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                <title>Government Hospital - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Government Hospital RSS Feed</description>
                
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                <title>रायपुर ने रचा नया रिकॉर्ड, 99 सरकारी स्वास्थ्य संस्थाओं को मिला NQAS प्रमाणन</title>
                                    <description><![CDATA[इलाज, जांच, स्वच्छता और मरीजों की सुरक्षा के मानकों पर खरे उतरे अस्पताल; छत्तीसगढ़ का पहला जिला बना रायपुर।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/raipur/6a4f3c907401d/article-58260"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/raipur-health.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">रायपुर जिले ने स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। जिले की 99 सरकारी स्वास्थ्य संस्थाओं को राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक (एनक्यूएएस) यानी नेशनल क्वालिटी एश्योरेंस स्टैंडर्ड (NQAS) का प्रमाणन प्राप्त हुआ है। इस उपलब्धि के साथ रायपुर छत्तीसगढ़ का पहला जिला बन गया है, जहां सबसे अधिक सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों को यह राष्ट्रीय स्तर का गुणवत्ता प्रमाणपत्र मिला है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह उपलब्धि लगातार मॉनिटरिंग, बेहतर प्रबंधन और स्वास्थ्य कर्मियों की टीमवर्क का परिणाम है। अभी जिले की दो स्वास्थ्य संस्थाओं के मूल्यांकन का परिणाम भारत सरकार से आना बाकी है, जबकि तीन अन्य संस्थानों का राष्ट्रीय स्तर पर मूल्यांकन होना शेष है। राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक (NQAS) केंद्र सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा संचालित एक महत्वपूर्ण गुणवत्ता मूल्यांकन कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों को बेहतर, सुरक्षित और मानक आधारित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है। प्रमाणन प्रक्रिया के दौरान अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थाओं का कई स्तरों पर विस्तृत मूल्यांकन किया जाता है। इनमें मरीजों की सुरक्षा, संक्रमण नियंत्रण, इलाज और जांच की गुणवत्ता, दवाओं की उपलब्धता, अस्पताल की स्वच्छता, रिकॉर्ड प्रबंधन, जैव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन, मरीजों की सुविधा और प्रशासनिक व्यवस्था जैसे अनेक मानकों को परखा जाता है। निर्धारित मानकों पर सफल होने के बाद ही किसी स्वास्थ्य संस्था को NQAS प्रमाणपत्र दिया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वास्थ्य विभाग के अनुसार रायपुर जिले में पिछले कुछ वर्षों से सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे थे। अस्पतालों में आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने, चिकित्सकीय सेवाओं में सुधार, नियमित निरीक्षण और कर्मचारियों के प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया। इसी का परिणाम है कि बड़ी संख्या में स्वास्थ्य संस्थाएं राष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों पर खरी उतर सकीं। अधिकारियों का कहना है कि यह प्रमाणन केवल एक उपलब्धि नहीं बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं में लगातार सुधार की जिम्मेदारी भी है। रायपुर कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह ने इस उपलब्धि पर स्वास्थ्य विभाग की पूरी टीम को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि जिले के प्रत्येक नागरिक को सुरक्षित, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। उनके अनुसार स्वास्थ्य संस्थाओं में नियमित मॉनिटरिंग, समय-समय पर समीक्षा बैठकें और टीमवर्क के कारण यह सफलता हासिल हुई है। उन्होंने कहा कि भविष्य में भी गुणवत्ता के इन मानकों को बनाए रखने और स्वास्थ्य सेवाओं को और बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास जारी रहेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मिथिलेश चौधरी ने कहा कि NQAS प्रमाणन किसी भी स्वास्थ्य संस्था के लिए गुणवत्ता और विश्वसनीयता का महत्वपूर्ण प्रमाण होता है। उन्होंने बताया कि मरीजों की सुरक्षा, संक्रमण नियंत्रण, अस्पतालों की स्वच्छता और सेवा व्यवस्था की लगातार निगरानी की जा रही है। यही कारण है कि रायपुर जिले ने प्रदेश में सबसे अधिक NQAS प्रमाणित स्वास्थ्य संस्थाओं वाला पहला जिला बनने का गौरव हासिल किया है। उन्होंने यह भी बताया कि जिन संस्थानों का मूल्यांकन अभी बाकी है, उन्हें भी आवश्यक तैयारियां पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">NQAS प्रमाणन का सबसे बड़ा लाभ आम मरीजों को मिलता है। इससे अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता बेहतर होती है, मरीजों को सुरक्षित वातावरण मिलता है और स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता बढ़ती है। अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण की प्रभावी व्यवस्था होने से मरीजों और स्वास्थ्य कर्मियों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। साथ ही रिकॉर्ड प्रबंधन और दवा वितरण प्रणाली में सुधार आने से सेवाएं अधिक व्यवस्थित और भरोसेमंद बनती हैं। सरकारी स्वास्थ्य संस्थाओं में गुणवत्ता सुधार का सीधा असर मरीजों के भरोसे पर भी पड़ता है। जब अस्पताल राष्ट्रीय स्तर के गुणवत्ता मानकों को पूरा करते हैं, तो लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक विश्वास जताते हैं। इससे निजी अस्पतालों पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिलती है। रायपुर जिले में बड़ी संख्या में स्वास्थ्य संस्थाओं को NQAS प्रमाणन मिलने के बाद यह उम्मीद की जा रही है कि प्रदेश के अन्य जिले भी इसी दिशा में तेजी से काम करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक के तहत प्रमाणित संस्थाओं का समय-समय पर दोबारा मूल्यांकन भी किया जाता है। इसलिए प्रमाणपत्र मिलने के बाद भी अस्पतालों को लगातार गुणवत्ता बनाए रखनी होती है। यदि किसी संस्था में निर्धारित मानकों का पालन नहीं होता है तो उसका प्रमाणन प्रभावित हो सकता है। इसी कारण स्वास्थ्य विभाग लगातार निगरानी और सुधार की प्रक्रिया को जारी रखता है। रायपुर की इस उपलब्धि को प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि इससे जिले की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत होगी। साथ ही यह उपलब्धि अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणा का काम करेगी। विभाग का लक्ष्य है कि आने वाले समय में शेष स्वास्थ्य संस्थाओं को भी NQAS प्रमाणन दिलाया जाए और पूरे प्रदेश में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किया जाए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>रायपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 13:13:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>रायपुर में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग शुरू नहीं, डायबिटीज मरीजों को विशेषज्ञ इलाज का इंतजार</title>
                                    <description><![CDATA[डीकेएस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में शासन की मंजूरी के बावजूद एंडोक्राइनोलॉजी विभाग अब तक शुरू नहीं हो सका। आंबेडकर अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद होने के बावजूद डायबिटीज और हार्मोनल बीमारियों के मरीजों को अलग विशेषज्ञ सेवाएं नहीं मिल रही हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/raipur/endocrinology-department-not-started-in-raipur-diabetes-patients-wait-for/article-57779"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/dks-hospital.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राजधानी रायपुर के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थानों में शामिल डॉ. भीमराव आंबेडकर स्मृति चिकित्सालय और डीकेएस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में डायबिटीज और हार्मोन से जुड़ी बीमारियों के मरीजों को अब तक विशेषज्ञ उपचार की सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाई है। राज्य सरकार की मंजूरी मिलने के बाद भी डीकेएस अस्पताल में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग शुरू नहीं हो सका है, जबकि आंबेडकर अस्पताल में सुपर स्पेशलिटी डिग्रीधारी डॉक्टर होने के बावजूद मरीजों को इस विशेषज्ञता का लाभ नहीं मिल रहा। इससे प्रतिदिन सैकड़ों मरीज सामान्य विभागों में इलाज कराने को मजबूर हैं। मधुमेह और हार्मोनल रोगों की बढ़ती संख्या को देखते हुए एंडोक्राइनोलॉजी विभाग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। इसके बावजूद राजधानी के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा शुरू नहीं होना मरीजों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आंबेडकर अस्पताल की ओपीडी में प्रतिदिन लगभग 2,500 से अधिक मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं। इनमें करीब 20 प्रतिशत यानी 500 से अधिक मरीज डायबिटीज, थायरॉयड, हार्मोन असंतुलन, पिट्यूटरी और अन्य अंतःस्रावी (एंडोक्राइन) रोगों से पीड़ित होते हैं। विशेषज्ञ विभाग नहीं होने के कारण इन मरीजों का इलाज फिलहाल मेडिसिन, जिरियाट्रिक और पीडियाट्रिक विभागों के चिकित्सकों द्वारा किया जा रहा है। हालांकि जटिल मामलों में एंडोक्राइनोलॉजिस्ट की विशेषज्ञ सलाह की जरूरत महसूस की जाती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राज्य शासन ने डीकेएस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग स्थापित करने की मंजूरी पहले ही