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                <title>Trump - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Trump RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>ट्रम्प के फोन के बाद फीफा ने रद्द किया रेड कार्ड, फैसले पर उठा बड़ा विवाद</title>
                                    <description><![CDATA[अमेरिकी स्ट्राइकर फोलारिन बालोगुन को एक मैच के प्रतिबंध से राहत मिली, लेकिन बेल्जियम से हारकर अमेरिका विश्व कप से बाहर हो गया। फीफा के फैसले ने खेल प्रशासन की निष्पक्षता पर नई बहस छेड़ दी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/after-trumps-call-fifa-canceled-the-red-card-decision-big/article-58048"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/_folarin-balogun.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">फीफा फुटबॉल विश्व कप के दौरान अमेरिकी स्ट्राइकर फोलारिन बालोगुन का रेड कार्ड रद्द किए जाने का मामला दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गया है। बताया जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो से बातचीत कर इस फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग की थी। इसके बाद फीफा की अनुशासन समिति ने बालोगुन पर लगाया गया एक मैच का प्रतिबंध हटा दिया और उन्हें बेल्जियम के खिलाफ प्री-क्वार्टर फाइनल मुकाबले में खेलने की अनुमति मिल गई। हालांकि मैदान पर वापसी के बावजूद अमेरिकी टीम कोई बड़ा उलटफेर नहीं कर सकी और बेल्जियम ने 4-1 से जीत दर्ज करते हुए अमेरिका का टूर्नामेंट खत्म कर दिया। इस पूरे घटनाक्रम ने फीफा के निर्णयों की पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर नई बहस शुरू कर दी है।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक 25 वर्षीय फोलारिन बालोगुन को पिछले नॉकआउट मुकाबले में बोस्निया-हर्जेगोविना के खिलाफ खेलते समय रेड कार्ड दिखाया गया था। रेफरी ने डिफेंडर तारिक मुहारेमोविक पर किए गए फाउल को गंभीर मानते हुए उन्हें सीधे मैदान से बाहर भेज दिया था। सामान्य नियमों के अनुसार रेड कार्ड मिलने वाले खिलाड़ी को अगला मुकाबला नहीं खेलने दिया जाता है, लेकिन इस बार मामला अलग दिशा में चला गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उन्होंने फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो से बात कर बालोगुन के मामले की समीक्षा करने का अनुरोध किया था। ट्रम्प का कहना था कि उन्हें यह फाउल इतना गंभीर नहीं लगा और खिलाड़ी पर लगाया गया प्रतिबंध उचित नहीं था। इसी के बाद फीफा ने अनुशासन समिति के स्तर पर मामले की समीक्षा की और प्रतिबंध हटाने का फैसला लिया।</p>
<p class="isSelectedEnd">बालोगुन के खेलने की अनुमति मिलने के बाद बेल्जियम फुटबॉल महासंघ ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। यूरोपीय फुटबॉल से जुड़े कई अधिकारियों ने भी सवाल उठाए कि यदि मैदान पर रेफरी का फैसला अंतिम माना जाता है तो फिर इस तरह के मामलों में बाहरी दबाव या राजनीतिक बयानबाजी के बाद निर्णय क्यों बदला गया। बेल्जियम फुटबॉल संघ ने फीफा के सामने औपचारिक अपील भी दायर की, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया। इसी वजह से यह मामला खेल जगत में और ज्यादा चर्चा का विषय बन गया। कई विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसे फैसले दूसरे देशों और टीमों के लिए भी विवाद की वजह बन सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">मैदान पर लौटे बालोगुन से अमेरिकी टीम को काफी उम्मीदें थीं। उन्होंने पूरे टूर्नामेंट में तीन गोल किए थे और टीम के सबसे प्रभावशाली खिलाड़ियों में शामिल रहे। लेकिन बेल्जियम के खिलाफ खेले गए मुकाबले में अमेरिकी टीम अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी। बेल्जियम ने शुरुआत से ही आक्रामक खेल दिखाया और अमेरिका की रक्षापंक्ति पर लगातार दबाव बनाए रखा। आखिरकार मुकाबला 4-1 के अंतर से बेल्जियम के पक्ष में समाप्त हुआ और अमेरिका का विश्व कप अभियान यहीं खत्म हो गया। हार के बाद भी चर्चा मैच से ज्यादा रेड कार्ड विवाद को लेकर होती रही।</p>
