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                <title>Sanatan Dharma - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Sanatan Dharma RSS Feed</description>
                
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                <title>प्रेमानंद जी महाराज के जीवन के 10 अनमोल मंत्र, जो बदल सकते हैं सोच, व्यवहार और जीवन की दिशा</title>
                                    <description><![CDATA[प्रेमानंद जी महाराज के प्रेरक जीवन मंत्र, भक्ति, सेवा, विनम्रता, संतोष और सकारात्मक सोच से जीवन को बेहतर बनाने का संदेश देते हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/mantras-of-life/10-precious-mantras-from-the-life-of-premanand-ji-maharaj/article-57453"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/premanand-ji-maharaj.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद जी महाराज आज देशभर में लाखों श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रोत बन चुके हैं। उनके प्रवचन केवल धार्मिक विषयों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि जीवन को सरल, सकारात्मक और संतुलित बनाने की सीख भी देते हैं। सोशल मीडिया से लेकर सत्संग सभाओं तक उनके विचार बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच रहे हैं। प्रेमानंद जी महाराज का कहना है कि जीवन की सबसे बड़ी सफलता धन, पद या प्रसिद्धि नहीं, बल्कि मन की शांति और ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम है। उनका मानना है कि यदि व्यक्ति अपने व्यवहार, सोच और कर्म में थोड़ा बदलाव कर ले तो उसका जीवन पूरी तरह बदल सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रेमानंद जी महाराज हमेशा कहते हैं कि मनुष्य को सबसे पहले अपने भीतर झांकना चाहिए। दूसरों की गलतियां देखने से पहले अपनी कमियों को पहचानना आवश्यक है। उनका मानना है कि जब तक इंसान स्वयं को नहीं समझता, तब तक वह जीवन का वास्तविक आनंद नहीं ले सकता। वे बार-बार आत्मचिंतन पर जोर देते हैं और कहते हैं कि हर दिन कुछ समय अपने विचारों और कर्मों का मूल्यांकन करना चाहिए। यही आदत व्यक्ति को बेहतर इंसान बनाती है। उनके सबसे चर्चित संदेशों में से एक है कि भगवान से प्रेम करो, लेकिन स्वार्थ के लिए नहीं। प्रेमानंद जी कहते हैं कि अधिकांश लोग भगवान को तभी याद करते हैं जब उन्हें कोई परेशानी होती है। जबकि सच्ची भक्ति वह है जिसमें कोई लालच, भय या अपेक्षा न हो। यदि मन से भगवान का स्मरण किया जाए तो जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करना भी आसान हो जाता है। उनके अनुसार भक्ति केवल मंदिर जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि हर अच्छे कर्म में भगवान का अनुभव करना ही सच्ची उपासना है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रेमानंद जी महाराज सेवा को सबसे बड़ा धर्म मानते हैं। उनका कहना है कि किसी भूखे को भोजन कराना, किसी दुखी का सहारा बनना या किसी जरूरतमंद की मदद करना ही वास्तविक पूजा है। यदि व्यक्ति दूसरों की भलाई के लिए कार्य करता है तो ईश्वर स्वयं उसके जीवन की कठिनाइयों को कम कर देते हैं। वे बताते हैं कि सेवा कभी दिखावे के लिए नहीं करनी चाहिए। निस्वार्थ भाव से किया गया छोटा सा कार्य भी भगवान को प्रिय होता है। उनका एक और महत्वपूर्ण जीवन मंत्र है कि अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। प्रेमानंद जी कहते हैं कि जैसे ही व्यक्ति को अपनी सफलता, ज्ञान या धन पर घमंड होने लगता है, उसी समय उसका पतन शुरू हो जाता है। इसलिए हमेशा विनम्र रहना चाहिए। वे बताते हैं कि फल से लदा हुआ पेड़ हमेशा झुक जाता है। उसी प्रकार सच्चा ज्ञानी और सफल व्यक्ति भी हमेशा विनम्र रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रेमानंद जी महाराज क्रोध को जीवन का सबसे बड़ा नुकसान मानते हैं। उनका कहना है कि कुछ क्षण का गुस्सा वर्षों पुराने रिश्तों को खत्म कर सकता है। इसलिए क्रोध आने पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय शांत रहने की आदत विकसित करनी चाहिए। वे बताते हैं कि धैर्य रखने वाला व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय ले पाता है। इसलिए संयम और धैर्य जीवन की सबसे बड़ी ताकत हैं। वे संतोष को भी सुखी जीवन का आधार मानते हैं। प्रेमानंद जी कहते हैं कि आज अधिकांश लोग दूसरों से तुलना करके दुखी रहते हैं। जबकि वास्तविक खुशी अपनी परिस्थितियों को स्वीकार करने और ईमानदारी से मेहनत करने में है। उनका मानना है कि मेहनत जरूर करें, लेकिन परिणाम को लेकर अत्यधिक चिंता न करें। जो व्यक्ति संतोष के साथ जीवन जीता है, वही वास्तविक आनंद का अनुभव करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रेमानंद जी महाराज का कहना है कि माता-पिता और गुरु का सम्मान करना हर व्यक्ति का कर्तव्य है। उनके अनुसार जिस घर में माता-पिता का आदर होता है, वहां सुख-समृद्धि बनी रहती है। गुरु केवल शिक्षा नहीं देते बल्कि जीवन जीने की सही दिशा भी दिखाते हैं। इसलिए उनके प्रति श्रद्धा और सम्मान बनाए रखना चाहिए। वे हमेशा सकारात्मक सोच रखने की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि जीवन में कठिनाइयां हर किसी के सामने आती हैं, लेकिन सफल वही होता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी उम्मीद नहीं छोड़ता। नकारात्मक विचार मनुष्य की ऊर्जा को कमजोर कर देते हैं, जबकि सकारात्मक सोच नई संभावनाओं के रास्ते खोलती है। इसलिए हर परिस्थिति में अच्छा सोचने और अच्छा करने का प्रयास करना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रेमानंद जी महाराज समय के महत्व पर