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                <title>Judiciary - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Judiciary RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान हंगामा, अभद्र व्यवहार पर याचिका खारिज</title>
                                    <description><![CDATA[सुनवाई के दौरान वकील ने कोर्ट की गरिमा का उल्लंघन किया, सुरक्षा कर्मियों ने बाहर निकाला; अदालत ने अवमानना की कार्रवाई से परहेज करते हुए याचिका खारिज की]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/uproar-during-hearing-in-supreme-court-petition-on-indecent-behavior/article-58413"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/supreme-court-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">देश की सर्वोच्च अदालत में शुक्रवार को एक सुनवाई के दौरान ऐसा घटनाक्रम देखने को मिला जिसने कुछ समय के लिए कोर्ट रूम का माहौल पूरी तरह बदल दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता वकील ने अदालत में अभद्र व्यवहार किया। सुनवाई के दौरान उन्होंने न केवल आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया बल्कि अदालत की कार्यवाही के बीच फाइल भी उछाल दी। स्थिति बिगड़ने पर सुरक्षा कर्मियों को हस्तक्षेप करना पड़ा और संबंधित वकील को कोर्ट रूम से बाहर ले जाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ के समक्ष आया जिसमें जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे सुनवाई कर रहे थे। याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर की गई थी और याचिकाकर्ता स्वयं अधिवक्ता के रूप में अपना पक्ष रख रहे थे। शुरुआत से ही उनका रवैया आक्रामक बताया गया। अदालत की कार्यवाही के दौरान उन्होंने लगातार ऊंची आवाज में अपनी बात रखी और न्यायालय की प्रक्रिया पर असंतोष जताया। सुनवाई के दौरान स्थिति तब गंभीर हो गई जब उन्होंने अदालत में आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया और गुस्से में केस से जुड़े दस्तावेज हवा में उछाल दिए। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से कुछ क्षणों के लिए कोर्ट रूम में मौजूद सभी लोग स्तब्ध रह गए। न्यायिक कार्यवाही के दौरान इस तरह के व्यवहार को देखते हुए सुरक्षा कर्मी तुरंत सक्रिय हुए और संबंधित वकील को अदालत कक्ष से बाहर ले गए, जिससे आगे की कार्यवाही शांतिपूर्वक जारी रह सके।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, वकील ने सुनवाई के दौरान न्यायालय से एक विशेष आदेश जारी करने की मांग की थी। उन्होंने कथित रूप से कहा कि संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। इस पर पीठ ने उनसे सवाल किया कि क्या वे अदालत को आदेश दे रहे हैं। इसके बाद माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया। वकील ने अपनी बात दोहराने के बाद दस्तावेज फेंक दिए और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। घटना के दौरान कोर्ट रूम में मौजूद कई अधिवक्ता और अन्य लोग कुछ समय के लिए असहज हो गए। अचानक हुए इस घटनाक्रम के कारण कार्यवाही कुछ देर के लिए प्रभावित हुई, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था सक्रिय रहने से स्थिति जल्द सामान्य हो गई। अदालत ने शांति बनाए रखते हुए सुनवाई आगे बढ़ाई।</p>
<p style="text-align:justify;">घटना के बाद जस्टिस के. वी. विश्वनाथन ने कहा कि संबंधित व्यक्ति स्पष्ट रूप से मानसिक और भावनात्मक दबाव में दिखाई दे रहे थे। उन्होंने कहा कि अदालत को उनके प्रति सहानुभूति है और इस पूरे घटनाक्रम को हताशा के रूप में देखा जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से दंडित करना नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को निष्पक्ष और संतुलित बनाए रखना है। महत्वपूर्ण बात यह रही कि अदालत ने इस मामले में वकील के खिलाफ तत्काल अवमानना की कार्रवाई करने का निर्णय नहीं लिया। हालांकि, पीठ ने याचिका के गुण-दोष पर विचार करने के बाद स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड का अवलोकन करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं पाया गया। इसी कारण विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया गया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 16:32:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: 'वर्दी पुलिस की, लेकिन दिल अपराधियों के साथ', DGP को एक महीने में सर्कुलर जारी करने का आदेश</title>
                                    <description><![CDATA[गिरफ्तारी के लिखित कारण नहीं बताने पर जताई कड़ी नाराजगी, कहा- ऐसी लापरवाही से अपराधियों को मिलता है कानूनी फायदा; सभी थाना प्रभारियों और जांच अधिकारियों को चेतावनी जारी करने के निर्देश]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-courts-strict-comment-on-uniformed-police-but-with-criminals/article-58175"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/madhya-pradesh-high-court-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने पुलिस अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताते हुए राज्य के पुलिस विभाग को बड़ा संदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कुछ पुलिस अधिकारी कानून की रक्षा के लिए वर्दी पहनते जरूर हैं, लेकिन उनके कामकाज से ऐसा लगता है कि उनका झुकाव अपराधियों को बचाने की ओर है। कोर्ट ने इस तरह की लापरवाही को न्याय व्यवस्था और समाज दोनों के लिए गंभीर खतरा बताया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया है कि एक महीने के भीतर सभी थाना प्रभारियों और विवेचना अधिकारियों के लिए सख्त सर्कुलर जारी किया जाए। इस सर्कुलर में स्पष्ट रूप से बताया जाए कि किसी भी आरोपी को गिरफ्तार करते समय उसे गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में देना अनिवार्य है। यदि कोई अधिकारी ऐसा नहीं करता है तो इसे केवल प्रक्रियागत चूक नहीं, बल्कि आरोपी को कानूनी लाभ पहुंचाने की मंशा के रूप में देखा जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया कानून के दायरे में रहकर ही पूरी की जानी चाहिए। यदि पुलिस अधिकारी निर्धारित नियमों का पालन नहीं करते हैं तो इसका सीधा लाभ अपराधियों को अदालत से राहत मिलने के रूप में मिलता है। ऐसी स्थिति में न केवल जांच प्रभावित होती है बल्कि न्यायिक प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह टिप्पणी जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए की। यह याचिका धर्मेंद्र लोधी ने अपने भाई की गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए दायर की थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि पुलिस ने उसके भाई को गिरफ्तार करते समय गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में नहीं बताए, इसलिए गिरफ्तारी को अवैध माना जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान अदालत ने पूरे मामले के रिकॉर्ड का विस्तार से परीक्षण किया। जांच में सामने आया कि संबंधित आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज था और पुलिस ने उसे धारा 50 के तहत आवश्यक लिखित नोटिस दिया था। आरोपी के कब्जे से करीब 86.850 किलोग्राम गांजा भी बरामद किया गया था। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने गिरफ्तारी को वैध माना और याचिका खारिज कर दी।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि अदालत ने यह भी माना कि कई मामलों में पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी की अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं करते। यही वजह है कि कई गंभीर मामलों में आरोपी तकनीकी आधार पर अदालत से राहत हासिल कर लेते हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस की ओर से गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में नहीं दिए जाते तो यह केवल साधारण लापरवाही नहीं मानी जाएगी, बल्कि यह माना जाएगा कि संबंधित अधिकारी ने जानबूझकर ऐसी चूक की ताकि आरोपी को कानूनी फायदा मिल सके।