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                <title>Court News - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Court News RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>चेक बाउंस मामले में अभिनेता राजपाल यादव को झटका, दिल्ली हाईकोर्ट ने बरकरार रखी सजा</title>
                                    <description><![CDATA[सात मामलों में दोषसिद्धि कायम, तीन महीने की सजा के साथ करोड़ों रुपये मुआवजा देने का आदेश; अदालत ने समझौते की शर्तें पूरी नहीं करने पर जताई नाराजगी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/bollywood/shock-to-actor-rajpal-yadav-in-check-bounce-case-delhi/article-58423"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/rajpal-yadav.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव को चेक बाउंस से जुड़े मामलों में बड़ा कानूनी झटका लगा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने सात अलग-अलग चेक बाउंस मामलों में उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए प्रत्येक मामले में तीन महीने के कारावास की सजा सुनाई है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी सजाएं एक साथ चलेंगी, इसलिए अभिनेता को कुल तीन महीने की ही जेल काटनी होगी। इसके साथ ही अदालत ने शिकायतकर्ता को करोड़ों रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया है।दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि निचली अदालत द्वारा दिए गए निर्णय और मुआवजे की गणना में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। अदालत ने माना कि पहले किए गए भुगतानों को ध्यान में रखते हुए मुआवजे की राशि तय की गई है। कोर्ट ने राजपाल यादव को प्रत्येक मामले में शिकायतकर्ता को 1.05 करोड़ रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया। इसके अतिरिक्त एक अन्य राशि और राज्य को 25 हजार रुपये देने का आदेश भी दिया गया। वहीं उनकी पत्नी राधा यादव को भी प्रत्येक मामले में शिकायतकर्ता को 5.51 लाख रुपये का भुगतान करने के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सुनवाई के दौरान अभिनेता को कई अवसर दिए गए थे ताकि वह विवाद का आपसी सहमति से समाधान कर सकें। राजपाल यादव की ओर से बार-बार अदालत को भरोसा दिलाया गया कि वह बकाया राशि का भुगतान कर देंगे और समझौते का पालन करेंगे। लेकिन अदालत के अनुसार उन्हें पर्याप्त समय और अवसर मिलने के बावजूद वे अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं कर सके।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सुनवाई के दौरान अभिनेता ने पहले समझौते की इच्छा जताई, लेकिन बाद में अतिरिक्त भुगतान करने से इनकार कर दिया। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने यह तक कहा कि यदि भुगतान संभव नहीं है तो वह जेल जाने के लिए तैयार हैं। इसी कारण अदालत ने माना कि अब इस मामले में राहत देने का कोई आधार नहीं बचता। यह पूरा मामला वर्ष 2010 में लिए गए एक बड़े ऋण से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार राजपाल यादव ने फिल्म निर्माण और निर्देशन के उद्देश्य से एक निजी कंपनी से लगभग पांच करोड़ रुपये का कर्ज लिया था। यह राशि उनकी फिल्म "अता पता लापता" के निर्माण में लगाई गई थी। हालांकि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो सकी, जिससे अभिनेता आर्थिक संकट में आ गए और समय पर ऋण नहीं चुका पाए। समय के साथ ब्याज, जुर्माना और भुगतान में देरी के कारण यह बकाया राशि बढ़कर लगभग नौ करोड़ रुपये तक पहुंच गई। इस बीच कर्ज चुकाने के लिए दिए गए कई चेक बैंक से बाउंस हो गए। इसके बाद शिकायतकर्ता कंपनी ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) के तहत अदालत का दरवाजा खटखटाया और अभिनेता के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू हुई। मामले की सुनवाई के दौरान राजपाल यादव ने कई बार अदालत से अतिरिक्त समय मांगा। उन्होंने कुछ किस्तों में भुगतान भी किया। अदालत ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि अभिनेता पहले ही लगभग 2.25 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुके हैं और इस राशि को अंतिम मुआवजे में समायोजित किया जाएगा। बावजूद इसके बड़ी रकम अभी भी बकाया है, जिसके कारण अदालत ने सजा और मुआवजे के आदेश को बरकरार रखा।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पाया कि पूर्व में दी गई राहत केवल इस भरोसे पर आधारित थी कि अभिनेता निर्धारित समय के भीतर समझौते की शर्तों का पालन करेंगे। लेकिन बार-बार समय सीमा बढ़ाने के बावजूद भुगतान पूरा नहीं किया गया। अदालत ने तकनीकी या टाइपिंग संबंधी त्रुटियों के कारण भुगतान में देरी के तर्क को भी स्वीकार नहीं किया और कहा कि ये दलीलें विश्वसनीय नहीं हैं। इस मामले में पहले भी राजपाल यादव को अदालत के निर्देश पर आत्मसमर्पण करना पड़ा था और उन्हें तिहाड़ जेल भेजा गया था। बाद में उन्होंने अदालत में 25 लाख रुपये का चेक प्रस्तुत कर शेष राशि का भुगतान करने का आश्वासन देते हुए राहत की मांग की थी। हालांकि अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि पहले आत्मसमर्पण आवश्यक है और उसके बाद ही किसी राहत पर विचार किया जा सकता है। अभिनेता ने सुनवाई के दौरान अपनी आर्थिक कठिनाइयों का भी जिक्र किया था। उन्होंने अदालत से कहा कि उनके पास भुगतान के लिए पर्याप्त धनराशि नहीं है और वह आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। हालांकि अदालत ने कहा कि केवल आर्थिक कठिनाई के आधार पर कानूनी दायित्वों से बचा नहीं जा सकता।राजपाल यादव के समर्थन में फिल्म उद्योग के कुछ कलाकार भी सामने आए। अभिनेता सोनू सूद ने सार्वजनिक रूप से कहा कि राजपाल यादव बेहद प्रतिभाशाली कलाकार हैं और कठिन समय में फिल्म उद्योग को उनके साथ खड़ा होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अपनी फिल्म में काम देकर अग्रिम राशि दी जाएगी, जिसे भविष्य के काम के बदले समायोजित किया जाएगा। सोनू सूद ने इसे दान नहीं बल्कि सम्मान और गरिमा बनाए रखने का प्रयास बताया। अभिनेता गुरमीत चौधरी ने भी राजपाल यादव के समर्थन में आवाज उठाई और फिल्म जगत से सहयोग की अपील की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बालीवुड</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 17:11:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान हंगामा, अभद्र व्यवहार पर याचिका खारिज</title>
