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                <title>high court - दैनिक जागरण</title>
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                <description>high court RSS Feed</description>
                
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                <title>असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती में NOC विवाद, हाईकोर्ट ने 120 दिन में मांगी जांच रिपोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[राजनीति शास्त्र के सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति पर उठे सवाल, उच्च शिक्षा सचिव और सीजीपीएससी को पूरे मामले की जांच कर तय समय में निर्णय लेने के निर्देश।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/noc-controversy-in-assistant-professor-recruitment-high-court-asked-for/article-58488"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/chhattisgarh-high-court-(10).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति प्रक्रिया में कथित अनियमितता के मामले को गंभीरता से लेते हुए उच्च शिक्षा विभाग और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सीजीपीएससी) को विस्तृत जांच के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पूरे मामले की जांच कर 120 दिनों के भीतर उचित निर्णय लिया जाए। मामला राजनीति शास्त्र विषय में सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति से जुड़ा है, जहां आरोप लगाया गया है कि हरियाणा सरकार में पहले से कार्यरत एक उम्मीदवार को आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) के बिना ही नियुक्ति दे दी गई। इस मामले को लेकर रायगढ़ निवासी अली हसन ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अदालत ने याचिका पर सुनवाई के बाद कहा कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब उच्च शिक्षा सचिव और सीजीपीएससी को पूरे रिकॉर्ड की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई करनी होगी। माना जा रहा है कि यह फैसला भविष्य की सरकारी नियुक्तियों में पारदर्शिता और नियमों के पालन को लेकर महत्वपूर्ण माना जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता अली हसन ने अपनी याचिका में बताया कि छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग ने वर्ष 2019 में राजनीति शास्त्र विषय के सहायक प्राध्यापक के 59 पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था। भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद वर्ष 2021 में अंतिम चयन सूची प्रकाशित की गई, जिसमें अली हसन को अनारक्षित वर्ग की प्रतीक्षा सूची में पहला स्थान मिला। चयन सूची का अध्ययन करने के दौरान उन्हें जानकारी मिली कि मुख्य चयन सूची में शामिल रंजन तिवारी पहले से हरियाणा सरकार के उच्चतर शिक्षा निदेशालय में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। इसके बाद अली हसन ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत हरियाणा सरकार से संबंधित जानकारी मांगी। आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार रंजन तिवारी 13 फरवरी 2020 से हरियाणा के महेंद्रगढ़ स्थित शासकीय महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक के रूप में सेवा दे रहे थे। याचिका में दावा किया गया कि उन्होंने छत्तीसगढ़ में नियुक्ति के लिए अपने वर्तमान नियोक्ता से आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं किया था और न ही उसे प्रस्तुत किया गया। इसके बावजूद 29 अप्रैल 2022 को उनकी नियुक्ति शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय भाटापारा, जिला बलौदाबाजार में कर दी गई। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह नियुक्ति सेवा नियमों और भर्ती प्रक्रिया की शर्तों के विपरीत है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि सरकारी या अर्ध-सरकारी संस्थानों में कार्यरत अभ्यर्थियों के लिए नई नियुक्ति स्वीकार करने से पहले संबंधित विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य होता है। यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि किसी भी कर्मचारी की सेवा स्थिति स्पष्ट रहे और नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे। याचिका में यह भी कहा गया कि भर्ती नियमों के अनुसार यदि कोई अभ्यर्थी गलत जानकारी देता है या आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करता, तो उसकी नियुक्ति रद्द की जा सकती है और उसके खिलाफ वैधानिक कार्रवाई भी संभव है। मामले को मजबूत करने के लिए याचिकाकर्ता ने भाटापारा शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय से सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी भी अदालत के समक्ष रखी। कॉलेज प्रशासन ने अपने जवाब में स्वीकार किया कि रंजन तिवारी ने 23 मई 2022 को कार्यभार ग्रहण किया था, लेकिन उनके कार्यालय रिकॉर्ड में नियोक्ता का अनापत्ति प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं है। इस तथ्य को अदालत ने भी गंभीरता से लिया। मामले की सुनवाई जस्टिस राकेश मोहन पांडे की एकल पीठ में हुई। अदालत ने तत्काल नियुक्ति रद्द करने का आदेश नहीं दिया, बल्कि उच्च शिक्षा सचिव और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग को निर्देश दिया कि वे पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करें और उपलब्ध दस्तावेजों, सेवा नियमों तथा संबंधित तथ्यों के आधार पर 120 दिनों के भीतर अंतिम निर्णय लें। हाईकोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि सरकारी नियुक्तियों में नियमों का पालन अनिवार्य है और किसी भी प्रकार की प्रक्रिया संबंधी चूक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस आदेश के बाद अब सभी की निगाहें जांच प्रक्रिया पर टिकी हैं। यदि जांच में याचिकाकर्ता के आरोप सही पाए जाते हैं तो नियुक्ति पर प्रभाव पड़ सकता है और प्रतीक्षा सूची में शामिल अभ्यर्थियों के अधिकारों पर भी निर्णय लिया जा सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 16:50:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान हंगामा, अभद्र व्यवहार पर याचिका खारिज</title>
                                    <description><![CDATA[सुनवाई के दौरान वकील ने कोर्ट की गरिमा का उल्लंघन किया, सुरक्षा कर्मियों ने बाहर निकाला; अदालत ने अवमानना की कार्रवाई से परहेज करते हुए याचिका खारिज की]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/uproar-during-hearing-in-supreme-court-petition-on-indecent-behavior/article-58413"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/supreme-court-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">देश की सर्वोच्च अदालत में शुक्रवार को एक सुनवाई के दौरान ऐसा घटनाक्रम देखने को मिला जिसने कुछ समय के लिए कोर्ट रूम का माहौल पूरी तरह बदल दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता वकील ने अदालत में अभद्र व्यवहार किया। सुनवाई के दौरान उन्होंने न केवल आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया बल्कि अदालत की कार्यवाही के बीच फाइल भी उछाल दी। स्थिति बिगड़ने पर सुरक्षा कर्मियों को हस्तक्षेप करना पड़ा और संबंधित वकील को कोर्ट रूम से बाहर ले जाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ के समक्ष आया जिसमें जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे सुनवाई कर रहे थे। याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर की गई थी और याचिकाकर्ता स्वयं अधिवक्ता के रूप में अपना पक्ष रख रहे थे। शुरुआत से ही उनका रवैया आक्रामक बताया गया। अदालत की कार्यवाही के दौरान उन्होंने लगातार ऊंची आवाज में अपनी बात रखी और न्यायालय की प्रक्रिया पर असंतोष जताया। सुनवाई के दौरान स्थिति तब गंभीर हो गई जब उन्होंने अदालत में आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया और गुस्से में केस से जुड़े दस्तावेज हवा में उछाल दिए। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से कुछ क्षणों के लिए कोर्ट रूम में मौजूद सभी लोग स्तब्ध रह गए। न्यायिक कार्यवाही के दौरान इस तरह के व्यवहार को देखते हुए सुरक्षा कर्मी तुरंत सक्रिय हुए और संबंधित वकील को अदालत कक्ष से बाहर ले गए, जिससे आगे की कार्यवाही शांतिपूर्वक जारी रह सके।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, वकील ने सुनवाई के दौरान न्यायालय से एक विशेष आदेश जारी करने की मांग की थी। उन्होंने कथित रूप से कहा कि संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। इस पर पीठ ने उनसे सवाल किया कि क्या वे अदालत को आदेश दे रहे हैं। इसके बाद माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया। वकील ने अपनी बात दोहराने के बाद दस्तावेज फेंक दिए और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। घटना के दौरान कोर्ट रूम में मौजूद कई अधिवक्ता और अन्य लोग कुछ समय के लिए असहज हो गए। अचानक हुए इस घटनाक्रम के कारण कार्यवाही कुछ देर के लिए प्रभावित हुई, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था सक्रिय रहने से स्थिति जल्द सामान्य हो गई। अदालत ने शांति बनाए रखते हुए सुनवाई आगे बढ़ाई।</p>
