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                <title>India - दैनिक जागरण</title>
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                <description>India RSS Feed</description>
                
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                <title>सरकारी योजनाओं से आम आदमी को मिल रही नई उम्मीद, बदलाव की रफ्तार बढ़ाने की जरूरत</title>
                                    <description><![CDATA[सरकारी योजनाओं का उद्देश्य तभी पूरा होता है जब उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक समय पर और पारदर्शी तरीके से पहुंचे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/the-common-man-is-getting-new-hope-from-government-schemes/article-58448"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/government-schemes.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">सरकारें किसी भी देश में केवल कानून बनाने या प्रशासन चलाने के लिए नहीं होतीं, बल्कि उनका सबसे बड़ा दायित्व आम लोगों के जीवन को बेहतर बनाना भी होता है। इसी सोच के साथ समय-समय पर केंद्र और राज्य सरकारें अलग-अलग योजनाएं शुरू करती हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य गरीब, किसान, मजदूर, महिला, युवा, बुजुर्ग, छात्र और छोटे कारोबारियों जैसे हर वर्ग तक सुविधाएं पहुंचाना होता है। मेरा मानना है कि अगर सरकारी योजनाओं को सही तरीके से लागू किया जाए और पात्र लोगों तक बिना किसी बाधा के उनका लाभ पहुंचे, तो वे करोड़ों लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं। पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसी योजनाएं सामने आई हैं, जिनका असर गांव से लेकर शहर तक देखने को मिला है। हालांकि चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन यह भी सच है कि योजनाओं ने लाखों परिवारों के लिए नई उम्मीद जगाई है।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे बड़ा सकारात्मक पक्ष यह है कि सरकारी योजनाएं आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सहारा देने का काम करती हैं। जब किसी गरीब परिवार को इलाज के लिए आर्थिक मदद मिलती है, किसान को खेती के लिए सहायता मिलती है या किसी छात्र को छात्रवृत्ति मिलती है, तो उसका सीधा असर उसके जीवन पर पड़ता है। कई परिवार ऐसे हैं जिनके लिए सरकारी सहायता किसी संकट के समय सबसे बड़ा सहारा साबित होती है। यही कारण है कि सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं का महत्व लगातार बढ़ा है। यदि कोई परिवार आर्थिक कठिनाइयों से गुजर रहा हो और उसे समय पर सरकारी सहायता मिल जाए, तो वह मुश्किल दौर से आसानी से बाहर निकल सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मेरा मानना है कि सरकारी योजनाओं का दूसरा बड़ा फायदा यह है कि वे समाज में समान अवसर देने की दिशा में काम करती हैं। हर व्यक्ति की आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं होती। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह कमजोर वर्ग को आगे बढ़ने का मौका दे। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और स्वरोजगार से जुड़ी योजनाएं लोगों को आत्मनिर्भर बनने में मदद करती हैं। जब किसी युवा को कौशल प्रशिक्षण मिलता है या किसी महिला को अपना छोटा व्यवसाय शुरू करने के लिए सहायता मिलती है, तो उसका लाभ केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं का महत्व और भी अधिक दिखाई देता है। गांवों में सड़क, बिजली, पानी, आवास, शौचालय, सिंचाई और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ी योजनाओं ने लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने की कोशिश की है। पहले जिन सुविधाओं के लिए लोगों को वर्षों तक इंतजार करना पड़ता था, अब कई जगहों पर उनमें तेजी आई है। हालांकि हर क्षेत्र की स्थिति एक जैसी नहीं है, लेकिन जहां योजनाओं का सही क्रियान्वयन हुआ है, वहां बदलाव साफ दिखाई देता है। यही वजह है कि विकास की चर्चा में सरकारी योजनाओं की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण मानी जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">डिजिटल तकनीक के बढ़ते उपयोग ने भी योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने में मदद की है। आज कई योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थियों के बैंक खाते में पहुंच रहा है। इससे बिचौलियों की भूमिका कम हुई है और पारदर्शिता बढ़ी है। ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल सत्यापन और समय-समय पर निगरानी जैसी व्यवस्थाओं ने प्रक्रिया को पहले की तुलना में अधिक आसान बनाया है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग अब डिजिटल सेवाओं का उपयोग करना सीख रहे हैं, जिससे सरकारी योजनाओं तक उनकी पहुंच बेहतर हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि केवल योजना बनाना ही पर्याप्त नहीं है। मेरा मानना है कि किसी भी योजना की असली सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। कई बार जानकारी के अभाव, दस्तावेजों की कमी, तकनीकी दिक्कतों या प्रशासनिक देरी के कारण पात्र लोगों को समय पर लाभ नहीं मिल पाता। कुछ दूरदराज के इलाकों में आज भी लोग यह नहीं जानते कि वे किन योजनाओं के लिए पात्र हैं और आवेदन कैसे करें। इसलिए सरकार के साथ-साथ स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की भी जिम्मेदारी है कि वे लोगों तक सही जानकारी पहुंचाएं और प्रक्रिया को सरल बनाएं। यह भी जरूरी है कि योजनाओं की समय-समय पर समीक्षा हो। बदलती जरूरतों के अनुसार उनमें सुधार किया जाए और लोगों से मिलने वाले सुझावों को भी महत्व दिया जाए। यदि किसी योजना में कमी दिखाई देती है तो उसे स्वीकार कर बेहतर बनाया जाना चाहिए। इससे न केवल योजनाओं की विश्वसनीयता बढ़ेगी बल्कि आम लोगों का भरोसा भी मजबूत होगा। पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमित निगरानी किसी भी सरकारी योजना की सफलता के सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मेरी राय में सरकारी योजनाएं केवल आर्थिक सहायता देने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे लोगों को सम्मान के साथ आगे बढ़ने का अवसर भी देती हैं। जब कोई छात्र अपनी पढ़ाई पूरी करता है, कोई किसान बेहतर उत्पादन करता है, कोई महिला अपना व्यवसाय शुरू करती है या किसी गरीब परिवार को पक्का घर मिलता है, तो यह केवल एक व्यक्ति की सफलता नहीं होती बल्कि पूरे समाज के विकास की दिशा में उठाया गया कदम होता है। इसलिए जरूरी है कि योजनाओं का लाभ बिना किसी भेदभाव के हर पात्र व्यक्ति तक पहुंचे। अंततः मेरा मानना है कि सरकारी योजनाएं आम आदमी के जीवन में बड़ा बदलाव लाने की क्षमता रखती हैं। उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वे कितनी ईमानदारी, पारदर्शिता और गति के साथ लागू की जाती हैं। यदि सरकार, प्रशासन और नागरिक मिलकर अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से पालन करें, तो सरकारी योजनाएं केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि देश के विकास और लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने का मजबूत आधार बनेंगी। यही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जानी चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 00:02:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>महात्मा गांधी का जीवन मंत्र: स्वास्थ्य ही वास्तविक धन, सुखी जीवन की सबसे बड़ी पूंजी</title>
                                    <description><![CDATA[बदलती जीवनशैली और बढ़ते तनाव के दौर में महात्मा गांधी का स्वास्थ्य पर दिया गया संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक माना जाता है, जितना उनके समय में था।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/mantras-of-life/mahatma-gandhis-life-mantra-health-is-the-real-wealth-and/article-58449"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/mahatma-gandhi.jpg" alt=""></a><br /><p>महात्मा गांधी ने अपने जीवन में सादगी, अनुशासन और स्वस्थ जीवनशैली को जितना महत्व दिया, उतना ही जोर उन्होंने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी दिया था। उनका प्रसिद्ध विचार, "स्वास्थ्य ही वास्तविक धन है, सोने और चांदी के टुकड़े नहीं", आज भी लोगों को यह समझाने का काम करता है कि जीवन में सबसे बड़ी पूंजी अच्छी सेहत है। बदलती जीवनशैली, बढ़ते तनाव, अनियमित खानपान और भागदौड़ के दौर में यह संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। आज लोग आर्थिक सफलता, करियर और सुविधाओं के पीछे लगातार भाग रहे हैं, लेकिन इसी दौड़ में अपनी सेहत को पीछे छोड़ देते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी मानते हैं कि यदि शरीर और मन स्वस्थ नहीं हैं, तो धन-दौलत और भौतिक सुविधाओं का आनंद लेना भी मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि गांधीजी के इस विचार को आज के समय में स्वस्थ जीवन का मूल मंत्र माना जा रहा है। उनका मानना था कि व्यक्ति का वास्तविक विकास तभी संभव है जब वह शारीरिक, मानसिक और नैतिक रूप से स्वस्थ हो। उन्होंने अपने जीवन में प्राकृतिक जीवनशैली, नियमित दिनचर्या, संतुलित भोजन और आत्मसंयम को अपनाकर इसका उदाहरण भी प्रस्तुत किया।</p>
