<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.dainikjagranmpcg.com/judiciary-news/tag-10953" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>दैनिक जागरण RSS Feed Generator</generator>
                <title>Judiciary News - दैनिक जागरण</title>
                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/tag/10953/rss</link>
                <description>Judiciary News RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>भरण-पोषण मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पत्नी जहां रहेगी वहीं होगी सुनवाई</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी जहां वर्तमान में रह रही है, वहीं की फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण का मामला दायर करने का अधिकार रखती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/big-decision-of-high-court-in-maintenance-case-hearing-will/article-55091"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐसा फैसला सुनाया है, जिसका असर भविष्य में इसी तरह के कई मामलों पर पड़ सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला अपने वर्तमान निवास स्थान पर रह रही है, तो उसे वहीं की सक्षम अदालत में भरण-पोषण का दावा पेश करने का अधिकार है। केवल इस आधार पर कि उसका स्थायी पता या पैतृक घर किसी दूसरे जिले में है, अदालत के अधिकार क्षेत्र को चुनौती नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट के इस फैसले के साथ ही एक डॉक्टर पति की ओर से दायर पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई।</p>
<p class="isSelectedEnd">मामला सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के एक डॉक्टर और उनकी पत्नी से जुड़ा है। दोनों का विवाह 16 मई 2019 को हुआ था। विवाह के बाद उनके परिवार में दो बेटियों का जन्म हुआ। कुछ समय बाद पति-पत्नी के संबंधों में विवाद शुरू हो गया। पत्नी ने आरोप लगाया कि विवाह के बाद उसे दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया। इसके अलावा उसने अपने पति पर गंभीर व्यक्तिगत आरोप भी लगाए। इन परिस्थितियों के बाद दोनों अलग-अलग रहने लगे और मामला कानूनी विवाद तक पहुंच गया।</p>
<p class="isSelectedEnd">पत्नी ने बिलासपुर स्थित फैमिली कोर्ट में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 के तहत भरण-पोषण के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। अपने आवेदन में उसने कहा कि उसके पास आय का कोई स्थायी साधन नहीं है और दोनों नाबालिग बेटियां उसकी देखरेख में रह रही हैं। उसने अदालत से अपने लिए एक लाख रुपए प्रतिमाह तथा दोनों बेटियों के लिए 20-20 हजार रुपए प्रतिमाह भरण-पोषण राशि देने की मांग की। इस प्रकार कुल 1 लाख 40 हजार रुपए मासिक भरण-पोषण की मांग अदालत के समक्ष रखी गई।</p>
<p class="isSelectedEnd">दूसरी ओर डॉक्टर पति ने इस आवेदन का विरोध किया। उन्होंने फैमिली कोर्ट में क्षेत्राधिकार को लेकर आपत्ति दर्ज कराई। उनका कहना था कि विवाह सारंगढ़ में हुआ था और पत्नी का स्थायी निवास भी वहीं है। इसलिए बिलासपुर की फैमिली कोर्ट को इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है। पति ने यह भी तर्क दिया कि आवेदन दाखिल किए जाने के समय दोनों बच्चियां सारंगढ़ में पढ़ाई कर रही थीं और केवल किरायानामा प्रस्तुत कर बिलासपुर में मामला दर्ज कराया गया है। उन्होंने स्वयं को पोलियो से प्रभावित दिव्यांग बताते हुए यह भी कहा कि पत्नी उन्हें परेशान करने की नीयत से बिलासपुर में मामला चला रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd">पत्नी ने इन आरोपों का अदालत में विरोध किया। उसने कहा कि वह वर्तमान में बिलासपुर जिले के लगरा क्षेत्र में किराए के मकान में रह रही है। इसके समर्थन में उसने आवश्यक दस्तावेज भी प्रस्तुत किए। पत्नी ने यह भी बताया कि उसकी दोनों बेटियां अब बिलासपुर के एक निजी विद्यालय में पढ़ाई कर रही हैं और उनका पूरा जीवन वर्तमान में बिलासपुर से जुड़ा हुआ है। उसके अनुसार उसने किसी भी प्रकार का फर्जी दस्तावेज अदालत के सामने प्रस्तुत नहीं किया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पति की क्षेत्राधिकार संबंधी आपत्ति को खारिज कर दिया था। इसके बाद डॉक्टर पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी। मामले की सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति बीडी गुरु ने पूरे रिकॉर्ड और दस्तावेजों का अवलोकन किया।</p>