<p style="text-align:justify;">घटना के बाद जस्टिस के. वी. विश्वनाथन ने कहा कि संबंधित व्यक्ति स्पष्ट रूप से मानसिक और भावनात्मक दबाव में दिखाई दे रहे थे। उन्होंने कहा कि अदालत को उनके प्रति सहानुभूति है और इस पूरे घटनाक्रम को हताशा के रूप में देखा जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से दंडित करना नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को निष्पक्ष और संतुलित बनाए रखना है। महत्वपूर्ण बात यह रही कि अदालत ने इस मामले में वकील के खिलाफ तत्काल अवमानना की कार्रवाई करने का निर्णय नहीं लिया। हालांकि, पीठ ने याचिका के गुण-दोष पर विचार करने के बाद स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड का अवलोकन करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं पाया गया। इसी कारण विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया गया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 16:32:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हाईकोर्ट से CMHO डॉ. हसानी को बड़ी राहत: 62 नहीं, 65 वर्ष की उम्र में होंगे रिटायर</title>
                                    <description><![CDATA[इंदौर खंडपीठ का अहम फैसला, कहा- मेडिकल अधिकारियों की सेवाएं स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए जरूरी; डॉ. हसानी 65 वर्ष की आयु तक सेवा जारी रख सकेंगे]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/big-relief-to-cmho-dr-hasani-from-high-court-he/article-58179"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/cmho-dr-madhav-prasad-hasani.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. माधव प्रसाद हसानी को बड़ी राहत देते हुए राज्य सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसके तहत उन्हें 62 वर्ष की आयु पूरी होने पर 31 जुलाई 2026 को सेवानिवृत्त किया जाना था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि डॉ. हसानी 65 वर्ष की आयु तक सेवा में बने रहने के पात्र हैं और राज्य सरकार को इस संबंध में आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। यह फैसला केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि प्रदेश के चिकित्सा अधिकारियों के सेवा नियमों और सेवानिवृत्ति आयु से जुड़े मामलों में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार द्वारा चिकित्सा अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष निर्धारित करने का उद्देश्य अनुभवी डॉक्टरों की सेवाओं का अधिक समय तक लाभ स्वास्थ्य व्यवस्था को उपलब्ध कराना है।</p>
<p style="text-align:justify;">डॉ. माधव प्रसाद हसानी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर 30 जनवरी 2026 को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें 62 वर्ष की आयु पूरी होने पर सेवानिवृत्त करने के निर्देश दिए गए थे। याचिका में कहा गया कि उन्होंने वर्ष 1999 में संविदा ग्रामीण चिकित्सा अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएं शुरू की थीं। इसके बाद वर्ष 2005 में उनकी सेवाओं का नियमितीकरण किया गया और तब से उन्होंने लगातार चिकित्सा सेवाएं प्रदान की हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि डॉ. हसानी ने लंबे समय तक क्लीनिकल सेवाएं दीं और बाद में विभिन्न प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाते हुए मुख्य ब्लॉक चिकित्सा अधिकारी तथा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। उनके अनुभव और सेवा अवधि को देखते हुए उन्हें 65 वर्ष तक सेवा का लाभ मिलना चाहिए। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क रखा गया कि मध्यप्रदेश सरकार पहले ही मेडिकल अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष निर्धारित कर चुकी है। इसके अलावा हाईकोर्ट पूर्व में भी डॉ. कांतिलाल साहू सहित कई मामलों में इसी प्रकार का फैसला दे चुका है। ऐसे में समान परिस्थितियों में डॉ. हसानी को अलग तरीके से सेवानिवृत्त करना न्यायसंगत नहीं होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं राज्य सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि 65 वर्ष तक सेवा जारी रखने का लाभ केवल उन्हीं अधिकारियों को मिल सकता है, जो नियमों में निर्धारित सभी शर्तों को पूरा करते हों। सरकार का कहना था कि याचिकाकर्ता उन निर्धारित शर्तों के अनुरूप पात्र नहीं हैं, इसलिए उन्हें 62 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त करने का आदेश जारी किया गया था। दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट की एकलपीठ ने मामले का परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि डॉ. हसानी वर्ष 1999 से लगातार चिकित्सा सेवाओं से जुड़े रहे हैं और उनके मामले के तथ्य पूर्व में दिए गए न्यायिक निर्णयों से काफी हद तक मेल खाते हैं। अदालत ने यह भी माना कि उन्होंने लंबे समय तक चिकित्सा क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाई है और स्वास्थ्य सेवाओं में उनका अनुभव महत्वपूर्ण है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मेडिकल अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाने का उद्देश्य केवल सेवा अवधि बढ़ाना नहीं, बल्कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को अनुभवी चिकित्सकों की सेवाएं उपलब्ध कराना है। ऐसे में इस नीति की भावना को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि 30 जनवरी 2026 को जारी किया गया सेवानिवृत्ति आदेश विधिसम्मत नहीं है और इसे निरस्त किया जाता है। साथ ही यह भी निर्देश दिया कि डॉ. माधव प्रसाद हसानी को 65 वर्ष की आयु तक सेवा जारी रखने की अनुमति दी जाए और राज्य सरकार आवश्यक प्रशासनिक कार्रवाई सुनिश्चित करे। इस फैसले के बाद स्वास्थ्य विभाग के कई अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच भी चर्चा तेज हो गई है। माना जा रहा है कि जिन चिकित्सा अधिकारियों के मामले समान परिस्थितियों वाले हैं, वे भी इस निर्णय का हवाला देते हुए कानूनी राहत की मांग कर सकते हैं। हालांकि प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों और सेवा रिकॉर्ड के आधार पर ही होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 13:54:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: 'वर्दी पुलिस की, लेकिन दिल अपराधियों के साथ', DGP को एक महीने में सर्कुलर जारी करने का आदेश</title>
                                    <description><![CDATA[गिरफ्तारी के लिखित कारण नहीं बताने पर जताई कड़ी नाराजगी, कहा- ऐसी लापरवाही से अपराधियों को मिलता है कानूनी फायदा; सभी थाना प्रभारियों और जांच अधिकारियों को चेतावनी जारी करने के निर्देश]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-courts-strict-comment-on-uniformed-police-but-with-criminals/article-58175"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/madhya-pradesh-high-court-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने पुलिस अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताते हुए राज्य के पुलिस विभाग को बड़ा संदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कुछ पुलिस अधिकारी कानून की रक्षा के लिए वर्दी पहनते जरूर हैं, लेकिन उनके कामकाज से ऐसा लगता है कि उनका झुकाव अपराधियों को बचाने की ओर है। कोर्ट ने इस तरह की लापरवाही को न्याय व्यवस्था और समाज दोनों के लिए गंभीर खतरा बताया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया है कि एक महीने के भीतर सभी थाना प्रभारियों और विवेचना अधिकारियों के लिए सख्त सर्कुलर जारी किया जाए। इस सर्कुलर में स्पष्ट रूप से बताया जाए कि किसी भी आरोपी को गिरफ्तार करते समय उसे गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में