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                <title>Indo Pacific - दैनिक जागरण</title>
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                <title>जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची भारत दौरे पर, मोदी संग शिखर वार्ता में कई अहम मुद्दों पर होगी चर्चा</title>
                                    <description><![CDATA[तीन दिवसीय भारत यात्रा के दौरान व्यापार, निवेश, रक्षा, सेमीकंडक्टर, सप्लाई चेन और स्थानीय मुद्राओं में कारोबार जैसे विषयों पर दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण फैसलों की उम्मीद]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/many-important-issues-will-be-discussed-in-the-summit-with/article-57511"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/india-japan-summit.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">भारत और जापान के बीच रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी को नई गति देने के उद्देश्य से जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची बुधवार को तीन दिवसीय भारत दौरे पर नई दिल्ली पहुंच रही हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनका पहला आधिकारिक भारत दौरा है, जिसे दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस यात्रा के दौरान वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ 16वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगी। दोनों नेताओं के बीच होने वाली बैठक में व्यापार, निवेश, रक्षा, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, महत्वपूर्ण खनिज, सप्लाई चेन, समुद्री सुरक्षा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग जैसे कई अहम मुद्दों पर विस्तृत चर्चा होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंत्रालय के अनुसार यह दौरा 1 से 3 जुलाई तक चलेगा। इस दौरान दोनों देशों के बीच चल रही विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी को और मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा। माना जा रहा है कि बैठक में आर्थिक सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ नई तकनीकों, औद्योगिक निवेश और रक्षा क्षेत्र में साझेदारी को लेकर भी सकारात्मक प्रगति हो सकती है। दोनों देशों के उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के साथ भी प्रधानमंत्री स्तर पर मुलाकात का कार्यक्रम प्रस्तावित है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पहलू भारत और जापान के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी भी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दोनों देश ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर काम कर रहे हैं, जिसके तहत व्यापारिक भुगतान सीधे भारतीय रुपये और जापानी येन में किया जा सकेगा। यदि यह व्यवस्था लागू होती है तो दोनों देशों के बीच पहली बार स्थानीय मुद्राओं में औपचारिक व्यापारिक भुगतान प्रणाली स्थापित होगी। इससे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम होगी और व्यापारिक लेनदेन पहले की तुलना में अधिक आसान तथा किफायती बन सकेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रस्तावित व्यवस्था के तहत जापानी कंपनियां भारत के बैंकों में विशेष खाते खोलकर सीधे रुपये और येन में भुगतान कर सकेंगी। इससे विदेशी मुद्रा विनिमय की अतिरिक्त लागत कम होगी और भुगतान प्रक्रिया भी तेज होगी। व्यापारिक समुदाय का मानना है कि इससे दोनों देशों के बीच कारोबार करने वाली कंपनियों को समय और धन दोनों की बचत होगी। साथ ही छोटे और मध्यम उद्योगों को भी इसका लाभ मिल सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की यह पहल नई जरूर है, लेकिन इसकी नींव पहले ही रखी जा चुकी थी। अगस्त 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अगले दस वर्षों के लिए साझा विजन दस्तावेज जारी किया था। उस समय भी भुगतान प्रणाली को सरल बनाने और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर सहमति बनी थी। अब उसी दिशा में ठोस कदम उठाने की तैयारी की जा रही है। भारतीय रिजर्व बैंक पहले ही विशेष रुपया वोस्त्रो अकाउंट की व्यवस्था शुरू कर चुका है, जिसके माध्यम से कई देशों के साथ रुपये में व्यापार को बढ़ावा दिया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत सरकार के अनुसार वर्तमान में 30 देशों के 123 विदेशी बैंकों के लिए भारत के 26 बैंकों में 156 विशेष रुपया वोस्त्रो खाते खोले जा चुके हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मजबूत विदेशी मुद्राओं पर निर्भरता कम करना और भारतीय रुपये के वैश्विक उपयोग को बढ़ावा देना है। जापान भी एशियाई देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की