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                <title>Wildlife News - दैनिक जागरण</title>
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                <title>मुंगेली के जंगल में तेंदुओं की खूनी जंग, एक की मौत; दूसरा गंभीर घायल</title>
                                    <description><![CDATA[क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई में हुआ जानलेवा संघर्ष, कानन पेंडारी में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम करेगी पोस्टमार्टम]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/6a3270ab1daf9/article-56214"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mungeli-leopard-death.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के मुंगेली वनमंडल में मंगलवार शाम एक दुर्लभ और चौंकाने वाली वन्यजीव घटना सामने आई। लोरमी वन परिक्षेत्र के चंदूपारा बीट स्थित जंगल में दो तेंदुओं के बीच हुए भीषण संघर्ष में एक तेंदुए की मौत हो गई, जबकि दूसरा गंभीर रूप से घायल बताया जा रहा है। घटना की जानकारी मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और पूरे क्षेत्र को सुरक्षा घेरे में लेकर जांच शुरू कर दी। दोनों तेंदुओं के बीच क्षेत्रीय वर्चस्व को लेकर संघर्ष हुआ, जो इतना हिंसक था कि एक तेंदुए की जान चली गई। घटना मंगलवार शाम करीब सात बजे की बताई जा रही है। स्थानीय ग्रामीणों ने जंगल से तेज गर्जना और जानवरों के लड़ने जैसी आवाजें सुनी थीं। कुछ लोगों ने दूर से टॉर्च की रोशनी में दो बड़े वन्यजीवों को आपस में भिड़ते हुए देखने का दावा भी किया है। हालांकि अंधेरा बढ़ने के कारण कोई भी व्यक्ति घटनास्थल के करीब नहीं जा सका। बाद में ग्रामीणों की सूचना पर वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची, जहां जंगल के भीतर एक तेंदुआ मृत अवस्था में पड़ा मिला।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वन अधिकारियों के अनुसार मृत तेंदुए के शरीर पर कई गंभीर घाव पाए गए हैं। उसके चेहरे, गर्दन और शरीर के अन्य हिस्सों पर गहरे जख्म के निशान मिले हैं। इन निशानों को देखकर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि संघर्ष काफी देर तक चला होगा। वन अमले ने घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद मृत तेंदुए के आसपास के इलाके को सुरक्षित कर लिया और रातभर निगरानी के लिए कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई। घटना के बाद दूसरा तेंदुआ जंगल की ओर चला गया। वन विभाग की टीम ने उसकी तलाश शुरू की, लेकिन देर रात तक उसका कोई स्पष्ट सुराग नहीं मिल पाया। हालांकि सर्च अभियान के दौरान कुछ स्थानों से कराहने जैसी आवाजें सुनाई देने की जानकारी सामने आई है। अधिकारियों का मानना है कि दूसरा तेंदुआ भी गंभीर रूप से घायल हो सकता है और उसे चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता पड़ सकती है। इसी संभावना को देखते हुए जंगल के भीतर निगरानी और खोज अभियान लगातार जारी रखा गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वन विभाग का कहना है कि तेंदुए स्वभाव से एकाकी और क्षेत्रीय प्रवृत्ति वाले वन्यजीव होते हैं। विशेष रूप से वयस्क नर तेंदुए अपने क्षेत्र में दूसरे नर तेंदुओं की मौजूदगी को आसानी से स्वीकार नहीं करते। कई बार भोजन, क्षेत्र और मादा तेंदुए की उपस्थिति को लेकर उनके बीच संघर्ष की स्थिति बन जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे संघर्ष सामान्यतः छोटे स्तर पर होते हैं, लेकिन कभी-कभी यह जानलेवा रूप भी ले लेते हैं। मुंगेली की यह घटना भी उसी प्रकार के संघर्ष का परिणाम मानी जा रही है। वन अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी प्रकार के शिकार या अवैध गतिविधि की संभावना को भी नजरअंदाज नहीं किया गया। घटनास्थल पर पहुंचने के बाद मृत तेंदुए के शरीर का विस्तृत निरीक्षण किया गया। उसके नाखून, दांत और अन्य अंग सुरक्षित पाए गए हैं। शरीर पर गोली, फंदे या किसी अन्य बाहरी हमले के संकेत नहीं मिले। इसी वजह से फिलहाल शिकार की आशंका कमजोर मानी जा रही है और आपसी संघर्ष को मौत का प्रमुख कारण माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बुधवार को मृत तेंदुए के शव को कानन पेंडारी भेजने की तैयारी की गई, जहां विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों की टीम पोस्टमार्टम करेगी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद मौत के वास्तविक कारणों की पुष्टि हो सकेगी। वन विभाग का कहना है कि रिपोर्ट आने के बाद आगे की जांच और आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा शरीर के आंतरिक अंगों की भी जांच की जाएगी ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मृत्यु केवल बाहरी चोटों के कारण हुई या कोई अन्य कारण भी इसमें शामिल था। ग्रामीणों से मिली जानकारी और घटनास्थल पर मिले साक्ष्यों के आधार पर संघर्ष की आशंका मजबूत है। उन्होंने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगी। वन विभाग पूरे क्षेत्र में निगरानी बढ़ा रहा है और घायल तेंदुए की तलाश प्राथमिकता के आधार पर की जा रही है। इस घटना ने एक बार फिर वन्यजीव संरक्षण और जंगलों में बढ़ते दबाव को लेकर सवाल खड़े किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वन क्षेत्रों में आवास और संसाधनों को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण वन्यजीवों के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ सकती हैं। हालांकि तेंदुओं के बीच क्षेत्रीय संघर्ष कोई नई बात नहीं है, लेकिन किसी संघर्ष में एक तेंदुए की मौत हो जाना बेहद दुर्लभ माना जाता है। वन विभाग की टीम जंगल में लगातार गश्त कर रही है। आसपास के ग्रामीणों को भी सतर्क रहने की सलाह दी गई है। घायल तेंदुए के मिलने पर उसका उपचार कराने और उसे सुरक्षित स्थान पर ले जाने की तैयारी की गई है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 15:56:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>250 साल पुराने बिकमा तालाब में निकले मगरमच्छ के बच्चे, वन विभाग ने सुरक्षित छोड़ा खूंटाघाट बांध</title>
                                    <description><![CDATA[रतनपुर के ऐतिहासिक तालाब में सुबह दिखा दुर्लभ नजारा, स्थानीय लोगों और वन विभाग की सतर्कता से छह मगरमच्छ शावकों को सुरक्षित स्थानांतरित किया गया]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/crocodile-babies-hatched-in-250-year-old-bikma-pond-forest/article-55822"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/bikma-talab-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बिलासपुर जिले के रतनपुर स्थित ऐतिहासिक बिकमा तालाब में शुक्रवार सुबह उस समय लोगों की उत्सुकता बढ़ गई, जब तालाब के किनारे मगरमच्छ के अंडों से बच्चों को निकलते हुए देखा गया। सुबह स्नान और दैनिक कार्यों के लिए पहुंचे स्थानीय लोगों ने यह दुर्लभ दृश्य देखा तो पहले तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। कुछ ही देर में यह खबर आसपास के इलाके में फैल गई और तालाब के किनारे लोगों की भीड़ जुटने लगी। हालात को देखते हुए स्थानीय नागरिकों ने समझदारी दिखाते हुए मगरमच्छ के नवजात बच्चों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की और तुरंत वन विभाग तथा पुलिस को सूचना दी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक सुबह के समय तालाब के किनारे कुछ हलचल दिखाई दी। करीब जाकर देखने पर पता चला कि मगरमच्छ के अंडों से बच्चे बाहर निकल रहे हैं। चूंकि तालाब के आसपास लोगों की आवाजाही रहती है, ऐसे में बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई। स्थानीय लोगों ने बिना किसी नुकसान के सभी बच्चों को सावधानीपूर्वक एक टब में रखा ताकि उन्हें किसी प्रकार का खतरा न पहुंचे। सूचना मिलने के बाद वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और पूरे घटनाक्रम का निरीक्षण किया। वन विभाग के अधिकारियों ने प्रारंभिक जांच के बाद बताया कि तालाब में मौजूद मगरमच्छों द्वारा दिए गए अंडों से इन बच्चों का जन्म हुआ है। बच्चों की उम्र कुछ ही घंटे आंकी गई। विशेषज्ञों की सलाह के बाद निर्णय लिया गया कि इन्हें ऐसे जलाशय में छोड़ा जाए जहां इनके सुरक्षित विकास की संभावना अधिक हो। इसके बाद सभी छह मगरमच्छ शावकों को खूंटाघाट बांध ले जाया गया और वहां प्राकृतिक वातावरण में छोड़ दिया गया। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान स्थानीय प्रशासन और वन विभाग के कर्मचारियों ने विशेष सावधानी बरती।