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                <title>Wildlife - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Wildlife RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>30 साल से हर दिन चीलों को दाना खिला रहे 'ईगल मैन' अजीजका, एक सीटी पर उमड़ पड़ते हैं सैकड़ों शिकारी पक्षी</title>
                                    <description><![CDATA[केरल के कोझिकोड बीच पर हर दोपहर देखने को मिलता है अनोखा नजारा, इंसान और वन्यजीवों के भरोसे की मिसाल बने अजीजका, आवारा जानवरों की भी करते हैं सेवा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/special-news/eagle-man-azizka-has-been-feeding-the-eagles-every-day/article-58438"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/eagle-man.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">दुनिया में इंसान और जानवरों के बीच प्रेम और विश्वास की कई कहानियां सुनने को मिलती हैं, लेकिन केरल के कोझिकोड (कालीकट) से सामने आई एक कहानी इन सबसे अलग और बेहद प्रेरणादायक है। यहां रहने वाले अजीज, जिन्हें लोग प्यार से 'ईगल मैन' अजीजका के नाम से जानते हैं, पिछले 30 से भी अधिक वर्षों से बिना किसी स्वार्थ के हर दिन सैकड़ों शिकारी चीलों और आवारा जानवरों को भोजन करा रहे हैं। उनकी यह अनूठी सेवा न केवल स्थानीय लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है, बल्कि देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को भी हैरान कर देती है। अजीजका का जीवन किसी नियमित दिनचर्या की तरह चलता है। चाहे मौसम कैसा भी हो, तेज बारिश हो, भीषण गर्मी हो या फिर त्योहार का दिन, वे अपनी सेवा में कभी विराम नहीं देते। हर दिन दोपहर ठीक 2 बजे वे अपनी पुरानी साइकिल पर चिकन के टुकड़ों से भरा एक बोरा लेकर अपने घर से निकलते हैं। उनका गंतव्य हमेशा एक ही होता है—कोझिकोड बीच, जहां सैकड़ों पक्षी और कई आवारा जानवर उनका इंतजार कर रहे होते हैं। बीच पर पहुंचने के बाद जो दृश्य दिखाई देता है, वह किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं होता। अजीजका जैसे ही अपनी खास अंदाज वाली सीटी बजाते हैं, कुछ ही क्षणों में आसमान में उड़ रही सैकड़ों चीलें उनकी ओर तेजी से आने लगती हैं। देखते ही देखते पूरा आसमान चीलों से भर जाता है और वे अजीजका के चारों ओर मंडराने लगती हैं। यह नजारा इतना अद्भुत होता है कि वहां मौजूद लोग कुछ देर के लिए मंत्रमुग्ध रह जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दिलचस्प बात यह है कि चीलों को स्वभाव से बेहद आक्रामक और शिकारी पक्षी माना जाता है। आमतौर पर ये पक्षी अपने शिकार पर तेज गति से हमला करते हैं और इंसानों से दूरी बनाए रखते हैं। लेकिन अजीजका के साथ इनका व्यवहार बिल्कुल अलग है। वर्षों से बना विश्वास इतना गहरा हो चुका है कि सैकड़ों चीलें उनके बेहद करीब आकर आराम से भोजन करती हैं, लेकिन उन्हें कभी कोई नुकसान नहीं पहुंचातीं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह रिश्ता एक-दो दिन या कुछ महीनों में नहीं बना। अजीजका ने लगातार तीन दशक तक बिना किसी लालच के इन पक्षियों की सेवा की है। उनकी नियमितता और समर्पण ने चीलों के मन में भरोसा पैदा किया, जिसका परिणाम आज दुनिया के सामने एक अनोखे उदाहरण के रूप में दिखाई देता है। अजीजका सिर्फ चीलों तक ही सीमित नहीं हैं। वे बीच के आसपास रहने वाले आवारा कुत्तों और अन्य जानवरों को भी भोजन कराते हैं। उनके लिए यह केवल सेवा नहीं बल्कि जीवन का उद्देश्य बन चुका है। उनका मानना है कि इंसानों की तरह जानवरों को भी भूख लगती है और यदि हम सक्षम हैं तो हमें उनकी मदद जरूर करनी चाहिए। कोझिकोड बीच पर आने वाले पर्यटक अक्सर इस दृश्य को अपने कैमरों में कैद करते हैं। सोशल मीडिया पर अजीजका के वीडियो लाखों बार देखे जा चुके हैं। लोग उन्हें "ईगल मैन" के नाम से पहचानते हैं और उनकी तुलना प्रकृति के सच्चे मित्र से करते हैं। कई सोशल मीडिया यूजर्स मजाकिया अंदाज में कहते हैं कि अजीजका को चीलों की "स्पेशल सिक्योरिटी" मिली हुई है, क्योंकि उनके आसपास सैकड़ों चीलें सुरक्षा घेरे की तरह मंडराती रहती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्पेशल खबरें</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 18:51:58 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मझगवां अस्पताल के डॉक्टर कक्ष में घुसा जहरीला सांप, वन विभाग ने रेस्क्यू कर टाला बड़ा हादसा</title>
                                    <description><![CDATA[सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सांप दिखते ही मरीजों और स्टाफ में मची अफरातफरी, वन विभाग की टीम ने सुरक्षित रेस्क्यू कर जंगल में छोड़ा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/vindhya-rewa/a-poisonous-snake-entered-the-doctors-room-of-majhgawan-hospital/article-58333"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/majhgawan-hospital.