमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी प्रमुख रूप से उठाई जा रही है। इस घोषणा के बाद जंतर-मंतर का कार्यक्रम केवल एक छात्र आंदोलन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसे राजनीतिक समर्थन मिलने से इसकी चर्चा और बढ़ गई है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) ने साफ किया है कि उसका समर्थन किसी राजनीतिक गठबंधन के तहत नहीं बल्कि छात्रों और युवाओं के हितों से जुड़े मुद्दों के आधार पर है। पार्टी का कहना है कि परीक्षा प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना समय की जरूरत है। हाल के वर्षों में विभिन्न राष्ट्रीय परीक्षाओं को लेकर उठे विवादों ने लाखों छात्रों और अभिभावकों की चिंताओं को बढ़ाया है। ऐसे में यदि युवा सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज उठा रहे हैं तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी बात सुनी जानी चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पार्टी अध्यक्ष अमित जोगी ने इस मौके पर कई राजनीतिक टिप्पणियां भी की हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में केवल किसी विचारधारा से जुड़े रहना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जनता के मुद्दों से लगातार जुड़े रहना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि राजनीति में बने रहने और संघर्ष करने के लिए जिजीविषा की जरूरत होती है। इसी संदर्भ में उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी के नाम का उल्लेख करते हुए कहा कि राजनीति में टिके रहने के लिए उसी तरह की संघर्ष क्षमता चाहिए, जैसी कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने वाले जीवों में दिखाई देती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमित जोगी ने छत्तीसगढ़ी भाषा का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य में कॉकरोच को स्थानीय तौर पर "झेंगुरा" कहा जाता है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ता जंतर-मंतर पर कॉकरोच बनकर नहीं बल्कि गर्व के साथ झेंगुरा बनकर पहुंचेंगे। उनका यह बयान राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। समर्थक इसे प्रतीकात्मक संदेश बता रहे हैं, जबकि विरोधी दल इस पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दिलचस्प बात यह है कि जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ ने फिलहाल अपने समर्थन को केवल छात्रों और परीक्षा अनियमितताओं के मुद्दे तक सीमित बताया है। हालांकि पार्टी नेताओं ने यह भी संकेत दिया है कि भविष्य में समान सोच रखने वाले संगठनों और समूहों के साथ सहयोग की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। इससे यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या आने वाले समय में छात्र आंदोलनों और छोटे राजनीतिक संगठनों के बीच नए प्रकार के राजनीतिक समीकरण बन सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">देश में युवाओं के बीच रोजगार, शिक्षा और परीक्षा प्रणाली से जुड़े मुद्दे लगातार महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। ऐसे में यदि कोई आंदोलन इन विषयों को लेकर व्यापक जनसमर्थन हासिल करता है तो उसका प्रभाव राजनीतिक विमर्श पर भी पड़ सकता है। जंतर-मंतर का यह प्रदर्शन भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। सोशल मीडिया से शुरू हुआ अभियान अब वास्तविक धरातल पर लोगों को जोड़ने की कोशिश कर रहा है और विभिन्न राज्यों से युवाओं के इसमें शामिल होने की खबरें सामने आ रही हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमित जोगी ने अपने बयान में यह भी कहा कि देश में भाजपा और कांग्रेस के अलावा एक मजबूत तीसरे राजनीतिक विकल्प की मांग लगातार बढ़ रही है। उनके अनुसार बड़ी राजनीतिक पार्टियों को भी यह समझने की जरूरत है कि युवाओं और आम नागरिकों की अपेक्षाएं बदल रही हैं। उन्होंने कहा कि जन आंदोलनों को केवल विरोध के रूप में नहीं बल्कि आत्ममंथन के अवसर के रूप में भी देखा जाना चाहिए। कई बार ऐसे आंदोलन राजनीतिक दलों को उनकी कमियों का एहसास कराते हैं और सुधार की दिशा में सोचने के लिए मजबूर करते हैं। जंतर-मंतर लंबे समय से देश के विभिन्न जन आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों का केंद्र रहा है। यहां समय-समय पर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों को लेकर लोग अपनी आवाज उठाते रहे हैं। अब CJP के प्रदर्शन में एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल की भागीदारी ने इस कार्यक्रम को अतिरिक्त महत्व दे दिया है। इससे यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या यह आंदोलन भविष्य में एक बड़े सामाजिक या राजनीतिक अभियान का रूप ले सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>रायपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 14:12:46 +0530</pubDate>