<p>गांधीजी का जीवन केवल राजनीतिक संघर्ष तक सीमित नहीं था, बल्कि वह स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का भी एक बड़ा संदेश देता है। वे सादा भोजन करते थे, नियमित पैदल चलते थे और प्राकृतिक चिकित्सा में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए महंगे संसाधनों की नहीं, बल्कि सही आदतों की जरूरत होती है। आज जब जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं, तब उनका यह संदेश लोगों को अपनी प्राथमिकताओं पर दोबारा सोचने के लिए प्रेरित करता है। डॉक्टरों के अनुसार, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और हृदय रोग जैसी कई समस्याएं अनियमित दिनचर्या और खराब खानपान से जुड़ी हुई हैं। यदि लोग समय पर भोजन करें, पर्याप्त नींद लें, रोजाना कुछ समय व्यायाम या पैदल चलने के लिए निकालें और तनाव को नियंत्रित रखने का प्रयास करें, तो कई बीमारियों के खतरे को कम किया जा सकता है। गांधीजी भी आत्मअनुशासन को स्वस्थ जीवन की सबसे बड़ी कुंजी मानते थे। उनका विश्वास था कि संयमित जीवन व्यक्ति को शारीरिक रूप से मजबूत बनाने के साथ-साथ मानसिक रूप से भी संतुलित रखता है। यही कारण है कि उनके विचार आज केवल इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आधुनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए इसी तरह की सलाह देते हैं।</p>
<p>आज के दौर में मोबाइल, लैपटॉप और डिजिटल उपकरणों पर बढ़ती निर्भरता ने लोगों की दिनचर्या को पूरी तरह बदल दिया है। घंटों एक ही जगह बैठकर काम करना, फास्ट फूड का बढ़ता चलन और शारीरिक गतिविधियों में कमी ने स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों को और बढ़ा दिया है। ऐसे समय में गांधीजी का संदेश याद दिलाता है कि स्वस्थ शरीर के बिना जीवन का संतुलन बनाए रखना कठिन है। मानसिक स्वास्थ्य भी आज बड़ी चिंता का विषय बन चुका है। तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएं हर आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित कर रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ जीवन केवल शारीरिक फिटनेस तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक शांति भी उतनी ही जरूरी है। नियमित योग, ध्यान, संतुलित भोजन, पर्याप्त आराम और परिवार के साथ समय बिताना मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। गांधीजी का जीवन भी आत्मचिंतन, धैर्य और सकारात्मक सोच का उदाहरण रहा है। उन्होंने हमेशा यह संदेश दिया कि सरल जीवन और उच्च विचार व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाते हैं। यही सोच आज भी लोगों को प्रेरित करती है कि सफलता का वास्तविक अर्थ केवल आर्थिक समृद्धि नहीं, बल्कि स्वस्थ और संतुलित जीवन भी है। बदलती दुनिया में जहां भौतिक उपलब्धियों को सफलता का पैमाना माना जाता है, वहीं गांधीजी का यह विचार याद दिलाता है कि यदि स्वास्थ्य साथ नहीं है, तो बाकी उपलब्धियां अधूरी रह जाती हैं। इसलिए जरूरी है कि लोग अपने व्यस्त जीवन में स्वास्थ्य को सबसे पहली प्राथमिकता दें, नियमित दिनचर्या अपनाएं, संतुलित खानपान रखें और मानसिक शांति बनाए रखने के लिए समय निकालें। यही आदतें लंबे समय तक बेहतर जीवन की आधारशिला बन सकती हैं और महात्मा गांधी के इस अमर संदेश को व्यवहार में उतारने का सबसे अच्छा तरीका भी यही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>जीवन के मंत्र</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 00:01:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>केंद्र का नया निर्देश: सरकारी कार्यक्रमों में पहले वंदे मातरम्, फिर होगा जन-गण-मन</title>
                                    <description><![CDATA[केंद्र सरकार ने सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्रीय मंत्रालयों को तय प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन कराने के निर्देश दिए हैं। आधिकारिक शब्द, सही उच्चारण और निर्धारित क्रम का पालन अनिवार्य बताया गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/centres-new-instructions-first-vande-mataram-and-then-jana-gana-mana-in/article-58450"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/vande-mataram.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">केंद्र सरकार ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम् और राष्ट्रगान जन-गण-मन के गायन और वादन को लेकर एक बार फिर सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्रीय मंत्रालयों को निर्देश जारी किए हैं। गृह मंत्रालय की ओर से भेजे गए पत्र में स्पष्ट किया गया है कि जिन सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों शामिल किए जाते हैं, वहां पहले वंदे मातरम् और उसके बाद जन-गण-मन प्रस्तुत किया जाएगा। मंत्रालय ने यह भी कहा है कि यह व्यवस्था पहले से निर्धारित नियमों के अनुरूप है और सभी संबंधित विभागों को इसका सख्ती से पालन सुनिश्चित करना होगा। 9 जुलाई को जारी इस पत्र की जानकारी अब सामने आई है। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन राज्यों का अपना राज्य गीत है, वहां भी निर्धारित क्रम में पहले राष्ट्रगीत और फिर राष्ट्रगान का पालन किया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार, उद्देश्य पूरे देश में एक समान प्रोटोकॉल लागू करना और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से जुड़े नियमों का पालन सुनिश्चित करना है।</p>
<p>निर्देश में राज्यों से कहा गया है कि राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान हमेशा उनके आधिकारिक और मूल शब्दों के साथ ही गाए या बजाए जाएं। उच्चारण, प्रस्तुति और समय से जुड़े तय मानकों का भी पालन किया जाना जरूरी होगा। इसके लिए दोनों की आधिकारिक प्रतियां मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध कराई गई हैं ताकि किसी तरह की त्रुटि या भ्रम की स्थिति न बने। मंत्रालय ने संबंधित विभागों और संस्थानों से कहा है कि कार्यक्रम आयोजित करते समय इन्हीं अधिकृत संस्करणों का उपयोग किया जाए। बताया जा रहा है कि यह दूसरा अवसर है जब केंद्र सरकार ने इस विषय पर राज्यों को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इससे पहले 28 जनवरी को भी इसी संबंध में आदेश जारी किया गया था। उस समय स्कूलों में दिन की शुरुआत राष्ट्रगीत से करने, वंदे मातरम् के दौरान सभी लोगों के खड़े रहने और पूरे छह अंतरे गाने की बात कही गई थी। छह अंतरों को गाने की कुल अवधि लगभग तीन मिनट दस सेकंड बताई गई थी, जबकि पहले सामान्य तौर पर केवल शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाते थे। हालांकि, सिनेमाघरों को इन नियमों से अलग रखा गया था। सरकार ने स्पष्ट किया था कि फिल्म शुरू होने से पहले वंदे मातरम् बजाना या दर्शकों का खड़ा होना अनिवार्य नहीं होगा। इसी तरह यदि किसी समाचार फिल्म या डॉक्यूमेंट्री के हिस्से के रूप में राष्ट्रगीत प्रस्तुत किया जाता है, तो उस दौरान दर्शकों के लिए खड़ा होना आवश्यक नहीं माना जाएगा।</p>
<p>राष्ट्रगीत वंदे मातरम् का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और देश के इतिहास में विशेष स्थान रहा है। इसे साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को लिखा था और बाद में 1882 में प्रकाशित उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में इसे शामिल किया गया। वर्ष 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने सार्वजनिक मंच से वंदे मातरम् का गायन किया था। इसके बाद यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना और अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष का प्रमुख नारा भी बना। संस्कृत भाषा के इस वाक्यांश का अर्थ है, "हे मातृभूमि, मैं तुम्हें नमन करता हूं।" आजादी के बाद इसे राष्ट्रगीत का दर्जा मिला और तब से यह राष्ट्रीय समारोहों और विशेष अवसरों पर सम्मानपूर्वक गाया जाता है। हाल के वर्षों में भी वंदे मातरम् राष्ट्रीय आयोजनों का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा है। इस वर्ष गणतंत्र दिवस परेड की थीम भी वंदे मातरम् रखी गई थी। संस्कृति मंत्रालय ने इसके 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर विशेष झांकी प्रस्तुत की थी, जिसे मंत्रालयों और विभागों की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ झांकी का पुरस्कार भी मिला। वहीं, संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान वंदे मातरम् को लेकर राजनीतिक बहस भी देखने को मिली थी। विभिन्न दलों ने इसके इतिहास, महत्व और प्रस्तुति को लेकर अपने-अपने पक्ष रखे थे। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर तीखी चर्चा हुई थी, जिसमें ऐतिहासिक दस्तावेजों और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े संदर्भ भी सामने आए थे। हालांकि, केंद्र सरकार के ताजा निर्देश प्रशासनिक स्तर पर तय प्रोटोकॉल के पालन पर केंद्रित हैं। सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रीय गीतों के सम्मान से जुड़े नियमों का एक समान अनुपालन देशभर में सुनिश्चित किया जाना चाहिए। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 00:01:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>भारत में लॉन्च हुई दुनिया की पहली साप्ताहिक बेसल इंसुलिन, डायबिटीज मरीजों को अब हफ्ते में सिर्फ एक इंजेक्शन</title>
