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                <title>Peace Talks - दैनिक जागरण</title>
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                <title>लीबिया में मध्यस्थता की कोशिशों में पाकिस्तान की एंट्री, विरोधी गुटों के बीच संवाद बढ़ाने की पहल</title>
                                    <description><![CDATA[रिपोर्टों और सूत्रों के दावों के बीच कूटनीतिक हलचल तेज, अमेरिका और सऊदी अरब के समर्थन की भी चर्चा; लीबिया संकट के समाधान पर टिकी नजरें]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/pakistans-entry-in-mediation-efforts-in-libya-initiative-to-increase/article-58118"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/libya.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">उत्तर अफ्रीकी देश लीबिया में लंबे समय से जारी राजनीतिक अस्थिरता और गृहसंघर्ष के बीच एक बार फिर कूटनीतिक गतिविधियां तेज होती दिखाई दे रही हैं। पाकिस्तान विरोधी गुटों के बीच संवाद स्थापित कराने और समझौते की दिशा में मध्यस्थता की कोशिश कर रहा है। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय पुष्टि सामने नहीं आई है, लेकिन इन दावों ने क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति में नई चर्चा शुरू कर दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि पाकिस्तान की कोशिश दोनों प्रमुख पक्षों के बीच बातचीत को आगे बढ़ाने और राजनीतिक समाधान का रास्ता तलाशने पर केंद्रित है। यदि यह पहल सफल होती है तो पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत हो सकती है। वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि लीबिया जैसा जटिल संकट केवल एक देश की पहल से हल नहीं होगा, बल्कि इसके लिए कई क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के बीच समन्वय आवश्यक होगा। अमेरिका और सऊदी अरब इस पूरी प्रक्रिया से अवगत हैं और पाकिस्तान की भूमिका को लेकर सकारात्मक रुख रखते हैं। हालांकि, इन दावों पर संबंधित देशों की ओर से विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। ऐसे में इन सूचनाओं को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल के महीनों में पाकिस्तान ने खुद को क्षेत्रीय कूटनीति में अधिक सक्रिय दिखाने का प्रयास किया है। कुछ रिपोर्टों में यह भी उल्लेख किया गया कि अमेरिका और ईरान के बीच संवाद की प्रक्रिया में पाकिस्तान ने संपर्क सूत्र की भूमिका निभाई थी। इसी पृष्ठभूमि में अब लीबिया को लेकर उसकी सक्रियता को देखा जा रहा है। हालांकि, इस विषय पर भी अलग-अलग स्तर पर अलग-अलग दावे सामने आए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लीबिया पिछले कई वर्षों से राजनीतिक विभाजन, सशस्त्र संघर्ष और सत्ता के लिए प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है। देश में अलग-अलग क्षेत्रों पर विभिन्न गुटों का प्रभाव रहा है, जिससे स्थायी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। संयुक्त राष्ट्र की पहल पर कई दौर की वार्ताएं भी हो चुकी हैं, लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। लीबिया में किसी भी शांति समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सभी प्रमुख पक्ष एक साझा राजनीतिक ढांचे पर सहमत हों। इसके साथ ही चुनाव प्रक्रिया, सत्ता के बंटवारे, सुरक्षा व्यवस्था और तेल संसाधनों से होने वाली आय के निष्पक्ष वितरण जैसे मुद्दों पर भी व्यापक सहमति बनाना जरूरी होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"> लीबिया केवल आंतरिक संघर्ष का मामला नहीं है, बल्कि इसमें कई बाहरी देशों के रणनीतिक हित भी जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि वहां किसी भी नई पहल को सफल बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी। पाकिस्तान और लीबिया के बीच रक्षा क्षेत्र में भी संपर्क बढ़ा है। दोनों देशों के बीच सुरक्षा और सैन्य सहयोग को लेकर बातचीत होने की जानकारी पहले भी सामने आ चुकी है। ऐसे में माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद संबंध इस नई कूटनीतिक पहल में सहायक हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि सभी संबंधित पक्ष बातचीत की प्रक्रिया को प्राथमिकता देते हैं तो लीबिया में स्थिरता की दिशा में सकारात्मक प्रगति संभव है। हालांकि, अतीत में कई बार वार्ता शुरू होने के बावजूद राजनीतिक मतभेद और क्षेत्रीय हितों के कारण समझौते आगे नहीं बढ़ पाए। इसलिए इस बार भी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सभी पक्ष कितनी गंभीरता से समाधान की दिशा में आगे बढ़ते हैं। लीबिया में स्थायी शांति केवल राजनीतिक समझौते से नहीं आएगी। इसके लिए सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना, सरकारी संस्थाओं को प्रभावी बनाना, आर्थिक पुनर्निर्माण और आम नागरिकों का भरोसा जीतना भी उतना ही आवश्यक होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 16:39:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>ईरान-अमेरिका की दूसरी वार्ता पर सस्पेंस, पाकिस्तान कर रहा मनाने की कोशिश</title>
