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                <title>Lord Shiva - दैनिक जागरण</title>
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                <title>महाकाल की भस्म आरती में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, दिव्य श्रृंगार ने मोहा भक्तों का मन</title>
                                    <description><![CDATA[पंचामृत पूजन के बाद भांग, चंदन, पुष्प और रुद्राक्ष की मालाओं से हुआ बाबा महाकाल का अलौकिक श्रृंगार]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/there-was-a-flood-of-devotion-in-the-bhasma-aarti/article-56785"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mahakal-bhasma-aarti-(11).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में बुधवार तड़के आयोजित भस्म आरती के दौरान एक बार फिर आस्था और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। ब्रह्म मुहूर्त में मंदिर के कपाट खुलते ही पूरे परिसर में मंत्रोच्चार, घंटों और शंखध्वनि की गूंज सुनाई देने लगी। देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल के दर्शन कर स्वयं को धन्य महसूस किया। भस्म आरती की परंपरा के अनुसार सबसे पहले वीरभद्र भगवान को प्रणाम कर स्वस्तिवाचन किया गया और विधिवत अनुमति प्राप्त करने के बाद चांदी द्वार खोला गया। इसके साथ ही गर्भगृह में विशेष पूजा-अर्चना का क्रम शुरू हुआ।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मंदिर के पुजारियों ने सबसे पहले भगवान महाकाल के रात्रिकालीन श्रृंगार को उतारा। इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान का जलाभिषेक किया गया। परंपरानुसार दूध, दही, घी, शक्कर, शहद और विभिन्न फलों के रस से तैयार पंचामृत से भगवान महाकाल का पूजन संपन्न हुआ। गर्भगृह में मौजूद पुजारी और पुरोहितों ने वैदिक विधि-विधान के अनुसार पूजा संपन्न कराई। इस दौरान वातावरण पूरी तरह भक्तिमय बना रहा और मंदिर परिसर में मौजूद श्रद्धालु भगवान के जयकारे लगाते रहे।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भस्म आरती से पहले नंदी हॉल में भी विशेष धार्मिक अनुष्ठान किए गए। भगवान शिव के परम भक्त नंदी महाराज का स्नान, ध्यान और पूजन किया गया। मंदिर परंपरा के अनुसार नंदी पूजन के बाद ही मुख्य आरती और पूजा की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है। इसके बाद भगवान महाकाल को पंचामृत अर्पित किया गया और विभिन्न सुगंधित द्रव्यों से अभिषेक किया गया। पूजा के दौरान श्रद्धालुओं की निगाहें गर्भगृह की ओर टिकी रहीं, जहां हर दिन होने वाली यह अलौकिक आरती एक विशेष आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पूजन के बाद भगवान महाकाल का विशेष श्रृंगार किया गया। बाबा महाकाल को भांग, चंदन, सिंदूर और सुगंधित द्रव्यों से सजाया गया। इसके साथ ही रजत मुकुट, रजत मुण्डमाला और रुद्राक्ष की मालाएं धारण कराई गईं। विभिन्न रंगों के ताजे पुष्पों से तैयार मालाओं से भगवान का स्वरूप और भी आकर्षक दिखाई दे रहा था। गर्भगृह में स्थापित ज्योतिर्लिंग पर चंदन का लेप और भस्म अर्पित किए जाने के बाद बाबा महाकाल का स्वरूप अत्यंत दिव्य नजर आया। आरती के दौरान मौजूद श्रद्धालु इस अलौकिक दृश्य को निहारते रहे।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">महाकाल मंदिर की भस्म आरती की विशेषता यह है कि यह देशभर के शिव भक्तों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र मानी जाती है। मान्यता है कि भगवान महाकाल को भस्म अर्पित करने के बाद वे निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। इसी मान्यता के चलते हर दिन हजारों श्रद्धालु भस्म आरती में शामिल होने के लिए दूर-दूर से उज्जैन पहुंचते हैं। बुधवार को भी मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की मौजूदगी देखने को मिली। सुबह होने से पहले ही श्रद्धालु कतारों में लग गए थे ताकि उन्हें बाबा महाकाल के दिव्य दर्शन का अवसर मिल सके।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भी परंपरा के अनुसार भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की गई। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और भस्म आरती का प्रमुख हिस्सा मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भस्म जीवन की नश्वरता का प्रतीक है और भगवान शिव को भस्म अति प्रिय मानी जाती है। इसी कारण महाकाल मंदिर में प्रतिदिन होने वाली भस्म आरती को विशेष महत्व प्राप्त है। श्रद्धालु इसे केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आध्यात्मिक अनुभूति के रूप में भी देखते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मंदिर प्रशासन के अनुसार भस्म आरती के दौरान सभी व्यवस्थाएं सुचारू रूप से संचालित की गईं। श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधा के लिए विशेष इंतजाम किए गए थे। दर्शन व्यवस्था को व्यवस्थित बनाए रखने के लिए मंदिर कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई थी। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के बावजूद दर्शन व्यवस्था शांतिपूर्ण ढंग से संचालित होती रही।