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">जिले के मझगवां स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में उस समय अफरातफरी का माहौल बन गया, जब अस्पताल के डॉक्टर कक्ष के भीतर एक जहरीला सांप दिखाई दिया। सांप को देखते ही अस्पताल में मौजूद मरीज, उनके परिजन और स्वास्थ्य कर्मियों में दहशत फैल गई। कुछ देर के लिए अस्पताल परिसर में हड़कंप जैसी स्थिति बन गई और लोग सुरक्षित स्थानों की ओर हटने लगे। सूचना मिलते ही वन विभाग की रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंची और सावधानीपूर्वक सांप को पकड़कर सुरक्षित जंगल में छोड़ दिया। समय रहते की गई इस कार्रवाई से एक संभावित बड़ा हादसा टल गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सुबह अस्पताल की नियमित गतिविधियां चल रही थीं। मरीज उपचार के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे, जबकि डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारी अपने कार्य में व्यस्त थे। इसी दौरान डॉक्टर कक्ष में अचानक एक जहरीला सांप दिखाई दिया। जैसे ही इसकी जानकारी अस्पताल के कर्मचारियों को मिली, उन्होंने तत्काल कमरे को खाली कराया और मरीजों को भी सुरक्षित दूरी पर रहने की सलाह दी।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ ही मिनटों में यह खबर पूरे अस्पताल परिसर में फैल गई। कई मरीज और उनके परिजन घबराकर अस्पताल के बाहर निकल आए। हालांकि अस्पताल प्रशासन ने स्थिति को शांत बनाए रखने की कोशिश की और किसी भी प्रकार की अफवाह फैलने से रोका। इसके बाद तुरंत वन विभाग को सूचना दी गई। सूचना मिलने पर वन विभाग की रेस्क्यू टीम बिना देर किए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंची। टीम के सदस्य विनोद पाण्डेय और लखन यादव ने पूरे क्षेत्र का निरीक्षण किया और सांप की गतिविधियों पर नजर रखी। काफी सावधानी और अनुभव के साथ उन्होंने सांप को सुरक्षित तरीके से पकड़ लिया। रेस्क्यू के दौरान यह सुनिश्चित किया गया कि न तो किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचे और न ही सांप को किसी प्रकार की चोट आए।</p>
<p style="text-align:justify;">रेस्क्यू टीम ने बताया कि सांप जहरीली प्रजाति का था। यदि समय रहते उसे नहीं पकड़ा जाता तो अस्पताल में मौजूद लोगों के लिए खतरा बढ़ सकता था। सांप को पकड़ने के बाद उसे सुरक्षित कंटेनर में रखा गया और वन क्षेत्र में ले जाकर प्राकृतिक वातावरण में छोड़ दिया गया। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि बरसात के मौसम में इस तरह की घटनाएं बढ़ जाती हैं। लगातार बारिश के कारण बिलों और झाड़ियों में रहने वाले सांप सुरक्षित स्थानों की तलाश में आबादी वाले इलाकों, मकानों, स्कूलों और सरकारी भवनों तक पहुंच जाते हैं। अस्पताल, जहां हर समय बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहते हैं, वहां इस प्रकार की घटनाओं को गंभीरता से लेना जरूरी होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अस्पताल प्रशासन ने वन विभाग की त्वरित कार्रवाई की सराहना करते हुए कहा कि यदि रेस्क्यू टीम समय पर नहीं पहुंचती तो स्थिति और गंभीर हो सकती थी। कर्मचारियों ने भी राहत की सांस ली कि बिना किसी नुकसान के पूरे घटनाक्रम का सफलतापूर्वक समाधान हो गया। घटना के बाद अस्पताल परिसर की साफ-सफाई और निरीक्षण भी कराया गया। अधिकारियों ने भवन के आसपास झाड़ियों और घास की सफाई कराने के निर्देश दिए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की संभावना कम हो सके। साथ ही अस्पताल परिसर में मौजूद पुराने सामान और अनुपयोगी वस्तुओं को हटाने की भी योजना बनाई गई है, क्योंकि ऐसे स्थानों पर अक्सर सांप और अन्य जीव छिप जाते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>विंध्य/रीवा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 10:08:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मासूम आंखों वाला फिलीपींस टार्सियर क्यों माना जाता है दुनिया का सबसे नाजुक जीव?</title>
                                    <description><![CDATA[बड़ी-बड़ी आंखों और मासूम चेहरे वाला फिलीपींस टार्सियर जितना आकर्षक दिखता है, उतना ही संवेदनशील भी है। विशेषज्ञ बताते हैं कि अत्यधिक तनाव और कैद की स्थिति में यह खुद को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/special-news/why-is-the-innocent-eyed-philippines-tarsier-considered-the-most-delicate/article-58314"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/philippine-tarsier.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">दुनिया में ऐसे कई जीव हैं, जो अपनी अनोखी बनावट और व्यवहार के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं। इन्हीं में से एक है फिलीपींस टार्सियर (Philippine Tarsier)। यह नन्हा प्राइमेट अपनी बड़ी-बड़ी गोल आंखों, छोटे शरीर और मासूम चेहरे के कारण दुनिया के सबसे प्यारे जीवों में गिना जाता है। सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें और वीडियो अक्सर वायरल होते रहते हैं और पहली नजर में इसे देखने वाला लगभग हर व्यक्ति इसकी मासूमियत का दीवाना हो जाता है। लेकिन इस छोटे से जीव की जिंदगी जितनी खूबसूरत दिखती है, उतनी ही नाजुक भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिलीपींस टार्सियर मुख्य रूप से फिलीपींस के बोहोल, समर, लेयटे और मिंदानाओ जैसे द्वीपों के घने जंगलों में पाया जाता है। इसका शरीर बेहद छोटा होता है और इसकी लंबाई लगभग 8 से 16 सेंटीमीटर तक होती है। हालांकि इसकी पूंछ शरीर से भी लंबी हो सकती है, जिससे यह पेड़ों पर आसानी से संतुलन बना पाता है। इसका वजन सामान्यतः 100 से 150 ग्राम के बीच होता