दे दी थी। इसके लिए आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी पूरी की जा चुकी हैं, लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति नहीं होने के कारण विभाग आज तक शुरू नहीं हो पाया। अस्पताल प्रबंधन नियमित रूप से विशेषज्ञ डॉक्टरों की भर्ती के लिए वॉक-इन इंटरव्यू आयोजित कर रहा है, लेकिन अब तक कोई योग्य चिकित्सक स्थायी रूप से नियुक्त नहीं हुआ है। इसका सीधा असर मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। आंबेडकर अस्पताल में डीएम एंडोक्राइनोलॉजी की डिग्री प्राप्त एक विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद हैं। इसके बावजूद वे एंडोक्राइनोलॉजी विभाग में सेवाएं नहीं दे रहे हैं। बताया जाता है कि उनकी वर्तमान पदस्थापना पीडियाट्रिक विभाग में है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">डॉक्टर का तर्क है कि उन्हें उनकी सुपर स्पेशलिटी योग्यता के अनुरूप पद और वेतनमान नहीं मिला है। इसी कारण वे अपनी विशेषज्ञता के अनुरूप सेवाएं नहीं दे रहे हैं। हालांकि प्रशासनिक जानकारी के अनुसार उन्हें डीएम डिग्री के आधार पर तीन अतिरिक्त वेतन वृद्धि (इंक्रीमेंट) का लाभ दिया जा चुका है। सरकारी प्रायोजन (स्पॉन्सरशिप) के तहत सुपर स्पेशलिटी की पढ़ाई करने वाले डॉक्टरों को निर्धारित अवधि तक उसी विषय में सरकारी सेवा देना अनिवार्य होता है। इसके लिए बांड भी भरवाया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ऐसे में स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकार सवाल उठा रहे हैं कि यदि किसी डॉक्टर ने सरकारी खर्च पर एंडोक्राइनोलॉजी की पढ़ाई की है तो उनकी विशेषज्ञता का उपयोग उसी विभाग में क्यों नहीं हो रहा। उनका मानना है कि इससे सरकारी संसाधनों का पूरा लाभ मरीजों तक नहीं पहुंच पा रहा है। डायबिटीज केवल रक्त में शुगर बढ़ने की बीमारी नहीं है। यदि समय पर उचित इलाज और निगरानी न मिले तो यह हृदय, किडनी, आंखों, नसों और मस्तिष्क पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसी वजह से कार्डियोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, न्यूरोलॉजी और न्यूरोसर्जरी विभागों में भी बड़ी संख्या में ऐसे मरीज पहुंचते हैं, जिनकी मूल समस्या डायबिटीज से जुड़ी होती है। एंडोक्राइनोलॉजी विशेषज्ञ इन जटिलताओं को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। डायबिटीज के अलावा थायरॉयड विकार, मोटापा, हार्मोन असंतुलन, बच्चों में ग्रोथ संबंधी समस्याएं, महिलाओं में हार्मोनल विकार और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारियों के मामलों में भी लगातार वृद्धि हो रही है। इन सभी बीमारियों के लिए एंडोक्राइनोलॉजी विशेषज्ञ की आवश्यकता होती है। लेकिन विशेषज्ञ विभाग उपलब्ध नहीं होने से मरीजों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जहां इलाज का खर्च काफी अधिक होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">डीकेएस अस्पताल प्रशासन का कहना है कि विभाग शुरू करने की पूरी तैयारी है। अस्पताल के उप अधीक्षक डॉ. हेमंत शर्मा के अनुसार हर महीने एंडोक्राइनोलॉजी विशेषज्ञों की भर्ती के लिए वॉक-इन इंटरव्यू आयोजित किए जा रहे हैं। जैसे ही योग्य डॉक्टर उपलब्ध होंगे, विभाग की शुरुआत कर दी जाएगी। प्रशासन का कहना है कि राज्य सरकार भी इस दिशा में लगातार प्रयास कर रही है ताकि मरीजों को जल्द से जल्द विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें।रायपुर जैसे बड़े चिकित्सा केंद्र में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग का संचालन समय की आवश्यकता है। इससे न केवल राजधानी बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के मरीजों को बेहतर इलाज मिल सकेगा। वर्तमान में कई मरीजों को रायपुर से बाहर अन्य राज्यों के बड़े अस्पतालों में जाना पड़ता है, जिससे समय और धन दोनों की अतिरिक्त लागत आती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>रायपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 18:25:27 +0530</pubDate>
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                <title>मऊगंज सिविल अस्पताल की बदहाल व्यवस्था उजागर, डॉक्टर गायब, कर्मचारी करते मिले इलाज</title>