देना अनिवार्य है। यदि कोई अधिकारी ऐसा नहीं करता है तो इसे केवल प्रक्रियागत चूक नहीं, बल्कि आरोपी को कानूनी लाभ पहुंचाने की मंशा के रूप में देखा जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया कानून के दायरे में रहकर ही पूरी की जानी चाहिए। यदि पुलिस अधिकारी निर्धारित नियमों का पालन नहीं करते हैं तो इसका सीधा लाभ अपराधियों को अदालत से राहत मिलने के रूप में मिलता है। ऐसी स्थिति में न केवल जांच प्रभावित होती है बल्कि न्यायिक प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह टिप्पणी जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए की। यह याचिका धर्मेंद्र लोधी ने अपने भाई की गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए दायर की थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि पुलिस ने उसके भाई को गिरफ्तार करते समय गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में नहीं बताए, इसलिए गिरफ्तारी को अवैध माना जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान अदालत ने पूरे मामले के रिकॉर्ड का विस्तार से परीक्षण किया। जांच में सामने आया कि संबंधित आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज था और पुलिस ने उसे धारा 50 के तहत आवश्यक लिखित नोटिस दिया था। आरोपी के कब्जे से करीब 86.850 किलोग्राम गांजा भी बरामद किया गया था। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने गिरफ्तारी को वैध माना और याचिका खारिज कर दी।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि अदालत ने यह भी माना कि कई मामलों में पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी की अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं करते। यही वजह है कि कई गंभीर मामलों में आरोपी तकनीकी आधार पर अदालत से राहत हासिल कर लेते हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस की ओर से गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में नहीं दिए जाते तो यह केवल साधारण लापरवाही नहीं मानी जाएगी, बल्कि यह माना जाएगा कि संबंधित अधिकारी ने जानबूझकर ऐसी चूक की ताकि आरोपी को कानूनी फायदा मिल सके।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस मुख्यालय भोपाल की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन में पुलिस मुख्यालय ने इसी वर्ष 13 फरवरी 2026 को एक सर्कुलर जारी किया था, जिसमें गिरफ्तारी की प्रक्रिया से जुड़े स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कई थाना प्रभारी और विवेचना अधिकारी इन निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। अदालत ने इसे गंभीर प्रशासनिक विफलता माना।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस की जिम्मेदारी केवल अपराध दर्ज करना नहीं है, बल्कि कानून के अनुरूप जांच करना और दोषियों के खिलाफ मजबूत केस तैयार करना भी है। यदि जांच अधिकारी ही नियमों की अनदेखी करेंगे तो अपराधियों को सजा दिलाना मुश्किल हो जाएगा और जनता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर पड़ेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि पुलिस विभाग को ऐसे अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए, जो लापरवाही या जानबूझकर की गई चूक के कारण अपराधियों को राहत दिलाने का रास्ता तैयार करते हैं। कोर्ट ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में विभागीय कार्रवाई भी जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई अधिकारी कानून की अनदेखी करने का साहस न कर सके।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया कि सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों, थाना प्रभारियों और जांच अधिकारियों तक यह संदेश स्पष्ट रूप से पहुंचाया जाए कि गिरफ्तारी के समय कानूनी प्रक्रिया का पालन हर हाल में किया जाना चाहिए। यदि किसी अधिकारी की ओर से दोबारा ऐसी लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस फैसले को पुलिस व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत की यह टिप्पणी भविष्य में पुलिस जांच की गुणवत्ता सुधारने और गिरफ्तारी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है। साथ ही इससे उन मामलों में भी कमी आएगी, जहां तकनीकी खामियों के कारण आरोपी अदालत से राहत पाने में सफल हो जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब पुलिस मुख्यालय पर जिम्मेदारी होगी कि वह निर्धारित समय सीमा के भीतर नया सर्कुलर जारी कर सभी अधिकारियों को कानून के प्रावधानों का सख्ती से पालन कराने की व्यवस्था सुनिश्चित करे। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत के निर्देशों का जमीनी स्तर पर कितना प्रभाव दिखाई देता है और पुलिस व्यवस्था में किस तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 13:19:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जंगलों के 10 किमी दायरे में आरा मिलों पर रोक बरकरार, हाईकोर्ट ने 19 याचिकाएं खारिज कीं</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अधिसूचना को सही ठहराया, कहा- पर्यावरण और वन संरक्षण से कोई समझौता नहीं होगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/ban-on-saw-mills-within-10-km-radius-of-forests/article-58081"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/chhattisgarh-high-court-(9).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जंगलों और संरक्षित वन क्षेत्रों के आसपास पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने अधिसूचित जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों से 10 किलोमीटर के दायरे में आरा मिलों के संचालन पर लगी रोक को बरकरार रखा है। इस मामले में दायर 19 अलग-अलग याचिकाओं को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की 25 सितंबर 2025 की अधिसूचना को पूरी तरह वैध माना। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट कहा कि राज्य में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना सबसे जरूरी है और ऐसी परिस्थितियां नहीं बनने दी जा सकतीं, जिनसे भविष्य में बड़े शहरों जैसी गंभीर प्रदूषण की समस्या पैदा हो। अदालत की टिप्पणी रही कि प्रदेश को ऐसी स्थिति से बचाना जरूरी है जहां पर्यावरण को अपूरणीय नुकसान पहुंचे।</p>
<p>यह मामला उस अधिसूचना से जुड़ा है, जिसे राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ काष्ठ चिरान (विनियमन) अधिनियम, 1984 की धारा 5(1) के तहत जारी किया था। अधिसूचना के अनुसार अधिसूचित जंगलों और संरक्षित वन क्षेत्रों से हवाई दूरी के आधार पर 10 किलोमीटर तक के क्षेत्र को तीन वर्षों के लिए प्रतिबंधित घोषित किया गया। इसके बाद वन विभाग ने इस दायरे में संचालित आरा मिलों के संचालन और उनके लाइसेंस के नवीनीकरण पर रोक लगाने के आदेश जारी किए थे। इस फैसले से प्रभावित कई आरा मिल संचालकों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।</p>
<p>याचिकाकर्ताओं में शाही ट्रेडर्स, अग्रवाल सॉ मिल, पटेल सॉ मिल सहित कई लकड़ी उद्योग संचालक शामिल थे। उनका कहना था कि उनकी आरा मिलें वर्ष 1996 से पहले से वैध लाइसेंस के साथ संचालित हो रही हैं और वे सभी आवश्यक नियमों का पालन करते आए हैं। उन्होंने अदालत के सामने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुल्पद मामले का हवाला भी दिया। उनका तर्क था कि पुराने और वैध लाइसेंसधारी प्रतिष्ठानों को अचानक इस प्रकार बंद करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस फैसले से उनके व्यवसाय, कर्मचारियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।</p>
<p>मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि जंगलों के आसपास लकड़ी आधारित गतिविधियों पर नियंत्रण पर्यावरण संरक्षण के लिए आवश्यक है। सरकार ने अदालत को बताया कि वन क्षेत्रों के आसपास सुरक्षा दायरा तय करने का उद्देश्य केवल उद्योगों को सीमित करना नहीं बल्कि अवैध कटाई, जंगलों पर बढ़ते दबाव और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि औद्योगिक क्षेत्रों और नगर निगम या नगर पालिका की सीमाओं के भीतर आने वाले कुछ क्षेत्रों को इस प्रतिबंध से पहले ही छूट दी जा चुकी है, जिससे यह साबित होता है कि निर्णय संतुलित सोच के साथ लिया गया है।</p>