                                    <description><![CDATA[सुनवाई के दौरान वकील ने कोर्ट की गरिमा का उल्लंघन किया, सुरक्षा कर्मियों ने बाहर निकाला; अदालत ने अवमानना की कार्रवाई से परहेज करते हुए याचिका खारिज की]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/uproar-during-hearing-in-supreme-court-petition-on-indecent-behavior/article-58413"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/supreme-court-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">देश की सर्वोच्च अदालत में शुक्रवार को एक सुनवाई के दौरान ऐसा घटनाक्रम देखने को मिला जिसने कुछ समय के लिए कोर्ट रूम का माहौल पूरी तरह बदल दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता वकील ने अदालत में अभद्र व्यवहार किया। सुनवाई के दौरान उन्होंने न केवल आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया बल्कि अदालत की कार्यवाही के बीच फाइल भी उछाल दी। स्थिति बिगड़ने पर सुरक्षा कर्मियों को हस्तक्षेप करना पड़ा और संबंधित वकील को कोर्ट रूम से बाहर ले जाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ के समक्ष आया जिसमें जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे सुनवाई कर रहे थे। याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर की गई थी और याचिकाकर्ता स्वयं अधिवक्ता के रूप में अपना पक्ष रख रहे थे। शुरुआत से ही उनका रवैया आक्रामक बताया गया। अदालत की कार्यवाही के दौरान उन्होंने लगातार ऊंची आवाज में अपनी बात रखी और न्यायालय की प्रक्रिया पर असंतोष जताया। सुनवाई के दौरान स्थिति तब गंभीर हो गई जब उन्होंने अदालत में आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया और गुस्से में केस से जुड़े दस्तावेज हवा में उछाल दिए। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से कुछ क्षणों के लिए कोर्ट रूम में मौजूद सभी लोग स्तब्ध रह गए। न्यायिक कार्यवाही के दौरान इस तरह के व्यवहार को देखते हुए सुरक्षा कर्मी तुरंत सक्रिय हुए और संबंधित वकील को अदालत कक्ष से बाहर ले गए, जिससे आगे की कार्यवाही शांतिपूर्वक जारी रह सके।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, वकील ने सुनवाई के दौरान न्यायालय से एक विशेष आदेश जारी करने की मांग की थी। उन्होंने कथित रूप से कहा कि संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। इस पर पीठ ने उनसे सवाल किया कि क्या वे अदालत को आदेश दे रहे हैं। इसके बाद माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया। वकील ने अपनी बात दोहराने के बाद दस्तावेज फेंक दिए और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। घटना के दौरान कोर्ट रूम में मौजूद कई अधिवक्ता और अन्य लोग कुछ समय के लिए असहज हो गए। अचानक हुए इस घटनाक्रम के कारण कार्यवाही कुछ देर के लिए प्रभावित हुई, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था सक्रिय रहने से स्थिति जल्द सामान्य हो गई। अदालत ने शांति बनाए रखते हुए सुनवाई आगे बढ़ाई।</p>
<p style="text-align:justify;">घटना के बाद जस्टिस के. वी. विश्वनाथन ने कहा कि संबंधित व्यक्ति स्पष्ट रूप से मानसिक और भावनात्मक दबाव में दिखाई दे रहे थे। उन्होंने कहा कि अदालत को उनके प्रति सहानुभूति है और इस पूरे घटनाक्रम को हताशा के रूप में देखा जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से दंडित करना नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को निष्पक्ष और संतुलित बनाए रखना है। महत्वपूर्ण बात यह रही कि अदालत ने इस मामले में वकील के खिलाफ तत्काल अवमानना की कार्रवाई करने का निर्णय नहीं लिया। हालांकि, पीठ ने याचिका के गुण-दोष पर विचार करने के बाद स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड का अवलोकन करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं पाया गया। इसी कारण विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया गया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 16:32:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वायरल गर्ल के पति को नहीं मिली अग्रिम जमानत, पॉक्सो कोर्ट ने कहा- सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका</title>
                                    <description><![CDATA[मंडलेश्वर की विशेष पॉक्सो अदालत ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि आरोपी जांच में सहयोग नहीं कर रहा है और पीड़िता की उम्र का अंतिम फैसला ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/viral-girls-husband-did-not-get-anticipatory-bail-pocso-court/article-57652"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/viral-girl-case.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">खरगोन जिले के मंडलेश्वर स्थित विशेष पॉक्सो न्यायालय ने चर्चित वायरल गर्ल मामले में उसके पति को बड़ी राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में उसे जमानत देना उचित नहीं होगा। अदालत का मानना है कि आरोपी के फरार रहने, जांच में सहयोग नहीं करने और साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका को देखते हुए अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पीड़िता की वास्तविक उम्र का अंतिम निर्धारण ट्रायल के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा। यह मामला उस एफआईआर से जुड़ा है जो पीड़िता के पिता ने 25 मार्च को दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि उनकी बेटी को फिल्मों में काम दिलाने का झांसा देकर केरल ले जाया गया। वहां कुछ समय तक साथ रखने के बाद आरोपी ने कथित रूप से उसे बहला-फुसलाकर विवाह कर लिया। परिवार का दावा है कि शादी के समय उनकी बेटी नाबालिग थी, इसलिए पूरा मामला पॉक्सो एक्ट के दायरे में आता है। बुधवार को मामले की सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हुई। आरोपी की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने अदालत में दलील दी कि युवती अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई थी और दोनों ने आपसी सहमति से विवाह किया। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि केरल के थंपानूर पुलिस थाने में युवती ने स्वयं को बालिग बताया था और उसने अपने बयान में भी विवाह को अपनी इच्छा से किया गया बताया था। इसी आधार पर आरोपी को अग्रिम जमानत देने की मांग की गई।