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस मुख्यालय भोपाल की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन में पुलिस मुख्यालय ने इसी वर्ष 13 फरवरी 2026 को एक सर्कुलर जारी किया था, जिसमें गिरफ्तारी की प्रक्रिया से जुड़े स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कई थाना प्रभारी और विवेचना अधिकारी इन निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। अदालत ने इसे गंभीर प्रशासनिक विफलता माना।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस की जिम्मेदारी केवल अपराध दर्ज करना नहीं है, बल्कि कानून के अनुरूप जांच करना और दोषियों के खिलाफ मजबूत केस तैयार करना भी है। यदि जांच अधिकारी ही नियमों की अनदेखी करेंगे तो अपराधियों को सजा दिलाना मुश्किल हो जाएगा और जनता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर पड़ेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि पुलिस विभाग को ऐसे अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए, जो लापरवाही या जानबूझकर की गई चूक के कारण अपराधियों को राहत दिलाने का रास्ता तैयार करते हैं। कोर्ट ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में विभागीय कार्रवाई भी जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई अधिकारी कानून की अनदेखी करने का साहस न कर सके।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया कि सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों, थाना प्रभारियों और जांच अधिकारियों तक यह संदेश स्पष्ट रूप से पहुंचाया जाए कि गिरफ्तारी के समय कानूनी प्रक्रिया का पालन हर हाल में किया जाना चाहिए। यदि किसी अधिकारी की ओर से दोबारा ऐसी लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस फैसले को पुलिस व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत की यह टिप्पणी भविष्य में पुलिस जांच की गुणवत्ता सुधारने और गिरफ्तारी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है। साथ ही इससे उन मामलों में भी कमी आएगी, जहां तकनीकी खामियों के कारण आरोपी अदालत से राहत पाने में सफल हो जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब पुलिस मुख्यालय पर जिम्मेदारी होगी कि वह निर्धारित समय सीमा के भीतर नया सर्कुलर जारी कर सभी अधिकारियों को कानून के प्रावधानों का सख्ती से पालन कराने की व्यवस्था सुनिश्चित करे। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत के निर्देशों का जमीनी स्तर पर कितना प्रभाव दिखाई देता है और पुलिस व्यवस्था में किस तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 13:19:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>हनीमून मर्डर केस: सुप्रीम कोर्ट ने सोनम रघुवंशी की जमानत पर रोक से किया इनकार</title>
                                    <description><![CDATA[मेघालय सरकार की याचिका पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश पर सवाल जरूर उठाए, लेकिन पहले से रिहा हो चुकी सोनम की जमानत तत्काल रद्द करने से इनकार किया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/honeymoon-murder-case-supreme-court-refuses-to-stay-bail-of/article-57833"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/sonam-raghuvanshi.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">राजा रघुवंशी हत्याकांड में आरोपी सोनम रघुवंशी को मिली जमानत पर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया है। मेघालय सरकार ने इस मामले में मेघालय हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत सोनम को जमानत दी गई थी। गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले के कुछ पहलुओं पर सवाल जरूर उठाए, लेकिन यह भी माना कि सोनम पहले ही जेल से रिहा हो चुकी हैं और ट्रायल कोर्ट की ओर से तय की गई शर्तों का पालन करते हुए फिलहाल शिलांग में रह रही हैं। अदालत ने फिलहाल उनकी जमानत रद्द करने या उस पर रोक लगाने का कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया। यह मामला वर्ष 2025 में सामने आए चर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड से जुड़ा है। आरोप है कि मेघालय में हनीमून के दौरान राजा रघुवंशी की हत्या कर दी गई थी। इस मामले में उनकी पत्नी सोनम रघुवंशी, उनके कथित प्रेमी और अन्य आरोपियों को जांच के बाद गिरफ्तार किया गया था। इस केस ने देशभर में काफी सुर्खियां बटोरी थीं और जांच एजेंसियों की कार्रवाई लगातार चर्चा में रही।</p>
<p class="isSelectedEnd">सुनवाई के दौरान मेघालय सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट और निचली अदालतों ने पहले ही सोनम के खिलाफ प्रथम दृष्टया पर्याप्त आधार पाए थे। उन्होंने अदालत को बताया कि सोनम की जमानत याचिका पहले तीन बार खारिज हो चुकी थी। अभियोजन पक्ष ने यह भी कहा कि जांच के दौरान इस बात की आशंका जताई गई थी कि यदि उन्हें राहत दी जाती है तो वह फरार हो सकती हैं, गवाहों को प्रभावित कर सकती हैं या साक्ष्यों से छेड़छाड़ कर सकती हैं। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को लेकर कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। जस्टिस एमएम सुंदरेश ने सुनवाई के दौरान पूछा कि यदि पहले तथ्यों के आधार पर जमानत याचिकाएं खारिज हो चुकी थीं, तो बाद में केवल तकनीकी आधार पर राहत देना किस हद तक उचित माना जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि पहली नजर में हाई कोर्ट के आदेश के कुछ पहलुओं पर अदालत की आपत्तियां हैं। हालांकि पीठ ने इस बात को भी ध्यान में रखा कि सोनम पहले ही रिहा हो चुकी हैं और फिलहाल अदालत द्वारा तय सभी शर्तों का पालन कर रही हैं। ऐसे में तत्काल उनकी जमानत पर रोक लगाने की जरूरत नहीं समझी गई। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई जारी रखने का फैसला किया है और आगे विस्तृत सुनवाई में दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार किया जाएगा।</p>
<p>इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू गिरफ्तारी के दौरान दर्ज की गई कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा रहा। रिकॉर्ड के अनुसार सोनम रघुवंशी को 27 अप्रैल को जमानत मिली थी और इस फैसले में गिरफ्तारी से जुड़े दस्तावेजों में हुई एक गंभीर त्रुटि अहम कारण बनी। मामला भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 103 के तहत दर्ज किया गया था, जो हत्या के अपराध से संबंधित है। लेकिन जब सोनम को गिरफ्तारी के आधार बताए गए तो दस्तावेजों में बीएनएस की धारा 403(1) का उल्लेख किया गया। अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि बीएनएस में धारा 403(1) का कोई अस्तित्व ही नहीं है। जांच में यह भी सामने आया कि यही त्रुटि केवल एक दस्तावेज तक सीमित नहीं थी, बल्कि गिरफ्तारी मेमो, गिरफ्तारी चेकलिस्ट, निरीक्षण मेमो, अधिकारों की जानकारी से जुड़े रिकॉर्ड और केस डायरी सहित कई दस्तावेजों में दोहराई गई थी। हाई कोर्ट ने माना था कि किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों और गिरफ्तारी के वास्तविक आधार की स्पष्ट जानकारी देना उसका संवैधानिक और कानूनी अधिकार है। अदालत ने अभियोजन पक्ष की इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि यह केवल क्लर्क की साधारण गलती थी। हाई कोर्ट का मानना था कि कई दस्तावेजों में एक जैसी त्रुटि होना गंभीर प्रक्रिया संबंधी कमी को दर्शाता है। इसी आधार पर सोनम को जमानत दी गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट इस आदेश की वैधता और उससे जुड़े कानूनी पहलुओं की विस्तार से समीक्षा करेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 11:51:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>छत्तीसगढ़ न्यायपालिका में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, 17 न्यायिक अधिकारियों के तबादले</title>
