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                <title>Indian Law - दैनिक जागरण</title>
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                <title>गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, केवल सर्टिफिकेट से शादी नहीं मानी जाएगी</title>
                                    <description><![CDATA[कोर्ट ने कहा—हिंदू विवाह के लिए रीति-रिवाज और सात फेरे जरूरी, रजिस्ट्रेशन मात्र कानूनी रिकॉर्ड है, विवाह नहीं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/big-decision-of-gujarat-high-court-marriage-will-not-be/article-57488"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/gujarat-high-court-marriage-verdict.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">गुजरात हाईकोर्ट ने एक अहम और दूरगामी असर डालने वाला फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि केवल मैरिज सर्टिफिकेट बन जाने से किसी भी हिंदू विवाह को वैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह तभी कानूनी और धार्मिक रूप से मान्य होता है जब उसमें हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तय सभी रीति-रिवाज और परंपराओं का पालन किया गया हो। जिन समुदायों में सात फेरे को विवाह का मूल आधार माना जाता है, वहां बिना फेरे लिए विवाह को पूरा नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मैरिज सर्टिफिकेट सिर्फ एक रिकॉर्ड होता है, जो किसी पहले से हुई शादी को दर्ज करता है, लेकिन अपने आप किसी रिश्ते को विवाह का दर्जा नहीं देता। यह फैसला जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर.टी. वच्छानी की खंडपीठ ने एक फर्जी शादी से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान दिया। मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा था जो ब्रिटेन में रहता है। उसका आरोप था कि अहमदाबाद की एक महिला ने नौकरी दिलाने का झांसा देकर उससे कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवा लिए और बाद में उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर फर्जी तरीके से मैरिज सर्टिफिकेट बनवा लिया। व्यक्ति ने दावा किया कि उसकी उस महिला से कभी कोई शादी नहीं हुई और न ही किसी प्रकार की विवाहिक रस्में पूरी की गईं। इस मामले ने कोर्ट तक पहुंचने से पहले फैमिली कोर्ट में भी सुनवाई हुई थी, लेकिन वहां सिर्फ मैरिज सर्टिफिकेट के आधार पर व्यक्ति की याचिका को खारिज कर दिया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि संबंधित महिला ने खुद फैमिली कोर्ट में स्वीकार किया कि उनके बीच कभी कोई शादी की रस्म नहीं हुई और न ही दोनों कभी पति-पत्नी की तरह साथ रहे। इसके बावजूद निचली अदालत ने केवल रजिस्ट्रेशन के आधार पर विवाह को मान्यता मानते हुए याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने इस निर्णय को गलत ठहराते हुए उसे रद्द कर दिया और स्पष्ट टिप्पणी की कि जब विवाह की मूल रस्में ही नहीं हुईं, तो केवल दस्तावेजों के आधार पर उसे वैध विवाह नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने अपने फैसले में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-7 का विस्तार से उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह एक संस्कार है, जो दो व्यक्तियों को सामाजिक और पारिवारिक रूप से जोड़ता है। विवाह का उद्देश्य केवल एक दस्तावेज तैयार करना नहीं होता, बल्कि यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक बंधन होता है, जिसमें रीति-रिवाजों का पालन अनिवार्य है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि विवाह की वास्तविक प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो केवल पंजीकरण के आधार पर उसे कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मैरिज सर्टिफिकेट केवल एक प्रमाण है, जो पहले से हुई वैध शादी को दर्ज करता है। इसका उपयोग विवाह के प्रमाण के रूप में किया जा सकता है, लेकिन यह स्वयं विवाह का निर्माण नहीं करता। अदालत ने कहा कि विवाह की वैधता तय करने के लिए यह देखना जरूरी है कि क्या दोनों पक्षों ने धार्मिक और सामाजिक परंपराओं के अनुसार विवाह किया है या नहीं। इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अदालत ने फैमिली कोर्ट के दृष्टिकोण को बदलते हुए यह संदेश दिया कि केवल दस्तावेजों के आधार पर किसी भी वैवाहिक संबंध को मान्यता देना उचित नहीं है। इससे भविष्य में ऐसे मामलों में स्पष्टता आएगी, जहां फर्जी दस्तावेजों के आधार पर विवाह का दावा किया जाता है। अदालत ने यह भी कहा कि विवाह एक गंभीर सामाजिक जिम्मेदारी है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। इस निर्णय के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि हिंदू विवाह में रीति-रिवाजों का पालन अनिवार्य है और केवल रजिस्ट्रेशन से विवाह को मान्यता नहीं मिल सकती। यह फैसला उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो विवाह से जुड़े दस्तावेजों को ही अंतिम प्रमाण मान लेते हैं। अदालत ने अपने फैसले में सामाजिक और कानूनी दोनों पहलुओं को संतुलित रखते हुए यह स्पष्ट किया कि विवाह केवल एक कागजी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक और सांस्कृतिक बंधन है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 11:03:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>छत्तीसगढ़ में UCC लागू करने की तैयारी तेज, 5 सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति गठित</title>
