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                <title>Law - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Law RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>मध्यप्रदेश में मानसून सत्र में यूसीसी विधेयक आना मुश्किल, समिति का कार्यकाल 26 जुलाई तक बढ़ा</title>
                                    <description><![CDATA[विधानसभा का मानसून सत्र 24 जुलाई को होगा समाप्त, सरकार ने समान नागरिक संहिता का मसौदा तैयार कर रही उच्च स्तरीय समिति को दिया अतिरिक्त समय, गुजरात मॉडल पर तैयार हो रहा ड्राफ्ट।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/difficult-to-pass-ucc-bill-in-monsoon-session-in-madhya/article-57880"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/madhya-pradesh-ucc-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर चल रही तैयारियों के बीच अब यह संभावना कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है कि प्रस्तावित कानून आगामी विधानसभा मानसून सत्र में पेश हो सकेगा। राज्य सरकार ने यूसीसी का मसौदा तैयार कर रही उच्च स्तरीय समिति का कार्यकाल 26 जुलाई 2026 तक बढ़ा दिया है, जबकि विधानसभा का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 24 जुलाई को समाप्त हो जाएगा। ऐसे में समय-सीमा को देखते हुए इस सत्र में यूसीसी विधेयक पेश होने की संभावना काफी कम मानी जा रही है। हालांकि सरकार की ओर से अभी तक इस विषय पर अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं किया गया है और अधिकारी यह भी मान रहे हैं कि यदि मसौदे को समय रहते अंतिम रूप मिल जाता है तो सरकार विशेष परिस्थितियों में आगे की रणनीति तय कर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">विधि एवं विधायी कार्य विभाग की ओर से 30 जून को जारी अधिसूचना के अनुसार समिति के सदस्य सचिव के अनुरोध और मसौदा तैयार करने की प्रगति को ध्यान में रखते हुए उसका कार्यकाल बढ़ाया गया है। अधिसूचना में स्पष्ट किया गया है कि समिति के गठन से जुड़े अन्य सभी प्रावधान पहले की तरह प्रभावी रहेंगे। सरकार का कहना है कि यूसीसी जैसा महत्वपूर्ण कानून तैयार करने में कानूनी, सामाजिक और प्रशासनिक पहलुओं का विस्तार से अध्ययन आवश्यक है। इसी कारण समिति को अतिरिक्त समय दिया गया है ताकि अंतिम मसौदा सभी आवश्यक बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;">अब तक तैयार किए गए प्रारूप का बड़ा हिस्सा गुजरात में लागू समान नागरिक संहिता के मॉडल से प्रेरित है। बताया जा रहा है कि मसौदे का लगभग 90 प्रतिशत भाग गुजरात के प्रावधानों के अनुरूप तैयार किया गया है। इसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, वसीयत, भरण-पोषण, बच्चों की अभिरक्षा और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे पारिवारिक मामलों के लिए सभी समुदायों पर समान कानूनी व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव शामिल है। सरकार का उद्देश्य विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर एक समान कानूनी व्यवस्था लागू करना बताया जा रहा है, जिससे नागरिकों के अधिकारों और जिम्मेदारियों में एकरूपता लाई जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पहले सार्वजनिक रूप से यह संकेत दे चुके हैं कि जुलाई में होने वाले विधानसभा मानसून सत्र के दौरान समान नागरिक संहिता कानून का स्वरूप ले सकती है। मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में यह माना जा रहा था कि सरकार मानसून सत्र में ही विधेयक पेश कर सकती है। इसी बीच 2 जुलाई को मुख्यमंत्री के समक्ष यूसीसी के प्रारूप का विस्तृत प्रस्तुतीकरण भी किया गया था। इस बैठक में मसौदे के विभिन्न कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं पर चर्चा होने की जानकारी सामने आई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि समिति का कार्यकाल बढ़ने के बाद स्थिति कुछ बदलती हुई नजर आ रही है। विधानसभा सत्र 24 जुलाई को समाप्त हो जाएगा, जबकि समिति को 26 जुलाई तक का समय दिया गया है। इस कारण तकनीकी रूप से समिति की अंतिम रिपोर्ट सत्र समाप्त होने के बाद उपलब्ध होगी। यही वजह है कि विधेयक को मानसून सत्र में पेश किए जाने की संभावना कम मानी जा रही है। फिर भी प्रशासनिक स्तर पर यह चर्चा बनी हुई है कि यदि समिति निर्धारित समय से पहले अपना अंतिम मसौदा सरकार को सौंप देती है तो सरकार उपलब्ध समय के भीतर विधेयक पेश करने की संभावना पर विचार कर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यूसीसी केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक और संवैधानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण विषय है। इसलिए सरकार किसी भी प्रकार की जल्दबाजी से बचना चाहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के व्यापक कानून के लिए सभी कानूनी पहलुओं, विभिन्न समुदायों की आवश्यकताओं और संभावित प्रशासनिक प्रभावों का गहन अध्ययन आवश्यक होता है। इसी कारण मसौदे को अंतिम रूप देने में अतिरिक्त समय लिया जाना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा माना जा सकता है। विधानसभा के आगामी मानसून सत्र में सरकार के सामने कई अन्य विधायी और प्रशासनिक विषय भी रहेंगे। ऐसे में यदि यूसीसी विधेयक इस सत्र में प्रस्तुत नहीं हो पाता है, तो संभावना है कि सरकार इसे किसी आगामी सत्र या विशेष विधानसभा सत्र में पेश करने पर विचार करे। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 16:19:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, AI के फर्जी कानूनी उदाहरणों को बताया न्याय व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[एनसीएलटी का फैसला रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार किए गए झूठे कानूनी उदाहरण अदालतों में पेश करना न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर असर डाल सकता है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/supreme-courts-strict-comment-calls-fake-legal-examples-of-ai/article-57706"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/supreme-court-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार किए गए फर्जी कानूनी उदाहरणों के इस्तेमाल पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बताया है। अदालत ने कहा कि AI तकनीक अपने आप में समस्या नहीं है, लेकिन यदि उससे तैयार की गई गलत या मनगढ़ंत जानकारी को असली कानूनी मिसाल बताकर अदालत के सामने पेश किया जाता है तो इससे न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ता है। कोर्ट ने इस खतरे की गंभीरता समझाने के लिए भोपाल गैस त्रासदी में मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह जहरीली गैस का प्रभाव दूरगामी और विनाशकारी था, उसी तरह न्यायिक प्रक्रिया में झूठी कानूनी जानकारी का प्रवेश भी बेहद नुकसानदायक हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने यह टिप्पणी नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) मुंबई के एक आदेश को रद्द करते हुए की। मामला एस्सेल इन्फ्राप्रोजेक्ट लिमिटेड, जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड और पूजा रमेश सिंह से जुड़े दिवालियापन विवाद का था। एनसीएलटी ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की धारा-7 के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए अपने फैसले में कई ऐसे कानूनी मामलों का हवाला दिया था, जिनका वास्तविक अस्तित्व ही नहीं था। जांच के दौरान सामने आया कि आदेश में जिन फैसलों का उल्लेख किया गया, उनमें कुछ पूरी तरह मनगढ़ंत थे और उनकी कानूनी साइटेशन भी वास्तविक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाती थीं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों में किसी भी फैसले का आधार केवल प्रमाणिक और सत्यापित कानूनी सामग्री होनी चाहिए। यदि किसी आदेश में ऐसे मामलों का हवाला दिया जाए जो वास्तव में मौजूद ही नहीं हैं, तो यह केवल तकनीकी गलती नहीं बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की मूल भावना के खिलाफ है। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस तरह की चूक लोगों के न्यायपालिका पर भरोसे को कमजोर कर सकती है और भविष्य के मामलों में भी गलत कानूनी आधार तैयार कर सकती है। अदालत ने कहा कि न्याय व्यवस्था का पूरा ढांचा सत्य, पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर आधारित है, इसलिए इसमें किसी भी प्रकार की फर्जी जानकारी के लिए कोई जगह नहीं हो सकती।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मामले की सुनवाई के दौरान जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड ने शपथपत्र दाखिल कर कहा कि उसके वकीलों ने अपने तर्कों में इन कथित मामलों का कोई उल्लेख नहीं किया था। बैंक के अनुसार, एनसीएलटी ने अपने स्तर पर की गई कानूनी रिसर्च के दौरान इन उदाहरणों को आदेश में शामिल किया। इस दलील के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड की समीक्षा की और पाया कि आदेश में शामिल कुछ कानूनी संदर्भ वास्तविक न्यायिक अभिलेखों में उपलब्ध ही नहीं थे। इसके बाद अदालत ने एनसीएलटी का आदेश रद्द कर दिया और भविष्य के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश भी जारी