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                <title>Court Order - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Court Order RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती में NOC विवाद, हाईकोर्ट ने 120 दिन में मांगी जांच रिपोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[राजनीति शास्त्र के सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति पर उठे सवाल, उच्च शिक्षा सचिव और सीजीपीएससी को पूरे मामले की जांच कर तय समय में निर्णय लेने के निर्देश।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/noc-controversy-in-assistant-professor-recruitment-high-court-asked-for/article-58488"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/chhattisgarh-high-court-(10).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति प्रक्रिया में कथित अनियमितता के मामले को गंभीरता से लेते हुए उच्च शिक्षा विभाग और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सीजीपीएससी) को विस्तृत जांच के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पूरे मामले की जांच कर 120 दिनों के भीतर उचित निर्णय लिया जाए। मामला राजनीति शास्त्र विषय में सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति से जुड़ा है, जहां आरोप लगाया गया है कि हरियाणा सरकार में पहले से कार्यरत एक उम्मीदवार को आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) के बिना ही नियुक्ति दे दी गई। इस मामले को लेकर रायगढ़ निवासी अली हसन ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अदालत ने याचिका पर सुनवाई के बाद कहा कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब उच्च शिक्षा सचिव और सीजीपीएससी को पूरे रिकॉर्ड की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई करनी होगी। माना जा रहा है कि यह फैसला भविष्य की सरकारी नियुक्तियों में पारदर्शिता और नियमों के पालन को लेकर महत्वपूर्ण माना जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता अली हसन ने अपनी याचिका में बताया कि छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग ने वर्ष 2019 में राजनीति शास्त्र विषय के सहायक प्राध्यापक के 59 पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था। भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद वर्ष 2021 में अंतिम चयन सूची प्रकाशित की गई, जिसमें अली हसन को अनारक्षित वर्ग की प्रतीक्षा सूची में पहला स्थान मिला। चयन सूची का अध्ययन करने के दौरान उन्हें जानकारी मिली कि मुख्य चयन सूची में शामिल रंजन तिवारी पहले से हरियाणा सरकार के उच्चतर शिक्षा निदेशालय में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। इसके बाद अली हसन ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत हरियाणा सरकार से संबंधित जानकारी मांगी। आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार रंजन तिवारी 13 फरवरी 2020 से हरियाणा के महेंद्रगढ़ स्थित शासकीय महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक के रूप में सेवा दे रहे थे। याचिका में दावा किया गया कि उन्होंने छत्तीसगढ़ में नियुक्ति के लिए अपने वर्तमान नियोक्ता से आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं किया था और न ही उसे प्रस्तुत किया गया। इसके बावजूद 29 अप्रैल 2022 को उनकी नियुक्ति शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय भाटापारा, जिला बलौदाबाजार में कर दी गई। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह नियुक्ति सेवा नियमों और भर्ती प्रक्रिया की शर्तों के विपरीत है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि सरकारी या अर्ध-सरकारी संस्थानों में कार्यरत अभ्यर्थियों के लिए नई नियुक्ति स्वीकार करने से पहले संबंधित विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य होता है। यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि किसी भी कर्मचारी की सेवा स्थिति स्पष्ट रहे और नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे। याचिका में यह भी कहा गया कि भर्ती नियमों के अनुसार यदि कोई अभ्यर्थी गलत जानकारी देता है या आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करता, तो उसकी नियुक्ति रद्द की जा सकती है और उसके खिलाफ वैधानिक कार्रवाई भी संभव है। मामले को मजबूत करने के लिए याचिकाकर्ता ने भाटापारा शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय से सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी भी अदालत के समक्ष रखी। कॉलेज प्रशासन ने अपने जवाब में स्वीकार किया कि रंजन तिवारी ने 23 मई 2022 को कार्यभार ग्रहण किया था, लेकिन उनके कार्यालय रिकॉर्ड में नियोक्ता का अनापत्ति प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं है। इस तथ्य को अदालत ने भी गंभीरता से लिया। मामले की सुनवाई जस्टिस राकेश मोहन पांडे की एकल पीठ में हुई। अदालत ने तत्काल नियुक्ति रद्द करने का आदेश नहीं दिया, बल्कि उच्च शिक्षा सचिव और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग को निर्देश दिया कि वे पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करें और उपलब्ध दस्तावेजों, सेवा नियमों तथा संबंधित तथ्यों के आधार पर 120 दिनों के भीतर अंतिम निर्णय लें। हाईकोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि सरकारी नियुक्तियों में नियमों का पालन अनिवार्य है और किसी भी प्रकार की प्रक्रिया संबंधी चूक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस आदेश के बाद अब सभी की निगाहें जांच प्रक्रिया पर टिकी हैं। यदि जांच में याचिकाकर्ता के आरोप सही पाए जाते हैं तो नियुक्ति पर प्रभाव पड़ सकता है और प्रतीक्षा सूची में शामिल अभ्यर्थियों के अधिकारों पर भी निर्णय लिया जा सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 16:50:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, AI के फर्जी कानूनी उदाहरणों को बताया न्याय व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[एनसीएलटी का फैसला रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार किए गए झूठे कानूनी उदाहरण अदालतों में पेश करना न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर असर डाल सकता है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/supreme-courts-strict-comment-calls-fake-legal-examples-of-ai/article-57706"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/supreme-court-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार किए गए फर्जी कानूनी उदाहरणों के इस्तेमाल पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बताया है। अदालत ने कहा कि AI तकनीक अपने आप में समस्या नहीं है, लेकिन यदि उससे तैयार की गई गलत या मनगढ़ंत जानकारी को असली कानूनी मिसाल बताकर अदालत के सामने पेश किया जाता है तो इससे न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ता है। कोर्ट ने इस खतरे की गंभीरता