है, लेकिन अपनी फुर्ती और छलांग लगाने की क्षमता के कारण यह जंगल में आसानी से शिकार कर लेता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस जीव की सबसे खास पहचान इसकी विशाल आंखें हैं। किसी भी स्तनधारी की तुलना में उसके शरीर के अनुपात में टार्सियर की आंखें सबसे बड़ी मानी जाती हैं। यदि इंसानों में भी ऐसा अनुपात होता तो हमारी आंखों का आकार लगभग एक संतरे जितना होता। इसकी आंखें इतनी बड़ी होती हैं कि वे अपनी आंखों को घुमा नहीं सकते। इस कमी को पूरा करने के लिए टार्सियर अपना सिर लगभग 180 डिग्री तक दोनों दिशाओं में घुमा सकता है, जिससे वह आसपास की गतिविधियों पर आसानी से नजर रखता है। टार्सियर पूरी तरह निशाचर जीव है। दिन के समय यह पेड़ों की शाखाओं और घनी पत्तियों के बीच आराम करता है, जबकि रात में भोजन की तलाश में निकलता है। इसका भोजन मुख्य रूप से कीड़े-मकोड़े, टिड्डे, झींगुर, मकड़ियां, छिपकलियां और छोटे पक्षी होते हैं। यह अपने लंबे पैरों की मदद से एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कई मीटर लंबी छलांग लगा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सोशल मीडिया और कई वेबसाइटों पर अक्सर यह दावा किया जाता है कि टार्सियर हल्का सा शोर सुनते ही "आत्महत्या" कर लेता है। हालांकि वैज्ञानिक इस दावे को पूरी तरह सही नहीं मानते। विशेषज्ञों के अनुसार, यह जीव अत्यधिक संवेदनशील होता है और तेज आवाज, लगातार फ्लैश लाइट, भीड़, बार-बार छूने या कैद जैसी परिस्थितियों में गंभीर तनाव का शिकार हो सकता है। ऐसे तनावपूर्ण हालात में कुछ टार्सियर खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं, सिर को बार-बार किसी कठोर सतह से टकराते हैं या अत्यधिक घबराहट के कारण उनकी मौत भी हो सकती है। इसलिए यह कहना कि हर तेज आवाज पर वह आत्महत्या कर लेता है, वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। सही बात यह है कि अत्यधिक तनाव और अनुचित वातावरण उसके लिए जानलेवा साबित हो सकता है। इसी वजह से वन्यजीव विशेषज्ञ लोगों से अपील करते हैं कि यदि जंगल में कभी टार्सियर दिखाई दे तो उसके पास शोर न करें, फ्लैश कैमरे का इस्तेमाल न करें और उसे छूने की कोशिश भी न करें। कई पर्यटक केवल तस्वीर लेने के लिए उसके बेहद करीब पहुंच जाते हैं, जिससे यह छोटा जीव डर जाता है और उसका प्राकृतिक व्यवहार प्रभावित होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिलीपींस सरकार ने टार्सियर के संरक्षण के लिए कई विशेष कदम उठाए हैं। बोहोल द्वीप पर टार्सियर संरक्षण केंद्र बनाए गए हैं, जहां पर्यटकों के लिए सख्त नियम लागू किए गए हैं। यहां तेज आवाज करना, फ्लैश फोटोग्राफी करना और जानवर को छूना पूरी तरह प्रतिबंधित है। इन नियमों का उद्देश्य टार्सियर को तनाव से बचाना और उसके प्राकृतिक आवास की रक्षा करना है। टार्सियर की संख्या धीरे-धीरे घट रही है। इसके पीछे जंगलों की कटाई, अवैध शिकार, पर्यटन का बढ़ता दबाव और प्राकृतिक आवास का नष्ट होना प्रमुख कारण हैं। यही वजह है कि इसके संरक्षण पर लगातार जोर दिया जा रहा है। यदि समय रहते इसके आवास और जीवनशैली की रक्षा नहीं की गई, तो भविष्य में यह दुर्लभ जीव और अधिक संकट में पड़ सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">टार्सियर केवल एक आकर्षक जीव नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह कीड़ों की संख्या नियंत्रित करने में मदद करता है और जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखने में भूमिका निभाता है। वैज्ञानिक भी इसकी अनोखी शारीरिक संरचना और व्यवहार का लगातार अध्ययन कर रहे हैं, ताकि इसके बारे में और अधिक जानकारी जुटाई जा सके। फिलीपींस टार्सियर हमें यह भी सिखाता है कि प्रकृति के सबसे छोटे और मासूम दिखने वाले जीव भी बेहद संवेदनशील होते हैं। उनकी सुरक्षा केवल कानूनों से नहीं, बल्कि लोगों की जागरूकता और जिम्मेदार व्यवहार से संभव है। यदि हम वन्यजीवों का सम्मान करें, उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखें और उन्हें अनावश्यक तनाव से बचाएं, तो आने वाली पीढ़ियां भी इस अद्भुत और प्यारे जीव को उसकी प्राकृतिक दुनिया में देख सकेंगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्पेशल खबरें</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 16:38:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कालापीपल में कुएं से मिले 13 हिरण और एक कुत्ते के शव, जांच जारी</title>
                                    <description><![CDATA[खरदौनकलां गांव के खेत में बने कुएं से सड़े-गले शव मिलने से हड़कंप, प्रारंभिक जांच में कुत्ते से बचने के दौरान हिरणों के गिरने की आशंका; वन विभाग पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bodies-of-13-deer-and-a-dog-found-in-a/article-58067"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/kalapipal-deer-death.