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसकी धार्मिक महत्ता देशभर में मानी जाती है। यहां प्रतिदिन होने वाली भस्म आरती को देखने के लिए विदेशों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। सावन, महाशिवरात्रि और अन्य विशेष अवसरों पर यहां भक्तों की संख्या और अधिक बढ़ जाती है। हालांकि सामान्य दिनों में भी भस्म आरती का आकर्षण कम नहीं होता। बुधवार को संपन्न हुई भस्म आरती ने एक बार फिर यह साबित किया कि बाबा महाकाल के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था लगातार बढ़ रही है। भोर की पहली किरणों के साथ जब भस्म आरती संपन्न हुई तो पूरा मंदिर परिसर शिवमय हो चुका था। श्रद्धालु भगवान महाकाल का आशीर्वाद लेकर अपने-अपने गंतव्य की ओर रवाना हुए, लेकिन उनके मन में भस्म आरती का दिव्य और अलौकिक दृश्य लंबे समय तक बना रहा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 13:29:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>सोमवार भस्म आरती में महाकाल का दिव्य श्रृंगार, पंचामृत पूजन के बाद दिए राजा स्वरूप दर्शन</title>
                                    <description><![CDATA[उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में तड़के भस्म आरती के दौरान भगवान महाकाल का जलाभिषेक, पंचामृत पूजन और रजत आभूषणों से विशेष श्रृंगार किया गया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल के दिव्य दर्शन किए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/6a38cce6c593f/article-56623"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mahakal-bhasma-aarti-(9).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में सोमवार तड़के आयोजित होने वाली भस्म आरती के दौरान श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। अलसुबह चार बजे मंदिर के पट खुलते ही गर्भगृह में धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम शुरू हुआ। मंदिर के पंडे-पुजारियों ने विधि-विधान के साथ भगवान महाकाल का पूजन-अर्चन किया और इसके बाद जलाभिषेक संपन्न कराया। भस्म आरती में शामिल होने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे श्रद्धालु देर रात से ही मंदिर परिसर में कतारबद्ध होकर बाबा महाकाल के दर्शन की प्रतीक्षा कर रहे थे। सोमवार होने के कारण महाकाल मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में अधिक रही। मंदिर के पट खुलने के बाद सबसे पहले गर्भगृह में स्थापित सभी देवी-देवताओं का पूजन किया गया। इसके पश्चात भगवान महाकाल का पवित्र जल से अभिषेक किया गया। धार्मिक परंपराओं के अनुसार अभिषेक के दौरान वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया गया, जिससे मंदिर परिसर पूरी तरह आध्यात्मिक वातावरण में डूब गया। हर-हर महादेव और जय श्री महाकाल के जयघोष से पूरा परिसर गूंज उठा। जलाभिषेक के बाद भगवान महाकाल का पंचामृत से विशेष पूजन किया गया। दूध, दही, घी, शक्कर और विभिन्न फलों के रस से तैयार पंचामृत भगवान को अर्पित किया गया। सनातन परंपरा में पंचामृत पूजन का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि इससे भगवान प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर अपनी विशेष कृपा बनाए रखते हैं। पूजन के दौरान पुजारियों ने वैदिक विधि से आराधना करते हुए भक्तों की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना की।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भस्म आरती से पहले प्रथम घंटाल बजाकर मंदिर में प्रवेश किया गया और मंत्रोच्चार के साथ भगवान का ध्यान किया गया। इसके बाद हरिओम का पवित्र जल अर्पित कर विशेष पूजा की गई। कपूर आरती के पश्चात भगवान महाकाल के मस्तक पर भांग, चंदन और त्रिपुंड अर्पित किया गया। यह श्रृंगार भगवान शिव के स्वरूप का प्रतीक माना जाता है और महाकाल मंदिर की परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस समय भगवान महाकाल का स्वरूप अत्यंत दिव्य और आकर्षक दिखाई देता है। श्रृंगार की अगली प्रक्रिया में भगवान महाकाल को रजत आभूषणों से अलंकृत किया गया। जटाधारी स्वरूप में विराजमान बाबा महाकाल को राजा स्वरूप में सजाया गया। रजत मुकुट, रजत की मुंडमाल, रुद्राक्ष की मालाएं और अन्य आभूषण अर्पित किए गए। इसके साथ ही सुगंधित पुष्पों से निर्मित विशेष मालाओं से भी भगवान का श्रृंगार किया गया। मोगरा और गुलाब के फूलों की सुगंध से पूरा गर्भगृह महक उठा। भगवान महाकाल का यह राजसी स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना रहा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">श्रृंगार पूर्ण होने के बाद ज्योतिर्लिंग को वस्त्र से ढंककर भस्म अर्पित करने की प्रक्रिया शुरू की गई। महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भगवान महाकाल को पवित्र भस्म अर्पित की गई। भस्म आरती महाकाल मंदिर की सबसे प्राचीन और विशेष परंपराओं में से एक मानी जाती है। यह परंपरा केवल उज्जैन के महाकाल मंदिर में ही देखने को मिलती है, जिसके कारण देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार भस्म अर्पित होने