                                    <description><![CDATA[विवाह, तलाक, उत्तराधिकार सहित सभी पर्सनल लॉ का होगा अध्ययन, सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रंजना देसाई को समिति की अध्यक्षता सौंपी गई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/preparations-intensified-to-implement-ucc-in-chhattisgarh-5-member-high/article-57042"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-elephants-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता यानी UCC लागू करने की दिशा में राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। साय सरकार ने इस मुद्दे पर स्टडी, सुझाव और ड्राफ्ट तैयार करने के लिए 5 सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है। इस संबंध में सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से गुरुवार को आधिकारिक आदेश जारी किया गया। सरकार का कहना है कि यह कदम राज्य में कानून व्यवस्था और सामाजिक ढांचे को समान आधार पर मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार द्वारा गठित इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई करेंगी। उनके साथ समिति में शत्रुघ्न सिंह, एमके राउत, मोहन पवार और ज्योति रानी सिंह को सदस्य बनाया गया है। समिति को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह राज्य में लागू विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों का अध्ययन करे और UCC लागू करने की संभावनाओं पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करे। समिति का मुख्य कार्य विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, गोद लेने (दत्तक ग्रहण) और अन्य नागरिक मामलों से जुड़े मौजूदा पर्सनल लॉ की समीक्षा करना होगा। वर्तमान में देश में अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं, जिनके आधार पर पारिवारिक और सामाजिक मामलों का निपटारा होता है। सरकार का मानना है कि इन कानूनों के बीच अंतर कई बार कानूनी और सामाजिक असमानताओं को जन्म देता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राज्य सरकार ने समिति को यह भी निर्देश दिया है कि वह केवल कानूनी अध्ययन तक सीमित न रहे, बल्कि विभिन्न समुदायों, सामाजिक संगठनों, विधि विशेषज्ञों और आम नागरिकों से सुझाव भी प्राप्त करे। इसके लिए जन संवाद और परामर्श प्रक्रिया अपनाई जाएगी ताकि सभी वर्गों की राय को रिपोर्ट में शामिल किया जा सके। इसके अलावा समिति उन राज्यों के अनुभवों का भी अध्ययन करेगी जहां पहले से UCC लागू है या इस दिशा में कदम उठाए गए हैं। समिति को यह भी जांच करनी होगी कि यदि छत्तीसगढ़ में UCC लागू किया जाता है तो इससे सामाजिक, कानूनी और प्रशासनिक ढांचे पर क्या प्रभाव पड़ेगा। सरकार चाहती है कि किसी भी निर्णय से पहले सभी पहलुओं पर विस्तृत अध्ययन हो ताकि भविष्य में किसी तरह की व्यावहारिक समस्या न आए। समिति अपनी रिपोर्ट तैयार कर सरकार को सौंपेगी, जिसके आधार पर आगे की विधायी प्रक्रिया तय की जाएगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने पहले ही संकेत दिए थे कि सरकार सभी वर्गों और समुदायों से विचार-विमर्श के बाद ही इस दिशा में आगे बढ़ेगी। अब समिति के गठन के बाद यह प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू हो गई है। राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इस कदम को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है और इसे राज्य में बड़े विधायी बदलाव की दिशा में शुरुआती प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। प्रस्तावित समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद राज्य में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून व्यवस्था लागू होने की संभावना है, चाहे उनका धर्म, जाति या समुदाय कुछ भी हो। वर्तमान में विवाह, तलाक, संपत्ति अधिकार, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग कानून लागू हैं। UCC लागू होने के बाद इन सभी मामलों में एक समान कानूनी ढांचा लागू किया जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य किसी भी समुदाय की परंपराओं को खत्म करना नहीं है, बल्कि कानूनी समानता सुनिश्चित करना है। विशेषकर महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा और समानता को इस प्रस्ताव का एक प्रमुख उद्देश्य बताया जा रहा है। कई बार अलग-अलग पर्सनल लॉ के कारण कानूनी प्रक्रिया में असमानता देखने को मिलती है, जिसे दूर करने की दिशा में यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। देश में वर्तमान स्थिति की बात करें तो उत्तराखंड पहला राज्य है जिसने UCC को लागू किया है। इसके अलावा कुछ अन्य राज्यों में इस दिशा में विधायी या प्रारंभिक प्रक्रिया जारी है। गोवा में पहले से ही एक सिविल कोड लागू है, जो ऐतिहासिक रूप से पुर्तगाली शासन के समय से चला आ रहा है। हालांकि उसे पूर्ण आधुनिक UCC का मॉडल नहीं माना जाता, लेकिन वह एक समान नागरिक कानून व्यवस्था का उदाहरण जरूर है। छत्तीसगढ़ में गठित यह समिति आने वाले महीनों में विभिन्न स्तरों पर अध्ययन और परामर्श करेगी। रिपोर्ट तैयार होने के बाद इसे राज्य सरकार को सौंपा जाएगा, जिसके बाद विधानसभा में इसे प्रस्तुत करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 16:19:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>हत्यारोपी को संपत्ति का हक नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने कानून पर दे दिया अहम फैसला, समझें</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि हत्या का आरोपी मृतक की संपत्ति का वारिस नहीं हो सकता। जानें हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 25 और पूरा मामला।