<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.dainikjagranmpcg.com/environment/tag-11362" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>दैनिक जागरण RSS Feed Generator</generator>
                <title>Environment - दैनिक जागरण</title>
                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/tag/11362/rss</link>
                <description>Environment RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>स्पेन के जंगल में भीषण आग से 12 की मौत, 19 लापता; राहत अभियान जारी</title>
                                    <description><![CDATA[एंडालूसिया के लॉस गैलार्डोस क्षेत्र में लगी भीषण आग ने बड़े इलाके को अपनी चपेट में ले लिया। शुरुआती आशंका बिजली की गिरी हुई तार से आग लगने की है, हालांकि जांच अभी जारी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/12-killed-19-missing-in-massive-fire-in-spains-forest/article-58451"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/spain-wildfire.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">स्पेन के दक्षिणी हिस्से में स्थित एंडालूसिया क्षेत्र के लॉस गैलार्डोस में शुक्रवार को लगी भीषण जंगल की आग ने भारी तबाही मचा दी। इस हादसे में अब तक 12 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि 19 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। स्थानीय प्रशासन के अनुसार आठ लोग घायल हुए हैं और इनमें से चार की हालत गंभीर बनी हुई है। आग इतनी तेजी से फैली कि कई लोगों को सुरक्षित निकलने का मौका तक नहीं मिला। राहत और बचाव दल लगातार प्रभावित इलाकों में तलाश अभियान चला रहे हैं। प्रशासन का कहना है कि लापता लोगों की तलाश के लिए फायरफाइटर, पुलिस और सेना की इमरजेंसी यूनिट मिलकर काम कर रही है। भीषण गर्मी और तेज हवाओं के कारण आग पर पूरी तरह काबू पाने में मुश्किलें आ रही हैं। कई इलाकों से लोगों को पहले ही सुरक्षित स्थानों पर भेज दिया गया था, लेकिन कुछ लोग समय रहते बाहर नहीं निकल सके। स्थानीय अधिकारियों ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और केवल आधिकारिक सूचनाओं का पालन करने की अपील की है।</p>
<p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/andalusia-fire-(2).jpg" alt="Andalusia Fire" width="1366" height="749"></img></p>
<p style="text-align:justify;">प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक इस आग की शुरुआत बिजली की गिरी हुई तार से होने की आशंका जताई गई थी। एंडालूसिया की इमरजेंसी सर्विस ने शुरुआती कॉल के आधार पर यही संभावना व्यक्त की, लेकिन बिजली कंपनी एंडेसा ने इस दावे से इनकार किया है। कंपनी का कहना है कि जिस बिजली लाइन की बात सामने आ रही है, उसमें उस समय बिजली का प्रवाह नहीं था। ऐसे में आग लगने के वास्तविक कारणों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है और जांच जारी है। हादसे के दौरान सामने आई कई घटनाओं ने स्थिति की गंभीरता को और बढ़ा दिया। अधिकारियों के मुताबिक एक कार में सवार चार लोग आग की चपेट में आने से जिंदा जल गए। वाहन का स्टीयरिंग दाईं ओर होने के कारण आशंका जताई जा रही है कि वे ब्रिटिश नागरिक हो सकते हैं। इसके अलावा सात अन्य लोग भी मृत पाए गए, जिन्होंने अपनी गाड़ियां छोड़कर दूसरे रास्ते से निकलने की कोशिश की थी। प्रशासन का कहना है कि इन लोगों ने निर्धारित निकासी मार्ग का इस्तेमाल नहीं किया, जिससे वे तेजी से फैलती आग के बीच फंस गए।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/andalusia-fire-(1).jpg" alt="Andalusia Fire" width="1366" height="749"></img></p>
<p style="text-align:justify;">अधिकारियों ने लोगों से आपातकालीन स्थिति में केवल प्रशासन द्वारा बताए गए सुरक्षित मार्गों का ही उपयोग करने की अपील की है। राहत दलों के सामने चुनौती यह भी है कि कई इलाकों में धुआं इतना घना है कि दृश्यता बेहद कम हो गई है, जिससे खोज अभियान प्रभावित हो रहा है। 12 लोगों की मौत के साथ यह आग वर्ष 2005 के बाद स्पेन की सबसे घातक जंगल की आग मानी जा रही है। वर्ष 2005 में ग्वाडालाहारा प्रांत में लगी आग में 11 फायरफाइटरों की मौत हुई थी, जिसके बाद स्पेन ने जंगल की आग से निपटने की रणनीति और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली में कई बड़े बदलाव किए थे। इसके बावजूद इस बार की आग ने एक बार फिर प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। आग बुझाने के लिए करीब 150 फायरफाइटर लगातार मोर्चे पर डटे हुए हैं और सेना की इमरजेंसी यूनिट भी राहत कार्य में शामिल है। एंडालूसिया के आपातकाल प्रमुख एंटोनियो सान्ज के अनुसार मृतकों में एक स्पेनिश नागरिक है, जबकि बाकी अधिकांश विदेशी नागरिक बताए जा रहे हैं। शुरुआती जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ लोगों ने अधिकारियों की घरों के भीतर सुरक्षित रहने की सलाह का पालन नहीं किया और कारों से निकलने का प्रयास किया।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/andalusia-fire.jpg" alt="Andalusia Fire" width="1366" height="749"></img></p>
<p style="text-align:justify;">इसी दौरान वे आग की लपटों में घिर गए। लॉस गैलार्डोस के मेयर फ्रांसिस्को मिगुएल रेयेस ने इस घटना को अभूतपूर्व बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने जीवन में इतना भयावह मंजर पहले कभी नहीं देखा। उनके अनुसार पूरा इलाका ऐसा दिखाई दे रहा है मानो किसी बड़े विस्फोट ने सब कुछ तबाह कर दिया हो। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि यह हादसा पूरे देश के लिए बेहद दुखद है। यूरोपियन फॉरेस्ट फायर इंफॉर्मेशन सिस्टम के अनुसार इस वर्ष अब तक स्पेन में लगभग 57 हजार हेक्टेयर जंगल जल चुके हैं</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/12-killed-19-missing-in-massive-fire-in-spains-forest/article-58451</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/12-killed-19-missing-in-massive-fire-in-spains-forest/article-58451</guid>
                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 00:01:18 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/spain-wildfire.jpg"                         length="122019"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मासूम आंखों वाला फिलीपींस टार्सियर क्यों माना जाता है दुनिया का सबसे नाजुक जीव?</title>
                                    <description><![CDATA[बड़ी-बड़ी आंखों और मासूम चेहरे वाला फिलीपींस टार्सियर जितना आकर्षक दिखता है, उतना ही संवेदनशील भी है। विशेषज्ञ बताते हैं कि अत्यधिक तनाव और कैद की स्थिति में यह खुद को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/special-news/why-is-the-innocent-eyed-philippines-tarsier-considered-the-most-delicate/article-58314"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/philippine-tarsier.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">दुनिया में ऐसे कई जीव हैं, जो अपनी अनोखी बनावट और व्यवहार के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं। इन्हीं में से एक है फिलीपींस टार्सियर (Philippine Tarsier)। यह नन्हा प्राइमेट अपनी बड़ी-बड़ी गोल आंखों, छोटे शरीर और मासूम चेहरे के कारण दुनिया के सबसे प्यारे जीवों में गिना जाता है। सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें और वीडियो अक्सर वायरल होते रहते हैं और पहली नजर में इसे देखने वाला लगभग हर व्यक्ति इसकी मासूमियत का दीवाना हो जाता है। लेकिन इस छोटे से जीव की जिंदगी जितनी खूबसूरत दिखती है, उतनी ही नाजुक भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिलीपींस टार्सियर मुख्य रूप से फिलीपींस के बोहोल, समर, लेयटे और मिंदानाओ जैसे द्वीपों के घने जंगलों में पाया जाता है। इसका शरीर बेहद छोटा होता है और इसकी लंबाई लगभग 8 से 16 सेंटीमीटर तक होती है। हालांकि इसकी पूंछ शरीर से भी लंबी हो सकती है, जिससे यह पेड़ों पर आसानी से संतुलन बना पाता है। इसका वजन सामान्यतः 100 से 150 ग्राम के बीच होता है, लेकिन अपनी फुर्ती और छलांग लगाने की क्षमता के कारण यह जंगल में आसानी से शिकार कर लेता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस जीव की सबसे खास पहचान इसकी विशाल आंखें हैं। किसी भी स्तनधारी की तुलना में उसके शरीर के अनुपात में टार्सियर की आंखें सबसे बड़ी मानी जाती हैं। यदि इंसानों में भी ऐसा अनुपात होता तो हमारी आंखों का आकार लगभग एक संतरे जितना होता। इसकी आंखें इतनी बड़ी होती हैं कि वे अपनी आंखों को घुमा नहीं सकते। इस कमी को पूरा करने के लिए टार्सियर अपना सिर लगभग 180 डिग्री तक दोनों दिशाओं में घुमा सकता है, जिससे वह आसपास की गतिविधियों पर आसानी से नजर रखता है। टार्सियर पूरी तरह निशाचर जीव है। दिन के समय यह पेड़ों की शाखाओं और घनी पत्तियों के बीच आराम करता है, जबकि रात में भोजन की तलाश में निकलता है। इसका भोजन मुख्य रूप से कीड़े-मकोड़े, टिड्डे, झींगुर, मकड़ियां, छिपकलियां और छोटे पक्षी होते हैं। यह