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                <title>Political Crisis - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Political Crisis RSS Feed</description>
                
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                <title>कीर स्टारमर के इस्तीफे की खबर: ब्रिटेन में राजनीतिक संकट गहराया</title>
                                    <description><![CDATA[लेबर पार्टी में अंदरूनी असंतोष और घटती लोकप्रियता के बीच सामने आया बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम, नए प्रधानमंत्री की तलाश शुरू]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/6a391b034d3e3/article-56668"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/keir-starmer.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">लंदन से सामने आ रही खबरों के अनुसार ब्रिटेन की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी है। यह घोषणा 10 डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर उनके संबोधन के दौरान सामने आई, जहां उन्होंने कहा कि वह सत्ता का शांतिपूर्ण और व्यवस्थित हस्तांतरण सुनिश्चित करेंगे। हालांकि आधिकारिक तौर पर सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी होने तक वह प्रधानमंत्री पद पर बने रहेंगे। यह फैसला अचानक नहीं आया है। पिछले कई महीनों से लेबर पार्टी के भीतर असंतोष लगातार बढ़ रहा था। पार्टी के सांसदों और वरिष्ठ नेताओं में यह भावना बन रही थी कि सरकार की लोकप्रियता में गिरावट आई है और नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगे हैं। खासकर जुलाई 2024 में भारी बहुमत से सत्ता में आने के बाद अपेक्षित प्रदर्शन न कर पाने के कारण आलोचना और तेज हो गई थी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">लेबर पार्टी को न केवल विपक्षी दलों से चुनौती मिल रही थी, बल्कि आंतरिक स्तर पर भी मतभेद गहराते जा रहे थे। कई सांसदों का मानना था कि आर्थिक सुधार, महंगाई नियंत्रण और जीवन यापन की लागत जैसे मुद्दों पर सरकार अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाई। इसी वजह से पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की मांग तेज होती गई। इस राजनीतिक संकट के बीच एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया, जो सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला साबित हुआ। हाल के महीनों में कुछ नियुक्तियों और राजनीतिक फैसलों को लेकर विवाद खड़ा हुआ। इन घटनाओं ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका दिया और लेबर पार्टी की साख पर असर पड़ा। राजनीतिक गलियारों में इसे स्टारमर सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने अपने संबोधन में कहा कि वह सत्ता छोड़ने की प्रक्रिया को जिम्मेदारी के साथ पूरा करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि देश में किसी तरह की प्रशासनिक अस्थिरता न हो। उन्होंने यह भी कहा कि नए नेतृत्व के चयन तक वह कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में अपनी भूमिका निभाते रहेंगे। ब्रिटेन की राजनीति में यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले एक दशक में यह छठा मौका है जब किसी प्रधानमंत्री का कार्यकाल समय से पहले समाप्त हुआ है। इससे पहले भी ब्रिटेन ने राजनीतिक अस्थिरता का दौर देखा है, जिसमें कई प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल अपेक्षाकृत छोटा रहा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;"> इस बार लेबर पार्टी को न केवल नेतृत्व चुनने की चुनौती है, बल्कि जनता का भरोसा फिर से जीतने की भी आवश्यकता है। आर्थिक स्थिति, आव्रजन नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंध जैसे मुद्दों पर पार्टी को स्पष्ट रणनीति पेश करनी होगी। इस बीच पार्टी के भीतर नए नेतृत्व के लिए नामों पर चर्चा शुरू हो गई है। कुछ रिपोर्ट्स में मैनचेस्टर के मेयर एंडी बर्नहम को संभावित उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा है। वे लंबे समय से पार्टी के भीतर सक्रिय हैं और संगठनात्मक अनुभव रखते हैं। हालांकि उनके नाम पर अभी अंतिम सहमति नहीं बनी है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसके अलावा पूर्व स्वास्थ्य मंत्री वेस स्ट्रिटिंग का नाम भी संभावित दावेदारों में शामिल बताया जा रहा है। पार्टी के अंदर कई गुट अपने-अपने उम्मीदवारों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे आने वाले दिनों में नेतृत्व को लेकर मुकाबला और तेज हो सकता है। यह इस्तीफा केवल एक व्यक्ति के पद छोड़ने का मामला नहीं है, बल्कि यह ब्रिटेन की राजनीतिक स्थिरता पर भी सवाल खड़े करता है। लगातार बदलते नेतृत्व ने देश की नीतियों और प्रशासनिक निरंतरता पर असर डाला है।हालांकि कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यह बदलाव लेबर पार्टी के लिए एक नई शुरुआत का अवसर हो सकता है, बशर्ते पार्टी सही नेतृत्व का चयन करे और जनता के भरोसे को फिर से मजबूत करने में सफल हो।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:17:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>TMC में बड़ी टूट के बीच ममता ने कल्याण बनर्जी को बनाया चीफ व्हिप</title>