<p>जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राज्य सरकार के फैसले को उचित और तार्किक माना। अदालत ने कहा कि जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं हैं, बल्कि जलवायु संतुलन, जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यदि वन क्षेत्रों के आसपास अनियंत्रित औद्योगिक गतिविधियों की अनुमति दी जाती है तो उसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ेगा। इसलिए सरकार द्वारा तय किया गया 10 किलोमीटर का बफर जोन पर्यावरण संरक्षण की दिशा में आवश्यक कदम माना जा सकता है।</p>
<p>अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि सरकार वैज्ञानिक तथ्यों और सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए कोई नीति बनाती है तो उसमें न्यायालय तब तक हस्तक्षेप नहीं करेगा, जब तक वह कानून के विपरीत न हो। अदालत ने माना कि इस मामले में सरकार का फैसला सार्वजनिक हित और पर्यावरण सुरक्षा दोनों के अनुरूप है। इसलिए इसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।</p>
<p>इस फैसले के बाद अब अधिसूचित जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों से 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाली आरा मिलों के संचालन और उनके लाइसेंस के नवीनीकरण पर रोक जारी रहेगी। जिन मिलों का संचालन इस प्रतिबंधित क्षेत्र में आता है, उन्हें वर्तमान नियमों का पालन करना होगा। वन विभाग भी इस संबंध में आगे की कार्रवाई जारी रख सकेगा। माना जा रहा है कि इस फैसले का असर प्रदेश के कई जिलों में संचालित लकड़ी उद्योगों पर पड़ सकता है, जहां बड़ी संख्या में आरा मिलें वन क्षेत्रों के आसपास स्थित हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 13:37:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>बिलासपुर करंट हादसे पर हाईकोर्ट सख्त, बिजली विभाग से मांगा विस्तृत जवाब</title>
                                    <description><![CDATA[तीन लोगों की मौत के मामले में स्वतः संज्ञान, हाईकोर्ट ने सुरक्षा व्यवस्था, इलेक्ट्रिक फेंसिंग और रोकथाम नीति पर मांगा शपथपत्र।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/high-court-strict-on-bilaspur-current-accident-demands-detailed-answer/article-58077"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/bilaspur-news-(5).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में करंट लगने से पूर्व सरपंच और उनके दो बेटों की मौत के मामले ने अब न्यायपालिका का भी ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस गंभीर घटना पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए मीडिया रिपोर्ट को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) के मैनेजिंग डायरेक्टर और राज्य के ऊर्जा विभाग के सचिव को शपथपत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह स्पष्ट करने को कहा है कि राज्य में बिजली व्यवस्था की निगरानी, रखरखाव और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्थाएं लागू हैं तथा भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि राज्य के कई हिस्सों में खेतों, फार्महाउसों और निजी परिसरों के आसपास बिजली प्रवाहित फेंसिंग लगाने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। कई लोग अपनी फसल, पशुओं या संपत्ति की सुरक्षा के लिए अवैध रूप से बिजली युक्त तारों का उपयोग करते हैं, लेकिन इसकी चपेट में आने से अनजान लोगों की जान चली जाती है। अदालत ने माना कि यह केवल व्यक्तिगत लापरवाही का मामला नहीं है, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है। इसलिए इस तरह की घटनाओं की रोकथाम के लिए प्रभावी व्यवस्था होना आवश्यक है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अदालत ने यह भी कहा कि वर्तमान में ऐसे मामलों में संबंधित लोगों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज कर दिए जाते हैं, लेकिन केवल एफआईआर दर्ज कर देना पर्याप्त समाधान नहीं माना जा सकता। यदि लगातार एक जैसी घटनाएं दोहराई जा रही हैं, तो इसका अर्थ है कि रोकथाम के लिए बनाई गई व्यवस्थाएं पर्याप्त प्रभावी नहीं हैं। अदालत ने सरकार और बिजली विभाग से पूछा है कि क्या ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई स्पष्ट नीति, दिशा-निर्देश या स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) लागू है। यदि नहीं, तो इसे तैयार करने और लागू करने की समय-सीमा भी बताई जाए। हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस मामले में CSPDCL के मैनेजिंग डायरेक्टर को भी औपचारिक रूप से पक्षकार बनाया जाए। साथ ही ऊर्जा विभाग के सचिव और बिजली कंपनी से विस्तृत शपथपत्र मांगा गया है। अदालत ने यह भी जानना चाहा है कि बिजली ढांचे का निरीक्षण कितनी नियमितता से किया जाता है, जर्जर तारों और खुले विद्युत स्रोतों की पहचान और मरम्मत की क्या व्यवस्था है तथा लापरवाही पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही कैसे तय की जाती है। मामले की अगली सुनवाई 23 जुलाई को निर्धारित की गई है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जिस घटना के आधार पर अदालत ने स्वतः संज्ञान लिया, वह बिलासपुर जिले के कोटा ब्लॉक के भाड़म गांव की है। यहां करंट लगने से पूर्व सरपंच और उनके दो बेटों की दर्दनाक मौत हो गई थी। घटना के बाद पूरे क्षेत्र में शोक और चिंता का माहौल बन गया था। मीडिया में प्रकाशित खबरों के आधार पर हाईकोर्ट ने मामले को जनहित से जुड़ा मानते हुए स्वतः सुनवाई शुरू की। अदालत का मानना है कि इस तरह की घटनाएं केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि पूरे समाज की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करती हैं। पिछले दो महीनों में बिलासपुर जिले में करंट लगने की अलग-अलग घटनाओं में आठ लोगों की जान जा चुकी है। इनमें कई मामले खेतों के आसपास लगे बिजली प्रवाहित तारों या जर्जर विद्युत लाइनों से जुड़े बताए गए हैं। लगातार हो रही इन घटनाओं ने बिजली सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े किए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई स्थानों पर पुराने और ढीले बिजली तार लंबे समय से मरम्मत का इंतजार कर रहे हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अदालत ने अपने अवलोकन में यह भी कहा कि इलेक्ट्रिक फेंसिंग का खतरा केवल इंसानों तक सीमित नहीं है। कई बार घरेलू पशु और वन्यजीव भी इसकी चपेट में आकर अपनी जान गंवा देते हैं। इसलिए यह विषय मानव सुरक्षा के साथ-साथ पशु संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि आवश्यकता पड़ी तो इस संबंध में व्यापक दिशा-निर्देश भी जारी किए जा सकते हैं, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को प्रभावी रूप से रोका जा सके। पूरे मामले पर राज्य सरकार और बिजली विभाग की ओर से विस्तृत जवाब का इंतजार है। अदालत के निर्देशों के बाद अब यह स्पष्ट होगा कि बिजली सुरक्षा को लेकर वर्तमान व्यवस्था कितनी प्रभावी है और भविष्य में किन सुधारात्मक कदमों की योजना बनाई जा रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 13:37:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>छत्तीसगढ़ न्यायपालिका में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, 17 न्यायिक अधिकारियों के तबादले</title>
                                    <description><![CDATA[अजय सिंह राजपूत बने NIA कोर्ट के स्पेशल जज, ओमप्रकाश जायसवाल को हाईकोर्ट में रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) की जिम्मेदारी; कई जिलों में जिला एवं सत्र न्यायाधीशों के पदों पर बदलाव]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/major-administrative-reshuffle-in-chhattisgarh-judiciary-transfer-of-17-judicial/article-57783"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/chhattisgarh-high-court-(8).