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वार्ड पार्षद मनोज पाटले ने बताया कि बिकमा तालाब में लंबे समय से मगरमच्छों की मौजूदगी दर्ज की जाती रही है। वर्तमान में तालाब में तीन मगरमच्छ होने की जानकारी है, जिनकी समय-समय पर निगरानी भी की जाती है। उन्होंने कहा कि मगरमच्छ के बच्चों के निकलने की जानकारी मिलते ही वन विभाग से संपर्क किया गया ताकि किसी तरह की अप्रिय स्थिति न बने। बच्चों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने में स्थानीय नागरिकों ने भी सहयोग किया। इस घटना ने एक बार फिर बिकमा तालाब को चर्चा में ला दिया है। रतनपुर का यह तालाब केवल जल स्रोत नहीं बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का केंद्र भी माना जाता है। बताया जाता है कि इसका निर्माण करीब 250 वर्ष पहले मराठा शासनकाल में कराया गया था। इतिहासकारों के अनुसार छत्तीसगढ़ में स्वतंत्र और प्रत्यक्ष शासन स्थापित करने वाले मराठा शासक विंबाजी राव भोसले ने इस तालाब का निर्माण करवाया था। वर्षों से यह तालाब क्षेत्र की पहचान बना हुआ है और स्थानीय लोगों की आस्था तथा इतिहास से जुड़ा हुआ है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बिकमा तालाब से जुड़ी कई लोक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि तालाब की खुदाई के दौरान भगवान राम की एक प्रतिमा प्राप्त हुई थी। बाद में इस प्रतिमा को रतनपुर की रामटेकरी स्थित श्रीराम मंदिर में स्थापित किया गया। क्षेत्र के बुजुर्गों और धार्मिक मान्यताओं से जुड़े लोगों के बीच यह कथा लंबे समय से सुनाई जाती रही है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन लोगों की आस्था आज भी इस मान्यता से जुड़ी हुई है। रतनपुर निवासी अजय गुप्ता बताते हैं कि मंदिर में स्थापित प्रतिमा सालिगराम पत्थर से निर्मित मानी जाती है। प्रतिमा में भगवान श्रीराम को अजानुबाहू स्वरूप में दर्शाया गया है। यही कारण है कि तालाब और मंदिर दोनों स्थानीय धार्मिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं। कई श्रद्धालु आज भी इस कथा को सुनने और मंदिर के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दूसरी ओर पुरातत्व विशेषज्ञ इस मामले में संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की बात कहते हैं। पुरातत्ववेत्ता राहुल सिंह के अनुसार बिकमा तालाब निश्चित रूप से ऐतिहासिक महत्व का स्थल है, लेकिन तालाब से भगवान राम की प्रतिमा मिलने संबंधी दावे के समर्थन में उनके पास कोई प्रमाणिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने कहा कि यह स्थानीय परंपराओं और आस्था से जुड़ा विषय है, इसलिए बिना पर्याप्त साक्ष्यों के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। मगरमच्छ के बच्चों के जन्म की इस घटना ने वन्यजीव संरक्षण को लेकर भी चर्चा बढ़ा दी है। वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि यह संकेत है कि क्षेत्र का प्राकृतिक वातावरण अभी भी वन्यजीवों के लिए अनुकूल बना हुआ है। मगरमच्छ जैसे संवेदनशील जीवों का प्रजनन होना पर्यावरणीय संतुलन की दृष्टि से सकारात्मक माना जाता है। विभाग ने लोगों से अपील की है कि वे ऐसे वन्यजीवों के प्रति सतर्कता और संवेदनशीलता बनाए रखें तथा किसी भी असामान्य स्थिति की सूचना तत्काल संबंधित विभाग को दें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 14:11:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>रायगढ़ में हाथी शावकों की मौत का खुलासा, संक्रमण बना वजह</title>
                                    <description><![CDATA[25 दिनों में चार शावकों की मौत से बढ़ी चिंता, देहरादून और बरेली लैब की रिपोर्ट में हेपेटाइटिस व सेप्टिसीमिया की पुष्टि]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/infection-became-the-reason-for-the-death-of-elephant-cubs/article-55393"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/elephant-calf-death.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">रायगढ़ और धरमजयगढ़ वन मंडलों में पिछले कुछ सप्ताह से हाथी शावकों की लगातार हो रही मौतों के मामले में अब जांच रिपोर्ट सामने आ गई है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जिन शावकों की मौत हुई, उनमें से एक की जान हेपेटाइटिस यानी लिवर संक्रमण और दूसरे की मौत सेप्टिसीमिया यानी गंभीर रक्त संक्रमण के कारण हुई। इससे पहले एक अन्य शावक की मौत निमोनिया से होने की पुष्टि हो चुकी थी। महज 25 दिनों के भीतर एक ही हाथी दल के चार शावकों की मौत ने वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है। मामले को गंभीर मानते हुए विभाग ने विशेषज्ञों की मदद से जांच कराई थी और अब रिपोर्ट आने के बाद मौतों के पीछे की वजह काफी हद तक साफ हो गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">8 