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">शाजापुर जिले के शुजालपुर अनुभाग की कालापीपल तहसील स्थित खरदौनकलां गांव में एक दर्दनाक घटना सामने आई है। यहां एक खेत के कुएं से 13 हिरणों और एक आवारा कुत्ते के शव मिलने के बाद पूरे इलाके में सनसनी फैल गई। रविवार को खेत मालिक के परिजन फसल पर कीटनाशक का छिड़काव करने पहुंचे थे। इसी दौरान उन्हें कुएं की तरफ से तेज दुर्गंध महसूस हुई। जब उन्होंने कुएं में झांककर देखा तो अंदर बड़ी संख्या में सड़े-गले शव दिखाई दिए। यह दृश्य देखकर उन्होंने तुरंत गांव के लोगों को सूचना दी। कुछ ही देर में मामला पूरे गांव में फैल गया और सरपंच के माध्यम से पुलिस तथा वन विभाग को इसकी जानकारी दी गई। सूचना मिलने के बाद प्रशासन, पुलिस और वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और घटनास्थल का निरीक्षण शुरू किया। प्रारंभिक जांच में आशंका जताई जा रही है कि हिरणों का झुंड किसी आवारा कुत्ते से बचने के दौरान भागते हुए कुएं में गिर गया। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि मौत की वास्तविक वजह पोस्टमार्टम रिपोर्ट और विस्तृत जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि यह कुआं खरदौनकलां निवासी कृष्णाबाई पति राजेश पाटीदार के खेत में स्थित है। खेत मालिक के परिजन जब खेत पहुंचे तो पहले उन्हें दुर्गंध महसूस हुई। शुरुआत में उन्हें लगा कि कोई जानवर आसपास मरा होगा, लेकिन जब उन्होंने कुएं के भीतर देखा तो एक साथ कई हिरणों और एक कुत्ते के शव दिखाई दिए। शवों की स्थिति देखकर अनुमान लगाया गया कि घटना एक-दो दिन पहले हुई होगी। ग्रामीण भी बड़ी संख्या में मौके पर पहुंच गए। कई लोगों ने बताया कि कुएं की मुंडेर का एक हिस्सा टूटा हुआ मिला है। आशंका है कि तेज रफ्तार में भागते समय हिरण उसी क्षतिग्रस्त हिस्से से सीधे कुएं में गिर गए होंगे। कुएं की गहराई अधिक होने और बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं होने के कारण सभी वन्यजीवों की मौत हो गई। जिस आवारा कुत्ते से बचने की कोशिश की जा रही थी, उसके भी कुएं में गिरने की बात सामने आई है। उसके शव भी हिरणों के साथ मिले हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार मृत हिरणों में चार नर और नौ मादा शामिल हैं। सभी हिरण संरक्षित वन्यजीव श्रेणी में आते हैं और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-1 में शामिल हैं। ऐसे मामलों में नियमानुसार वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में ही पंचनामा और शव निकालने की कार्रवाई की जाती है। बताया गया कि रविवार को सूचना मिलने के समय संबंधित एसडीओ विभागीय कार्य से बाहर थे। इसी वजह से शव निकालने की कार्रवाई सोमवार को नायब तहसीलदार और वन विभाग के अधिकारियों की मौजूदगी में की गई। सभी शवों का पोस्टमार्टम कराया गया और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद घटनास्थल के पास ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। कार्रवाई के दौरान आम लोगों और ग्रामीणों को सुरक्षा कारणों से घटनास्थल से दूर रखा गया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">घटनास्थल की जांच के दौरान वन विभाग ने आसपास के हालात का भी निरीक्षण किया। अधिकारियों ने टूटी हुई मुंडेर, कुएं की संरचना और आसपास के पैरों के निशानों का परीक्षण किया। प्रारंभिक तौर पर ऐसा माना जा रहा है कि हिरणों का झुंड किसी खतरे से बचने के लिए तेजी से भाग रहा था और अंधेरे या घबराहट में कुएं को नहीं देख पाया। हालांकि अभी यह भी जांच का विषय है कि घटना रात के समय हुई या दिन में। वन विभाग का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जाएगा। फिलहाल किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस घटना के बाद ग्रामीणों ने भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि खेतों के बीच बने कई पुराने कुएं खुले हैं या उनकी सुरक्षा दीवारें पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। ऐसे में वन्यजीवों के साथ-साथ इंसानों के लिए भी खतरा बना रहता है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि खुले और क्षतिग्रस्त कुओं की पहचान कर उन्हें सुरक्षित बनाया जाए ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके। कुछ ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि विभाग ने घटना की जानकारी सार्वजनिक होने से रोकने की कोशिश की, हालांकि अधिकारियों ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">कालापीपल और शुजालपुर क्षेत्र लंबे समय से हिरणों की बड़ी आबादी के लिए जाना जाता है। यहां खेतों और खुले इलाकों में अक्सर हिरणों के झुंड दिखाई देते हैं। पिछले कुछ वर्षों में वन्यजीवों की संख्या बढ़ने के कारण किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। इसी को देखते हुए करीब दो महीने पहले वन विभाग ने विशेष अभियान चलाकर बोमा पद्धति के माध्यम से हेलीकॉप्टर की सहायता से लगभग 800 हिरणों को दूसरे वन अभयारण्यों में स्थानांतरित किया था। इसके बावजूद क्षेत्र में बड़ी संख्या में हिरण मौजूद हैं। ऐसे में वन्यजीवों की सुरक्षा और खुले कुओं जैसी संभावित दुर्घटनाओं से बचाव के लिए प्रभावी उपायों की जरूरत एक बार फिर महसूस की जा रही है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 12:37:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कूनो के चीते मप्र-राजस्थान के 12 जिलों तक पहुंचे, शिकार के तरीके में भी आया बड़ा बदलाव</title>