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य की न्यायिक व्यवस्था में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल करते हुए उच्च न्यायिक सेवा संवर्ग के 17 न्यायिक अधिकारियों के तबादले और नई पदस्थापनाओं के आदेश जारी किए हैं। रजिस्ट्रार जनरल की ओर से जारी इस आदेश के तहत जिला एवं सत्र न्यायाधीश, अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, विशेष न्यायालयों के न्यायाधीशों और हाईकोर्ट में पदस्थ कई वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारियों में बदलाव किया गया है। न्यायपालिका में इस व्यापक प्रशासनिक पुनर्गठन को न्यायिक कार्यों की बेहतर निगरानी, प्रशासनिक संतुलन और मामलों के प्रभावी निपटारे की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">जारी आदेश के अनुसार, जगदलपुर के प्रथम जिला एवं सत्र न्यायाधीश अजय सिंह राजपूत को अब स्पेशल जज (NIA कोर्ट), जगदलपुर की जिम्मेदारी सौंपी गई है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) से जुड़े संवेदनशील मामलों की सुनवाई करने वाली इस अदालत में उनकी नियुक्ति को अहम माना जा रहा है। वहीं, हाईकोर्ट लीगल सर्विस कमेटी के सचिव ओमप्रकाश जायसवाल को हाईकोर्ट में रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) नियुक्त किया गया है। न्यायिक प्रशासन और अदालतों के संचालन में रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा, बलौदाबाजार के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश अब्दुल जाहिद कुरैशी को हाईकोर्ट में रजिस्ट्रार (विजिलेंस) नियुक्त किया गया है। यह पद न्यायिक व्यवस्था में अनुशासन, निगरानी और प्रशासनिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। वहीं, बलौदाबाजार के प्रथम जिला एवं सत्र न्यायाधीश राकेश कुमार वर्मा को छत्तीसगढ़ न्यायिक अकादमी, बिलासपुर में एडिशनल डायरेक्टर बनाया गया है, जहां वे न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण और क्षमता विकास से जुड़े कार्यों की जिम्मेदारी संभालेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने बिलासपुर, रायपुर, बलरामपुर, सारंगढ़ और अन्य जिलों में भी कई महत्वपूर्ण नियुक्तियां की हैं। द्वितीय जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बिलासपुर रूपनारायण पात्रे को हाईकोर्ट लीगल सर्विस कमेटी का सचिव नियुक्त किया गया है। वहीं, सिद्धार्थ अग्रवाल को द्वितीय अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, जगदलपुर से पदोन्नत करते हुए प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, जगदलपुर बनाया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी प्रकार किरण कुमार जांगड़े को प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बलरामपुर-रामानुजगंज नियुक्त किया गया है। विनय कुमार प्रधान को एफटीसी (POCSO), रायपुर से रायपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट में पदस्थ किया गया है। वहीं, डमरूधर चौहान को षष्ठम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रायपुर से स्थानांतरित कर दशम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रायपुर बनाया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">तबादला सूची में कई वरिष्ठ अधिकारियों के नए दायित्व भी तय किए गए हैं। विनिता वारनेर को प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, सूरजपुर से बलौदाबाजार भेजा गया है। वहीं, थामस एक्का को प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, सूरजपुर से प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, सूरजपुर नियुक्त किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्पेशल जज (NIA), जगदलपुर के पद पर कार्यरत संगीता नवीन तिवारी को प्रथम जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बलौदाबाजार बनाया गया है। डॉ. मनोज कुमार प्रजापति को प्रथम जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बलरामपुर-रामानुजगंज से सारंगढ़ स्थानांतरित किया गया है। अमित राठौर को द्वितीय अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, सारंगढ़ से रायपुर भेजा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा, हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) पद पर कार्यरत सुमित कपूर को जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रायपुर नियुक्त किया गया है। वहीं, छत्तीसगढ़ न्यायिक अकादमी के एडिशनल डायरेक्टर अमित कुमार कोहली को प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बलरामपुर-रामानुजगंज की जिम्मेदारी दी गई है। इन नियुक्तियों को न्यायिक अनुभव और प्रशासनिक दक्षता के आधार पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की ओर से जारी यह आदेश आधिकारिक वेबसाइट पर भी अपलोड कर दिया गया है। संबंधित अधिकारियों को निर्धारित समय के भीतर अपने नए पदस्थापन स्थल पर कार्यभार ग्रहण करने के निर्देश दिए गए हैं। न्यायिक प्रशासन से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि समय-समय पर इस तरह के स्थानांतरण से न्यायिक व्यवस्था में कार्यकुशलता बढ़ती है और विभिन्न जिलों में लंबित मामलों के प्रभावी निपटारे में भी सहायता मिलती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/major-administrative-reshuffle-in-chhattisgarh-judiciary-transfer-of-17-judicial/article-57783</link>
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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 18:26:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मेडिकल कॉलेजों में डीन की सीधी भर्ती पर हाईकोर्ट की रोक, सरकार से मांगा जवाब</title>
                                    <description><![CDATA[मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पांच मेडिकल कॉलेजों में डीन की सीधी भर्ती प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाई। याचिका में भर्ती नियमों के उल्लंघन का दावा किया गया है, जिससे नियुक्ति प्रक्रिया और पूर्व की गई भर्तियों पर भी सवाल उठने लगे हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-bans-direct-recruitment-of-deans-in-medical-colleges/article-57740"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/mp-medical-college-dean.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">मध्य प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा विभाग से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में हाईकोर्ट ने प्रदेश के पांच मेडिकल कॉलेजों में डीन पदों पर प्रस्तावित सीधी भर्ती प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने 18 मई 2026 को जारी भर्ती विज्ञापन पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से दो सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। यह आदेश 30 जून को जस्टिस विशाल धागत की एकलपीठ ने सुनाया। अदालत के इस अंतरिम फैसले के बाद संबंधित भर्ती प्रक्रिया फिलहाल स्थगित हो गई है और अब सरकार को भर्ती नियमों के अनुरूप अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा। यह मामला रीवा के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. मनोज इंदुलकर द्वारा दायर याचिका के बाद सामने आया। याचिका में दावा किया गया कि मध्य प्रदेश चिकित्सा शिक्षा भर्ती नियम, 2023 के अनुसार डीन का पद शत-प्रतिशत पदोन्नति से भरा जाना निर्धारित है। ऐसे में इन पदों पर सीधी भर्ती के लिए विज्ञापन जारी करना नियमों का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता एल.सी. पाटनी ने अदालत के समक्ष तर्क रखा कि जब सेवा नियम स्पष्ट रूप से पदोन्नति का प्रावधान करते हैं, तब प्रत्यक्ष भर्ती की प्रक्रिया शुरू करना विधिसम्मत नहीं माना जा सकता। इन दलीलों पर प्रारंभिक सुनवाई के दौरान अदालत ने भर्ती प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने का फैसला सुनाया।</p>
<p class="isSelectedEnd">हाईकोर्ट के इस आदेश का सीधा असर प्रदेश के पांच मेडिकल कॉलेजों पर पड़ेगा। इनमें नए मेडिकल कॉलेज बुधनी, छतरपुर और दमोह के अलावा दो अन्य कॉलेज भी शामिल हैं, जहां डीन पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही थी। इन संस्थानों में प्रशासनिक नेतृत्व की नियुक्ति अब न्यायालय के अंतिम निर्णय तक प्रभावित रह सकती है। नए मेडिकल कॉलेजों में शैक्षणिक और प्रशासनिक गतिविधियों को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए डीन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में भर्ती प्रक्रिया रुकने से विभाग को वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखनी पड़ सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रोग्रेसिव मेडिकल टीचर एसोसिएशन (पीएमटीए) ने हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश का स्वागत किया है। संगठन के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राकेश मालवीया ने कहा कि चिकित्सा शिक्षा सेवा भर्ती नियमों में डीन का पद पूरी तरह पदोन्नति का पद निर्धारित किया गया है। इसके बावजूद सरकार ने सीधी भर्ती का रास्ता अपनाया, जो नियमों की भावना के अनुरूप नहीं था। उनका कहना है कि वरिष्ठ शिक्षकों को उनके अनुभव और सेवा के आधार पर पदोन्नति का अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि अंतिम सुनवाई में भी अदालत सेवा नियमों को ध्यान में रखते हुए निर्णय देगी।</p>