के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। यही कारण है कि भस्म आरती को देखने और इसमें शामिल होने की श्रद्धालुओं में विशेष उत्सुकता रहती है। आरती के दौरान मंदिर परिसर में मौजूद भक्त पूरी श्रद्धा के साथ बाबा महाकाल के जयकारे लगाते नजर आए। कई श्रद्धालु इस पल को अपने जीवन का सौभाग्य मानते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भस्म आरती के पश्चात भगवान महाकाल को फल और मिष्ठान का भोग लगाया गया। मंदिर प्रशासन के अनुसार प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु बाबा महाकाल के दर्शन के लिए पहुंचते हैं, लेकिन सोमवार और विशेष पर्वों पर यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है। सुरक्षा और व्यवस्थाओं को लेकर मंदिर प्रशासन ने विशेष इंतजाम किए थे ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसकी धार्मिक मान्यता अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यहां प्रतिदिन होने वाली भस्म आरती को देखने के लिए देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन को आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से विशेष स्थान प्राप्त है। सावन, महाशिवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। सोमवार की भस्म आरती में भी यही आस्था और भक्ति देखने को मिली। पंचामृत पूजन, रजत आभूषणों से सुसज्जित राजसी श्रृंगार और भस्म आरती के दिव्य दृश्य ने श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। बाबा महाकाल के दर्शन कर भक्तों ने अपने परिवार की सुख-समृद्धि और मंगल की कामना की। मंदिर परिसर में सुबह से ही भक्ति का माहौल बना रहा और श्रद्धालु महाकाल के जयघोष के साथ आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते रहे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 14:07:24 +0530</pubDate>
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                <title>जून में कालाष्टमी 2026: 8 जून को रहेगा विशेष संयोग, जानें पूजा का महत्व और व्रत नियम</title>
                                    <description><![CDATA[भगवान काल भैरव की आराधना का पावन दिन, श्रद्धालु रखेंगे व्रत]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/kalashtami-2026-will-be-a-special-coincidence-on-8th-june/article-55053"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/kalashtami-2026-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जून माह की मासिक कालाष्टमी इस वर्ष 8 जून 2026, सोमवार को मनाई जाएगी। भगवान काल भैरव को समर्पित यह तिथि हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर कालाष्टमी व्रत रखा जाता है और इस दिन भगवान काल भैरव की पूजा-अर्चना करने से जीवन के कष्ट, भय और नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं। इस बार कालाष्टमी का पर्व सोमवार को पड़ रहा है, जिसे भगवान शिव का दिन माना जाता है। ऐसे में श्रद्धालुओं के बीच इस तिथि को लेकर विशेष उत्साह देखा जा रहा है। पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि 8 जून को सुबह 3 बजकर 25 मिनट से शुरू होगी और 9 जून को सुबह 3 बजकर 24 मिनट तक रहेगी। इसी अवधि में भक्त व्रत और पूजा का पालन करेंगे। बताया जा रहा है कि देश के कई शिव और काल भैरव मंदिरों में विशेष धार्मिक कार्यक्रमों की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। सुबह से ही श्रद्धालु स्नान कर भगवान शिव और काल भैरव की पूजा करेंगे तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करेंगे।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">धार्मिक परंपराओं के अनुसार कालाष्टमी के दिन व्रत रखने वाले लोग सूर्योदय से पहले उठकर पवित्र स्नान करते हैं। इसके बाद भगवान काल भैरव की विधिवत पूजा की जाती है। कई श्रद्धालु दिनभर निर्जला या फलाहार व्रत भी रखते हैं। शाम के समय काल भैरव मंदिरों में दर्शन और विशेष आरती का आयोजन किया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने पर भगवान भैरव भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं और जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करते हैं। मान्यता है कि भगवान काल भैरव भगवान शिव का ही एक उग्र और शक्तिशाली स्वरूप हैं। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ था। उसी दौरान भगवान शिव ने क्रोधित होकर काल भैरव का रूप धारण किया और ब्रह्मा के पांचवें सिर का अंत कर दिया। इसके बाद से भगवान शिव के इस स्वरूप की पूजा काल भैरव के रूप में की जाने लगी। धार्मिक ग्रंथों में उन्हें समय का देवता भी कहा गया है। माना जाता है कि जो व्यक्ति काल भैरव की आराधना करता है, उसे समय और परिस्थितियों पर नियंत्रण पाने की शक्ति मिलती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कालाष्टमी के दिन पितरों के निमित्त भी विशेष कर्मकांड किए जाते हैं। कई स्थानों पर सुबह के समय पूर्वजों के लिए तर्पण और दान-पुण्य करने की परंपरा है। धार्मिक जानकारों के अनुसार इस दिन किया गया दान और सेवा कार्य विशेष फलदायी माना जाता है। काशी, उज्जैन और अन्य प्रमुख