दिशा में लगातार प्रयास कर रहा है और भारत के साथ यह सहयोग उसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत और जापान के आर्थिक संबंध पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुए हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच लगभग 27.5 अरब डॉलर का व्यापार दर्ज किया गया। इसी अवधि में जापान ने भारत में करीब 3.2 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष निवेश किया। जापान ने अगले दस वर्षों में भारत में 61 अरब डॉलर से अधिक निवेश करने का लक्ष्य भी तय किया है। वर्तमान में भारत में लगभग 1400 जापानी कंपनियां कार्यरत हैं, जिनमें बड़ी संख्या विनिर्माण क्षेत्र से जुड़ी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">दोनों देशों के सहयोग का सबसे बड़ा उदाहरण मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना है, जिसमें जापान की शिनकानसेन तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। इसके अलावा सेमीकंडक्टर, क्लीन एनर्जी, ऑटोमोबाइल, डिजिटल टेक्नोलॉजी और महत्वपूर्ण खनिजों की सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए भी दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं। चीन पर वैश्विक निर्भरता कम करने की रणनीति के तहत भारत और जापान ने वर्ष 2025 में सेमीकंडक्टर और क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में विशेष रणनीतिक संवाद भी शुरू किया था। प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची का यह दौरा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा, क्वाड सहयोग और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने जैसे विषयों पर भी महत्वपूर्ण संदेश देगा। ऐसे समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं, भारत और जापान की रणनीतिक साझेदारी दोनों देशों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 13:44:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>अमेरिका ने इंडो-पैसिफिक कमांड से हटाया ‘इंडो’, भारत की भूमिका पर उठे सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[2018 में चीन को संतुलित करने की रणनीति के तहत जोड़ा गया था ‘इंडो’, अब नाम बदलकर फिर से यूएस पैसिफिक कमांड करने पर विशेषज्ञों के बीच नई बहस शुरू हो गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/america-removes-indo-from-indo-pacific-command-questions-raised-on-indias/article-56234"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-pacific-command.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिका ने अपनी सबसे महत्वपूर्ण सैन्य कमांड में से एक के नाम में बड़ा बदलाव करते हुए ‘इंडो’ शब्द हटा दिया है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि अब यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड (USINDOPACOM) को फिर से यूएस पैसिफिक कमांड (USPACOM) के नाम से जाना जाएगा। इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह कदम अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं का संकेत है और क्या इससे भारत की रणनीतिक भूमिका को लेकर कोई नया संदेश जा रहा है। वर्ष 2018 में तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन ने इस सैन्य कमांड का नाम बदलकर यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड किया था। उस समय यह फैसला केवल एक नाम परिवर्तन नहीं माना गया था, बल्कि इसे अमेरिका की नई एशिया रणनीति का अहम हिस्सा बताया गया था। अमेरिका ने तब स्पष्ट किया था कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर अब एक-दूसरे से जुड़े रणनीतिक क्षेत्र बन चुके हैं। ऐसे में भारत को क्षेत्रीय संतुलन और सुरक्षा व्यवस्था में प्रमुख भागीदार के रूप में देखा जा रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने नाम परिवर्तन की घोषणा करते हुए कहा था कि हिंद महासागर का महत्व लगातार बढ़ रहा है और वैश्विक व्यापार, समुद्री सुरक्षा तथा क्षेत्रीय स्थिरता के लिए इसकी भूमिका बेहद अहम हो चुकी है। इसी सोच के तहत कमांड के नाम में ‘इंडो’ शब्द जोड़ा गया था ताकि भारत और हिंद महासागर क्षेत्र की बढ़ती अहमियत को दर्शाया जा सके।अब आठ साल बाद इस फैसले को पलटते हुए अमेरिका ने फिर से पुराना नाम अपनाने का निर्णय लिया है। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि यूएस पैसिफिक कमांड नाम ऐतिहासिक रूप से जुड़ा हुआ है और इसका सैन्य विरासत से गहरा संबंध रहा है। मंत्रालय के अनुसार यह नाम कई महत्वपूर्ण अभियानों, युद्धों और सैन्य उपलब्धियों का प्रतीक है। इसलिए इसे वापस लाने का फैसला किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि पेंटागन ने साफ किया है कि केवल नाम बदला गया है। कमांड की जिम्मेदारियों, अधिकार क्षेत्र, सैन्य रणनीति और संचालन में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ इस कदम को केवल औपचारिक बदलाव मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि कूटनीति और सुरक्षा नीति में प्रतीकों का भी बड़ा महत्व होता है और ऐसे फैसले अक्सर व्यापक रणनीतिक संकेत देते हैं। जब 2018 में ‘इंडो’ शब्द जोड़ा गया था, तब अमेरिका चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर काफी चिंतित था। उस समय भारत को अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति का केंद्रीय साझेदार माना जा रहा था। क्वाड जैसे मंचों को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना गया, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इस समूह का उद्देश्य क्षेत्र में नियम आधारित व्यवस्था को मजबूत करना और चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन बनाना था।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान बदलाव से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अमेरिका अब अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव कर रहा है। कुछ विशेषज्ञ इसे ट्रम्प प्रशासन की नई विदेश नीति सोच से जोड़कर देख रहे हैं। माना जा रहा है कि अमेरिका अब अपने संसाधनों और सैन्य फोकस को अलग तरीके से व्यवस्थित करना चाहता है। हालांकि आधिकारिक तौर पर किसी रणनीतिक बदलाव की पुष्टि नहीं की गई है। इस फैसले पर भारत में भी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया पर अमेरिकी आदेश की तस्वीर साझा करते हुए सवाल उठाया कि क्या यह क्वाड के भविष्य के लिए कोई संकेत है। उन्होंने टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या यह क्वाड के ताबूत में एक और कील साबित हो सकती है। थरूर की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है जब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा और सामरिक साझेदारियों पर लगातार चर्चा हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">यूएस पैसिफिक कमांड अमेरिका की सबसे बड़ी सैन्य कमांडों में गिनी जाती है। इसका क्षेत्र एशिया-प्रशांत के विशाल हिस्से तक फैला हुआ है। यह कमांड चीन, उत्तर कोरिया, दक्षिण चीन सागर, ताइवान जलडमरूमध्य और कई अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों की निगरानी करती है। इसी वजह से इसके नाम में होने वाला बदलाव भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रहा है। आने वाले महीनों में अमेरिका की विदेश और सुरक्षा नीति के अन्य फैसलों पर नजर रखनी होगी। तभी यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह कदम केवल ऐतिहासिक नाम की वापसी है या फिर इसके पीछे कोई व्यापक रणनीतिक सोच काम कर रही है। फिलहाल अमेरिका ने यह जरूर कहा है कि उसके सहयोगी देशों के साथ संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा प्रतिबद्धताओं में कोई बदलाव नहीं होगा। इसके बावजूद भारत, क्वाड और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से जुड़े देशों में इस फैसले को लेकर चर्चा जारी है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 18:39:40 +0530</pubDate>
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                <title>भारत को समझना है तो ट्रेन और बस से सफर करें: ऑस्ट्रेलियाई पीएम अल्बनीज</title>
                                    <description><![CDATA[ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने भारत की आर्थिक प्रगति और सांस्कृतिक विविधता की सराहना करते हुए कहा कि भारत को सही मायनों में समझने के लिए ट्रेन या बस से यात्रा करनी चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/if-you-want-to-understand-india-then-travel-by-train/article-54433"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/india-australia-relations.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने भारत की आर्थिक तरक्की, सांस्कृतिक विविधता और वैश्विक प्रभाव की खुलकर तारीफ की है। उन्होंने कहा कि भारत तेजी से दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है और यह सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के लिए एक बड़ा अवसर साबित होगा। कैनबरा में ऑस्ट्रेलियाई संसद को संबोधित करते हुए अल्बनीज ने भारत के साथ अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि भारत को सही तरीके से समझने के लिए केवल बड़े शहरों या आधिकारिक बैठकों तक सीमित रहना काफी नहीं है। अगर कोई भारत की असली आत्मा को महसूस करना चाहता है तो उसे बस या ट्रेन से यात्रा करनी चाहिए। उनके इस बयान को भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता की बड़ी सराहना माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अल्बनीज ने कहा कि भारत सिर्फ एक देश नहीं बल्कि कई संस्कृतियों, भाषाओं और परंपराओं का संगम है। उन्होंने कहा कि भारतीय रेलवे और सड़क यात्रा देश की असली तस्वीर दिखाती है, जहां अलग-अलग समुदाय, परंपराएं और जीवनशैली एक साथ दिखाई देती हैं। उन्होंने अपने पुराने भारत दौरे को याद करते हुए कहा कि भारत की यात्रा ने उनके जीवन और सोच पर गहरा प्रभाव डाला। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ने बताया कि वे पहली बार साल 1991 में एक बैकपैकर के रूप में भारत आए थे। उस समय उन्होंने भारत के कई हिस्सों की यात्रा की थी। उन्होंने कहा कि उस दौर में उन्होंने भारत की ऊर्जा, लोगों की गर्मजोशी और सांस्कृतिक विविधता को करीब से महसूस किया। यही अनुभव आज भी उनके मन में ताजा हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे दो बार भारत का दौरा कर चुके हैं और हर यात्रा में भारत को और बेहतर तरीके से समझने का मौका मिला। उन्होंने भारत की प्रगति की तारीफ करते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों में देश ने बुनियादी ढांचे, डिजिटल तकनीक, व्यापार और वैश्विक नेतृत्व के क्षेत्र में जबरदस्त विकास किया है। अल्बनीज ने अपने संबोधन में भारत और ऑस्ट्रेलिया के मजबूत होते रिश्तों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के संबंध अब केवल कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शिक्षा, व्यापार, संस्कृति, खेल और तकनीक जैसे कई क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि दोनों लोकतांत्रिक देशों के साझा मूल्य उन्हें और करीब लाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने 2022 में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते को ऐतिहासिक बताया। अल्बनीज ने कहा कि इस समझौते के बाद दोनों देशों के व्यापारिक संबंध और मजबूत हुए हैं। इससे निवेश, रोजगार और आर्थिक सहयोग के नए अवसर पैदा हुए हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार कई गुना बढ़ेगा। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ने शिक्षा क्षेत्र में भारत के योगदान की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में भारतीय छात्र ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई कर रहे हैं और वे दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय समुदाय ऑस्ट्रेलिया की बहुसांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्रिकेट का जिक्र करते हुए अल्बनीज ने कहा कि यह खेल दोनों देशों को भावनात्मक रूप से जोड़ता है। उन्होंने कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच क्रिकेट मुकाबले केवल खेल नहीं बल्कि लोगों के बीच जुड़ाव और दोस्ती का प्रतीक बन चुके हैं। उन्होंने भारतीय क्रिकेट प्रेमियों की भी जमकर तारीफ की। प्रधानमंत्री अल्बनीज ने यह भी कहा कि वे जल्द ही भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेजबानी करने को लेकर उत्साहित हैं। उन्होंने बताया कि यह दूसरी बार होगा जब वे ऑस्ट्रेलिया में पीएम मोदी का स्वागत करेंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नरेंद्र मोदी जुलाई की शुरुआत में ऑस्ट्रेलिया दौरे पर जा सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के रिश्ते आने वाले समय में और मजबूत होंगे। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता, सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए दोनों देशों का सहयोग बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए लोकतांत्रिक देशों का एकजुट होना जरूरी है और भारत इसमें बड़ी भूमिका निभा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अल्बनीज का यह बयान भारत की बढ़ती वैश्विक ताकत और प्रभाव को दर्शाता है। भारत की आर्थिक प्रगति, तकनीकी विकास और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मजबूत उपस्थिति ने दुनिया के बड़े देशों का ध्यान आकर्षित किया है। ऑस्ट्रेलिया भी अब भारत को केवल एक रणनीतिक साझेदार नहीं बल्कि भविष्य की वैश्विक शक्ति के रूप में देख रहा है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच पिछले कुछ वर्षों में रिश्तों में तेजी से सुधार हुआ है। रक्षा, व्यापार, शिक्षा और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देश लगातार सहयोग बढ़ा रहे हैं। ऐसे में अल्बनीज का यह बयान दोनों देशों की दोस्ती को और मजबूत करने वाला माना जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 28 May 2026 14:09:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पीएम मोदी और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने की मुलाकात, रक्षा, व्यापार और तकनीक सहयोग बढ़ाने पर की बातचीत</title>