<p class="isSelectedEnd">मामले को और दिलचस्प बनाने वाली बात यह है कि इसी बीच सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) ने 30 जून को सभी विभागों को पदोन्नति प्रक्रिया जारी रखने के निर्देश दिए हैं। यह निर्देश वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. वैद्यनाथन के विधिक अभिमत के आधार पर जारी किए गए। विधिक राय में कहा गया कि पदोन्नति नियम-2025 पर किसी भी न्यायालय द्वारा अंतरिम रोक नहीं लगाई गई है। इसलिए विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक आयोजित कर पदोन्नति की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है। हालांकि यह भी स्पष्ट किया गया कि ऐसी सभी पदोन्नतियां न्यायालय के अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी। ऐसे में एक ओर सरकार पदोन्नति प्रक्रिया जारी रखने की बात कर रही है, जबकि दूसरी ओर चिकित्सा शिक्षा विभाग में डीन पदों पर सीधी भर्ती को लेकर न्यायिक विवाद खड़ा हो गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">हाईकोर्ट के इस अंतरिम आदेश के बाद वर्ष 2024 में हुई डीन की सीधी नियुक्तियां भी चर्चा के केंद्र में आ गई हैं। प्रदेश के 13 ऑटोनॉमस मेडिकल कॉलेजों में डीन के पदों को दो वर्ष पहले वैधानिक कारणों का हवाला देकर शासकीय घोषित किया गया था। इसके बाद नए मेडिकल कॉलेजों के संचालन के लिए कुल 19 डीन पदों पर सीधी भर्ती की गई थी। वर्तमान में इनमें से दो पद रिक्त बताए जा रहे हैं, जबकि तीन नए मेडिकल कॉलेज शुरू होने वाले हैं। इन्हीं पांच रिक्त पदों को भरने के लिए 18 मई 2026 को नया भर्ती विज्ञापन जारी किया गया था। अब अदालत द्वारा इस विज्ञापन पर रोक लगाए जाने के बाद यह सवाल भी उठने लगे हैं कि यदि सेवा नियमों में वास्तव में पदोन्नति का ही प्रावधान है, तो पहले की गई सीधी नियुक्तियों की वैधानिक स्थिति क्या होगी। हालांकि इस संबंध में अभी अदालत ने कोई टिप्पणी नहीं की है और यह विषय भविष्य की सुनवाई में सामने आ सकता है। अब इस मामले में राज्य सरकार को निर्धारित समय सीमा के भीतर हाईकोर्ट में अपना जवाब दाखिल करना होगा। सरकार यह स्पष्ट करेगी कि किन परिस्थितियों और कानूनी आधार पर डीन पदों के लिए सीधी भर्ती का निर्णय लिया गया। इसके बाद अदालत दोनों पक्षों की दलीलों और सेवा भर्ती नियमों का परीक्षण करेगी। यदि अदालत यह मानती है कि नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो भर्ती प्रक्रिया में व्यापक बदलाव संभव हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 09:58:09 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>स्कूलों में मंत्रोच्चार पर याचिका खारिज, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सबूत के साथ दोबारा आने को कहा</title>
                                    <description><![CDATA[राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर हाईकोर्ट ने फिलहाल हस्तक्षेप से इनकार किया, कहा- आदेश लागू होने के ठोस प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/raipur/chhattisgarh-high-court-rejects-petition-on-chanting-in-schools-asks/article-57670"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/chhattisgarh-high-court-(7).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य के सरकारी स्कूलों में मंत्रोच्चार कराए जाने संबंधी राज्य शासन के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका फिलहाल खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसे कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किए गए हैं, जिनसे यह साबित हो सके कि संबंधित आदेश का वास्तव में स्कूलों में पालन शुरू हो चुका है। ऐसे में न्यायालय ने इस स्तर पर किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि भविष्य में आदेश के अमल से जुड़े ठोस प्रमाण सामने आते हैं तो याचिकाकर्ता नई याचिका दाखिल कर सकते हैं। इस फैसले के बाद फिलहाल इस मुद्दे पर कानूनी राहत नहीं मिली है, लेकिन अदालत ने भविष्य के लिए कानूनी रास्ता खुला रखा है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह याचिका छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल सलमान रिज़वी की ओर से दायर की गई थी। याचिका में राज्य सरकार के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें स्कूलों में मंत्रोच्चार कराए जाने का प्रावधान बताया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह आदेश संविधान में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के विपरीत है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया था कि इस आदेश को असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त किया जाए। मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता डॉ. अमीर खान ने पक्ष रखा और कहा कि इस आदेश से संविधान के मूल प्रावधान प्रभावित होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने सबसे पहले इस बात पर जोर दिया कि अदालत किसी भी प्रशासनिक आदेश में तभी हस्तक्षेप करती है, जब उसके लागू होने या उससे प्रभावित होने के स्पष्ट और ठोस प्रमाण उपलब्ध हों। अदालत ने कहा कि मौजूदा याचिका में ऐसे दस्तावेज, वीडियो या अन्य सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई, जिससे यह साबित हो सके कि राज्य सरकार का आदेश वास्तव में स्कूलों में लागू किया जा चुका है। केवल आशंका या संभावना के आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता। इसी कारण अदालत ने फिलहाल याचिका स्वीकार करने से इनकार कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">अधिवक्ता डॉ. अमीर खान के अनुसार, सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में किसी सरकारी या सहायता प्राप्त स्कूल में इस आदेश का पालन कराए जाने के प्रमाण सामने आते हैं, तो याचिकाकर्ता उन साक्ष्यों को रिकॉर्ड पर रखकर दोबारा अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि वीडियो, फोटो, आधिकारिक दस्तावेज या अन्य विश्वसनीय सामग्री उपलब्ध होती है, तो उसके आधार पर नई याचिका पर विचार किया जा सकता है। इस टिप्पणी को मामले का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट हो गया है कि अदालत ने कानूनी चुनौती का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस फैसले के बाद फिलहाल राज्य सरकार के आदेश पर कोई न्यायिक रोक नहीं लगी है। हालांकि अदालत ने आदेश की वैधता पर कोई अंतिम टिप्पणी भी नहीं की है। न्यायालय का पूरा फोकस इस बात पर रहा कि याचिका में प्रस्तुत तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं बनती। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत ने इस मामले में प्रक्रिया संबंधी सिद्धांतों का पालन करते हुए फैसला दिया है। किसी भी नीति या प्रशासनिक आदेश को चुनौती देने के लिए उसके प्रभाव या क्रियान्वयन के पर्याप्त प्रमाण होना आवश्यक माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस मामले ने राज्य में शिक्षा व्यवस्था और धार्मिक गतिविधियों को लेकर एक नई बहस भी छेड़ दी है। एक पक्ष का मानना है कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं से जुड़े कार्यक्रम स्कूलों में कराए जा सकते हैं, जबकि दूसरा पक्ष इसे संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के संदर्भ में देख रहा है। हालांकि इन सभी मुद्दों पर हाईकोर्ट ने फिलहाल कोई टिप्पणी नहीं की और केवल उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही अपना निर्णय सुनाया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर केवल याचिका की स्वीकार्यता पर विचार कर रही थी, न कि आदेश की संवैधानिक वैधता पर। भविष्य में यदि किसी स्कूल में आदेश के पालन के प्रमाण सामने आते हैं और उसके आधार पर नई याचिका दायर होती है, तो अदालत उस समय मामले के संवैधानिक पहलुओं पर भी विस्तार से विचार कर सकती है। फिलहाल इस फैसले से यह संदेश गया है कि न्यायालय केवल अनुमान या आशंका के आधार पर हस्तक्षेप नहीं करेगा, बल्कि ठोस तथ्यों और साक्ष्यों को प्राथमिकता देगा। यही वजह है कि याचिकाकर्ता को दोबारा याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता भी दी गई है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>रायपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 17:22:30 +0530</pubDate>
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                <title>बिलासपुर की बदहाल बिजली व्यवस्था पर हाईकोर्ट सख्त, विभाग से मांगा जवाब</title>