                                    <description><![CDATA[अजय सिंह राजपूत बने NIA कोर्ट के स्पेशल जज, ओमप्रकाश जायसवाल को हाईकोर्ट में रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) की जिम्मेदारी; कई जिलों में जिला एवं सत्र न्यायाधीशों के पदों पर बदलाव]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/major-administrative-reshuffle-in-chhattisgarh-judiciary-transfer-of-17-judicial/article-57783"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/chhattisgarh-high-court-(8).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य की न्यायिक व्यवस्था में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल करते हुए उच्च न्यायिक सेवा संवर्ग के 17 न्यायिक अधिकारियों के तबादले और नई पदस्थापनाओं के आदेश जारी किए हैं। रजिस्ट्रार जनरल की ओर से जारी इस आदेश के तहत जिला एवं सत्र न्यायाधीश, अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, विशेष न्यायालयों के न्यायाधीशों और हाईकोर्ट में पदस्थ कई वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारियों में बदलाव किया गया है। न्यायपालिका में इस व्यापक प्रशासनिक पुनर्गठन को न्यायिक कार्यों की बेहतर निगरानी, प्रशासनिक संतुलन और मामलों के प्रभावी निपटारे की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">जारी आदेश के अनुसार, जगदलपुर के प्रथम जिला एवं सत्र न्यायाधीश अजय सिंह राजपूत को अब स्पेशल जज (NIA कोर्ट), जगदलपुर की जिम्मेदारी सौंपी गई है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) से जुड़े संवेदनशील मामलों की सुनवाई करने वाली इस अदालत में उनकी नियुक्ति को अहम माना जा रहा है। वहीं, हाईकोर्ट लीगल सर्विस कमेटी के सचिव ओमप्रकाश जायसवाल को हाईकोर्ट में रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) नियुक्त किया गया है। न्यायिक प्रशासन और अदालतों के संचालन में रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा, बलौदाबाजार के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश अब्दुल जाहिद कुरैशी को हाईकोर्ट में रजिस्ट्रार (विजिलेंस) नियुक्त किया गया है। यह पद न्यायिक व्यवस्था में अनुशासन, निगरानी और प्रशासनिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। वहीं, बलौदाबाजार के प्रथम जिला एवं सत्र न्यायाधीश राकेश कुमार वर्मा को छत्तीसगढ़ न्यायिक अकादमी, बिलासपुर में एडिशनल डायरेक्टर बनाया गया है, जहां वे न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण और क्षमता विकास से जुड़े कार्यों की जिम्मेदारी संभालेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने बिलासपुर, रायपुर, बलरामपुर, सारंगढ़ और अन्य जिलों में भी कई महत्वपूर्ण नियुक्तियां की हैं। द्वितीय जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बिलासपुर रूपनारायण पात्रे को हाईकोर्ट लीगल सर्विस कमेटी का सचिव नियुक्त किया गया है। वहीं, सिद्धार्थ अग्रवाल को द्वितीय अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, जगदलपुर से पदोन्नत करते हुए प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, जगदलपुर बनाया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी प्रकार किरण कुमार जांगड़े को प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बलरामपुर-रामानुजगंज नियुक्त किया गया है। विनय कुमार प्रधान को एफटीसी (POCSO), रायपुर से रायपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट में पदस्थ किया गया है। वहीं, डमरूधर चौहान को षष्ठम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रायपुर से स्थानांतरित कर दशम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रायपुर बनाया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">तबादला सूची में कई वरिष्ठ अधिकारियों के नए दायित्व भी तय किए गए हैं। विनिता वारनेर को प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, सूरजपुर से बलौदाबाजार भेजा गया है। वहीं, थामस एक्का को प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, सूरजपुर से प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, सूरजपुर नियुक्त किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्पेशल जज (NIA), जगदलपुर के पद पर कार्यरत संगीता नवीन तिवारी को प्रथम जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बलौदाबाजार बनाया गया है। डॉ. मनोज कुमार प्रजापति को प्रथम जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बलरामपुर-रामानुजगंज से सारंगढ़ स्थानांतरित किया गया है। अमित राठौर को द्वितीय अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, सारंगढ़ से रायपुर भेजा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा, हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) पद पर कार्यरत सुमित कपूर को जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रायपुर नियुक्त किया गया है। वहीं, छत्तीसगढ़ न्यायिक अकादमी के एडिशनल डायरेक्टर अमित कुमार कोहली को प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बलरामपुर-रामानुजगंज की जिम्मेदारी दी गई है। इन नियुक्तियों को न्यायिक अनुभव और प्रशासनिक दक्षता के आधार पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की ओर से जारी यह आदेश आधिकारिक वेबसाइट पर भी अपलोड कर दिया गया है। संबंधित अधिकारियों को निर्धारित समय के भीतर अपने नए पदस्थापन स्थल पर कार्यभार ग्रहण करने के निर्देश दिए गए हैं। न्यायिक प्रशासन से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि समय-समय पर इस तरह के स्थानांतरण से न्यायिक व्यवस्था में कार्यकुशलता बढ़ती है और विभिन्न जिलों में लंबित मामलों के प्रभावी निपटारे में भी सहायता मिलती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 18:26:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>महिला जज को धमकियों पर हाईकोर्ट सख्त, ACS गृह और DGP से मांगा हलफनामा</title>
                                    <description><![CDATA[गौहत्या से जुड़े चर्चित मामले में उम्रकैद की सजा सुनाने के बाद मिली जान से मारने की धमकियों पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से सुरक्षा इंतजामों का पूरा ब्यौरा मांगा, अगली सुनवाई 9 जुलाई को होगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-strict-on-threats-to-female-judge-seeks-affidavit/article-57651"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/woman-judge-threats.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">गौहत्या से जुड़े बहुचर्चित मामले में 14 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाने वाली सिवनी मालवा की महिला न्यायिक अधिकारी को मिल रही जान से मारने की धमकियों पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस मामले को बेहद गंभीर मानते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया है और गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) तथा पुलिस महानिदेशक (DGP) को शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने पूछा है कि महिला न्यायिक अधिकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अब तक कौन-कौन से ठोस कदम उठाए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 9 जुलाई को निर्धारित की गई है। न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से जुड़े इस घटनाक्रम ने एक बार फिर न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला अगस्त 2022 में हुई उस घटना से जुड़ा है, जिसने पूरे प्रदेश में काफी चर्चा बटोरी थी। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक महाराष्ट्र के अमरावती जा रहे एक ट्रक को नर्मदापुरम जिले के सिवनी मालवा क्षेत्र के बराखड़ गांव के पास रोक लिया गया था। ट्रक में करीब 30 मवेशी मौजूद थे। इसके बाद मौके पर ग्रामीणों और गो-रक्षकों की भीड़ जमा हो गई। आरोप है कि भीड़ ने ट्रक में सवार तीन लोगों के साथ लाठी-डंडों से मारपीट की, जिसमें नाजिर अहमद की मौत हो गई थी। इस मामले की सुनवाई अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान की अदालत में चल रही थी। सुनवाई पूरी होने के बाद 12 जून को अदालत ने 14 आरोपियों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। फैसले के बाद न्यायालय परिसर का माहौल भी तनावपूर्ण हो गया था। बताया गया कि जब पुलिस दोषियों को जेल ले जाने की प्रक्रिया पूरी कर रही थी, उसी दौरान अदालत परिसर में हंगामा हुआ और सुरक्षा व्यवस्था बढ़ानी पड़ी।</p>