                                    <description><![CDATA[20 बागी सांसदों के NDA समर्थन के दावे के बाद ममता बनर्जी का बड़ा कदम, लोकसभा स्पीकर को भेजा पत्र]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/mamata-made-kalyan-banerjee-the-chief-whip-amid-major-rift/article-55444"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/tmc-crisis-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रहे सियासी घटनाक्रम के बीच तृणमूल कांग्रेस को एक और बड़ा झटका लगा है। पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी और सांसदों की बगावत के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लोकसभा सांसद कल्याण बनर्जी को पार्टी का नया चीफ व्हिप नियुक्त कर दिया है। मंगलवार को इस संबंध में लोकसभा स्पीकर को पत्र भेजा गया और अनुरोध किया गया कि इस नियुक्ति को तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आ चुका है और कई सांसद नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">तृणमूल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता लोकसभा में उसके सांसदों की एकजुटता को लेकर है। पार्टी के कुल 28 सांसदों में से 20 सांसदों के अलग रुख अपनाने का दावा किया गया है। बागी सांसदों का कहना है कि उन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA को समर्थन देने का फैसला किया है। इस दावे के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से स्थिति को संभालने की कोशिशें लगातार जारी हैं। इसी रणनीति के तहत कल्याण बनर्जी को नई जिम्मेदारी सौंपे जाने को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">एक दिन पहले बागी सांसदों ने काकोली घोष दस्तीदार को अपना चीफ व्हिप चुने जाने का दावा किया था। इसके बाद उन्होंने लोकसभा स्पीकर को एक पत्र भी भेजा था। बताया गया कि इस पत्र में बागी सांसदों के हस्ताक्षर मौजूद थे और उन्होंने अलग संसदीय ब्लॉक के रूप में बैठने की अनुमति मांगी थी। यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि संसदीय राजनीति में चीफ व्हिप की भूमिका काफी अहम होती है। पार्टी लाइन को लागू करवाना, सांसदों के बीच समन्वय बनाए रखना और महत्वपूर्ण मुद्दों पर एकजुटता सुनिश्चित करना इसी पद की जिम्मेदारी होती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">काकोली घोष पहले ही पार्टी छोड़ चुकी हैं, लेकिन उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा नहीं दिया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह अब भी खुद को लोकसभा में मुख्य सचेतक मानती हैं। उनके बयान ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दी। उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक सफर का जिक्र करते हुए कहा कि वह दशकों से पार्टी के साथ जुड़ी रही हैं और संघर्ष के रास्ते से आगे बढ़ी हैं। उनके इस बयान को पार्टी नेतृत्व के प्रति नाराजगी के रूप में भी देखा गया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उधर, तृणमूल कांग्रेस के अन्य नेताओं ने बागी सांसदों पर तीखे हमले किए हैं। राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने बिना नाम लिए कहा कि कुछ लोगों की वफादारी केवल सत्ता तक सीमित रहती है और राजनीतिक दबाव के सामने उनके सिद्धांत कमजोर पड़ जाते हैं। वहीं कल्याण बनर्जी ने भी अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राजनीतिक ताकतों के सामने उनकी सबसे बड़ी ताकत जनता और पार्टी कार्यकर्ता हैं। उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी अभी भी बंगाल में मजबूत स्थिति में है और कार्यकर्ताओं का समर्थन नेतृत्व के साथ बना हुआ है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राजनीतिक संकट केवल सांसदों तक सीमित नहीं है। इससे पहले राज्य की राजनीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला था, जब बड़ी संख्या में विधायकों के अलग गुट बनाने की खबर सामने आई। पार्टी के भीतर लगातार बढ़ते असंतोष ने नेतृत्व के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकसभा और विधानसभा दोनों स्तरों पर इस तरह की घटनाएं पार्टी की संगठनात्मक स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दिल्ली में भी इस पूरे घटनाक्रम को लेकर गतिविधियां तेज रहीं। बागी सांसदों की कई बैठकें हुईं।  