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं अभियोजन पक्ष और पीड़िता की ओर से पेश वकीलों ने अदालत के सामने जन्म प्रमाण पत्र सहित अन्य दस्तावेज प्रस्तुत किए। उनका कहना था कि विवाह के समय युवती नाबालिग थी और आरोपी की ओर से प्रस्तुत किए गए कुछ दस्तावेज कानूनी रूप से प्रमाणिक नहीं हैं। अभियोजन ने यह भी तर्क दिया कि पुलिस जांच अभी पूरी नहीं हुई है और इस स्तर पर आरोपी को अग्रिम जमानत देना जांच को प्रभावित कर सकता है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद विशेष न्यायाधीश रवि झारोला ने केस डायरी का अध्ययन किया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभी मामले की जांच जारी है और पीड़िता के बयान सहित कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं पूरी होना बाकी हैं। आरोपी जांच एजेंसियों के सामने उपस्थित नहीं हुआ है और फरार बताया जा रहा है। ऐसे में यदि उसे अग्रिम जमानत दी जाती है तो वह साक्ष्यों से छेड़छाड़ कर सकता है या गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश कर सकता है। इसी आधार पर अदालत ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि पीड़िता की वास्तविक उम्र को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद है। इस विषय पर अंतिम निर्णय ट्रायल के दौरान प्रस्तुत होने वाले दस्तावेजों, गवाहों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर ही लिया जाएगा। फिलहाल इस स्तर पर उम्र को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस मामले में इससे पहले केरल हाईकोर्ट भी सुनवाई कर चुका है। तीन जून को केरल हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर युवती को बालिग मानते हुए उसके पति को एक महीने की ट्रांजिट बेल प्रदान की थी। उस दौरान अदालत के सामने जन्म प्रमाण पत्र, वोटर आईडी और बैंक पासबुक जैसे दस्तावेज पेश किए गए थे। हालांकि मध्य प्रदेश पुलिस की ओर से यह दावा किया गया था कि जन्म प्रमाण पत्र फर्जी है और युवती वास्तव में नाबालिग है। हाईकोर्ट ने उस समय उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर राहत दी थी, लेकिन उम्र संबंधी विवाद का अंतिम फैसला नहीं सुनाया था। मामले ने उस समय और अधिक तूल पकड़ लिया जब राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने इस विवाह पर आपत्ति जताई। आयोग ने दावा किया कि शादी के समय युवती की उम्र 16 वर्ष थी और विवाह के लिए कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद खरगोन पुलिस ने आरोपी के खिलाफ पॉक्सो एक्ट सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी मामले से जुड़ा एक अन्य पहलू फिल्म निर्देशक सनोज मिश्रा के खिलाफ दर्ज एफआईआर भी है। युवती ने आरोप लगाया था कि जब वह नाबालिग थी तब फिल्म की शूटिंग के दौरान उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया। इन आरोपों के आधार पर केरल पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। हालांकि फिल्म निर्देशक ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे अपने खिलाफ रची गई साजिश बताया है। पूरे मामले में सबसे बड़ा विवाद युवती की उम्र को लेकर है। जांच के दौरान अलग-अलग जन्म प्रमाण पत्र सामने आए, जिनमें जन्मतिथि अलग-अलग दर्ज है। प्रशासन की ओर से कुछ दस्तावेजों की वैधता पर भी सवाल उठाए गए हैं। यही कारण है कि अदालत ने स्पष्ट किया है कि इस विवाद का समाधान केवल ट्रायल के दौरान साक्ष्यों की जांच के बाद ही संभव होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 13:40:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>महिला जज को धमकियों पर हाईकोर्ट सख्त, ACS गृह और DGP से मांगा हलफनामा</title>
                                    <description><![CDATA[गौहत्या से जुड़े चर्चित मामले में उम्रकैद की सजा सुनाने के बाद मिली जान से मारने की धमकियों पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से सुरक्षा इंतजामों का पूरा ब्यौरा मांगा, अगली सुनवाई 9 जुलाई को होगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-strict-on-threats-to-female-judge-seeks-affidavit/article-57651"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/woman-judge-threats.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">गौहत्या से जुड़े बहुचर्चित मामले में 14 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाने वाली सिवनी मालवा की महिला न्यायिक अधिकारी को मिल रही जान से मारने की धमकियों पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस मामले को बेहद गंभीर मानते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया है और गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) तथा पुलिस महानिदेशक (DGP) को शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने पूछा है कि महिला न्यायिक अधिकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अब तक कौन-कौन से ठोस कदम उठाए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 9 जुलाई को निर्धारित की गई है। न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से जुड़े इस घटनाक्रम ने एक बार फिर न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला अगस्त 2022 में हुई उस घटना से जुड़ा है, जिसने पूरे प्रदेश में काफी चर्चा बटोरी थी। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक महाराष्ट्र के अमरावती जा रहे एक ट्रक को नर्मदापुरम जिले के सिवनी मालवा क्षेत्र के बराखड़ गांव के पास रोक लिया गया था। ट्रक में करीब 30 मवेशी मौजूद थे। इसके बाद मौके पर ग्रामीणों और गो-रक्षकों की भीड़ जमा हो गई। आरोप है कि भीड़ ने ट्रक में सवार तीन लोगों के साथ लाठी-डंडों से मारपीट की, जिसमें नाजिर अहमद की मौत हो गई थी। इस मामले की सुनवाई अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान की अदालत में चल रही थी। सुनवाई पूरी होने के बाद 12 जून को अदालत ने 14 आरोपियों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। फैसले के बाद न्यायालय परिसर का माहौल भी तनावपूर्ण हो गया था। बताया गया कि जब पुलिस दोषियों को जेल ले जाने की प्रक्रिया पूरी कर रही थी, उसी दौरान अदालत परिसर में हंगामा हुआ और सुरक्षा व्यवस्था बढ़ानी पड़ी।</p>
<p style="text-align:justify;">फैसले के कुछ समय बाद ही सोशल मीडिया पर महिला न्यायिक अधिकारी को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां सामने आने लगीं। अधिकारियों के अनुसार कई प्लेटफॉर्म पर सांप्रदायिक माहौल बनाने की कोशिश करते हुए न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया। कुछ पोस्ट में जान से मारने की धमकियां भी दी गईं। मामला सामने आने के बाद पुलिस ने दो फेसबुक उपयोगकर्ताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और आपत्तिजनक सामग्री हटाने की प्रक्रिया भी शुरू की। हालांकि लगातार सामने आ रहे संदेशों और धमकियों को देखते हुए न्यायिक अधिकारी की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई। न्यायपालिका से जुड़े कई लोगों ने भी इस तरह की घटनाओं को गंभीर बताते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की। इसी दौरान वर्ष 2016 से लंबित न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस पूरे मामले का स्वतः संज्ञान लिया। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी। अदालत ने कहा कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी को न्यायिक दायित्व निभाने के कारण धमकियां मिलती हैं तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि पूरी न्यायिक व्यवस्था की सुरक्षा और स्वतंत्रता से जुड़ा विषय है। ऐसे मामलों में राज्य की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता प्रशांत सिंह और उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने अदालत को बताया कि महिला न्यायिक अधिकारी को 1-5 श्रेणी की सशस्त्र सुरक्षा उपलब्ध करा दी गई है। इसके अलावा सोशल मीडिया पर प्रसारित आपत्तिजनक पोस्ट और धमकी भरे संदेशों को हटाने के लिए संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय किया जा रहा है। पुलिस की ओर से मामले की जांच जारी है और जिन लोगों की पहचान हुई है, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है। अदालत ने इन जानकारियों को रिकॉर्ड पर लिया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि केवल मौखिक जानकारी पर्याप्त नहीं होगी। इसलिए गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को शपथपत्र के माध्यम से यह बताना होगा कि सुरक्षा के लिए अब तक कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं और भविष्य में क्या व्यवस्था की गई है। हाईकोर्ट ने अपने निर्देशों में यह भी संकेत दिया कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि न्यायाधीश कानून के अनुसार स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय देते हैं। यदि फैसलों के बाद उन्हें धमकियों का सामना करना पड़े और पर्याप्त सुरक्षा न मिले तो इसका असर न्यायिक व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। इसलिए ऐसे मामलों में राज्य सरकार को संवेदनशीलता और तत्परता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए। अदालत अब 9 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई में सरकार की ओर से दाखिल शपथपत्र का परीक्षण करेगी। माना जा रहा है कि इस सुनवाई में न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर आगे के निर्देश भी जारी किए जा सकते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 13:40:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>खनन डिफॉल्टरों को दोबारा लीज देने पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से मांगा जवाब</title>
                                    <description><![CDATA[ग्वालियर हाईकोर्ट ने अवैध खनन से जुड़े बकायेदारों को नई और नवीनीकृत खनन लीज दिए जाने पर राज्य सरकार से जवाब तलब किया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-strictly-seeks-response-from-government-on-re-granting-lease/article-57408"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mp-mining-case.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">मध्य प्रदेश में अवैध खनन और उससे जुड़े कथित घोटालों को लेकर ग्वालियर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में पूछा है कि जिन खनन संचालकों पर करोड़ों रुपये की पेनल्टी बकाया है, उनसे अब तक वसूली क्यों नहीं की गई और आखिर उन्हें दोबारा खनन लीज किस आधार पर दे दी गई। अदालत की यह टिप्पणी उस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें आरोप लगाया गया है कि खनिज विभाग की लापरवाही और कथित मिलीभगत के कारण अवैध खनन करने वाले कई प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा, जिसे अदालत ने स्वीकार करते हुए एक सप्ताह की मोहलत दी है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 6 जुलाई 2026 को होगी। यह मामला उस समय और गंभीर हो गया जब याचिका में दावा किया गया कि ग्वालियर जिले में खनन से जुड़े कई डिफॉल्टरों पर करीब 305 करोड़ 97 लाख रुपये की पेनल्टी वर्षों से बकाया है। बताया गया कि यह राशि वर्ष 2017 से लंबित है, लेकिन संबंधित विभाग अब तक इसकी वसूली नहीं कर पाया। याचिकाकर्ता का कहना है कि नियमों के अनुसार यदि कोई खदान संचालक जुर्माना जमा नहीं करता तो उसे ब्लैकलिस्ट किया जाना चाहिए और उसकी खनन गतिविधियों पर रोक लगनी चाहिए। इसके बावजूद न केवल कार्रवाई नहीं की गई, बल्कि कई मामलों में उन्हीं लोगों को फिर से खनन की अनुमति भी दे दी गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने इसी पहलू पर सरकार से जवाब मांगा। न्यायालय ने जानना चाहा कि जब बकाया राशि इतनी बड़ी है और सरकारी खजाने का नुकसान स्पष्ट रूप से सामने है, तब जिम्मेदार विभाग ने वसूली के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए। अदालत के सवाल इस बात की ओर भी संकेत करते हैं कि यदि नियमों का पालन नहीं किया गया तो इससे शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। फिलहाल अदालत ने सरकार को अपना विस्तृत पक्ष रखने का अवसर दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि जिन लोगों पर पहले से भारी जुर्माना बकाया था, उनकी पुरानी खदानों का नवीनीकरण कर दिया गया। इतना ही नहीं, कुछ मामलों में उन्हें नई जगहों पर भी खनन लीज आवंटित कर दी गई। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह फैसला नियमों की भावना के विपरीत है और इससे यह संदेश जाता है कि बकाया राशि जमा किए बिना भी खनन का काम जारी रखा जा सकता है। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह प्रशासनिक जवाबदेही और खनन व्यवस्था दोनों के लिए बड़ा सवाल बन सकता है। मामले में पर्यावरणीय नुकसान का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है। याचिका के अनुसार ग्वालियर जिले के बिलौआ और बेरजा क्षेत्र में लंबे समय से बड़े पैमाने पर काले पत्थर का खनन किया जा रहा है। आरोप है कि कई स्थानों पर तय मानकों से कहीं अधिक गहराई तक खुदाई की गई, जिससे जमीन बड़े-बड़े गड्ढों में बदल गई। बताया गया कि कुछ इलाकों में लगभग 25 से 30 मीटर यानी करीब 100 फीट तक खुदाई की गई है। इससे न केवल प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हुआ बल्कि आसपास के क्षेत्र में पर्यावरणीय जोखिम भी बढ़ा है। स्थानीय स्तर पर ऐसे मामलों को लेकर पहले भी चिंता जताई जाती रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd">याचिका में यह भी कहा गया है कि पूर्व में खनिज विभाग की जांच में बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन की पुष्टि हुई थी। जांच में यह सामने आया कि कई हजार घनमीटर मूल्यवान काला पत्थर बिना वैध अनुमति के निकाला गया और बाजार में बेचा गया। आरोप है कि इससे जो राजस्व सरकार को मिलना चाहिए था, वह सरकारी खजाने तक पहुंचने के बजाय अवैध रूप से निजी हाथों में चला गया। इसी आधार पर संबंधित संचालकों पर करोड़ों रुपये की पेनल्टी लगाई गई थी, लेकिन वर्षों बाद भी उसकी वसूली अधूरी है। खनन से जुड़े मामलों में समय-समय पर नियमों के पालन और पर्यावरण संरक्षण को लेकर अदालतें सख्त रुख अपनाती रही हैं। अवैध खनन केवल सरकारी राजस्व को प्रभावित नहीं करता, बल्कि इससे प्राकृतिक संसाधनों का नुकसान, भूजल स्तर पर असर और स्थानीय पर्यावरण को भी गंभीर क्षति पहुंचती है। ऐसे मामलों में नियामक एजेंसियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि नियमों का प्रभावी पालन ही अवैध गतिविधियों पर रोक लगा सकता है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह केवल औपचारिक जवाब से संतुष्ट नहीं होगी, बल्कि यह भी देखेगी कि बकाया राशि की वसूली, लीज आवंटन की प्रक्रिया और नियमों के पालन को लेकर सरकार का पक्ष कितना ठोस है। यदि अदालत को जवाब संतोषजनक नहीं लगता, तो आगे और सख्त निर्देश भी दिए जा सकते हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 14:16:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मॉब लिंचिंग केस में उम्रकैद के बाद जज को धमकी, वीडियो वायरल</title>