<p style="text-align:justify;">फैसले के कुछ समय बाद ही सोशल मीडिया पर महिला न्यायिक अधिकारी को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां सामने आने लगीं। अधिकारियों के अनुसार कई प्लेटफॉर्म पर सांप्रदायिक माहौल बनाने की कोशिश करते हुए न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया। कुछ पोस्ट में जान से मारने की धमकियां भी दी गईं। मामला सामने आने के बाद पुलिस ने दो फेसबुक उपयोगकर्ताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और आपत्तिजनक सामग्री हटाने की प्रक्रिया भी शुरू की। हालांकि लगातार सामने आ रहे संदेशों और धमकियों को देखते हुए न्यायिक अधिकारी की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई। न्यायपालिका से जुड़े कई लोगों ने भी इस तरह की घटनाओं को गंभीर बताते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की। इसी दौरान वर्ष 2016 से लंबित न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस पूरे मामले का स्वतः संज्ञान लिया। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की पीठ ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी। अदालत ने कहा कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी को न्यायिक दायित्व निभाने के कारण धमकियां मिलती हैं तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि पूरी न्यायिक व्यवस्था की सुरक्षा और स्वतंत्रता से जुड़ा विषय है। ऐसे मामलों में राज्य की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता प्रशांत सिंह और उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने अदालत को बताया कि महिला न्यायिक अधिकारी को 1-5 श्रेणी की सशस्त्र सुरक्षा उपलब्ध करा दी गई है। इसके अलावा सोशल मीडिया पर प्रसारित आपत्तिजनक पोस्ट और धमकी भरे संदेशों को हटाने के लिए संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय किया जा रहा है। पुलिस की ओर से मामले की जांच जारी है और जिन लोगों की पहचान हुई है, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है। अदालत ने इन जानकारियों को रिकॉर्ड पर लिया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि केवल मौखिक जानकारी पर्याप्त नहीं होगी। इसलिए गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को शपथपत्र के माध्यम से यह बताना होगा कि सुरक्षा के लिए अब तक कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं और भविष्य में क्या व्यवस्था की गई है। हाईकोर्ट ने अपने निर्देशों में यह भी संकेत दिया कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि न्यायाधीश कानून के अनुसार स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय देते हैं। यदि फैसलों के बाद उन्हें धमकियों का सामना करना पड़े और पर्याप्त सुरक्षा न मिले तो इसका असर न्यायिक व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। इसलिए ऐसे मामलों में राज्य सरकार को संवेदनशीलता और तत्परता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए। अदालत अब 9 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई में सरकार की ओर से दाखिल शपथपत्र का परीक्षण करेगी। माना जा रहा है कि इस सुनवाई में न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर आगे के निर्देश भी जारी किए जा सकते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 13:40:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी, आपसी सहमति से बने संबंध को रेप नहीं माना</title>
                                    <description><![CDATA[लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले बालिगों के मामले में हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा, कहा- केवल शादी से इनकार करना दुष्कर्म नहीं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/important-comment-of-chhattisgarh-high-court-consensual-relationship-is-not/article-57417"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-high-court-(6).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुष्कर्म से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि यदि दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं और उनके बीच शारीरिक संबंध आपसी सहमति से बने हैं, तो बाद में पुरुष द्वारा शादी से इनकार करने मात्र से उसे दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों का निर्णय केवल किसी एक बयान या आरोप के आधार पर नहीं, बल्कि पूरे संबंध की प्रकृति, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। यह फैसला छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की खंडपीठ ने सुनाया, जिसमें जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास शामिल थे। अदालत ने सरगुजा की फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के आदेश को सही ठहराते हुए महिला की अपील खारिज कर दी। हाई कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक साथ रहने वाले बालिग व्यक्तियों के बीच बने शारीरिक संबंधों को सामान्य परिस्थितियों में सहमति से बना संबंध माना जा सकता है, जब तक कि उपलब्ध साक्ष्य इसके विपरीत स्पष्ट रूप से संकेत न दें। मामले के अनुसार शिकायतकर्ता महिला भिलाई नगर निगम में प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत थीं। उन्होंने अपनी शिकायत में बताया था कि वर्ष 2019 में रायपुर में एमबीए की पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात आरोपी से हुई थी। दोनों के बीच निकटता बढ़ी और बाद में वे लगभग दो वर्षों तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे। महिला का आरोप था कि आरोपी ने उनसे शादी करने का वादा किया था और इसी भरोसे पर दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">शिकायत में महिला ने आगे कहा कि एमबीए पूरा होने के बाद आरोपी ने शादी की बात टालनी शुरू कर दी। बाद में उसने कथित रूप से यह कहा कि उसके परिवार वाले इस विवाह के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि महिला उम्र में उससे बड़ी हैं, तलाकशुदा हैं और ईसाई समुदाय से संबंध रखती हैं। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि 28 नवंबर 2021 को जब वह शादी की बात करने आरोपी के घर पहुंचीं तो वहां उनके साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए गए। इसी आधार पर उन्होंने दुष्कर्म और अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज कराया। मामले की सुनवाई पहले सरगुजा की फास्ट ट्रैक कोर्ट में हुई थी। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयान के आधार पर आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। इसके बाद महिला ने इस फैसले को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड, गवाहों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों का विस्तृत परीक्षण किया। खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि केवल यह तथ्य कि दोनों विवाह करना चाहते थे, इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि उनके बीच बने शारीरिक संबंध केवल शादी के वादे के कारण ही स्थापित हुए थे। अदालत ने कहा कि जब दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक एक साथ रहते हैं तो यह माना जा सकता है कि वे अपने संबंधों और उनके संभावित परिणामों से पूरी तरह परिचित थे। ऐसे मामलों में प्रत्येक परिस्थिति का अलग-अलग मूल्यांकन करना आवश्यक होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि न्यायालयों को इस प्रकार के मामलों को केवल तकनीकी या संकीर्ण कानूनी दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए। किसी भी मामले में संबंध की अवधि, दोनों पक्षों का व्यवहार, परिस्थितियां और उपलब्ध साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अदालत ने कहा कि यदि लंबे समय तक दोनों की सहमति से संबंध रहे हों, तो बाद में विवाह न होने की स्थिति को स्वतः दुष्कर्म का मामला नहीं माना जा सकता। फैसले के दौरान हाई कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2013 के एक निर्णय का भी उल्लेख किया। अदालत ने कैनी राजन बनाम केरल राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि सहमति का अर्थ केवल मौन स्वीकृति या आत्मसमर्पण नहीं होता, बल्कि यह सोच-समझकर लिया गया स्वतंत्र निर्णय होता है। न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक मामले में यह देखना आवश्यक है कि सहमति किन परिस्थितियों में दी गई थी और क्या उसके पीछे किसी प्रकार का छल या दबाव था। हाई कोर्ट ने मेडिकल साक्ष्यों पर भी विचार किया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध चिकित्सकीय रिपोर्ट में दुष्कर्म की स्पष्ट पुष्टि नहीं हुई। साथ ही रिपोर्ट में दर्ज चोटों और कथित घटना के समय के बीच भी स्पष्ट सामंजस्य नहीं पाया गया। अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य अभियोजन के आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 15:41:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राम मंदिर चढ़ावा मामले में सुप्रीम कोर्ट की तत्काल सुनवाई से इनकार, छुट्टियों के बाद होगी सुनवाई</title>