कुछ बैठकें गोपनीय स्थानों पर आयोजित की गईं, जहां आगे की रणनीति पर चर्चा हुई। इसी दौरान कुछ सांसदों की वरिष्ठ भाजपा नेताओं से मुलाकात की खबरें भी सामने आईं। इन मुलाकातों ने राजनीतिक अटकलों को और मजबूत किया। हालांकि आधिकारिक तौर पर इन बैठकों को लेकर ज्यादा जानकारी साझा नहीं की गई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी भी इसी बीच दिल्ली पहुंचे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनका दौरा केवल विपक्षी गठबंधन की बैठकों तक सीमित नहीं था, बल्कि पार्टी के भीतर उभर रहे संकट का आकलन करना भी इसका हिस्सा था। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी नेतृत्व बागी सांसदों को मनाने में कितना सफल होता है या फिर यह असंतोष और बड़ा रूप लेता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 17:41:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>TMC में बड़ी बगावत: 58 विधायकों ने बनाया अलग गुट, ऋतब्रत बनर्जी बने विधायक दल के नेता</title>
                                    <description><![CDATA[पश्चिम बंगाल की राजनीति में भूचाल, ममता बनर्जी की पार्टी में सबसे बड़ा आंतरिक संकट]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/big-rebellion-in-tmc-58-mlas-formed-a-separate-group/article-54881"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/tmc-split.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) में अभूतपूर्व बगावत देखने को मिली है। पार्टी से हाल ही में निष्कासित किए गए विधायक ऋतब्रत बनर्जी को 58 बागी विधायकों ने अपना नेता चुन लिया है। इस कदम ने न केवल TMC के भीतर गहरे मतभेदों को उजागर किया है, बल्कि राज्य की राजनीति में नए समीकरणों की संभावना भी पैदा कर दी है। बुधवार को बागी विधायकों के समूह ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस से मुलाकात कर समर्थन पत्र सौंपा। इस पत्र में ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता घोषित किया गया है। इसके अलावा जावेद खान, संदीपन साहा और सिउली साहा को उपनेता तथा अखरुज्जमान को चीफ व्हिप नियुक्त किया गया है। हालांकि बागी गुट ने अभी भी ममता बनर्जी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष माना है, लेकिन उन्होंने पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व और उनके फैसलों को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया है। यही मुद्दा इस पूरे राजनीतिक संकट का मुख्य कारण माना जा रहा है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>फर्जी हस्ताक्षर विवाद से शुरू हुआ संकट</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">इस राजनीतिक बगावत की शुरुआत उस समय हुई जब विधायक संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी ने विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष शिकायत दर्ज कराई कि नेता प्रतिपक्ष के चयन संबंधी प्रस्ताव में उनके हस्ताक्षर फर्जी तरीके से लगाए गए हैं।अभिषेक बनर्जी के लेटरहेड पर विधानसभा अध्यक्ष को भेजे गए एक प्रस्ताव में शोभनदेव को नेता विपक्ष बनाने की सिफारिश की गई थी। दोनों विधायकों का आरोप था कि इस प्रस्ताव में उनकी सहमति के बिना उनके हस्ताक्षरों का इस्तेमाल किया गया। शिकायत के बाद पार्टी नेतृत्व ने दोनों विधायकों को अनुशासनहीनता का आरोप लगाते हुए TMC से निष्कासित कर दिया। इसके बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा और धीरे-धीरे कई विधायक उनके समर्थन में आ गए।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>58 विधायकों का समर्थन, बढ़ी TMC की मुश्किलें</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">58 विधायकों का एक साथ अलग गुट बनाना TMC के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह केवल कुछ नेताओं की नाराजगी नहीं, बल्कि पार्टी के अंदर लंबे समय से चल रहे असंतोष का परिणाम है। बागी विधायकों का दावा है कि पार्टी में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अनदेखी की जा रही है और महत्वपूर्ण निर्णय कुछ चुनिंदा नेताओं तक सीमित हो गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विधायकों की राय को महत्व नहीं दिया जा रहा और संगठनात्मक ढांचे में पारदर्शिता की कमी है। यही वजह है कि उन्होंने विधायक दल के भीतर अलग पहचान बनाने का निर्णय लिया है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>ममता बनर्जी ने सभी कमेटियां भंग कीं</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">बढ़ते राजनीतिक संकट के बीच मुख्यमंत्री और TMC प्रमुख ममता बनर्जी ने बड़ा कदम उठाते हुए राज्य की सभी पार्टी कमेटियों और फ्रंटल संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है। पार्टी नेतृत्व का कहना है कि संगठन के व्यापक पुनर्गठन की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। हालांकि राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह फैसला बागी गुट की ताकत को सीमित करने और संगठन पर नियंत्रण बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। कमेटियों के भंग होने से संगठनात्मक स्तर पर शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है और नए नेतृत्व को सामने लाने का रास्ता खुल सकता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>क्या बागी विधायक TMC पर दावा कर सकते हैं?