<p class="isSelectedEnd">व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि उन्होंने सिर्फ यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि खिलाड़ी के साथ न्याय हो। उनके मुताबिक यदि प्रतिबंध बरकरार रहता तो यह टूर्नामेंट के लिए गलत संदेश होता। दूसरी ओर फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो ने सोशल मीडिया पर कहा कि अनुशासन समिति ने पूरी स्वतंत्रता के साथ उपलब्ध तथ्यों और नियमों का मूल्यांकन किया। उन्होंने यह भी दोहराया कि फीफा के फैसले किसी राजनीतिक दबाव के आधार पर नहीं लिए जाते। हालांकि आलोचकों का कहना है कि ट्रम्प की सार्वजनिक टिप्पणी और उसके तुरंत बाद आए फैसले ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">फुटबॉल इतिहास पर नजर डालें तो इस तरह का मामला बेहद दुर्लभ माना जाता है। वर्ष 2018 विश्व कप के दौरान भी कुछ देशों के नेताओं ने रेफरी के फैसलों पर सार्वजनिक टिप्पणी की थी, लेकिन तब फीफा ने किसी सजा या फैसले में बदलाव नहीं किया था। 2002 विश्व कप में दक्षिण कोरिया से जुड़े कुछ विवादित निर्णयों को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं हुई थीं, लेकिन किसी खिलाड़ी की सजा वापस नहीं ली गई थी। ऐसे में मौजूदा घटनाक्रम को विश्व कप इतिहास का पहला ऐसा मामला माना जा रहा है, जब किसी राष्ट्राध्यक्ष की पैरवी के बाद रेड कार्ड से जुड़े प्रतिबंध में बदलाव किया गया। हालांकि विश्व कप इतिहास में रेड कार्ड रद्द होने की एक पुरानी मिसाल भी मिलती है। वर्ष 1962 में ब्राजील के दिग्गज खिलाड़ी गरिंचा को सेमीफाइनल में रेड कार्ड दिखाया गया था, लेकिन बाद में वह फाइनल मुकाबला खेलने उतरे थे। उस समय नियम अलग थे और रेड कार्ड के बाद स्वतः प्रतिबंध लागू नहीं होता था। अनुशासन समिति उपलब्ध सबूतों के आधार पर अलग से फैसला सुनाती थी। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्पोर्ट्स</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 11:59:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ईरान जंग के बीच वैश्विक तेल संकट गहराया, 115 करोड़ बैरल सप्लाई गायब</title>
                                    <description><![CDATA[होर्मुज स्ट्रेट खुलने के बाद भी पूरी तरह राहत नहीं, तेल भंडार 36 साल के निचले स्तर पर]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/global-oil-crisis-deepens-amid-iran-war-115-crore-barrel/article-56437"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/iran-oil-crisis.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दुनिया के ऊर्जा बाजार में ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच बड़ा झटका सामने आया है। हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले चार महीनों में वैश्विक तेल सप्लाई से करीब 115 करोड़ बैरल कच्चा तेल गायब हो गया है। यह आंकड़ा एनालिटिक्स फर्म केपलर की रिपोर्ट में सामने आया है, जिसने पूरी दुनिया में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चिंता खड़ी कर दी है। होर्मुज स्ट्रेट फिर से खुलने के बाद बाजार में थोड़ी राहत जरूर देखी गई है, लेकिन स्थिति अभी भी सामान्य नहीं मानी जा रही है। मिडिल ईस्ट में युद्ध के दौरान तेल आपूर्ति लगभग बाधित रही, जिससे दुनिया के रणनीतिक और वाणिज्यिक तेल भंडार पर भारी दबाव पड़ा। रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान करीब 19 करोड़ बैरल तेल स्टॉक से निकाल लिया गया, जिससे वैश्विक रिजर्व तेजी से घटे हैं। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक स्ट्रेटजिक रिजर्व 1990 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं, जबकि अमेरिका का इमरजेंसी रिजर्व 43 साल के न्यूनतम स्तर पर दर्ज किया गया है। हालात इतने गंभीर रहे कि कई देशों को अपने दैनिक ईंधन उपयोग को संतुलित करने के लिए आपातकालीन खरीदारी करनी पड़ी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में वर्साय में G7 बैठक के दौरान कहा कि अगर युद्ध लंबा चलता, तो अमेरिका के तेल भंडार करीब चार हफ्तों में खत्म हो जाते। उन्होंने यह भी दावा किया कि ईरान के साथ समझौते के बाद स्थिति नियंत्रण में आई है, लेकिन अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद रहता तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ता। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बयान ऊर्जा संकट की गंभीरता को दर्शाता है, क्योंकि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं तेल आपूर्ति पर अत्यधिक निर्भर हैं। सीजफायर और समझौते के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में गिरावट देखी गई है। युद्ध के दौरान जहां कीमतें 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं, वहीं अब यह 80 डॉलर से नीचे आ चुकी हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट केवल अस्थायी राहत है, क्योंकि सप्लाई चेन अभी भी पूरी तरह बहाल नहीं हुई है। समुद्री रास्तों से संभावित बारूदी खतरे हटाने, खाली टैंकरों की वापसी और उत्पादन सामान्य करने में अभी लंबा समय लग सकता है। बाजार फिलहाल जरूरत से ज्यादा आशावादी हो गया है। RBC कैपिटल मार्केट्स की विश्लेषक हेलिमा क्रॉफ्ट का कहना है कि संकट खत्म मान लेना जल्दबाजी होगी, क्योंकि तेल आपूर्ति को सामान्य स्थिति में आने में कई महीनों का समय लग सकता है। वहीं इंफ्रास्ट्रक्चर कैपिटल एडवाइजर्स के CEO जे हैटफील्ड का मानना है कि OPEC देश उत्पादन बढ़ाकर बाजार में स्थिरता ला सकते हैं, जिससे कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मैक्वेरी ग्रुप के ग्लोबल ऑयल एंड गैस स्ट्रैटेजिस्ट विकास द्विवेदी के अनुसार युद्ध से पहले दुनिया के पास पर्याप्त तेल स्टॉक था, इसी कारण इतनी बड़ी सप्लाई बाधा के बावजूद बाजार पूरी तरह नहीं टूटा। उन्होंने यह भी बताया कि डीजल और पेट्रोल के भंडार में गिरावट जरूर आई है, लेकिन स्थिति अभी नियंत्रण में है और आने वाले हफ्तों में सप्लाई चैन में सुधार देखा जा सकता है। आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया में इस समय प्रतिदिन लगभग 10.3 करोड़ बैरल कच्चे तेल का उत्पादन हो रहा है। इसमें अमेरिका, सऊदी अरब, रूस, कनाडा और इराक जैसे देश प्रमुख भूमिका निभाते हैं, जो मिलकर वैश्विक तेल सप्लाई का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा देते हैं। ऐसे में इन देशों में किसी भी प्रकार की राजनीतिक अस्थिरता या युद्ध सीधे तौर पर वैश्विक बाजार और ईंधन कीमतों को प्रभावित करती है। युद्ध के दौरान गायब हुए 115 करोड़ बैरल तेल की भरपाई आसान नहीं होगी। यदि उत्पादन मांग से 50 लाख बैरल प्रतिदिन अधिक भी बढ़ाया जाए, तब भी इस कमी को पूरा करने में लगभग एक साल का समय लग सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 11:24:03 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>अमेरिका-इजराइल जासूसी विवाद से बढ़ा तनाव, DIA का अलर्ट ‘क्रिटिकल’ स्तर पर</title>
                                    <description><![CDATA[ट्रम्प सरकार और नेतन्याहू के बीच मतभेद गहराए, खुफिया एजेंसियों में असाधारण चेतावनी जारी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/tension-increases-due-to-us-israel-spying-dispute-dias-alert-at/article-55143"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-israel-spy-controversy.