अपने लंबे पैरों की मदद से एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कई मीटर लंबी छलांग लगा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सोशल मीडिया और कई वेबसाइटों पर अक्सर यह दावा किया जाता है कि टार्सियर हल्का सा शोर सुनते ही "आत्महत्या" कर लेता है। हालांकि वैज्ञानिक इस दावे को पूरी तरह सही नहीं मानते। विशेषज्ञों के अनुसार, यह जीव अत्यधिक संवेदनशील होता है और तेज आवाज, लगातार फ्लैश लाइट, भीड़, बार-बार छूने या कैद जैसी परिस्थितियों में गंभीर तनाव का शिकार हो सकता है। ऐसे तनावपूर्ण हालात में कुछ टार्सियर खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं, सिर को बार-बार किसी कठोर सतह से टकराते हैं या अत्यधिक घबराहट के कारण उनकी मौत भी हो सकती है। इसलिए यह कहना कि हर तेज आवाज पर वह आत्महत्या कर लेता है, वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। सही बात यह है कि अत्यधिक तनाव और अनुचित वातावरण उसके लिए जानलेवा साबित हो सकता है। इसी वजह से वन्यजीव विशेषज्ञ लोगों से अपील करते हैं कि यदि जंगल में कभी टार्सियर दिखाई दे तो उसके पास शोर न करें, फ्लैश कैमरे का इस्तेमाल न करें और उसे छूने की कोशिश भी न करें। कई पर्यटक केवल तस्वीर लेने के लिए उसके बेहद करीब पहुंच जाते हैं, जिससे यह छोटा जीव डर जाता है और उसका प्राकृतिक व्यवहार प्रभावित होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिलीपींस सरकार ने टार्सियर के संरक्षण के लिए कई विशेष कदम उठाए हैं। बोहोल द्वीप पर टार्सियर संरक्षण केंद्र बनाए गए हैं, जहां पर्यटकों के लिए सख्त नियम लागू किए गए हैं। यहां तेज आवाज करना, फ्लैश फोटोग्राफी करना और जानवर को छूना पूरी तरह प्रतिबंधित है। इन नियमों का उद्देश्य टार्सियर को तनाव से बचाना और उसके प्राकृतिक आवास की रक्षा करना है। टार्सियर की संख्या धीरे-धीरे घट रही है। इसके पीछे जंगलों की कटाई, अवैध शिकार, पर्यटन का बढ़ता दबाव और प्राकृतिक आवास का नष्ट होना प्रमुख कारण हैं। यही वजह है कि इसके संरक्षण पर लगातार जोर दिया जा रहा है। यदि समय रहते इसके आवास और जीवनशैली की रक्षा नहीं की गई, तो भविष्य में यह दुर्लभ जीव और अधिक संकट में पड़ सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">टार्सियर केवल एक आकर्षक जीव नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह कीड़ों की संख्या नियंत्रित करने में मदद करता है और जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखने में भूमिका निभाता है। वैज्ञानिक भी इसकी अनोखी शारीरिक संरचना और व्यवहार का लगातार अध्ययन कर रहे हैं, ताकि इसके बारे में और अधिक जानकारी जुटाई जा सके। फिलीपींस टार्सियर हमें यह भी सिखाता है कि प्रकृति के सबसे छोटे और मासूम दिखने वाले जीव भी बेहद संवेदनशील होते हैं। उनकी सुरक्षा केवल कानूनों से नहीं, बल्कि लोगों की जागरूकता और जिम्मेदार व्यवहार से संभव है। यदि हम वन्यजीवों का सम्मान करें, उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखें और उन्हें अनावश्यक तनाव से बचाएं, तो आने वाली पीढ़ियां भी इस अद्भुत और प्यारे जीव को उसकी प्राकृतिक दुनिया में देख सकेंगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्पेशल खबरें</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/special-news/why-is-the-innocent-eyed-philippines-tarsier-considered-the-most-delicate/article-58314</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/special-news/why-is-the-innocent-eyed-philippines-tarsier-considered-the-most-delicate/article-58314</guid>
                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 16:38:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/philippine-tarsier.jpg"                         length="361744"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एनसीआर में वायु प्रदूषण पर सख्ती तेज, 17 दिनों में 173 निरीक्षण; 62 मामलों में नियम उल्लंघन मिला</title>
                                    <description><![CDATA[सीएक्यूएम की प्रवर्तन टास्क फोर्स ने उद्योगों, निर्माण स्थलों और डीजल जनरेटर सेटों की व्यापक जांच की। उल्लंघन मिलने पर कई इकाइयों को बंद करने, डीजी सेट सील करने और पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाने की कार्रवाई प्रस्तावित।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/strictness-on-air-pollution-intensified-in-ncr-173-inspections-in/article-58097"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/caqm.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए प्रवर्तन कार्रवाई लगातार तेज की जा रही है। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) की प्रवर्तन टास्क फोर्स (ईटीएफ) की 134वीं बैठक में पिछले 17 दिनों के दौरान की गई निरीक्षण कार्रवाई, अनुपालन की स्थिति और विभिन्न क्षेत्रों में नियमों के पालन की समीक्षा की गई। बैठक में सामने आए आंकड़ों से स्पष्ट हुआ कि आयोग प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों पर लगातार निगरानी रख रहा है और नियमों के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई की जा रही है। बैठक में बताया गया कि 14 जून से 30 जून 2026 के बीच आयोग की फ्लाइंग स्क्वॉड टीमों ने कुल 173 निरीक्षण किए। इन निरीक्षणों का उद्देश्य निर्माण एवं ध्वस्तीकरण (सी एंड डी) गतिविधियों, औद्योगिक इकाइयों और डीजल जनरेटर (डीजी) सेटों से होने वाले प्रदूषण की निगरानी करना था। जांच के दौरान कई स्थानों पर पर्यावरणीय मानकों का पालन नहीं किया जाता पाया गया, जिसके बाद संबंधित मामलों में कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की गई। निरीक्षण के दौरान कुल 173 स्थानों में से 15 निर्माण एवं ध्वस्तीकरण स्थलों की जांच की गई, जबकि 91 निरीक्षण औद्योगिक क्षेत्र में किए गए। इसके अलावा 67 निरीक्षण डीजल जनरेटर सेटों से जुड़े मामलों में किए गए। इन सभी निरीक्षणों के दौरान कुल 62 मामलों में नियमों का उल्लंघन सामने आया। इनमें निर्माण स्थलों पर सात, औद्योगिक क्षेत्र में 31 और डीजल जनरेटर से जुड़े 24 मामलों में अनियमितताएं दर्ज की गईं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आयोग के अनुसार, निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर चार परियोजनाओं या इकाइयों को बंद करने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। वहीं पर्यावरणीय मानकों का पालन नहीं करने वाले 27 डीजल जनरेटर सेटों को सील करने की कार्रवाई भी प्रस्तावित की गई है। इसके अतिरिक्त छह मामलों में संबंधित संस्थानों को आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने के लिए निर्देश जारी करने का निर्णय लिया गया है। पर्यावरण को हुए नुकसान के मद्देनजर 17 मामलों में पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति (एनवायरमेंटल कंपेनसेशन) लगाने का भी प्रस्ताव रखा गया है। बैठक में पिछली यानी 133वीं प्रवर्तन टास्क फोर्स बैठक में दिए गए निर्देशों की प्रगति रिपोर्ट की भी समीक्षा की गई। आयोग ने संतोष व्यक्त किया कि औद्योगिक क्षेत्र, निर्माण एवं ध्वस्तीकरण गतिविधियों तथा डीजल जनरेटर सेटों से जुड़े सभी कार्रवाई योग्य मामलों में संबंधित विभागों ने आवश्यक कदम उठाए हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय पहले की तुलना में बेहतर हुआ है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अनुपालन की समीक्षा के दौरान यह भी बताया गया कि जिन परियोजनाओं या निर्माण स्थलों ने निर्धारित पर्यावरणीय मानकों का पालन सुनिश्चित कर लिया है, उन्हें दोबारा काम शुरू करने की अनुमति दी जा रही है। अब तक सात निर्माण परियोजनाओं को अनुपालन की पुष्टि के बाद पुनः संचालन की अनुमति दी गई है। इनमें उत्तर प्रदेश की दो और हरियाणा की पांच परियोजनाएं शामिल हैं। आयोग का मानना है कि यह प्रक्रिया नियमों का पालन करने वाले संस्थानों को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ अन्य इकाइयों को भी मानकों का पालन करने के लिए प्रेरित करेगी। बैठक में अब तक की कुल प्रवर्तन कार्रवाई का भी विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत किया गया। आयोग के अनुसार 6 जुलाई 2026 तक फ्लाइंग स्क्वॉड द्वारा कुल 27,750 इकाइयों, परियोजनाओं और अन्य संस्थानों का निरीक्षण किया जा चुका है। यह आंकड़ा बताता है कि आयोग लगातार बड़े स्तर पर निगरानी अभियान चला रहा है ताकि प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों को समय रहते रोका जा सके।