भी विशेष बल देते हैं। उनका कहना है कि बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता। इसलिए हर दिन का सही उपयोग करना चाहिए। समय को व्यर्थ की बहस, ईर्ष्या, क्रोध और आलस्य में नष्ट करने के बजाय ज्ञान, सेवा और आत्मविकास में लगाना चाहिए। यही आदत भविष्य को बेहतर बनाती है। उनके प्रवचनों में बार-बार नाम जप का महत्व भी बताया जाता है। वे कहते हैं कि यदि व्यक्ति प्रतिदिन कुछ समय भगवान के नाम का स्मरण करे तो मन शांत होता है और नकारात्मक विचार धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। उनके अनुसार नाम जप केवल धार्मिक क्रिया नहीं बल्कि मानसिक शांति का सरल माध्यम भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रेमानंद जी महाराज का पूरा संदेश यही है कि जीवन को सरल रखें, दूसरों के प्रति प्रेम रखें, ईमानदारी से मेहनत करें और हर परिस्थिति में भगवान पर विश्वास बनाए रखें। वे बताते हैं कि सच्ची सफलता बाहरी उपलब्धियों से नहीं बल्कि मन की शांति, अच्छे संस्कार और दूसरों के प्रति करुणा से मिलती है। यदि व्यक्ति इन मूल्यों को अपने दैनिक जीवन में अपनाता है तो वह न केवल स्वयं खुश रह सकता है बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणा बन सकता है। आज के तनावपूर्ण और भागदौड़ भरे जीवन में प्रेमानंद जी महाराज के ये जीवन मंत्र लोगों को मानसिक संतुलन, सकारात्मक सोच और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करने का संदेश देते हैं। यही कारण है कि उनके विचार हर उम्र के लोगों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। उनके अनुसार जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य केवल सफलता नहीं, बल्कि ऐसा व्यक्तित्व बनाना है जिससे स्वयं भी सुखी रहें और दूसरों के जीवन में भी खुशियां बांट सकें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>जीवन के मंत्र</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 00:01:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>108 कलशों के पवित्र जल से महाप्रभु का महाअभिषेक, खुले मंच से दिए भक्तों को दर्शन</title>
                                    <description><![CDATA[देव स्नान पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन का वैदिक विधि-विधान से स्नान, अब 15 दिनों तक रहेंगे अनासार गृह में, इसके बाद होगा नवयौवन दर्शन और रथयात्रा का शुभारंभ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/mahaprabhus-mahaabhishek-with-the-holy-water-of-108-kalash-was/article-57321"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/jagannath-puri.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">सनातन आस्था के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजनों में शामिल देव स्नान पूर्णिमा का पर्व सोमवार को ओडिशा के श्रीजगन्नाथ धाम पुरी में पूरे श्रद्धा, उत्साह और वैदिक परंपराओं के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई भगवान बलभद्र, बहन देवी सुभद्रा, सुदर्शन और मदनमोहन का 108 पवित्र कलशों के जल से महाअभिषेक किया गया। हर वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन होने वाला यह दिव्य अनुष्ठान विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा महापर्व की औपचारिक शुरुआत माना जाता है। देश के अलग-अलग राज्यों के साथ विदेशों से भी हजारों श्रद्धालु इस दुर्लभ अवसर के साक्षी बनने पुरी पहुंचे। सुबह से ही श्रीमंदिर परिसर में भक्तों की लंबी कतारें लगी रहीं और पूरा क्षेत्र शंखध्वनि, घंटानाद तथा वैदिक मंत्रों से गूंजता रहा। देव स्नान पूर्णिमा वर्ष का एकमात्र ऐसा दिन माना जाता है जब भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों को खुले मंच से प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। सुबह मंगला आरती, अबकाश और अन्य दैनिक नीतियां पूरी होने के बाद पारंपरिक पहंडी विजय के माध्यम से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन को गर्भगृह से बाहर स्नान मंडप तक लाया गया। इस दौरान श्रद्धालुओं ने जय जगन्नाथ के जयघोष के साथ महाप्रभु का स्वागत किया। पूरे मंदिर परिसर में आध्यात्मिक वातावरण देखने को मिला और श्रद्धालुओं में भगवान के दर्शन को लेकर विशेष उत्साह दिखाई दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd"><img alt="9k="></img></p>
<p class="isSelectedEnd">स्नान अनुष्ठान के लिए मंदिर परिसर स्थित पवित्र सुना कुआं यानी स्वर्ण कूप से जल निकाला गया। इस जल में चंदन, कपूर, अगरु, केसर, पुष्प और विभिन्न औषधीय जड़ी-बूटियों को मिलाकर उसे सुगंधित बनाया गया। इसके बाद 108 स्वर्ण कलशों में इस जल को भरकर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान का राजकीय स्नान कराया गया। परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ को 35 कलश, भगवान बलभद्र को 33, देवी सुभद्रा को 22 तथा सुदर्शन को 18 कलशों के पवित्र जल से स्नान कराया गया। यह अनुष्ठान श्रीजगन्नाथ परंपरा की सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण धार्मिक विधियों में से एक माना जाता है। महाअभिषेक के बाद गजपति महाराजा ने पारंपरिक 'छेरा पहंरा' की रस्म निभाई। इसके पश्चात भगवान जगन्नाथ और भगवान बलभद्र को दुर्लभ 'हाती बेश' अर्थात गजानन स्वरूप में सजाया गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान ने अपने परम भक्त गणपति भट्ट को दर्शन देने के लिए हाथी स्वरूप धारण किया था। तभी से देव स्नान पूर्णिमा पर भगवान को हाती बेश में सजाने की परंपरा चली आ रही है। इस दिव्य स्वरूप के दर्शन को अत्यंत शुभ माना जाता है और हर वर्ष लाखों श्रद्धालु विशेष रूप