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                <title>राज्यसभा चुनाव से पहले कांग्रेस का बड़ा दांव, भूपेश बघेल को झारखंड का पर्यवेक्षक बनाया</title>
                                    <description><![CDATA[कांग्रेस ने भूपेश बघेल और अजय शर्मा को चुनाव पर्यवेक्षक बनाकर जिम्मेदारी सौंपी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/big-bet-of-congress-before-rajya-sabha-elections-bhupesh-baghel/article-55086"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/bhupesh-baghel.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">झारखंड में होने वाले राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां लगातार तेज होती जा रही हैं। दो सीटों के लिए होने वाले चुनाव से पहले सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर ही मतभेदों की खबरें सामने आने लगी हैं। इसी बीच कांग्रेस हाईकमान ने बड़ा कदम उठाते हुए छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पार्टी नेता अजय शर्मा को झारखंड राज्यसभा चुनाव का पर्यवेक्षक नियुक्त किया है। कांग्रेस के इस फैसले को चुनावी रणनीति और गठबंधन के भीतर समन्वय बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि झारखंड में बदलते हालात के बीच अनुभवी नेताओं को जिम्मेदारी सौंपना कांग्रेस की रणनीतिक तैयारी का हिस्सा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही झारखंड की राजनीति में हलचल बढ़ गई है। विधानसभा में मौजूदा संख्या बल को देखते हुए दोनों सीटों पर सत्तापक्ष गठबंधन की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। हालांकि उम्मीदवारों के चयन को लेकर कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा के बीच अलग-अलग रुख सामने आने से राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। कांग्रेस ने कुछ दिन पहले ही प्रणव झा को राज्यसभा के लिए अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था। पार्टी के इस फैसले के बाद गठबंधन सहयोगी झारखंड मुक्ति मोर्चा ने भी दोनों सीटों पर अपनी दावेदारी जताने के संकेत दिए, जिससे राजनीतिक समीकरण अचानक बदलते नजर आने लगे।</p>
<p class="isSelectedEnd">राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राज्यसभा की दोनों सीटों को लेकर सहयोगी दलों के बीच सहमति बनाने की प्रक्रिया अभी पूरी तरह आसान नहीं दिख रही है। कांग्रेस का मानना है कि गठबंधन में उसकी भूमिका और योगदान को देखते हुए उसे उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। दूसरी ओर झारखंड मुक्ति मोर्चा भी अपने संगठनात्मक और राजनीतिक प्रभाव के आधार पर सीटों पर दावा मजबूत कर रहा है। ऐसे माहौल में कांग्रेस द्वारा भूपेश बघेल को पर्यवेक्षक बनाना काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">भूपेश बघेल लंबे समय से कांग्रेस संगठन और चुनावी रणनीति से जुड़े रहे हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण राजनीतिक अभियानों का नेतृत्व किया था। पार्टी नेतृत्व को उम्मीद है कि उनका अनुभव झारखंड में राज्यसभा चुनाव से जुड़े मुद्दों को सुलझाने और विधायकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने में मदद करेगा। उनके साथ अजय शर्मा को भी पर्यवेक्षक बनाया गया है, जो संगठनात्मक मामलों में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">झारखंड में राज्यसभा चुनाव का गणित भी काफी दिलचस्प माना जा रहा है। विधानसभा में सत्तारूढ़ गठबंधन के पास पर्याप्त संख्या बल है, जिससे दोनों सीटों पर उसकी जीत की संभावना मजबूत दिखाई देती है। लेकिन उम्मीदवारों को लेकर यदि सहयोगी दलों के बीच सहमति नहीं बनती है तो राजनीतिक संदेश अलग जा सकता है। यही वजह है कि कांग्रेस नेतृत्व इस चुनाव को केवल एक संसदीय प्रक्रिया नहीं बल्कि गठबंधन की एकजुटता की परीक्षा के रूप में भी देख रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">राज्यसभा चुनाव अक्सर संख्या बल के आधार पर तय होते हैं, लेकिन कई बार इनके जरिए गठबंधन की आंतरिक स्थिति भी सामने आ जाती है। झारखंड में भी यही स्थिति बनती दिखाई दे रही है। कांग्रेस और जेएमएम दोनों सार्वजनिक रूप से गठबंधन को मजबूत बताते रहे हैं, लेकिन उम्मीदवार चयन को