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">बागी विधायक विधायक दल के भीतर अलग गुट बनाकर नेता और चीफ व्हिप जैसे पद हासिल कर सकते हैं, लेकिन पार्टी संगठन और चुनाव चिह्न पर उनका सीधा दावा अभी आसान नहीं होगा। भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दलबदल विरोधी कानून और चुनाव आयोग के नियम इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। 91वें संविधान संशोधन के अनुसार यदि किसी दल के कम से कम दो-तिहाई विधायक अलग होने का फैसला करते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से राहत मिल सकती है। इसके बाद यह प्रश्न उठता है कि पार्टी का वास्तविक नियंत्रण किसके पास है। चुनाव आयोग इस स्थिति में कई पहलुओं की जांच करता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>चुनाव आयोग किन आधारों पर फैसला करता है?</strong></h5>
<ol style="text-align:justify;">
<li>पार्टी संगठन का समर्थन किसके पास है।</li>
<li>राष्ट्रीय और राज्य कार्यकारिणी किस गुट के साथ है।</li>
<li>पार्टी संविधान क्या कहता है।</li>
<li>चुने हुए जनप्रतिनिधियों का बहुमत किसके पक्ष में है।</li>
</ol>
<p style="text-align:justify;">इन्हीं मानकों के आधार पर चुनाव आयोग तय करता है कि पार्टी और उसके चुनाव चिह्न पर किसका अधिकार होगा।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>महाराष्ट्र जैसा राजनीतिक घटनाक्रम?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">राजनीतिक विश्लेषक इस पूरे घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र की राजनीति से कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) दोनों बड़े विभाजन का सामना कर चुकी हैं। 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना का बड़ा गुट अलग हुआ था। इसके बाद 2023 में अजित पवार के नेतृत्व में NCP का विभाजन हुआ। दोनों मामलों में अलग हुए गुटों ने पार्टी और चुनाव चिह्न पर दावा किया था। पश्चिम बंगाल में भी वैसी ही स्थिति बनने की आशंका जताई जा रही है, हालांकि TMC का संगठनात्मक ढांचा और नेतृत्व शैली महाराष्ट्र की पार्टियों से अलग मानी जाती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 17:00:33 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>TMC में बढ़ी अंदरूनी कलह, बागी विधायकों के दावों से सियासत गरमाई</title>
                                    <description><![CDATA[पार्टी से निकाले गए विधायकों ने बहुमत समर्थन का दावा किया, आज विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर सकते हैं बागी नेता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/internal-strife-increased-in-tmc-politics-heated-up-due-to/article-54758"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/tmc-crisis.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर बढ़ते असंतोष और बागी सुरों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। पार्टी से निष्कासित किए गए विधायक रिजू दत्ता ने दावा किया है कि बड़ी संख्या में विधायक उनके साथ हैं और वे खुद को असली तृणमूल कांग्रेस मानते हैं। इस दावे के बाद राज्य की राजनीति में नए समीकरणों को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या टीएमसी के भीतर चल रहा असंतोष आने वाले दिनों में किसी बड़े राजनीतिक बदलाव का कारण बन सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">रिजू दत्ता का कहना है कि पार्टी के कुल 80 विधायकों में से 50 से अधिक विधायक उनके विचारों से सहमत हैं। उन्होंने दावा किया कि ये विधायक विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर अपनी स्थिति स्पष्ट करेंगे। बागी गुट की ओर से यह भी कहा गया है कि यदि उनके पास दो-तिहाई बहुमत का समर्थन है तो उन्हें ही पार्टी का वास्तविक प्रतिनिधि माना जाना चाहिए। साथ ही विधानसभा में विपक्ष के नेता के पद को लेकर भी नए दावे सामने आए हैं। बागी नेताओं का कहना है कि नेतृत्व के सवाल पर भी पुनर्विचार होना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सोमवार शाम को कोलकाता स्थित विधायक आवास में हुई एक बैठक ने इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक चर्चा में ला दिया। बैठक में निष्कासित विधायक संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी के साथ कई अन्य विधायक भी मौजूद बताए गए। हालांकि बैठक में शामिल विधायकों की सटीक संख्या को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं, लेकिन इस बैठक ने पार्टी के भीतर मौजूद असंतोष को खुलकर सामने ला दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब नेता प्रतिपक्ष के मुद्दे पर विधानसभा अध्यक्ष को भेजे गए एक प्रस्ताव में