                                    <description><![CDATA[चढ़ावे में कथित गड़बड़ी की जांच के लिए सीबीआई जांच की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- इतनी जल्द सुनवाई की जरूरत क्या है?]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/supreme-court-refuses-to-give-immediate-hearing-in-ram-temple/article-57320"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/ram-mandir-donation-case-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे में कथित गड़बड़ी और हेरफेर के आरोपों से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया है। अदालत ने याचिकाकर्ता की जल्द सुनवाई की मांग स्वीकार नहीं की और स्पष्ट किया कि मामले की सुनवाई अब न्यायालय की छुट्टियां समाप्त होने के बाद नियमित प्रक्रिया के तहत होगी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद फिलहाल इस मामले में किसी प्रकार की तत्काल न्यायिक कार्रवाई नहीं होगी। याचिका में राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर मंदिर में आने वाले चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ता का दावा है कि चढ़ावे की राशि और उससे जुड़े वित्तीय रिकॉर्ड में कथित अनियमितताएं हुई हैं। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई कि मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की अगुवाई में गठित विशेष जांच दल से कराई जाए। साथ ही यह भी अनुरोध किया गया कि पूरी जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में तय समय सीमा के भीतर पूरी कराई जाए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से इस मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने की मांग की गई। उनका तर्क था कि मामला सार्वजनिक आस्था और करोड़ों श्रद्धालुओं से जुड़ा है, इसलिए इसमें देरी नहीं होनी चाहिए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील से सहमति नहीं जताई। अदालत ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि आखिर इस मामले में इतनी जल्द सुनवाई की आवश्यकता क्या है। अदालत की इस टिप्पणी के बाद तत्काल सुनवाई की मांग खारिज कर दी गई। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख का मतलब यह नहीं है कि याचिका खारिज कर दी गई है। अदालत ने केवल तत्काल सुनवाई से इनकार किया है। अब यह मामला न्यायालय की नियमित प्रक्रिया के अनुसार सूचीबद्ध होने के बाद सुना जाएगा। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय आमतौर पर उन्हीं मामलों में तत्काल सुनवाई करता है, जहां किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों पर तत्काल प्रभाव पड़ रहा हो या स्थिति अत्यंत आपातकालीन हो। अन्य मामलों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत सूचीबद्ध किया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">याचिका में यह भी मांग की गई है कि यदि प्रारंभिक जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। साथ ही मंदिर में चढ़ावे के संग्रह, लेखा-जोखा और उपयोग की पूरी व्यवस्था की स्वतंत्र जांच कराई जाए, ताकि भविष्य में किसी प्रकार की पारदर्शिता संबंधी शंका न रहे। हालांकि इन आरोपों पर अभी तक अदालत की ओर से कोई टिप्पणी नहीं की गई है और न ही आरोपों की सत्यता पर कोई न्यायिक निष्कर्ष सामने आया है।मामले को लेकर राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की ओर से भी अभी तक कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं आई है। कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ने के बाद ही ट्रस्ट की ओर से अदालत में जवाब दाखिल किया जा सकता है। ऐसे मामलों में अदालत दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद ही आगे की कार्रवाई तय करती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राम मंदिर देश की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक परियोजनाओं में से एक है और यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर निर्माण के बाद से चढ़ावे की राशि में लगातार वृद्धि हुई है। ऐसे में चढ़ावे के प्रबंधन और लेखा प्रणाली को लेकर समय-समय पर सार्वजनिक चर्चा भी होती रही है। हालांकि किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता का आरोप तभी कानूनी रूप से स्थापित माना जाएगा, जब जांच एजेंसियां या अदालत उसके संबंध में कोई निष्कर्ष दें। अदालत का तत्काल सुनवाई से इनकार करना किसी पक्ष के पक्ष या विपक्ष में फैसला नहीं माना जा सकता। यह केवल न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। यदि अदालत को सुनवाई के दौरान प्रथम दृष्टया जांच की आवश्यकता महसूस होती है तो वह संबंधित एजेंसियों को निर्देश दे सकती है। फिलहाल ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया गया है। इस बीच याचिका को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी चर्चा तेज हो गई है। कुछ लोग मामले की स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं, जबकि अन्य का कहना है कि बिना जांच पूरी हुए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में तथ्यों और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करना आवश्यक है ताकि किसी तरह की भ्रम की स्थिति पैदा न हो।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 16:57:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>वक्फ संपत्ति विवाद में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- ऐसे मामलों की सुनवाई ट्रिब्यूनल ही करेगा</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वक्फ संपत्ति पर कथित अवैध निर्माण से जुड़ी याचिका पर सुनवाई से किया इनकार, ट्रिब्यूनल को दो महीने में फैसला करने का निर्देश]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/high-courts-big-decision-in-waqf-property-dispute-said/article-57132"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/waqf-property-dispute.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वक्फ संपत्तियों से जुड़े विवादों की सुनवाई को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों के निपटारे के लिए वक्फ ट्रिब्यूनल ही सक्षम और वैधानिक मंच है। अदालत ने कहा कि जब वक्फ अधिनियम के तहत विवादों के समाधान के लिए विशेष व्यवस्था उपलब्ध है, तब सीधे हाईकोर्ट में हस्तक्षेप करना उचित नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मामला पहले से ट्रिब्यूनल के समक्ष लंबित है तो वहीं उसकी सुनवाई होगी और उसी मंच पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने संबंधित ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया है कि लंबित मामले का कानून के अनुसार दो महीने के भीतर निपटारा किया जाए। मामले की सुनवाई जस्टिस ए.के. प्रसाद की एकल पीठ में हुई। याचिकाकर्ता मोहम्मद अजमल खान ने कवर्धा स्थित जामा मस्जिद मुस्लिम ट्रस्ट की वक्फ संपत्ति पर कथित अवैध निर्माण को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में आरोप लगाया गया कि वक्फ संपत्ति के मुतवल्ली यानी प्रबंधक की ओर से नियमों के विपरीत निर्माण कराया जा रहा है, जिससे वक्फ संपत्ति के प्रबंधन और उपयोग को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) ने कथित अवैध निर्माण को रोकने के लिए पहले ही आदेश जारी किए थे। इसके बावजूद जिला प्रशासन की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। उनका कहना था कि आदेश जारी होने के बाद भी निर्माण को रोकने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए गए, जिसके कारण उन्हें न्याय के लिए अदालत की शरण लेनी पड़ी। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता पहले ही वक्फ अधिनियम की धारा 83(2) के तहत वक्फ ट्रिब्यूनल में आवेदन प्रस्तुत कर चुके थे। हालांकि उस समय ट्रिब्यूनल में आवश्यक कोरम उपलब्ध नहीं होने के कारण मामले की सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी थी। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की थी। मामले में राज्य सरकार और वक्फ बोर्ड की ओर से अदालत में कहा गया कि वक्फ अधिनियम के तहत इस प्रकार के विवादों के निपटारे के लिए विशेष रूप से ट्रिब्यूनल का गठन किया गया है। अब ट्रिब्यूनल पूरी तरह कार्यशील है और संबंधित मामला पहले से वहीं लंबित है। इसलिए हाईकोर्ट को इस स्तर पर हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। उनका तर्क था कि जब कानून ने किसी विशेष विवाद के लिए अलग मंच निर्धारित किया है तो उसी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और वक्फ बोर्ड के तर्कों से सहमति जताई। अदालत ने कहा कि वक्फ अधिनियम में स्पष्ट रूप से ट्रिब्यूनल को ऐसे मामलों की सुनवाई और निर्णय का अधिकार दिया गया है। इसलिए हाईकोर्ट समानांतर रूप से इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा। अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे अपना पक्ष वक्फ ट्रिब्यूनल के समक्ष ही रखें। साथ ही हाईकोर्ट ने संबंधित वक्फ ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया कि यदि मामला अभी भी लंबित है तो कानून के अनुरूप उसकी सुनवाई कर दो महीने के भीतर निर्णय दिया जाए। अदालत ने माना कि न्याय में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए और यदि ट्रिब्यूनल अब कार्यशील है तो मामले का शीघ्र निपटारा किया जाना आवश्यक है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि उसने इस विवाद के गुण-दोष यानी मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की है। अदालत ने कहा कि मामले से जुड़े सभी तथ्य, साक्ष्य और कानूनी प्रश्न ट्रिब्यूनल के समक्ष विचार के लिए खुले रहेंगे। ट्रिब्यूनल स्वतंत्र रूप से उपलब्ध रिकॉर्ड और कानून के आधार पर अपना निर्णय देगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह फैसला भविष्य में वक्फ संपत्तियों से जुड़े विवादों के लिए महत्वपूर्ण माना जाएगा। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि जहां किसी विशेष कानून के तहत विवाद निपटाने के लिए वैधानिक मंच उपलब्ध हो, वहां सीधे हाईकोर्ट का रुख करने के बजाय पहले उसी मंच पर न्यायिक प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए। इससे न्यायिक व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ भी कम होगा और विशेष मामलों का निपटारा विशेषज्ञ मंचों के माध्यम से अधिक प्रभावी ढंग से हो सकेगा। वक्फ संपत्तियों को लेकर देश के विभिन्न राज्यों में समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों में संपत्ति के प्रबंधन, उपयोग, निर्माण कार्य और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर कई तरह के कानूनी प्रश्न उठते हैं। वक्फ अधिनियम इन्हीं विवादों के समाधान के लिए ट्रिब्यूनल की व्यवस्था करता है ताकि मामलों का त्वरित और विधिसम्मत निपटारा हो सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 27 Jun 2026 14:07:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>12 साल पुराने आदेश की अनदेखी पर हाईकोर्ट सख्त, कलेक्टर का फैसला रद्द</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्व मंडल के 2014 के आदेश का पालन नहीं होने पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी, जिम्मेदार अधिकारी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-strict-on-ignoring-12-year-old-order-collectors/article-56998"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mp-high-court-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रशासनिक लापरवाही और अदालती आदेशों की अनदेखी को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने राजस्व मंडल के करीब 12 साल पुराने आदेश का पालन नहीं किए जाने पर कड़ी नाराजगी जाहिर की। कोर्ट ने इस मामले में कलेक्टर द्वारा जारी एक आदेश को निरस्त कर दिया और आदेश के पालन में अनावश्यक देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब किसी सक्षम अदालत ने राजस्व मंडल के आदेश पर कोई रोक नहीं लगाई है, तब उसके क्रियान्वयन में वर्षों की देरी को किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने इसे प्रशासनिक उदासीनता और जवाबदेही की कमी का उदाहरण माना। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि राजस्व मंडल ने 20 मई 2014 को अपना आदेश पारित किया था, लेकिन इतने लंबे समय के बाद भी उसका प्रभावी पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारी न्यायिक आदेशों की अनदेखी नहीं कर सकते। यदि किसी आदेश पर कोई स्थगन नहीं है, तो उसका समयबद्ध तरीके से पालन करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है। अदालत ने यह भी कहा कि आदेशों के पालन में अनावश्यक देरी न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता को प्रभावित करती है और इससे आम नागरिकों का भरोसा भी कमजोर होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह पूरा मामला एडवेंचर वाइल्ड लाइफ रिजॉर्ट प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है। कंपनी की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि राजस्व मंडल के आदेश का पालन सुनिश्चित कराने के लिए पहले भी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया था। उस समय भी न्यायालय ने प्रशासन को निर्धारित समय सीमा के भीतर कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद आदेश का पालन नहीं किया गया और बाद में कलेक्टर की ओर से नया आदेश जारी कर दिया गया। रिकॉर्ड के अनुसार, हाईकोर्ट ने 7 जुलाई 2025 को प्रशासन को 45 दिनों के भीतर आवश्यक कार्रवाई पूरी करने के निर्देश दिए थे। लेकिन इसके बाद भी निर्धारित समय में आदेश लागू नहीं किया गया। इसके बजाय 27 फरवरी 2026 को कलेक्टर की ओर से एक नया आदेश जारी किया गया, जिसमें यह स्पष्ट करने की बात कही गई कि मामले में कहीं कोई अपील या अन्य कानूनी कार्यवाही लंबित तो नहीं है। न्यायालय ने इस प्रक्रिया को अनावश्यक बताया और कहा कि जब मूल आदेश पर किसी भी अदालत की ओर से रोक नहीं थी, तब इस तरह की कार्रवाई का कोई औचित्य नहीं बनता।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उपस्थित पैनल वकील ने भी अदालत के समक्ष स्वीकार किया कि राजस्व मंडल के 2014 के आदेश पर किसी भी सक्षम न्यायालय ने कोई अंतरिम राहत या स्थगन आदेश जारी नहीं किया है। इस स्वीकारोक्ति के बाद अदालत ने माना कि आदेश के पालन में हुई देरी पूरी तरह प्रशासनिक स्तर पर हुई लापरवाही का परिणाम है। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी केवल औपचारिक प्रक्रियाओं का हवाला देकर अपने दायित्व से बच नहीं सकते। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक और अर्धन्यायिक संस्थाओं द्वारा दिए गए आदेशों का सम्मान करना प्रशासनिक अधिकारियों की संवैधानिक जिम्मेदारी है। यदि किसी आदेश को चुनौती नहीं दी गई है या उस पर रोक नहीं लगी है, तो उसका तत्काल पालन किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में देरी से न केवल संबंधित पक्षों को नुकसान होता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता भी प्रभावित होती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">न्यायालय ने इस मामले में जिम्मेदार अधिकारी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाते हुए संकेत दिया कि भविष्य में इस तरह की लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत का मानना है कि जवाबदेही तय किए बिना प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है। इसलिए ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करना आवश्यक है ताकि भविष्य में न्यायालय के आदेशों के पालन में अनावश्यक देरी न हो। यह फैसला प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। इससे स्पष्ट होता है कि अदालतें अब न्यायिक आदेशों के पालन में होने वाली देरी को गंभीरता से देख रही हैं। साथ ही यह निर्णय उन लोगों के लिए भी राहत का संकेत है, जो वर्षों तक अपने अधिकारों के लिए न्यायालयों के चक्कर लगाने को मजबूर होते हैं। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायिक आदेशों के सम्मान को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। आने वाले समय में यह निर्णय ऐसे मामलों में मिसाल बन सकता है, जहां प्रशासनिक स्तर पर आदेशों के पालन में अनावश्यक देरी होती है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून के शासन में न्यायालय के आदेश सर्वोपरि हैं और उनका समय पर पालन सुनिश्चित करना हर संबंधित अधिकारी का कर्तव्य है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-strict-on-ignoring-12-year-old-order-collectors/article-56998</link>