                                    <description><![CDATA[14 दोषियों को उम्रकैद सुनाने वाली एडीजे तबस्सुम खान को सोशल मीडिया पर जान से मारने की धमकी, वीडियो वायरल के बाद पुलिस और साइबर सेल जांच में जुटी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/threat-to-judge-after-life-imprisonment-in-mob-lynching-case/article-57086"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mob-lynching-case.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश के नर्मदापुरम जिले में मॉब लिंचिंग केस में 14 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाने के बाद एडीजे तबस्सुम खान को जान से मारने की धमकी मिलने का मामला सामने आया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में एक युवक और एक महिला की ओर से कथित तौर पर आपत्तिजनक और धमकी भरी बातें कही गईं, जिसके बाद पूरे मामले ने तूल पकड़ लिया है। पुलिस ने इसे गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू कर दी है और साइबर सेल भी सक्रिय हो गई है। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में एक युवक खुद को हिंदू भाइयों के समर्थन में बताते हुए कथित तौर पर जज पर गंभीर आरोप लगाता दिख रहा है। वीडियो में वह कहता है कि अगर निर्धारित समय में कुछ लोगों को रिहा नहीं किया गया तो बड़े स्तर पर हिंसा जैसी स्थिति बन सकती है। वहीं एक अन्य वीडियो में एक महिला भी जज के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करती नजर आती है। इन वीडियो के वायरल होने के बाद राजनीतिक हलकों में भी प्रतिक्रिया शुरू हो गई है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि दोषियों को धर्म के आधार पर नहीं बल्कि अदालत में साबित अपराध के आधार पर सजा मिली है और इस तरह की धमकियां कानून के खिलाफ हैं। प्रशासन की ओर से भी कहा गया है कि साइबर सेल वीडियो की जांच कर रही है और आरोपियों की पहचान की कोशिश की जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह पूरा मामला मध्यप्रदेश के सिवनी मालवा क्षेत्र से जुड़ा हुआ है, जहां अगस्त 2022 में कथित तौर पर गो-तस्करी के शक में एक ट्रक को रोका गया था। ट्रक में करीब 30 मवेशी होने की बात सामने आई थी और इसी दौरान भीड़ ने उसमें सवार तीन लोगों पर हमला कर दिया था। इस घटना में एक व्यक्ति नाजिर अहमद की मौत हो गई थी, जबकि दो अन्य गंभीर रूप से घायल हुए थे। बाद में इस मामले की जांच पुलिस और अदालत के स्तर पर आगे बढ़ी और लंबे ट्रायल के बाद 14 आरोपियों को दोषी ठहराया गया। अदालत ने सभी को हत्या, हत्या के प्रयास, बलवा और अन्य गंभीर धाराओं में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। फैसले के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं और इसी बीच कथित तौर पर धमकी भरे वीडियो भी वायरल हो गए। पुलिस का कहना है कि मामला संज्ञान में आते ही साइबर सेल को सक्रिय किया गया और दो अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है। अधिकारियों के अनुसार वीडियो की सत्यता और उसमें शामिल लोगों की पहचान की जा रही है। अभी तक जज की ओर से कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है, लेकिन पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामला दर्ज किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम ने इलाके में माहौल को भी कुछ हद तक तनावपूर्ण बना दिया है, हालांकि प्रशासन की ओर से लगातार शांति बनाए रखने की अपील की जा रही है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी न्यायिक अधिकारी पर इस तरह की धमकी देना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है और इसके लिए सख्त कार्रवाई संभव है। वहीं स्थानीय स्तर पर पुलिस गश्त भी बढ़ा दी गई है ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से बचा जा सके। पुलिस और साइबर सेल इस पूरे मामले की डिजिटल ट्रैकिंग में जुटी है और यह भी देखा जा रहा है कि वीडियो किस प्लेटफॉर्म से सबसे पहले अपलोड हुआ था। शुरुआती जांच में यह बात सामने आई है कि वीडियो को कई अकाउंट्स से शेयर किया गया, जिससे यह तेजी से वायरल हुआ। अधिकारियों का मानना है कि सोशल मीडिया पर इस तरह की भड़काऊ सामग्री पर रोक लगाना जरूरी है ताकि न्यायिक प्रक्रिया पर कोई असर न पड़े। फिलहाल पूरा मामला जांच के दायरे में है और पुलिस आगे की कार्रवाई सबूतों के आधार पर करेगी। स्थानीय लोगों के बीच इस घटना को लेकर चर्चा तेज है और सोशल मीडिया पर भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। प्रशासन का कहना है कि कानून व्यवस्था बनाए रखना प्राथमिकता है और किसी भी तरह की अफवाह या भड़काऊ संदेश पर सख्त निगरानी रखी जा रही है। अधिकारियों के अनुसार मामले में तकनीकी साक्ष्य, कॉल डिटेल्स और डिजिटल फुटप्रिंट्स की भी जांच की जा रही है ताकि पूरी साजिश या वायरल नेटवर्क का पता लगाया जा सके। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि किसी भी अनवेरिफाइड वीडियो या संदेश को शेयर करने से बचें और कानून पर भरोसा रखें। मामले में आगे की कार्रवाई कोर्ट और जांच एजेंसियों के निष्कर्ष पर निर्भर करेगी और पुलिस का कहना है कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 27 Jun 2026 11:52:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सोनम रघुवंशी की जमानत पर फैसला सुरक्षित, हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी</title>