तीर्थस्थलों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। हालांकि इस बार भी स्थानीय मंदिरों में भक्तों की अच्छी खासी भीड़ जुटने की संभावना जताई जा रही है। कालाष्टमी से जुड़ी एक और विशेष परंपरा कुत्तों को भोजन कराने की है। मान्यता है कि काला कुत्ता भगवान काल भैरव का वाहन माना जाता है। इसी कारण भक्त इस दिन कुत्तों को दूध, दही, मिठाई या अन्य खाद्य सामग्री खिलाते हैं। कई लोग गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन भी कराते हैं। धार्मिक दृष्टि से इसे पुण्यदायी कार्य माना जाता है। सूत्रों के मुताबिक कई सामाजिक और धार्मिक संस्थाएं भी इस अवसर पर सेवा कार्यों का आयोजन करती हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">धार्मिक विद्वानों का कहना है कि कालाष्टमी का व्रत केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना का भी अवसर माना जाता है। भक्त इस दिन काल भैरव स्तोत्र, शिव मंत्र और काल भैरव कथा का पाठ करते हैं। कुछ श्रद्धालु पूरी रात जागरण कर भगवान शिव और महाकाल की महिमा का श्रवण भी करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और भय, रोग तथा मानसिक परेशानियों से राहत मिलती है। 8 जून को पड़ने वाली मासिक कालाष्टमी को लेकर देशभर के शिव भक्तों में उत्साह का माहौल है। मंदिरों में विशेष सजावट और पूजा की तैयारियां जारी हैं। श्रद्धालु भगवान काल भैरव की आराधना कर सुख, शांति और समृद्धि की कामना करेंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया यह व्रत जीवन में शुभ फल प्रदान करता है तथा भगवान शिव और काल भैरव की कृपा प्राप्त होती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 10:53:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>बुधवार की भस्म आरती में गणेश स्वरूप में सजे बाबा महाकाल, श्रद्धालुओं ने किए दिव्य दर्शन</title>
                                    <description><![CDATA[भांग, चंदन, सिंदूर और रजत आभूषणों से हुआ विशेष शृंगार, भस्म आरती में उमड़ा आस्था का सैलाब]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/baba-mahakal-devotees-dressed-in-the-form-of-ganesha-had/article-54841"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mahakal-bhasma-aarti-(5).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में बुधवार तड़के आयोजित भस्म आरती के दौरान भक्तों को बाबा महाकाल के दिव्य और मनोहारी स्वरूप के दर्शन हुए। ज्योतिर्लिंग महाकाल के दरबार में रोजाना होने वाली भस्म आरती का विशेष महत्व माना जाता है, लेकिन बुधवार को भगवान महाकाल का गणेश स्वरूप में किया गया विशेष शृंगार श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहा। मंदिर परिसर में सुबह से ही भक्ति और श्रद्धा का वातावरण बना रहा तथा देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।</p>
<p class="isSelectedEnd">परंपरा के अनुसार तड़के मंदिर के कपाट खुलने के बाद सबसे पहले वीरभद्र जी को प्रणाम किया गया। इसके पश्चात स्वस्तिवाचन के साथ पूजा-अर्चना की प्रक्रिया शुरू हुई और चांदी के द्वार खोले गए। गर्भगृह में प्रवेश करने के बाद पुजारियों ने भगवान महाकाल का पूर्व श्रृंगार उतारा और विधिवत पूजन की तैयारियां शुरू कीं। मंदिर की प्राचीन परंपराओं के अनुसार सभी धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए गए। इसके बाद भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया। पवित्र जल से अभिषेक के बाद दूध, दही, घी, शक्कर, शहद और फलों के रस से तैयार पंचामृत द्वारा विशेष पूजन किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच यह धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुआ। मंदिर के पुजारियों और पुरोहितों ने पूरे विधि-विधान के साथ पूजा संपन्न कर भगवान महाकाल का दिव्य शृंगार किया।</p>
<p class="isSelectedEnd">बुधवार होने के कारण भगवान महाकाल को विशेष रूप से गणेश स्वरूप में सजाया गया। भांग, चंदन और सिंदूर से अलौकिक शृंगार किया गया। इसके साथ ही रजत आभूषणों और पारंपरिक अलंकरणों से बाबा महाकाल की भव्य छवि तैयार की गई। श्रद्धालुओं को भगवान के इस विशेष स्वरूप के दर्शन कर आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति हुई। मंदिर में मौजूद भक्त लगातार जय महाकाल के जयघोष लगाते रहे, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। शृंगार के दौरान भगवान महाकाल को शेषनाग का रजत मुकुट धारण कराया गया। इसके अलावा रजत मुंडमाला, रुद्राक्ष की मालाएं और सुगंधित पुष्पों से निर्मित आकर्षक हार पहनाए गए। फूलों की सजावट ने भगवान के स्वरूप को और भी दिव्य बना दिया। गर्भगृह में दीपों की रोशनी और मंत्रों की ध्वनि के बीच बाबा महाकाल का स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना रहा।</p>