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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 13:24:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>14 लाख सालाना कमाने वाली पत्नी को नहीं मिलेगा मेंटिनेंस, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की</title>
                                    <description><![CDATA[मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कहा- भरण-पोषण का उद्देश्य जरूरतमंद जीवनसाथी की सहायता करना है, आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति को इसका लाभ नहीं दिया जा सकता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/wife-earning-rs-14-lakh-annually-will-not-get-maintenance/article-56792"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/maintenance-case.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आर्थिक रूप से सक्षम और स्वयं पर्याप्त आय अर्जित करने वाले जीवनसाथी को अंतरिम भरण-पोषण (मेंटिनेंस) का लाभ नहीं दिया जा सकता। भोपाल निवासी एक महिला द्वारा पति से अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग को अदालत ने खारिज कर दिया। न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मांग प्रसिद्ध साहित्यिक कृति ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ में वर्णित “एक पाउंड मांस” की मांग जैसी प्रतीत होती है, जिसकी अनुमति कानून नहीं देता। मामले की सुनवाई मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की एकल पीठ में हुई। महिला ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें तलाक से जुड़े लंबित मामले के दौरान अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार किया गया था। अदालत के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों और आय संबंधी दस्तावेजों की समीक्षा के बाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही माना और महिला की याचिका खारिज कर दी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रकरण के अनुसार दंपति का विवाह 4 नवंबर 2022 को हुआ था। शादी के कुछ समय बाद ही दोनों के बीच मतभेद बढ़ गए और वर्ष 2023 से वे अलग-अलग रह रहे हैं। पति ने वैवाहिक संबंध समाप्त करने के लिए फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी। इसके बाद पत्नी ने अदालत में आवेदन प्रस्तुत कर अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग की थी। सुनवाई के दौरान महिला ने स्वीकार किया कि वह एक निजी क्षेत्र में कार्यरत हैं और नियमित वेतन प्राप्त करती हैं। प्रारंभिक चरण में महिला ने अपनी वार्षिक आय करीब 20 लाख रुपए बताई थी, जबकि पति की आय 30 लाख रुपए से अधिक होने का दावा किया गया था। बाद में महिला की ओर से कहा गया कि उनकी आय में कमी आई है और वर्तमान में वह लगभग 14 लाख रुपए सालाना कमा रही हैं। इसी आधार पर उन्होंने आर्थिक सहायता की मांग की।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हालांकि अदालत ने केवल मौखिक दावों पर भरोसा नहीं किया बल्कि वेतन संबंधी रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों की जांच की। रिकॉर्ड से सामने आया कि महिला की मासिक आय लगभग 1.25 लाख रुपए है। इस हिसाब से उनकी वार्षिक आय करीब 14.81 लाख रुपए बैठती है। न्यायालय ने माना कि यह आय किसी भी व्यक्ति के सामान्य जीवन-यापन और व्यक्तिगत खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य ऐसे जीवनसाथी को आर्थिक सहायता प्रदान करना है जो स्वयं अपना निर्वाह करने में असमर्थ हो या आर्थिक रूप से दूसरे पक्ष पर निर्भर हो। यदि कोई व्यक्ति अच्छी आय अर्जित कर रहा है और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम है तो उसे केवल इस आधार पर मेंटिनेंस नहीं दिया जा सकता कि दूसरे पक्ष की आय उससे अधिक है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि दंपति की कोई संतान नहीं है, जिसकी देखभाल का अतिरिक्त वित्तीय भार महिला पर हो। इसके अलावा पति और पत्नी की आय में भी इतना अधिक अंतर नहीं पाया गया जिससे आर्थिक निर्भरता या असमानता का गंभीर आधार बन सके। न्यायालय ने कहा कि भरण-पोषण का प्रावधान किसी आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति को अतिरिक्त लाभ पहुंचाने के लिए नहीं बनाया गया है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ का उल्लेख भी किया। अदालत ने कहा कि जिस प्रकार नाटक में एक पाउंड मांस की मांग कानूनी और नैतिक सीमाओं के कारण पूरी नहीं की जा सकती थी, उसी तरह वर्तमान मामले में भी कानून की भावना के विपरीत जाकर राहत नहीं दी जा सकती। यह टिप्पणी फैसले का सबसे चर्चित हिस्सा बन गई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है, जहां दोनों पक्ष आर्थिक रूप से सक्षम हों और फिर भी भरण-पोषण की मांग की जा रही हो। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले का निर्णय उसकी परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा, लेकिन आर्थिक आत्मनिर्भरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अंततः हाईकोर्ट ने महिला की याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के 18 फरवरी 2026 के आदेश को बरकरार रखा। न्यायालय ने दोहराया कि मेंटिनेंस का उद्देश्य जरूरतमंद जीवनसाथी की सहायता करना है। यदि कोई व्यक्ति पर्याप्त आय अर्जित कर रहा है और अपना खर्च स्वयं वहन करने में सक्षम है, तो उसे भरण-पोषण का लाभ नहीं दिया जा सकता। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 13:29:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>बस्तर में NIA की विशेष अदालत शुरू, नक्सल मामलों की सुनवाई होगी तेज</title>
                                    <description><![CDATA[जगदलपुर को मिला विशेष अधिकार क्षेत्र, लंबे समय से लंबित संवेदनशील मामलों के निपटारे की बढ़ी उम्मीद]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/nia-special-court-started-in-bastar-hearing-of-naxal-cases/article-55529"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/bastar-nia-court.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">बस्तर संभाग में नक्सल मामलों की सुनवाई को लेकर लंबे समय से चली आ रही मांग आखिरकार पूरी हो गई है। केंद्र सरकार ने जगदलपुर में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की विशेष अदालत की स्थापना को मंजूरी दे दी है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना के बाद जगदलपुर स्थित नामित अपर सत्र न्यायालय को अब एनआईए के विशेष न्यायालय के रूप में अधिसूचित किया गया है। इस फैसले को बस्तर के न्यायिक ढांचे और सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार अब राष्ट्रीय जांच एजेंसी द्वारा जांच किए गए मामलों की सुनवाई स्थानीय स्तर पर ही की जा सकेगी, जिससे वर्षों से लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आने की उम्मीद है।</p>