समझाने के लिए भोपाल गैस त्रासदी में मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह जहरीली गैस का प्रभाव दूरगामी और विनाशकारी था, उसी तरह न्यायिक प्रक्रिया में झूठी कानूनी जानकारी का प्रवेश भी बेहद नुकसानदायक हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने यह टिप्पणी नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) मुंबई के एक आदेश को रद्द करते हुए की। मामला एस्सेल इन्फ्राप्रोजेक्ट लिमिटेड, जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड और पूजा रमेश सिंह से जुड़े दिवालियापन विवाद का था। एनसीएलटी ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की धारा-7 के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए अपने फैसले में कई ऐसे कानूनी मामलों का हवाला दिया था, जिनका वास्तविक अस्तित्व ही नहीं था। जांच के दौरान सामने आया कि आदेश में जिन फैसलों का उल्लेख किया गया, उनमें कुछ पूरी तरह मनगढ़ंत थे और उनकी कानूनी साइटेशन भी वास्तविक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाती थीं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों में किसी भी फैसले का आधार केवल प्रमाणिक और सत्यापित कानूनी सामग्री होनी चाहिए। यदि किसी आदेश में ऐसे मामलों का हवाला दिया जाए जो वास्तव में मौजूद ही नहीं हैं, तो यह केवल तकनीकी गलती नहीं बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की मूल भावना के खिलाफ है। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस तरह की चूक लोगों के न्यायपालिका पर भरोसे को कमजोर कर सकती है और भविष्य के मामलों में भी गलत कानूनी आधार तैयार कर सकती है। अदालत ने कहा कि न्याय व्यवस्था का पूरा ढांचा सत्य, पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर आधारित है, इसलिए इसमें किसी भी प्रकार की फर्जी जानकारी के लिए कोई जगह नहीं हो सकती।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मामले की सुनवाई के दौरान जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड ने शपथपत्र दाखिल कर कहा कि उसके वकीलों ने अपने तर्कों में इन कथित मामलों का कोई उल्लेख नहीं किया था। बैंक के अनुसार, एनसीएलटी ने अपने स्तर पर की गई कानूनी रिसर्च के दौरान इन उदाहरणों को आदेश में शामिल किया। इस दलील के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड की समीक्षा की और पाया कि आदेश में शामिल कुछ कानूनी संदर्भ वास्तविक न्यायिक अभिलेखों में उपलब्ध ही नहीं थे। इसके बाद अदालत ने एनसीएलटी का आदेश रद्द कर दिया और भविष्य के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश भी जारी किए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि वह AI तकनीक के उपयोग के खिलाफ नहीं है। अदालत ने कहा कि आधुनिक तकनीक न्यायिक शोध और दस्तावेजों की तैयारी में उपयोगी हो सकती है, लेकिन अंतिम जिम्मेदारी हमेशा इंसानों की ही रहेगी। यदि कोई वकील बिना तथ्य जांचे AI से प्राप्त जानकारी को अदालत में पेश करता है, तो यह उसकी गंभीर पेशेवर लापरवाही मानी जाएगी। इसी तरह यदि कोई न्यायिक अधिकारी या न्यायाधीश बिना सत्यापन के ऐसी सामग्री पर भरोसा करता है, तो यह भी न्यायिक जिम्मेदारी के अनुरूप नहीं माना जाएगा। अदालत ने कहा कि तकनीक केवल सहायक हो सकती है, लेकिन निर्णय और तथ्य सत्यापन का दायित्व मानव विवेक पर ही आधारित रहना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पीठ ने कहा कि केवल चेतावनी देना पर्याप्त नहीं होगा। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर या लापरवाही से अदालत में फर्जी AI-आधारित कानूनी सामग्री प्रस्तुत करता है, तो उसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। अदालत ने इस मुद्दे को भविष्य की न्यायिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि समय रहते स्पष्ट नियम बनाना आवश्यक है ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके। न्यायपालिका में विश्वास बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि अदालतों में प्रस्तुत हर कानूनी संदर्भ का स्वतंत्र सत्यापन किया जाए। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने की सिफारिश की है। अदालत का कहना है कि यह समिति अदालतों में AI के जिम्मेदार उपयोग के लिए दिशा-निर्देश तैयार करे और यह सुनिश्चित करे कि किसी भी वकील या पक्षकार द्वारा फर्जी अथवा भ्रामक AI सामग्री प्रस्तुत न की जाए। यदि ऐसे मामलों में नियमों का उल्लंघन होता है तो उसके लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी प्रावधान होना चाहिए। अदालत ने कहा कि तकनीक का उपयोग स्वागतयोग्य है, लेकिन न्याय की प्रक्रिया में सत्य और प्रमाणिकता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 06:06:00 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>स्कूलों में मंत्रोच्चार पर याचिका खारिज, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सबूत के साथ दोबारा आने को कहा</title>
                                    <description><![CDATA[राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर हाईकोर्ट ने फिलहाल हस्तक्षेप से इनकार किया, कहा- आदेश लागू होने के ठोस प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/raipur/chhattisgarh-high-court-rejects-petition-on-chanting-in-schools-asks/article-57670"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/chhattisgarh-high-court-(7).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य के सरकारी स्कूलों में मंत्रोच्चार कराए जाने संबंधी राज्य शासन के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका फिलहाल खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसे कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किए गए हैं, जिनसे यह साबित हो सके कि संबंधित आदेश का वास्तव में स्कूलों में पालन शुरू हो चुका है। ऐसे में न्यायालय ने इस स्तर पर किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि भविष्य में आदेश के अमल से जुड़े ठोस प्रमाण सामने आते हैं तो याचिकाकर्ता नई याचिका दाखिल कर सकते हैं। इस फैसले के बाद फिलहाल इस मुद्दे पर कानूनी राहत नहीं मिली है, लेकिन अदालत ने भविष्य के लिए कानूनी रास्ता खुला रखा है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह याचिका छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल सलमान रिज़वी की ओर से दायर की गई थी। याचिका में राज्य सरकार के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें स्कूलों में मंत्रोच्चार कराए जाने का प्रावधान बताया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह आदेश संविधान में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के विपरीत है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया था कि इस आदेश को असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त किया जाए। मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता डॉ. अमीर खान ने पक्ष रखा और कहा कि इस