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                <title>US Sanctions - दैनिक जागरण</title>
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                <description>US Sanctions RSS Feed</description>
                
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                <title>अमेरिका ने चार भारतीय कंपनियों से प्रतिबंध हटाए, रक्षा और निर्यात क्षेत्र को मिल सकती है नई मजबूती</title>
                                    <description><![CDATA[प्रतिबंध हटने के बाद वैश्विक कारोबार, रक्षा आपूर्ति, हाई-टेक निर्यात और भारत-अमेरिका औद्योगिक सहयोग को मिलने की उम्मीद नई गति]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/america-lifts-sanctions-from-four-indian-companies-defense-and-export/article-57513"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/us-sanctions-removed.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में अमेरिका ने चार भारतीय कंपनियों पर लगाए गए प्रतिबंध हटा दिए हैं। इस फैसले को भारतीय उद्योग, रक्षा उत्पादन और निर्यात क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। इससे न केवल संबंधित कंपनियों के लिए वैश्विक कारोबार के नए अवसर खुलेंगे, बल्कि भारत की उभरती हुई विनिर्माण क्षमता और रक्षा क्षेत्र को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती मिलेगी। ऐसे समय में जब भारत वैश्विक सप्लाई चेन का प्रमुख केंद्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, यह निर्णय दोनों देशों के आर्थिक सहयोग को और गति दे सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका द्वारा प्रतिबंध हटाने के बाद संबंधित भारतीय कंपनियां अब अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक गतिविधियों में पहले की तुलना में अधिक सहजता से भाग ले सकेंगी। विदेशी कंपनियों के साथ तकनीकी सहयोग, निवेश, उपकरणों की खरीद, वित्तीय लेनदेन और निर्यात से जुड़े कई काम आसान होने की संभावना है। उद्योग जगत का मानना है कि इससे भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी मजबूत होगी और वे वैश्विक बाजार में अपनी उपस्थिति को और विस्तार दे सकेंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">रक्षा क्षेत्र के दृष्टिकोण से भी इस फैसले को काफी अहम माना जा रहा है। भारत पिछले कुछ वर्षों में रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के साथ-साथ रक्षा निर्यात को भी लगातार प्रोत्साहित कर रहा है। आधुनिक रक्षा उपकरण, एयरोस्पेस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म, विशेष मशीनरी और उन्नत तकनीकों के क्षेत्र में भारतीय कंपनियां लगातार अपनी क्षमता बढ़ा रही हैं। प्रतिबंध हटने के बाद इन कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में भागीदारी की संभावनाएं और मजबूत हो सकती हैं। रक्षा उद्योग में किसी भी कंपनी के लिए तकनीकी सहयोग और आपूर्ति नेटवर्क तक आसान पहुंच बेहद महत्वपूर्ण होती है। जब प्रतिबंध हटते हैं तो विदेशी कंपनियों के साथ संयुक्त परियोजनाओं, अनुसंधान, उत्पादन और निर्यात के अवसर बढ़ जाते हैं। इससे नई तकनीकों का आदान-प्रदान भी आसान होता है और भारतीय उद्योगों को वैश्विक गुणवत्ता मानकों के अनुरूप उत्पादन करने में मदद मिलती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत सरकार भी पिछले कुछ वर्षों से रक्षा क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' जैसे कार्यक्रमों के तहत निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई गई है। रक्षा उत्पादन में नई कंपनियों के प्रवेश, तकनीकी निवेश और निर्यात को प्रोत्साहन देने के लिए कई नीतिगत सुधार भी किए गए हैं। ऐसे में अमेरिका का यह फैसला भारतीय उद्योगों के लिए सकारात्मक वातावरण तैयार करने वाला माना जा रहा है। निर्यात क्षेत्र पर भी इसका व्यापक असर देखने को मिल सकता है। भारत आज इंजीनियरिंग उत्पाद, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, विशेष रसायन, फार्मास्यूटिकल्स और रक्षा उपकरणों के निर्यात में लगातार अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा है। यदि भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजार में बेहतर पहुंच मिलती है तो देश के कुल निर्यात में भी वृद्धि की संभावना मजबूत होगी। इससे विदेशी मुद्रा आय बढ़ने के साथ-साथ विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह फैसला वैश्विक निवेशकों के लिए भी सकारात्मक संकेत है। किसी देश की कंपनियों पर लगे प्रतिबंध हटने से निवेशकों का विश्वास बढ़ता है और वे दीर्घकालिक निवेश के प्रति अधिक उत्साहित होते हैं। इसका लाभ संबंधित कंपनियों के साथ-साथ पूरे औद्योगिक क्षेत्र को मिल सकता है। नई साझेदारियां बनने से तकनीकी नवाचार और उत्पादन क्षमता दोनों में वृद्धि होने की संभावना रहती है। भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक सहयोग पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुआ है। सूचना प्रौद्योगिकी, रक्षा, ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, स्वच्छ ऊर्जा, अंतरिक्ष और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं। ऐसे में प्रतिबंध हटाने का यह निर्णय व्यापक रणनीतिक और आर्थिक सहयोग को भी नई गति दे सकता है। उद्योग जगत को उम्मीद है कि भविष्य में दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश के नए अवसर विकसित होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के लिए यह समय काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वैश्विक कंपनियां अपनी आपूर्ति श्रृंखला को विविध बनाने की दिशा में काम कर रही हैं और भारत एक विश्वसनीय उत्पादन केंद्र के रूप में तेजी से उभर रहा है। बेहतर नीतिगत वातावरण, मजबूत बुनियादी ढांचा, कुशल मानव संसाधन और बढ़ती घरेलू मांग भारत को वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षक बना रही है। ऐसे में अमेरिकी निर्णय से भारतीय उद्योगों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा और मजबूत हो सकती है। यदि प्रतिबंध हटने के बाद व्यापारिक सहयोग, तकनीकी साझेदारी और निर्यात गतिविधियां तेजी से आगे बढ़ती हैं तो इसका सकारात्मक प्रभाव आने वाले वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देगा। रक्षा विनिर्माण, उच्च तकनीक उत्पादन और वैश्विक निर्यात नेटवर्क में भारत की भागीदारी बढ़ने से औद्योगिक विकास को नई गति मिल सकती है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 13:44:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>अमेरिका ने रूसी तेल पर बढ़ाई छूट, क्या भारत को मिल सकता है बड़ा फायदा</title>
                                    <description><![CDATA[अमेरिका ने रूसी तेल पर छूट 17 जून तक बढ़ाई। इससे भारत को सस्ते कच्चे तेल की सप्लाई जारी रहने और बाजार स्थिरता का फायदा मिल सकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/america-increased-discount-on-russian-oil-can-india-get-big/article-53753"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/us-on-russian-oil-discounts.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अमेरिका ने फिर से रूसी तेल पर दी गई अस्थायी छूट की समय सीमा बढ़ा दी है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब यह 17 जून तक बढ़ा दी गई है। इस फैसले के बाद समुद्र में पहले से मौजूद रूसी कच्चे तेल की खेप को खरीदार देशों तक पहुंचाने की अनुमति दी जाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भले ही उस पर प्रतिबंध लगे हों। वैश्विक तेल बाजार पहले से ही काफी अस्थिर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए यह बात भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए राहत का कारण बन रही है। यह और भी महत्वपूर्ण है जब डीजल और पेट्रोल के बढ़ते दाम आम लोगों को प्रभावित कर रहे हैं और आपूर्ति में लगातार अनिश्चितता बनी हुई है। इसलिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह निर्णय काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अमेरिकी वित्त विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह छूट केवल उन्हीं रूसी तेल शिपमेंट पर लागू होगी</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो पहले से समुद्र में मौजूद हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि रूस के ऊर्जा निर्यात पर लगे सभी प्रतिबंध हटा दिए गए हैं। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि इस कदम से वैश्विक बाजार में कुछ स्थिरता आएगी और उन देशों को मदद मिलेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो ऊर्जा संकट या महंगे आयात का सामना कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि अमेरिका यह भी सुनिश्चित कर रहा है कि ईरान और अन्य क्षेत्रों में तनाव के चलते तेल की आपूर्ति पर दबाव न बढ़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए यह छूट सीमित समय के लिए दी गई है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">भारत के दृष्टिकोण से</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस निर्णय का सीधा प्रभाव कच्चे तेल की आपूर्ति पर पड़ेगा। रूस से आने वाला सस्ता तेल अब बिना किसी बड़े कानूनी जोखिम के भारतीय रिफाइनरियों तक पहुंच सकेगा। पिछले कुछ महीनों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत ने रूस से रिकॉर्ड मात्रा में तेल खरीदा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और कई बार यह आयात कुल जरूरत का लगभग आधा हो गया है। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार थोड़े समय के लिए छूट बढ़ाने से तेल कंपनियों को दीर्घकालिक योजना बनाने में मुश्किल होती है। इस पर जहाजों की बुकिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीमा और भुगतान व्यवस्था पर भी असर पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे पूरा सिस्टम थोड़ी अस्थिरता में काम करता है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">दूसरी तरफ</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत सरकार लगातार यह कहती रही है कि उसकी तेल नीति पूरी तरह से बाजार की जरूरतों और कीमतों पर आधारित है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत पहले भी रूस से तेल खरीदता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छूट के समय भी खरीद कर रहा है और आगे भी आवश्यकता के अनुसार खरीद जारी रखेगा। भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसकी खरीद किसी अमेरिकी छूट या किसी एक देश की नीति पर निर्भर नहीं है। इस बीच</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीमा और शिपिंग व्यवस्था में भी बदलाव किए गए हैं ताकि सप्लाई चेन पर कोई असर न पड़े और कच्चे तेल की आवाजाही बिना रुकावट के जारी रह सके।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">कुल मिलाकर</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह फैसला ऐसे समय आया है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले से ही कई दबावों का सामना कर रहा है। अमेरिका की यह छूट भले सीमित हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसका असर भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देश पर सीधे तौर पर देखने को मिल सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खासकर जब घरेलू स्तर पर ईंधन की कीमतें पहले से चर्चा में हैं।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्पेशल खबरें</category>