मई से 1 जून के बीच रायगढ़ और धरमजयगढ़ क्षेत्र के जंगलों में अलग-अलग स्थानों पर हाथी शावकों के शव मिले थे। शुरुआती स्तर पर यह स्पष्ट नहीं था कि मौतों की वजह क्या है। कई मामलों में शावकों के शव जल स्रोतों और तालाबों के आसपास पाए गए थे, जिससे वन अमले के सामने कई सवाल खड़े हो गए थे। चूंकि सभी शावक एक ही हाथी दल से जुड़े बताए जा रहे थे, इसलिए संक्रमण फैलने की आशंका भी जताई जा रही थी। अधिकारियों के अनुसार पोस्टमॉर्टम के दौरान आवश्यक नमूने एकत्र किए गए और उन्हें जांच के लिए देहरादून तथा बरेली स्थित प्रयोगशालाओं में भेजा गया था। अब आई रिपोर्ट में दो अलग-अलग तरह के संक्रमण की पुष्टि हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का कहना है कि हेपेटाइटिस ऐसा संक्रमण है जो सीधे लिवर को प्रभावित करता है। इसके कारण शरीर की कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं प्रभावित होने लगती हैं। दूसरी ओर सेप्टिसीमिया एक गंभीर स्थिति होती है जिसमें रक्त संक्रमित हो जाता है और संक्रमण पूरे शरीर में फैलने लगता है। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक छोटे शावकों में ऐसी बीमारियां तेजी से असर दिखाती हैं और समय पर इलाज या पहचान नहीं होने पर जान का खतरा बढ़ जाता है। यही वजह है कि हाथी शावकों की मौत के मामलों को लेकर विभाग अब पहले से ज्यादा सतर्क नजर आ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">लगातार सामने आ रही घटनाओं के बाद वन विभाग ने हाल ही में एक विशेष कार्यशाला का आयोजन भी किया। दो दिन तक चले इस कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों से आए वैज्ञानिकों, वन्यजीव विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने हिस्सा लिया। कार्यशाला के दौरान हाथियों में होने वाली बीमारियों, संक्रमण के कारणों, स्वास्थ्य निगरानी और बचाव के उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई। अधिकारियों और मैदानी कर्मचारियों को भी यह बताया गया कि जंगलों में किसी हाथी या शावक के असामान्य व्यवहार को कैसे पहचानना है और बीमारी की आशंका होने पर तत्काल क्या कदम उठाने चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि रायगढ़ और धरमजयगढ़ के जंगलों में इस समय कुल 137 हाथी मौजूद हैं। इनमें 37 नर, 62 मादा और 35 शावक शामिल हैं। शावकों की लगातार मौत के बाद विभाग ने विशेष निगरानी अभियान शुरू कर दिया है। हाथी मित्र दल, ट्रैकर्स और वनकर्मियों की टीमें लगातार जंगलों में सक्रिय हैं। हाथियों के मूवमेंट पर नजर रखने के लिए ट्रैप कैमरों और ड्रोन का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। रात के समय थर्मल ड्रोन की मदद से हाथियों की लोकेशन और गतिविधियों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है ताकि किसी भी तरह की समस्या का समय रहते पता लगाया जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;">वन अधिकारियों का मानना है कि जंगलों में रहने वाले हाथियों के स्वास्थ्य की निगरानी आसान नहीं होती। कई बार बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखाई नहीं देते और जब तक स्थिति स्पष्ट होती है तब तक काफी देर हो चुकी होती है। ऐसे में तकनीक और विशेषज्ञों की मदद से निगरानी बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। विभाग का उद्देश्य सिर्फ मौतों के कारणों की पहचान करना नहीं बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकना भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">डीएफओ जितेंद्र उपाध्याय ने बताया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की मौजूदगी में पोस्टमॉर्टम कराया गया था। जांच रिपोर्ट में एक शावक की मौत हेपेटाइटिस और दूसरे की मौत सेप्टिसीमिया के कारण होने की पुष्टि हुई है। उन्होंने कहा कि विभाग अब एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार कर रहा है ताकि हाथी शावकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और जंगलों में संक्रमण से जुड़े मामलों की समय रहते पहचान हो सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 12:57:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>पोल्ट्री फार्म में घुसा तेंदुआ, 10 मुर्गियों का किया शिकार</title>