आदेश से संविधान के मूल प्रावधान प्रभावित होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने सबसे पहले इस बात पर जोर दिया कि अदालत किसी भी प्रशासनिक आदेश में तभी हस्तक्षेप करती है, जब उसके लागू होने या उससे प्रभावित होने के स्पष्ट और ठोस प्रमाण उपलब्ध हों। अदालत ने कहा कि मौजूदा याचिका में ऐसे दस्तावेज, वीडियो या अन्य सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई, जिससे यह साबित हो सके कि राज्य सरकार का आदेश वास्तव में स्कूलों में लागू किया जा चुका है। केवल आशंका या संभावना के आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता। इसी कारण अदालत ने फिलहाल याचिका स्वीकार करने से इनकार कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">अधिवक्ता डॉ. अमीर खान के अनुसार, सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में किसी सरकारी या सहायता प्राप्त स्कूल में इस आदेश का पालन कराए जाने के प्रमाण सामने आते हैं, तो याचिकाकर्ता उन साक्ष्यों को रिकॉर्ड पर रखकर दोबारा अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि वीडियो, फोटो, आधिकारिक दस्तावेज या अन्य विश्वसनीय सामग्री उपलब्ध होती है, तो उसके आधार पर नई याचिका पर विचार किया जा सकता है। इस टिप्पणी को मामले का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट हो गया है कि अदालत ने कानूनी चुनौती का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस फैसले के बाद फिलहाल राज्य सरकार के आदेश पर कोई न्यायिक रोक नहीं लगी है। हालांकि अदालत ने आदेश की वैधता पर कोई अंतिम टिप्पणी भी नहीं की है। न्यायालय का पूरा फोकस इस बात पर रहा कि याचिका में प्रस्तुत तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं बनती। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत ने इस मामले में प्रक्रिया संबंधी सिद्धांतों का पालन करते हुए फैसला दिया है। किसी भी नीति या प्रशासनिक आदेश को चुनौती देने के लिए उसके प्रभाव या क्रियान्वयन के पर्याप्त प्रमाण होना आवश्यक माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस मामले ने राज्य में शिक्षा व्यवस्था और धार्मिक गतिविधियों को लेकर एक नई बहस भी छेड़ दी है। एक पक्ष का मानना है कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं से जुड़े कार्यक्रम स्कूलों में कराए जा सकते हैं, जबकि दूसरा पक्ष इसे संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के संदर्भ में देख रहा है। हालांकि इन सभी मुद्दों पर हाईकोर्ट ने फिलहाल कोई टिप्पणी नहीं की और केवल उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही अपना निर्णय सुनाया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर केवल याचिका की स्वीकार्यता पर विचार कर रही थी, न कि आदेश की संवैधानिक वैधता पर। भविष्य में यदि किसी स्कूल में आदेश के पालन के प्रमाण सामने आते हैं और उसके आधार पर नई याचिका दायर होती है, तो अदालत उस समय मामले के संवैधानिक पहलुओं पर भी विस्तार से विचार कर सकती है। फिलहाल इस फैसले से यह संदेश गया है कि न्यायालय केवल अनुमान या आशंका के आधार पर हस्तक्षेप नहीं करेगा, बल्कि ठोस तथ्यों और साक्ष्यों को प्राथमिकता देगा। यही वजह है कि याचिकाकर्ता को दोबारा याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता भी दी गई है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>रायपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 17:22:30 +0530</pubDate>
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                <title>जीतू पटवारी के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट, कोर्ट ने पुलिस से मांगा जवाब</title>
                                    <description><![CDATA[भिंड की विशेष MP-MLA कोर्ट ने 2024 चुनावी भाषण से जुड़े मामले में अगली सुनवाई पर हर हाल में उपस्थिति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/arrest-warrant-against-jitu-patwari-court-seeks-answer-from-police/article-57505"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/jitu-patwari.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान दिए गए एक चुनावी भाषण से जुड़े मामले में मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी की मुश्किलें बढ़ गई हैं। ग्वालियर की विशेष MP-MLA कोर्ट ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करते हुए भिंड पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिए हैं कि अगली सुनवाई पर उनकी अदालत में उपस्थिति हर हाल में सुनिश्चित की जाए। अदालत ने सुनवाई के दौरान पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए और कहा कि जब जीतू पटवारी सार्वजनिक कार्यक्रमों, मीडिया और राजनीतिक गतिविधियों में लगातार दिखाई दे रहे हैं, तो पुलिस उन्हें तलाशने में असफल कैसे हो सकती है। मामले की अगली सुनवाई 27 जुलाई को निर्धारित की गई है। यह मामला लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान 27 अप्रैल 2024 को भिंड जिले के ऊमरी कस्बे में आयोजित एक चुनावी सभा से जुड़ा है। उस समय जीतू पटवारी कांग्रेस प्रत्याशी फूल सिंह बरैया के समर्थन में प्रचार करने पहुंचे थे। सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने भिंड-दतिया लोकसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी देवाशीष जरारिया को लेकर कुछ आरोप लगाए थे। शिकायत के अनुसार, उन्होंने चुनावी मंच से बसपा प्रत्याशी पर भाजपा से सांठगांठ और कथित लेनदेन के आरोप लगाए थे। शिकायतकर्ता का यह भी आरोप है कि भाषण के दौरान कुछ आपत्तिजनक शब्दों का भी प्रयोग किया गया, जिससे उनकी छवि प्रभावित हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव के कुछ दिनों बाद देवाशीष जरारिया की ओर से इस मामले में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई। शिकायत के आधार पर 4 मई 2024 को भिंड जिले के उमरी थाने में जीतू पटवारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। शिकायत के साथ चुनावी सभा की वीडियो रिकॉर्डिंग भी पुलिस को सौंपी गई थी। पुलिस ने वीडियो का परीक्षण करने के बाद प्रकरण दर्ज किया और जांच आगे बढ़ाई। इसके बाद अदालत ने 16 जनवरी 2026 को जीतू पटवारी को पेश होने का नोटिस जारी किया था, लेकिन निर्धारित तिथि पर वे अदालत में उपस्थित नहीं हुए। हालिया सुनवाई के दौरान पुलिस ने अदालत को बताया कि जीतू पटवारी का पता नहीं चल सका, इसलिए उन्हें नोटिस तामील नहीं कराया जा सका। इस पर अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब संबंधित व्यक्ति लगातार मीडिया में दिखाई दे रहे हैं, सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे हैं और राजनीतिक गतिविधियां कर रहे हैं, तब पुलिस का उन्हें तलाश नहीं पाना समझ से परे है। अदालत ने इस पर नाराजगी जताते हुए भिंड पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिए कि अगली सुनवाई में उनकी मौजूदगी हर हाल में सुनिश्चित की जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">एफआईआर