किए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि वह AI तकनीक के उपयोग के खिलाफ नहीं है। अदालत ने कहा कि आधुनिक तकनीक न्यायिक शोध और दस्तावेजों की तैयारी में उपयोगी हो सकती है, लेकिन अंतिम जिम्मेदारी हमेशा इंसानों की ही रहेगी। यदि कोई वकील बिना तथ्य जांचे AI से प्राप्त जानकारी को अदालत में पेश करता है, तो यह उसकी गंभीर पेशेवर लापरवाही मानी जाएगी। इसी तरह यदि कोई न्यायिक अधिकारी या न्यायाधीश बिना सत्यापन के ऐसी सामग्री पर भरोसा करता है, तो यह भी न्यायिक जिम्मेदारी के अनुरूप नहीं माना जाएगा। अदालत ने कहा कि तकनीक केवल सहायक हो सकती है, लेकिन निर्णय और तथ्य सत्यापन का दायित्व मानव विवेक पर ही आधारित रहना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पीठ ने कहा कि केवल चेतावनी देना पर्याप्त नहीं होगा। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर या लापरवाही से अदालत में फर्जी AI-आधारित कानूनी सामग्री प्रस्तुत करता है, तो उसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। अदालत ने इस मुद्दे को भविष्य की न्यायिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि समय रहते स्पष्ट नियम बनाना आवश्यक है ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके। न्यायपालिका में विश्वास बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि अदालतों में प्रस्तुत हर कानूनी संदर्भ का स्वतंत्र सत्यापन किया जाए। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने की सिफारिश की है। अदालत का कहना है कि यह समिति अदालतों में AI के जिम्मेदार उपयोग के लिए दिशा-निर्देश तैयार करे और यह सुनिश्चित करे कि किसी भी वकील या पक्षकार द्वारा फर्जी अथवा भ्रामक AI सामग्री प्रस्तुत न की जाए। यदि ऐसे मामलों में नियमों का उल्लंघन होता है तो उसके लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी प्रावधान होना चाहिए। अदालत ने कहा कि तकनीक का उपयोग स्वागतयोग्य है, लेकिन न्याय की प्रक्रिया में सत्य और प्रमाणिकता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 06:06:00 +0530</pubDate>
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                <title>30 दिन जेल में रहने पर PM-CM को छोड़ना पड़ सकता पद</title>
                                    <description><![CDATA[130वें संविधान संशोधन बिल पर JPC की रिपोर्ट अंतिम चरण में, प्रावधान हटाने के पक्ष में नहीं समिति; मानसून सत्र में फिर पेश हो सकता है विधेयक]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/pm-cm-may-have-to-leave-post-if-he-stays-in/article-57579"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/constitutional-amendment-bill.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">देश की राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ा एक अहम मुद्दा इन दिनों चर्चा में है। 130वें संविधान संशोधन बिल को लेकर संसद की संयुक्त संसदीय समिति (JPC) अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार करने में जुटी है। प्रस्तावित प्रावधान के तहत यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या किसी केंद्रीय एवं राज्य मंत्री को किसी गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार कर 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रखा जाता है, तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है। इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक और कानूनी स्तर पर विचार-विमर्श जारी है और इसे आगामी मानसून सत्र में दोबारा पेश किए जाने की संभावना जताई जा रही है। समिति इस बात पर सहमति के करीब है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की जवाबदेही तय करने के लिए कुछ स्पष्ट नियम होने चाहिए। हालांकि इस विषय पर विभिन्न विचार सामने आ रहे हैं और सभी पक्षों की राय को रिपोर्ट में शामिल किया जा रहा है। समिति की रिपोर्ट 17 जुलाई के आसपास अंतिम रूप ले सकती है, जिसके बाद इसे संसद में प्रस्तुत किया जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस पूरे मामले का उद्देश्य संवैधानिक ढांचे में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करना बताया जा रहा है। सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया है कि यदि कोई व्यक्ति गंभीर आरोपों में लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो उससे प्रशासनिक कार्यों की निरंतरता और जनता के विश्वास पर असर पड़ सकता है। ऐसे में नियमों को स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है ताकि भविष्य में किसी प्रकार की