<p class="isSelectedEnd">हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पत्नी ने स्पष्ट रूप से बिलासपुर के लगरा क्षेत्र को अपना वर्तमान निवास बताया है और उसके समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज भी पेश किए हैं। अदालत ने माना कि यदि कोई व्यक्ति किसी स्थान पर वास्तविक रूप से निवास कर रहा है, तो उसे उस क्षेत्र की सक्षम अदालत में कानूनी राहत मांगने का अधिकार है। केवल इस वजह से कि उसका स्थायी पता किसी अन्य जिले में है, वर्तमान निवास वाले क्षेत्र की अदालत का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। अदालत ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या प्रक्रिया संबंधी खामी नजर नहीं आती। इसलिए हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने डॉक्टर पति की पुनरीक्षण याचिका प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट की कार्यवाही को जारी रखने का रास्ता साफ कर दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह फैसला महिलाओं और बच्चों से जुड़े भरण-पोषण मामलों में महत्वपूर्ण नजीर साबित हो सकता है। कई बार पति-पत्नी अलग-अलग स्थानों पर रहने लगते हैं और क्षेत्राधिकार को लेकर विवाद उत्पन्न हो जाता है। ऐसे मामलों में हाईकोर्ट की यह टिप्पणी स्पष्ट करती है कि वर्तमान निवास स्थान भी न्यायिक अधिकार क्षेत्र तय करने का महत्वपूर्ण आधार हो सकता है। इस फैसले के बाद बिलासपुर फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी। वहीं यह आदेश उन महिलाओं के लिए भी राहत का संदेश माना जा रहा है जो अलग रहने की स्थिति में अपने वर्तमान निवास स्थान से न्याय पाने की कोशिश करती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/big-decision-of-high-court-in-maintenance-case-hearing-will/article-55091</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/big-decision-of-high-court-in-maintenance-case-hearing-will/article-55091</guid>
                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 14:13:10 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-06/chhattisgarh-high-court.jpg"                         length="150896"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट सख्त, हाईकोर्ट को 3 महीने में फैसला सुनाने के निर्देश</title>
                                    <description><![CDATA[जमानत मामलों में देरी पर नाराजगी, सुप्रीम कोर्ट बोला- आदेश उसी दिन या अगले दिन जारी करें]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/supreme-court-gives-strict-instructions-to-the-high-court-to/article-54493"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/supreme-court-order.jpg" alt=""></a><br /><p dir="ltr" style="text-align:justify;">देशभर की अदालतों में लंबित मामलों और फैसलों में हो रही देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अहम निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी भी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसे अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए। अगर तय समय में फैसला नहीं आता है तो संबंधित हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को उस मामले की जानकारी चीफ जस्टिस के सामने रखनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर जमानत याचिकाओं में देरी पर चिंता जताई और कहा कि ऐसे मामलों में आदेश उसी दिन या अगले दिन सुनाया जाना चाहिए।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने यह टिप्पणी झारखंड से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की। मामले में आरोप लगाया गया था कि हाईकोर्ट में 2022 से फैसला सुरक्षित रखा गया है, लेकिन अब तक फैसला सुनाया नहीं गया। याचिकाकर्ताओं ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया था। उनका कहना था कि समय पर न्याय मिलना भी मौलिक अधिकार का हिस्सा है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान कुल 12 अहम दिशानिर्देश जारी किए। कोर्ट ने कहा कि जमानत, अग्रिम जमानत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में हाईकोर्ट को विशेष तेजी दिखानी चाहिए। अदालत ने कहा कि जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आदेश उसी दिन सुनाया और वेबसाइट पर अपलोड किया जाना चाहिए। यदि किसी कारणवश आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले दिन जारी करना अनिवार्य होगा।