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">अमेरिका और इजराइल के बीच रिश्तों में एक बार फिर तनाव की स्थिति बनती दिखाई दे रही है। इस बार मामला सीधे जासूसी और खुफिया जानकारी से जुड़ा हुआ है, जिसने वॉशिंगटन और तेल अवीव दोनों में हलचल बढ़ा दी है। अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) के भीतर यह चिंता जताई जा रही है कि इजराइल अमेरिकी अधिकारियों और ट्रम्प सरकार की अंदरूनी जानकारियों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकता है। यह दावा एक अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट में सामने आया है, जिसके बाद सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी निगरानी और सतर्कता बढ़ा दी है। हालांकि इजराइल ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है और इसे पूरी तरह झूठा बताया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">NBC न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) ने हाल ही में इजराइल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस खतरे के स्तर को बढ़ाकर ‘क्रिटिकल’ कर दिया है। यह एजेंसी का सबसे गंभीर अलर्ट माना जाता है और आमतौर पर बेहद असाधारण परिस्थितियों में ही जारी किया जाता है। रिपोर्ट में दो मौजूदा और एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि यह फैसला अचानक नहीं बल्कि कई घटनाओं और आकलनों के आधार पर लिया गया है। हालांकि किसी एक बड़े सुरक्षा उल्लंघन की पुष्टि अब तक नहीं हुई है, लेकिन लगातार मिल रही सूचनाओं ने अमेरिकी एजेंसियों को सतर्क कर दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">सूत्रों के अनुसार, इस अलर्ट का सीधा असर उन अमेरिकी अधिकारियों पर पड़ सकता है जो इजराइल की यात्रा करते हैं या वहां के अधिकारियों से नियमित संपर्क में रहते हैं। ऐसे मामलों में सुरक्षा प्रोटोकॉल को और कड़ा किया गया है। बताया जा रहा है कि अमेरिकी अधिकारी विदेश यात्राओं के दौरान अपने निजी फोन और लैपटॉप का इस्तेमाल करने से बचते हैं और उनकी जगह अस्थायी डिवाइस का उपयोग किया जाता है। कई बार संवेदनशील बैठकों को भी ऐसे स्थानों पर रखा जाता है जहां निगरानी का जोखिम कम हो। यह स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि अमेरिका इजराइल की खुफिया क्षमता को लेकर सतर्क रुख अपना रहा है, भले ही दोनों देश लंबे समय से रणनीतिक साझेदार रहे हों।</p>
<p class="isSelectedEnd">इजराइली दूतावास ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उनका देश किसी भी सहयोगी देश की जासूसी नहीं करता। दूतावास का कहना है कि इजराइल की खुफिया एजेंसियां केवल उन देशों और समूहों पर नजर रखती हैं जिन्हें वह सुरक्षा खतरा मानता है। दूसरी तरफ अमेरिकी अधिकारी भी यह स्वीकार कर रहे हैं कि किसी एक घटना के कारण यह कदम नहीं उठाया गया, बल्कि कई सूचनाओं के आधार पर जोखिम का आकलन किया गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और इजराइल के बीच ईरान को लेकर पहले से ही मतभेद बढ़े हुए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रम्प प्रशासन ईरान के साथ नए समझौते की कोशिश कर रहा है, जबकि इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस पर सख्त रुख अपनाए हुए हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह को लेकर भी दोनों देशों की रणनीति अलग-अलग मानी जा रही है। इसी बीच ट्रम्प और नेतन्याहू के बीच फोन पर हुई कथित तीखी बातचीत ने भी राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। इस विवाद में एक और परत तब जुड़ी जब यह जानकारी सामने आई कि ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि उन्होंने नेतन्याहू के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया था। इससे दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत और राजनीतिक तनाव की अटकलें और तेज हो गई हैं। यह स्थिति सिर्फ कूटनीतिक मतभेद नहीं बल्कि रणनीतिक असहमति का संकेत भी हो सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">अमेरिका और इजराइल के बीच जासूसी के आरोप नए नहीं हैं। इतिहास में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिन्होंने दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित किया है। 1985 का जोनाथन पोलार्ड केस सबसे चर्चित उदाहरणों में से एक है, जिसमें एक अमेरिकी नौसेना अधिकारी पर इजराइल को गोपनीय जानकारी देने का आरोप लगा था। इस मामले ने दोनों देशों के बीच लंबे समय तक तनाव बनाए रखा था। इसी तरह 2008 में बेन-अमी कादिश केस में भी संवेदनशील रक्षा दस्तावेज लीक करने के आरोप लगे थे।