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                <title>family court - दैनिक जागरण</title>
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                <title>भरण-पोषण मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पत्नी जहां रहेगी वहीं होगी सुनवाई</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी जहां वर्तमान में रह रही है, वहीं की फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण का मामला दायर करने का अधिकार रखती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/big-decision-of-high-court-in-maintenance-case-hearing-will/article-55091"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐसा फैसला सुनाया है, जिसका असर भविष्य में इसी तरह के कई मामलों पर पड़ सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला अपने वर्तमान निवास स्थान पर रह रही है, तो उसे वहीं की सक्षम अदालत में भरण-पोषण का दावा पेश करने का अधिकार है। केवल इस आधार पर कि उसका स्थायी पता या पैतृक घर किसी दूसरे जिले में है, अदालत के अधिकार क्षेत्र को चुनौती नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट के इस फैसले के साथ ही एक डॉक्टर पति की ओर से दायर पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई।</p>
<p class="isSelectedEnd">मामला सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के एक डॉक्टर और उनकी पत्नी से जुड़ा है। दोनों का विवाह 16 मई 2019 को हुआ था। विवाह के बाद उनके परिवार में दो बेटियों का जन्म हुआ। कुछ समय बाद पति-पत्नी के संबंधों में विवाद शुरू हो गया। पत्नी ने आरोप लगाया कि विवाह के बाद उसे दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया। इसके अलावा उसने अपने पति पर गंभीर व्यक्तिगत आरोप भी लगाए। इन परिस्थितियों के बाद दोनों अलग-अलग रहने लगे और मामला कानूनी विवाद तक पहुंच गया।</p>
<p class="isSelectedEnd">पत्नी ने बिलासपुर स्थित फैमिली कोर्ट में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 के तहत भरण-पोषण के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। अपने आवेदन में उसने कहा कि उसके पास आय का कोई स्थायी साधन नहीं है और दोनों नाबालिग बेटियां उसकी देखरेख में रह रही हैं। उसने अदालत से अपने लिए एक लाख रुपए प्रतिमाह तथा दोनों बेटियों के लिए 20-20 हजार रुपए प्रतिमाह भरण-पोषण राशि देने की मांग की। इस प्रकार कुल 1 लाख 40 हजार रुपए मासिक भरण-पोषण की मांग अदालत के समक्ष रखी गई।</p>
<p class="isSelectedEnd">दूसरी ओर डॉक्टर पति ने इस आवेदन का विरोध किया। उन्होंने फैमिली कोर्ट में क्षेत्राधिकार को लेकर आपत्ति दर्ज कराई। उनका कहना था कि विवाह सारंगढ़ में हुआ था और पत्नी का स्थायी निवास भी वहीं है। इसलिए बिलासपुर की फैमिली कोर्ट को इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है। पति ने यह भी तर्क दिया कि आवेदन दाखिल किए जाने के समय दोनों बच्चियां सारंगढ़ में पढ़ाई कर रही थीं और केवल किरायानामा प्रस्तुत कर बिलासपुर में मामला दर्ज कराया गया है। उन्होंने स्वयं को पोलियो से प्रभावित दिव्यांग बताते हुए यह भी कहा कि पत्नी उन्हें परेशान करने की नीयत से बिलासपुर में मामला चला रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd">पत्नी ने इन आरोपों का अदालत में विरोध किया। उसने कहा कि वह वर्तमान में बिलासपुर जिले के लगरा क्षेत्र में किराए के मकान में रह रही है। इसके समर्थन में उसने आवश्यक दस्तावेज भी प्रस्तुत किए। पत्नी ने यह भी बताया कि उसकी दोनों बेटियां अब बिलासपुर के एक निजी विद्यालय में पढ़ाई कर रही हैं और उनका पूरा जीवन वर्तमान में बिलासपुर से जुड़ा हुआ है। उसके अनुसार उसने किसी भी प्रकार का फर्जी दस्तावेज अदालत के सामने प्रस्तुत नहीं किया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पति की क्षेत्राधिकार संबंधी आपत्ति को खारिज कर दिया था। इसके बाद डॉक्टर पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी। मामले की सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति बीडी गुरु ने पूरे रिकॉर्ड और दस्तावेजों का अवलोकन किया।</p>