                                    <description><![CDATA[नोवो नॉर्डिस्क की Awiqli (इंसुलिन आइकोडेक) से रोजाना इंजेक्शन की जरूरत होगी खत्म, टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज के वयस्क मरीजों के लिए नई उम्मीद। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/worlds-first-weekly-basal-insulin-launched-in-india-diabetes-patients/article-58315"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/awiqli.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">भारत में डायबिटीज के इलाज के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है। डेनमार्क की दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क ने देश में Awiqli (इंसुलिन आइकोडेक) लॉन्च कर दी है। कंपनी का दावा है कि यह दुनिया की पहली ऐसी सप्ताह में एक बार दी जाने वाली बेसल इंसुलिन है, जिसे टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित वयस्क मरीजों के लिए विकसित किया गया है। इस नई तकनीक के आने से उन मरीजों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्हें अब तक हर दिन इंसुलिन का इंजेक्शन लगाना पड़ता था।</p>
<p>अब तक अधिकांश इंसुलिन पर निर्भर मरीजों को रोजाना बेसल इंसुलिन लेना पड़ता था। यानी पूरे साल में करीब 365 इंजेक्शन लगाने पड़ते थे। नई साप्ताहिक बेसल इंसुलिन के आने से यह संख्या घटकर केवल 52 इंजेक्शन सालाना रह जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल मरीजों की दिनचर्या आसान होगी, बल्कि इलाज को नियमित रूप से अपनाने की संभावना भी बढ़ेगी।</p>
<p>नोवो नॉर्डिस्क के अनुसार, भारत में इंसुलिन थेरेपी शुरू करने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक रोजाना इंजेक्शन लगाने का डर है। कई मरीज इंसुलिन शुरू करने से बचते रहते हैं और इलाज में सात से नौ साल तक की देरी हो जाती है। इस देरी के कारण ब्लड शुगर लंबे समय तक अनियंत्रित रहती है, जिससे हृदय, किडनी, आंखों और नसों से जुड़ी गंभीर जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है।</p>
<p>कंपनी ने Awiqli का 700 यूनिट पैक 2,611 रुपये में लॉन्च किया है। इस हिसाब से इसकी कीमत लगभग 3.73 रुपये प्रति यूनिट पड़ती है। कंपनी का दावा है कि यह मौजूदा दैनिक बेसल इंसुलिन की तुलना में 30 से 40 प्रतिशत तक अधिक किफायती है। यदि किसी मरीज को रोजाना 10 यूनिट इंसुलिन की आवश्यकता होती है, तो उसे सप्ताह में 70 यूनिट इंसुलिन लगेगी, जिसकी अनुमानित लागत लगभग 261 रुपये प्रति सप्ताह होगी।</p>
<p>नई इंसुलिन को FlexTouch पेन डिवाइस के जरिए सप्ताह में केवल एक बार लगाया जाएगा। यह पेन उपयोग में आसान है और मरीज स्वयं भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार इसे इस्तेमाल कर सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इंजेक्शन की संख्या कम होने से मरीज इलाज को बीच में छोड़ने की संभावना भी कम होगी।</p>
<p>मुंबई के वरिष्ठ डायबिटीज विशेषज्ञ डॉ. राजीव कोविल का कहना है कि इस दवा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रतिस्पर्धी कीमत और आसान उपयोग है। उनके अनुसार, क्लिनिकल ट्रायल में Awiqli ने कई मामलों में रोजाना दी जाने वाली बेसल इंसुलिन के बराबर या उससे बेहतर ब्लड शुगर नियंत्रण दिखाया है। इससे यह तकनीक केवल बड़े शहरों या सीमित मरीजों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अधिक लोगों तक पहुंच सकेगी।</p>
<p>क्लिनिकल ट्रायल के दौरान ONWARDS-1 प्रोग्राम के आंकड़ों में यह सामने आया कि Awiqli ने ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने और HbA1c स्तर कम करने में सकारात्मक परिणाम दिए। कंपनी के अनुसार, टाइप-2 डायबिटीज के अधिक मरीज बिना गंभीर हाइपोग्लाइसीमिया की समस्या के HbA1c को 7 प्रतिशत से नीचे लाने में सफल रहे। हालांकि, किसी भी मरीज के लिए दवा की उपयुक्तता का निर्णय उसके चिकित्सक द्वारा ही किया जाना चाहिए।</p>
<p>भारत में डायबिटीज तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है। अनुमान के अनुसार, देश में करीब 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं, जबकि लगभग 13.6 करोड़ लोग प्री-डायबिटीज की स्थिति में हैं। इसके अलावा 9 लाख से अधिक लोग टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित हैं, जिनके इलाज में इंसुलिन अनिवार्य है। वहीं टाइप-2 डायबिटीज के लगभग 10 प्रतिशत मरीजों को भी समय के साथ इंसुलिन थेरेपी की आवश्यकता पड़ती है।</p>
<p>नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. एस.के. वांगनू का कहना है कि इंसुलिन शुरू करने में देरी और इलाज का नियमित पालन न करना आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। उनके अनुसार, यदि मरीजों को कम इंजेक्शन लगाने पड़ें और उपचार सरल हो, तो अधिक लोग समय रहते इंसुलिन थेरेपी शुरू कर सकते हैं, जिससे भविष्य में जटिलताओं का खतरा कम होगा।</p>
<p>नोवो नॉर्डिस्क इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर विक्रांत श्रोत्रिया ने इसे भारत में डायबिटीज उपचार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है। उनका कहना है कि सप्ताह में केवल एक बार की डोज मरीजों पर मानसिक और शारीरिक दोनों तरह का बोझ कम करेगी। साथ ही इससे इलाज को नियमित रूप से जारी रखने में भी मदद मिलेगी। भारत में फिलहाल लगभग 60 लाख लोग इंसुलिन थेरेपी ले रहे हैं, </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 16:51:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चीन के मिसाइल परीक्षण ने बढ़ाई हिंद-प्रशांत की चिंता, परमाणु पनडुब्बी से बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च के बाद भारत भी सतर्क</title>
                                    <description><![CDATA[चीन की समुद्र आधारित परमाणु क्षमता में बढ़ोतरी से क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण बदलने की आशंका, भारत के लिए समुद्री निगरानी और रक्षा तैयारियों को मजबूत करना होगा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/chinas-missile-test-increases-the-concern-of-indo-pacific-india-also/article-58131"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/china-missile-test.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक बार फिर रणनीतिक तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। चीन ने परमाणु ऊर्जा से संचालित अपनी पनडुब्बी से लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण कर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस परीक्षण को चीन ने नियमित सैन्य अभ्यास का हिस्सा बताया है, लेकिन अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड समेत कई देशों ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर संकेत माना है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल एक सैन्य परीक्षण नहीं, बल्कि चीन की बदलती रणनीति और समुद्र आधारित परमाणु शक्ति को मजबूत करने का स्पष्ट संदेश भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">जानकारों के अनुसार इस परीक्षण में चीन ने अपनी नई पीढ़ी की सबमरीन लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) का इस्तेमाल किया है, जिसे परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम माना जाता है। माना जा रहा है कि यह मिसाइल हजारों किलोमीटर दूर तक लक्ष्य भेदने की क्षमता रखती है। इसका सबसे बड़ा रणनीतिक महत्व यह है कि ऐसी मिसाइलें समुद्र में गहराई तक मौजूद परमाणु पनडुब्बियों से दागी जा सकती हैं, जिससे दुश्मन के लिए उनका पता लगाना बेहद कठिन हो जाता है। चीन लंबे समय से अपनी समुद्री परमाणु क्षमता को मजबूत करने पर काम कर रहा है। पहले उसका सैन्य फोकस मुख्य रूप से दक्षिण चीन सागर और ताइवान के आसपास देखा जाता था, लेकिन अब उसकी गतिविधियां हिंद महासागर और व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक फैल चुकी हैं। इसी वजह से भारत सहित कई देशों की रणनीतिक चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में