                                    <description><![CDATA[प्रोजेक्ट चीता की प्रोग्रेस रिपोर्ट में खुलासा, खुले जंगल में 50% शिकार पालतू पशुओं का, आसान शिकार को दे रहे प्राथमिकता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/kunos-leopards-reached-12-districts-of-madhya-pradesh-and-rajasthan/article-57650"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/project-cheetah.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में बसाए गए अफ्रीकी चीते अब भारतीय जंगलों और यहां के वातावरण में पूरी तरह से घुलमिल चुके हैं। प्रोजेक्ट चीता की ताजा प्रोग्रेस रिपोर्ट से पता चलता है कि इन चीतों ने न केवल अपने रहने और विचरण के तरीके में बदलाव किया है, बल्कि शिकार की रणनीति भी बदल ली है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की सितंबर 2024 से दिसंबर 2025 तक की रिपोर्ट के अनुसार, खुले जंगल में विचरण कर रहे चीतों के कुल शिकार में अब लगभग 50 प्रतिशत हिस्सेदारी पालतू पशुओं की हो गई है। इनमें करीब 30 प्रतिशत बकरियां और 20 प्रतिशत मवेशी शामिल हैं। वहीं 42 प्रतिशत शिकार चीतल का रहा, जबकि बाकी 8 प्रतिशत अन्य वन्यजीवों का शिकार किया गया। रिपोर्ट बताती है कि कम ऊर्जा खर्च होने और कम जोखिम होने की वजह से चीते अब आसान शिकार को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं। प्रोजेक्ट चीता के तहत कूनो में छोड़े गए चीतों का दायरा भी लगातार बढ़ रहा है। अब तक ये चीते मध्यप्रदेश और राजस्थान के कुल 12 जिलों तक पहुंच चुके हैं। हाल ही में नर चीता 'अग्नि' रणथंभौर क्षेत्र तक पहुंच गया था, जिससे यह साफ हो गया कि चीते अपने लिए नए इलाकों की तलाश कर रहे हैं। वन विभाग लगातार इनकी गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है और जीपीएस कॉलर की मदद से उनकी लोकेशन ट्रैक की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि यह प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा है और नए वातावरण में चीते धीरे-धीरे अपना क्षेत्र तय कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कूनो नेशनल पार्क के कोर क्षेत्र में चीतलों की अच्छी संख्या मौजूद है। यहां प्रति वर्ग किलोमीटर औसतन 23 चीतल पाए जाते हैं, जो चीतों के लिए स्वाभाविक शिकार हैं। लेकिन जब चीते पार्क की सीमा से बाहर निकलकर टेरिटोरियल वन क्षेत्रों या गांवों के आसपास पहुंचते हैं, तब वहां जंगली शिकार की उपलब्धता कम हो जाती है। इसके विपरीत घरेलू पशु आसानी से मिल जाते हैं। ऐसे में चीते कम मेहनत और कम जोखिम वाले शिकार को चुन रहे हैं, जिसके कारण बकरियां और मवेशी उनके शिकार का हिस्सा बन रहे हैं। यह व्यवहार पूरी तरह असामान्य नहीं है। दुनिया के कई देशों में बड़े मांसाहारी वन्यजीव अपने प्राकृतिक क्षेत्र से बाहर निकलने पर घरेलू पशुओं का शिकार करते हैं। यदि किसी क्षेत्र में जंगली शिकार पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न हो तो शिकारी जानवर अपेक्षाकृत आसान विकल्प चुनते हैं। कूनो के मामले में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। हालांकि वन विभाग का कहना है कि चीतों को यथासंभव उनके प्राकृतिक आवास में बनाए रखने और पर्याप्त जंगली शिकार उपलब्ध कराने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">शावकों की परवरिश कर रही मादा चीता 'ज्वाला' और 'गामिनी' ने सबसे अधिक शिकार किए हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार शावकों को पालने के दौरान मादा चीतों को सामान्य दिनों की तुलना में अधिक भोजन की आवश्यकता होती है। इसी कारण वे अपेक्षाकृत अधिक शिकार करती हैं। आसान शिकार मिलने पर ऊर्जा की बचत होती है, जिससे शावकों की देखभाल भी बेहतर तरीके से हो पाती है। यह व्यवहार प्राकृतिक पारिस्थितिकी का हिस्सा माना जाता है। प्रोजेक्ट चीता भारत में विलुप्त हो चुके चीतों को फिर से बसाने की महत्वाकांक्षी योजना है। इसके तहत अफ्रीका से लाए गए चीतों को पहले नियंत्रित बाड़ों में रखा गया और बाद में चरणबद्ध तरीके से खुले जंगल में छोड़ा गया। शुरुआती महीनों में उनके स्वास्थ्य, शिकार की क्षमता और अनुकूलन प्रक्रिया पर विशेष निगरानी रखी गई। अब ताजा रिपोर्ट से संकेत मिल रहे हैं कि अधिकांश चीते भारतीय परिस्थितियों में खुद को ढाल चुके हैं और स्वतंत्र रूप से शिकार करने में सक्षम हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि चीतों का गांवों की ओर बढ़ना वन विभाग के लिए नई चुनौती भी बन रहा है। ग्रामीण इलाकों में पालतू पशुओं के शिकार की घटनाएं बढ़ने से स्थानीय लोगों की चिंता भी बढ़ी है। ऐसे मामलों में विभाग प्रभावित पशुपालकों को मुआवजा देने की प्रक्रिया अपनाता है, ताकि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम किया जा सके। साथ ही ग्रामीणों को जागरूक किया जा रहा है कि वे रात के समय पशुओं को सुरक्षित बाड़ों में रखें और जंगल से लगे इलाकों में अतिरिक्त सावधानी बरतें। आने वाले समय में यदि कूनो और आसपास के क्षेत्रों में जंगली शिकार की संख्या और बढ़ाई जाती है तो चीतों का घरेलू पशुओं पर निर्भर होना कम हो सकता है। इसके लिए आवास प्रबंधन, शिकार प्रजातियों के संरक्षण और वन क्षेत्रों के विस्तार पर लगातार काम करने की आवश्यकता होगी। वहीं चीतों की बढ़ती आवाजाही यह भी दिखाती है कि वे नए क्षेत्रों को तलाश रहे हैं और भारतीय जंगलों में अपना प्राकृतिक विस्तार स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 13:40:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कटघोरा में 13 हाथियों की जलक्रीड़ा, वीडियो वायरल</title>