कथित तौर पर फर्जी हस्ताक्षरों का आरोप लगाया गया। संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी ने इस मामले पर आपत्ति जताई थी और शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद दोनों नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। निष्कासन के बाद दोनों नेता लगातार पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं और संगठन के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मांग कर रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस घटनाक्रम ने विपक्षी दलों को भी प्रतिक्रिया देने का अवसर दे दिया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि टीएमसी के भीतर लंबे समय से असंतोष मौजूद था, जो अब सामने आ रहा है। कुछ कांग्रेस नेताओं ने यहां तक कहा कि पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं। वहीं भारतीय जनता पार्टी ने भी इस पूरे मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। भाजपा नेताओं का कहना है कि वे इस राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं, हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि पार्टी अपनी रणनीति और संगठनात्मक ढांचे के अनुसार आगे बढ़ेगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दूसरी ओर टीएमसी नेतृत्व ने बागी नेताओं के दावों को खारिज कर दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि अधिकांश विधायक अब भी ममता बनर्जी के नेतृत्व के साथ खड़े हैं और पार्टी संगठन पूरी तरह मजबूत है। उनका दावा है कि कुछ नेताओं के व्यक्तिगत असंतोष को पूरे संगठन की राय नहीं माना जा सकता। पार्टी का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस अपने संगठनात्मक ढांचे और जनाधार के बल पर पहले की तरह एकजुट बनी हुई है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यदि किसी दल के दो-तिहाई विधायक अलग होकर नया गुट बनाते हैं तो संवैधानिक और कानूनी स्तर पर कई प्रक्रियाएं शुरू होती हैं। ऐसे मामलों में दलबदल कानून, निर्वाचन आयोग के नियम और पार्टी संगठन की स्थिति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि कोई गुट खुद को मूल पार्टी बताता है तो चुनाव आयोग को यह तय करना होता है कि संगठन, कार्यकारिणी और निर्वाचित प्रतिनिधियों का वास्तविक समर्थन किसके साथ है। ऐसे मामलों में कई बार कानूनी विवाद भी उत्पन्न हो जाते हैं और अंतिम निर्णय में लंबा समय लग सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पिछले कुछ दिनों में टीएमसी के भीतर कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्होंने संगठन में मतभेदों की चर्चा को बढ़ावा दिया है। पार्टी की बैठकों में अपेक्षा से कम विधायकों की उपस्थिति, कुछ नेताओं के इस्तीफे और सार्वजनिक मंचों पर उठे सवालों ने नेतृत्व के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह असंतोष सीमित स्तर तक है या वास्तव में संगठन के भीतर बड़ा बदलाव आकार ले रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 15:53:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>नेपाल में बालेन सरकार पर उठने लगे सवाल, 100 में 88 वादे अब तक अधूरे</title>
                                    <description><![CDATA[दो महीने में बढ़ी नाराजगी, मंत्रियों के इस्तीफे और अधूरे वादों पर घिरी सरकार]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/questions-are-being-raised-on-balen-government-in-nepal-88/article-54507"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/_donald-trump-note-nepal-prime-minister.jpg" alt=""></a><br /><p dir="ltr">नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह को सत्ता संभाले अभी दो महीने ही हुए हैं, लेकिन उनकी सरकार अब सवालों के घेरे में आ गई है। मार्च में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद बालेन शाह ने बड़े बदलावों और प्रशासनिक सुधारों का दावा करते हुए 100 पॉइंट एजेंडा पेश किया था। उस समय युवाओं और खासकर जेन-जी वर्ग में इसे लेकर काफी उत्साह दिखाई दिया था। लोग मान रहे थे कि पारंपरिक राजनीति से अलग छवि रखने वाले बालेन नेपाल की राजनीति में नया अध्याय शुरू करेंगे। लेकिन अब हालात कुछ अलग नजर आ रहे हैं।</p>
<p dir="ltr">प्रधानमंत्री कार्यालय की ट्रैकर वेबसाइट के मुताबिक बालेन सरकार के 100 में से 88 वादे तय समय से पीछे चल रहे हैं। कई योजनाएं अभी शुरुआती स्तर पर भी नहीं पहुंच पाई हैं। विपक्ष तो सरकार पर सवाल उठा ही रहा है, अब उनकी अपनी पार्टी के नेताओं ने भी सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जाहिर करनी शुरू कर दी है। सोशल मीडिया पर भी युवा पूछ रहे हैं कि अगर नई राजनीति में भी पुराने तरीके ही दिखेंगे तो फिर बदलाव कहां है।</p>