<p class="isSelectedEnd">भस्म आरती से पहले नंदी हाल में भी विशेष पूजा-अर्चना की गई। यहां नंदी महाराज का स्नान, ध्यान और पूजन संपन्न किया गया। मान्यता है कि भगवान शिव के परम भक्त नंदी की पूजा के बिना महाकाल की आराधना पूर्ण नहीं मानी जाती। इसी परंपरा का पालन करते हुए नंदी जी की विशेष सेवा और पूजा की गई। पूजन-अभिषेक के बाद भगवान महाकाल को ड्रायफ्रूट, ताजे फल और विभिन्न प्रकार की मिठाइयों का भोग अर्पित किया गया। इसके बाद भस्म अर्पण की प्रक्रिया शुरू हुई। महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को पवित्र भस्म समर्पित की गई। यह भस्म आरती महाकाल मंदिर की सबसे विशिष्ट और प्राचीन परंपराओं में से एक मानी जाती है, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भस्म अर्पित होने के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। इसी कारण भस्म आरती को अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक महत्व का माना जाता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु रात से ही मंदिर पहुंच जाते हैं ताकि उन्हें इस अद्भुत आरती का साक्षी बनने का अवसर मिल सके। बुधवार की भस्म आरती में भी हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति देखने को मिली। मंदिर परिसर में सुरक्षा और व्यवस्थाओं के विशेष इंतजाम किए गए थे। दर्शन व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए मंदिर प्रशासन और सुरक्षा कर्मी लगातार सक्रिय रहे। श्रद्धालु अनुशासित तरीके से दर्शन करते हुए बाबा महाकाल का आशीर्वाद प्राप्त करते रहे।</p>
<p class="isSelectedEnd">उज्जैन का श्री महाकालेश्वर मंदिर देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख स्थान रखता है। यहां प्रतिदिन होने वाली भस्म आरती की ख्याति विश्वभर में है। धार्मिक दृष्टि से यह आरती केवल एक पूजा अनुष्ठान नहीं बल्कि सनातन परंपरा और शिव भक्ति का अद्भुत प्रतीक मानी जाती है। विशेष अवसरों और वारों के अनुसार भगवान महाकाल का अलग-अलग स्वरूपों में शृंगार किया जाता है, जिसे देखने के लिए भक्तों में विशेष उत्साह रहता है। बुधवार को गणेश स्वरूप में सजे बाबा महाकाल के दर्शन ने श्रद्धालुओं को भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। मंदिर में दिनभर दर्शन का सिलसिला जारी रहा और भक्त भगवान महाकाल के जयकारों के साथ अपनी आस्था व्यक्त करते रहे। महाकाल की नगरी उज्जैन में एक बार फिर भक्ति, परंपरा और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम देखने को मिला।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 13:32:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>मई 2026 में प्रदोष व्रत: महत्व, पूजा समय और संपूर्ण विधि</title>
                                    <description><![CDATA[28 मई 2026 को गुरुवार के दिन आने वाला प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने का विशेष अवसर है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/pradosh-vrat-importance-puja-time-and-complete-method-in-may/article-54348"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/pradosh-vrat-2026-(2).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"> </div>
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<div class="markdown prose dark:prose-invert wrap-break-word w-full light markdown-new-styling">
<p style="text-align:justify;">प्रदोष व्रत हिंदू धर्म में भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित एक अत्यंत पवित्र और फलदायी व्रत माना जाता है, जिसे हर महीने की त्रयोदशी तिथि को शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष दोनों में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। वर्ष 2026 में मई माह का प्रदोष व्रत 28 मई, गुरुवार के दिन पड़ रहा है, जो जेष्ठ माह के शुक्ल पक्ष का महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर माना जा रहा है। इस दिन देशभर के शिवभक्त विशेष रूप से उपवास रखते हैं और संध्या काल में भगवान शिव की आराधना कर उनके आशीर्वाद की प्राप्ति की कामना करते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार प्रदोष काल सूर्यास्त के बाद का वह समय होता है जिसे अत्यंत शुभ और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर माना गया है। मान्यता है कि इसी समय भगवान शिव और माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में होते हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं, इसलिए इस समय की गई पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">28 मई 2026 को प्रदोष व्रत के दिन सूर्यास्त लगभग शाम 07:02 बजे होगा, जिसके तुरंत बाद प्रदोष पूजा का शुभ मुहूर्त प्रारंभ होकर रात 09:11 बजे तक रहेगा। इसी संध्या काल में भक्तजन पूजा-अर्चना करते हैं, दीप प्रज्वलित करते हैं और भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत कथा का श्रवण करते हैं। त्रयोदशी तिथि इस दिन सुबह 07:57 बजे से प्रारंभ होकर अगले दिन 29 मई को सुबह 09:51 बजे तक रहेगी, लेकिन धार्मिक दृष्टि से संध्या काल का समय ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी कारण से भक्त विशेष रूप से सूर्यास्त के बाद शिव पूजा की तैयारी करते हैं और पूरे विधि-विधान के साथ आराधना करते हैं। यह व्रत न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह आत्मसंयम, भक्ति