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इन निरीक्षणों के आधार पर अब तक कुल 1,802 बंदी निर्देश जारी किए गए हैं। इनमें से 1,424 मामलों में संबंधित इकाइयों द्वारा आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने के बाद दोबारा संचालन की अनुमति प्रदान की गई है। वहीं 123 मामलों को अंतिम निर्णय के लिए संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति को भेजा गया है। इसके अलावा 255 इकाइयों के मामलों की समीक्षा अभी भी जारी है और उनके अनुपालन की जांच के बाद आगे का निर्णय लिया जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रवर्तन टास्क फोर्स ने बैठक के दौरान इस बात पर विशेष जोर दिया कि वायु प्रदूषण की समस्या से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए केवल निरीक्षण पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि समयबद्ध कार्रवाई और नियमों का कड़ाई से पालन भी आवश्यक है। आयोग ने सभी संबंधित एजेंसियों को निर्देश दिए कि निरीक्षण की गुणवत्ता में सुधार किया जाए, उल्लंघनों पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जाए और विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखा जाए। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि औद्योगिक उत्सर्जन, डीजल जनरेटर सेटों का संचालन और निर्माण एवं ध्वस्तीकरण गतिविधियां एनसीआर में वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं। इसलिए इन क्षेत्रों में निगरानी और प्रवर्तन को प्राथमिकता देना जरूरी है। यदि कोई संस्था निर्धारित पर्यावरणीय मानकों का पालन नहीं करती है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई जारी रहेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/strictness-on-air-pollution-intensified-in-ncr-173-inspections-in/article-58097</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/strictness-on-air-pollution-intensified-in-ncr-173-inspections-in/article-58097</guid>
                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 14:47:38 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/caqm.jpg"                         length="78689"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बड़े कचरा उत्पादकों का ऑनलाइन पंजीयन अनिवार्य, सीपीसीबी पोर्टल से होगी निगरानी</title>
                                    <description><![CDATA[शहरी निकायों को बल्क वेस्ट जनरेटर्स की पहचान कर जल्द रजिस्ट्रेशन कराने के निर्देश, वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन और नियमों के पालन पर रहेगा फोकस।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/online-registration-of-big-waste-producers-mandatory-monitoring-will-be/article-58082"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/cpcb-portal.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">प्रदेश में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी बनाने की दिशा में नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने बड़ा कदम उठाया है। विभाग ने सभी नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायतों को निर्देश जारी किए हैं कि उनके क्षेत्र में संचालित सभी बल्क वेस्ट जनरेटर्स यानी बड़े स्तर पर कचरा उत्पन्न करने वाले संस्थानों का अनिवार्य रूप से ऑनलाइन पंजीयन कराया जाए। इसके लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल का उपयोग किया जाएगा। विभाग का कहना है कि इससे प्रदेश में कचरा प्रबंधन की निगरानी मजबूत होगी और यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि बड़े संस्थान ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं। नगरीय प्रशासन विभाग द्वारा जारी परिपत्र में सभी नगर निगम आयुक्तों और मुख्य नगर पालिका अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने-अपने क्षेत्र में ऐसे सभी संस्थानों की पहचान करें, जो बड़ी मात्रा में ठोस कचरा उत्पन्न करते हैं। इनमें अस्पताल, होटल, बड़े आवासीय परिसर, शैक्षणिक संस्थान, औद्योगिक इकाइयां, व्यावसायिक प्रतिष्ठान और अन्य बड़े संस्थान शामिल हैं। पहचान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन सभी का पंजीयन सीपीसीबी के ऑनलाइन पोर्टल पर कराना अनिवार्य होगा। विभाग ने इस प्रक्रिया को जल्द पूरा करने पर जोर दिया है ताकि नई व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">अधिकारियों के अनुसार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का यह केंद्रीकृत पोर्टल एक जून 2026 से लागू हो चुका है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 के तहत अब बड़े कचरा उत्पादकों का पंजीयन इसी पोर्टल के माध्यम से किया जाएगा। इस डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य केवल रिकॉर्ड तैयार करना नहीं है, बल्कि कचरे के उत्पादन से लेकर उसके संग्रहण, पृथक्करण, परिवहन और अंतिम निपटान तक की पूरी प्रक्रिया की निगरानी करना भी है। इससे संबंधित विभागों को वास्तविक समय में जानकारी उपलब्ध होगी और नियमों का पालन सुनिश्चित करने में आसानी होगी। विभाग का मानना है कि शहरी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती आबादी और व्यावसायिक गतिविधियों के कारण कचरे की मात्रा लगातार बढ़ रही है। यदि बड़े स्तर पर कचरा उत्पन्न करने वाले संस्थान अपने स्तर पर वैज्ञानिक तरीके से उसका प्रबंधन नहीं करते हैं, तो इसका सीधा असर पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसी वजह से अब ऐसे संस्थानों को अपनी जिम्मेदारी तय करनी होगी। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कचरे का स्रोत पर पृथक्करण किया जाए और उसका निपटान निर्धारित नियमों के अनुसार ही किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">इस नई व्यवस्था से स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। नगर निगम और नगर पालिकाओं को अपने क्षेत्र में सभी बल्क वेस्ट जनरेटर्स का सर्वे कर सूची तैयार करनी होगी। इसके बाद उनका ऑनलाइन पंजीयन कराया जाएगा और समय-समय पर उनकी गतिविधियों की निगरानी भी की जाएगी। यदि कोई संस्थान नियमों का पालन नहीं करता है या बिना पंजीयन के कार्य करता पाया जाता है, तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। अधिकारियों का कहना है कि इससे कचरा प्रबंधन प्रणाली अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनेगी। बताया जा रहा है कि इस व्यवस्था का एक प्रमुख उद्देश्य स्रोत पर कचरे का पृथक्करण सुनिश्चित करना भी है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि गीला और सूखा कचरा अलग-अलग एकत्र किया जाए और उसका वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण किया जाए, तो लैंडफिल पर दबाव कम होगा और पुनर्चक्रण की प्रक्रिया अधिक प्रभावी बन सकेगी। इससे पर्यावरण प्रदूषण कम होगा और संसाधनों का बेहतर उपयोग भी संभव होगा। इसी बीच राज्य में पर्यावरण संरक्षण को लेकर हाल के दिनों में कई अन्य सख्त कदम भी उठाए गए हैं। करीब 19 दिन पहले छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल ने बैटरी वेस्ट के अवैध कारोबार के खिलाफ भी सख्ती दिखाई थी। मंडल ने स्पष्ट किया था कि बिना पंजीयन और आवश्यक दस्तावेजों के पुरानी बैटरियों की खरीद-बिक्री, संग्रहण, भंडारण और परिवहन पूरी तरह अवैध माना जाएगा। बैटरी वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स-2022 के तहत केवल पंजीकृत संस्थाओं को ही बैटरी अपशिष्ट के संग्रहण और रीसाइक्लिंग की अनुमति है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/online-registration-of-big-waste-producers-mandatory-monitoring-will-be/article-58082</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/online-registration-of-big-waste-producers-mandatory-monitoring-will-be/article-58082</guid>
                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 13:37:28 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/cpcb-portal.jpg"                         length="115785"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जंगलों के 10 किमी दायरे में आरा मिलों पर रोक बरकरार, हाईकोर्ट ने 19 याचिकाएं खारिज कीं</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अधिसूचना को सही ठहराया, कहा- पर्यावरण और वन संरक्षण से कोई समझौता नहीं होगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/ban-on-saw-mills-within-10-km-radius-of-forests/article-58081"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/chhattisgarh-high-court-(9).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जंगलों और संरक्षित वन क्षेत्रों के आसपास पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने अधिसूचित जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों से 10 किलोमीटर के दायरे में आरा मिलों के संचालन पर लगी रोक को बरकरार रखा है। इस मामले में दायर 19 अलग-अलग याचिकाओं को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की 25 सितंबर 2025 की अधिसूचना को पूरी तरह वैध माना। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट कहा कि राज्य में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना सबसे जरूरी है और ऐसी परिस्थितियां नहीं बनने दी जा सकतीं, जिनसे भविष्य में बड़े शहरों जैसी गंभीर प्रदूषण की समस्या पैदा हो। अदालत की टिप्पणी रही कि प्रदेश को ऐसी स्थिति से बचाना जरूरी है जहां पर्यावरण को अपूरणीय नुकसान पहुंचे।</p>