                                    <description><![CDATA[भारत-दक्षिण कोरिया बैठक में मोदी और ली जे-म्युंग ने व्यापार, रक्षा और तकनीकी सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया, संबंधों को नई दिशा मिली।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/pm-modi-and-south-korean-president-lee-jae-myung-met-and/article-51659"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/india-south-korea-meeting.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">नई दिल्ली में सोमवार को प्रधानमंत्री मोदी और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग के बीच हुई अहम बैठक ने द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने का संकेत दिया। राजधानी स्थित हैदराबाद हाउस में आयोजित इस बैठक में दोनों नेताओं ने रक्षा, व्यापार, प्रौद्योगिकी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। इससे पहले राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में ली जे-म्युंग का औपचारिक स्वागत किया, जहां पारंपरिक समारोह के जरिए दोनों देशों की मित्रता को रेखांकित किया गया। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक स्तर पर आपूर्ति श्रृंखला और क्षेत्रीय सुरक्षा प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने विशेष सामरिक साझेदारी को और मजबूत करने पर सहमति जताई। अधिकारियों के अनुसार, चर्चा में रक्षा उत्पादन, सेमीकंडक्टर, बैटरी निर्माण, साइबर सुरक्षा और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई। भारत और दक्षिण कोरिया के बीच बढ़ता आर्थिक सहयोग भी एजेंडे में प्रमुख रहा, जहां द्विपक्षीय व्यापार को और विस्तार देने पर जोर दिया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">रणनीतिक सहयोग पर फोकस</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">दोनों देशों ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई। सूत्रों के मुताबिक, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने पर भी चर्चा हुई। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Randhir Jaiswal ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि भारत-दक्षिण कोरिया विशेष सामरिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए यह बैठक महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि दोनों देशों के बीच गहरे और भरोसेमंद संबंधों को नई गति देने पर जोर दिया गया है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">आर्थिक रिश्तों की मजबूती</span></strong></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">भारत दक्षिण कोरियाई कंपनियों के लिए तेजी से उभरता निवेश केंद्र बन रहा है। व्यापार और तकनीकी सहयोग को बढ़ाने पर विशेष सहमति बनी। देखा जाए तो भारत और दक्षिण कोरिया के बीच विशेष सामरिक साझेदारी की शुरुआत वर्ष 2010 में हुई थी। तब से दोनों देश रक्षा, व्यापार और उभरती तकनीकों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाते रहे हैं। वर्तमान में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 30 अरब डॉलर से अधिक का है, और इसे आगे बढ़ाने के लिए नए अवसर तलाशे जा रहे हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">इस यात्रा के दौरान उच्च-स्तरीय वार्ता में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, रक्षा सहयोग और निवेश को बढ़ावा देने पर भी चर्चा होने की उम्मीद है। रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देश सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रिक बैटरी सप्लाई चेन में साझेदारी मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे रहे हैं, जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा का अहम हिस्सा बन चुका है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने भारत पहुंचने से पहले विमान से एक वीडियो संदेश भी साझा किया, जिसमें उन्होंने भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बताया। उन्होंने दोनों देशों के साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और सहयोग की संभावनाओं पर जोर दिया।</span></p>
<p><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">विश्लेषकों का मानना है कि यह दौरा भारत-दक्षिण कोरिया संबंधों को नई ऊंचाई देने के साथ-साथ इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है। खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक सप्लाई चेन और तकनीकी प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है, दोनों देशों की साझेदारी का महत्व और बढ़ जाता है आगे की बात करें तो इस दौरे के बाद कई द्विपक्षीय समझौतों और निवेश प्रस्तावों पर प्रगति देखने को मिल सकती है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 13:49:34 +0530</pubDate>
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