                                    <description><![CDATA[आंधी-बारिश के बाद घंटों ब्लैकआउट और जलभराव पर हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए ऊर्जा विभाग व निगम अधिकारियों से जवाब तलब किया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/high-court-demands-strict-response-from-the-department-on-the/article-57672"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/bilaspur-news-(4).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में बिजली व्यवस्था की लगातार बिगड़ती स्थिति अब न्यायपालिका की निगरानी में पहुंच गई है। शहर में आधे घंटे की आंधी और बारिश के बाद पूरी रात बिजली गुल रहने और लोगों को भारी परेशानी झेलनी पड़ने के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने इस मामले को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार करते हुए ऊर्जा विभाग, नगर निगम और छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) के अधिकारियों से विस्तृत जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 7 जुलाई को निर्धारित की गई है।</p>
<p>दरअसल, सोमवार शाम बिलासपुर में तेज आंधी और बारिश के बाद शहर के अधिकांश हिस्सों में बिजली आपूर्ति पूरी तरह बाधित हो गई थी। कई इलाकों में रात करीब तीन बजे तक ब्लैकआउट की स्थिति बनी रही। गर्मी और उमस के बीच घंटों बिजली नहीं मिलने से लोग पूरी रात परेशान रहे। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि नाराज नागरिक बिजली विभाग के नेहरू नगर जोन कार्यालय पहुंच गए और अधिकारियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। लोगों का आरोप था कि विभाग की लापरवाही और कमजोर व्यवस्था के कारण हर बार हल्की बारिश या तेज हवा के बाद शहर को लंबे बिजली संकट का सामना करना पड़ता है।</p>
<p>जानकारी के अनुसार सरकंडा क्षेत्र के बंधवापारा फीडर, महर्षि स्कूल फीडर, ओम नगर, सिंधी कॉलोनी, वेयरहाउस क्षेत्र और शेफर स्कूल सहित कई प्रमुख फीडर पूरी तरह बंद हो गए थे। कई स्थानों पर बिजली के खंभे गिर गए, इंसुलेटर क्षतिग्रस्त हो गए और कलेक्टर बंगले के पास एक बड़ा पेड़ गिरने से 11 केवी की मुख्य बिजली लाइन भी टूट गई। इसके अलावा बृहस्पति बाजार सब स्टेशन में तकनीकी खराबी आने से वहां देर रात तक सुधार कार्य प्रभावित रहा। कई इलाकों में ट्रांसफार्मर खराब होने के कारण अगले दिन तक भी पूरी तरह बिजली बहाल नहीं हो सकी।</p>
<p>शहरवासियों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों से बिलासपुर में बिजली कटौती लगातार बढ़ती जा रही है। मामूली बारिश या तेज हवा के बाद कई घंटे तक बिजली गुल रहना अब सामान्य बात हो गई है। लोगों का आरोप है कि बिजली विभाग समय रहते आवश्यक रखरखाव नहीं करता, जिसके कारण हर बार ऐसी स्थिति बनती है। खासकर बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों को रातभर बिजली नहीं मिलने से काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।</p>
<p>बिजली विभाग के अधिकारियों ने भी माना है कि वे संसाधनों और कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं। विभाग के अनुसार आपात स्थिति से निपटने के लिए पूरी रात केवल तीन मरम्मत टीमें मैदान में थीं, जिनमें कुल 12 कर्मचारी शामिल थे। एक साथ कई जगह फॉल्ट आने के कारण प्रत्येक लाइन की मरम्मत में दो से तीन घंटे का समय लग रहा था। अधिकारियों का कहना है कि सीमित स्टाफ और लगातार बढ़ती शिकायतों के कारण बिजली आपूर्ति बहाल करने में अपेक्षा से अधिक समय लगा।</p>
<p>इस पूरे मामले को मीडिया में प्रमुखता से प्रकाशित खबरों के आधार पर हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान में लिया। अदालत ने माना कि यह केवल बिजली कटौती का मामला नहीं बल्कि आम नागरिकों के जीवन और मूलभूत सुविधाओं से जुड़ा गंभीर विषय है। इसी कारण इसे जनहित याचिका के रूप में दर्ज करते हुए संबंधित विभागों से जवाब मांगा गया है।</p>
<p>हाईकोर्ट ने ऊर्जा विभाग के सचिव, बिलासपुर नगर निगम आयुक्त और सीएसपीडीसीएल के प्रबंध निदेशक को व्यक्तिगत शपथपत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने पूछा है कि शहर में निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए क्या योजना तैयार की गई है। अदालत ने यह भी जानना चाहा है कि बिजली वितरण प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए विभाग किस प्रकार की कार्ययोजना पर काम कर रहा है।</p>
<p>केवल बिजली व्यवस्था ही नहीं, बल्कि शहर में जलभराव की समस्या भी अदालत की चिंता का विषय बनी है। हाईकोर्ट ने नगर निगम से सड़कों, गलियों और निचले इलाकों में पानी भरने से रोकने के लिए ड्रेनेज सिस्टम की वर्तमान स्थिति और उसके सुधार को लेकर भी विस्तृत जानकारी मांगी है। अदालत का मानना है कि बारिश के दौरान जलभराव और बिजली व्यवस्था दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और इनका प्रभाव सीधे आम लोगों के जीवन पर पड़ता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 16:06:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>12 साल की बच्ची से दुष्कर्म मामले में हाईकोर्ट सख्त, काउंसिलिंग रिपोर्ट तलब; आरोपी जीजा गिरफ्तार</title>
                                    <description><![CDATA[बैकुंठपुर की घटना में बच्चों की सुरक्षा और मानसिक स्थिति को बताया सर्वोपरि, अगली सुनवाई 2 जुलाई को]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/high-court-calls-for-strict-counseling-report-in-case-of/article-57527"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/sims-bilaspur-(1).jpg" alt=""></a><br /><div class="qMYqUG_convSearchResultHighlightRoot">
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<p style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के बैकुंठपुर से सामने आए 12 वर्षीय बच्ची से कथित दुष्कर्म और बाल संरक्षण से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी कानूनी प्रक्रिया से पहले बच्चों की सुरक्षा, मानसिक स्थिति और भविष्य सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों बच्चों को फिलहाल चाइल्ड वेलफेयर की निगरानी में रखने के निर्देश दिए हैं और काउंसिलिंग रिपोर्ट बंद लिफाफे में प्रस्तुत करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 2 जुलाई को निर्धारित की गई है। यह मामला दो अनाथ भाई-बहन से जुड़ा है। 12 वर्षीय बच्ची और उसका 9 वर्षीय भाई बैकुंठपुर में अपनी मुंहबोली बहन के घर रह रहे थे। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक दोनों बच्चों को वहीं आश्रय दिया गया था, लेकिन बाद में उनके साथ शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना के आरोप सामने आए। बताया गया कि लगातार प्रताड़ना से परेशान होकर दोनों बच्चे वहां से निकलकर अपने एक परिचित के पास पहुंच गए। इसके बाद मामले की सूचना पुलिस और चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) को दी गई।</p>
<p style="text-align:justify;">बच्चों को संरक्षण में लेने के बाद उनकी काउंसिलिंग कराई गई। इसी दौरान बच्ची ने कथित रूप से बताया कि उसकी मुंहबोली बहन के पति ने उसके साथ दुष्कर्म किया। शिकायत और काउंसिलिंग के आधार पर पुलिस ने संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है। इस बीच मामले ने नया मोड़ तब लिया जब बच्चों की मुंहबोली बहन ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर दावा किया कि दोनों बच्चों को अवैध रूप से चाइल्ड हेल्पलाइन में रखा गया है। हालांकि सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि रिकॉर्ड के अनुसार बच्ची को अंबिकापुर स्थित बालिका गृह तथा उसके भाई को बैकुंठपुर चाइल्ड वेलफेयर सेंटर में सुरक्षा के मद्देनजर रखा गया है। दोनों बच्चों को वैधानिक प्रक्रिया के तहत संरक्षण दिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया था कि दोनों बच्चों को अदालत में प्रस्तुत किया जाए। इसके बाद संबंधित जिला प्रशासन और महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारी बच्चों को लेकर हाईकोर्ट पहुंचे और अदालत के समक्ष पूरी स्थिति रखी गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि याचिका में कुछ तथ्यों को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बच्चों का हित और उनका मानसिक स्वास्थ्य है। इसलिए किसी भी निर्णय से पहले उनकी स्वतंत्र काउंसिलिंग आवश्यक है, ताकि वास्तविक परिस्थितियों का आकलन किया जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट के निर्देश पर बच्चों की काउंसिलिंग न्यायालय कक्ष के बजाय राज्य न्यायिक अकादमी में कराई गई। यह प्रक्रिया वरिष्ठ अधिवक्ता और संबंधित अधिकारियों की देखरेख में पूरी हुई। अदालत ने निर्देश दिया है कि काउंसिलिंग रिपोर्ट बंद लिफाफे में प्रस्तुत की जाए, ताकि बच्चों की निजता और पहचान पूरी तरह सुरक्षित रहे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि रिपोर्ट के आधार पर आगे की सुनवाई में आवश्यक निर्णय लिया जाएगा।  