                                    <description><![CDATA[धमतरी के मोहलाई गांव में CCTV में कैद हुई घटना, रिहायशी इलाके के करीब तेंदुए की मौजूदगी से ग्रामीणों में बढ़ी चिंता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/6a2541ae6b9a3/article-55190"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/leopard-attack-dhamtari.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में एक बार फिर तेंदुए की आमद ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है। जिले के केरेगांव रेंज अंतर्गत ग्राम मोहलाई स्थित एक निजी पोल्ट्री फार्म में गुरुवार देर रात तेंदुआ घुस गया और उसने करीब 10 मुर्गियों का शिकार कर लिया। पूरी घटना वहां लगे सीसीटीवी कैमरे में रिकॉर्ड हो गई, जिसका वीडियो अब सामने आया है। वीडियो में तेंदुआ फार्म के भीतर घूमता दिखाई देता है और कुछ मुर्गियों को अपने जबड़े में दबाकर ले जाते हुए नजर आता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जानकारी के मुताबिक, घटना गुरुवार रात की है। बताया जा रहा है कि तेंदुआ पोल्ट्री फार्म की सुरक्षा जाली को नुकसान पहुंचाकर अंदर दाखिल हुआ था। जैसे ही वह फार्म के भीतर पहुंचा, वहां मौजूद मुर्गियों में अफरा-तफरी मच गई। कई मुर्गियां इधर-उधर भागने लगीं जबकि कुछ डर के कारण एक कोने में सिमट गईं। इसी दौरान तेंदुए ने एक के बाद एक कई मुर्गियों को अपना शिकार बना लिया। सुबह जब फार्म संचालक वहां पहुंचे तो उन्हें कई मुर्गियां गायब मिलीं और कुछ मृत अवस्था में पड़ी थीं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">घटना के बाद इलाके में दहशत का माहौल है क्योंकि जिस पोल्ट्री फार्म में तेंदुआ घुसा, वह रिहायशी क्षेत्र से महज 500 से 700 मीटर की दूरी पर स्थित है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर तेंदुआ भोजन की तलाश में आबादी वाले इलाके की ओर बढ़ा तो लोगों की सुरक्षा पर भी खतरा पैदा हो सकता है। खासकर बच्चों और मवेशियों को लेकर ग्रामीणों में चिंता बढ़ गई है। गांव के लोगों ने वन विभाग से लगातार निगरानी और सुरक्षा इंतजाम बढ़ाने की मांग की है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">स्थानीय लोगों के अनुसार मोहलाई गांव जंगल से सटा हुआ क्षेत्र है। यहां अक्सर हिरण, चीतल, सियार और लकड़बग्घा जैसे वन्य जीव दिखाई देते रहते हैं। हालांकि तेंदुए की मौजूदगी ने लोगों की चिंता कहीं ज्यादा बढ़ा दी है। ग्रामीणों का कहना है कि पिछले कुछ समय में यह तीसरी बार है जब आसपास के पोल्ट्री फार्मों के नजदीक तेंदुआ देखा गया है। इससे पहले भी उसकी गतिविधियां दर्ज की गई थीं, लेकिन मुर्गियों पर इस तरह हमला करने की घटना सामने नहीं आई थी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पोल्ट्री फार्म संचालक साजिद अब्दुल हमीद ने बताया कि सीसीटीवी फुटेज में तेंदुआ दो से तीन मुर्गियों को उठाकर ले जाता दिखाई दे रहा है, लेकिन वास्तविक नुकसान इससे कहीं ज्यादा है। उनके अनुसार करीब 10 मुर्गियां गायब मिलीं और कुछ मुर्गियां मृत पड़ी थीं। उन्होंने बताया कि बीते 10 दिनों के दौरान फार्म में लगभग 500 मुर्गियों की मौत हुई है, जिससे उन्हें एक से डेढ़ लाख रुपये तक का नुकसान होने का अनुमान है। लगातार हो रहे नुकसान को देखते हुए उन्होंने पूरे फार्म को फिलहाल खाली करा दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">घटना की जानकारी मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और स्थिति का जायजा लिया। अधिकारियों ने आसपास के क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी है। वन विभाग के कर्मचारियों ने ग्रामीणों से रात के समय अकेले जंगल की ओर नहीं जाने, छोटे बच्चों को घर के आसपास रखने और पालतू पशुओं को सुरक्षित स्थान पर बांधने की सलाह दी है। गांव में लोगों को सतर्क रहने के लिए भी कहा गया है। धमतरी वन मंडल के डीएफओ श्रीकृष्ण जाधव ने बताया कि मोहलाई गांव स्थित पोल्ट्री फार्म में तेंदुए के घुसने की सूचना विभाग को मिली है। प्रारंभिक जांच में तेंदुए की गतिविधि की पुष्टि हुई है। उन्होंने बताया कि विभाग की टीम लगातार गश्त कर रही है और पूरे इलाके पर नजर रखी जा रही है। साथ ही पोल्ट्री फार्म में हुए नुकसान का आंकलन करने के निर्देश दिए गए हैं ताकि नियमानुसार क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया पूरी की जा सके।