और आध्यात्मिक शुद्धि का भी मार्ग माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रदोष व्रत की पूजा विधि अत्यंत सरल होने के बावजूद गहरी आस्था और शुद्धता की मांग करती है। इस दिन श्रद्धालु प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और दिनभर उपवास का पालन करते हैं। कई भक्त निर्जला व्रत रखते हैं जबकि कुछ फलाहार या सात्विक भोजन का सेवन करते हैं। सूर्यास्त से लगभग एक घंटे पहले पूजा की तैयारी शुरू की जाती है। घर या मंदिर में पूजा स्थल को शुद्ध करके भगवान शिव के साथ माता पार्वती, भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय और नंदी की स्थापना की जाती है। इसके बाद शिवलिंग का अभिषेक दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से किया जाता है। बिल्वपत्र अर्पित करना इस व्रत का सबसे महत्वपूर्ण भाग माना जाता है क्योंकि इसे भगवान शिव को अत्यंत प्रिय बताया गया है। पूजा के दौरान भक्त “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते हैं और कई स्थानों पर महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार उच्चारण भी किया जाता है, जिसे जीवन में स्वास्थ्य, सुरक्षा और दीर्घायु प्रदान करने वाला माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पूजा के पश्चात प्रदोष व्रत कथा का श्रवण या पाठ किया जाता है, जिसमें इस व्रत के महत्व और इसके पालन से मिलने वाले लाभों का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि इस कथा को सुनने और सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करने से सभी प्रकार के पापों का नाश होता है और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। पूजा समाप्त होने के बाद भक्त अपने माथे पर भस्म या चंदन का तिलक लगाते हैं और कलश के पवित्र जल को ग्रहण करते हैं। इसके बाद कई श्रद्धालु शिव मंदिर जाकर दर्शन करते हैं और दीपदान करते हैं, जिसे अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। पूरे वातावरण में भक्ति, मंत्रोच्चार और दीपों की रोशनी से एक आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है, जो श्रद्धालुओं के मन को शांति और संतोष प्रदान करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">धार्मिक ग्रंथों विशेषकर स्कंद पुराण में प्रदोष व्रत का अत्यधिक महत्व बताया गया है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा और नियमों के साथ करता है, उसे भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत न केवल भौतिक सुख-संपत्ति और समृद्धि प्रदान करता है, बल्कि मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का भी माध्यम बनता है। गुरुवार को पड़ने के कारण यह व्रत “गुरुवारा प्रदोष” कहलाता है, जिसे विशेष रूप से ज्ञान, बाधाओं के निवारण और पूर्वजों के आशीर्वाद के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि इस दिन की गई साधना से जीवन की कठिनाइयाँ दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इस प्रकार 28 मई 2026 का प्रदोष व्रत शिवभक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर है, जो आस्था, भक्ति और आत्मिक शुद्धि का संदेश देता है और जीवन में सुख-शांति तथा कल्याण की कामना को पूर्ण करने वाला माना जाता है।</p>
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                                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 17:07:28 +0530</pubDate>
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                <title>मई 2026 में पूर्णिमा व्रत: तिथि, पूजा समय, महत्व और संपूर्ण विधि</title>
                                    <description><![CDATA[30 मई 2026, शनिवार को मनाया जाएगा पूर्णिमा व्रत, जो भगवान विष्णु और शिव की कृपा प्राप्त करने का विशेष अवसर है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/purnima-vrat-date-puja-time-importance-and-complete-method-in/article-54349"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/purnima-vrat-2026-(1).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पूर्णिमा व्रत हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाने वाला व्रत है, जिसे शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि यानी पूर्ण चंद्रमा के दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। वर्ष 2026 में मई माह की पूर्णिमा 30 मई, शनिवार को पड़ रही है, जिसे भक्तगण विशेष रूप से धार्मिक अनुष्ठानों और उपवास के साथ मनाएंगे। यह दिन भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। कई स्थानों पर इस दिन सत्यनारायण व्रत और पूजा का आयोजन भी किया जाता है, जिसे अत्यंत फलदायी माना गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">30 मई 2026 को पूर्णिमा तिथि दोपहर 11:58 बजे से शुरू होकर 31 मई 2026 को दोपहर 02:15 बजे तक रहेगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूर्णिमा का दिन चंद्रमा की पूर्ण ऊर्जा का प्रतीक होता है और इस दिन प्रकृति तथा मानव शरीर पर विशेष आध्यात्मिक प्रभाव माना जाता है। इस दिन भक्त सुबह से ही व्रत की तैयारी करते हैं और दिनभर उपवास रखते हैं, जो चंद्र दर्शन के बाद पूजा और प्रसाद ग्रहण करके पूर्ण किया जाता है। कुछ भक्त कठोर उपवास रखते हैं जिसमें वे पूरे दिन बिना भोजन और जल के रहते हैं, जबकि कुछ लोग केवल एक सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं जिसमें नमक और दाल का प्रयोग नहीं होता।</p>