अस्पष्टता न रहे। गौरतलब है कि पिछले मानसून सत्र में गृहमंत्री अमित शाह द्वारा इस विषय से जुड़े तीन विधेयक संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत किए गए थे। उस समय इन विधेयकों को विस्तृत विचार-विमर्श के लिए JPC को भेजने का निर्णय लिया गया था। समिति ने इसके बाद विभिन्न विशेषज्ञों, कानूनी जानकारों और संबंधित पक्षों से चर्चा की और अब रिपोर्ट अंतिम चरण में पहुंच चुकी है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सूत्र बताते हैं कि समिति इस बात के पक्ष में है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, इसलिए उनके लिए कुछ अतिरिक्त नैतिक और कानूनी मानदंड तय किए जा सकते हैं। हालांकि यह भी ध्यान रखा जा रहा है कि किसी भी प्रस्ताव से न्यायिक प्रक्रिया या व्यक्तिगत अधिकारों पर अनावश्यक प्रभाव न पड़े। इस मुद्दे पर राजनीतिक हलकों में भी चर्चा जारी है। विभिन्न दलों के नेताओं ने अलग-अलग दृष्टिकोण रखे हैं। कुछ का मानना है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को उच्च नैतिक मानदंडों पर खरा उतरना चाहिए, जबकि कुछ का कहना है कि केवल गिरफ्तारी के आधार पर किसी को पद से हटाना न्यायसंगत नहीं होगा जब तक अदालत में दोष सिद्ध न हो जाए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह प्रस्ताव भारतीय लोकतंत्र और संविधान के संतुलन को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जा रहा है। यदि यह नियम लागू होता है तो भविष्य में प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर एक स्पष्ट ढांचा तैयार हो सकता है। हालांकि यह भी जरूरी होगा कि इसका दुरुपयोग न हो और निष्पक्ष प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए। इस बिल का उद्देश्य किसी व्यक्ति या दल विशेष को प्रभावित करना नहीं है, बल्कि शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और नैतिकता को मजबूत करना है। इसी कारण सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। सभी की नजरें 17 जुलाई को आने वाली जेपीसी रिपोर्ट और आगामी मानसून सत्र पर टिकी हैं। रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि प्रस्तावित संशोधन किस रूप में संसद में आगे बढ़ाया जाएगा और इस पर अंतिम निर्णय क्या होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 00:36:27 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी, आपसी सहमति से बने संबंध को रेप नहीं माना</title>
                                    <description><![CDATA[लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले बालिगों के मामले में हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा, कहा- केवल शादी से इनकार करना दुष्कर्म नहीं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/important-comment-of-chhattisgarh-high-court-consensual-relationship-is-not/article-57417"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-high-court-(6).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुष्कर्म से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि यदि दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं और उनके बीच शारीरिक संबंध आपसी सहमति से बने हैं, तो बाद में पुरुष द्वारा शादी से इनकार करने मात्र से उसे दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों का निर्णय केवल किसी एक बयान या आरोप के आधार पर नहीं, बल्कि पूरे संबंध की प्रकृति, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। यह फैसला छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की खंडपीठ ने सुनाया, जिसमें जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास शामिल थे। अदालत ने सरगुजा की फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के आदेश को सही ठहराते हुए महिला की अपील खारिज कर दी। हाई कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक साथ रहने वाले बालिग व्यक्तियों के बीच बने शारीरिक संबंधों को सामान्य परिस्थितियों में सहमति से बना संबंध माना जा सकता है, जब तक कि उपलब्ध साक्ष्य इसके विपरीत स्पष्ट रूप से संकेत न दें। मामले के अनुसार शिकायतकर्ता महिला भिलाई नगर निगम में प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत थीं। उन्होंने अपनी शिकायत में बताया था कि वर्ष 2019 में रायपुर में एमबीए की पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात आरोपी से हुई थी। दोनों के बीच निकटता बढ़ी और बाद में वे लगभग दो वर्षों तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे। महिला का आरोप था कि आरोपी ने उनसे शादी करने का वादा किया था और इसी भरोसे पर दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">शिकायत में महिला ने आगे कहा कि एमबीए पूरा होने के बाद आरोपी ने शादी की बात टालनी शुरू कर दी। बाद में उसने कथित रूप से यह कहा कि उसके परिवार वाले इस विवाह के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि महिला उम्र में उससे बड़ी हैं, तलाकशुदा हैं और ईसाई समुदाय से संबंध रखती हैं। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि 28 नवंबर 2021 को जब वह शादी की बात करने आरोपी के घर पहुंचीं तो वहां उनके साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए गए। इसी आधार पर उन्होंने दुष्कर्म और अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज कराया। मामले की सुनवाई पहले सरगुजा की फास्ट ट्रैक कोर्ट में हुई थी। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयान के आधार पर आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। इसके बाद महिला ने इस फैसले को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड, गवाहों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों का विस्तृत परीक्षण किया। खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि केवल यह तथ्य कि दोनों विवाह करना चाहते थे, इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि उनके बीच बने शारीरिक संबंध केवल शादी के वादे के कारण ही स्थापित हुए थे। अदालत ने कहा कि जब दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक एक साथ रहते हैं तो यह माना जा सकता है कि वे अपने संबंधों और उनके संभावित परिणामों से पूरी तरह परिचित थे। ऐसे मामलों में प्रत्येक परिस्थिति का अलग-अलग मूल्यांकन करना आवश्यक होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि न्यायालयों को इस प्रकार के मामलों को केवल तकनीकी या संकीर्ण कानूनी दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए। किसी भी मामले में संबंध की अवधि, दोनों पक्षों का व्यवहार, परिस्थितियां और उपलब्ध साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अदालत ने कहा कि यदि लंबे समय तक दोनों की सहमति से संबंध रहे हों, तो बाद में विवाह न होने की स्थिति को स्वतः दुष्कर्म का मामला नहीं माना जा सकता। फैसले के दौरान हाई कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2013 के एक निर्णय का भी उल्लेख किया। अदालत ने कैनी राजन बनाम केरल राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि सहमति का अर्थ केवल मौन स्वीकृति या आत्मसमर्पण नहीं होता, बल्कि यह सोच-समझकर लिया गया स्वतंत्र निर्णय होता है। न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक मामले में यह देखना आवश्यक है कि सहमति किन परिस्थितियों में दी गई थी और क्या उसके पीछे किसी प्रकार का छल या दबाव था। हाई कोर्ट ने मेडिकल साक्ष्यों पर भी विचार किया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध चिकित्सकीय रिपोर्ट में दुष्कर्म की स्पष्ट पुष्टि नहीं हुई। साथ ही रिपोर्ट में दर्ज चोटों और कथित घटना के समय के बीच भी स्पष्ट सामंजस्य नहीं पाया गया। अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य अभियोजन के आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 15:41:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ट्विशा शर्मा केस में आज फिर सुनवाई, CBI ने आरोपियों की न्यायिक हिरासत बढ़ाने की मांग की</title>
                                    <description><![CDATA[अदालत में सीबीआई ने पति समर्थ सिंह और सास गिरिबाला की न्यायिक हिरासत 14 जुलाई तक बढ़ाने का अनुरोध किया, जांच अब भी जारी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/hearing-in-twisha-sharma-case-again-today-cbi-demanded-to/article-57400"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/twisha-sharma-case-(8).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बहुचर्चित ट्विशा शर्मा केस में मंगलवार को एक बार फिर अदालत में सुनवाई हुई, जहां केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने मामले में गिरफ्तार दोनों आरोपियों की न्यायिक हिरासत बढ़ाने की मांग की। यह सुनवाई न्यायिक मजिस्ट्रेट आरती आदित्य बांदिल की अदालत (कोर्ट जी-14) में हुई। सुनवाई के दौरान ट्विशा शर्मा के पिता और भाई भी अदालत पहुंचे और पूरी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान मौजूद रहे। मामले को लेकर अदालत परिसर में भी हलचल बनी रही, क्योंकि इस केस पर लगातार लोगों की नजर बनी हुई है। सुनवाई के दौरान सीबीआई ने अदालत से आरोपी पति समर्थ सिंह और उनकी मां, सेवानिवृत्त न्यायाधीश गिरिबाला की न्यायिक हिरासत 14 जुलाई तक बढ़ाने का अनुरोध किया। एजेंसी ने अदालत को बताया कि मामले की जांच अभी अंतिम चरण में नहीं पहुंची है और कई महत्वपूर्ण पहलुओं की पड़ताल की जानी बाकी है। ऐसे में आरोपियों का न्यायिक अभिरक्षा में रहना जांच के हित में आवश्यक है। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं, हालांकि समाचार लिखे जाने तक इस पर अंतिम आदेश जारी नहीं किया गया था।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सीबीआई ने अदालत को यह भी बताया कि मामले में कई गवाहों के बयान अभी दर्ज किए जाने हैं। जांच एजेंसी का कहना है कि अब तक जुटाए गए साक्ष्यों के अलावा कुछ नए तथ्यों की भी पुष्टि की जा रही है। अधिकारियों के अनुसार, जांच को पूरी तरह निष्पक्ष और वैज्ञानिक तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है ताकि किसी भी महत्वपूर्ण पहलू को नजरअंदाज न किया जाए। एजेंसी का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद ही पूरे घटनाक्रम की स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकेगी। मामले में डिजिटल साक्ष्यों की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सीबीआई ने अदालत को बताया कि आरोपियों से जब्त किए गए मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की फॉरेंसिक जांच अभी जारी है। इन उपकरणों से मिलने वाले डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है, जिससे घटनाक्रम से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। एजेंसी का कहना है कि डिजिटल जांच पूरी होने में अभी कुछ और समय लगेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान सीबीआई ने समर्थ सिंह के लैपटॉप का मुद्दा भी अदालत के सामने रखा। एजेंसी के अनुसार जांच के लिए लैपटॉप में मौजूद डेटा तक पहुंच बेहद जरूरी है, लेकिन उसका पासवर्ड अब तक उपलब्ध नहीं हो सका है। जांच अधिकारियों ने अदालत को बताया कि पासवर्ड के बिना डिवाइस में मौजूद संभावित महत्वपूर्ण जानकारियों तक पहुंचना संभव नहीं हो पा रहा है। एजेंसी ने कहा कि फॉरेंसिक विशेषज्ञ तकनीकी स्तर पर भी इस दिशा में काम कर रहे हैं, लेकिन जांच को गति देने के लिए पासवर्ड की आवश्यकता बनी हुई है। सीबीआई ने यह भी संकेत दिया कि यदि जांच के दौरान जरूरत महसूस हुई तो दोनों आरोपियों की दोबारा पुलिस रिमांड भी मांगी जा सकती है। एजेंसी का कहना है कि जांच के दौरान सामने आने वाले नए तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर आगे की रणनीति तय की जाएगी। फिलहाल न्यायिक हिरासत के दौरान भी जांच की प्रक्रिया लगातार जारी है और विभिन्न तकनीकी एवं दस्तावेजी साक्ष्यों का परीक्षण किया जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इससे पहले 16 जून को अदालत ने समर्थ सिंह और गिरिबाला को 30 जून तक न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया था। उसी आदेश की अवधि पूरी होने के बाद मंगलवार को दोनों आरोपियों को फिर अदालत में पेश किया गया। अब सीबीआई ने हिरासत की अवधि बढ़ाने का अनुरोध किया है ताकि लंबित जांच को पूरा किया जा सके। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत में सुनवाई के दौरान सुरक्षा व्यवस्था भी सामान्य दिनों की तुलना में अधिक सतर्क रखी गई। ट्विशा शर्मा केस लगातार चर्चा में बना हुआ है और हर सुनवाई पर पीड़ित पक्ष तथा आम लोगों की नजर बनी रहती है। परिवार की ओर से भी मामले की निष्पक्ष जांच और जल्द न्याय की उम्मीद जताई गई है। दूसरी ओर सीबीआई का कहना है कि जांच पूरी तरह तथ्यों, वैज्ञानिक साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर आगे बढ़ाई जा रही है। एजेंसी किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी पहलुओं की गहराई से जांच करना चाहती है। अब पूरे मामले में अगला महत्वपूर्ण कदम अदालत के आदेश पर निर्भर करेगा। यदि अदालत सीबीआई की मांग स्वीकार कर लेती है तो दोनों आरोपी 14 जुलाई तक न्यायिक हिरासत में रहेंगे और इस दौरान जांच एजेंसी डिजिटल साक्ष्यों, गवाहों के बयान और अन्य तकनीकी पहलुओं पर काम जारी रखेगी। वहीं यदि अदालत कोई अलग आदेश देती है तो उसके अनुसार आगे की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 12:59:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>हिमंत सरकार का बड़ा फैसला: असम में UCC लागू, 26 मई को विधानसभा में पेश होगा विधेयक</title>