<p class="isSelectedEnd">बस्तर क्षेत्र लंबे समय से नक्सल हिंसा से प्रभावित रहा है। यहां हुए कई बड़े हमले और संवेदनशील घटनाएं राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनीं। ऐसे मामलों की जांच अक्सर एनआईए को सौंपी जाती रही है, लेकिन सुनवाई के लिए अलग-अलग अदालतों पर निर्भर रहना पड़ता था। इससे न्यायिक प्रक्रिया में समय अधिक लगता था और कई बार गवाहों, जांच अधिकारियों तथा पक्षकारों को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। नई व्यवस्था लागू होने के बाद इन चुनौतियों में काफी कमी आने की संभावना जताई जा रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd">गृह मंत्रालय की अधिसूचना के मुताबिक यह फैसला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय और राज्य सरकार से परामर्श के बाद लिया गया है। विशेष अदालत का अधिकार क्षेत्र बस्तर संभाग के विभिन्न जिलों तक रहेगा। इनमें दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर, कोंडागांव, कांकेर और बस्तर जिले सहित अन्य नक्सल प्रभावित क्षेत्र शामिल होंगे। बताया जा रहा है कि अदालत केवल एनआईए द्वारा जांच किए गए मामलों की सुनवाई करेगी। इससे मामलों के संचालन में विशेषज्ञता भी बढ़ेगी और प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ सकेगी।</p>
<p class="isSelectedEnd">बस्तर में कई ऐसे मामले हैं जो वर्षों से न्यायिक प्रक्रिया में लंबित हैं। झीरम घाटी हमला, भाजपा नेता भीमा मंडावी की हत्या, नारायणपुर और दंतेवाड़ा के कई नक्सली हमले जैसे मामलों को देश के सबसे संवेदनशील मामलों में गिना जाता है। इन घटनाओं में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई थी और इनके राजनीतिक तथा सुरक्षा संबंधी प्रभाव भी काफी व्यापक रहे हैं। ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालत की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। एनआईए भी समय-समय पर इस संबंध में अपनी जरूरत जाहिर कर चुकी थी।</p>
<p class="isSelectedEnd">स्थानीय स्तर पर अदालत स्थापित होने से सबसे अधिक राहत गवाहों और जांच अधिकारियों को मिलने की उम्मीद है। अब उन्हें सुनवाई के लिए दूर-दराज के शहरों की यात्रा नहीं करनी पड़ेगी। कई मामलों में गवाहों की अनुपस्थिति या समय पर पेशी नहीं हो पाने के कारण सुनवाई प्रभावित होती थी। नई अदालत के गठन से दस्तावेजों की उपलब्धता, केस डायरी की प्रस्तुति और अन्य न्यायिक प्रक्रियाएं भी पहले की तुलना में अधिक आसान हो जाएंगी। इससे मामलों के शीघ्र निपटारे की संभावना मजबूत हुई है।</p>
<p class="isSelectedEnd">नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में न्यायिक संस्थाओं की मजबूत मौजूदगी लोकतांत्रिक व्यवस्था को और मजबूत करती है। जब गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों का समयबद्ध निपटारा होता है तो लोगों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा बढ़ता है। बस्तर जैसे क्षेत्र में, जहां लंबे समय तक सुरक्षा चुनौतियां बनी रही हैं, वहां इस तरह की विशेष अदालत का गठन प्रशासनिक और न्यायिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">स्थानीय लोगों के बीच भी इस फैसले को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया देखी जा रही है। कई सामाजिक संगठनों का मानना है कि इससे न केवल लंबित मामलों को गति मिलेगी बल्कि पीड़ित परिवारों को भी न्याय मिलने की प्रक्रिया तेज होगी। वहीं सुरक्षा एजेंसियों को उम्मीद है कि विशेष अदालत के माध्यम से जांच और अभियोजन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जा सकेगा। जगदलपुर में स्थापित यह विशेष अदालत बस्तर के लिए एक नई शुरुआत के रूप में देखी जा रही है। आने वाले समय में यह अदालत नक्सल हिंसा से जुड़े मामलों की सुनवाई में कितनी तेजी ला पाती है, इस पर सबकी नजर रहेगी। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 16:08:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में समर वेकेशन पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से होगी सुनवाई, जज भी करेंगे कार पूलिंग</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने समर वेकेशन में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई का फैसला लिया। जज और अधिकारी कार पूलिंग भी करेंगे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/hearing-will-be-held-through-video-conferencing-during-summer-vacation/article-53818"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/chhattisgarh-high-court-video-conferencing.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गर्मी की बढ़ती मार और ईंधन की बचत को ध्यान में रखते हुए अपने कामकाज में बड़ा बदलाव किया है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों के बाद</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट प्रशासन ने समर वेकेशन में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मामलों की सुनवाई करने का फैसला किया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा के निर्देश पर जारी सर्कुलर के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छुट्टियों के दौरान ज्यादातर सुनवाई वर्चुअल मोड में होगी। इससे वकीलों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पक्षकारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जिन लोगों को दूर-दूर से आना पड़ता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें कोर्ट पहुंचने की जरूरत नहीं पड़ेगी। माना जा रहा है कि भीषण गर्मी और फ्यूल खपत को कम करने का यह फैसला काफी अहम है। हाईकोर्ट प्रशासन का कहना है कि तकनीक के जरिए न्यायिक प्रक्रिया को बिना किसी रुकावट के सुगम बनाया जाएगा।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">सर्कुलर में यह साफ किया गया है कि सामान्य परिस्थितियों में अदालत की कार्यवाही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से होगी</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अगर किसी वकील को तकनीकी वजह से ऑनलाइन जुड़ने में दिक्कत होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का मौका मिलेगा। जरूरत पड़ने पर कोर्ट खुद भी किसी मामले में फिजिकल सुनवाई का निर्देश दे सकता है। इसके साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट और जिला अदालतों के कर्मचारियों के लिए भी नई व्यवस्था बनाई गई है। सूत्रों के मुताबिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मचारियों को सप्ताह में दो दिन वर्क फ्रॉम होम की सुविधा दी जाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसके लिए एक रोटेशन सिस्टम रहेगा ताकि कम से कम 50 प्रतिशत कर्मचारी कार्यालय में मौजूद रहें और काम में कोई रुकावट न आए। घर से काम करने वाले कर्मचारियों को मोबाइल और अन्य सरकारी संपर्क माध्यमों पर हमेशा उपलब्ध रहना होगा। कोर्ट प्रशासन का मानना है कि इससे संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होगा और कर्मचारियों को भी राहत मिलेगी।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">इसके अलावा</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने फ्यूल बचाने के लिए व्हीकल पूलिंग को भी प्रमोट करने का निर्णय लिया है। न्यायिक अधिकारियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रजिस्ट्री अफसरों और मंत्रालयीन कर्मचारियों के लिए साझा वाहन व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव है। हाईकोर्ट के जजों से भी कार पूलिंग अपनाने की अपील की गई है। प्रशासन का कहना है कि यह कदम सिर्फ फ्यूल बचाने के लिए नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पर्यावरण की सुरक्षा और सरकारी संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग के लिए भी है। हाईकोर्ट रजिस्ट्री को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और अन्य तकनीकी व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखने के निर्देश दिए गए हैं ताकि सुनवाई में कोई समस्या न आए। लगातार बढ़ती गर्मी और फ्यूल संकट के बीच हाईकोर्ट का यह फैसला चर्चा का विषय बना हुआ है।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 20 May 2026 11:05:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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