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वन विभाग का मानना है कि जंगलों में भोजन की उपलब्धता कम होने और मानव बस्तियों के विस्तार के कारण कई बार जंगली जानवर आबादी वाले क्षेत्रों की ओर पहुंच जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में लोगों को घबराने की बजाय सतर्क रहने की जरूरत होती है। वहीं ग्रामीण चाहते हैं कि वन विभाग इलाके में कैमरा ट्रैप लगाए और तेंदुए की गतिविधियों पर लगातार नजर रखे ताकि किसी बड़ी घटना को रोका जा सके। मोहलाई गांव और आसपास के क्षेत्रों में तेंदुए की मौजूदगी चर्चा का विषय बनी हुई है। सीसीटीवी में कैद तस्वीरों ने लोगों की चिंता और बढ़ा दी है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि वन विभाग जल्द ही प्रभावी कदम उठाएगा, जिससे लोगों और पशुधन की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 16:27:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कूनो नेशनल पार्क में दिखी दुर्लभ कैराकल बिल्ली, दशकों बाद वापसी से वन्यजीव विशेषज्ञ उत्साहित</title>
                                    <description><![CDATA[श्योपुर के कूनो नेशनल पार्क में कैमरा ट्रैप सर्वेक्षण के दौरान कैद हुई दुर्लभ कैराकल, मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इसे जैव विविधता और संरक्षण प्रयासों की बड़ी सफलता बताया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/wildlife-experts-excited-by-the-return-of-rare-caracal-cat/article-55077"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/kuno-national-park.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले स्थित कूनो नेशनल पार्क से वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पर्यावरण प्रेमियों, वन्यजीव विशेषज्ञों और संरक्षण से जुड़े अधिकारियों को उत्साहित कर दिया है। वर्षों बाद दुर्लभ जंगली बिल्ली कैराकल की मौजूदगी कूनो में दर्ज की गई है। कैमरा ट्रैप सर्वेक्षण के दौरान कैद हुई इस दुर्लभ प्रजाति की तस्वीरों ने यह संकेत दिया है कि कूनो का पारिस्थितिकी तंत्र लगातार मजबूत हो रहा है और यहां वन्यजीवों के लिए अनुकूल वातावरण विकसित हो रहा है। लंबे समय से इस प्रजाति के दर्शन न होने के कारण इसे लेकर चिंताएं जताई जाती रही थीं, लेकिन अब इसकी वापसी ने संरक्षण प्रयासों को नई उम्मीद दी है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर सामने आई इस जानकारी को राज्य सरकार ने भी महत्वपूर्ण उपलब्धि माना है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट साझा करते हुए खुशी व्यक्त की और कहा कि प्रकृति ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन के प्रयास सकारात्मक परिणाम दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि कूनो नेशनल पार्क में कैमरा ट्रैप के दौरान कैराकल का दिखाई देना कई वर्षों बाद इस क्षेत्र में उसकी वापसी का संकेत है। मुख्यमंत्री के अनुसार यह केवल एक वन्यजीव की मौजूदगी नहीं बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के बेहतर होने का प्रमाण भी है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कैराकल एक बेहद दुर्लभ और शर्मीली जंगली बिल्ली मानी जाती है। इसकी पहचान इसके लंबे पैरों, तेज शिकार क्षमता और कानों के ऊपर मौजूद काले बालों के गुच्छों से होती है। भारत में कभी यह प्रजाति कई हिस्सों में पाई जाती थी, लेकिन बदलते पर्यावरण, प्राकृतिक आवास के नुकसान और मानवीय हस्तक्षेप के कारण इसकी संख्या लगातार घटती चली गई। यही वजह है कि वन्यजीव विशेषज्ञ लंबे समय से इसके संरक्षण को लेकर चिंता व्यक्त करते रहे हैं। कूनो में इसकी मौजूदगी दर्ज होना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि यहां का जंगल और घासभूमि क्षेत्र इस प्रजाति के लिए अनुकूल साबित हो रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार कैमरा ट्रैप सर्वेक्षण नियमित निगरानी प्रक्रिया का हिस्सा था। इसी दौरान कैराकल की तस्वीरें रिकॉर्ड हुईं। प्रारंभिक अध्ययन के अनुसार यह क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से मौजूद वन्यजीव गतिविधियों का हिस्सा हो सकती है। हालांकि इसके व्यवहार, संख्या और आवागमन के बारे में अधिक जानकारी जुटाने के लिए निगरानी बढ़ाई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी क्षेत्र में कैराकल जैसी संवेदनशील प्रजाति दिखाई देती है तो यह उस इलाके के पारिस्थितिक स्वास्थ्य का सकारात्मक संकेत माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पिछले कुछ वर्षों में कूनो नेशनल पार्क लगातार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा है। विशेष रूप से प्रोजेक्ट चीता के तहत अफ्रीकी चीतों को यहां लाए