चीनी नौसेना की पनडुब्बियां कई बार हिंद महासागर क्षेत्र में देखी गई हैं। इसके अलावा जिबूती में चीन का सैन्य अड्डा, पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में उसकी सक्रियता और श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह पर बढ़ता प्रभाव पहले से ही भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। यदि चीन अधिक आधुनिक, कम शोर वाली और लंबी दूरी की मिसाइलों से लैस परमाणु पनडुब्बियों की तैनाती बढ़ाता है तो हिंद महासागर में उसकी रणनीतिक मौजूदगी और मजबूत हो सकती है। समुद्र आधारित परमाणु हथियार किसी भी देश की रणनीतिक ताकत का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं। पनडुब्बी से छोड़ी गई बैलिस्टिक मिसाइलों का पता लगाना बेहद मुश्किल होता है और यही कारण है कि दुनिया की प्रमुख सैन्य शक्तियां अपनी नौसेना में इस क्षमता को लगातार विकसित कर रही हैं। चीन का हालिया परीक्षण इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की परमाणु नीति "क्रेडिबल मिनिमम डेटेरेंस" और "नो फर्स्ट यूज" के सिद्धांत पर आधारित है। ऐसे में यदि चीन अपनी समुद्र आधारित परमाणु क्षमता तेजी से बढ़ाता है तो भारत को भी अपने रणनीतिक प्रतिरोधक तंत्र को और मजबूत करना पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भारत को अधिक परमाणु पनडुब्बियों के निर्माण, लंबी दूरी की K-4 और K-5 बैलिस्टिक मिसाइलों के विकास तथा समुद्री निगरानी प्रणाली के विस्तार पर और अधिक ध्यान देना होगा। चीन की बढ़ती समुद्री सक्रियता का असर केवल सैन्य संतुलन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की भू-राजनीति पर भी पड़ सकता है। भारत पहले से उत्तरी सीमा पर चीन और पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान जैसी दोहरी सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। यदि समुद्री क्षेत्र में भी चीन की मौजूदगी लगातार बढ़ती है तो भारत को भूमि, वायु और समुद्र—तीनों मोर्चों पर अपनी रक्षा तैयारियों को संतुलित तरीके से मजबूत करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बदलते परिदृश्य में अंडमान एवं निकोबार कमांड की रणनीतिक भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी। यह कमांड मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जहां से दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्ग गुजरते हैं। यदि चीन की पनडुब्बियों की गतिविधियां इस क्षेत्र में बढ़ती हैं तो भारत को पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता, समुद्री निगरानी ड्रोन, आधुनिक सोनार सिस्टम और P-8I समुद्री निगरानी विमानों की तैनाती और बढ़ानी पड़ सकती है। चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों का एक और बड़ा प्रभाव QUAD समूह पर भी पड़ सकता है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया पहले से ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त और सुरक्षित समुद्री मार्ग बनाए रखने के लिए सहयोग कर रहे हैं। ऐसे में समुद्री सुरक्षा, खुफिया जानकारी साझा करने और संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों की संख्या आने वाले समय में और बढ़ सकती है। मालाबार जैसे संयुक्त अभ्यास इस सहयोग को और मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाकर ताइवान पर दबाव बनाए रखना चाहता है। साथ ही वह प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की रणनीतिक बढ़त को चुनौती देने और वैश्विक स्तर पर अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन करने की कोशिश भी कर रहा है। समुद्र आधारित परमाणु क्षमता को मजबूत करना इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। दूसरी ओर भारत भी अपनी समुद्री शक्ति को लगातार मजबूत कर रहा है। भारतीय नौसेना के पास पहले से परमाणु पनडुब्बियां, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, आधुनिक समुद्री निगरानी विमान और मजबूत नौसैनिक कमांड मौजूद हैं। इसके अलावा मित्र देशों के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग और हिंद महासागर क्षेत्र में सक्रिय रणनीतिक निगरानी भारत की सुरक्षा नीति का अहम हिस्सा बन चुका है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 10:12:49 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>भारत-इंडोनेशिया के बीच रक्षा सहयोग मजबूत, ब्रह्मोस और अस्त्र मिसाइल खरीद पर सहमति</title>
                                    <description><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो की बैठक में रक्षा, चुनावी तकनीक और रणनीतिक साझेदारी से जुड़े कई अहम समझौतों पर बनी सहमति।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/defense-cooperation-between-india-and-indonesia-strengthened-agreement-on-purchase/article-58049"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/india-indonesia-relations.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भारत और इंडोनेशिया के बीच रक्षा और रणनीतिक सहयोग को नई मजबूती मिली है। जकार्ता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक में कई महत्वपूर्ण समझौतों पर सहमति बनी। सबसे बड़ा फैसला ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की खरीद को लेकर रहा। फिलीपींस और वियतनाम के बाद अब इंडोनेशिया भी भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने वाला तीसरा देश बन गया है। अधिकारियों के अनुसार इस समझौते के तहत भारत इंडोनेशिया को ब्रह्मोस मिसाइल की अतिरिक्त यूनिट उपलब्ध कराएगा। इसे दोनों देशों के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग और भारत की रक्षा तकनीक पर बढ़ते वैश्विक भरोसे के रूप में देखा जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;"><img alt="Z"></img></p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बैठक के दौरान इंडोनेशिया ने भारत में विकसित 'अस्त्र' एयर-टू-एयर मिसाइल खरीदने का भी फैसला किया। यह वही मिसाइल है, जिसका उपयोग हाल के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान किया गया था। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक इस फैसले से भारतीय रक्षा उद्योग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक और बड़ी सफलता मिली है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वदेशी रक्षा प्रणालियों की लगातार बढ़ती मांग भारत को वैश्विक रक्षा निर्यातक देशों की सूची में और मजबूत स्थिति दिला सकती है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर जोर दिया है और अब उसके उत्पाद कई देशों का भरोसा जीत रहे हैं। रक्षा सहयोग के अलावा दोनों देशों के बीच चुनावी तकनीक के क्षेत्र में भी अहम सहमति बनी है। भारत इंडोनेशिया के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम विकसित करने में तकनीकी सहायता देगा। इसे भारत की चुनाव प्रणाली और तकनीकी क्षमता पर इंडोनेशिया के भरोसे के तौर पर देखा जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार इस सहयोग का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और आधुनिक बनाना है। भारत पहले भी कई देशों के साथ डिजिटल प्रशासन और तकनीकी सहयोग के क्षेत्र में साझेदारी बढ़ाता रहा है और अब इसमें चुनावी प्रबंधन भी शामिल हो रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;"><img alt="Z"></img></p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंडोनेशिया दौरे का मंगलवार को दूसरा दिन रहा। सुबह जकार्ता स्थित राष्ट्रपति भवन में उनका औपचारिक स्वागत किया गया। राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने स्वयं उनका स्वागत किया और दोनों नेताओं ने गर्मजोशी से मुलाकात की। प्रधानमंत्री मोदी को गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया गया। समारोह के दौरान वहां मौजूद भारतीय समुदाय के लोगों और बच्चों ने भी उनका स्वागत किया। राष्ट्रपति भवन में हुई द्विपक्षीय वार्ता के दौरान दोनों नेताओं ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, व्यापार, निवेश, डिजिटल तकनीक और क्षेत्रीय सहयोग सहित कई विषयों पर विस्तार से चर्चा की। भारत और इंडोनेशिया लंबे समय से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में महत्वपूर्ण साझेदार रहे हैं। दोनों देशों के बीच समुद्री सुरक्षा, व्यापार और सांस्कृतिक संबंध लगातार मजबूत होते रहे हैं। ऐसे समय में जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र रणनीतिक दृष्टि से दुनिया का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है, दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को विशेष महत्व दिया जा रहा है। जानकारों का कहना है कि ब्रह्मोस और अस्त्र जैसी रक्षा प्रणालियों के निर्यात से भारत की रणनीतिक स्थिति और मजबूत होगी, वहीं इंडोनेशिया की रक्षा क्षमताओं