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/the-supreme-court-explained-that-the-murderer-has-no-right/article-53057"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ---2026-05-10t150453.990.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">संपत्ति विवाद और पारिवारिक रिश्तों के बीच बढ़ते आपराधिक मामलों में एक बड़ा सवाल अक्सर सामने आता है कि अगर कोई व्यक्ति अपने ही परिजन की हत्या कर दे</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो क्या उसे उसकी जायदाद में हिस्सा मिलेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सवाल सिर्फ नैतिक नहीं बल्कि कानूनी दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने इस मुद्दे पर स्थिति को और स्पष्ट कर दिया है कि हत्यारोपी किसी भी हाल में मृतक की संपत्ति का वारिस नहीं हो सकता।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">यह मामला उस समय चर्चा में आया जब कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक आदेश को चुनौती देते हुए एक याचिका सुप्रीम कोर्ट पहुंची। विवाद बेंगलुरु की एक सिविल अदालत के फैसले से जुड़ा था</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर अलग राय सामने आई थी। सुप्रीम कोर्ट की पीठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन शामिल थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ने इस मामले की सुनवाई करते हुए साफ टिप्पणी की कि यदि किसी व्यक्ति पर मृतक की हत्या या हत्या के लिए उकसाने का आरोप है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह उस संपत्ति पर किसी भी तरह का अधिकार नहीं जता सकता।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह सिद्धांत केवल उन मामलों तक सीमित नहीं है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां वसीयत मौजूद नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उन परिस्थितियों में भी लागू होगा जहां वसीयत के जरिए संपत्ति का बंटवारा किया गया हो। यहां तक कि अगर मामला अदालत में विचाराधीन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब भी आरोपी को संपत्ति से लाभ लेने का अधिकार नहीं मिलेगा। यह टिप्पणी कानून की व्याख्या के साथ-साथ नैतिकता और न्याय के सिद्धांतों को भी मजबूत करती है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">1956 की धारा 25 इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह प्रावधान स्पष्ट रूप से कहता है कि जो व्यक्ति किसी हिंदू की हत्या करता है या हत्या में सहायता करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह उस व्यक्ति की संपत्ति का उत्तराधिकारी नहीं बन सकता। यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि कोई व्यक्ति अपने ही अपराध का लाभ न उठा सके।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">कानून यह भी स्पष्ट करता है कि केवल हत्यारे को ही संपत्ति से वंचित किया जाता है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि उसकी संतानों को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि वे अपराध में शामिल नहीं हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उत्तराधिकार से नहीं रोका जाता। इसका मतलब यह है कि अपराध का दंड व्यक्तिगत स्तर पर सीमित रहता है और निर्दोष परिवार के सदस्यों को इसका नुकसान नहीं पहुंचाया जाता।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">इस फैसले के पीछे न्यायालय का तर्क केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक न्याय से भी जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि इस तरह के मामलों में </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">‘<span lang="hi" xml:lang="hi">पब्लिक पॉलिसी</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">और नैतिक मूल्यों को प्राथमिकता दी जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता बनी रहे और कोई भी व्यक्ति अपने अपराध से लाभ न उठा सके।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे कई मामलों के लिए दिशा-निर्देशक साबित होगा</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां संपत्ति विवाद और आपराधिक आरोप एक साथ जुड़े होते हैं। अदालत का यह रुख समाज में यह संदेश भी देता है कि कानून केवल अधिकार नहीं देता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि जिम्मेदारी और नैतिकता को भी बराबर महत्व देता है।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्पेशल खबरें</category>
                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 10 May 2026 15:10:11 +0530</pubDate>
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