<p>यह मामला उस अधिसूचना से जुड़ा है, जिसे राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ काष्ठ चिरान (विनियमन) अधिनियम, 1984 की धारा 5(1) के तहत जारी किया था। अधिसूचना के अनुसार अधिसूचित जंगलों और संरक्षित वन क्षेत्रों से हवाई दूरी के आधार पर 10 किलोमीटर तक के क्षेत्र को तीन वर्षों के लिए प्रतिबंधित घोषित किया गया। इसके बाद वन विभाग ने इस दायरे में संचालित आरा मिलों के संचालन और उनके लाइसेंस के नवीनीकरण पर रोक लगाने के आदेश जारी किए थे। इस फैसले से प्रभावित कई आरा मिल संचालकों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।</p>
<p>याचिकाकर्ताओं में शाही ट्रेडर्स, अग्रवाल सॉ मिल, पटेल सॉ मिल सहित कई लकड़ी उद्योग संचालक शामिल थे। उनका कहना था कि उनकी आरा मिलें वर्ष 1996 से पहले से वैध लाइसेंस के साथ संचालित हो रही हैं और वे सभी आवश्यक नियमों का पालन करते आए हैं। उन्होंने अदालत के सामने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुल्पद मामले का हवाला भी दिया। उनका तर्क था कि पुराने और वैध लाइसेंसधारी प्रतिष्ठानों को अचानक इस प्रकार बंद करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस फैसले से उनके व्यवसाय, कर्मचारियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।</p>
<p>मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि जंगलों के आसपास लकड़ी आधारित गतिविधियों पर नियंत्रण पर्यावरण संरक्षण के लिए आवश्यक है। सरकार ने अदालत को बताया कि वन क्षेत्रों के आसपास सुरक्षा दायरा तय करने का उद्देश्य केवल उद्योगों को सीमित करना नहीं बल्कि अवैध कटाई, जंगलों पर बढ़ते दबाव और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि औद्योगिक क्षेत्रों और नगर निगम या नगर पालिका की सीमाओं के भीतर आने वाले कुछ क्षेत्रों को इस प्रतिबंध से पहले ही छूट दी जा चुकी है, जिससे यह साबित होता है कि निर्णय संतुलित सोच के साथ लिया गया है।</p>
<p>जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राज्य सरकार के फैसले को उचित और तार्किक माना। अदालत ने कहा कि जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं हैं, बल्कि जलवायु संतुलन, जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यदि वन क्षेत्रों के आसपास अनियंत्रित औद्योगिक गतिविधियों की अनुमति दी जाती है तो उसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ेगा। इसलिए सरकार द्वारा तय किया गया 10 किलोमीटर का बफर जोन पर्यावरण संरक्षण की दिशा में आवश्यक कदम माना जा सकता है।</p>
<p>अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि सरकार वैज्ञानिक तथ्यों और सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए कोई नीति बनाती है तो उसमें न्यायालय तब तक हस्तक्षेप नहीं करेगा, जब तक वह कानून के विपरीत न हो। अदालत ने माना कि इस मामले में सरकार का फैसला सार्वजनिक हित और पर्यावरण सुरक्षा दोनों के अनुरूप है। इसलिए इसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।</p>
<p>इस फैसले के बाद अब अधिसूचित जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों से 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाली आरा मिलों के संचालन और उनके लाइसेंस के नवीनीकरण पर रोक जारी रहेगी। जिन मिलों का संचालन इस प्रतिबंधित क्षेत्र में आता है, उन्हें वर्तमान नियमों का पालन करना होगा। वन विभाग भी इस संबंध में आगे की कार्रवाई जारी रख सकेगा। माना जा रहा है कि इस फैसले का असर प्रदेश के कई जिलों में संचालित लकड़ी उद्योगों पर पड़ सकता है, जहां बड़ी संख्या में आरा मिलें वन क्षेत्रों के आसपास स्थित हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/ban-on-saw-mills-within-10-km-radius-of-forests/article-58081</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/ban-on-saw-mills-within-10-km-radius-of-forests/article-58081</guid>
                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 13:37:20 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/chhattisgarh-high-court-%289%29.jpg"                         length="133394"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भोपाल के बड़ा तालाब किनारे अतिक्रमण पर बड़ा एक्शन, FTL क्षेत्र से फार्म हाउस और बंगले हटाने शुरू</title>
                                    <description><![CDATA[एनजीटी के निर्देशों के बाद जिला प्रशासन और नगर निगम की संयुक्त कार्रवाई तेज, पहले चरण में छह अवैध निर्माण हटाए जाएंगे; 21 चिन्हित अतिक्रमणों पर चलेगा अभियान]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/big-action-on-encroachment-on-the-banks-of-bada-talab/article-57879"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/bhopal-big-lake.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">भोपाल के ऐतिहासिक और पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बड़ा तालाब को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए जिला प्रशासन और नगर निगम ने शनिवार से व्यापक अभियान शुरू कर दिया। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के निर्देशों और नगर निगम की कार्ययोजना के तहत फुल टैंक लेवल (FTL) क्षेत्र में बने अवैध फार्म हाउस, बंगले और अन्य निर्माणों को हटाने की कार्रवाई प्रारंभ की गई। प्रशासन का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य भोज वेटलैंड और बड़ा तालाब के प्राकृतिक स्वरूप को सुरक्षित रखना है।</p>
<p style="text-align:justify;">शनिवार सुबह से ही जिला प्रशासन, नगर निगम और पुलिस की संयुक्त टीमें गौरागांव, बिशनखेड़ी और आसपास के क्षेत्रों में पहुंचीं। जेसीबी मशीनों और अन्य संसाधनों की मदद से चिन्हित अवैध निर्माणों को हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई। अभियान के पहले दिन छह अतिक्रमणों को हटाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। पूरे अभियान की निगरानी नगर निगम के उपायुक्त भुवन गुप्ता कर रहे हैं, जबकि टीटी नगर एसडीएम अर्चना शर्मा और तहसीलदार कुणाल राउत सहित अन्य अधिकारी मौके पर मौजूद रहे। नगर निगम ने कुछ दिन पहले ही एनजीटी में अपनी एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) प्रस्तुत की थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि बड़ा तालाब के आसपास एफटीएल क्षेत्र में चिन्हित 21 अवैध निर्माणों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। इसी योजना के तहत अब अभियान को धरातल पर लागू किया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रशासन के अनुसार जिन निर्माणों को हटाया जा रहा है, वे फुल टैंक लेवल और उसके निर्धारित सुरक्षा दायरे के भीतर आते हैं। संबंधित भवन मालिकों को पहले ही नोटिस जारी किए जा चुके थे। नोटिस में स्पष्ट किया गया था कि भोज वेटलैंड के सीमांकन के बाद एफटीएल से 50 मीटर के भीतर आने वाले सभी अवैध निर्माणों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। पर्याप्त समय दिए जाने के बावजूद जब अवैध निर्माण नहीं हटाए गए, तब प्रशासन ने संयुक्त अभियान शुरू किया। नगर निगम की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार सेवनिया गौंड, गौरा विशनखेड़ी और प्रेमपुरा क्षेत्र में कुल 21 अतिक्रमण चिन्हित किए गए हैं। इनमें से तीन निर्माण वर्ष 2022 से पहले के बताए गए हैं, जबकि शेष 18 निर्माण वर्ष 2022 के बाद किए गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि अधिकांश निर्माण बिना किसी वैध भवन अनुमति के किए गए हैं, इसलिए नियमानुसार इन्हें हटाया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">बड़ा तालाब भोपाल ही नहीं बल्कि पूरे मध्यप्रदेश की पहचान माना जाता है। इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रामसर साइट का दर्जा प्राप्त है। यहां अनेक दुर्लभ पक्षियों का निवास है और यह शहर के प्रमुख जल स्रोतों में शामिल है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि तालाब के कैचमेंट और एफटीएल क्षेत्र में लगातार हो रहे अवैध निर्माणों से जल संरक्षण, जैव विविधता और पर्यावरण संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसी कारण समय-समय पर न्यायालयों और पर्यावरण संस्थाओं ने अतिक्रमण हटाने पर जोर दिया है। हालांकि यह पहला अवसर नहीं है जब बड़ा तालाब क्षेत्र में कार्रवाई की जा रही हो। जानकारी के अनुसार इस वर्ष सीमांकन अभियान के दौरान प्रशासन ने कुल 347 अतिक्रमण चिन्हित किए थे, लेकिन अब तक केवल 51 छोटे अतिक्रमण ही हटाए जा सके थे। इनमें टीटी नगर क्षेत्र के 39 और बैरागढ़ क्षेत्र के 12 निर्माण शामिल थे। अभी भी लगभग 296 अतिक्रमण शेष हैं, जिन पर चरणबद्ध तरीके से कार्रवाई की जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">अधिकारियों का कहना है कि प्रत्येक मामले में सुनवाई की प्रक्रिया पूरी करने के बाद ही कार्रवाई की जा रही है। जिन निर्माणों को हटाया जा रहा है, उनके पास वैध स्वीकृति या भवन निर्माण की अनुमति उपलब्ध नहीं है। प्रशासन का दावा है कि अभियान पूरी तरह कानून के दायरे में रहकर संचालित किया जा रहा है। बड़ा तालाब के आसपास भू-माफियाओं की सक्रियता भी प्रशासन