में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;"><img alt="2Q=="></img></p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी जावा द्वीप पर स्थित प्रसिद्ध प्रम्बानन मंदिर भी जाने वाले हैं। नौवीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा को समर्पित है तथा यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है। यह मंदिर भारत और इंडोनेशिया के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों का प्रतीक माना जाता है। माना जा रहा है कि इस यात्रा के जरिए दोनों देशों के साझा सांस्कृतिक विरासत को भी नई पहचान मिलेगी। सोमवार को इंडोनेशिया पहुंचने पर प्रधानमंत्री मोदी के विमान को इंडोनेशियाई वायुसेना ने अपने एयरस्पेस में प्रवेश करते ही एस्कॉर्ट किया था। इसे दोनों देशों के बीच मजबूत मित्रता और सम्मान का प्रतीक माना गया। दो दिवसीय यात्रा के दौरान हुए समझौते यह संकेत देते हैं कि भारत और इंडोनेशिया अब केवल व्यापारिक साझेदार ही नहीं, बल्कि रक्षा, तकनीक, लोकतांत्रिक संस्थाओं और क्षेत्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में भी दीर्घकालिक सहयोग को नई दिशा देने की तैयारी में हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 11:59:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>आकांक्षा चमोला का बड़ा खुलासा, बोलीं- शादी से पहले लड़कियों के साथ रिश्तों में रही, बायसेक्सुअल होने की बात कबूली</title>
                                    <description><![CDATA['लॉक अप सीजन 2' में एक्ट्रेस ने निजी जीवन पर खुलकर की बात; गौरव खन्ना से अलग रहने, बच्चों को लेकर मतभेद और सोशल मीडिया पर उठे सवाल भी चर्चा में]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/bollywood/akanksha-chamolas-big-revelation-confessed-to-being-bisexual-had/article-57927"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/akanksha-chamola.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">टीवी इंडस्ट्री की जानी-मानी अभिनेत्री आकांक्षा चमोला एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार चर्चा उनके किसी नए प्रोजेक्ट की नहीं, बल्कि उनके निजी जीवन से जुड़े एक खुलासे की है। रियलिटी शो 'लॉक अप सीजन 2' के दौरान आकांक्षा ने स्वीकार किया कि गौरव खन्ना से शादी से पहले वह खुद को बायसेक्सुअल मानती थीं और उनका कुछ लड़कियों के साथ रिलेशनशिप भी रहा है। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है। कुछ लोगों ने उनकी ईमानदारी की सराहना की, जबकि कई यूजर्स ने इसे शो की लोकप्रियता बढ़ाने का प्रयास बताया। रियलिटी शो के एक एपिसोड में बातचीत के दौरान आकांक्षा चमोला ने कहा कि शादी से पहले उनके कुछ लड़कियों के साथ रिश्ते रहे हैं। उन्होंने बताया कि ये रिश्ते बहुत ज्यादा इंटिमेट नहीं थे, लेकिन वह महिलाओं की ओर आकर्षित होती थीं और उनके साथ खुद को सुरक्षित महसूस करती थीं।</p>
<p style="text-align:justify;">आकांक्षा ने कहा कि उन्हें हमेशा से लड़कियां पसंद रही हैं। वह उनकी प्रशंसा करती हैं और उनकी ओर आकर्षण महसूस करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनके लिए महिलाओं का साथ एक सुरक्षित और सहज स्पेस जैसा रहा है। उनका यह बयान सामने आते ही सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया। कई लोगों ने इसे व्यक्तिगत पहचान को लेकर साहसिक स्वीकारोक्ति बताया, जबकि कुछ यूजर्स ने इसे केवल प्रचार हासिल करने की रणनीति करार दिया। आकांक्षा के बयान के बाद इंटरनेट पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। कुछ लोगों ने कहा कि किसी व्यक्ति की यौन पहचान उसका निजी मामला है और इस पर खुलकर बात करना सकारात्मक कदम है। वहीं दूसरी ओर कई यूजर्स ने आरोप लगाया कि रियलिटी शोज में चर्चा बटोरने के लिए इस तरह के खुलासे किए जाते हैं। कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया गया कि शो की टीआरपी बढ़ाने के लिए इस तरह के बयान दिए जाते हैं, जबकि अन्य लोगों ने कहा कि किसी की निजी जिंदगी को लेकर बिना पूरी जानकारी के टिप्पणी करना उचित नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">आकांक्षा चमोला इससे पहले भी अपने वैवाहिक जीवन को लेकर चर्चा में रह चुकी हैं। इसी शो में उन्होंने खुलासा किया था कि वह और उनके पति गौरव खन्ना अलग रहने लगे हैं। उन्होंने बताया कि शादी के बाद भी उनमें कभी मां बनने की इच्छा विकसित नहीं हुई। उन्होंने इसे समझने की कोशिश की, लेकिन समय के साथ उन्हें महसूस हुआ कि वह मातृत्व के लिए खुद को तैयार नहीं पाती हैं। आकांक्षा के अनुसार, शुरुआत में गौरव खन्ना भी इस फैसले से सहमत थे, लेकिन बाद में उनकी सोच बदल गई और वह परिवार बढ़ाना चाहते थे। दोनों की अलग-अलग प्राथमिकताओं के कारण रिश्ते में दूरी बढ़ती गई।</p>
<p style="text-align:justify;">आकांक्षा ने शो में यह भी बताया कि वह और गौरव पिछले लगभग एक वर्ष से अलग रह रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि जीवन के महत्वपूर्ण फैसलों पर दोनों की सोच अलग हो गई है, तो सम्मानपूर्वक अलग होना भी एक सही विकल्प हो सकता है। हालांकि दोनों ने अब तक अपने रिश्ते को लेकर सार्वजनिक रूप से किसी कानूनी प्रक्रिया की पुष्टि नहीं की है। उनके बयान के बाद प्रशंसकों के बीच कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई थीं।</p>
<p style="text-align:justify;">आकांक्षा के अलग रहने वाले बयान के बाद गौरव खन्ना ने मीडिया से बातचीत में कहा था कि उनके मन में आज भी आकांक्षा के लिए सम्मान और प्यार है। उन्होंने कहा कि वह हमेशा उनकी सफलता और खुशहाली की कामना करेंगे। गौरव ने यह भी कहा कि वह चाहते हैं कि आकांक्षा शो में अच्छा प्रदर्शन करें और अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ें। उनके इस बयान को कई लोगों ने रिश्ते में परिपक्वता और सम्मान का उदाहरण बताया।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरव खन्ना और आकांक्षा चमोला की मुलाकात टीवी इंडस्ट्री में काम करने के दौरान हुई थी। एक ऑडिशन के दौरान दोनों की पहचान हुई, जो बाद में दोस्ती और फिर प्रेम संबंध में बदल गई। लंबे समय तक एक-दूसरे को डेट करने के बाद दोनों ने 24 नवंबर 2016 को कानपुर में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ शादी की। तीन दिनों तक चले विवाह समारोह में परिवार और करीबी मित्र शामिल हुए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरव खन्ना टीवी इंडस्ट्री के लोकप्रिय कलाकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने कई चर्चित धारावाहिकों में काम किया है और रियलिटी शोज में भी अपनी अलग पहचान बनाई है। अभिनय के साथ-साथ उनकी लोकप्रियता सोशल मीडिया पर भी लगातार बढ़ी है। वहीं आकांक्षा चमोला भी कई टीवी धारावाहिकों का हिस्सा रह चुकी हैं। उन्होंने 'स्वरागिनी', 'संतोषी मां', 'ये है आशिकी' और 'क्राइम पेट्रोल' जैसे कार्यक्रमों में अभिनय किया है। अपनी सहज अदाकारी और स्क्रीन प्रेजेंस के कारण उन्होंने टीवी दर्शकों के बीच खास पहचान बनाई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बालीवुड</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 15:42:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>E20 पेट्रोल पर भूटान का बड़ा फैसला, भारत से मांगा सिर्फ नॉर्मल पेट्रोल</title>
                                    <description><![CDATA[पुराने फ्यूल स्टोरेज, पानी रिसाव और पहाड़ी इलाकों में इंजन पर असर की आशंका जताई; भारत से एडवांस सूचना और लीक-प्रूफ टैंक की भी मांग]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/bhutans-big-decision-on-e20-petrol-asked-for-only-normal/article-57925"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/bhutan.