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                <title>anti defection law - दैनिक जागरण</title>
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                <title>तृणमूल के 20 सांसदों ने पार्टी छोड़ एनसीपीआई में किया विलय</title>
                                    <description><![CDATA[एनसीपीआई में शामिल होकर बगावती सांसदों ने साधा संवैधानिक दांव, भाजपा से सीधा जुड़ाव टालने के पीछे भी रही राजनीतिक रणनीति]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/20-trinamool-mps-left-the-party-and-merged-with-ncpi/article-56133"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/trinamool-congress.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों के एक साथ पार्टी छोड़कर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय करने के फैसले ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। पहली नजर में यह फैसला चौंकाने वाला लग सकता है क्योंकि जिस पार्टी में इन सांसदों ने विलय किया है, वह राष्ट्रीय स्तर पर लगभग अज्ञात राजनीतिक संगठन मानी जाती है। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक और कानूनी रणनीति भी जुड़ी हुई बताई जा रही है। तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष एनसीपीआई में विलय का दावा पेश किया। यह संख्या तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा सांसदों के दो-तिहाई से अधिक बताई जा रही है। यही आंकड़ा इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। सांसदों ने दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए यह रास्ता चुना, क्योंकि मौजूदा कानूनी व्यवस्था में केवल दो-तिहाई सदस्यों के साथ किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय ही उन्हें अयोग्यता से बचा सकता है। एनसीपीआई की बात करें तो यह पार्टी त्रिपुरा में पंजीकृत है, लेकिन अभी तक राष्ट्रीय राजनीति में उसका कोई बड़ा प्रभाव नहीं रहा है। वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सीमित स्तर पर चुनाव लड़ा था और उसे बेहद कम वोट मिले थे। इसके बावजूद अब अचानक यह पार्टी लोकसभा में 20 सांसदों के साथ चर्चा के केंद्र में आ गई है। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर बागी सांसदों ने इतनी छोटी पार्टी को ही क्यों चुना। शुरुआत में सांसदों के बीच अलग राजनीतिक समूह बनाने पर भी चर्चा हुई थी। लेकिन दल-बदल कानून की मौजूदा व्यवस्था के तहत ऐसा करना आसान नहीं था। यदि सांसद अलग समूह बनाते तो उन्हें अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता था। यही वजह रही कि उन्होंने विलय का विकल्प चुना।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">संविधान की दसवीं अनुसूची यानी एंटी-डिफेक्शन लॉ की पृष्ठभूमि इस फैसले को समझने में अहम भूमिका निभाती है। जब यह कानून 1985 में लागू हुआ था तब इसमें एक-तिहाई विधायकों या सांसदों के समर्थन से अलग समूह बनाने की छूट थी। लेकिन बाद के वर्षों में इस प्रावधान का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हुआ। कई राज्यों और केंद्र की राजनीति में नेताओं ने बार-बार दल बदलकर सरकारों की दिशा बदल दी। इसे देखते हुए वर्ष 2003 में कानून में संशोधन किया गया और अलग समूह बनाने वाली व्यवस्था समाप्त कर दी गई। संशोधन के बाद केवल एक ही रास्ता बचा, जिसमें किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सांसद या विधायक किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय कर सकते हैं। इसी प्रावधान का उपयोग करते हुए तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने एनसीपीआई में शामिल होने का फैसला किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम पूरी तरह संवैधानिक सुरक्षा को ध्यान में रखकर उठाया गया। इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। पिछले कुछ समय से ऐसी खबरें सामने आती रही थीं कि बागी सांसद भाजपा नेताओं के संपर्क में हैं। अटकलें लगाई जा रही थीं कि वे सीधे भाजपा में शामिल हो सकते हैं। हालांकि ऐसा नहीं हुआ। इसके पीछे भी राजनीतिक कारण बताए जा रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">तृणमूल कांग्रेस और भाजपा पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय से कट्टर प्रतिद्वंद्वी रही हैं। ऐसे में यदि सांसद सीधे भाजपा में शामिल हो जाते तो उनके निर्वाचन क्षेत्रों में इसका नकारात्मक संदेश जा सकता था। दूसरी ओर भाजपा के लिए भी इतने बड़े समूह को सीधे पार्टी संरचना में समायोजित करना आसान नहीं होता। पार्टी के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच भी असंतोष पैदा हो सकता था। एनसीपीआई का विकल्प इस लिहाज से अपेक्षाकृत सुरक्षित माना गया। यह पार्टी राजनीतिक रूप से छोटी है और उसका संगठनात्मक ढांचा सीमित है। ऐसे में बागी सांसद वहां अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रख सकते हैं। साथ ही वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को समर्थन देकर केंद्र की राजनीति में अपनी भूमिका भी कायम रख सकते हैं। इस घटनाक्रम का असर केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा। लोकसभा में सांसदों की संख्या बढ़ने से एनडीए को भी राजनीतिक लाभ मिल सकता है। विशेष रूप से उन विधेयकों के संदर्भ में, जिनके लिए व्यापक समर्थन की आवश्यकता होती है। माना जा रहा है कि लोकसभा में संख्या बल बढ़ने से सरकार की रणनीतिक स्थिति पहले की तुलना में मजबूत हो सकती है। तृणमूल कांग्रेस की ओर से इस घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया सामने आने की संभावना जताई जा रही है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 18:09:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>AAP को बड़ा झटका, 7 सांसदों के BJP में विलय को मंजूरी</title>
                                    <description><![CDATA[राज्यसभा में भाजपा की ताकत बढ़कर 113 हुई, AAP घटकर 3 सांसदों तक सिमटी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/big-blow-to-aap-approval-for-merger-of-7-mps/article-52217"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/aap,-bjp.jpg" alt=""></a><br /><p>राज्यसभा में आज बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया, जब सभापति <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">CP Radhakrishnan</span></span> ने आम आदमी पार्टी (AAP) के सात सांसदों के भारतीय जनता पार्टी (BJP) में विलय को मंजूरी दे दी। इस फैसले के बाद राज्यसभा में AAP की संख्या घटकर 3 रह गई, जबकि भाजपा की ताकत बढ़कर 113 सांसदों तक पहुंच गई।इस घटनाक्रम ने संसद के ऊपरी सदन में राजनीतिक संतुलन को बदल दिया है और विपक्षी खेमे में हलचल तेज कर दी है।</p>
<h5><span><strong>कौन-कौन हुए शामिल</strong></span></h5>
<p>जिन सात सांसदों के विलय को मंजूरी मिली है, उनमें <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Raghav Chadha</span></span>, <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Swati Maliwal</span></span>, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, विक्रमजीत साहनी और राजेंद्र गुप्ता शामिल हैं। इन सभी ने हाल ही में भाजपा नेतृत्व से मुलाकात के बाद पार्टी में शामिल होने का निर्णय लिया था। बता दें, इन सांसदों ने सभापति को आवेदन देकर खुद को भाजपा सांसद के रूप में मान्यता देने की मांग की थी, जिसे अब स्वीकार कर लिया गया है।</p>
<h5><span><strong>क्या है पूरा मामला</strong></span></h5>
<p>यह घटनाक्रम 24 अप्रैल को शुरू हुआ, जब राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने भाजपा नेतृत्व से मुलाकात के बाद पार्टी में शामिल होने की घोषणा की थी। बाद में अन्य सांसदों ने भी इसी राह को अपनाया।इन सांसदों ने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है और आंतरिक कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की कमी है।</p>
<p>यह निर्णय संसद भवन, नई दिल्ली में राज्यसभा सभापति द्वारा आज सोमवार को लिया गया। इसके बाद राज्यसभा की आधिकारिक वेबसाइट पर भी इन सांसदों को भाजपा के सदस्य के रूप में अपडेट कर दिया गया।</p>
<p>इस पूरे घटनाक्रम ने दलबदल कानून की वैधानिकता और व्याख्या को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आम आदमी पार्टी ने इसे संविधान की 10वीं अनुसूची का उल्लंघन बताया है और आरोप लगाया है कि यह लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ है।पार्टी के वरिष्ठ नेता <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Sanjay Singh</span></span> ने सभापति को पत्र लिखकर सभी सात सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग की है।</p>
<h5><span><strong>कैसे बदला राजनीतिक समीकरण</strong></span></h5>
<p>इस विलय के बाद राज्यसभा में भाजपा की ताकत 106 से बढ़कर 113 हो गई है, जिससे उसे सदन में और मजबूत स्थिति मिली है। वहीं आम आदमी पार्टी अब केवल 3 सांसदों तक सीमित रह गई है, जिससे उसका संसदीय प्रभाव काफी कम हो गया है।</p>
<p>राघव चड्ढा ने पहले कहा था कि वे खुद को “गलत पार्टी में सही व्यक्ति” महसूस कर रहे थे। वहीं स्वाति मालीवाल ने पार्टी नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए थे और कहा था कि उनके साथ पार्टी में दुर्व्यवहार हुआ।दूसरी ओर, AAP का कहना है कि यह राजनीतिक दबाव और रणनीतिक हस्तक्षेप का परिणाम है।फिलहाल यह मामला संसद से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का केंद्र बना हुआ है, और आगे इसकी कानूनी जांच और राजनीतिक प्रतिक्रिया पर सभी की नजरें टिकी हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 15:52:17 +0530</pubDate>
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