<p class="isSelectedEnd">हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पत्नी ने स्पष्ट रूप से बिलासपुर के लगरा क्षेत्र को अपना वर्तमान निवास बताया है और उसके समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज भी पेश किए हैं। अदालत ने माना कि यदि कोई व्यक्ति किसी स्थान पर वास्तविक रूप से निवास कर रहा है, तो उसे उस क्षेत्र की सक्षम अदालत में कानूनी राहत मांगने का अधिकार है। केवल इस वजह से कि उसका स्थायी पता किसी अन्य जिले में है, वर्तमान निवास वाले क्षेत्र की अदालत का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। अदालत ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या प्रक्रिया संबंधी खामी नजर नहीं आती। इसलिए हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने डॉक्टर पति की पुनरीक्षण याचिका प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट की कार्यवाही को जारी रखने का रास्ता साफ कर दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह फैसला महिलाओं और बच्चों से जुड़े भरण-पोषण मामलों में महत्वपूर्ण नजीर साबित हो सकता है। कई बार पति-पत्नी अलग-अलग स्थानों पर रहने लगते हैं और क्षेत्राधिकार को लेकर विवाद उत्पन्न हो जाता है। ऐसे मामलों में हाईकोर्ट की यह टिप्पणी स्पष्ट करती है कि वर्तमान निवास स्थान भी न्यायिक अधिकार क्षेत्र तय करने का महत्वपूर्ण आधार हो सकता है। इस फैसले के बाद बिलासपुर फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी। वहीं यह आदेश उन महिलाओं के लिए भी राहत का संदेश माना जा रहा है जो अलग रहने की स्थिति में अपने वर्तमान निवास स्थान से न्याय पाने की कोशिश करती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 14:13:10 +0530</pubDate>
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                <title>ग्वालियर तलाक मामला: ननद को ‘सौतन’ बताकर लिया एकतरफा तलाक, हाईकोर्ट में पहुंचा विवाद</title>
                                    <description><![CDATA[फैमिली फोटो को दूसरी शादी का सबूत बताकर मिली डिक्री; पति ने कोर्ट को गुमराह करने का लगाया आरोप]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/gwalior-divorce-case-one-sided-divorce-by-calling-sister-in-law-as-sautan/article-52141"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/gwalior-divorce-case.jpg" alt=""></a><br /><p>मध्य प्रदेश के <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Gwalior</span></span> में तलाक से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें एक महिला ने पति से अलग होने के लिए कथित तौर पर अदालत को गलत जानकारी दी। महिला ने अपनी ही ननद (पति की बहन) को ‘सौतन’ बताकर फैमिली कोर्ट से एकतरफा तलाक की डिक्री हासिल कर ली। अब इस मामले को पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है, जिससे यह विवाद कानूनी बहस का विषय बन गया है।</p>
<p><strong>क्या है पूरा मामला</strong><br />जानकारी के मुताबिक, दंपति की शादी वर्ष 1998 में हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी। पति एक निजी कंपनी में कार्यरत है और काम के सिलसिले में अक्सर बाहर रहता था। इसी कारण दोनों के संबंधों में दूरी बढ़ती गई और वर्ष 2015 में महिला अलग रहने लगी। महिला तलाक चाहती थी, जबकि पति इसके लिए तैयार नहीं था।</p>
<p><strong>कैसे मिला एकतरफा तलाक</strong><br />वर्ष 2021 में महिला ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उसके पति ने दूसरी शादी कर ली है। सबूत के तौर पर उसने एक पारिवारिक फोटो पेश किया, जिसमें पति अपनी बहन और अन्य रिश्तेदारों के साथ खड़ा था। महिला ने इस फोटो में दिख रही अपनी ननद को ही पति की दूसरी पत्नी बताते हुए अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया।</p>
<p>अदालत ने प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर पति को एकपक्षीय घोषित कर दिया, जिससे वह अपनी ओर से सफाई पेश नहीं कर सका। इसके बाद महिला को तलाक की डिक्री मिल गई।</p>
<p><strong>पति का आरोप और हाईकोर्ट की शरण</strong><br />पति का कहना है कि तलाक की प्रक्रिया के दौरान उसकी मां का निधन हो गया था, जिसका फायदा उठाकर उसे मामले से अनभिज्ञ रखा गया। हाल ही में जब उसने अदालत के रिकॉर्ड की जांच की, तब उसे इस कथित फर्जीवाड़े की जानकारी मिली। उसने आरोप लगाया कि पत्नी ने जानबूझकर अदालत को गुमराह किया और गलत साक्ष्य पेश किए।इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एकतरफा तलाक की डिक्री को रद्द करने की मांग की है।</p>
<p>यदि अदालत में गलत साक्ष्य प्रस्तुत कर निर्णय हासिल किया गया है, तो यह गंभीर अपराध की श्रेणी में आ सकता है। इससे न केवल न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है, बल्कि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की संभावना भी बनती है।</p>
<p>अब मामला हाईकोर्ट के समक्ष है, जहां दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जाएंगी। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या तलाक की डिक्री वैध है या इसे निरस्त किया जाना चाहिए। इस केस ने पारिवारिक विवादों और न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 15:02:26 +0530</pubDate>
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