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">भारत सरकार जहां देशभर में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित E20 पेट्रोल के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही है, वहीं पड़ोसी देश भूटान ने इस ईंधन को लेने से फिलहाल इनकार कर दिया है। भूटान ने भारतीय ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) से स्पष्ट रूप से अनुरोध किया है कि जब तक भारत में सामान्य (बिना एथेनॉल मिश्रण वाला) पेट्रोल उपलब्ध है, तब तक उसे वही सप्लाई किया जाए। भूटान का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में E20 पेट्रोल का उपयोग उसके लिए तकनीकी और व्यावहारिक चुनौतियां पैदा कर सकता है। सरकार ने इस फैसले के पीछे कई अहम कारण बताए हैं। इनमें सबसे बड़ा कारण देश का पुराना फ्यूल स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर, अंडरग्राउंड टैंकों में पानी रिसने की समस्या और पहाड़ी इलाकों में वाहनों की परफॉर्मेंस को लेकर चिंता शामिल है। भूटान का मानना है कि इन परिस्थितियों में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का इस्तेमाल वाहनों और ईंधन भंडारण व्यवस्था दोनों के लिए जोखिम बढ़ा सकता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>पुराना स्टोरेज सिस्टम बना सबसे बड़ी चिंता</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">भूटान के अधिकांश पेट्रोल पंपों पर ईंधन को जमीन के नीचे बने स्टील के टैंकों में संग्रहित किया जाता है। कई स्थानों पर ये टैंक पुराने हो चुके हैं और उनमें पानी के रिसाव की आशंका बनी रहती है। विशेषज्ञों के अनुसार, एथेनॉल में नमी को तेजी से सोखने की क्षमता होती है। यदि स्टोरेज टैंक में थोड़ी भी नमी या पानी मौजूद हो तो E20 पेट्रोल उसे अपने अंदर मिला सकता है। ऐसी स्थिति में ईंधन की गुणवत्ता प्रभावित होती है और वाहनों के इंजन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसके अलावा स्टील टैंक और पाइपलाइन में जंग लगने का खतरा भी बढ़ जाता है, जिससे भविष्य में रखरखाव की लागत अधिक हो सकती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>पहाड़ी रास्तों पर प्रदर्शन को लेकर आशंका</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">भूटान का अधिकांश भूभाग पहाड़ी है, जहां तीखी चढ़ाइयों और घुमावदार सड़कों पर वाहन चलाने के लिए अधिक शक्ति की आवश्यकता होती है। अधिकारियों का मानना है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की ऊर्जा क्षमता सामान्य पेट्रोल की तुलना में कुछ कम होती है। इससे कठिन पहाड़ी मार्गों पर इंजन की कार्यक्षमता प्रभावित होने की आशंका है। हालांकि भारत सरकार और कई ऑटोमोबाइल निर्माता E20 को सुरक्षित बताते हैं, लेकिन भूटान का कहना है कि वह अपने स्थानीय भौगोलिक हालात और मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर को ध्यान में रखते हुए फिलहाल इस ईंधन को अपनाने के लिए तैयार नहीं है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भारत में भी जारी है बहस</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">देश में E20 पेट्रोल को लेकर पहले से ही चर्चा और बहस जारी है। विशेष रूप से वर्ष 2023 से पहले बनी कई पेट्रोल गाड़ियों के मालिकों ने दावा किया है कि एथेनॉल मिश्रित ईंधन के कारण माइलेज में कमी आती है और कुछ मामलों में इंजन के रखरखाव की लागत बढ़ जाती है। हालांकि केंद्र सरकार का कहना है कि E20 ईंधन से प्रदूषण कम होता है, विदेशी कच्चे तेल पर निर्भरता घटती है और किसानों को एथेनॉल उत्पादन के माध्यम से अतिरिक्त आय का अवसर मिलता है। सरकार का यह भी दावा है कि E20 के कारण इंजन की कार्यक्षमता पर कोई बड़ा नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भारत से ही खरीदता है पूरा ईंधन</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">भूटान अपनी पेट्रोल और डीजल की लगभग पूरी आवश्यकता भारत से पूरी करता है। दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग लंबे समय से मजबूत रहा है। वर्तमान में भूटान को उच्च गुणवत्ता वाला ईंधन उपलब्ध कराया जाता है। भूटानी अधिकारियों का कहना है कि यदि भविष्य में गलती से भी E20 पेट्रोल की आपूर्ति हो जाती है तो उसकी पहचान करना कठिन नहीं होगा। एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल में यदि पानी मिल जाए तो उसका रंग दूधिया दिखाई देने लगता है, जिससे परीक्षण के दौरान आसानी से पता लगाया जा सकता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भविष्य के लिए पहले से सूचना की मांग</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">भूटान ने भारतीय ऑयल मार्केटिंग कंपनियों से यह भी अनुरोध किया है कि यदि भविष्य में एथेनॉल मिश्रण का प्रतिशत बढ़ाया जाता है या सामान्य पेट्रोल की आपूर्ति पूरी तरह बंद करने का निर्णय लिया जाता है, तो इसकी जानकारी पहले से दी जाए। इससे भूटान को अपने स्टोरेज सिस्टम और वितरण नेटवर्क में आवश्यक बदलाव करने का समय मिल सकेगा। इसके साथ ही भूटान ने लीक-प्रूफ और आधुनिक ईंधन भंडारण टैंक उपलब्ध कराने में भी भारत से सहयोग की अपेक्षा जताई है। अधिकारियों का मानना है कि बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होने के बाद भविष्य में E20 जैसे ईंधन को अपनाने पर पुनर्विचार किया जा सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 15:42:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>LNG सप्लाई फिर हुई सामान्य, सरकार ने हटाए सभी आपातकालीन प्रतिबंध</title>
                                    <description><![CDATA[अमेरिका-ईरान संघर्ष थमने और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से शिपमेंट बहाल होने के बाद केंद्र का बड़ा फैसला, उद्योगों को मिलेगी राहत और गैस आपूर्ति होगी सुचारु]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/lng-supply-normal-again-government-removed-all-emergency-restrictions/article-57903"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/lng-supply-india.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">भारत में लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की आपूर्ति एक बार फिर सामान्य हो गई है। केंद्र सरकार ने अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच चले सैन्य संघर्ष के दौरान लागू किए गए ‘इमरजेंसी नेचुरल गैस सप्लाई रेगुलेशन ऑर्डर’ को वापस लेने का निर्णय लिया है। इस फैसले के बाद देश के औद्योगिक क्षेत्रों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि एलएनजी का सबसे अधिक उपयोग उद्योगों, बिजली उत्पादन, उर्वरक निर्माण और कई अन्य औद्योगिक गतिविधियों में किया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार, पश्चिम एशिया में युद्धविराम लागू होने और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से गैस एवं तेल के जहाजों की आवाजाही सामान्य होने के बाद आपातकालीन प्रतिबंधों की अब आवश्यकता नहीं रह गई है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि मौजूदा परिस्थितियों में गैस की आपूर्ति स्थिर है और विदेशी आपूर्तिकर्ताओं से भारत के लिए एलएनजी कार्गो फिर से नियमित रूप से पहुंच रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़े सैन्य तनाव के चलते फरवरी के अंत में स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो गई थी। इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से दुनिया के बड़े हिस्से में तेल और गैस की सप्लाई होती है। हालात बिगड़ने के बाद कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत आने वाले एलएनजी कार्गो को रोक दिया था या उन्हें अन्य देशों की ओर मोड़ दिया था। इस संभावित ऊर्जा संकट को देखते हुए केंद्र सरकार ने 9 मार्च 2026 को आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत ‘इमरजेंसी नेचुरल गैस सप्लाई रेगुलेशन ऑर्डर’ लागू किया था। इसका उद्देश्य सीमित उपलब्ध गैस का प्राथमिकता के आधार पर वितरण सुनिश्चित करना और आवश्यक क्षेत्रों में आपूर्ति बनाए रखना था।</p>
<p style="text-align:justify;">एलएनजी सप्लाई से जुड़े प्रतिबंध हटाना सरकार का तीसरा बड़ा निर्णय माना जा रहा है। इससे पहले सरकार ऊर्जा आपूर्ति सामान्य होने के बाद दो अन्य आपातकालीन फैसले भी वापस ले चुकी है। पहले फैसले के तहत तेल रिफाइनरियों को निर्देश दिया गया था कि वे पेट्रोकेमिकल उत्पादन कम कर एलपीजी का उत्पादन अधिक करें ताकि घरेलू जरूरतें पूरी की जा सकें। अब इस निर्देश को समाप्त कर दिया गया है। दूसरे फैसले में बल्क उपभोक्ताओं को डीजल की बिक्री पर लगाई गई सीमा भी समाप्त कर दी गई है। सरकार का कहना है कि अब ईंधन आपूर्ति पूरी तरह सामान्य हो चुकी है और किसी प्रकार की अतिरिक्त पाबंदी की आवश्यकता नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">एलएनजी की आपूर्ति सामान्य होने का सबसे बड़ा लाभ औद्योगिक क्षेत्र को मिलेगा। देश में कई उद्योग प्राकृतिक गैस पर आधारित उत्पादन प्रणाली का उपयोग करते हैं। गैस की कमी के दौरान कई कंपनियों को उत्पादन लागत बढ़ने, वैकल्पिक ईंधन अपनाने और उत्पादन घटाने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा था। अब नियमित आपूर्ति बहाल होने से उत्पादन क्षमता में सुधार होगा और कई उद्योगों का संचालन पहले की तरह सुचारु रूप से हो सकेगा। इससे बिजली उत्पादन, उर्वरक उद्योग, स्टील, सिरेमिक, कांच, टेक्सटाइल और अन्य गैस आधारित उद्योगों को राहत मिलने की संभावना है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और इसी रास्ते से खाड़ी देशों का अधिकांश तेल और गैस दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुंचता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। देश अपनी आवश्यकता का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल और करीब 50 प्रतिशत प्राकृतिक गैस विदेशों से खरीदता है। इनमें से बड़ी मात्रा पश्चिम एशिया के देशों से आती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 40 से 45 प्रतिशत और एलएनजी आयात