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसके अलावा 2019 में ‘स्टिंगरे डिवाइस’ को लेकर भी विवाद सामने आया था, जिसमें आशंका जताई गई थी कि व्हाइट हाउस के आसपास मोबाइल डेटा की निगरानी की गई। हालांकि उस समय भी इजराइल ने सभी आरोपों से इनकार किया था और किसी भी तरह की संलिप्तता से साफ इनकार किया गया था। मौजूदा विवाद ने एक बार फिर अमेरिका-इजराइल संबंधों की जटिलता को सामने ला दिया है। भले ही दोनों देश रणनीतिक साझेदार हों, लेकिन खुफिया और सुरक्षा मामलों में अविश्वास की परतें समय-समय पर उभरती रही हैं। DIA का यह नया अलर्ट आने वाले समय में दोनों देशों के बीच सहयोग और निगरानी दोनों को प्रभावित कर सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 17:38:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>ट्रंप-शी जिनपिंग की बीजिंग में अहम मुलाकात, जानें क्या हुआ खास?</title>
                                    <description><![CDATA[बीजिंग में ट्रंप और शी जिनपिंग की अहम मुलाकात में व्यापार, सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता पर चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/important-meeting-of-trump-xi-jinping-in-beijing-know-what-happened/article-53325"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ---2026-05-14t114448.121.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बीजिंग में गुरुवार को सभी की नजरें उस वक्त टिकी रहीं</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आमने-सामने बैठे। यह मुलाकात चीन की राजधानी के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां औपचारिक स्वागत और गार्द ऑफ ऑनर के साथ माहौल काफी गंभीर और राजनयिक था। बताया गया कि दोनों नेताओं ने एक-दूसरे से हाथ मिलाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुस्कुराए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और फिर अपने-अपने प्रतिनिधिमंडल का परिचय कराया। अमेरिकी पक्ष से कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और चीनी सेना की ओर से ऑनर गार्ड ने औपचारिक सलामी दी। यह दौरा ऐसे समय पर हुआ है जब अमेरिका और चीन के बीच व्यापार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और सुरक्षा के मुद्दे लगातार चर्चा में हैं।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मुलाकात की शुरुआत में माहौल काफी गर्मजोशी भरा दिखाई दिया। ट्रंप ने शी जिनपिंग की तारीफ करते हुए उन्हें </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">“<span lang="hi" xml:lang="hi">मजबूत और प्रभावशाली नेता</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">बताया और भविष्य में दोनों देशों के रिश्तों को बेहतर बनाने की उम्मीद जताई। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार मुश्किल हालात आए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन बातचीत के जरिए चीजें संभाली गईं। ट्रंप ने ये भी कहा कि उनके बीच लंबे समय से संवाद का इतिहास रहा है और व्यक्तिगत रिश्तों ने कई बार कूटनीतिक तनाव को कम करने में मदद की। वहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शी जिनपिंग ने ट्रंप का स्वागत करते हुए कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में दोनों देशों के बीच स्थिर संबंध बेहद जरुरी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि चीन और अमेरिका को एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी की तरह नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि साझेदार की तरह आगे बढ़ना चाहिए।