<p style="text-align:justify;">पूर्णिमा व्रत की पूजा विधि अत्यंत सरल लेकिन आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन भक्त प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और पूरे दिन ईश्वर के नाम का स्मरण करते हैं। सूर्यास्त के बाद जब चंद्रमा का दर्शन होता है, तब विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। भक्त अपने घर या मंदिर में भगवान विष्णु और शिव की आराधना करते हैं। इस अवसर पर सत्यनारायण कथा का पाठ भी किया जाता है, जिसे अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। पूजा के दौरान दीप जलाए जाते हैं, मंत्रों का उच्चारण किया जाता है और भगवान को फल, मिठाई तथा अन्य सात्विक प्रसाद अर्पित किया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">चंद्र दर्शन के बाद व्रत का पारण किया जाता है, जिसमें भक्त पहले भगवान को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। इसके बाद ही व्रत पूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा की ऊर्जा शरीर और मन पर सकारात्मक प्रभाव डालती है, जिससे मानसिक शांति और स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होते हैं। कई धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूर्णिमा के दिन की गई पूजा से घर में सुख-समृद्धि आती है और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। विशेष रूप से सत्यनारायण पूजा को इस दिन करना अत्यंत शुभ माना जाता है क्योंकि इससे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">पूर्णिमा व्रत का उल्लेख हिंदू धर्मग्रंथों में भी मिलता है और इसे पुण्य प्रदान करने वाला व्रत बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत को श्रद्धा और नियमों के साथ करने से व्यक्ति के जीवन में सौभाग्य, स्वास्थ्य और शांति का संचार होता है। इसके अलावा यह व्रत मानसिक संतुलन को भी बढ़ाता है और आध्यात्मिक ऊर्जा को मजबूत करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की स्थिति का प्रभाव मानव शरीर और मानसिक अवस्था पर पड़ता है, जिससे ध्यान और साधना के लिए यह समय अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस प्रकार 30 मई 2026 का पूर्णिमा व्रत धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है। यह दिन भक्तों के लिए आस्था, उपवास और ईश्वर भक्ति का विशेष संगम प्रस्तुत करता है। भगवान विष्णु और शिव की आराधना के साथ किया गया यह व्रत जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाने वाला माना जाता है तथा भक्तों को सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक संतोष प्रदान करता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 17:07:15 +0530</pubDate>
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                <title>आज का पंचांग 11 मई 2026: ज्येष्ठ नवमी आज, जानें शुभ मुहूर्त और राहुकाल का समय</title>
                                    <description><![CDATA[11 मई 2026 का आज का पंचांग पढ़ें। जानें नवमी तिथि, शुभ मुहूर्त, राहुकाल, नक्षत्र और सोमवार के खास उपाय।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/todays-panchang-11-may-2026-jyeshtha-navami-know-the-auspicious/article-53078"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ---2026-05-11t091218.440.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;"><strong>Aaj Ka Panchang 11 May 2026:</strong> 11<span lang="hi" xml:lang="hi"> मई </span>2026, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोमवार का दिन धार्मिक दृष्टि से खास माना जा रहा है। आज ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि है और दिनभर कई शुभ योग बन रहे हैं। पंचांग के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चंद्रमा आज कुंभ राशि में रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि शतभिषा नक्षत्र का प्रभाव देर रात तक देखने को मिलेगा। ज्योतिष गणना के मुताबिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज का दिन पूजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दान और शिव की आराधना के लिए अच्छा माना गया है। खास तौर से सोमवार होने के कारण शिव मंदिरों में सुबह से भक्तों का तांता लग सकता है। कई लोग आज व्रत और विशेष पूजा करेंगे।