में दर्ज विवरण के अनुसार, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि चुनावी सभा के दौरान जीतू पटवारी ने कहा था कि बसपा प्रत्याशी भाजपा से "माल लाए हैं" और मतदाताओं से उन्हें वोट नहीं देने की अपील की थी। शिकायत में यह भी कहा गया कि इस तरह के बयान बिना किसी प्रमाण के सार्वजनिक मंच से दिए गए, जिससे उनकी राजनीतिक और सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित हुई। इसी आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर कानूनी प्रक्रिया शुरू की थी। चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए भाषणों और सार्वजनिक बयानों की जिम्मेदारी संबंधित नेता की होती है। यदि किसी बयान को लेकर शिकायत दर्ज होती है और अदालत उसे सुनवाई योग्य मानती है, तो कानून के तहत पूरी प्रक्रिया का पालन किया जाता है। इस मामले में भी अदालत ने अभी केवल उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए गिरफ्तारी वारंट जारी किया है। मामले में अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही आएगा। यह लोकसभा चुनाव के दौरान दिए गए भाषण से जुड़ा हुआ है। फिलहाल अदालत ने पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि अगली सुनवाई तक सभी आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं पूरी की जाएं और संबंधित पक्ष की अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित की जाए। अब 27 जुलाई को होने वाली सुनवाई में इस मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया तय होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 13:43:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वक्फ संपत्ति विवाद में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- ऐसे मामलों की सुनवाई ट्रिब्यूनल ही करेगा</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वक्फ संपत्ति पर कथित अवैध निर्माण से जुड़ी याचिका पर सुनवाई से किया इनकार, ट्रिब्यूनल को दो महीने में फैसला करने का निर्देश]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/high-courts-big-decision-in-waqf-property-dispute-said/article-57132"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/waqf-property-dispute.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वक्फ संपत्तियों से जुड़े विवादों की सुनवाई को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों के निपटारे के लिए वक्फ ट्रिब्यूनल ही सक्षम और वैधानिक मंच है। अदालत ने कहा कि जब वक्फ अधिनियम के तहत विवादों के समाधान के लिए विशेष व्यवस्था उपलब्ध है, तब सीधे हाईकोर्ट में हस्तक्षेप करना उचित नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मामला पहले से ट्रिब्यूनल के समक्ष लंबित है तो वहीं उसकी सुनवाई होगी और उसी मंच पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने संबंधित ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया है कि लंबित मामले का कानून के अनुसार दो महीने के भीतर निपटारा किया जाए। मामले की सुनवाई जस्टिस ए.के. प्रसाद की एकल पीठ में हुई। याचिकाकर्ता मोहम्मद अजमल खान ने कवर्धा स्थित जामा मस्जिद मुस्लिम ट्रस्ट की वक्फ संपत्ति पर कथित अवैध निर्माण को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में आरोप लगाया गया कि वक्फ संपत्ति के मुतवल्ली यानी प्रबंधक की ओर से नियमों के विपरीत निर्माण कराया जा रहा है, जिससे वक्फ संपत्ति के प्रबंधन और उपयोग को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) ने कथित अवैध निर्माण को रोकने के लिए पहले ही आदेश जारी किए थे। इसके बावजूद जिला प्रशासन की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। उनका कहना था कि आदेश जारी होने के बाद भी निर्माण को रोकने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए गए, जिसके कारण उन्हें न्याय के लिए अदालत की शरण लेनी पड़ी। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता पहले ही वक्फ अधिनियम की धारा 83(2) के तहत वक्फ ट्रिब्यूनल में आवेदन प्रस्तुत कर चुके थे। हालांकि उस समय ट्रिब्यूनल में आवश्यक कोरम उपलब्ध नहीं होने के कारण मामले की सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी थी। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की थी। मामले में राज्य सरकार और वक्फ बोर्ड की ओर से अदालत में कहा गया कि वक्फ अधिनियम के तहत इस प्रकार के विवादों के निपटारे के लिए विशेष रूप से ट्रिब्यूनल का गठन किया गया है। अब ट्रिब्यूनल पूरी तरह कार्यशील है और संबंधित मामला पहले से वहीं लंबित है। इसलिए हाईकोर्ट को इस स्तर पर हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। उनका तर्क था कि जब कानून ने किसी विशेष विवाद के लिए अलग मंच निर्धारित किया है तो उसी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और वक्फ बोर्ड के तर्कों से सहमति जताई। अदालत ने कहा कि वक्फ अधिनियम में स्पष्ट रूप से ट्रिब्यूनल को ऐसे मामलों की सुनवाई और निर्णय का अधिकार दिया गया है। इसलिए हाईकोर्ट समानांतर रूप से इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा। अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे अपना पक्ष वक्फ ट्रिब्यूनल के समक्ष ही रखें। साथ ही हाईकोर्ट ने संबंधित वक्फ ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया कि यदि मामला अभी भी लंबित है तो कानून के अनुरूप उसकी सुनवाई कर दो महीने के भीतर निर्णय दिया जाए। अदालत ने माना कि न्याय में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए और यदि ट्रिब्यूनल अब कार्यशील है तो मामले का शीघ्र निपटारा किया जाना आवश्यक है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि उसने इस विवाद के गुण-दोष यानी मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की है। अदालत ने कहा कि मामले से जुड़े सभी तथ्य, साक्ष्य और कानूनी प्रश्न ट्रिब्यूनल के समक्ष विचार के लिए खुले रहेंगे। ट्रिब्यूनल स्वतंत्र रूप से उपलब्ध रिकॉर्ड और कानून के आधार पर अपना निर्णय देगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह फैसला भविष्य में वक्फ संपत्तियों से जुड़े विवादों के लिए महत्वपूर्ण माना जाएगा। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि जहां किसी विशेष कानून के तहत विवाद निपटाने के लिए वैधानिक मंच उपलब्ध हो, वहां सीधे हाईकोर्ट का रुख करने के बजाय पहले उसी मंच पर न्यायिक प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए। इससे न्यायिक व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ भी कम होगा और विशेष मामलों का निपटारा विशेषज्ञ मंचों के माध्यम से अधिक प्रभावी ढंग से हो सकेगा। वक्फ संपत्तियों को लेकर देश के विभिन्न राज्यों में समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों में संपत्ति के प्रबंधन, उपयोग, निर्माण कार्य और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर कई तरह के कानूनी प्रश्न उठते हैं। वक्फ अधिनियम इन्हीं विवादों के समाधान के लिए ट्रिब्यूनल की व्यवस्था करता है ताकि मामलों का त्वरित और विधिसम्मत निपटारा हो सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 27 Jun 2026 14:07:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>12 साल पुराने आदेश की अनदेखी पर हाईकोर्ट सख्त, कलेक्टर का फैसला रद्द</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्व मंडल के 2014 के आदेश का पालन नहीं होने पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी, जिम्मेदार अधिकारी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-strict-on-ignoring-12-year-old-order-collectors/article-56998"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mp-high-court-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रशासनिक लापरवाही और अदालती आदेशों की अनदेखी को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने राजस्व मंडल के करीब 12 साल पुराने आदेश का पालन नहीं किए जाने पर कड़ी नाराजगी जाहिर की। कोर्ट ने इस मामले में कलेक्टर द्वारा जारी एक आदेश को निरस्त कर दिया और आदेश के पालन में अनावश्यक देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब किसी सक्षम अदालत ने राजस्व मंडल के आदेश पर कोई रोक नहीं लगाई है, तब उसके क्रियान्वयन में वर्षों की देरी को किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने इसे प्रशासनिक उदासीनता और जवाबदेही की कमी का उदाहरण माना। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि राजस्व मंडल ने 20 मई 2014 को अपना आदेश पारित किया था, लेकिन इतने लंबे समय के बाद भी उसका प्रभावी पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारी न्यायिक आदेशों की अनदेखी नहीं कर सकते। यदि किसी आदेश पर कोई स्थगन नहीं है, तो उसका समयबद्ध तरीके से पालन करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है। अदालत ने यह भी कहा कि आदेशों के पालन में अनावश्यक देरी न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता को प्रभावित करती है और इससे आम नागरिकों का भरोसा भी कमजोर होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह पूरा मामला एडवेंचर वाइल्ड लाइफ रिजॉर्ट प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है। कंपनी की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि राजस्व मंडल के आदेश का पालन सुनिश्चित कराने के लिए पहले भी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया था। उस समय भी न्यायालय ने प्रशासन को निर्धारित समय सीमा के भीतर कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद आदेश का पालन नहीं किया गया और बाद में कलेक्टर की ओर से नया आदेश जारी कर दिया गया। रिकॉर्ड के अनुसार, हाईकोर्ट ने 7 जुलाई 2025 को प्रशासन को 45 दिनों के भीतर आवश्यक कार्रवाई पूरी करने के निर्देश दिए थे। लेकिन इसके बाद भी निर्धारित समय में आदेश लागू नहीं किया गया। इसके बजाय 27 फरवरी 2026 को कलेक्टर की ओर से एक नया आदेश जारी किया गया, जिसमें यह स्पष्ट करने की बात कही गई कि मामले में कहीं कोई अपील या अन्य कानूनी कार्यवाही लंबित तो नहीं है। न्यायालय ने इस प्रक्रिया को अनावश्यक बताया और कहा कि जब मूल आदेश पर किसी भी अदालत की ओर से रोक नहीं थी, तब इस तरह की कार्रवाई का कोई औचित्य नहीं बनता।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उपस्थित पैनल वकील ने भी अदालत के समक्ष स्वीकार किया कि राजस्व मंडल के 2014 के आदेश पर किसी भी सक्षम न्यायालय ने कोई अंतरिम राहत या स्थगन आदेश जारी नहीं किया है। इस स्वीकारोक्ति के बाद अदालत ने माना कि आदेश के पालन में हुई देरी पूरी तरह प्रशासनिक स्तर पर हुई लापरवाही का परिणाम है। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी केवल औपचारिक प्रक्रियाओं का हवाला देकर अपने दायित्व से बच नहीं सकते। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक और अर्धन्यायिक संस्थाओं द्वारा दिए गए आदेशों का सम्मान करना प्रशासनिक अधिकारियों की संवैधानिक जिम्मेदारी है। यदि किसी आदेश को चुनौती नहीं दी गई है या उस पर रोक नहीं लगी है, तो उसका तत्काल पालन किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में देरी से न केवल संबंधित पक्षों को नुकसान होता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता भी प्रभावित होती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">न्यायालय ने इस मामले में जिम्मेदार अधिकारी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाते हुए संकेत दिया कि भविष्य में इस तरह की लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत का मानना है कि जवाबदेही तय किए बिना प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है। इसलिए ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करना आवश्यक है ताकि भविष्य में न्यायालय के आदेशों के पालन में अनावश्यक देरी न हो। यह फैसला प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। इससे स्पष्ट होता है कि अदालतें अब न्यायिक आदेशों के पालन में होने वाली देरी को गंभीरता से देख रही हैं। साथ ही यह निर्णय उन लोगों के लिए भी राहत का संकेत है, जो वर्षों तक अपने अधिकारों के लिए न्यायालयों के चक्कर लगाने को मजबूर होते हैं। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायिक आदेशों के सम्मान को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। आने वाले समय में यह निर्णय ऐसे मामलों में मिसाल बन सकता है, जहां प्रशासनिक स्तर पर आदेशों के पालन में अनावश्यक देरी होती है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून के शासन में न्यायालय के आदेश सर्वोपरि हैं और उनका समय पर पालन सुनिश्चित करना हर संबंधित अधिकारी का कर्तव्य है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/high-court-strict-on-ignoring-12-year-old-order-collectors/article-56998</link>
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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 13:24:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>एमपी के दो टीआई समेत 100 पर FIR, ड्रग्स फैक्ट्री कार्रवाई पर उठे सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान की अदालत ने घाटाखेड़ी गांव में हुई NDPS कार्रवाई को संदिग्ध माना, जांच रिपोर्ट के आधार पर मध्य प्रदेश पुलिस अधिकारियों और अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/questions-raised-on-drugs-factory-action-against-100-including-two/article-56075"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mp-police-fir.