से इस अवसर पर पुरी पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार 108 कलशों के शीतल जल से स्नान कराने के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद उन्हें अनासार गृह में विश्राम के लिए ले जाया जाता है, जहां अगले 15 दिनों तक आम श्रद्धालुओं के लिए प्रत्यक्ष दर्शन बंद रहते हैं। इस अवधि में केवल दैतापति सेवक भगवान की विशेष सेवा करते हैं और आयुर्वेदिक औषधियों से उनकी सेवा-सुश्रुषा की जाती है। इसे भगवान के विश्राम काल के रूप में देखा जाता है। अनासार अवधि पूरी होने के बाद नवयौवन दर्शन का आयोजन होता है, जिसमें भगवान नए स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। इसके तुरंत बाद विश्वविख्यात रथयात्रा का आयोजन किया जाता है, जिसका इंतजार देश-दुनिया के करोड़ों श्रद्धालु पूरे वर्ष करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd"><img alt="9k="></img></p>
<p class="isSelectedEnd">स्कंद पुराण के अनुसार देव स्नान पूर्णिमा की परंपरा का संबंध राजा इंद्रद्युम्न से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ के विग्रहों की स्थापना के बाद राजा इंद्रद्युम्न ने पहली बार इस महाअभिषेक का आयोजन कराया था। तभी से ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है। धार्मिक दृष्टि से इस दिन को भगवान जगन्नाथ के प्राकट्य दिवस के रूप में भी माना जाता है। यही कारण है कि देव स्नान पूर्णिमा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सनातन परंपरा, ओडिशा की सांस्कृतिक विरासत और भगवान जगन्नाथ के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक बन चुकी है। इस वर्ष भी मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए थे। दर्शन व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए विशेष प्रबंधन किया गया ताकि बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालु बिना किसी परेशानी के महाप्रभु के दर्शन कर सकें। पूरे दिन भजन-कीर्तन, वैदिक अनुष्ठान और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता रहा। श्रद्धालुओं का मानना है कि देव स्नान पूर्णिमा पर भगवान के खुले मंच से दर्शन करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। देव स्नान पूर्णिमा के साथ अब जगन्नाथ संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू हो गया है। अगले 15 दिनों तक भगवान अनासार गृह में रहेंगे, जिसके बाद नवयौवन दर्शन होगा और फिर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने भव्य रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकलेंगे। विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और परंपरा का ऐसा उत्सव है, जिसकी पहचान पूरी दुनिया में है। पुरी की यह परंपरा सदियों से सनातन संस्कृति की जीवंत विरासत को आगे बढ़ाती आ रही है और हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 16:57:39 +0530</pubDate>
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                <title>धीरेंद्र शास्त्री की गौ माता को राष्ट्र माता बनाने की मांग तेज</title>
                                    <description><![CDATA[27 जुलाई को देशभर में चलेगा हस्ताक्षर अभियान, संत समाज से दिल्ली पहुंचने की अपील]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/dhirendra-shastris-demand-to-make-mother-cow-the-mother-of/article-54379"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/dhirendra-shastri.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करने की मांग को लेकर बड़ा अभियान शुरू करने का ऐलान किया है। उत्तराखंड के श्री बद्रीनाथ धाम में चल रही श्री सत्यनारायण कथा के दौरान उन्होंने कहा कि 27 जुलाई को देशभर के सभी जिलों में ज्ञापन सौंपे जाएंगे और हस्ताक्षर अभियान चलाया जाएगा। इस अभियान का उद्देश्य केंद्र सरकार तक यह संदेश पहुंचाना है कि देश में गौ माता को राष्ट्र माता का दर्जा दिया जाए। कथा में मौजूद श्रद्धालुओं और संत समाज के बीच इस घोषणा को लेकर काफी उत्साह दिखाई दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पंडित धीरेंद्र शास्त्री इन दिनों उत्तराखंड यात्रा पर हैं। बताया जा रहा है कि उन्होंने 21 दिनों की कठिन साधना पूरी करने के बाद बद्रीनाथ धाम में पांच दिवसीय श्री सत्यनारायण कथा की शुरुआत की है। कथा के पहले दिन व्यासपीठ से उन्होंने गौ संरक्षण को लेकर विस्तार से बात की और देशभर के सनातनियों, गौ सेवकों और संत समाज से इस अभियान में सक्रिय भागीदारी की अपील की। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि गौ माता के सम्मान और संरक्षण के लिए देशव्यापी स्तर पर आवाज उठाई जाए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कथा के दौरान उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति और परंपरा में गाय का विशेष स्थान रहा है। सदियों से गाय को पूजनीय माना जाता रहा है और गांवों की अर्थव्यवस्था से लेकर धार्मिक आस्था तक उसका गहरा संबंध है। उन्होंने कहा कि अगर देश में कई चीजों को राष्ट्रीय दर्जा दिया जा सकता है तो गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करने की मांग भी गंभीरता से सुनी जानी चाहिए। इसके लिए समाज के हर वर्ग को एकजुट होकर आगे आना होगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पंडित शास्त्री ने अपने संबोधन में सड़कों पर घूम रही बेसहारा गायों का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि सिर्फ घोषणा करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि ऐसी व्यवस्था भी बननी चाहिए जिससे गौ माताओं को सम्मानपूर्वक गौशालाओं तक पहुंचाया जा सके। उन्होंने कहा कि कई