                                    <description><![CDATA[सलिहाभाठा जलाशय में मस्ती करते दिखा हाथियों का झुंड, वन विभाग अलर्ट]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/water-sports-video-of-13-elephants-in-katghora-goes-viral/article-57040"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-elephants.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के कटघोरा वनमंडल में 13 हाथियों के झुंड का एक दुर्लभ और मनमोहक दृश्य सामने आया है। ऐतमा नगर परिक्षेत्र के सलिहाभाठा जलाशय में इन हाथियों को जलक्रीड़ा करते और ‘डस्ट बाथ’ लेते हुए देखा गया, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। यह दृश्य लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है और वन्यजीव प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र भी बन गया है। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि हाथियों का झुंड पानी में उतरकर एक-दूसरे पर सूंड़ से पानी उछालते हुए मस्ती कर रहा है। कुछ हाथी गहरे पानी में लोटपोट होते नजर आते हैं, जबकि अन्य किनारे पर खड़े होकर अपने शरीर पर सूखी मिट्टी और धूल डालते दिखाई देते हैं। यह पूरी गतिविधि प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा है, जिसे देखकर स्थानीय लोग भी हैरान रह गए। सुबह और शाम के समय यह दृश्य और भी ज्यादा सक्रिय रहता है, जब हाथियों का झुंड जलस्रोतों की ओर पहुंचता है। हाथियों द्वारा धूल-मिट्टी अपने शरीर पर डालने की प्रक्रिया को ‘डस्ट बाथ’ कहा जाता है। यह उनकी प्राकृतिक आदत है, जो उन्हें तेज धूप, गर्मी और कीड़ों के हमले से बचाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि जलक्रीड़ा के बाद हाथी अक्सर इस प्रक्रिया को अपनाते हैं, जिससे उनकी त्वचा सुरक्षित रहती है और शरीर का तापमान भी नियंत्रित होता है। यह व्यवहार हाथियों के सामाजिक और प्राकृतिक जीवन का अहम हिस्सा माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, कटघोरा वनमंडल में हाथियों की आवाजाही कोई नई बात नहीं है, लेकिन इतने बड़े झुंड का एक साथ जलाशय में दिखाई देना दुर्लभ है। बताया जा रहा है कि इस इलाके में करीब 50 हाथियों का एक स्थायी दल विचरण करता है, जो अक्सर भोजन और पानी की तलाश में जंगलों से निकलकर खेतों और जलस्रोतों की ओर पहुंचता है। रात के समय इनकी गतिविधियां अधिक बढ़ जाती हैं, जिससे कई बार ग्रामीण क्षेत्रों में सतर्कता बढ़ानी पड़ती है। वीडियो वायरल होने के बाद कटघोरा वन विभाग तुरंत अलर्ट हो गया है। वन विभाग की टीम ने सलिहाभाठा जलाशय और आसपास के गांवों में गश्त तेज कर दी है। अधिकारियों ने स्थानीय लोगों से अपील की है कि वे हाथियों के करीब जाने की कोशिश न करें और उन्हें किसी भी तरह से परेशान न करें। विभाग का कहना है कि ऐसे प्राकृतिक दृश्यों को दूर से देखना ही सुरक्षित और उचित है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वन विभाग ने ग्रामीणों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह भी दी है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि हाथियों के दिखने पर शोर न मचाया जाए, पटाखे न जलाए जाएं और किसी भी प्रकार की उकसाने वाली गतिविधि से बचा जाए। ऐसा करने से मानव-वन्यजीव संघर्ष की संभावना बढ़ सकती है, जो दोनों पक्षों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। अधिकारियों के अनुसार, गर्मी के मौसम में जंगलों में जलस्रोत सूखने लगते हैं, जिससे हाथियों के झुंड पानी की तलाश में नदी, तालाब और जलाशयों की ओर बढ़ते हैं। यही कारण है कि कटघोरा वनमंडल जैसे क्षेत्रों में हाथियों की आवाजाही अधिक देखी जाती है। इस समय वन विभाग लगातार निगरानी बनाए हुए है ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वन विभाग ने निगरानी को और मजबूत करते हुए ड्रोन और सीसीटीवी कैमरों का उपयोग भी शुरू किया है। इन तकनीकों के जरिए हाथियों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि इससे उनकी लोकेशन ट्रैक करने में मदद मिलती है और ग्रामीणों को समय रहते सतर्क किया जा सकता है। यह पूरा दृश्य जहां एक ओर प्रकृति की सुंदरता और वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यह भी याद दिलाता है कि मानव और वन्यजीवों के बीच संतुलन बनाए रखना कितना जरूरी है। कटघोरा का यह वायरल वीडियो लोगों को प्रकृति के करीब लाने के साथ-साथ सतर्कता का संदेश भी दे रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 16:20:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एमपी में गिद्धों की गिनती अंतिम दौर में, संख्या 14 हजार पार होने के संकेत</title>