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश और राजस्थान की पुलिस व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा मामला सामने आया है, जिसमें मध्य प्रदेश के दो थाना प्रभारियों समेत करीब 100 लोगों के खिलाफ राजस्थान में एफआईआर दर्ज की गई है। यह मामला जनवरी 2026 में राजस्थान के झालावाड़ जिले के डग थाना क्षेत्र के घाटाखेड़ी गांव में हुई कथित ड्रग्स फैक्ट्री कार्रवाई से जुड़ा हुआ है। उस समय मध्य प्रदेश पुलिस ने बड़ी मात्रा में मादक पदार्थ और ड्रग्स बनाने की सामग्री बरामद करने का दावा किया था, लेकिन अब अदालत के आदेश और जांच रिपोर्ट के बाद पूरी कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। चौमहला कोर्ट ने 13 जून को दिए अपने आदेश में उपलब्ध साक्ष्यों और जांच रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद मामला दर्ज करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद डग थाने में आगर कोतवाली थाना प्रभारी शशि उपाध्याय, बड़ौद थाना प्रभारी रूप सिंह राजपूत, एसआई राखी गुर्जर, एएसआई अजय जाट समेत करीब 100 ज्ञात और अज्ञात लोगों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले की जांच आगे बढ़ने पर अन्य लोगों की पहचान भी की जाएगी और जरूरत पड़ने पर धाराओं में भी बढ़ोतरी हो सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पूरा मामला 21 जनवरी 2026 से शुरू हुआ था, जब आगर पुलिस ने फैजान नाम के युवक को कथित रूप से 330 ग्राम एमडी ड्रग्स के साथ गिरफ्तार किया था। पूछताछ में फैजान ने बताया था कि यह मादक पदार्थ राजस्थान के घाटाखेड़ी गांव निवासी शाहिर, मुनव्वर और ताहिर से लाया गया था। इसके बाद मध्य प्रदेश पुलिस ने 28 जनवरी को बड़ी कार्रवाई का दावा करते हुए 80 से अधिक पुलिसकर्मियों के साथ घाटाखेड़ी गांव में दबिश दी थी। उस समय पुलिस ने कहा था कि वहां से भारी मात्रा में ड्रग्स और उसे बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री बरामद की गई है। कार्रवाई के दौरान शाहिर खान और मुनव्वर उर्फ राजा को गिरफ्तार भी किया गया था। उस समय तत्कालीन एसपी विनोद कुमार सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसे बड़ी सफलता बताया था। उन्होंने दावा किया था कि मौके से हथियार, मशीनें और ड्रग्स निर्माण से जुड़ा सामान बरामद हुआ है। लेकिन जैसे-जैसे मामले की जांच आगे बढ़ी, कई ऐसे तथ्य सामने आए जिन्होंने पुलिस की कार्रवाई को संदेह के घेरे में ला दिया। जांच में पाया गया कि जब्त किया गया कुछ सामान बिल्कुल नया दिखाई दे रहा था, जिस पर सवाल उठे थे। इसके अलावा यह दावा भी किया गया था कि कार्रवाई में राजस्थान पुलिस शामिल थी, जबकि जांच के दौरान सामने आया कि स्थानीय पुलिस को इस कार्रवाई की कोई पूर्व जानकारी ही नहीं थी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मामले में सबसे बड़ा सवाल कार्रवाई की प्रक्रिया को लेकर उठा। पुलिस ने कहा था कि पूरे ऑपरेशन की रिकॉर्डिंग ई-साक्ष्य ऐप के माध्यम से की गई थी, लेकिन जांच के दौरान ऐसी कोई वीडियोग्राफी उपलब्ध नहीं कराई जा सकी। इतना ही नहीं, पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज समय और सीसीटीवी फुटेज में भी बड़ा अंतर पाया गया। रिकॉर्ड के अनुसार गिरफ्तारियां और जब्ती की कार्रवाई सुबह 4:40 बजे से 5:40 बजे के बीच हुई थी, जबकि जांच में सामने आया कि मध्य प्रदेश पुलिस की टीम सुबह 5:05 बजे तक ही उस इलाके में मौजूद थी। ऐसे में इतने कम समय में NDPS अधिनियम के तहत आवश्यक कानूनी प्रक्रियाएं पूरी होने को लेकर सवाल खड़े हुए। गिरफ्तार आरोपियों के पिता हमीद खान ने शुरुआत से ही कार्रवाई को फर्जी बताया था। उनका आरोप था कि मध्य प्रदेश पुलिस ने बिना स्थानीय पुलिस को सूचना दिए उनके घर में प्रवेश किया, परिवार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार किया और उनके बेटों को झूठे मामले में फंसाया। इसके बाद उन्होंने 21 फरवरी 2026 को चौमहला कोर्ट में परिवाद दायर किया। अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए झालावाड़ पुलिस अधीक्षक को जांच के आदेश दिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जांच की जिम्मेदारी अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक भागचंद्र मीणा को सौंपी गई। उन्होंने मध्य प्रदेश जाकर कार्रवाई में शामिल पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के बयान दर्ज किए। जांच के दौरान तलाशी, गिरफ्तारी और जब्ती से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं मिले। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कई दावों की पुष्टि उपलब्ध साक्ष्यों से नहीं हो सकी। इन्हीं तथ्यों और जांच रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए। अब डग थाना पुलिस पूरे मामले की विस्तृत जांच करेगी और रिपोर्ट अदालत को सौंपेगी। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल प्रक्रियागत त्रुटियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संबंधित अधिकारियों के खिलाफ गंभीर कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 13:25:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>बालिग युवती को अपनी पसंद से रहने की आजादी, हाई कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला</title>
                                    <description><![CDATA[मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा कि बालिग महिला अपनी इच्छा से कहीं भी रह सकती है, लेकिन साथ रहने भर से संबंध को वैध विवाह का दर्जा नहीं दिया जा सकता।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/adult-girl-gets-freedom-to-live-as-per-her-choice/article-55505"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/madhya-pradesh-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए बालिग युवती की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई युवती बालिग है तो उसे अपनी इच्छा के अनुसार रहने और जीवन से जुड़े फैसले लेने का पूरा अधिकार है। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि किसी युवक के साथ रहने या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने मात्र से उस संबंध को कानूनी रूप से वैध विवाह नहीं माना जा सकता। विवाह की वैधता का फैसला केवल सक्षम न्यायालय ही कर सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह मामला एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा हुआ था, जिसे अभिषेक गुर्जर ने हाई कोर्ट में दायर किया था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि जिस युवती के साथ वह रहना चाहता है, उसे उसके पिता ने उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने पास रखा हुआ है। याचिकाकर्ता का कहना था कि युवती अपनी मर्जी से उसके साथ रहना चाहती है, लेकिन परिवार की ओर से उस पर दबाव बनाया जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने सुनवाई शुरू की और संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd">सुनवाई के दौरान अभिषेक गुर्जर ने अदालत को बताया कि उसने 25 मार्च 2026 को धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार युवती से विवाह किया था। उसने यह भी दावा किया कि युवती लगभग ढाई महीने की गर्भवती है। याचिका में यह भी कहा गया कि एक जून को पुलिस की सहायता से युवती को उसके पास से हटाकर जबरन उसके पिता के घर भेज दिया गया था। इन आरोपों के बाद अदालत ने पूरे मामले की जानकारी मांगी और पुलिस को युवती को न्यायालय में पेश करने का निर्देश दिया। बाद में पुरानी छावनी थाना पुलिस युवती को अदालत में लेकर पहुंची।</p>