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">नवमी तिथि दोपहर </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">3<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजकर </span>24<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट तक रहेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बाद दशमी तिथि शुरू हो जाएगी। शतभिषा नक्षत्र रात </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजकर </span>28<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट तक रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र का आरंभ होगा। इन्द्र योग का प्रभाव भी देर रात तक रहेगा और इसे कई शुभ कार्यों के लिए अनुकूल माना जाता है। सूर्योदय सुबह </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजकर </span>33<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट पर हुआ और सूर्यास्त शाम </span>7<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजकर </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट पर होगा। चंद्रोदय अगले दिन यानी </span>12<span lang="hi" xml:lang="hi"> मई की रात </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजकर </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट पर होगा।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आज के शुभ मुहूर्त की बात करें तो अभिजीत मुहूर्त दोपहर </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">11<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजकर </span>51<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट से </span>12<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजकर </span>45<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट तक रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो नए कार्यों की शुरुआत या महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए शुभ माना जाता है। अमृत काल शाम </span>6<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजकर </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट से </span>7<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजकर </span>43<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट तक रहेगा। ब्रह्म मुहूर्त सुबह </span>4<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजकर </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट से </span>4<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजकर </span>48<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट तक था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो ध्यान और पूजा के लिए उत्तम समय है। दूसरी तरफ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राहुकाल सुबह </span>7<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजकर </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट से </span>9<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजे तक रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस दौरान मांगलिक या शुभ कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है। यमगंड सुबह </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजकर </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट से दोपहर </span>12<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजे तक और गुलिक काल दोपहर </span>1<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजकर </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट से </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजे तक रहेगा।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;"> </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पंचांग के अनुसार</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज गरज करण दोपहर </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> बजकर </span>24<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिनट तक रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बाद वणिज करण शुरू होगा जो देर रात तक प्रभावी रहेगा। ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि शतभिषा नक्षत्र में जन्मे लोग आमतौर पर गंभीर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र विचारों वाले और रहस्यमयी होते हैं। इस नक्षत्र के स्वामी राहु हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और इसके देवता वरुणदेव माने गए हैं। कहा जाता है कि इस नक्षत्र में किए गए शोध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्ययन और गुप्त योजनाओं में सफलता मिलने की संभावना बढ़ जाती है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आज के उपाय के तौर पर शिवलिंग पर जल और कच्चा दूध अर्पित करना शुभ माना गया है। सोमवार होने के कारण </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">‘<span lang="hi" xml:lang="hi">ॐ नमः शिवाय</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">मंत्र का जाप और सफेद वस्तुओं का दान भी लाभकारी बताया गया है। कई लोग आज मानसिक शांति और पारिवारिक सुख के लिए भगवान शिव की आराधना करेंगे।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 May 2026 10:14:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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