लेकर उभरे मतभेदों ने नई चर्चाओं को जन्म दिया है। आने वाले दिनों में दोनों दलों के बीच बातचीत और राजनीतिक बैठकों का दौर तेज हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रणव झा को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह देखा गया है। पार्टी इसे संगठन के लिए सकारात्मक कदम बता रही है। वहीं जेएमएम के रुख ने यह संकेत दिया है कि राज्यसभा चुनाव को लेकर अंतिम तस्वीर अभी स्पष्ट नहीं हुई है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि पर्यवेक्षकों की नियुक्ति का उद्देश्य केवल चुनावी प्रक्रिया की निगरानी करना नहीं बल्कि सहयोगी दलों के साथ संवाद बनाए रखना भी हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं क्योंकि इनके जरिए राष्ट्रीय राजनीति में राज्य का प्रतिनिधित्व तय होता है। इस बार भी चुनाव को लेकर राजनीतिक दल पूरी ताकत के साथ मैदान में नजर आ रहे हैं। कांग्रेस की ओर से भूपेश बघेल और अजय शर्मा की नियुक्ति ने चुनावी माहौल को और रोचक बना दिया है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि गठबंधन के भीतर सीटों को लेकर जारी चर्चा किस दिशा में आगे बढ़ती है और अंततः उम्मीदवारों तथा समर्थन को लेकर क्या फैसला सामने आता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 14:12:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>मध्य प्रदेश में जल्द लागू होगी UCC, मुख्यमंत्री मोहन यादव ने जनता से मांगे सुझाव</title>
                                    <description><![CDATA[समान नागरिक संहिता को लेकर सरकार ने तेज की प्रक्रिया, विभिन्न धर्मों और समाजों से राय जुटा रही समिति]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/6a1fccc85ab1f/article-54835"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/madhya-pradesh-ucc.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) को लागू करने की दिशा में राज्य सरकार तेजी से आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश में यूसीसी लागू करने की तैयारी चल रही है और इसके लिए गठित समिति विभिन्न वर्गों, सामाजिक संगठनों, विधि विशेषज्ञों तथा आम नागरिकों से सुझाव प्राप्त कर रही है। मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों से भी इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी निभाने और अपने सुझाव साझा करने का आग्रह किया है। सरकार का मानना है कि जनता की भागीदारी से तैयार होने वाला प्रारूप अधिक प्रभावी और व्यापक होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि समय के साथ समाज में कई बदलाव आए हैं और अब विभिन्न सामाजिक तथा पारिवारिक मामलों में एक समान व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की जा रही है। उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य प्रदेश के सभी नागरिकों को समान अधिकार और समान अवसर प्रदान करना है। सरकार इस दिशा में पूरी गंभीरता के साथ कार्य कर रही है और जल्द ही महत्वपूर्ण कदम देखने को मिल सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्य प्रदेश में यूसीसी को लेकर सकारात्मक वातावरण है। प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में समिति लगातार लोगों से संवाद कर रही है और उनके विचारों को सुन रही है। सरकार चाहती है कि हर वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित हो, ताकि तैयार होने वाला प्रारूप समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप हो। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता की राय सबसे महत्वपूर्ण होती है और इसी भावना के साथ सुझाव आमंत्रित किए जा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार द्वारा गठित समिति का नेतृत्व न्यायिक और विधिक अनुभव रखने वाले विशेषज्ञों को सौंपा गया है। समिति विभिन्न जिलों में जाकर सामाजिक संगठनों, शिक्षाविदों, महिलाओं के समूहों, युवा प्रतिनिधियों और अन्य वर्गों से चर्चा कर रही है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह समझना है कि प्रदेश के नागरिक समान नागरिक संहिता को किस रूप में देखते हैं और वे इसमें क्या अपेक्षाएं रखते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि समान नागरिक संहिता सामाजिक समरसता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकती है। उनका मानना है कि जब सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था होगी तो प्रशासनिक प्रक्रियाएं अधिक सरल और प्रभावी बनेंगी। साथ ही नागरिकों को अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के बारे में