के लिए चुनौती बनी हुई है। आरोप हैं कि कई क्षेत्रों में कम कीमत पर प्लॉट बेचने के नाम पर लोगों को गुमराह किया गया। इतना ही नहीं, एफटीएल सीमा को लेकर भ्रम पैदा करने के लिए कथित तौर पर अलग-अलग प्रकार की सीमांकन मुनारें भी स्थापित कर दी गईं। मौके पर पांच प्रकार की मुनारें मिलने की बात सामने आई है, जिनमें केवल कुछ पर ही नगर निगम का स्पष्ट चिन्ह अंकित है। अधिकारियों का कहना है कि इस पूरे मामले की भी जांच की जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">बड़ा तालाब की सीमा निर्धारण को लेकर पिछले कुछ वर्षों में कई सर्वे किए जा चुके हैं। वर्ष 2016 में डिफरेंशियल ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (DGPS) तकनीक से सर्वे कराया गया था, जिसमें तालाब का क्षेत्रफल पहले की तुलना में अधिक दर्ज किया गया। इसके बाद एनजीटी के निर्देश पर सीमांकन हुआ, जिसमें कई मुनारें गायब मिलीं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद भी नया सर्वे कराया गया, हालांकि उसकी विस्तृत रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुई है। राज्य सरकार भी बड़ा तालाब संरक्षण को लेकर गंभीरता जता चुकी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पहले संबंधित विभागों को नए सिरे से सर्वे कर अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे। वहीं भोपाल सांसद आलोक शर्मा ने भी बड़ा तालाब के संरक्षण के लिए मास्टर प्लान तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उनका मानना है कि दीर्घकालिक योजना के बिना तालाब क्षेत्र को सुरक्षित रखना कठिन होगा। प्रशासन का कहना है कि यह अभियान आगे भी जारी रहेगा और सभी चिन्हित अवैध निर्माणों पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। अधिकारियों का उद्देश्य केवल अतिक्रमण हटाना नहीं, बल्कि भोपाल की इस ऐतिहासिक जल धरोहर को सुरक्षित और संरक्षित रखना भी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इसकी प्राकृतिक सुंदरता और पर्यावरणीय महत्व का लाभ उठा सकें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/big-action-on-encroachment-on-the-banks-of-bada-talab/article-57879</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/big-action-on-encroachment-on-the-banks-of-bada-talab/article-57879</guid>
                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 16:19:49 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/bhopal-big-lake.jpg"                         length="187129"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कूनो के चीते मप्र-राजस्थान के 12 जिलों तक पहुंचे, शिकार के तरीके में भी आया बड़ा बदलाव</title>
                                    <description><![CDATA[प्रोजेक्ट चीता की प्रोग्रेस रिपोर्ट में खुलासा, खुले जंगल में 50% शिकार पालतू पशुओं का, आसान शिकार को दे रहे प्राथमिकता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/kunos-leopards-reached-12-districts-of-madhya-pradesh-and-rajasthan/article-57650"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/project-cheetah.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में बसाए गए अफ्रीकी चीते अब भारतीय जंगलों और यहां के वातावरण में पूरी तरह से घुलमिल चुके हैं। प्रोजेक्ट चीता की ताजा प्रोग्रेस रिपोर्ट से पता चलता है कि इन चीतों ने न केवल अपने रहने और विचरण के तरीके में बदलाव किया है, बल्कि शिकार की रणनीति भी बदल ली है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की सितंबर 2024 से दिसंबर 2025 तक की रिपोर्ट के अनुसार, खुले जंगल में विचरण कर रहे चीतों के कुल शिकार में अब लगभग 50 प्रतिशत हिस्सेदारी पालतू पशुओं की हो गई है। इनमें करीब 30 प्रतिशत बकरियां और 20 प्रतिशत मवेशी शामिल हैं। वहीं 42 प्रतिशत शिकार चीतल का रहा, जबकि बाकी 8 प्रतिशत अन्य वन्यजीवों का शिकार किया गया। रिपोर्ट बताती है कि कम ऊर्जा खर्च होने और कम जोखिम होने की वजह से चीते अब आसान शिकार को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं। प्रोजेक्ट चीता के तहत कूनो में छोड़े गए चीतों का दायरा भी लगातार बढ़ रहा है। अब तक ये चीते मध्यप्रदेश और राजस्थान के कुल 12 जिलों तक पहुंच चुके हैं। हाल ही में नर चीता 'अग्नि' रणथंभौर क्षेत्र तक पहुंच गया था, जिससे यह साफ हो गया कि चीते अपने लिए नए इलाकों की तलाश कर रहे हैं। वन विभाग लगातार इनकी गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है और जीपीएस कॉलर की मदद से उनकी लोकेशन ट्रैक की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि यह प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा है और नए वातावरण में चीते धीरे-धीरे अपना क्षेत्र तय कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कूनो नेशनल पार्क के कोर क्षेत्र में चीतलों की अच्छी संख्या मौजूद है। यहां प्रति वर्ग किलोमीटर औसतन 23 चीतल पाए जाते हैं, जो चीतों के लिए स्वाभाविक शिकार हैं। लेकिन जब चीते पार्क की सीमा से बाहर निकलकर टेरिटोरियल वन क्षेत्रों या गांवों के आसपास पहुंचते हैं, तब वहां जंगली शिकार की उपलब्धता कम हो जाती है। इसके विपरीत घरेलू पशु आसानी से मिल जाते हैं। ऐसे में चीते कम मेहनत और कम जोखिम वाले शिकार को चुन रहे हैं, जिसके कारण बकरियां और मवेशी उनके शिकार का हिस्सा बन रहे हैं। यह व्यवहार पूरी तरह असामान्य नहीं है। दुनिया के कई देशों में बड़े मांसाहारी वन्यजीव अपने प्राकृतिक क्षेत्र से बाहर निकलने पर घरेलू पशुओं का शिकार करते हैं। यदि किसी क्षेत्र में जंगली शिकार पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न हो तो शिकारी जानवर अपेक्षाकृत आसान विकल्प चुनते हैं। कूनो के मामले में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। हालांकि वन विभाग का कहना है कि चीतों को यथासंभव उनके प्राकृतिक आवास में बनाए रखने और पर्याप्त जंगली शिकार उपलब्ध कराने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">शावकों की परवरिश कर रही मादा चीता 'ज्वाला' और 'गामिनी' ने सबसे अधिक शिकार किए हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार शावकों को पालने के दौरान मादा चीतों को सामान्य दिनों की तुलना में अधिक भोजन की आवश्यकता होती है। इसी कारण वे अपेक्षाकृत अधिक शिकार करती हैं। आसान शिकार मिलने पर ऊर्जा की बचत होती है, जिससे शावकों की देखभाल भी बेहतर तरीके से हो पाती है। यह व्यवहार प्राकृतिक पारिस्थितिकी का हिस्सा माना जाता है। प्रोजेक्ट चीता भारत में विलुप्त हो चुके चीतों को फिर से बसाने की महत्वाकांक्षी योजना है। इसके तहत अफ्रीका से लाए गए चीतों को पहले नियंत्रित बाड़ों में रखा गया और बाद में चरणबद्ध तरीके से खुले जंगल में छोड़ा गया। शुरुआती महीनों में उनके स्वास्थ्य, शिकार की क्षमता और अनुकूलन प्रक्रिया पर विशेष निगरानी रखी गई। अब ताजा रिपोर्ट से संकेत मिल रहे हैं कि अधिकांश चीते भारतीय परिस्थितियों में खुद को ढाल चुके हैं और स्वतंत्र रूप से शिकार करने में सक्षम हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि चीतों का गांवों की ओर बढ़ना वन विभाग के लिए नई चुनौती भी बन रहा है। ग्रामीण इलाकों में पालतू पशुओं के शिकार की घटनाएं बढ़ने से स्थानीय लोगों की चिंता भी बढ़ी है। ऐसे मामलों में विभाग प्रभावित पशुपालकों को मुआवजा देने की प्रक्रिया अपनाता है, ताकि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम किया जा सके। साथ ही ग्रामीणों को जागरूक किया जा रहा है कि वे रात के समय पशुओं को सुरक्षित बाड़ों में रखें और जंगल से लगे इलाकों में अतिरिक्त सावधानी बरतें। आने वाले समय में यदि कूनो और आसपास के क्षेत्रों में जंगली शिकार की संख्या और बढ़ाई जाती है तो चीतों का घरेलू पशुओं पर निर्भर होना कम हो सकता है। इसके लिए आवास प्रबंधन, शिकार प्रजातियों के संरक्षण और वन क्षेत्रों के विस्तार पर लगातार काम करने की आवश्यकता होगी। वहीं चीतों की बढ़ती आवाजाही यह भी दिखाती है कि वे नए क्षेत्रों को तलाश रहे हैं और भारतीय जंगलों में अपना प्राकृतिक विस्तार स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/kunos-leopards-reached-12-districts-of-madhya-pradesh-and-rajasthan/article-57650</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/kunos-leopards-reached-12-districts-of-madhya-pradesh-and-rajasthan/article-57650</guid>
                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 13:40:20 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-07/project-cheetah.jpg"                         length="176068"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बेटे की प्लास्टिक वाली सीख पर ट्रोल हुईं दिया मिर्जा, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस</title>