<p class="isSelectedEnd">मामले ने उस समय नया मोड़ ले लिया जब ब्रजेश गुर्जर नामक एक अन्य व्यक्ति ने अदालत में हस्तक्षेप याचिका दायर कर दी। उसने दावा किया कि युवती का विवाह पहले ही उसके साथ हो चुका है और इस संबंध में उसने कुछ फोटो तथा विवाह कार्ड भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए। तीसरे पक्ष के इस दावे ने मामले को और जटिल बना दिया। अदालत ने उसके आवेदन को स्वीकार करते हुए उसे भी मामले में पक्षकार बनने की अनुमति प्रदान कर दी, ताकि सभी तथ्यों को सामने रखकर निष्पक्ष निर्णय लिया जा सके।</p>
<p class="isSelectedEnd">सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने युवती से अलग कमरे में बातचीत की और उसकी इच्छा जानने का प्रयास किया। अदालत के समक्ष युवती ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह अभिषेक गुर्जर के साथ रहना चाहती है और किसी प्रकार के दबाव में नहीं है। राज्य सरकार की ओर से भी अदालत को बताया गया कि युवती बालिग है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार उसकी जन्मतिथि 1 जनवरी 2008 बताई गई, जिसके आधार पर अदालत ने माना कि वह अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने के लिए कानूनी रूप से सक्षम है।</p>
<p class="isSelectedEnd">सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति दीपक खोत की खंडपीठ ने कहा कि भारतीय कानून बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने का अधिकार देता है। अदालत ने माना कि किसी बालिग महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी स्थान पर रोककर नहीं रखा जा सकता। यदि वह अपनी मर्जी से किसी व्यक्ति के साथ रहना चाहती है तो उसे ऐसा करने की स्वतंत्रता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">हालांकि कोर्ट ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण बात भी जोड़ी। अदालत ने कहा कि युवती का किसी व्यक्ति के साथ रहना या उसके साथ जाने का निर्णय विवाह की वैधता को साबित नहीं करता। यदि विवाह को लेकर विवाद है या कई पक्ष अलग-अलग दावे कर रहे हैं, तो ऐसे मामलों में विवाह की वैधता का निर्धारण केवल सक्षम सिविल या पारिवारिक न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा। हाई कोर्ट ने इस याचिका की सुनवाई के दौरान केवल युवती की स्वतंत्रता और उसकी इच्छा को ध्यान में रखा</p>
<p class="isSelectedEnd">यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें बालिग युवक-युवतियों की पसंद और परिवार की इच्छा के बीच टकराव देखने को मिला है। अदालतें लगातार यह स्पष्ट करती रही हैं कि बालिग व्यक्ति को अपनी जिंदगी के फैसले लेने का अधिकार है, चाहे परिवार उसकी पसंद से सहमत हो या नहीं। इस मामले में भी हाई कोर्ट ने यही संदेश दिया कि किसी बालिग महिला की इच्छा सर्वोपरि है। साथ ही अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया कि विवाह की वैधता से जुड़े विवादों का निपटारा उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही किया जाए। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 14:19:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>भरण-पोषण मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पत्नी जहां रहेगी वहीं होगी सुनवाई</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी जहां वर्तमान में रह रही है, वहीं की फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण का मामला दायर करने का अधिकार रखती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/big-decision-of-high-court-in-maintenance-case-hearing-will/article-55091"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐसा फैसला सुनाया है, जिसका असर भविष्य में इसी तरह के कई मामलों पर पड़ सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला अपने वर्तमान निवास स्थान पर रह रही है, तो उसे वहीं की सक्षम अदालत में भरण-पोषण का दावा पेश करने का अधिकार है। केवल इस आधार पर कि उसका स्थायी पता या पैतृक घर किसी दूसरे जिले में है, अदालत के अधिकार क्षेत्र को चुनौती नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट के इस फैसले के साथ ही एक डॉक्टर पति की ओर से दायर पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई।</p>
<p class="isSelectedEnd">मामला सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के एक डॉक्टर और उनकी पत्नी से जुड़ा है। दोनों का विवाह 16 मई 2019 को हुआ था। विवाह के बाद उनके परिवार में दो बेटियों का जन्म हुआ। कुछ समय बाद पति-पत्नी के संबंधों में विवाद शुरू हो गया। पत्नी ने आरोप लगाया कि विवाह के बाद उसे दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया। इसके अलावा उसने अपने पति पर गंभीर व्यक्तिगत आरोप भी लगाए। इन परिस्थितियों के बाद दोनों अलग-अलग रहने लगे और मामला कानूनी विवाद तक पहुंच गया।</p>
<p class="isSelectedEnd">पत्नी ने बिलासपुर स्थित फैमिली कोर्ट में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 के तहत भरण-पोषण के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। अपने आवेदन में उसने कहा कि उसके पास आय का कोई स्थायी साधन नहीं है और दोनों नाबालिग बेटियां उसकी देखरेख में रह रही हैं। उसने अदालत से अपने लिए एक लाख रुपए प्रतिमाह तथा दोनों बेटियों के लिए 20-20 हजार रुपए प्रतिमाह भरण-पोषण राशि देने की मांग की। इस प्रकार कुल 1 लाख 40 हजार रुपए मासिक भरण-पोषण की मांग अदालत के समक्ष रखी गई।</p>
<p class="isSelectedEnd">दूसरी ओर डॉक्टर पति ने इस आवेदन का विरोध किया। उन्होंने फैमिली कोर्ट में क्षेत्राधिकार को लेकर आपत्ति दर्ज कराई। उनका कहना था कि विवाह सारंगढ़ में हुआ था और पत्नी का स्थायी निवास भी वहीं है। इसलिए बिलासपुर की फैमिली कोर्ट को इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है। पति ने यह भी तर्क दिया कि आवेदन दाखिल किए जाने के समय दोनों बच्चियां सारंगढ़ में पढ़ाई कर रही थीं और केवल किरायानामा प्रस्तुत कर बिलासपुर में मामला दर्ज कराया गया है। उन्होंने स्वयं को पोलियो से प्रभावित दिव्यांग बताते हुए यह भी कहा कि पत्नी उन्हें परेशान करने की नीयत से बिलासपुर में मामला चला रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd">पत्नी ने इन आरोपों का अदालत में विरोध किया। उसने कहा कि वह वर्तमान में बिलासपुर जिले के लगरा क्षेत्र में किराए के मकान में रह रही है। इसके समर्थन में उसने आवश्यक दस्तावेज भी प्रस्तुत किए। पत्नी ने यह भी बताया कि उसकी दोनों बेटियां अब बिलासपुर के एक निजी विद्यालय में पढ़ाई कर रही हैं और उनका पूरा जीवन वर्तमान में बिलासपुर से जुड़ा हुआ है। उसके अनुसार उसने किसी भी प्रकार का फर्जी दस्तावेज अदालत के सामने प्रस्तुत नहीं किया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पति की क्षेत्राधिकार संबंधी आपत्ति को खारिज कर दिया था। इसके बाद डॉक्टर पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी। मामले की सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति बीडी गुरु ने पूरे रिकॉर्ड और दस्तावेजों का अवलोकन किया।</p>