स्पष्ट जानकारी भी मिलेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रदेश सरकार ने यूसीसी से जुड़े सुझाव प्राप्त करने के लिए एक विशेष ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भी उपलब्ध कराया है। इसके माध्यम से नागरिक अपने विचार और सुझाव सीधे समिति तक पहुंचा सकते हैं। मुख्यमंत्री ने लोगों से अपील की कि वे इस अवसर का लाभ उठाएं और प्रदेश के भविष्य से जुड़े इस महत्वपूर्ण विषय पर अपनी राय अवश्य दें। सरकार का लक्ष्य है कि अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी के साथ एक संतुलित और व्यवहारिक व्यवस्था तैयार की जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश सरकार इसी दिशा में काम कर रही है। विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त सुझावों का अध्ययन कर समिति एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी। इसके बाद सरकार आगे की प्रक्रिया पर निर्णय लेगी। इस पहल को प्रशासनिक सुधार और सुशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में सुशासन और जनहित से जुड़े अनेक कार्य किए जा रहे हैं। मध्य प्रदेश सरकार भी नागरिकों के हितों को प्राथमिकता देते हुए विभिन्न क्षेत्रों में सुधारात्मक कदम उठा रही है। समान नागरिक संहिता को भी इसी श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। सरकार चाहती है कि प्रदेश विकास और सामाजिक समरसता के नए मानक स्थापित करे।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य में यूसीसी को लेकर बढ़ती चर्चा के बीच बड़ी संख्या में लोग अपने सुझाव देने में रुचि दिखा रहे हैं। विभिन्न सामाजिक मंचों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी इस विषय पर संवाद हो रहा है। सरकार का मानना है कि इस तरह की भागीदारी से नीति निर्माण की प्रक्रिया और अधिक मजबूत होती है। यही कारण है कि सुझाव लेने की प्रक्रिया को व्यापक स्तर पर संचालित किया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश लंबे समय से प्रशासनिक नवाचारों और जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए जाना जाता रहा है। ऐसे में समान नागरिक संहिता को लेकर शुरू की गई यह पहल भी व्यापक ध्यान आकर्षित कर रही है। सरकार का लक्ष्य है कि सभी नागरिकों को समान अवसर और पारदर्शी व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए। मुख्यमंत्री ने भरोसा जताया कि जनता के सहयोग और सुझावों के आधार पर तैयार होने वाला ढांचा प्रदेश के विकास और सामाजिक एकता को नई दिशा देगा। समिति विभिन्न जिलों में संवाद कार्यक्रम आयोजित कर रही है और सुझावों का संग्रह जारी है। आने वाले समय में इस प्रक्रिया के और तेज होने की संभावना है। सरकार का कहना है कि जनता की भागीदारी के साथ तैयार होने वाली यह पहल मध्य प्रदेश के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित हो सकती है। प्रदेश के नागरिक भी उत्सुकता के साथ इस प्रक्रिया को देख रहे हैं और अपने विचार साझा कर रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 13:33:29 +0530</pubDate>
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                <title>वंदे मातरम विवाद पर शशि थरूर का सवाल, बोले- हर कार्यक्रम में पूरा राष्ट्रगीत गाना व्यावहारिक नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[सरकारी आयोजनों में वंदे मातरम के सभी छंद अनिवार्य करने पर उठाए सवाल, सहमति से समाधान निकालने की कही बात]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/shashi-tharoors-question-on-vande-mataram-controversy-said-singing/article-54754"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/shashi-tharoor.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम को लेकर जारी बहस के बीच एक बार फिर अपनी राय रखी है। उन्होंने सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम के सभी छंदों को अनिवार्य रूप से गाने या बजाने की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह व्यावहारिक रूप से लोगों के लिए बोझिल साबित हो सकता है। थरूर का कहना है कि राष्ट्रगीत के प्रति सम्मान को लेकर कोई विवाद नहीं है, लेकिन हर सार्वजनिक कार्यक्रम में इसके पूरे संस्करण को गाना और लोगों का बार-बार खड़े होना व्यवहारिक चुनौतियां पैदा कर सकता है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर नई चर्चा शुरू हो गई है।</p>