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत या सजा पर रोक से जुड़े आदेश की जानकारी तुरंत जेल प्रशासन तक पहुंचाई जाए ताकि आरोपी को उसी दिन या अगले दिन रिहा किया जा सके। हालांकि यह शर्त रहेगी कि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित न हो और उसने जमानत की शर्तों का उल्लंघन न किया हो। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि फैसलों में अनावश्यक देरी कई बार लोगों की स्वतंत्रता और न्याय प्रक्रिया दोनों को प्रभावित करती है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने अपने अनुभव भी साझा किए। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट जज के रूप में अपने 15 साल के कार्यकाल में उन्होंने कभी भी किसी मामले में फैसला लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा। उन्होंने कहा कि न्याय में देरी लोगों का भरोसा कमजोर करती है और इसे सामान्य प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। अदालत ने साफ कहा कि न्याय की कीमत पर देरी स्वीकार नहीं की जा सकती।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">कोर्ट ने हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए भी कई निर्देश दिए हैं। अब हर महीने हाईकोर्ट की वेबसाइट से एक ऑटोमैटिक ई-मेल संबंधित चीफ जस्टिस को भेजा जाएगा, जिसमें उन मामलों की जानकारी होगी जिनमें फैसला सुरक्षित रखा गया है। इसकी कॉपी संबंधित बेंच को भी भेजी जाएगी। यदि फैसले का ऑपरेटिव हिस्सा सुनाए जाने के 15 दिन बाद तक विस्तृत आदेश अपलोड नहीं होता है, तो रजिस्ट्रार जनरल को इसकी जानकारी चीफ जस्टिस को देनी होगी।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के तीन महीने बाद भी आदेश जारी नहीं होता है, तो संबंधित पक्षकार अदालत में आवेदन देकर फैसला सुनाने की मांग कर सकता है। ऐसे आवेदन पर दो दिन के भीतर सुनवाई करना जरूरी होगा। वहीं यदि तीन महीने और अतिरिक्त एक महीने यानी कुल चार महीने तक फैसला नहीं आता है, तो पक्षकार चीफ जस्टिस से मामले को दूसरी बेंच को सौंपने की मांग कर सकता है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">फैसलों की कॉपी और वेबसाइट पर जानकारी अपडेट करने को लेकर भी कोर्ट ने सख्त निर्देश दिए हैं। अब हर फैसले की सर्टिफाइड कॉपी में यह साफ लिखा जाएगा कि फैसला कब सुरक्षित रखा गया, कब सुनाया गया और वेबसाइट पर कब अपलोड हुआ। हाईकोर्ट की वेबसाइट पर भी यह जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अलावा फैसला अपलोड होते ही पक्षकारों और वकीलों को ई-मेल के जरिए सूचना भेजी जाएगी।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">यह पूरा मामला झारखंड हाईकोर्ट में लंबित एक आपराधिक अपील से जुड़ा था। अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़े चार दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि उनकी अपील वर्षों से लंबित है और फैसला सुरक्षित रखे जाने के बावजूद सुनाया नहीं गया। इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की न्यायिक व्यवस्था पर व्यापक टिप्पणी करते हुए ये दिशानिर्देश जारी किए।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि संविधान का अनुच्छेद 142 उसे विशेष अधिकार देता है, जिसके तहत अदालत पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए विशेष आदेश जारी कर सकती है। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता बेहद जरूरी है। देश में अदालतों में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट में ही इस समय 92 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं। वहीं देशभर की अदालतों में कुल लंबित मामलों का आंकड़ा करोड़ों में पहुंच चुका है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/supreme-court-gives-strict-instructions-to-the-high-court-to/article-54493</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/supreme-court-gives-strict-instructions-to-the-high-court-to/article-54493</guid>
                <pubDate>Fri, 29 May 2026 15:20:29 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-05/supreme-court-order.jpg"                         length="229408"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मालेगांव ब्लास्ट केस में हाईकोर्ट ने ट्रायल रोका, 4 आरोपियों को राहत</title>