                                    <description><![CDATA[राजा रघुवंशी हत्याकांड में मेघालय सरकार ने जमानत रद्द करने की मांग की, दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद शिलांग हाई कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रखा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/decision-on-sonam-raghuvanshis-bail-reserved-hearing-completed-in-high/article-55612"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/sonam-raghuvanshi-bail.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इंदौर निवासी राजा रघुवंशी की मेघालय में हुई चर्चित हत्या के मामले में मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी की जमानत को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई अब अहम मोड़ पर पहुंच गई है। शिलांग उच्च न्यायालय ने मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब सभी की नजर अदालत के अंतिम आदेश पर टिकी है, जिससे यह तय होगा कि सोनम रघुवंशी को मिली जमानत बरकरार रहेगी या फिर उन्हें दोबारा जेल जाना पड़ेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह मामला पिछले कई महीनों से लगातार चर्चा में बना हुआ है। राजा रघुवंशी की हत्या के बाद मेघालय पुलिस ने जांच शुरू की थी और जांच के दौरान सोनम रघुवंशी को मुख्य आरोपियों में शामिल किया गया। मामले की गंभीरता और इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं के कारण यह केस लगातार सुर्खियों में बना रहा। बाद में जब मामला अदालत पहुंचा तो शिलांग की जिला अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और प्रस्तुत तर्कों के आधार पर सोनम रघुवंशी को जमानत दे दी थी। जिला अदालत के इस फैसले के बाद सोनम रघुवंशी को जेल से रिहा कर दिया गया था। हालांकि यह फैसला मेघालय सरकार को स्वीकार नहीं था। सरकार का मानना था कि मामले की प्रकृति और जांच से जुड़े तथ्यों को देखते हुए जमानत देना उचित नहीं है। इसी आधार पर राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर जिला अदालत के आदेश को चुनौती दी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से कहा गया कि हत्या जैसे गंभीर मामले में आरोपों की प्रकृति को ध्यान में रखा जाना चाहिए। सरकारी पक्ष ने अदालत को बताया कि जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं और मामले की पूरी पड़ताल अभी भी महत्वपूर्ण है। सरकार का तर्क था कि ऐसे मामलों में आरोपी को जमानत पर रहने देना जांच प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। दूसरी ओर, सोनम रघुवंशी की ओर से पेश वकीलों ने जिला अदालत के फैसले का समर्थन किया। बचाव पक्ष का कहना था कि निचली अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों और तथ्यों का अध्ययन करने के बाद ही जमानत देने का निर्णय लिया था। उन्होंने यह भी कहा कि जमानत किसी व्यक्ति को दोषमुक्त घोषित नहीं करती, बल्कि यह केवल मुकदमे की सुनवाई पूरी होने तक दी गई एक कानूनी राहत है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान अदालत में जांच से जुड़े दस्तावेजों, गवाहों के बयानों और विभिन्न कानूनी बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्कों को मजबूती से रखा। अदालत ने कई महत्वपूर्ण सवाल भी पूछे और जांच एजेंसियों द्वारा प्रस्तुत तथ्यों का अवलोकन किया। बताया जा रहा है कि 5 जून से इस मामले में लगातार सुनवाई चल रही थी। हर सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले के विभिन्न पहलुओं को समझने का प्रयास किया। अदालत का फैसला इस केस की आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राजा रघुवंशी हत्याकांड पहले ही काफी संवेदनशील माना जा रहा है। मामले से जुड़े घटनाक्रमों पर लगातार लोगों की नजर बनी हुई है। इंदौर और मेघालय दोनों जगह इस केस को लेकर चर्चा होती रही है। मृतक के परिजनों ने भी पहले कई बार निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की मांग की थी। जमानत रद्द करने के मामलों में अदालत केवल आरोपों की गंभीरता ही नहीं देखती, बल्कि यह भी परखती है कि क्या आरोपी के बाहर रहने से जांच, गवाहों या न्यायिक प्रक्रिया पर कोई प्रभाव पड़ सकता है। इसी आधार पर अदालत अपना निर्णय देती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस बीच अदालत के फैसले का इंतजार बढ़ गया है। यदि हाई कोर्ट मेघालय सरकार की अपील स्वीकार कर लेता है तो सोनम रघुवंशी की जमानत निरस्त हो सकती है और उन्हें दोबारा हिरासत में जाना पड़ सकता है। वहीं यदि अदालत जिला अदालत के आदेश को सही मानती है तो उनकी जमानत बरकरार रहेगी। मामले में किसी भी तरह की अटकलों से बचने की सलाह दी जा रही है। सभी पक्ष अब उच्च न्यायालय के अंतिम आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अदालत का फैसला आने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि आगे की कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 13:10:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ट्विशा शर्मा मौत मामले में भोपाल कोर्ट में हाई वोल्टेज ड्रामा, पूर्व जज गिरिबाला सिंह और बेटे को 14 दिन की जेल</title>
                                    <description><![CDATA[सुनवाई के दौरान कोर्ट में तीखी बहस, आरोप-प्रत्यारोप और तनावपूर्ण माहौल ने खींचा सबका ध्यान]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/6a1fd229bd318/article-54836"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/twisha-sharma-case-new-update-.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भोपाल में चर्चित ट्विशा शर्मा मौत मामले की सुनवाई बुधवार को उस समय सुर्खियों में आ गई जब अदालत परिसर के भीतर अभूतपूर्व घटनाक्रम देखने को मिला। मामले में आरोपी पूर्व जज गिरिबाला सिंह और उनके बेटे समर्थ सिंह को अदालत ने 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेजने का आदेश दिया। सीबीआई द्वारा पुलिस रिमांड समाप्त होने के बाद दोनों आरोपियों को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में मौजूद लोगों ने एक ऐसा माहौल देखा, जहां कानूनी दलीलों के साथ-साथ तीखे आरोप, भावनात्मक प्रतिक्रियाएं और तनावपूर्ण बहसें भी सामने आईं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ट्विशा शर्मा मौत मामला पिछले कुछ समय से प्रदेश के सबसे चर्चित मामलों में शामिल रहा है। मामले की जांच सीबीआई के हाथ में है और एजेंसी लगातार विभिन्न पहलुओं की जांच कर रही है। इसी सिलसिले में आरोपी गिरिबाला सिंह और उनके बेटे समर्थ सिंह को अदालत में पेश किया गया था। सुनवाई शुरू होते ही अदालत कक्ष में असामान्य स्थिति बन गई। बड़ी संख्या में अधिवक्ता, पक्षकार और अन्य लोग कार्यवाही को देखने के लिए मौजूद थे।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा उस समय हुई जब सेवानिवृत्त जज गिरिबाला सिंह स्वयं अपनी पैरवी के लिए खड़ी हो गईं। उन्होंने अदालत के सामने अपनी बात रखते हुए कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए। अदालत कक्ष में मौजूद लोगों के अनुसार उनका पक्ष रखने का अंदाज बेहद आत्मविश्वासपूर्ण और मुखर था। उन्होंने कई बिंदुओं पर विस्तार से अपनी बात रखी और विपक्षी पक्ष के आरोपों का जवाब देने की कोशिश की।