शहरों और गांवों में बड़ी संख्या में गायें सड़कों पर भटकती नजर आती हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा भी बना रहता है। ऐसे में सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि गौ संरक्षण को लेकर गंभीर कदम उठाए जाएं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अपने संबोधन के दौरान उन्होंने एक समाचार का जिक्र करते हुए कहा कि अब मुस्लिम समाज के कुछ लोग भी गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करने के समर्थन में सामने आ रहे हैं। उन्होंने मौलाना मदनी का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने भी इस मांग को लेकर समर्थन जताया है। इस दौरान पंडित धीरेंद्र शास्त्री ने कहा, “हम लोग गाय को रोटी खिलाते हैं, कुछ लोग रोटी के साथ गाय खाते हैं, लेकिन अब वे भी गौ माता को राष्ट्र माता बनाने के समर्थन में आगे आ रहे हैं। देश बदल रहा है।” उनके इस बयान के बाद कथा स्थल पर मौजूद श्रद्धालुओं ने जयकारे लगाए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हालांकि उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी सामने आने की संभावना जताई जा रही है। बीते कुछ वर्षों में गौ संरक्षण और गौ राजनीति का मुद्दा कई बार राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है। कई राज्यों में गौवंश संरक्षण को लेकर कानून भी बनाए गए हैं। वहीं विपक्षी दल समय-समय पर इस मुद्दे पर सरकारों को घेरते रहे हैं। ऐसे माहौल में पंडित धीरेंद्र शास्त्री का यह अभियान आने वाले समय में चर्चा का बड़ा विषय बन सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उन्होंने संत समाज से अपील करते हुए कहा कि सभी संत महात्मा, गौ सेवक और सनातनी एकजुट होकर दिल्ली पहुंचें और सरकार के सामने अपनी मांग मजबूती से रखें। उनके मुताबिक यह सिर्फ धार्मिक मुद्दा नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि अगर समाज एकजुट होकर आवाज उठाएगा तो सरकार को इस दिशा में फैसला लेने पर मजबूर होना पड़ेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">27 जुलाई को प्रस्तावित इस अभियान के तहत देशभर के जिलों में प्रशासन के माध्यम से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपे जाने की तैयारी की जा रही है। इसके साथ ही हस्ताक्षर अभियान भी चलाया जाएगा। आयोजकों का दावा है कि बड़ी संख्या में लोग इस अभियान से जुड़ेंगे। सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं और समर्थक लगातार अभियान के समर्थन में पोस्ट साझा कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बद्रीनाथ धाम में चल रही कथा में देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे श्रद्धालु शामिल हो रहे हैं। कथा स्थल पर सुरक्षा के भी विशेष इंतजाम किए गए हैं। कथा के दौरान धार्मिक अनुष्ठानों और भजन-कीर्तन का आयोजन भी किया जा रहा है। श्रद्धालुओं का कहना है कि गौ संरक्षण का मुद्दा लंबे समय से उठता रहा है, लेकिन अब इसे बड़े स्तर पर अभियान के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 28 May 2026 09:57:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पूजा के दौरान भूलकर भी न करें ये 7 गलतियां, वरना नहीं मिलता पूरा फल</title>
                                    <description><![CDATA[पूजा-पाठ के दौरान की गई छोटी गलतियां भी आराधना का फल कम कर सकती हैं। जानें पूजा के समय किन 7 बातों का ध्यान रखना जरूरी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/do-not-make-these-7-mistakes-during-puja-otherwise-you/article-54086"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/worship-guidelines-rules-for-puja.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हिंदू धर्म में पूजा-पाठ को केवल धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा से भी जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमों के साथ की गई आराधना व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि ला सकती है। लेकिन कई बार लोग जल्दबाजी या जानकारी की कमी में ऐसी गलतियां कर बैठते हैं</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनसे पूजा का प्रभाव कम हो जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा के समय शुद्धता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दिशा और सामग्री का विशेष ध्यान रखना जरूरी माना गया है। ज्योतिष और धर्माचार्यों के मुताबिक कुछ छोटी लापरवाहियाँ भी पूजा को निष्फल बना सकती हैं।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">सबसे पहली बात घर के मंदिर में रखी मूर्तियों को लेकर कही जाती है। धार्मिक मान्यता है कि टूटी या खंडित मूर्तियां घर में नहीं रखनी चाहिए। ऐसी मूर्तियों की पूजा करना शुभ नहीं माना जाता। इसके अलावा देवी-देवताओं को गलत फूल अर्पित करने से भी बचना चाहिए। बताया जाता है कि भगवान शिव और गणेश जी को तुलसी अर्पित नहीं की जाती</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं शिव पूजा में केतकी का फूल वर्जित माना गया है। पूजा में इस्तेमाल होने वाले फूल और जल भी ताजे होने चाहिए। बासी फूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुरझाई माला या पुराना जल पूजा की पवित्रता को प्रभावित कर सकता है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पूजा करते समय दिशा का भी खास महत्व माना गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार पूर्व</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर या ईशान दिशा की ओर मुख करके पूजा करना शुभ माना जाता है। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पूजा करने से बचने की सलाह दी जाती है। वहीं आरती के दौरान बीच में उठकर चले जाना भी उचित नहीं माना गया। ऐसा कहा जाता है कि अधूरी आरती से पूजा का पूर्ण फल नहीं मिल पाता। कई लोग जल्दबाजी में आरती छोड़ देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन धार्मिक दृष्टि से इसे सही नहीं माना जाता।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">दीपक को लेकर भी कुछ नियम बताए गए हैं। मान्यता है कि पूजा का दीपक किसी दूसरे जलते हुए दीपक से नहीं जलाना चाहिए। साथ ही पूजा के दौरान दीपक बुझना भी शुभ संकेत नहीं माना जाता। इसलिए लोग पूजा शुरू करने से पहले घी या तेल की मात्रा का ध्यान रखते हैं। इसके अलावा पूजा करते समय मन को शांत रखना भी बेहद जरूरी माना गया है। गुस्सा करना</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपशब्द बोलना या किसी की बुराई करना पूजा की पवित्रता को कम कर सकता है। धर्माचार्यों का कहना है कि शांत और सकारात्मक मन से की गई पूजा ही फलदायी मानी जाती है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">धार्मिक जानकारों के मुताबिक पूजा केवल विधि-विधान नहीं बल्कि आस्था और अनुशासन का भी विषय है। ऐसे में छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखने से पूजा का शुभ प्रभाव बढ़ सकता है और मानसिक संतुलन भी बना रहता है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 24 May 2026 00:00:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>25 या 26 मई? जानिए गंगा दशहरा की सही तारीख</title>
                                    <description><![CDATA[गंगा दशहरा 2026 कब मनाया जाएगा? जानिए 25 या 26 मई में सही तारीख, शुभ मुहूर्त, गंगा स्नान का समय और पूजा विधि।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/know-the-exact-date-of-ganga-dussehra-on-25th-or/article-53997"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/ganga-dussehra-2026.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;"><strong>Ganga Dussehra </strong><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>2026:</strong> गंगा दशहरा को हिंदू धर्म में एक बहुत ही खास पर्व माना जाता है। माना जाता है कि इसी दिन मां गंगा स्वर्ग से धरती पर आई थीं। हर साल ये पर्व ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन गंगा स्नान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दान-पुण्य और मां गंगा की पूजा का काफी महत्व होता है। लेकिन इस बार 2026 के गंगा दशहरा को लेकर लोगों के बीच कुछ कन्फ्यूजन नज़र आ रहा है। कुछ लोग कह रहे हैं कि ये 25 मई को है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरे इसे 26 मई को मनाने की बात कर रहे हैं। इस वजह से सही तारीख जानने में लोग उलझन में हैं।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पंचांग के मुताबिक</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">दशमी तिथि का आरंभ 25 मई 2026 को सुबह 4:30 बजे से होगा और इसका समापन 26 मई की सुबह करीब 5:10 बजे माना जाएगा। हिंदू धर्म में ज्यादातर पर्व उदया तिथि के आधार पर मनाए जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए गंगा दशहरा 25 मई 2026</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोमवार को मनाया जाएगा। धार्मिक जानकारों का मानना है कि इस दिन गंगा स्नान और पूजा करना बेहद शुभ है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">गंगा दशहरा से जुड़ी एक धार्मिक मान्यता काफी प्रचलित है। कहा जाता है कि राजा भागीरथ की कठोर तपस्या के बाद मां गंगा धरती पर आई थीं</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि उनके पूर्वजों का उद्धार हो सके। मान्यताओं के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मां गंगा पहले भगवान ब्रह्मा के कमंडल में रहती थीं और बाद में भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण कर उनके वेग को नियंत्रित किया था। इसीलिए गंगा दशहरा पर्व को विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व भी है। कहते हैं कि गंगा में डुबकी लगाने से व्यक्ति के दस प्रकार के पापों का नाश होता है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">और इसी वजह से इसे </span>‘<span lang="hi" xml:lang="hi">दशहरा</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">कहा जाता है। अगर किसी कारणवश गंगा नदी तक पहुंचना संभव न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो लोग घर में स्नान के पानी में गंगाजल मिलाकर भी स्नान करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे धार्मिक रूप से पुण्यदायी माना गया है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">25 मई को ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:04 से 4:45 बजे तक रहेगा। वहीं</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रातः-संध्या का समय 4:24 से 5:26 बजे तक बताया जा रहा है। इस दौरान स्नान और पूजा करना शुभ रहेगा। इसके अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरे दिन रवि योग का संयोग भी रहने की आशा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे काफी फलदायी माना जाता है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">गंगा दशहरा के दिन लोग मां गंगा को फूल</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">दीप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धूप और नैवेद्य अर्पित करते हैं। कई श्रद्धालु इस दिन दान-पुण्य भी करते हैं। कपड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भोजन और जरूरत की चीजों का दान करना बहुत शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से मां गंगा की पूजा करने पर जीवन की बाधाएं कम होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 23 May 2026 00:00:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>19 मई महाकाल भस्म आरती में हुआ दिव्य श्रृंगार, भस्म, चंदन और रजत मुकुट से सजे बाबा महाकालेश्वर</title>