                                    <description><![CDATA[असम कैबिनेट ने यूसीसी लागू करने को मंजूरी दी। आदिवासी समुदाय को बाहर रखा गया है। 26 मई को विधानसभा में विधेयक पेश होगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/big-decision-of-himanta-government-ucc-implemented-in-assam-bill/article-53343"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/आज-का-राशिफल-5-मई-2026-कर्क,-सिंह,-कुंभ-को-लाभ---2026-05-14t143650.510.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">असम में यूसीसी यानी समान नागरिक संहिता को लेकर एक अहम राजनीतिक और प्रशासनिक फैसला बुधवार को आया</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब राज्य मंत्रिमंडल ने इसे लागू करने की मंजूरी दे दी। यह फैसला मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की अध्यक्षता में हुई दूसरी कार्यकाल की पहली कैबिनेट बैठक में लिया गया। बैठक के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुद मुख्यमंत्री ने इसकी जानकारी दी और बताया कि यूसीसी विधेयक </span>26<span lang="hi" xml:lang="hi"> मई को नई विधानसभा में पेश किया जाएगा। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार इस निर्णय को अपने चुनावी वादों से जोड़कर देख रही है और इसे एक "महत्वपूर्ण कदम" बताया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि इस फैसले को लेकर राजनीतिक माहौल भी गर्म होता दिख रहा है। सबसे खास बात यह है कि असम यूसीसी के दायरे से आदिवासी समुदाय को पूरी तरह बाहर रखा गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे सरकार ने स्थानीय सामाजिक संरचना और परंपराओं का ध्यान रखते हुए लिया गया निर्णय बताया है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">कैबिनेट फैसले के बाद जो जानकारी मिली है</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके मुताबिक यूसीसी का दायरा मुख्य रूप से विवाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तलाक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तराधिकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सहजीवन यानी लिव-इन रिलेशन और उनके अनिवार्य पंजीकरण तक सीमित रहेगा। सरकार का कहना है कि इससे कानून में एकरूपता आएगी और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े मामलों में स्पष्टता बढ़ेगी। मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि उत्तराखंड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गोवा और गुजरात जैसे राज्यों में यूसीसी को पहले से ही अलग-अलग रूपों में लागू किया जा चुका है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और असम का मॉडल उनके मुकाबले अलग होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इसे राज्य की जरूरतों और सामाजिक विविधता के हिसाब से तैयार किया गया है। प्रशासनिक स्तर पर यह भी कहा गया है कि असम में रहने वाले लोगों की परंपराएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रीति-रिवाज और स्थानीय सामाजिक ढांचा काफी विविध है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए सरकार ने आदिवासी समुदाय को इस कानून से बाहर रखने का फैसला किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि उनकी पहचान और सांस्कृतिक अधिकारों पर कोई असर न पड़े। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस पूरे ढांचे को लेकर कई तकनीकी और कानूनी पहलुओं पर चर्चा अभी भी आगे जारी रह सकती है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;"> </span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">दूसरी तरफ</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं। कांग्रेस ने इस कदम की आलोचना की है। कांग्रेस नेता गौरव गोगोई</span>i <span lang="hi" xml:lang="hi">का आरोप है कि भारतीय जनता पार्टी समान नागरिक संहिता के नाम पर समाज में एकरूपता थोपने की कोशिश कर रही है और इसके जरिए विभाजनकारी राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है। उनका कहना है कि यूसीसी का इस्तेमाल सभी नागरिकों को समान अधिकार देने के बजाय राजनीतिक एजेंडे के रूप में किया जा रहा है। कांग्रेस का यह भी कहना है कि सरकार की मंशा पर सवाल उठते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि अलग-अलग समुदायों की परंपराओं का ध्यान रखने के बजाय एक समान कानून थोपने की कोशिश की जा रही है। फिलहाल सरकार अपने फैसले को ऐतिहासिक और सुधारात्मक बता रही है जबकि विपक्ष इसे सामाजिक संतुलन के लिए चुनौतीपूर्ण मान रहा है।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्पेशल खबरें</category>
                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 May 2026 14:50:07 +0530</pubDate>
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