<p dir="ltr">सरकार बनने के कुछ ही दिनों के भीतर दो मंत्रियों का इस्तीफा भी बालेन सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। श्रम मंत्री दीपक शाह पर पत्नी को गलत तरीके से नौकरी दिलाने का आरोप लगा, जिसके बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा। वहीं गृह मंत्री सूदन गुरुंग पर एक विवादित कारोबारी से संबंधों के आरोप लगे। मामला बढ़ने के बाद उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया। इन घटनाओं ने सरकार की साफ-सुथरी छवि को नुकसान पहुंचाया है।</p>
<p dir="ltr">बालेन शाह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद मंत्रालयों की संख्या कम करने, घाटे वाले बोर्ड और समितियों को मर्ज करने, सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों को राजनीति से दूर रखने जैसे कई बड़े वादे किए थे। इसके अलावा डिजिटल निवेश व्यवस्था, ऊर्जा निर्यात नीति और बंद पड़ी परियोजनाओं को फिर शुरू करने की बात भी कही गई थी। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार ने इन वादों के लिए बेहद कम समय सीमा तय कर दी थी। कई योजनाओं को 24 घंटे, 7 दिन और 15 दिन में पूरा करने का दावा किया गया, जो व्यवहारिक तौर पर मुश्किल माना जा रहा था।</p>
<p dir="ltr">नेपाल के राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक सुधारों और आयोगों की सिफारिशें लागू करने में लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। लेकिन बालेन सरकार ने तेजी दिखाने के चक्कर में कई फैसले बिना पर्याप्त तैयारी के ले लिए। इसका असर अब साफ दिखाई दे रहा है।</p>
<p dir="ltr">सरकार की सबसे ज्यादा आलोचना अध्यादेशों के जरिए फैसले लेने को लेकर हो रही है। बालेन सरकार निचले सदन में मजबूत स्थिति में है, लेकिन ऊपरी सदन नेशनल असेंबली में उसका कोई सदस्य नहीं है। ऐसे में सरकार ने कई अहम फैसले अध्यादेशों के जरिए लागू करने की कोशिश की। इनमें छात्र संगठनों और सिविल सर्विस यूनियनों को खत्म करने जैसे प्रस्ताव शामिल थे। बाद में नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने इन अध्यादेशों पर रोक लगा दी। छात्र संगठनों और सरकारी कर्मचारियों ने भी इसका विरोध किया।</p>
<p dir="ltr">बालेन शाह ने सोशल मीडिया पर सफाई देते हुए कहा कि सरकारी दफ्तरों और स्कूलों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करना जरूरी है। उनका कहना था कि छात्र संगठन और यूनियन अब पेशेवर संस्थाओं की जगह राजनीतिक दलों के “स्लीपर सेल” बन चुके हैं। हालांकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बता रहा है।</p>
<p dir="ltr">इसी बीच सरकार द्वारा शुरू किए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान ने भी विवाद खड़ा कर दिया है। काठमांडू घाटी समेत कई इलाकों में बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक करीब 4 हजार ढांचे हटाए गए हैं, जिससे लगभग 15 हजार लोग प्रभावित हुए हैं। कई परिवारों का कहना है कि उन्हें बिना पर्याप्त समय दिए घरों और दुकानों से हटाया गया।</p>
<p dir="ltr">बालेन शाह जब काठमांडू के मेयर थे, तब भी उनकी पहचान बुलडोजर एक्शन को लेकर बनी थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने उसी मॉडल को देशभर में लागू करने की कोशिश की। लेकिन अब यह फैसला गरीब और भूमिहीन लोगों के विरोध का कारण बन रहा है।</p>
<p dir="ltr">भारत-नेपाल सीमा पर भी सरकार के नए नियमों को लेकर नाराजगी बढ़ रही है। नेपाल सरकार ने भारत से आने वाले सामान पर कस्टम ड्यूटी के नियमों को सख्ती से लागू करना शुरू किया है। नियम के अनुसार 100 नेपाली रुपए से ज्यादा का सामान लाने पर टैक्स देना होगा। दशकों से सीमा पर रहने वाले लोग भारत के शहरों से राशन, कपड़े और घरेलू सामान खरीदते रहे हैं। अब नए नियमों के बाद लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।</p>
<p dir="ltr">बालेन शाह की चुप्पी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। चुनाव के दौरान उन्होंने पारदर्शिता और जवाबदेही की बात कही थी, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने अब तक एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की। संसद में विपक्ष लगातार उनसे जवाब मांग रहा है। यहां तक कि उनकी अपनी पार्टी के नेताओं ने भी सवाल उठाए हैं कि सरकार संसद के प्रति जवाबदेह क्यों नहीं दिख रही। हालांकि सरकार का दावा है कि कुछ बड़े फैसले लागू किए जा चुके हैं। गरीब मरीजों के लिए अस्पतालों में मुफ्त बेड की व्यवस्था और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच शुरू करना इनमें शामिल है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 29 May 2026 16:12:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>TVK का भविष्य तीन दलों के हाथ, DMK-AIADMK गठबंधन चर्चा से बढ़ा सस्पेंस, जानें पूरी जानकारी</title>