                                    <description><![CDATA[उज्जैन के महाकाल मंदिर में 19 मई की भस्म आरती में बाबा महाकाल का दिव्य श्रृंगार हुआ। श्रद्धालुओं ने जयकारों के बीच दर्शन किए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/baba-mahakaleshwar-adorned-with-ashes-sandalwood-and-silver-crown-was/article-53727"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/mahakal-bhasma-aarti-(3).jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"><strong>Mahakal Bhasma Aarti: </strong>विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में मंगलवार 19 मई की सुबह भस्म आरती के दौरान बाबा महाकाल का भव्य श्रृंगार किया गया। ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर सुबह करीब 4 बजे मंदिर के दरवाजे खोले गए</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">और उसके बाद श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगी। भस्म आरती में भाग लेने के लिए भक्त देर रात से ही लाइन में खड़े दिखे। मंदिर के गर्भगृह में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा की प्रक्रिया शुरू हुई</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जिससे पूरा माहौल शिवमय हो गया। खबर है कि इस दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से आए श्रद्धालुओं ने भी आरती में भाग लेकर बाबा महाकाल का आशीर्वाद लिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मंदिर के दरवाजे खुलते ही पुजारियों ने गर्भगृह में स्थापित देवी-देवताओं का पूजन किया। इसके बाद भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया। फिर पंचामृत से अभिषेक हुआ</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जिसमें दूध</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">दही</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">घी</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">शहद और फलों का रस शामिल था। इसके अलावा</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बाबा का विशेष श्रृंगार भांग</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">चंदन और सुगंधित द्रव्यों से किया गया। आरती से पहले पहले घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">और मंत्रोच्चार के बीच भगवान महाकाल का ध्यान किया गया। कपूर आरती के बाद ज्योतिर्लिंग को कपड़े से ढककर परंपरा के अनुसार भस्म अर्पित की गई। फिर शेषनाग का रजत मुकुट</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">रजत की मुण्डमाल</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">रुद्राक्ष की माला और फूलों की माला भगवान को अर्पित की गई। गर्भगृह का दृश्य उस समय बेहद भव्य नजर आ रहा था। कई श्रद्धालु मोबाइल में इस पल को कैद करने की कोशिश में थे</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">लेकिन सुरक्षा व्यवस्था के चलते गर्भगृह में खास नजर रखी गई।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">सुबह होते-होते मंदिर का परिसर पूरी तरह भक्तिमय माहौल में डूब गया। सैकड़ों श्रद्धालुओं ने नंदी हॉल और सभा मंडप से बाबा महाकाल के दर्शन किए। श्रद्धालु नंदी महाराज के कान में अपनी मनोकामनाएं बताते हुए नजर आए। मंदिर परिसर में लगातार </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">“</span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जय श्री महाकाल</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">” </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">के नारों की गूंज सुनाई देती रही। भस्म आरती के दौरान सुरक्षा और दर्शन व्यवस्था को लेकर खास इंतजाम किए गए थे ताकि श्रद्धालुओं को कोई परेशानी न हो। उज्जैन में इन दिनों श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है और सुबह की भस्म आरती में शामिल होने के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से बड़ी संख्या में बुकिंग हो रही है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 19 May 2026 09:30:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>14 मई महाकाल भस्म आरती में चंद्र तिलक और बेलपत्र से हुआ बाबा का श्रृंगार</title>
                                    <description><![CDATA[उज्जैन महाकाल मंदिर में 14 मई की भस्म आरती में बाबा महाकाल का चंदन, बेलपत्र और रजत आभूषणों से विशेष श्रृंगार किया गया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/baba-was-decorated-with-chandra-tilak-and-belpatra-in-mahakal/article-53303"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ---2026-05-14t103413.843.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में गुरुवार की सुबह ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि पर बाबा महाकाल की भस्म आरती बड़े श्रद्धा और वैदिक मंत्रों के बीच संपन्न हुई। सुबह करीब 4 बजे मंदिर के कपाट खोले गए और उसके बाद गर्भगृह में विशेष पूजन की प्रक्रिया शुरू हुई। सुबह से ही मंदिर के बाहर श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं और पूरा वातावरण </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">“<span lang="hi" xml:lang="hi">जय श्री महाकाल</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">के जयघोष से गूंजता रहा।