                                    <description><![CDATA[पॉडकास्ट में बेटे अव्यान से जुड़ा किस्सा साझा करने के बाद दिया मिर्जा सोशल मीडिया पर ट्रोल हुईं, यूजर्स ने व्यवहार और विशेषाधिकार को लेकर उठाए सवाल।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/bollywood/dia-mirza-trolled-for-her-sons-plastic-lesson-debate-on/article-57433"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/dia-mirza.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">बॉलीवुड अभिनेत्री दिया मिर्जा एक बार फिर सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं। इस बार वजह उनकी कोई फिल्म या सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उनके पांच वर्षीय बेटे अव्यान से जुड़ा एक किस्सा है। हाल ही में सोहा अली खान के पॉडकास्ट में दिया मिर्जा ने एक घटना सुनाई, जिसमें उनके बेटे ने घर पर नारियल पानी पहुंचाने आए डिलीवरी एजेंट से प्लास्टिक के इस्तेमाल को लेकर सवाल किया। अभिनेत्री ने इस घटना को पर्यावरण के प्रति जागरूकता और अच्छी परवरिश का उदाहरण बताते हुए साझा किया था, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कई लोगों ने जहां बच्चे की पर्यावरण के प्रति जागरूक सोच की सराहना की, वहीं बड़ी संख्या में यूजर्स ने दिया मिर्जा और उनके बेटे के व्यवहार की आलोचना भी की। पॉडकास्ट के दौरान दिया मिर्जा ने बताया कि उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी तब होती है जब नारियल पानी प्लास्टिक बैग और प्लास्टिक स्ट्रॉ के साथ उनके घर पहुंचाया जाता है। उन्होंने कहा कि एक दिन जब डिलीवरी एजेंट नारियल लेकर उनके घर आया तो दरवाजा उनके बेटे अव्यान ने खोला। अभिनेत्री के मुताबिक, अव्यान ने डिलीवरी एजेंट से कहा कि उनके घर में प्लास्टिक की अनुमति नहीं है और उसने उनसे प्लास्टिक तथा स्ट्रॉ वापस ले जाने के लिए कहा। दिया ने इस घटना को मुस्कुराते हुए साझा किया और कहा कि उनका बेटा छोटी उम्र से ही पर्यावरण को लेकर काफी जागरूक है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इस दौरान पॉडकास्ट होस्ट और अभिनेत्री सोहा अली खान ने भी अव्यान की तारीफ करते हुए कहा कि इतनी छोटी उम्र में किसी बड़े व्यक्ति के सामने अपनी बात आत्मविश्वास से रखना अपने आप में खास बात है। बातचीत का यह हिस्सा सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। हालांकि, जिस घटना को दिया मिर्जा ने प्रेरणादायक अनुभव के रूप में साझा किया था, उसी पर इंटरनेट पर बहस शुरू हो गई। वीडियो वायरल होने के बाद कई सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे "विशेषाधिकार वाली सोच" बताते हुए आलोचना की। कुछ लोगों का कहना था कि यदि किसी को प्लास्टिक के इस्तेमाल से इतनी आपत्ति है तो उसे स्वयं दुकान पर जाकर अपनी पसंद के बर्तन या बैग में सामान लेना चाहिए, न कि डिलीवरी करने वाले कर्मचारी को इस तरह निर्देश देना चाहिए। कुछ यूजर्स ने यह भी लिखा कि पर्यावरण संरक्षण का संदेश देना अच्छी बात है, लेकिन इसके लिए मेहनत करने वाले डिलीवरी कर्मचारियों को असहज महसूस कराना उचित नहीं माना जा सकता।</p>
<p class="isSelectedEnd">एक अन्य यूजर ने टिप्पणी की कि यदि वास्तव में पर्यावरण की इतनी चिंता है तो ग्राहक अपने साथ स्टील या अन्य पुन: उपयोग योग्य बर्तन लेकर नारियल विक्रेता के पास जा सकते हैं। कुछ लोगों ने कहा कि वीडियो समाज के दो अलग-अलग वर्गों की सोच को भी दिखाता है, जहां एक ओर पर्यावरण जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है तो दूसरी ओर डिलीवरी एजेंट जैसे लोग अपनी रोजमर्रा की आजीविका में व्यस्त रहते हैं। हालांकि सोशल मीडिया पर सभी प्रतिक्रियाएं नकारात्मक नहीं थीं। कई यूजर्स ने दिया मिर्जा की परवरिश की सराहना भी की। उनका कहना था कि यदि बच्चों को बचपन से ही पर्यावरण संरक्षण और प्लास्टिक के कम इस्तेमाल की शिक्षा दी जाए तो भविष्य में इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है। कुछ लोगों ने लिखा कि बच्चे की मंशा गलत नहीं थी और उसने केवल वही बात कही, जो उसे घर में सिखाई गई होगी। दिया मिर्जा लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण से जुड़े अभियानों का हिस्सा रही हैं। वह कई मंचों पर जलवायु परिवर्तन, प्लास्टिक प्रदूषण, वन संरक्षण और टिकाऊ जीवनशैली जैसे विषयों पर खुलकर अपनी राय रखती रही हैं। विभिन्न पर्यावरण अभियानों में उनकी सक्रिय भागीदारी भी रही है। यही वजह है कि पॉडकास्ट में साझा की गई इस घटना को उन्होंने पर्यावरण के प्रति जागरूकता के संदर्भ में रखा था। दिया मिर्जा ने वर्ष 2021 में उद्योगपति वैभव रेखी से विवाह किया था। इसी वर्ष उनके बेटे अव्यान का जन्म हुआ। इससे पहले उनकी शादी निर्माता साहिल संघा से हुई थी, जो बाद में आपसी सहमति से समाप्त हो गई। निजी जीवन के साथ-साथ दिया अपने सामाजिक कार्यों और पर्यावरण संबंधी अभियानों के कारण भी लगातार चर्चा में रहती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बालीवुड</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/bollywood/dia-mirza-trolled-for-her-sons-plastic-lesson-debate-on/article-57433</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/bollywood/dia-mirza-trolled-for-her-sons-plastic-lesson-debate-on/article-57433</guid>
                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 15:41:06 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-06/dia-mirza.jpg"                         length="119784"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>खनन डिफॉल्टरों को दोबारा लीज देने पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से मांगा जवाब</title>
                                    <description><![CDATA[ग्वालियर हाईकोर्ट ने अवैध खनन से जुड़े बकायेदारों को नई और नवीनीकृत खनन लीज दिए जाने पर राज्य सरकार से जवाब तलब किया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-strictly-seeks-response-from-government-on-re-granting-lease/article-57408"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mp-mining-case.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">मध्य प्रदेश में अवैध खनन और उससे जुड़े कथित घोटालों को लेकर ग्वालियर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में पूछा है कि जिन खनन संचालकों पर करोड़ों रुपये की पेनल्टी बकाया है, उनसे अब तक वसूली क्यों नहीं की गई और आखिर उन्हें दोबारा खनन लीज किस आधार पर दे दी गई। अदालत की यह टिप्पणी उस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें आरोप लगाया गया है कि खनिज विभाग की लापरवाही और कथित मिलीभगत के कारण अवैध खनन करने वाले कई प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा, जिसे अदालत ने स्वीकार करते हुए एक सप्ताह की मोहलत दी है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 6 जुलाई 2026 को होगी। यह मामला उस समय और गंभीर हो गया जब याचिका में दावा किया गया कि ग्वालियर जिले में खनन से जुड़े कई डिफॉल्टरों पर करीब 305 करोड़ 97 लाख रुपये की पेनल्टी वर्षों से बकाया है। बताया गया कि यह राशि वर्ष 2017 से लंबित है, लेकिन संबंधित विभाग अब तक इसकी वसूली नहीं कर पाया। याचिकाकर्ता का कहना है कि नियमों के अनुसार यदि कोई खदान संचालक जुर्माना जमा नहीं करता तो उसे ब्लैकलिस्ट किया जाना चाहिए और उसकी खनन गतिविधियों पर रोक लगनी चाहिए। इसके बावजूद न केवल कार्रवाई नहीं की गई, बल्कि कई मामलों में उन्हीं लोगों को फिर से खनन की अनुमति भी दे दी गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने इसी पहलू पर सरकार से जवाब मांगा। न्यायालय ने जानना चाहा कि जब बकाया राशि इतनी बड़ी है और सरकारी खजाने का नुकसान स्पष्ट रूप से सामने है, तब जिम्मेदार विभाग ने वसूली के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए। अदालत के सवाल इस बात की ओर भी संकेत करते हैं कि यदि नियमों का पालन नहीं किया गया तो इससे शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। फिलहाल अदालत ने सरकार को अपना विस्तृत पक्ष रखने का अवसर दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि जिन लोगों पर पहले से भारी जुर्माना बकाया था, उनकी पुरानी खदानों का नवीनीकरण कर दिया गया। इतना ही नहीं, कुछ मामलों में उन्हें नई जगहों पर भी खनन लीज आवंटित कर दी गई। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह फैसला नियमों की भावना के विपरीत है और इससे यह संदेश जाता है कि बकाया राशि जमा किए बिना भी खनन का काम जारी रखा जा सकता है। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह प्रशासनिक जवाबदेही और खनन व्यवस्था दोनों के लिए बड़ा सवाल बन सकता है। मामले में पर्यावरणीय नुकसान का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है। याचिका के अनुसार ग्वालियर जिले के बिलौआ और बेरजा क्षेत्र में लंबे समय से बड़े पैमाने पर काले पत्थर का खनन किया जा रहा है। आरोप है कि कई स्थानों पर तय मानकों से कहीं अधिक गहराई तक खुदाई की गई, जिससे जमीन बड़े-बड़े गड्ढों में बदल गई। बताया गया कि कुछ इलाकों में लगभग 25 से 30 मीटर यानी करीब 100 फीट तक खुदाई की गई है। इससे न केवल प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हुआ बल्कि आसपास के क्षेत्र में पर्यावरणीय जोखिम भी बढ़ा है। स्थानीय स्तर पर ऐसे मामलों को लेकर पहले भी चिंता जताई जाती रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd">याचिका में यह भी कहा गया है कि पूर्व में खनिज विभाग की जांच में बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन की पुष्टि हुई थी। जांच में यह सामने आया कि कई हजार घनमीटर मूल्यवान काला पत्थर बिना वैध अनुमति के निकाला गया और बाजार में बेचा गया। आरोप है कि इससे जो राजस्व सरकार को मिलना चाहिए था, वह सरकारी खजाने तक पहुंचने के बजाय अवैध रूप से निजी हाथों में चला गया। इसी आधार पर संबंधित संचालकों पर करोड़ों रुपये की पेनल्टी लगाई गई थी, लेकिन वर्षों बाद भी उसकी वसूली अधूरी है। खनन से जुड़े मामलों में समय-समय पर नियमों के पालन और पर्यावरण संरक्षण को लेकर अदालतें सख्त रुख अपनाती रही हैं। अवैध खनन केवल सरकारी राजस्व को प्रभावित नहीं करता, बल्कि इससे प्राकृतिक संसाधनों का नुकसान, भूजल स्तर पर असर और स्थानीय पर्यावरण को भी गंभीर क्षति पहुंचती है। ऐसे मामलों में नियामक एजेंसियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि नियमों का प्रभावी पालन ही अवैध गतिविधियों पर रोक लगा सकता है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह केवल औपचारिक जवाब से संतुष्ट नहीं होगी, बल्कि यह भी देखेगी कि बकाया राशि की वसूली, लीज आवंटन की प्रक्रिया और नियमों के पालन को लेकर सरकार का पक्ष कितना ठोस है। यदि अदालत को जवाब संतोषजनक नहीं लगता, तो आगे और सख्त निर्देश भी दिए जा सकते हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-strictly-seeks-response-from-government-on-re-granting-lease/article-57408</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-strictly-seeks-response-from-government-on-re-granting-lease/article-57408</guid>
                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 14:16:56 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-06/mp-mining-case.jpg"                         length="157531"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एमपी में गिद्धों की गिनती अंतिम दौर में, संख्या 14 हजार पार होने के संकेत</title>
                                    <description><![CDATA[मध्य प्रदेश में गिद्धों की गणना अंतिम चरण में पहुंची। शुरुआती रिपोर्ट में संख्या 14 हजार के पार जाने का अनुमान जताया गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/in-the-last-round-of-vulture-counting-in-mp-the/article-54093"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/madhya-pradesh-vulture-census.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश में गिद्धों की गणना का काम रविवार को तीसरे दिन भी चलता रहा। अब सबकी नजर फाइनल आंकड़ों पर है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन शुरुआती रिपोर्ट में गिद्धों की संख्या 14 हजार के पार पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस बार राज्य के 16 वन वृत्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">9 टाइगर रिजर्व और अन्य संरक्षित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर गिनती की गई है। खास बात यह है कि पहली बार ऑनलाइन एप के जरिए पूरी निगरानी और डेटा एंट्री की जा रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे रिपोर्ट तैयार करना काफी आसान हो गया है। सुबह सूरज निकलने के तुरंत बाद टीमें जंगलों और गिद्धों के घोंसले वाले इलाकों में पहुंचीं। कई जगहों पर लाल सिर वाले और सफेद पीठ वाले गिद्ध नजर आए हैं।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">प्रारंभिक जानकारी के अनुसार</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">पन्ना क्षेत्र में रेड हेडेड वल्चर यानी लाल सिर वाले गिद्ध मिले हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं भोपाल के वन विहार नेशनल पार्क में सफेद पीठ वाले गिद्धों की मौजूदगी देखी गई। फरवरी में हुए सर्वे में प्रदेश में करीब सात प्रजातियों के गिद्ध पाए गए थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें भारतीय गिद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिनेरियस गिद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिस्र गिद्ध और हिमालयन ग्रिफॉन प्रमुख रहे। वन विभाग का कहना है कि पिछले लगभग दस साल में प्रदेश में गिद्धों की संख्या तेजी से बढ़ी है। 2019 में इनकी संख्या करीब 8 हजार थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि 2025 की गणना में यह बढ़कर 12,981 तक पहुंच गई थी। इस बार तो संख्या और भी बढ़ने की संभावना है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">गणना की प्रक्रिया भी काफी ध्यानपूर्वक की जा रही है। गणनाकर्मी और स्वयंसेवक घोंसलों के आसपास बैठे गिद्धों और उनके बच्चों की गिनती कर एप में जानकारी दर्ज कर रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">उड़ते हुए गिद्धों को गिनती में शामिल नहीं किया जाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि दोबारा गिनने में गलती न हो। कई इलाकों में सुबह 9 बजे तक ही सर्वे का काम पूरा कर लिया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उसके बाद तापमान बढ़ने लगता है और गिद्ध ऊंचाई पर उड़ने लगते हैं। बताया जा रहा है कि इस बार टाइगर रिजर्व क्षेत्रों से भी अच्छी संख्या सामने आ सकती है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि गिद्ध कभी विलुप्त होने की कगार पर थे। एक वक्त था जब भारत में इनकी संख्या करोड़ों में थी</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन पशुओं के लिए इस्तेमाल होने वाली डाइक्लोफेनाक दवा के कारण बड़ी संख्या में गिद्धों की मौत होने लगी। इसके बाद इस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उससे धीरे-धीरे इनकी संख्या में सुधार दिखने लगा। मध्य प्रदेश में संरक्षण के लिए लगातार प्रयास किए गए हैं। भोपाल के वन विहार में करीब तीन साल पहले हरियाणा से सफेद पीठ वाले 20 गिद्ध लाए गए थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें संरक्षण केंद्र में रखा गया है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">गिद्धों की प्रजनन प्रक्रिया भी काफी धीमी मानी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये पक्षी साल में सिर्फ एक बार अंडा देते हैं और बच्चे के जीवित निकलने की संभावना लगभग 50 फीसदी होती है। यही वजह है कि उनकी संख्या बढ़ने में समय लगता है। फिलहाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदेश में लगातार बढ़ती संख्या को वन विभाग ने सकारात्मक संकेत माना है। अधिकारियों का कहना है कि अंतिम रिपोर्ट आने के बाद स्थिति और स्पष्ट होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन शुरुआती आंकड़े काफी उत्साहजनक हैं।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/in-the-last-round-of-vulture-counting-in-mp-the/article-54093</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/in-the-last-round-of-vulture-counting-in-mp-the/article-54093</guid>
                <pubDate>Sun, 24 May 2026 11:15:31 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-05/madhya-pradesh-vulture-census.jpg"                         length="172956"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कूनो मे मादा चीता जंगल में दौड़ेगी, टाइगर स्टेट से आगे MP बन रहा वाइल्डलाइफ मॉडल</title>
                                    <description><![CDATA[कूनो नेशनल पार्क में मादा चीतों को जंगल में छोड़ा गया। MP वाइल्डलाइफ संरक्षण, टाइगर रिजर्व और इको-टूरिज्म में नया मॉडल बन रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/female-cheetah-will-run-in-the-forest-mp-is-becoming/article-53117"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ---2026-05-11t132729.875.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">सोमवार को मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले के कूनो नेशनल पार्क में एक खास कदम उठाया जाएगा। यहां</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">बोत्सवाना से लाई गई दो मादा चीतों को उनके बाड़े से खुले जंगल में छोड़ने का कार्यक्रम है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 10-11 मई को कूनो का दौरा करेंगे और इसी दौरान यह प्रक्रिया पूरी होगी। वन विभाग के अधिकारी इसे प्रोजेक्ट चीता के अगले बड़े पड़ाव के रूप में देख रहे हैं। उम्मीद है कि इन मादा चीतों को अब जंगल के बड़े हिस्से में आज़ाद घूमने का मौका मिलेगा।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">ये गतिविधि सिर्फ वन्यजीवों की रिहाई नहीं है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि इसे मध्यप्रदेश के व्यापक मॉडल से भी जोड़ा जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें वन्यजीव संरक्षण को सरकारी योजनाओं से आगे बढ़ाकर एक व्यापक नीति और सामाजिक आंदोलन के रूप में विकसित किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में कूनो में चीतों की संख्या बढ़कर 57 हो चुकी है और अब इसे एक वैश्विक संरक्षण प्रयोगशाला के रूप में विकसित करने की योजनाएं हैं।