का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। विशेष रूप से कतर से आने वाली एलएनजी का अधिकांश परिवहन स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के रास्ते ही होता है। ऐसे में इस मार्ग पर किसी भी प्रकार का तनाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सीधे प्रभावित कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम एशिया में पैदा हुए संकट के दौरान सरकार ने ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने के लिए कई वैकल्पिक कदम उठाए थे। विभिन्न देशों से ईंधन आयात के विकल्प तलाशे गए, घरेलू भंडार का उपयोग किया गया और आवश्यक क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हुए गैस वितरण किया गया। एलएनजी आपूर्ति सामान्य होने से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में भी स्थिरता आने की उम्मीद है। उद्योगों के साथ-साथ ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े अन्य व्यवसायों को भी इसका लाभ मिलेगा। इससे गैस की उपलब्धता बेहतर होगी और उत्पादन लागत पर पड़ने वाला अतिरिक्त दबाव कम हो सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 12:53:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दिग्विजय सिंह का ऐलान: महाकाल से अयोध्या तक करेंगे 1000 किमी पदयात्रा, राम मंदिर चंदे का हिसाब मांगेंगे</title>
                                    <description><![CDATA[2 अक्टूबर से शुरू होगी यात्रा, कोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी; यात्रा को गैर-राजनीतिक बताते हुए सोशल मीडिया से दूरी बनाने की घोषणा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/6a48b697e584e/article-57851"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/digvijaya-singh.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने राम मंदिर निर्माण के लिए जुटाए गए चंदे की पारदर्शिता को लेकर बड़ा ऐलान किया है। भोपाल में शुक्रवार को मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि वह आगामी 2 अक्टूबर से उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर से अयोध्या की राम जन्मभूमि तक करीब 1000 किलोमीटर लंबी पदयात्रा निकालेंगे। दिग्विजय सिंह ने कहा कि यह यात्रा पूरी तरह गैर-राजनीतिक होगी और इसका उद्देश्य किसी दल या संगठन के खिलाफ अभियान चलाना नहीं, बल्कि राम मंदिर निर्माण के लिए मिले चंदे का सार्वजनिक हिसाब मांगना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यात्रा के दौरान कांग्रेस का प्रचार नहीं किया जाएगा और न ही वे फेसबुक, एक्स (पूर्व में ट्विटर) या किसी अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करेंगे। उनके अनुसार उन्होंने स्वयं भी राम मंदिर निर्माण के लिए 1.11 लाख रुपये का योगदान दिया था और आज भी उस दान की रसीद तथा चेक की प्रति उनके पास सुरक्षित है। उनका कहना है कि जिन श्रद्धालुओं ने आस्था के साथ दान दिया है, उन्हें यह जानने का अधिकार है कि उस धन का उपयोग किस प्रकार किया गया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दिग्विजय सिंह ने बताया कि पदयात्रा शुरू होने से पहले वह वरिष्ठ अधिवक्ताओं से कानूनी सलाह लेंगे। उन्होंने कहा कि 5 या 6 जुलाई को वकीलों से चर्चा के बाद अयोध्या जाकर अदालत में याचिका दायर करने की तैयारी है। उनका कहना है कि न्यायालय से राम मंदिर निर्माण के लिए एकत्रित धन का पूरा लेखा-जोखा प्रस्तुत करने की मांग की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि जांच में किसी प्रकार की वित्तीय अनियमितता सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय न्यायालय और जांच प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। दिग्विजय सिंह का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि धार्मिक संस्थाओं के प्रति लोगों की आस्था बहुत गहरी होती है, इसलिए आर्थिक मामलों में भी स्पष्टता बनी रहनी चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि इस पदयात्रा में उन सभी लोगों का स्वागत होगा जिन्होंने राम मंदिर निर्माण के लिए आर्थिक सहयोग दिया था। उन्होंने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन या आम नागरिक को यदि चंदे के उपयोग में पारदर्शिता की अपेक्षा है तो वह इस यात्रा में शामिल हो सकता है। उनके अनुसार यात्रा के दौरान वह अपने साथ दान की रसीद और चेक की प्रतियां भी रखेंगे ताकि यह दिखाया जा सके कि उन्होंने स्वयं भी इस अभियान में योगदान दिया था। उन्होंने कहा कि करोड़ों लोगों ने भगवान राम के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए स्वेच्छा से दान दिया था और ऐसे में यदि चंदे के उपयोग को लेकर कोई सवाल उठते हैं तो उनका समाधान भी पारदर्शी तरीके से होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अदालत में किसी प्रकार की वित्तीय गड़बड़ी साबित होती है तो वह अपना दिया गया चंदा वापस लेकर उसे किसी मान्यता प्राप्त धार्मिक पीठ या शंकराचार्य के न्यास को दान कर देंगे।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दिग्विजय सिंह ने उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर क्षेत्र में बने एक गेस्ट हाउस का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस परियोजना और उससे जुड़े आर्थिक पहलुओं पर भी पारदर्शिता होनी चाहिए। उनका कहना था कि धार्मिक स्थलों से जुड़ी सभी संस्थाओं और ट्रस्टों के आर्थिक लेन-देन का समय-समय पर सार्वजनिक विवरण उपलब्ध होना चाहिए, ताकि श्रद्धालुओं का विश्वास और मजबूत हो। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी मांग केवल एक ट्रस्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी धार्मिक ट्रस्टों के लिए समान रूप से पारदर्शिता लागू होनी चाहिए। उन्होंने अपने घर के बाहर एक तख्ती लगाने की भी घोषणा की, जिस पर लिखा होगा कि "मेरे घर में चंदा चोरों का प्रवेश निषिद्ध है।" इसे उन्होंने प्रतीकात्मक संदेश बताया। दिग्विजय सिंह ने दोहराया कि उनकी पूरी यात्रा शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और संवैधानिक दायरे में होगी। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था को निशाना बनाना नहीं बल्कि दानदाताओं के मन में उठ रहे सवालों को उचित मंच पर रखना है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 14:38:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नई गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम की तैयारी, अब ज्वेलर्स के पास भी जमा कर सकेंगे सोना</title>
                                    <description><![CDATA[सरकार जल्द ला सकती है अपडेटेड योजना, ज्वेलर्स को बनाया जा सकता है कलेक्शन पार्टनर; घरों में रखा निष्क्रिय सोना अर्थव्यवस्था में लाने की तैयारी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/preparation-for-new-gold-monetization-scheme-now-you-will-be/article-57820"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/gold-monetization-scheme.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">केंद्र सरकार देश में निष्क्रिय पड़े सोने को अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में लाने के लिए गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (जीएमएस) में बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगले दो सप्ताह के भीतर सरकार इस योजना का नया और संशोधित स्वरूप पेश कर सकती है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत पहली बार देशभर के ज्वेलर्स और सर्राफा कारोबारियों को 'कलेक्शन पार्टनर' के रूप में शामिल किया जा सकता है। अभी तक आम लोग केवल अधिकृत बैंकों के माध्यम से ही इस योजना में अपना सोना जमा कर सकते थे। नए प्रस्ताव का उद्देश्य इस प्रक्रिया को आसान बनाना है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसमें भाग ले सकें। माना जा रहा है कि यदि यह योजना लागू होती है तो लोगों को अपने आसपास के भरोसेमंद ज्वेलर्स के पास ही सोना जमा करने की सुविधा मिल जाएगी। इससे बैंक तक जाने की जरूरत कम होगी और योजना की पहुंच भी पहले के मुकाबले काफी बढ़ सकती है। सरकार का मानना है कि देश के घरों में बड़ी मात्रा में ऐसा सोना रखा है जिसका उपयोग नहीं हो रहा है। यदि उसका एक हिस्सा भी औपचारिक व्यवस्था में आ जाता है तो इससे आयात पर निर्भरता घटाने और अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में मदद मिल सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सराफा कारोबार से जुड़े संगठनों ने लंबे समय से सरकार से इस योजना के नियमों में बदलाव की मांग की थी। उनका तर्क था कि ज्वेलर्स को इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए क्योंकि आम लोगों का उनसे सीधा संपर्क होता है और विश्वास भी अधिक होता है। ऑल इंडिया ज्वेलर्स एंड गोल्डस्मिथ फेडरेशन (AIJGF) का कहना है कि यदि ज्वेलर्स को कलेक्शन पार्टनर बनाया जाता है तो