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पुजारियों ने मंदिर के पट खुलने के बाद सबसे पहले गर्भगृह में विराजित देवी-देवताओं का पूजन किया। इसके बाद भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया। पंचामृत</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो दूध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शहद और फलों के रस से बना था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">से अभिषेक किया गया। बाबा का दिव्य श्रृंगार भांग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चंदन और सुगंधित द्रव्यों से किया गया। उनके मस्तक पर चंद्र तिलक सजाया गया और बेलपत्र अर्पित किए गए। पूजा के बाद पुजारी ने पहले घंटाल बजाकर हरिओम का जल अर्पित किया। मंत्रों के बीच भगवान का ध्यान करते हुए विशेष आरती की गई।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">भस्म अर्पण की प्रक्रिया में</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">कपूर आरती के बाद ज्योतिर्लिंग को कपड़े से ढंककर भस्म लगाई गई। फिर बाबा महाकाल को शेषनाग का रजत मुकुट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रजत की मुण्डमाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रुद्राक्ष की माला और विभिन्न पुष्प मालाएं अर्पित की गईं। चंदन और सुगंधित फूलों से किया गया अलंकरण श्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र बना रहा। सुबह की भस्म आरती में देशभर से आए सैकड़ों श्रद्धालुओं ने दर्शन कर पुण्य लाभ कमाया। कई श्रद्धालु नंदी महाराज के कान में अपनी मनोकामनाएं करते नजर आए। मंदिर परिसर में भक्ति का माहौल लंबे समय तक बना रहा और श्रद्धालु लगातार बाबा महाकाल के जयकारे लगाते रहे।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 May 2026 10:36:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कब है अपरा एकादशी? जानें व्रत का सही मुहूर्त और पारण समय</title>
                                    <description><![CDATA[अपरा एकादशी 2026 कब है? जानें 13 या 14 मई में सही तारीख, व्रत पारण समय, पूजा विधि और धार्मिक महत्व।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/when-is-apara-ekadashi-know-the-exact-muhurat-and-paran/article-53081"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ---2026-05-11t095315.653.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"><strong>Apara Ekadashi 2026:</strong> अपरा एकादशी धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्व रखती है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की पूजा के लिए खास माना जाता है। इस साल लोगों में तारीख को लेकर थोड़ी उलझन है। कई लोग जानना चाहते हैं कि अपरा एकादशी 13 मई को मनाई जाएगी या 14 मई को। पंचांग के हिसाब से</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपरा एकादशी का व्रत 13 मई 2026</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुधवार को होगा। ये एकादशी ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष में आती है और इसे जलक्रीड़ा एकादशी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अचला एकादशी और भद्रकाली एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पंचांग के अनुसार</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">एकादशी तिथि की शुरुआत 12 मई 2026 को दोपहर 2 बजकर 52 मिनट पर होगी और इसका समापन 13 मई को दोपहर 1 बजकर 29 मिनट पर होगा। उदया तिथि के आधार पर अपरा एकादशी का व्रत 13 मई को रखा जाएगा। वहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्रत का पारण 14 मई की सुबह किया जाएगा। पारण का शुभ समय सुबह 5 बजकर 31 मिनट से 8 बजकर 14 मिनट तक बताया गया है। द्वादशी तिथि 14 मई को सुबह 11 बजकर 20 मिनट तक रहेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए श्रद्धालुओं को इस समय के भीतर पारण कर लेना चाहिए।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">धार्मिक मान्यताओं के अनुसार</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपरा एकादशी का व्रत करने से पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस एकादशी को पुराणों में विशेष फलदायी बताया गया है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। कई लोग इसे आर्थिक संकट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मानसिक तनाव और ग्रह दोषों से राहत पाने के लिए भी करते हैं। ज्योतिष जानकारों के मुताबिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह व्रत मन की शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ाने में मददगार होता है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अपरा एकादशी के दिन लोग सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करते हैं और साफ वस्त्र पहनते हैं। इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा होती है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें पीले फूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तुलसी दल और फल अर्पित किए जाते हैं। श्रद्धालु दिनभर व्रत रखते हैं और शाम को तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक जलाते हैं। बहुत से लोग पूरी रात भजन-कीर्तन और विष्णु मंत्रों का जाप भी करते हैं। अगले दिन जरूरतमंदों को भोजन कराने और दान देने का भी विशेष महत्व है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">धार्मिक ग्रंथों के अनुसार</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपरा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है और पुराने पापों का नाश होता है। यही कारण है कि हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसे पूरी श्रद्धा और नियम के साथ करते हैं। इस बार भी मंदिरों और विष्णु धामों में विशेष पूजा-पाठ की तैयारियां चल रही हैं।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 May 2026 10:13:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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                <title>सूर्य को जल चढ़ाने का सही समय और तरीका क्या है? जानें मंत्र, नियम और लाभ</title>