                                    <description><![CDATA[मध्य प्रदेश में गिद्धों की गणना अंतिम चरण में पहुंची। शुरुआती रिपोर्ट में संख्या 14 हजार के पार जाने का अनुमान जताया गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/in-the-last-round-of-vulture-counting-in-mp-the/article-54093"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/madhya-pradesh-vulture-census.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश में गिद्धों की गणना का काम रविवार को तीसरे दिन भी चलता रहा। अब सबकी नजर फाइनल आंकड़ों पर है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन शुरुआती रिपोर्ट में गिद्धों की संख्या 14 हजार के पार पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस बार राज्य के 16 वन वृत्त</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">9 टाइगर रिजर्व और अन्य संरक्षित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर गिनती की गई है। खास बात यह है कि पहली बार ऑनलाइन एप के जरिए पूरी निगरानी और डेटा एंट्री की जा रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे रिपोर्ट तैयार करना काफी आसान हो गया है। सुबह सूरज निकलने के तुरंत बाद टीमें जंगलों और गिद्धों के घोंसले वाले इलाकों में पहुंचीं। कई जगहों पर लाल सिर वाले और सफेद पीठ वाले गिद्ध नजर आए हैं।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">प्रारंभिक जानकारी के अनुसार</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">पन्ना क्षेत्र में रेड हेडेड वल्चर यानी लाल सिर वाले गिद्ध मिले हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं भोपाल के वन विहार नेशनल पार्क में सफेद पीठ वाले गिद्धों की मौजूदगी देखी गई। फरवरी में हुए सर्वे में प्रदेश में करीब सात प्रजातियों के गिद्ध पाए गए थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें भारतीय गिद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिनेरियस गिद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिस्र गिद्ध और हिमालयन ग्रिफॉन प्रमुख रहे। वन विभाग का कहना है कि पिछले लगभग दस साल में प्रदेश में गिद्धों की संख्या तेजी से बढ़ी है। 2019 में इनकी संख्या करीब 8 हजार थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि 2025 की गणना में यह बढ़कर 12,981 तक पहुंच गई थी। इस बार तो संख्या और भी बढ़ने की संभावना है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">गणना की प्रक्रिया भी काफी ध्यानपूर्वक की जा रही है। गणनाकर्मी और स्वयंसेवक घोंसलों के आसपास बैठे गिद्धों और उनके बच्चों की गिनती कर एप में जानकारी दर्ज कर रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">उड़ते हुए गिद्धों को गिनती में शामिल नहीं किया जाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि दोबारा गिनने में गलती न हो। कई इलाकों में सुबह 9 बजे तक ही सर्वे का काम पूरा कर लिया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उसके बाद तापमान बढ़ने लगता है और गिद्ध ऊंचाई पर उड़ने लगते हैं। बताया जा रहा है कि इस बार टाइगर रिजर्व क्षेत्रों से भी अच्छी संख्या सामने आ सकती है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि गिद्ध कभी विलुप्त होने की कगार पर थे। एक वक्त था जब भारत में इनकी संख्या करोड़ों में थी</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन पशुओं के लिए इस्तेमाल होने वाली डाइक्लोफेनाक दवा के कारण बड़ी संख्या में गिद्धों की मौत होने लगी। इसके बाद इस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उससे धीरे-धीरे इनकी संख्या में सुधार दिखने लगा। मध्य प्रदेश में संरक्षण के लिए लगातार प्रयास किए गए हैं। भोपाल के वन विहार में करीब तीन साल पहले हरियाणा से सफेद पीठ वाले 20 गिद्ध लाए गए थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें संरक्षण केंद्र में रखा गया है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">गिद्धों की प्रजनन प्रक्रिया भी काफी धीमी मानी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">ये पक्षी साल में सिर्फ एक बार अंडा देते हैं और बच्चे के जीवित निकलने की संभावना लगभग 50 फीसदी होती है। यही वजह है कि उनकी संख्या बढ़ने में समय लगता है। फिलहाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदेश में लगातार बढ़ती संख्या को वन विभाग ने सकारात्मक संकेत माना है। अधिकारियों का कहना है कि अंतिम रिपोर्ट आने के बाद स्थिति और स्पष्ट होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन शुरुआती आंकड़े काफी उत्साहजनक हैं।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 24 May 2026 11:15:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कूनो मे मादा चीता जंगल में दौड़ेगी, टाइगर स्टेट से आगे MP बन रहा वाइल्डलाइफ मॉडल</title>
                                    <description><![CDATA[कूनो नेशनल पार्क में मादा चीतों को जंगल में छोड़ा गया। MP वाइल्डलाइफ संरक्षण, टाइगर रिजर्व और इको-टूरिज्म में नया मॉडल बन रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/female-cheetah-will-run-in-the-forest-mp-is-becoming/article-53117"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ---2026-05-11t132729.875.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">सोमवार को मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले के कूनो नेशनल पार्क में एक खास कदम उठाया जाएगा। यहां</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">बोत्सवाना से लाई गई दो मादा चीतों को उनके बाड़े से खुले जंगल में छोड़ने का कार्यक्रम है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 10-11 मई को कूनो का दौरा करेंगे और इसी दौरान यह प्रक्रिया पूरी होगी। वन विभाग के अधिकारी इसे प्रोजेक्ट चीता के अगले बड़े पड़ाव के रूप में देख रहे हैं। उम्मीद है कि इन मादा चीतों को अब जंगल के बड़े हिस्से में आज़ाद घूमने का मौका मिलेगा।