                                    <description><![CDATA[वायरल वीडियो के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप, आउटसोर्स कर्मचारियों और निजी सहायकों द्वारा मरीजों को इंजेक्शन लगाने व दवाइयां देने के आरोप, अस्पताल की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/poor-arrangement-of-mauganj-civil-hospital-exposed-doctors-missing-staff/article-55718"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mauganj-civil-hospital.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले के सिविल अस्पताल से सामने आई तस्वीरों ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें डॉक्टरों की अनुपस्थिति के बीच आउटसोर्स कर्मचारियों और निजी सहायकों द्वारा मरीजों का इलाज किए जाने के आरोप सामने आए हैं। वीडियो सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है और पूरे मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि अस्पताल में इन दिनों मरीजों की संख्या लगातार बढ़ी हुई है। सुबह से लेकर दोपहर तक ओपीडी और वार्डों में मरीजों की लंबी कतारें लगी रहती हैं। लेकिन इसी बीच कई डॉक्टरों के ड्यूटी पर मौजूद नहीं रहने की शिकायतें भी सामने आई हैं। मरीजों और उनके परिजनों का आरोप है कि इलाज के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है, जबकि कई बार डॉक्टर अस्पताल में उपलब्ध ही नहीं होते। ऐसे हालात में अस्पताल की व्यवस्था अन्य कर्मचारियों के भरोसे चलती दिखाई देती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वायरल वीडियो में कुछ ऐसे दृश्य दिखाई दे रहे हैं, जिन्होंने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। वीडियो में कथित तौर पर डॉक्टर के निजी सहायक मरीजों को देखते हुए नजर आ रहे हैं। वहीं मल्टी स्किल्ड ग्रुप-डी के आउटसोर्स कर्मचारी मरीजों को दवाइयां देते और इंजेक्शन लगाते दिखाई दे रहे हैं। यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि चिकित्सा से जुड़े ऐसे कार्य केवल प्रशिक्षित और अधिकृत स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा किए जाने चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अस्पताल की स्थिति को लेकर एक और चिंताजनक पहलू सामने आया है। वार्डों में मरीजों की संख्या क्षमता से अधिक होने के कारण कई बेड पर दो-दो मरीजों को भर्ती किए जाने की बात कही जा रही है। भीषण गर्मी के बीच मरीजों को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पाने की शिकायत भी सामने आई है। कुछ परिजनों का कहना है कि स्ट्रेचर और अन्य बुनियादी संसाधनों की कमी के कारण उन्हें मरीजों को खुद उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना पड़ता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वीडियो में एक बुजुर्ग मरीज को कुर्सी पर बैठाकर इंजेक्शन लगाया जाता दिखाई देता है। आरोप है कि इंजेक्शन लगाने वाला व्यक्ति प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ का सदस्य नहीं था। वीडियो में कई बार सुई लगाने की कोशिश होती दिखती है, जिससे मरीज को असुविधा होती नजर आती है। इस दृश्य ने सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं और तेज कर दी हैं। कई लोगों ने इसे मरीजों की सुरक्षा के साथ गंभीर लापरवाही बताया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मरीजों के परिजनों का कहना है कि अस्पताल में पहले भी डॉक्टरों और स्टाफ की कमी की शिकायतें सामने आती रही हैं। उनका आरोप है कि समय पर विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं होने से मरीजों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई लोगों का कहना है कि यदि प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह निभा रहा होता, तो गैर-चिकित्सकीय कर्मचारियों को इस तरह की भूमिका निभाने की जरूरत नहीं पड़ती। मरीजों को दवा देना, इंजेक्शन लगाना और उपचार से जुड़े अन्य कार्य अत्यंत संवेदनशील होते हैं। इन कार्यों के लिए उचित प्रशिक्षण और चिकित्सकीय योग्यता आवश्यक होती है। यदि इन प्रक्रियाओं में किसी प्रकार की चूक होती है तो मरीज के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि अस्पतालों में जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण किया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वीडियो वायरल होने के बाद स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने भी मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही अस्पताल में डॉक्टरों की नियमित उपस्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम ने सरकारी अस्पतालों में संसाधनों, मानवबल और जवाबदेही की स्थिति पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए सरकारी अस्पताल ही इलाज का प्रमुख माध्यम होते हैं। ऐसे में यदि वहां भी आवश्यक चिकित्सा सेवाएं समय पर उपलब्ध नहीं हों तो मरीजों की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। वायरल वीडियो की जांच और तथ्यों की पुष्टि का इंतजार किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से मामले की समीक्षा किए जाने की बात कही जा रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 14:00:31 +0530</pubDate>
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                <title>अलवर के सरकारी अस्पताल में स्वास्थ्य व्यवस्था बेहाल, स्टाफ की हुई भारी कमी</title>