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बातचीत में वैश्विक अर्थव्यवस्था</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यापार संतुलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और तकनीकी प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दों पर चर्चा भी हुई। जैसे-जैसे बैठक आगे बढ़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बातचीत ने रणनीतिक और गंभीर मुद्दों की दिशा लेने शुरू कर दी। शी जिनपिंग ने </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">थ्यूसीडाइड्स ट्रैप</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">का जिक्र करते हुए कहा कि बड़ी शक्तियों के बीच टकराव से बचने के लिए सहयोग की राह निकाली जानी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वरना वैश्विक अस्थिरता बढ़ सकती है। ट्रंप ने भी कहा कि अगर अमेरिका और चीन मिलकर काम करें तो दुनिया में स्थिरता और आर्थिक विकास को नई दिशा मिल सकती है। इस दौरान ताइवान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानवाधिकार और तकनीकी प्रतिबंध जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी दोनों देशों के बीच पुराने मतभेद भी अप्रत्यक्ष रूप से सामने आए। बीजिंग में इस मुलाकात के बाद एक राजकीय भोज का आयोजन भी हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे दोनों देशों के रिश्तों में एक नए अध्याय की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्पेशल खबरें</category>
                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 May 2026 11:50:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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                <title>ईरानी सांसद का पाकिस्तान पर हमला, अमेरिका के पक्ष में झुकने का आरोप</title>
                                    <description><![CDATA[तेहरान ने पाकिस्तान की भूमिका पर जताई आपत्ति, इब्राहिम रेजई का बयान ऐसे समय आया जब क्षेत्र में कूटनीतिक हलचल तेज है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/iranian-mp-attacks-pakistan-and-accuses-it-of-bowing-in/article-52235"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/iran-pakistan-relations.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और ईरान-अमेरिका के बीच चल रही कूटनीतिक कोशिशों के बीच पाकिस्तान की भूमिका पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। ईरान की संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के प्रवक्ता इब्राहिम रेजई ने पाकिस्तान को मध्यस्थ (मीडिएटर) के रूप में अस्वीकार करते हुए कहा है कि वह निष्पक्ष भूमिका निभाने में सक्षम नहीं है। यह बयान ईरानी सांसद इब्राहिम रेजई ने तेहरान में दिया, जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने की कोशिशें जारी हैं। रेजई ने स्पष्ट कहा कि पाकिस्तान भले ही ईरान का दोस्त हो, लेकिन वह किसी भी तरह की मध्यस्थता के लिए उपयुक्त नहीं है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रेजई का कहना है कि एक सही मध्यस्थ वही हो सकता है जो दोनों पक्षों के बीच समान दूरी बनाए रखे, जबकि पाकिस्तान की स्थिति वैसी नहीं दिखती। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने हाल ही में 24 घंटे के भीतर दूसरी बार पाकिस्तान का दौरा किया था, जिससे क्षेत्रीय कूटनीति में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थीं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान का यह बयान केवल पाकिस्तान पर टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह संकेत भी है कि तेहरान किसी भी बाहरी पक्ष को लेकर सतर्क रुख अपना रहा है। क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और अमेरिका के साथ जटिल रिश्तों के बीच ईरान फिलहाल सीमित और भरोसेमंद साझेदारों पर ही निर्भर दिख रहा है। ईरान-अमेरिका तनाव और बढ़ते कूटनीतिक संपर्कों के बीच यह साफ है कि मध्यस्थता की भूमिका को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है। पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठने से आने वाले दिनों में क्षेत्रीय कूटनीति और अधिक जटिल हो सकती है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 17:44:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
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