                                    <description><![CDATA[सूर्य को जल चढ़ाने का सही समय, सही तरीका, मंत्र और लाभ जानें। ज्योतिष अनुसार सूर्य को अर्घ्य देने से यश, स्वास्थ्य और समृद्धि बढ़ती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/rules-for-offering-water-to-the-sun-what-is-the/article-52442"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/surya-ko-jal-chadhane-ka-sahi-samay.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;"><strong>Surya Ko Jal Arpit karne Ke Niyam:</strong> हिंदू धर्म में सूर्य को अर्घ्य देने का बड़ा महत्व बताया गया है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, सूर्य को यश, तेज, प्रसिद्धि, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास का प्रतीक माना जाता है। अब अगर आप नियमित रूप से सूर्य को जल चढ़ाते हैं तो जीवन में सूर्य की कृपा बनी रहती है। इससे जातक की समृद्धि और प्रसिद्धि में बढ़ौतरी होती है। हालांकि ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, सूर्य को अर्घ्य देते समय कुछ मंत्रो का ध्यान रखना जरूरी होता है। अगर आप गलत तरीके से जल चढ़ाते हैं तो पूजा का फल नहीं मिलता है। आइए आपको इस बारे पूरी जानकारी देते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सूर्य देवे को जल चढ़ाने का सही समय क्या है?</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">ज्योतिषचार्य के अनुसार, सूर्य को सही समय पर अर्घ्य देना जरूरी होता है। वरना इसका कम फल मिलता है। माना जाता है कि सूर्य देव को जल अर्पित करने का सबसे सही समय सुबह 5 से 8 बजे के बीच होता है। इस दौरान सूर्य पूर्व दिशा में होते हैं और 8 बजे के बाद दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर चले जाते हैं। ज्योतिषशास्त्र में कहा जाता है कि जब सूर्य खुद की दिशा में हो तभी सूर्य को अर्घ्य देने से ज्यादा महत्व मिलता है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">क्या है सूर्य देव को अर्घ्य देने का सही तरीका</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">मान्यता के अनुसार सबसे पहले सुबह सूरज उगने के पहले उठना अच्छा माना जाता है। इसलिए सुबह जल्दी उठकर नहाने के बाद साफ कपडे पहनने चहिए। इसके बड़ा एक तांबे के लोटे में जल लेकर दोनों से हाथों से पकड़कर अपने सर के ऊपर से नीचे जल डालें। सूर्य को जल अर्पित करते समय हाथ हमेशा सर के ऊपर होने चाहिए। इस तरीके से सूर्य को जल अर्पित करना सही और शुभ माना जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सूर्य को जल अर्पित करते समय किन बातों का ध्यान रखें</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सूर्य को जल करते समय कुछ बातों का खास ध्यान रखना होता है। जैसे कि जब जल की धारा नीचे गिरे तो एक धार में गिरनी चाहिए। यानी जल की धारा कभी भी बीच से नहीं टूटनी चाहिए। मान्यता है कि जल की एक धारा गिरने से उसकी ऊर्जा इंसान के अंदर समाहित होती है। इसके साथ हमेशा साफ स्थान पर ही सूर्य देव को जल अर्पित करना चाहिए। जल को किसी गंदे नाले या किसी गंदे स्थान पर नहीं देना चाहिए। जल को किसी पौधे, नदी या किसी ऐसे स्थान पर देना चाहिए, जहां पर पानी को धरती सोख लें।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सूर्य को जल अर्पित करते समयँम इन मंत्रों का जाप करें</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, सूर्य देव को जल अर्पित करते समय कुछ जाप करने से बहुत शुभ माना जाता है। जा सूर्य को जल अर्पित करें तो उसी स्थान पर खड़े रहकर 'ओम घृणि सूर्याय नमः' मंत्र का जाप कर सकते हैं। इसके आलावा आदित्य हृदय स्तोत्र और गायत्री मंत्र का जाप करना भी काफी शुभ माना जाता है। सूर्य को जल अर्पति करते समय इन मंत्रों का जाप करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">सूर्य देव को जल अर्पित करने से लाभ</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:107%;font-family:'Nirmala UI', sans-serif;">ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, सूर्य देव को विधि-विधान से जल देने से काफी शुभ फल की प्राप्ति होती है। इससे सेहत अच्छी रहती है। सूर्य को प्रसिद्धि को प्रतीक माना जाता है, इसलिए जातक की प्रसिद्धि और समृद्धि बढ़ती है। सूर्य को नियम से जल अर्पित करने से कई तरह की बिमारियों का नाश होता है। इसका वैज्ञानिक कारण भी माना गया है। वैज्ञानिक कारणों के अनुसार, सुबह 5 से 8 क बीच सूर्य से निकलने वाली किरणों और ऊर्जा को काफी अच्छा माना जाता है। सूर्य की किरणों से विटामिन डी की भी कमी पूरी होती है। इसके साथ ही कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं भी खत्म होती हैं।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 May 2026 11:50:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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