                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 19 May 2026 11:57:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>अमेरिका ने ईरान को भेजा नया प्रस्ताव, ट्रंप बोले- समझौता नहीं हुआ तो फिर होगी बमबारी</title>
                                    <description><![CDATA[अमेरिका ने ईरान को युद्ध खत्म करने का नया प्रस्ताव भेजा है। ट्रंप की चेतावनी के बीच परमाणु कार्यक्रम पर समझौता अब भी अटका हुआ है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/america-sent-a-new-proposal-to-iran-trump-said/article-52857"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ---2026-05-07t161820.521.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अमेरिका और ईरान के बीच करीब दो महीने से जारी तनाव अब एक नए मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने तेहरान को युद्ध खत्म करने के लिए नया प्रस्ताव भेजा है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी समीक्षा फिलहाल ईरान कर रहा है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक इस प्रस्ताव में होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए दोबारा खोलने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ अमेरिकी प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों को कम करने जैसे बिंदु शामिल हैं। हालांकि मामला अभी पूरी तरह सुलझा नहीं है। तेहरान ने साफ संकेत दिए हैं कि वह जल्दबाजी में किसी समझौते पर दस्तखत नहीं करेगा। इसी बीच ट्रंप ने सोशल मीडिया पर फिर चेतावनी दी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो ईरान पर दोबारा बमबारी शुरू हो सकती है। इस बयान के बाद मिडिल ईस्ट में बेचैनी फिर बढ़ गई है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">गुरुवार सुबह से ही अंतरराष्ट्रीय बाजारों में हलचल देखने को मिली। कच्चे तेल की कीमतें कुछ समय के लिए स्थिर हुईं और निवेशकों में उम्मीद जगी कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य खुलता है तो तेल सप्लाई सामान्य हो सकती है। बताया जा रहा है कि पिछले कुछ हफ्तों में पर्सियन गल्फ से गुजरने वाले कई तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई थी। इसी वजह से ब्रेंट क्रूड लगातार ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। बुधवार देर रात अमेरिकी सेना और एक ईरानी तेल टैंकर के बीच ओमान की खाड़ी में तनाव की खबर भी सामने आई। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने दावा किया कि टैंकर अमेरिकी नाकेबंदी तोड़ने की कोशिश कर रहा था</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके बाद कार्रवाई की गई। हालांकि ईरान ने इसे उकसावे वाली कार्रवाई बताया है। हालात इतने तनावपूर्ण रहे कि कई अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों ने अस्थायी रूप से अपने रूट बदल दिए।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">इस पूरे युद्ध की सबसे बड़ी उलझन अब भी ईरान का परमाणु कार्यक्रम बना हुआ है। वॉशिंगटन चाहता है कि तेहरान यूरेनियम संवर्धन सीमित करे और परमाणु हथियारों की दिशा में कोई कदम न बढ़ाए। दूसरी तरफ ईरान इसे अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बता रहा है। सूत्रों के मुताबिक दोनों देशों के बीच असली पेच यहीं फंसा है। अमेरिकी पक्ष चाहता है कि किसी भी समझौते में परमाणु गतिविधियों पर सख्त निगरानी शामिल हो</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि ईरान अपने कार्यक्रम को पूरी तरह रोकने के लिए तैयार नहीं दिख रहा। हालांकि अब यह भी कहा जा रहा है कि दोनों देश फिलहाल इस मुद्दे को अलग रखकर बाकी बिंदुओं पर सहमति बनाने की कोशिश कर सकते हैं ताकि युद्ध जैसी स्थिति खत्म हो सके। बाद में परमाणु वार्ता के लिए अलग दौर की बातचीत कराई जा सकती है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">इस संघर्ष की शुरुआत फरवरी के आखिर में हुई थी</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर हमले शुरू किए। उसी दौरान ईरान के शीर्ष नेतृत्व को बड़ा नुकसान पहुंचा और इसके बाद तेहरान ने मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। हालात तेजी से बिगड़े और होर्मुज जलडमरूमध्य पर असर पड़ने लगा। अप्रैल में संघर्षविराम की कोशिश हुई थी लेकिन बीच-बीच में दोनों पक्षों की तरफ से आरोप लगते रहे कि सीजफायर का उल्लंघन हुआ। पाकिस्तान की मध्यस्थता में भी बातचीत कराने की कोशिश हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मगर वह सफल नहीं हो पाई। अब ट्रंप प्रशासन दावा कर रहा है कि समझौता करीब है और एक छोटे मेमोरैंडम पर सहमति बन सकती है। लेकिन तेहरान अभी पूरी तरह भरोसा करने की स्थिति में नहीं दिख रहा।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्पेशल खबरें</category>
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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 16:25:17 +0530</pubDate>
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