                                    <description><![CDATA[तमिलनाडु में TVK का भविष्य CPI, CPM, VCK के फैसले पर टिका है। DMK-AIADMK गठबंधन चर्चा से राजनीतिक हलचल तेज।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/the-future-of-tvk-is-in-the-hands-of-three/article-52905"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ---2026-05-08t120036.741.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">तमिलनाडु की राजनीति इन दिनों किसी फिल्मी सस्पेंस से कम नहीं लग रही है। हर दिन हालात बदलते दिख रहे हैं और राजनीतिक गलियारों में लगातार नई चर्चाओं ने माहौल को और गर्म कर दिया है। एक तरफ अभिनेता से नेता बने थलापति विजय की पार्टी टीवीके (</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">TVK) <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने विधायकों के समर्थन को मजबूत करने की कोशिश में जुटी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी तरफ राज्य की पुरानी प्रतिद्वंदी पार्टियां </span>DMK <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>AIADMK <span lang="hi" xml:lang="hi">के बीच भी कथित तौर पर सरकार गठन को लेकर बातचीत की खबरें राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। हालांकि अभी तक किसी भी स्तर पर औपचारिक ऐलान नहीं हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सियासी हलचल तेज है और हर कोई अगले कदम पर नजर लगाए बैठा है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जानकारी के मुताबिक टीवीके ने लेफ्ट पार्टियों </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">CPI, CPM <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>VCK <span lang="hi" xml:lang="hi">से समर्थन की अपील की है। इन तीनों दलों ने संकेत दिए हैं कि वे आज शाम तक अपना रुख साफ कर सकते हैं। अंदरूनी हलकों में यह चर्चा है कि जनादेश और राजनीतिक स्थिरता को देखते हुए </span>TVK <span lang="hi" xml:lang="hi">को समर्थन दिया जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि </span>DMK <span lang="hi" xml:lang="hi">की ओर से इन दलों पर लगातार यह दबाव है कि कोई भी फैसला सोच-समझकर लिया जाए। ये तीनों दल लंबे समय से </span>DMK <span lang="hi" xml:lang="hi">गठबंधन का हिस्सा रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे में उनका रुख बदलना आसान नहीं माना जा रहा। चेन्नई से लेकर कोयंबटूर तक इस फैसले को लेकर राजनीतिक हलचल साफ देखी जा रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और पार्टी स्तर पर लगातार बैठकें भी चल रही हैं।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">इस पूरे घटनाक्रम के बीच राज्यपाल आर. एन. रवि की टिप्पणियों ने भी राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। राज्यपाल ने हाल ही में यह कहा था कि उनके लिए संख्या बल सबसे महत्वपूर्ण है और वे उसी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने का मौका देंगे जिसके पास 118 विधायकों का स्पष्ट बहुमत होगा। इस बयान के बाद </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">TVK <span lang="hi" xml:lang="hi">और कांग्रेस दोनों ने नाराजगी जताई है और सवाल उठाए हैं कि क्या राजनीतिक प्रक्रिया में संवैधानिक संतुलन बना रहेगा या नहीं। इसी बीच</span>, DMK <span lang="hi" xml:lang="hi">ने अपने सभी विधायकों को 10 मई तक चेन्नई में मौजूद रहने के निर्देश दिए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे साफ है कि पार्टी किसी भी संभावित राजनीतिक बदलाव को लेकर सतर्क है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">उधर</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, AIADMK <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>DMK <span lang="hi" xml:lang="hi">के बीच कथित गठबंधन या बातचीत की खबरों ने स्थिति को और उलझा दिया है। </span>AIADMK <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमुख ई. पलनीस्वामी द्वारा पुडुचेरी के एक रिसॉर्ट में विधायकों के हस्ताक्षर इकट्ठा करने की खबरें भी सामने आई हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। उन्होंने राज्यपाल से मिलने का समय भी मांगा है। इसी बीच यह भी चर्चा है कि अगर </span>DMK <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>AIADMK <span lang="hi" xml:lang="hi">के बीच कोई अप्रत्याशित समझौता बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं। बताया जा रहा है कि </span>TVK <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमुख थलापति विजय ने भी इस स्थिति पर नजर बनाए रखी है और यदि हालात उनके पक्ष में नहीं जाते तो वे अपने 107 विधायकों से इस्तीफे पर विचार कर सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि इसकी पुष्टि किसी स्तर पर नहीं हुई है। पनयूर स्थित </span>TVK <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यालय में आज विधायक दल की बैठक भी बुलाई गई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस पर सभी की निगाहें टिकी हैं।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्पेशल खबरें</category>