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कार्यवाही के दौरान गिरिबाला सिंह ने विपक्षी पक्ष के अधिवक्ता अनुराग श्रीवास्तव पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि जबलपुर हाईकोर्ट परिसर में उनके बेटे समर्थ सिंह के साथ दुर्व्यवहार और मारपीट की गई थी। इस आरोप के बाद अदालत कक्ष का माहौल और अधिक गर्म हो गया। विपक्षी पक्ष ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यदि ऐसा कोई घटनाक्रम हुआ है तो संबंधित परिसर के सीसीटीवी फुटेज की जांच कराई जानी चाहिए, जिससे वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुनवाई आगे बढ़ी तो दोनों पक्षों के बीच बहस और अधिक तीखी हो गई। कई मौकों पर अदालत को हस्तक्षेप कर कार्यवाही को व्यवस्थित बनाए रखना पड़ा। उपस्थित लोगों के अनुसार दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों को लेकर पूरी तरह आक्रामक नजर आए। हालांकि अदालत की मौजूदगी में स्थिति नियंत्रण में रही, लेकिन कुछ समय के लिए माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया कि हाथापाई जैसी स्थिति बनने की चर्चा भी सामने आई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मामले के दौरान एक और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया। विपक्षी पक्ष की ओर से सवाल किया गया कि समर्थ सिंह, जिनकी गिरफ्तारी को लेकर जांच एजेंसियां सक्रिय थीं और जिन पर इनाम भी घोषित किया गया था, उन्हें कथित रूप से एक न्यायिक परिसर में शरण कैसे मिली। इस सवाल ने सुनवाई को नया मोड़ दे दिया। अदालत में इस विषय पर भी लंबी बहस हुई और मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की गई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वहीं बचाव पक्ष ने इस आरोप का जवाब देते हुए कहा कि किसी भी नागरिक को अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि मामले से जुड़े कई तथ्यों को एकतरफा तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है और पूरी सच्चाई सामने आने के बाद स्थिति स्पष्ट होगी। बचाव पक्ष ने अदालत से निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाने की अपील भी की।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ट्विशा शर्मा मौत मामले को लेकर प्रदेशभर में लोगों की नजरें लगातार अदालत की कार्यवाही पर बनी हुई हैं। मामले में हर सुनवाई के बाद नए तथ्य और नए सवाल सामने आ रहे हैं। बुधवार की सुनवाई भी इसी वजह से काफी चर्चाओं में रही।  किसी भी संवेदनशील मामले में अदालत की कार्यवाही के दौरान सभी पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा अधिकार होता है। हालांकि अदालत का मुख्य उद्देश्य तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय तक पहुंचना होता है। ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों की रिपोर्ट, गवाहों के बयान और उपलब्ध दस्तावेज महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस बीच अदालत ने दोनों आरोपियों को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया है। इसके बाद मामले की अगली सुनवाई निर्धारित तिथि पर होगी। जांच एजेंसियां भी अपने स्तर पर मामले से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जांच जारी रखे हुए हैं। आने वाले दिनों में इस मामले में और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आने की संभावना जताई जा रही है। बुधवार की सुनवाई ने पूरे मामले को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। अदालत में हुई तीखी बहस, गंभीर आरोपों और तनावपूर्ण माहौल ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। अब सभी की निगाहें अगली सुनवाई और जांच की प्रगति पर टिकी हुई हैं, जहां इस चर्चित मामले में नए घटनाक्रम सामने आ सकते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 13:33:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ट्विशा शर्मा केस में सास गिरिबाला सिंह को झटका, हाईकोर्ट ने रद्द की अग्रिम जमानत</title>
                                    <description><![CDATA[जबलपुर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही परीक्षण नहीं किया]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/e/article-54393"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/twisha-sharma-case-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ट्विशा शर्मा मौत मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए मृतका की सास और पूर्व न्यायाधीश गिरिबाला सिंह को दी गई अग्रिम जमानत रद्द कर दी है। जबलपुर हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए कहा कि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और केस डायरी का पर्याप्त परीक्षण किए बिना जल्दबाजी में राहत दे दी थी। कोर्ट ने साफ कहा कि मामले की गंभीरता, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, गवाहों के बयान और जांच की स्थिति को देखते हुए आरोपी पक्ष को अग्रिम जमानत देना उचित नहीं था।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हाईकोर्ट के जस्टिस देव नारायण मिश्रा की एकलपीठ ने यह आदेश सुनाया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अग्रिम जमानत रद्द करने के लिए ठोस और गंभीर कारण होना जरूरी होता है और इस मामले में ऐसे कारण स्पष्ट रूप से मौजूद हैं। कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद कई महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज किया, जिसके चलते जमानत आदेश कानूनी रूप से कमजोर हो गया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मामला भोपाल निवासी ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत से जुड़ा है। परिवार की ओर से आरोप लगाए गए थे कि शादी के बाद से ही ट्विशा को दहेज और अन्य मुद्दों को लेकर प्रताड़ित किया जा रहा था। परिवार का दावा है कि पति और सास की ओर से लगातार मानसिक दबाव बनाया जाता था। मामले में यह आरोप भी सामने आया कि ट्विशा पर गर्भपात कराने का दबाव डाला जा रहा था। इन आरोपों के समर्थन में व्हाट्सऐप चैट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जांच एजेंसियों को सौंपे गए हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि मृतका के शरीर पर फांसी के अलावा अन्य चोटों के निशान भी पाए गए थे। अदालत ने माना कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार ये चोटें केवल शव को नीचे उतारने के दौरान नहीं आई थीं। कोर्ट ने इसे मामले का महत्वपूर्ण पहलू बताते हुए कहा कि पूरी घटना की गहन और निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है। अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी पक्ष इन चोटों के संबंध में संतोषजनक जवाब देने में असफल रहा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अदालत ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि आरोपी पक्ष ने जांच में पूरा सहयोग नहीं किया। कोर्ट के अनुसार मामले से जुड़े कुछ व्यवहार ऐसे थे, जिनसे जांच प्रभावित होने की आशंका पैदा होती है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मीडिया में बयान देकर मृतका की छवि खराब करने की कोशिश की गई, जिसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि इस तरह की गतिविधियां जांच को प्रभावित कर सकती हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अब मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI को सौंप दी गई है। ऐसे में जांच एजेंसी को पक्षकार बनाए जाने की आवश्यकता है ताकि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जा सके। अदालत ने माना कि मामले की संवेदनशीलता और आरोपियों की प्रभावशाली पृष्ठभूमि को देखते हुए जांच एजेंसी को स्वतंत्र तरीके से काम करने देना जरूरी है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश पर भी सवाल उठाए। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने यह मान लिया था कि केवल विवाह के सात साल के भीतर हुई मौत के आधार पर अग्रिम जमानत खारिज नहीं की जा सकती। निचली अदालत ने यह भी माना था कि आरोपी पक्ष ट्विशा के खाते में पैसे भेजता था और व्हाट्सऐप चैट्स में मुख्य शिकायत पति के खिलाफ दिखाई देती है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर जमानत दी गई थी। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों की गहराई से जांच करने पर तस्वीर अलग दिखाई देती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मामले में CBI और राज्य सरकार की ओर से भी अदालत में कई महत्वपूर्ण दलीलें पेश की गईं। जांच एजेंसियों ने कहा कि ट्विशा गर्भवती थी और इसी दौरान पति तथा सास ने उसके चरित्र पर संदेह जताना शुरू किया। आरोप है कि उस पर गर्भपात कराने का दबाव बनाया गया, जिसका जिक्र व्हाट्सऐप चैट्स में भी मिलता है। जांच एजेंसियों ने यह भी कहा कि ट्विशा लगातार अपने परिवार को मानसिक प्रताड़ना की जानकारी देती रही थी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सरकार की ओर से अदालत में यह तर्क भी रखा गया कि आरोपी प्रभावशाली हैं और उन्हें राहत मिलने पर जांच प्रभावित हो सकती है। ऐसे मामलों में हिरासत में पूछताछ जरूरी होती है ताकि पूरे घटनाक्रम की सच्चाई सामने आ सके। हाईकोर्ट ने इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि मामले की जांच अभी प्रारंभिक और महत्वपूर्ण चरण में है, इसलिए आरोपियों को अग्रिम राहत देना उचित नहीं माना जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">अपने अंतिम आदेश में हाईकोर्ट ने 15 मई 2026 को भोपाल की 10वीं अतिरिक्त सत्र अदालत द्वारा दिया गया अग्रिम जमानत आदेश निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य, मामले की गंभीरता और जांच की वर्तमान स्थिति को देखते हुए आरोपी पक्ष को राहत देना न्यायसंगत नहीं था। इस फैसले के बाद अब मामले की जांच और तेज होने की संभावना है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 28 May 2026 11:53:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मालेगांव ब्लास्ट केस में हाईकोर्ट ने ट्रायल रोका, 4 आरोपियों को राहत</title>
                                    <description><![CDATA[मालेगांव ब्लास्ट केस में बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, ठोस सबूत के अभाव में ट्रायल पर रोक हाईकोर्ट के इस फैसले ने लंबे समय से चल रहे इस संवेदनशील मामले को फिर से चर्चा में ला दिया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-stops-trial-in-malegaon-blast-case-relief-to/article-51901"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/mp-news-(62).jpg" alt=""></a><br /><p>मालेगांव ब्लास्ट केस में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी है। यह फैसला उन चार आरोपियों के लिए राहत लेकर आया है, जिन पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने आरोप तय किए थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के किसी भी आपराधिक मामले को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। कोर्ट ने माना कि जिस बयान के आधार पर मामला दर्ज किया गया था, वह बाद में वापस ले लिया गया था, ऐसे में उस पर आधारित आरोपों की वैधता पर गंभीर सवाल उठते हैं। इस आदेश के बाद फिलहाल मामले की सुनवाई स्थगित कर दी गई है, जिससे जांच एजेंसियों की प्रक्रिया और साक्ष्यों की गुणवत्ता पर बहस तेज हो गई है।</p>
<p>अधिकारियों के अनुसार, यह मामला 2006 के मालेगांव धमाकों से जुड़ा है, जिसमें चार लोगों को आरोपी बनाया गया था। इन आरोपियों में मध्यप्रदेश के महू और देपालपुर के निवासी भी शामिल हैं।</p>
<p>राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने अपनी चार्जशीट में इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई का आधार एक कथित स्वीकारोक्ति बयान को बताया था। यह बयान 2010 में सामने आया था, जिसमें कुछ लोगों की संलिप्तता का जिक्र किया गया था।हालांकि, बाद में संबंधित व्यक्ति ने अदालत में यह बयान वापस लेते हुए कहा था कि इसे दबाव में दिलवाया गया था।</p>
<h5><strong>सबूतों पर सवाल</strong></h5>
<p>सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी कि मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं है और न ही ऐसे ठोस साक्ष्य हैं, जो आरोपियों को सीधे तौर पर घटना से जोड़ते हों।</p>
<p>कोर्ट ने इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर ही आगे बढ़ाया जा सकता है।</p>
<p>8 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के मालेगांव शहर में सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। ये धमाके धार्मिक स्थलों के पास हुए, जिससे देशभर में तनाव का माहौल बन गया था। इस घटना में 31 लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे।</p>
<p>शुरुआत में जांच एजेंसियों ने अलग दिशा में कार्रवाई की थी, लेकिन बाद में जांच कई बार अलग-अलग एजेंसियों को सौंपी गई। अंततः यह मामला राष्ट्रीय जांच एजेंसी के पास पहुंचा।</p>
<p>रिपोर्ट्स के अनुसार, आरोपियों को 2013 में गिरफ्तार किया गया था और वे कई वर्षों तक जेल में रहे। बाद में उन्हें जमानत मिल गई थी।सितंबर 2025 में विशेष अदालत ने उनके खिलाफ आरोप तय किए थे, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।</p>
<p>इस फैसले का असर न केवल इस मामले पर पड़ेगा, बल्कि अन्य मामलों में भी जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो सकते हैं।अब इस मामले में आगे की सुनवाई हाईकोर्ट के अगले आदेशों पर निर्भर करेगी। जांच एजेंसियों को अपने साक्ष्यों को मजबूत करने या नए सिरे से समीक्षा करने की आवश्यकता पड़ सकती है।</p>
<p>मालेगांव ब्लास्ट केस से जुड़ा यह फैसला आने वाले समय में न्यायिक प्रक्रिया और जांच प्रणाली दोनों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 11:57:53 +0530</pubDate>
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