<p class="isSelectedEnd">हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पत्नी ने स्पष्ट रूप से बिलासपुर के लगरा क्षेत्र को अपना वर्तमान निवास बताया है और उसके समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज भी पेश किए हैं। अदालत ने माना कि यदि कोई व्यक्ति किसी स्थान पर वास्तविक रूप से निवास कर रहा है, तो उसे उस क्षेत्र की सक्षम अदालत में कानूनी राहत मांगने का अधिकार है। केवल इस वजह से कि उसका स्थायी पता किसी अन्य जिले में है, वर्तमान निवास वाले क्षेत्र की अदालत का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। अदालत ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या प्रक्रिया संबंधी खामी नजर नहीं आती। इसलिए हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने डॉक्टर पति की पुनरीक्षण याचिका प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट की कार्यवाही को जारी रखने का रास्ता साफ कर दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह फैसला महिलाओं और बच्चों से जुड़े भरण-पोषण मामलों में महत्वपूर्ण नजीर साबित हो सकता है। कई बार पति-पत्नी अलग-अलग स्थानों पर रहने लगते हैं और क्षेत्राधिकार को लेकर विवाद उत्पन्न हो जाता है। ऐसे मामलों में हाईकोर्ट की यह टिप्पणी स्पष्ट करती है कि वर्तमान निवास स्थान भी न्यायिक अधिकार क्षेत्र तय करने का महत्वपूर्ण आधार हो सकता है। इस फैसले के बाद बिलासपुर फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी। वहीं यह आदेश उन महिलाओं के लिए भी राहत का संदेश माना जा रहा है जो अलग रहने की स्थिति में अपने वर्तमान निवास स्थान से न्याय पाने की कोशिश करती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 14:13:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>दोस्त को कार देना पड़ा भारी, मर्डर केस में फंसी SUV, अब हाईकोर्ट के आदेश पर असली मालिक को लौटाएगी पुलिस</title>
                                    <description><![CDATA[नरसिंहपुर मर्डर केस में फंसी लग्जरी SUV को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अहम आदेश दिया। जांच पूरी होने पर मालिक को कार लौटाने पर पुनर्विचार के निर्देश।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/had-to-give-car-to-friend-suv-stuck-in-heavy/article-53124"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ---2026-05-11t151743.257.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने थानों में जब्त वाहनों की स्थिति और असली मालिकों के अधिकारों के बारे में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। यह मामला नरसिंहपुर जिले के एक चर्चित मर्डर केस से जुड़ा है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें एक लग्जरी </span>SUV <span lang="hi" xml:lang="hi">का इस्तेमाल हत्या के लिए किया गया था। अदालत ने कहा कि जांच पूरी होने के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे वाहनों को लंबे समय तक थानों में रखना ठीक नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इससे वाहन खराब होते हैं और सरकारी व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ पड़ता है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि वो वाहन को उसके असली मालिक को सौंपने पर फिर से विचार करे।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">यह मामला अगस्त 2025 का है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब गाडरवारा निवासी आदित्य राजपूत ने अपनी लग्जरी </span>SUV <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने दोस्त शिवम राय को भोपाल जाने के लिए दी थी। कहा जाता है कि शिवम ने बाद में वही गाड़ी नितिन दुबे को दे दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके बाद एक गंभीर घटना हुई। आरोप है कि इसी चलती कार में नितिन दुबे ने अपनी पत्नी की हत्या कर दी। घटना के बाद पुलिस ने मौके पर पहुंचकर वाहन को सबूत के तौर पर जब्त कर लिया और मामला जांच में चला गया।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">गाड़ी के मालिक आदित्य राजपूत ने अदालत में स्पष्ट कहा कि उनका इस अपराध से कोई संबंध नहीं है। उनका कहना था कि जांच लगभग पूरी हो चुकी है और उन्हें उनकी सम्पत्ति</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">यानी </span>SUV, <span lang="hi" xml:lang="hi">वापस मिलनी चाहिए। लेकिन निचली अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा। सुनवाई के दौरान अदालत ने निचली अदालत के फैसले को गलत बताया और कहा कि कानून के अनुसार निर्दोष व्यक्ति की सम्पत्ति को अनावश्यक रूप से रोका नहीं जा सकता।</span></span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;"> </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने अपने आदेश में </span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">‘<span lang="hi" xml:lang="hi">भजनलाल बनाम मध्य प्रदेश राज्य</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">केस का हवाला देते हुए कहा कि यदि वाहन मालिक कोर्ट की शर्तों को मानने के लिए तैयार है और आगे किसी विवाद में इस वाहन का उपयोग नहीं होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे सुपुर्दनामा पर वाहन सौंपा जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में संतुलन जरूरी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि एक ओर जांच प्रभावित न हो और दूसरी ओर निर्दोष व्यक्ति को नुकसान न हो।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अदालत ने पुलिस थानों में खड़े जब्त वाहनों की स्थिति पर भी गंभीर टिप्पणी की। कहा गया कि लंबे समय तक खुले में पड़े वाहन धीरे-धीरे खराब हो जाते हैं और कबाड़ में बदल जाते हैं</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे राष्ट्रीय संपत्ति का नुकसान होता है। इसके अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिस व्यवस्था पर भी अतिरिक्त दबाव बढ़ता है क्योंकि इन वाहनों की देखरेख और सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बन जाती है।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हाईकोर्ट के इस रुख को ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश माना जा रहा है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ जांच के बाद भी वाहन वर्षों तक थानों में पड़े रहते हैं। अब ट्रायल कोर्ट को यह तय करना होगा कि </span>SUV <span lang="hi" xml:lang="hi">को शर्तों के साथ मालिक को सौंपा जाए या नहीं।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 May 2026 16:12:56 +0530</pubDate>
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