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दिसंबर 2023 में कार्यभार संभालने के बाद से वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में नई सोच लाने का काम किया है। इसे अब न केवल पर्यावरण तक सीमित रखा जा रहा है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पर्यटन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रामीण रोजगार और सांस्कृतिक पहचान से भी जोड़ा जा रहा है। इसी वजह से पिछले डेढ़ साल में राज्य में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। रातापानी टाइगर रिजर्व का देश के आठवें टाइगर रिजर्व के रूप में घोषित होना भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसकी निकटता भोपाल के कारण इको-टूरिज्म को नई दिशा मिलेगी।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">इसी तरह</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्च 2025 में घोषित माधव टाइगर रिजर्व को लेकर विशेषज्ञों की राय भी सकारात्मक है। यहां बन रही सुरक्षा दीवार को मानव और वन्यजीव संघर्ष को कम करने की एक ठोस पहल माना जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ते टकराव के संदर्भ में।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;"> </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मध्यप्रदेश का गिद्ध संरक्षण मॉडल भी चर्चा में है। यहां गिद्धों की संख्या 14 हजार से अधिक है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो देश में सबसे अधिक है। वन विहार नेशनल पार्क और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के सहयोग से चल रहे रेस्क्यू सेंटर में घायलों का इलाज किया जा रहा है। हाल ही में एक गिद्ध के उज्बेकिस्तान तक पहुंचने की घटना को विभाग ने बड़ी उपलब्धि बताया है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">कूनो के साथ-साथ गांधी सागर और नौरादेही वाइल्डलाइफ सेंचुरी को भी चीता लैंडस्केप के रूप में विकसित किया जा रहा है। अधिकारियों ने बताया कि नौरादेही में सॉफ्ट रिलीज बोमा का निर्माण अगले चरण की तैयारी है। वहीं</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">नए वन्यजीव अभ्यारण्यों और कंजर्वेशन रिजर्व के जरिए राज्य अपने सुरक्षित क्षेत्रों का दायरा लगातार बढ़ा रहा है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">वन विभाग के अनुसार</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताप्ती क्षेत्र को मध्यप्रदेश का पहला कंजर्वेशन रिजर्व घोषित करना भी एक बड़ी सफलता है। इस क्षेत्र में </span>Tigers, Leopards <span lang="hi" xml:lang="hi">और अन्य दुर्लभ प्रजातियों की मौजूदगी इसे संवेदनशील बनाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मॉडल स्थानीय समुदाय और संरक्षण के बीच संतुलन बनाने में मदद करेगा।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">इसके अलावा</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाथी संरक्षण योजना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घड़ियाल और मगरमच्छों के संरक्षण कार्यक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जंगली भैंसों की पुनर्स्थापना जैसी योजनाएं भी राज्य में चल रही हैं। टाइगर कॉरिडोर परियोजना को भविष्य की सबसे बड़ी योजना माना जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके तहत कई टाइगर रिजर्व को जोड़ने की तैयारी है। इससे वन्यजीवों की आवाजाही भी सुरक्षित हो सकेगी।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">वन्यजीव विभाग का कहना है कि इको-टूरिज्म और संरक्षण गतिविधियों से स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। कूनो और अन्य संरक्षित क्षेत्रों में पर्यटन बढ़ने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर देखा जा रहा है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">कुल मिलाकर</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">कूनो में मादा चीतों की जंगल में रिहाई सिर्फ एक घटना नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह मध्यप्रदेश में एक बड़े बदलाव का हिस्सा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें राज्य खुद को </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">टाइगर स्टेट</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">से आगे बढ़ाकर </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">वाइल्डलाइफ लीडर</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">की दिशा में प्रगति कर रहा है।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/female-cheetah-will-run-in-the-forest-mp-is-becoming/article-53117</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/female-cheetah-will-run-in-the-forest-mp-is-becoming/article-53117</guid>
                <pubDate>Mon, 11 May 2026 15:04:06 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-05/%E0%A4%86%E0%A4%9C-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%AB%E0%A4%B2-5-%E0%A4%AE%E0%A4%88-2026-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%95%2C-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9%2C-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%AD-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AD---2026-05-11t132729.875.jpg"                         length="275603"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मध्य प्रदेश में बाघों की मौत पर बढ़ी चिंता, 6 दिन में 3 शावकों की मौत</title>
                                    <description><![CDATA[भुखमरी और प्रबंधन पर उठे सवाल, चार महीनों में 23 बाघों की मौत; विशेषज्ञों ने जताई गहरी चिंता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/concern-increased-over-the-death-of-tigers-in-madhya-pradesh/article-52198"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/mp-tiger-death-news.jpg" alt=""></a><br /><p>मध्यप्रदेश में बाघों की लगातार हो रही मौतों ने राज्य की ‘टाइगर स्टेट’ की पहचान पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला कान्हा टाइगर रिजर्व का है, जहां एक ही बाघिन के तीन शावकों की छह दिनों के भीतर मौत हो गई। इस घटना ने वन्यजीव संरक्षण की स्थिति और प्रबंधन प्रणाली पर बहस तेज कर दी है।</p>
<p>वन विभाग के अनुसार, अमाही क्षेत्र की बाघिन टी-141 के तीसरे शावक का शव शनिवार शाम सरही जोन में मिला। इससे पहले 21 और 24 अप्रैल को इसी बाघिन के दो अन्य शावकों की मौत हो चुकी थी। प्रारंभिक जांच में दो शावकों की मौत का कारण भुखमरी बताया गया है, जबकि तीसरे शावक के शव को विस्तृत परीक्षण के लिए जबलपुर स्थित वन्यजीव फॉरेंसिक प्रयोगशाला भेजा गया है।</p>
<p>यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब प्रदेश में जनवरी से अप्रैल के बीच बाघों की मौत का आंकड़ा 23 तक पहुंच चुका है। इनमें टेरिटोरियल संघर्ष, बीमारी, प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौतें भी शामिल हैं। अकेले अप्रैल में कान्हा और आसपास के क्षेत्रों में चार बाघों की मौत दर्ज की गई है।</p>
<p>मध्यप्रदेश, जो 785 बाघों के साथ देश में शीर्ष स्थान पर रहा है, अब संरक्षण के मोर्चे पर चुनौती का सामना कर रहा है। पिछले वर्षों के आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं—2021 में 34, 2022 में 43, 2023 में 45, 2024 में 46 और 2025 में 55 बाघों की मौत दर्ज की गई। छह वर्षों में कुल 269 बाघों की मौत इस बात का संकेत है कि संरक्षित क्षेत्रों में भी खतरे कम नहीं हुए हैं।</p>
<p>वन विभाग का कहना है कि सभी मामलों में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों का पालन किया जा रहा है और हर घटना की जांच की जा रही है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर निगरानी और त्वरित कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं।</p>
<p>फिलहाल, चौथे शावक की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बनी हुई है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट और विभागीय कदमों से यह तय होगा कि मध्यप्रदेश अपनी ‘टाइगर स्टेट’ की पहचान बरकरार रख पाएगा या नहीं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/concern-increased-over-the-death-of-tigers-in-madhya-pradesh/article-52198</link>
                <guid>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/concern-increased-over-the-death-of-tigers-in-madhya-pradesh/article-52198</guid>
                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 11:46:40 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/2026-04/mp-tiger-death-news.jpg"                         length="138043"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        