                                    <description><![CDATA[मालेगांव ब्लास्ट केस में बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, ठोस सबूत के अभाव में ट्रायल पर रोक हाईकोर्ट के इस फैसले ने लंबे समय से चल रहे इस संवेदनशील मामले को फिर से चर्चा में ला दिया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-stops-trial-in-malegaon-blast-case-relief-to/article-51901"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/mp-news-(62).jpg" alt=""></a><br /><p>मालेगांव ब्लास्ट केस में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी है। यह फैसला उन चार आरोपियों के लिए राहत लेकर आया है, जिन पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने आरोप तय किए थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के किसी भी आपराधिक मामले को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। कोर्ट ने माना कि जिस बयान के आधार पर मामला दर्ज किया गया था, वह बाद में वापस ले लिया गया था, ऐसे में उस पर आधारित आरोपों की वैधता पर गंभीर सवाल उठते हैं। इस आदेश के बाद फिलहाल मामले की सुनवाई स्थगित कर दी गई है, जिससे जांच एजेंसियों की प्रक्रिया और साक्ष्यों की गुणवत्ता पर बहस तेज हो गई है।</p>
<p>अधिकारियों के अनुसार, यह मामला 2006 के मालेगांव धमाकों से जुड़ा है, जिसमें चार लोगों को आरोपी बनाया गया था। इन आरोपियों में मध्यप्रदेश के महू और देपालपुर के निवासी भी शामिल हैं।</p>
<p>राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने अपनी चार्जशीट में इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई का आधार एक कथित स्वीकारोक्ति बयान को बताया था। यह बयान 2010 में सामने आया था, जिसमें कुछ लोगों की संलिप्तता का जिक्र किया गया था।हालांकि, बाद में संबंधित व्यक्ति ने अदालत में यह बयान वापस लेते हुए कहा था कि इसे दबाव में दिलवाया गया था।</p>
<h5><strong>सबूतों पर सवाल</strong></h5>
<p>सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी कि मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं है और न ही ऐसे ठोस साक्ष्य हैं, जो आरोपियों को सीधे तौर पर घटना से जोड़ते हों।</p>
<p>कोर्ट ने इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर ही आगे बढ़ाया जा सकता है।</p>
<p>8 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के मालेगांव शहर में सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। ये धमाके धार्मिक स्थलों के पास हुए, जिससे देशभर में तनाव का माहौल बन गया था। इस घटना में 31 लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे।</p>
<p>शुरुआत में जांच एजेंसियों ने अलग दिशा में कार्रवाई की थी, लेकिन बाद में जांच कई बार अलग-अलग एजेंसियों को सौंपी गई। अंततः यह मामला राष्ट्रीय जांच एजेंसी के पास पहुंचा।</p>
<p>रिपोर्ट्स के अनुसार, आरोपियों को 2013 में गिरफ्तार किया गया था और वे कई वर्षों तक जेल में रहे। बाद में उन्हें जमानत मिल गई थी।सितंबर 2025 में विशेष अदालत ने उनके खिलाफ आरोप तय किए थे, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।</p>
<p>इस फैसले का असर न केवल इस मामले पर पड़ेगा, बल्कि अन्य मामलों में भी जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो सकते हैं।अब इस मामले में आगे की सुनवाई हाईकोर्ट के अगले आदेशों पर निर्भर करेगी। जांच एजेंसियों को अपने साक्ष्यों को मजबूत करने या नए सिरे से समीक्षा करने की आवश्यकता पड़ सकती है।</p>
<p>मालेगांव ब्लास्ट केस से जुड़ा यह फैसला आने वाले समय में न्यायिक प्रक्रिया और जांच प्रणाली दोनों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-stops-trial-in-malegaon-blast-case-relief-to/article-51901</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-stops-trial-in-malegaon-blast-case-relief-to/article-51901</guid>
                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 11:57:53 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-04/mp-news-%2862%29.jpg"                         length="98594"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        