                                    <description><![CDATA[अलवर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में 146 में से 97 पैरामेडिकल पद खाली हैं। स्वास्थ्य सेवाएं 650 से ज्यादा ठेका कर्मचारियों के भरोसे चल रही हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/health-system-in-alwar-government-hospital-is-in-disarray-and/article-52768"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ-(62).jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अलवर जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाएं इस वक्त गंभीर स्टाफ संकट के बीच चल रही हैं। हालत यह है कि अस्पताल की रोजमर्रा की व्यवस्था से लेकर कई तकनीकी सेवाएं तक ठेका कर्मचारियों के भरोसे चल रही हैं। अलवर सरकारी अस्पताल में स्टाफ संकट का असर अब साफ तौर पर मरीजों की सुविधाओं पर भी दिखने लगा है। रिकॉर्ड के मुताबिक अस्पताल में पैरामेडिकल स्टाफ के 146 पद स्वीकृत हैं</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इनमें से 97 पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। सबसे ज्यादा कमी वार्ड ब्वॉय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफाईकर्मी और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की है। वार्ड ब्वॉय के 83 स्वीकृत पदों में 60 खाली हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि स्वीपर के 37 पदों में से 28 पर नियुक्ति नहीं है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के 10 पदों में 6 खाली पड़े हैं। ऐसे में अस्पताल का बड़ा हिस्सा अस्थायी कर्मचारियों के सहारे चल रहा है और स्थायी स्टाफ की कमी लगातार दबाव बढ़ा रही है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अस्पताल में सिर्फ सामान्य कामकाज ही नहीं</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">कई तकनीकी जिम्मेदारियां भी अब ठेका व्यवस्था पर टिकी हुई हैं। डेंटल टेक्नीशियन के दो पद स्वीकृत हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन एक पद खाली है। सीनियर डेंटल टेक्नीशियन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑप्टोमेट्रिस्ट और ऑप्टोमेट्रिस्ट ग्रेड-1 के एक-एक पद भी लंबे समय से रिक्त बताए जा रहे हैं। ऑप्टोमेट्रिस्ट असिस्टेंट के दोनों स्वीकृत पद खाली हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे आंखों से जुड़ी जांच और सेवाओं पर असर पड़ रहा है। फिजियोथेरेपिस्ट का केवल एक पद स्वीकृत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अस्पताल में दो फिजियोथेरेपिस्ट काम कर रहे हैं। यह स्थिति भी व्यवस्था की असंतुलित तस्वीर दिखाती है। बताया जा रहा है कि जिन सेवाओं के लिए नियमित और प्रशिक्षित स्थायी स्टाफ होना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां भी अब ठेका कर्मचारियों से काम लिया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार स्वीकृत पदों के मुकाबले नई भर्तियां नहीं होने से यह संकट लगातार गहराता गया है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अस्पताल की व्यवस्था फिलहाल चार ठेका कंपनियों के जरिए चल रही है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनके माध्यम से 650 से ज्यादा कर्मचारी विभिन्न सेवाओं में लगे हुए हैं। इनमें लैब टेक्नीशियन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नर्सिंगकर्मी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफाईकर्मी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा गार्ड और तकनीकी स्टाफ तक शामिल हैं। दंत रोग विभाग में दो डेंटल टेक्नीशियन कार्यरत हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि 15 लैब टेक्नीशियन और एक लैब असिस्टेंट सेवाएं दे रहे हैं। ब्लड बैंक में एक काउंसलर तैनात है। इसके अलावा 6 इलेक्ट्रिशियन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">6 प्लंबर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक गार्डनर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक टेलर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">12 ड्राइवर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">6 एलडीसी और 42 गार्ड भी ठेका प्रणाली के तहत काम कर रहे हैं। अस्पताल में 3-3 लिफ्ट ऑपरेटर और ट्रॉलीमैन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">20 फार्मासिस्ट और 8 ऑक्सीजन ऑपरेटर भी इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं। नर्सिंग सेवाओं की बात करें तो 100 से अधिक नर्सिंगकर्मी काम कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि स्वीकृत पद 87 ही हैं। यानी कुछ विभागों में जरूरत से ज्यादा ठेका स्टाफ है और कई अहम स्थायी पद खाली पड़े हैं।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 May 2026 15:55:09 +0530</pubDate>
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