जाने के बाद इस पार्क की पहचान और बढ़ी है। वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में इसे एक महत्वपूर्ण प्रयोग के रूप में देखा गया। अब कैराकल की मौजूदगी ने इस धारणा को और मजबूत किया है कि कूनो केवल चीतों के पुनर्वास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई अन्य वन्यजीव प्रजातियों के लिए भी सुरक्षित आवास के रूप में विकसित हो रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अपने बयान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संचालित प्रोजेक्ट चीता का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस परियोजना का प्रभाव केवल चीतों तक सीमित नहीं है बल्कि इससे पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र को लाभ मिल रहा है। बेहतर संरक्षण, वन प्रबंधन और निगरानी व्यवस्था के कारण विभिन्न वन्यजीव प्रजातियों के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार हुआ है। इससे जैव विविधता को भी मजबूती मिली है। किसी दुर्लभ प्रजाति की वापसी केवल संयोग नहीं होती। इसके पीछे वर्षों की संरक्षण नीति, प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन और स्थानीय स्तर पर किए गए प्रयास शामिल होते हैं। कूनो में कैराकल का दिखाई देना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। इससे भविष्य में और भी दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण को लेकर नई संभावनाएं खुल सकती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कूनो नेशनल पार्क में कैराकल की मौजूदगी ने वन्यजीव जगत में नई चर्चा शुरू कर दी है। आने वाले समय में विशेषज्ञ इस प्रजाति की गतिविधियों पर नजर रखेंगे और यह समझने का प्रयास करेंगे कि इसका आवास कितना विस्तृत है। लेकिन इतना तय है कि दशकों बाद मिली यह झलक मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों के लिए एक सकारात्मक और प्रेरणादायक संकेत बनकर सामने आई है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 12:44:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एमपी में 150 साल बाद लौटी जंगली भैंसें, सीएम मोहन यादव ने कान्हा में छोड़ी 4 भैंसें</title>
                                    <description><![CDATA[कान्हा टाइगर रिजर्व में जंगली भैंसों की वापसी, एमपी सरकार की बड़ी पहल। असम से लाए गए 4 भैंसे, इकोसिस्टम को मिलेगा लाभ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/wild-buffaloes-returned-to-mp-after-150-years-cm-mohan/article-52276"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/kanha-national-park-wild-buffalo.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले स्थित कान्हा क्षेत्र में करीब डेढ़ सदी बाद जंगली भैंसों की वापसी हुई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सुपखार रेंज में चार जंगली भैंसों को बाड़े में छोड़कर पुनर्स्थापन योजना की शुरुआत की। ये भैंसे असम के काजीरंगा क्षेत्र से लगभग 2,000 किलोमीटर की दूरी तय कर यहां लाई गई हैं। इन भैंसों में तीन मादा और एक नर किशोर शावक शामिल है, जिन्हें विशेष निगरानी में रखा जाएगा। मुख्यमंत्री सुबह करीब 9:15 बजे सुपखार पहुंचे और निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 9:30 बजे औपचारिक रूप से भैंसों को छोड़ा गया। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">जानकारी के मुताबिक, 1960 और 1970 के दशक तक इस क्षेत्र में जंगली भैंसों की मौजूदगी दर्ज की गई थी, लेकिन बाद में वे धीरे-धीरे समाप्त हो गए। अब लगभग 150 साल बाद उनकी वापसी को वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से ऐतिहासिक माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">यह परियोजना ‘कान्हा टाइगर रिजर्व में जंगली भैंसा पुनर्स्थापन योजना</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;" xml:lang="en-us">’</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us"> </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">के तहत शुरू की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से इकोसिस्टम की एक महत्वपूर्ण कड़ी फिर से जुड़ सकेगी, जिससे प्राकृतिक संतुलन बेहतर होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कार्यक्रम के दौरान कहा कि यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि राज्य की पहचान को भी नया आयाम देगी। उन्होंने संकेत दिए कि भविष्य