<p class="isSelectedEnd">तिरुवनंतपुरम में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान शशि थरूर ने कहा कि वंदे मातरम भारत का राष्ट्रगीत है और जब भी यह गाया जाता है तो लोग सम्मान के साथ खड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि देश के अधिकांश लोगों को वंदे मातरम के पहले एक या दो छंद ही याद हैं, जिन्हें वर्षों से सार्वजनिक आयोजनों में गाया जाता रहा है। थरूर के अनुसार यही परंपरा लंबे समय से स्वीकार की गई है और लोगों के बीच भी यही प्रचलन रहा है। ऐसे में पूरे गीत को हर कार्यक्रम में अनिवार्य बनाने पर पुनर्विचार की आवश्यकता हो सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">थरूर ने इसी वर्ष फरवरी में दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम का उदाहरण भी दिया। उन्होंने बताया कि उस आयोजन में कार्यक्रम की शुरुआत और समापन दोनों समय वंदे मातरम का पूरा संस्करण बजाया गया था। उनके अनुसार गीत की अवधि अपेक्षाकृत लंबी होने के कारण लोगों को दो बार लंबे समय तक खड़ा रहना पड़ा, जिससे असुविधा महसूस हुई। उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत के सम्मान पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन व्यवहारिक पक्ष को भी ध्यान में रखना जरूरी है।</p>
<p class="isSelectedEnd">कांग्रेस सांसद का कहना है कि संसद द्वारा ऐसा कोई कानून पारित नहीं किया गया है जो वंदे मातरम के सभी छंदों को हर कार्यक्रम में अनिवार्य रूप से गाने का निर्देश देता हो। उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे का समाधान टकराव के बजाय आपसी सहमति और संवाद से निकाला जाना चाहिए। उनके मुताबिक राष्ट्रगीत के प्रति सम्मान बनाए रखते हुए ऐसा रास्ता खोजा जा सकता है जो सभी पक्षों के लिए स्वीकार्य हो।</p>
<p class="isSelectedEnd">वंदे मातरम को लेकर हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के बाद यह विषय चर्चा में आया है। नए निर्देशों के अनुसार सरकारी कार्यक्रमों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य औपचारिक आयोजनों में वंदे मातरम का पूर्ण संस्करण प्रस्तुत किया जा सकता है। साथ ही इसके दौरान उपस्थित लोगों के सम्मानपूर्वक खड़े रहने की बात भी कही गई है। पहले अधिकांश स्थानों पर वंदे मातरम के शुरुआती दो छंद ही गाए जाते थे, जिन्हें सार्वजनिक रूप से स्वीकार्यता प्राप्त थी।</p>
<p class="isSelectedEnd">शशि थरूर ने अपने ताजा बयान में यह भी कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही वंदे मातरम के शुरुआती छंदों को गाने की परंपरा रही है। उनका मानना है कि यही हिस्सा सबसे अधिक लोकप्रिय है और लोगों की स्मृति में भी मौजूद है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मुद्दे को कुछ राजनीतिक दल अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग देने का प्रयास कर रहे हैं। थरूर ने यह भी कहा कि जो लोग सभी छंदों को अनिवार्य करने की बात कर रहे हैं, उन्हें पहले स्वयं पूरा गीत गाकर दिखाना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd">इस बीच वंदे मातरम के ऐतिहासिक महत्व को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। राष्ट्रगीत वंदे मातरम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा था। यह केवल एक गीत नहीं बल्कि आजादी की लड़ाई का प्रतीक बन गया था। ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलनों और जनसभाओं में इसका व्यापक उपयोग किया जाता था। यही कारण है कि स्वतंत्र भारत में भी इसे विशेष सम्मान प्राप्त है।</p>
<p class="isSelectedEnd">वंदे मातरम की रचना प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वर्ष 1875 में की थी। बाद में इसे उनके उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया। वर्ष 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार इसे राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया गया था। उस समय से लेकर आज तक यह गीत देशभक्ति और राष्ट्रीय गौरव का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा हैं। इसलिए इनके सम्मान को लेकर सभी पक्षों में एक समान भावना है। हालांकि इनके प्रस्तुतीकरण के तरीके और नियमों को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे मुद्दों पर संवाद और सहमति के माध्यम से समाधान निकालना ही सबसे बेहतर तरीका माना जाता है। शशि थरूर के बयान ने वंदे मातरम को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले दिनों में इस विषय पर राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों के बीच चर्चा जारी रहने की संभावना है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 15:08:57 +0530</pubDate>
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