                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 08 May 2026 12:25:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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                <title>तमिलनाडु में TVK सरकार गठन फंसा, विजय को चाहिए 11 और विधायकों का समर्थन, सियासी हलचल बढ़ी</title>
                                    <description><![CDATA[तमिलनाडु में सरकार गठन पर संकट, विजय को बहुमत के लिए 118 विधायकों का समर्थन जरूरी। राज्यपाल ने स्थिर सरकार की शर्त रखी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/tvk-government-formation-stuck-in-tamil-nadu-vijay-needs-support/article-52840"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ---2026-05-07t125715.744.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">तमिलनाडु में सरकार गठन को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है और इसी बीच एक्टर से नेता बने विजय की पार्टी </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">TVK <span lang="hi" xml:lang="hi">के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है। तमिलनाडु सरकार गठन को लेकर राजभवन की ओर से साफ संकेत दिए गए हैं कि मुख्यमंत्री पद की शपथ तभी संभव होगी जब विधानसभा में स्पष्ट बहुमत साबित किया जाएगा। राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने स्थिर सरकार की आवश्यकता का हवाला देते हुए 118 विधायकों के समर्थन की शर्त रखी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके बाद सियासी माहौल और गर्म हो गया है। विजय गुरुवार को लगातार दूसरे दिन राज्यपाल से मिलने लोकभवन पहुंचे थे और करीब एक घंटे की मुलाकात के बाद वहां से बाहर निकले।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">सूत्रों के मुताबिक राज्यपाल ने यह साफ कर दिया है कि केवल दावा पेश करना काफी नहीं होगा</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संख्या बल के साथ बहुमत साबित करना जरूरी है। इसी वजह से </span>TVK <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमुख विजय पर दबाव बढ़ गया है। इससे पहले बुधवार को विजय ने 113 विधायकों के समर्थन का पत्र राज्यपाल को सौंपा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसे पर्याप्त नहीं माना गया। बताया जा रहा है कि राज्यपाल ने उनसे दो टूक कहा कि सरकार गठन से पहले 118 विधायकों का समर्थन अनिवार्य है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि मौजूदा राजनीतिक स्थिति में स्थिरता सबसे बड़ा मुद्दा है। विजय ने इस पर कुछ समय की मांग की है ताकि अतिरिक्त समर्थन जुटाया जा सके। फिलहाल सत्ता की दौड़ में </span>TVK <span lang="hi" xml:lang="hi">खुद को मजबूत स्थिति में दिखाने की कोशिश कर रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आंकड़ों का गणित उनके लिए चुनौती बन गया है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">विधानसभा के कुल समीकरण की बात करें तो 234 सदस्यीय सदन में </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">TVK <span lang="hi" xml:lang="hi">के पास 108 सीटें हैं। हालांकि विजय खुद दो सीटों से चुनाव जीते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे में एक सीट छोड़ने के बाद यह संख्या 107 पर आ जाती है। इस तरह बहुमत का आंकड़ा 118 ही रहता है और पार्टी को कम से कम 11 अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की जरूरत है। कांग्रेस के 5 विधायकों के समर्थन ने थोड़ी राहत जरूर दी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अभी भी संख्या पूरी नहीं हो पा रही है। इसी बीच राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा तेज हो गई है कि </span>DMK <span lang="hi" xml:lang="hi">और </span>AIADMK <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे बड़े प्रतिद्वंदी दलों के बीच भी किसी तरह की बैकचैनल बातचीत चल रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें सरकार गठन के वैकल्पिक फॉर्मूले पर विचार किया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि एक प्रस्ताव में </span>AIADMK <span lang="hi" xml:lang="hi">को सरकार बनाने और </span>DMK <span lang="hi" xml:lang="hi">को बाहर से समर्थन देने जैसी बात सामने आई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि इस पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। छोटे दलों की भूमिका भी इस पूरे समीकरण में अहम मानी जा रही है।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्पेशल खबरें</category>
                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 13:15:22 +0530</pubDate>
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