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">ये गतिविधि सिर्फ वन्यजीवों की रिहाई नहीं है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि इसे मध्यप्रदेश के व्यापक मॉडल से भी जोड़ा जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें वन्यजीव संरक्षण को सरकारी योजनाओं से आगे बढ़ाकर एक व्यापक नीति और सामाजिक आंदोलन के रूप में विकसित किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में कूनो में चीतों की संख्या बढ़कर 57 हो चुकी है और अब इसे एक वैश्विक संरक्षण प्रयोगशाला के रूप में विकसित करने की योजनाएं हैं।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दिसंबर 2023 में कार्यभार संभालने के बाद से वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में नई सोच लाने का काम किया है। इसे अब न केवल पर्यावरण तक सीमित रखा जा रहा है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पर्यटन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रामीण रोजगार और सांस्कृतिक पहचान से भी जोड़ा जा रहा है। इसी वजह से पिछले डेढ़ साल में राज्य में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। रातापानी टाइगर रिजर्व का देश के आठवें टाइगर रिजर्व के रूप में घोषित होना भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसकी निकटता भोपाल के कारण इको-टूरिज्म को नई दिशा मिलेगी।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">इसी तरह</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्च 2025 में घोषित माधव टाइगर रिजर्व को लेकर विशेषज्ञों की राय भी सकारात्मक है। यहां बन रही सुरक्षा दीवार को मानव और वन्यजीव संघर्ष को कम करने की एक ठोस पहल माना जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ते टकराव के संदर्भ में।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;"> </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मध्यप्रदेश का गिद्ध संरक्षण मॉडल भी चर्चा में है। यहां गिद्धों की संख्या 14 हजार से अधिक है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो देश में सबसे अधिक है। वन विहार नेशनल पार्क और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के सहयोग से चल रहे रेस्क्यू सेंटर में घायलों का इलाज किया जा रहा है। हाल ही में एक गिद्ध के उज्बेकिस्तान तक पहुंचने की घटना को विभाग ने बड़ी उपलब्धि बताया है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">कूनो के साथ-साथ गांधी सागर और नौरादेही वाइल्डलाइफ सेंचुरी को भी चीता लैंडस्केप के रूप में विकसित किया जा रहा है। अधिकारियों ने बताया कि नौरादेही में सॉफ्ट रिलीज बोमा का निर्माण अगले चरण की तैयारी है। वहीं</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">नए वन्यजीव अभ्यारण्यों और कंजर्वेशन रिजर्व के जरिए राज्य अपने सुरक्षित क्षेत्रों का दायरा लगातार बढ़ा रहा है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">वन विभाग के अनुसार</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताप्ती क्षेत्र को मध्यप्रदेश का पहला कंजर्वेशन रिजर्व घोषित करना भी एक बड़ी सफलता है। इस क्षेत्र में </span>Tigers, Leopards <span lang="hi" xml:lang="hi">और अन्य दुर्लभ प्रजातियों की मौजूदगी इसे संवेदनशील बनाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मॉडल स्थानीय समुदाय और संरक्षण के बीच संतुलन बनाने में मदद करेगा।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">इसके अलावा</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">हाथी संरक्षण योजना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घड़ियाल और मगरमच्छों के संरक्षण कार्यक्रम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जंगली भैंसों की पुनर्स्थापना जैसी योजनाएं भी राज्य में चल रही हैं। टाइगर कॉरिडोर परियोजना को भविष्य की सबसे बड़ी योजना माना जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके तहत कई टाइगर रिजर्व को जोड़ने की तैयारी है। इससे वन्यजीवों की आवाजाही भी सुरक्षित हो सकेगी।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">वन्यजीव विभाग का कहना है कि इको-टूरिज्म और संरक्षण गतिविधियों से स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। कूनो और अन्य संरक्षित क्षेत्रों में पर्यटन बढ़ने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर देखा जा रहा है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">कुल मिलाकर</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">कूनो में मादा चीतों की जंगल में रिहाई सिर्फ एक घटना नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह मध्यप्रदेश में एक बड़े बदलाव का हिस्सा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें राज्य खुद को </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">टाइगर स्टेट</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">से आगे बढ़ाकर </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">वाइल्डलाइफ लीडर</span>” <span lang="hi" xml:lang="hi">की दिशा में प्रगति कर रहा है।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 May 2026 15:04:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Rohit.P]]></dc:creator>
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