ऐसे मामलों में पीड़ित बच्चों की पहचान और गोपनीयता की रक्षा करना अत्यंत आवश्यक होता है। इसके साथ ही मनोवैज्ञानिक सहायता, सुरक्षित वातावरण और कानूनी संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कानून के अनुसार नाबालिग पीड़ितों से जुड़े मामलों में जांच और न्यायिक प्रक्रिया संवेदनशील तरीके से पूरी की जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">पुलिस अधिकारियों ने बताया कि आरोपी की गिरफ्तारी के बाद मामले की जांच विभिन्न पहलुओं से की जा रही है। मेडिकल रिपोर्ट, बच्चों के बयान, काउंसिलिंग रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। वहीं महिला एवं बाल विकास विभाग का कहना है कि दोनों बच्चों को फिलहाल सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराया गया है और उनकी नियमित काउंसिलिंग जारी रहेगी। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का उद्देश्य किसी व्यक्ति की अवैध हिरासत की जांच करना होता है। लेकिन यदि किसी नाबालिग को कानून के अनुसार सुरक्षा और संरक्षण के लिए अधिकृत संस्था में रखा गया हो, तो अदालत उपलब्ध रिकॉर्ड और तथ्यों के आधार पर निर्णय लेती है। यही कारण है कि इस मामले में हाईकोर्ट ने बच्चों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए विस्तृत रिपोर्ट और काउंसिलिंग को प्राथमिकता दी है। दोनों बच्चों को चाइल्ड वेलफेयर संस्थाओं की निगरानी में रखा गया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई तक उनकी सुरक्षा और देखभाल सुनिश्चित की जाए। वहीं आरोपी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले की जांच भी जारी रहेगी। </p>
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                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 15:13:48 +0530</pubDate>
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                <title>मध्य प्रदेश में पदोन्नति प्रक्रिया फिर होगी शुरू, सरकार ने सभी विभागों को दिए तैयारी के निर्देश</title>
                                    <description><![CDATA[सामान्य प्रशासन विभाग ने महाधिवक्ता की कानूनी राय के आधार पर सभी विभागों को पदोन्नति प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए, हालांकि सभी प्रमोशन अदालत के अंतिम फैसले के अधीन रहेंगे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/promotion-process-will-start-again-in-madhya-pradesh-government-has/article-57451"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mp-promotion-2026.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश के लाखों सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए लंबे इंतजार के बाद राहत भरी खबर सामने आई है। करीब एक दशक से विभिन्न कानूनी कारणों और न्यायालय में लंबित मामलों के चलते रुकी हुई पदोन्नति (प्रमोशन) प्रक्रिया अब दोबारा शुरू होने की दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है। सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने सोमवार को राज्य के सभी अपर मुख्य सचिवों, विभागाध्यक्षों, संभागायुक्तों और कलेक्टरों को पत्र जारी कर पदोन्नति प्रक्रिया शुरू करने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। विभागों को यह कार्रवाई महाधिवक्ता की कानूनी राय के आधार पर करने के लिए कहा गया है। हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि दिए जाने वाले सभी प्रमोशन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों के अंतिम निर्णय के अधीन होंगे। राज्य सरकार के इस फैसले को लंबे समय से प्रमोशन की प्रतीक्षा कर रहे कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। कई विभागों में वर्षों से पदोन्नति नहीं होने के कारण अधिकारी एक ही पद पर लंबे समय से कार्यरत हैं। इसका असर न केवल कर्मचारियों के करियर पर पड़ा, बल्कि विभागों की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक व्यवस्था भी प्रभावित हुई। अब सरकार के ताजा निर्देशों के बाद विभागीय स्तर पर पदोन्नति समितियों (DPC) की बैठकें बुलाने की तैयारी शुरू होने की संभावना है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी पत्र में बताया गया है कि मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम-2025 को लेकर न्यायालय में कई याचिकाएं लंबित हैं। इन मामलों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने महाधिवक्ता से कानूनी राय प्राप्त की थी। महाधिवक्ता ने वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. वैद्यनाथन की राय सरकार को भेजी, जिसके आधार पर विभागों को आगे की कार्रवाई करने के निर्देश जारी किए गए हैं। कानूनी राय में स्पष्ट किया गया है कि वर्तमान में हाईकोर्ट ने पदोन्नति नियम-2025 पर किसी प्रकार की अंतरिम रोक (स्टे) नहीं लगाई है। पहले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से प्रमोशन नहीं करने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन वह न्यायालय के आदेश का हिस्सा नहीं था और न ही किसी आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं और मामला नए सिरे से सुनवाई के लिए जाएगा। ऐसे में सरकार अपने वैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए पदोन्नति प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हालांकि कानूनी राय में यह भी कहा गया है कि सभी पदोन्नतियां न्यायालय के अंतिम फैसले के अधीन रहेंगी। इसका मतलब यह है कि यदि भविष्य में हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अलग आता है, तो सरकार को उसी के अनुरूप आगे की कार्रवाई करनी होगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य एक ओर प्रशासनिक कार्यों को सुचारु बनाए रखना है, वहीं दूसरी ओर न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान भी सुनिश्चित करना है। सरकार ने अपने पक्ष में यह भी कहा है कि लंबे समय से प्रमोशन नहीं होने के कारण कई महत्वपूर्ण पद खाली पड़े हैं। अनेक विभाग अपनी स्वीकृत क्षमता के मुकाबले लगभग 40 प्रतिशत कर्मचारियों के साथ काम कर रहे हैं। वरिष्ठ पद रिक्त होने से निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है और निचले स्तर पर नई भर्तियां भी समय पर नहीं हो पा रही हैं। इससे प्रशासनिक व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;"> यदि पदोन्नति प्रक्रिया समय पर पूरी होती है तो इसका सकारात्मक असर पूरे प्रशासनिक ढांचे पर दिखाई देगा। वरिष्ठ पदों पर अधिकारियों की नियुक्ति होने से विभागों की कार्यक्षमता बढ़ेगी और खाली पदों पर नई भर्ती का रास्ता भी साफ होगा। इससे युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी बन सकते हैं। राज्य के कर्मचारी संगठनों ने भी सरकार के इस कदम का स्वागत किया है। उनका कहना है कि कई अधिकारी और कर्मचारी पिछले आठ से दस वर्षों से प्रमोशन का इंतजार कर रहे हैं। पदोन्नति नहीं मिलने के कारण न केवल उनका वेतन और सेवा लाभ प्रभावित हुए, बल्कि मनोबल पर भी असर पड़ा। संगठनों का कहना है कि यदि न्यायालय की शर्तों का पालन करते हुए प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है तो इससे कर्मचारियों को बड़ी राहत मिलेगी। अब सभी विभागों की नजर सामान्य प्रशासन विभाग के निर्देशों के बाद होने वाली विभागीय पदोन्नति समितियों की बैठकों पर रहेगी। माना जा रहा है कि विभाग अपने-अपने स्तर पर पात्र कर्मचारियों की वरिष्ठता सूची, सेवा अभिलेख और अन्य आवश्यक दस्तावेजों का परीक्षण शुरू करेंगे। इसके बाद डीपीसी की अनुशंसा के आधार पर पदोन्नति आदेश जारी किए जा सकते हैं। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि सभी आदेश न्यायालय के अंतिम निर्णय के अधीन होंगे। यदि भविष्य में अदालत कोई अलग निर्देश देती है तो उसी के अनुसार संशोधित कार्रवाई की जाएगी। इसलिए कर्मचारियों को प्रमोशन मिलने के बावजूद अंतिम कानूनी स्थिति का इंतजार करना पड़ सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 18:04:50 +0530</pubDate>
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