में कान्हा में गैंडे लाने की भी तैयारी चल रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">केंद्र सरकार के सहयोग से विलुप्तप्राय प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास में पुनर्स्थापित करने की योजना पर काम किया जा रहा है। इससे मध्य प्रदेश को ‘टाइगर स्टेट</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;" xml:lang="en-us">’</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us"> </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">के साथ-साथ ‘व्हाइट बफेलो स्टेट</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;" xml:lang="en-us">’</span><span lang="en-us" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="en-us"> </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">के रूप में पहचान दिलाने की कोशिश है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">इस परियोजना को लेकर वन्यजीव विशेषज्ञों और पर्यावरण प्रेमियों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि इससे न केवल वन्यजीवों की संख्या बढ़ेगी, बल्कि प्राकृतिक आवास भी मजबूत होगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/wild-buffaloes-returned-to-mp-after-150-years-cm-mohan/article-52276</link>
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                <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 17:16:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मध्य प्रदेश में बाघों की मौत पर बढ़ी चिंता, 6 दिन में 3 शावकों की मौत</title>
                                    <description><![CDATA[भुखमरी और प्रबंधन पर उठे सवाल, चार महीनों में 23 बाघों की मौत; विशेषज्ञों ने जताई गहरी चिंता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/concern-increased-over-the-death-of-tigers-in-madhya-pradesh/article-52198"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/mp-tiger-death-news.jpg" alt=""></a><br /><p>मध्यप्रदेश में बाघों की लगातार हो रही मौतों ने राज्य की ‘टाइगर स्टेट’ की पहचान पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला कान्हा टाइगर रिजर्व का है, जहां एक ही बाघिन के तीन शावकों की छह दिनों के भीतर मौत हो गई। इस घटना ने वन्यजीव संरक्षण की स्थिति और प्रबंधन प्रणाली पर बहस तेज कर दी है।</p>
<p>वन विभाग के अनुसार, अमाही क्षेत्र की बाघिन टी-141 के तीसरे शावक का शव शनिवार शाम सरही जोन में मिला। इससे पहले 21 और 24 अप्रैल को इसी बाघिन के दो अन्य शावकों की मौत हो चुकी थी। प्रारंभिक जांच में दो शावकों की मौत का कारण भुखमरी बताया गया है, जबकि तीसरे शावक के शव को विस्तृत परीक्षण के लिए जबलपुर स्थित वन्यजीव फॉरेंसिक प्रयोगशाला भेजा गया है।</p>
<p>यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब प्रदेश में जनवरी से अप्रैल के बीच बाघों की मौत का आंकड़ा 23 तक पहुंच चुका है। इनमें टेरिटोरियल संघर्ष, बीमारी, प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौतें भी शामिल हैं। अकेले अप्रैल में कान्हा और आसपास के क्षेत्रों में चार बाघों की मौत दर्ज की गई है।</p>
<p>मध्यप्रदेश, जो 785 बाघों के साथ देश में शीर्ष स्थान पर रहा है, अब संरक्षण के मोर्चे पर चुनौती का सामना कर रहा है। पिछले वर्षों के आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं—2021 में 34, 2022 में 43, 2023 में 45, 2024 में 46 और 2025 में 55 बाघों की मौत दर्ज की गई। छह वर्षों में कुल 269 बाघों की मौत इस बात का संकेत है कि संरक्षित क्षेत्रों में भी खतरे कम नहीं हुए हैं।</p>
<p>वन विभाग का कहना है कि सभी मामलों में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों का पालन किया जा रहा है और हर घटना की जांच की जा रही है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर निगरानी और त्वरित कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं।</p>
<p>फिलहाल, चौथे शावक की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बनी हुई है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट और विभागीय कदमों से यह तय होगा कि मध्यप्रदेश अपनी ‘टाइगर स्टेट’ की पहचान बरकरार रख पाएगा या नहीं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 11:46:40 +0530</pubDate>
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