                                    <description><![CDATA[ईरान-अमेरिका वार्ता अनिश्चित, पाकिस्तान मध्यस्थता में जुटा। नाकेबंदी हटाने की शर्त पर अड़ा ईरान, इस्लामाबाद बैठक पर संशय बरकरार।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/iran-americas-second-talks-stalled-pakistan-is-trying-to-persuade/article-51645"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/iran-us-talks-pakistan-mediation.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित दूसरे दौर की शांति वार्ता पर सस्पेंस बना हुआ है, जबकि पाकिस्तान दोनों पक्षों के बीच संवाद बहाल कराने के प्रयास तेज कर रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने रविवार को ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से फोन पर बातचीत कर क्षेत्रीय हालात और संभावित वार्ता पर चर्चा की। करीब 45 मिनट चली इस बातचीत में द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव पर भी विस्तार से विचार हुआ। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि उनका प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंचकर बातचीत करेगा, लेकिन ईरान ने इस पर अब तक सहमति नहीं दी है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, शहबाज शरीफ ने इस बातचीत के दौरान सऊदी अरब, कतर और तुर्किये के नेताओं के साथ हालिया संवाद की जानकारी भी साझा की। दोनों नेताओं ने क्षेत्र में शांति बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया। हालांकि, ईरान की सरकारी एजेंसी ने इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता को लेकर चल रही खबरों को खारिज कर दिया है, जिससे स्थिति और अस्पष्ट हो गई है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">ईरान की शर्त</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह तभी वार्ता में शामिल होगा जब अमेरिका उसके बंदरगाहों पर लगी नौसैनिक नाकेबंदी हटाएगा। अधिकारियों के अनुसार, यह शर्त ईरान की सुरक्षा और आर्थिक हितों से जुड़ी हुई है। ईरान को आशंका है कि बिना ठोस भरोसे के बातचीत में शामिल होना उसके लिए नुकसानदेह हो सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय और शीर्ष नेतृत्व लगातार ईरान को मनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस मुद्दे पर ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल की बैठक भी हो चुकी है, जिसमें वार्ता की शर्तों और संभावित जोखिमों पर चर्चा की गई।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">पृष्ठभूमि और गतिरोध</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">इससे पहले 11 और 12 अप्रैल को इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच पहली बार सीधी बातचीत हुई थी। हालांकि, उस दौर में कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया था। इसके बाद से ही दूसरे दौर की वार्ता को लेकर उम्मीद और अनिश्चितता दोनों बनी हुई हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">ईरान को यह भी संदेह है कि बातचीत के बाद भी उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध नहीं हटाए जाएंगे। साथ ही, पहले के अनुभवों को देखते हुए उसे यह डर भी है कि वार्ता के बावजूद तनाव बढ़ सकता है। यही कारण है कि तेहरान इस बार ज्यादा सतर्क रुख अपना रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">असर और आगे की स्थिति</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">विश्लेषकों के अनुसार, यदि यह वार्ता सफल होती है तो मध्य पूर्व में तनाव कम हो सकता है और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा। वहीं, बातचीत में देरी या विफलता क्षेत्रीय अस्थिरता को और बढ़ा सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">फिलहाल 22 अप्रैल को समाप्त होने वाले दो सप्ताह के युद्धविराम को लेकर भी स्थिति अनिश्चित बनी हुई है। पाकिस्तान इस युद्धविराम को आगे बढ़ाने और वार्ता को सफल बनाने के लिए सक्रिय कूटनीतिक प्रयास कर रहा है।</span></p>
<p><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">आगे की स्थिति काफी हद तक ईरान के रुख और अमेरिका की ओर से संभावित रियायतों पर निर्भर करेगी। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता वास्तव में हो पाएगी या नहीं।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 11:54:19 +0530</pubDate>
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