देशभर से बड़ी मात्रा में सोना जुटाना आसान हो जाएगा। संगठन का अनुमान है कि इस व्यवस्था के जरिए 1000 टन से अधिक सोना बाजार में लाया जा सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यदि भारतीय परिवारों के पास मौजूद कुल सोने का केवल पांच प्रतिशत हिस्सा भी इस योजना में जमा हो जाता है तो अर्थव्यवस्था में लगभग 90 अरब डॉलर, यानी करीब 8.57 लाख करोड़ रुपये के बराबर मूल्य का सोना औपचारिक वित्तीय व्यवस्था में शामिल हो सकता है। इससे सोने के आयात की जरूरत कम होगी और विदेशी मुद्रा पर पड़ने वाला दबाव भी घट सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में शामिल है और हर साल बड़ी मात्रा में सोने का आयात करता है। ऐसे में घरेलू स्तर पर उपलब्ध सोने का बेहतर उपयोग देश की आर्थिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रस्तावित नई गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम में आम लोगों के लिए कई सुविधाएं देने की भी तैयारी है। जानकारी के अनुसार, योजना में जमा किए गए सोने पर सालाना लगभग 2.25 से 2.5 प्रतिशत तक ब्याज मिलने की व्यवस्था बरकरार रह सकती है। इससे घरों में वर्षों से बिना उपयोग के रखे सोने से आय अर्जित करने का अवसर मिलेगा। साथ ही बैंक लॉकर का वार्षिक खर्च और घर में सोना रखने से जुड़ी सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी कम हो सकती हैं। योजना की अवधि पूरी होने पर निवेशकों के पास यह विकल्प रहेगा कि वे अपनी राशि नकद के रूप में लें या फिर उतनी कीमत का फिजिकल गोल्ड वापस प्राप्त करें। सरकार ऐसी व्यवस्था पर भी काम कर रही है जिससे पुराने सोने को जमा करने वाले लोगों को दस्तावेजों और कर संबंधी प्रक्रियाओं को लेकर अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े। हालांकि अंतिम नियमों और पात्रता की जानकारी योजना की आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगी। यदि योजना का ढांचा सरल और पारदर्शी रखा जाता है तो यह आम परिवारों के लिए आकर्षक विकल्प बन सकती है। इसके साथ ही ज्वेलर्स को शामिल करने से योजना का नेटवर्क तेजी से बढ़ेगा और छोटे शहरों तथा कस्बों तक इसकी पहुंच आसान होगी। सरकार का उद्देश्य केवल लोगों को निवेश का नया विकल्प देना नहीं, बल्कि देश में निष्क्रिय पड़े सोने को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना भी है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 11:14:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>खामेनेई के अंतिम संस्कार में जुटे 100 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधि, कई बड़े देशों ने नहीं भेजे शीर्ष नेता</title>
                                    <description><![CDATA[तेहरान में कड़ी सुरक्षा के बीच अंतिम विदाई की रस्में शुरू, ईरान के शीर्ष नेतृत्व ने दी श्रद्धांजलि, भारत सहित कई देशों ने मंत्री स्तर के प्रतिनिधिमंडल भेजे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/6a4892cddd218/article-57814"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/khamenei-funeral-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई को अंतिम विदाई देने का सिलसिला तेहरान में शुरू हो गया है। राजधानी के इमाम खुमैनी ग्रैंड मुसल्ला में शनिवार सुबह से ही बड़ी संख्या में लोग पहुंचने लगे। श्रद्धांजलि समारोह में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए नागरिकों के साथ विदेशी प्रतिनिधिमंडलों की भी मौजूदगी रही। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान, चीफ जस्टिस गुलाम-हुसैन मोहसेनी-एजेई, संसद के स्पीकर बाघेर गालिबाफ और सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री समारोह में शामिल हुए और खामेनेई को श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक इस कार्यक्रम में 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधि पहुंचे, लेकिन रूस, चीन, भारत और तुर्किये जैसे प्रभावशाली देशों ने अपने सर्वोच्च नेताओं को नहीं भेजा। इन देशों की ओर से मंत्री स्तर या अन्य वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बताया जा रहा है कि सुरक्षा कारणों से खामेनेई के बेटे मुजतबा खामेनेई सार्वजनिक रूप से समारोह में मौजूद नहीं रहे। इसे लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी काफी चर्चा देखने को मिली। हालांकि ईरान की ओर से कई देशों के शीर्ष नेताओं को औपचारिक निमंत्रण भेजा गया था, लेकिन मौजूदा क्षेत्रीय हालात और सुरक्षा कारणों को देखते हुए अधिकांश देशों ने अपने प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया। भारत की ओर से विदेश राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा और बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनकर श्रद्धांजलि दी। वहीं पाकिस्तान, इराक, आर्मेनिया, ताजिकिस्तान और जॉर्जिया के शीर्ष नेता स्वयं समारोह में शामिल हुए। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अलग-अलग देशों की मौजूदगी और प्रतिनिधित्व का स्तर मौजूदा कूटनीतिक समीकरणों को भी दर्शाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">श्रद्धांजलि समारोह के दौरान तेहरान में सुरक्षा के बेहद कड़े इंतजाम किए गए। राजधानी की प्रमुख सड़कों, सरकारी भवनों और संवेदनशील इलाकों में सेना, पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के जवान तैनात रहे। कई प्रमुख मार्गों पर सैन्य वाहनों की लगातार गश्त देखने को मिली। अधिकारियों के अनुसार समारोह में बड़ी भीड़ जुटने की संभावना को देखते हुए कई स्तर की सुरक्षा व्यवस्था लागू की गई थी। इमाम खुमैनी ग्रैंड मुसल्ला में प्रवेश करने वाले लोगों की अलग-अलग सुरक्षा जांच की गई और पूरे परिसर की निगरानी आधुनिक उपकरणों के जरिए की गई। आम लोगों की सुविधा के लिए सरकार ने राजधानी में मेट्रो और सरकारी बस सेवाओं को नि:शुल्क रखा। दूसरे शहरों से आने वाले लोगों के लिए विशेष ट्रेनें चलाई गईं, जबकि कई स्कूलों, मस्जिदों और सामुदायिक भवनों में अस्थायी ठहरने की व्यवस्था की गई। कुछ होटलों ने भी श्रद्धांजलि कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोगों के लिए किराए में विशेष छूट दी। प्रशासन का कहना है कि इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य दूर-दराज से आने वाले नागरिकों को किसी प्रकार की असुविधा न होने देना था। सुबह से ही लोगों की लंबी कतारें दिखाई दीं और बड़ी संख्या में महिलाएं, बुजुर्ग और युवा हाथों में खामेनेई की तस्वीरें लेकर श्रद्धांजलि देने पहुंचे। कई लोग लाल झंडे लिए भी नजर आए। समारोह के दौरान कुछ समूहों ने अमेरिका विरोधी नारे लगाए और क्षेत्रीय घटनाओं को लेकर अपनी नाराजगी भी जाहिर की। हालांकि सुरक्षा एजेंसियों ने पूरे कार्यक्रम के दौरान हालात पर पूरी तरह नियंत्रण बनाए रखा और किसी अप्रिय घटना की सूचना सामने नहीं आई। कई महिलाओं को भावुक होकर रोते हुए भी देखा गया, जबकि लोगों ने शांतिपूर्वक अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित की।</p>
<p style="text-align:justify;">खामेनेई का ताबूत इमाम खुमैनी ग्रैंड मुसल्ला पहुंचने के बाद अंतिम श्रद्धांजलि की औपचारिक रस्में शुरू हुईं। अधिकारियों के अनुसार परिवार के सदस्यों ने भी उन्हें अंतिम विदाई दी। पूरे समारोह का सीधा प्रसारण देश के कई समाचार माध्यमों पर किया गया, जिसे बड़ी संख्या में लोगों ने देखा। समारोह में मौजूद नेताओं ने खामेनेई के लंबे सार्वजनिक जीवन और ईरान की राजनीति में उनकी भूमिका को याद किया। हालांकि कार्यक्रम के दौरान किसी प्रकार का औपचारिक राजनीतिक संबोधन नहीं हुआ, लेकिन कई वरिष्ठ नेताओं ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्हें देश के महत्वपूर्ण नेताओं में से एक बताया। इस बीच दुनिया की नजर भी तेहरान पर बनी रही, क्योंकि खामेनेई के निधन के बाद ईरान की राजनीति, क्षेत्रीय रणनीति और भविष्य के नेतृत्व को लेकर लगातार चर्चाएं चल रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में ईरान की आंतरिक राजनीति और उसकी विदेश नीति को लेकर कई महत्वपूर्ण फैसले सामने आ सकते हैं। अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से जारी है और प्रशासन लगातार सुरक्षा व्यवस्था पर नजर बनाए हुए है। बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी के बावजूद पूरे कार्यक्रम को व्यवस्थित तरीके से संचालित किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि अंतिम संस्कार से जुड़े सभी कार्यक्रम तय कार्यक्रम के अनुसार पूरे किए जाएंगे। वहीं अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी ईरान में होने वाले राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रखे हुए है, क्योंकि इसका असर पश्चिम एशिया के व्यापक क्षेत्रीय समीकरणों पर पड़ सकता है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 11:14:12 +0530</pubDate>
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