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                <title>Technology - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Technology RSS Feed</description>
                
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                <title>BSNL ने लॉन्च किया सैटेलाइट फोन, बिना मोबाइल नेटवर्क भी होगी बातचीत; खरीदने के लिए सरकारी मंजूरी जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[₹1.34 लाख कीमत वाले सैटेलाइट फोन में SOS इमरजेंसी सपोर्ट, दूरदराज और नेटवर्क विहीन इलाकों में भी मिलेगा भरोसेमंद संचार]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/bsnl-launches-satellite-phone-conversation-will-be-possible-even-without/article-58365"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/bsnl-satellite-phone.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">सरकारी टेलीकॉम कंपनी भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) ने देश में एक नई संचार तकनीक की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए सैटेलाइट फोन लॉन्च किया है। यह फोन उन परिस्थितियों के लिए तैयार किया गया है, जहां सामान्य मोबाइल नेटवर्क काम नहीं करते। इस डिवाइस की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पारंपरिक मोबाइल टावरों पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि सीधे सैटेलाइट नेटवर्क के माध्यम से कॉलिंग और संचार की सुविधा उपलब्ध कराता है। कंपनी ने इसकी कीमत टैक्स सहित 1,34,166 रुपये निर्धारित की है। हालांकि, इसे खरीदना और इस्तेमाल करना आम स्मार्टफोन की तरह आसान नहीं होगा, क्योंकि इसके लिए सरकार से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है। भारत में अब तक मोबाइल संचार मुख्य रूप से सेलुलर नेटवर्क पर आधारित रहा है। किसी भी सामान्य स्मार्टफोन को काम करने के लिए मोबाइल टावर और सिम कार्ड की जरूरत होती है। लेकिन सैटेलाइट फोन की तकनीक पूरी तरह अलग है। यह सीधे पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे संचार उपग्रहों से जुड़ता है, जिससे ऐसे स्थानों पर भी संपर्क संभव हो जाता है जहां मोबाइल नेटवर्क पूरी तरह अनुपलब्ध रहता है। BSNL के इस नए सैटेलाइट फोन को खास तौर पर उन लोगों और संस्थाओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जिन्हें दूरदराज, पहाड़ी, जंगल, समुद्री क्षेत्र या प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी भरोसेमंद संचार व्यवस्था की आवश्यकता होती है। ऐसे क्षेत्रों में अक्सर मोबाइल टावर नहीं होते या किसी आपदा के दौरान नेटवर्क पूरी तरह ठप हो जाता है। ऐसे समय में सैटेलाइट फोन जीवनरक्षक उपकरण साबित हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कंपनी के अनुसार, इस फोन में इमरजेंसी परिस्थितियों के लिए SOS सपोर्ट जैसी महत्वपूर्ण सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। यदि कोई व्यक्ति किसी दुर्घटना, प्राकृतिक आपदा या अन्य संकट में फंस जाता है, तो वह इस सुविधा के माध्यम से तुरंत सहायता के लिए संपर्क कर सकता है। यही वजह है कि इस प्रकार के फोन का उपयोग सेना, सुरक्षा एजेंसियां, आपदा प्रबंधन विभाग, समुद्री परिवहन, पर्वतारोहण दल और राहत कार्यों में लगे संगठनों के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है। BSNL ने इस डिवाइस को वैश्विक सैटेलाइट नेटवर्क सेवा प्रदाता 'इनमारसैट' के सहयोग से विकसित किया है। इनमारसैट दुनिया के कई देशों में सैटेलाइट आधारित संचार सेवाएं उपलब्ध कराता है और उसकी तकनीक समुद्री, विमानन और आपातकालीन संचार क्षेत्रों में लंबे समय से इस्तेमाल की जा रही है। इसी वैश्विक नेटवर्क की मदद से यह फोन भारत के दुर्गम इलाकों में भी संचार सेवाएं उपलब्ध कराने में सक्षम होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि इस फोन को आम उपभोक्ताओं के लिए लॉन्च नहीं किया गया है। भारत में सैटेलाइट फोन के उपयोग को लेकर कड़े कानूनी नियम लागू हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा और संचार व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए किसी भी व्यक्ति या संस्था को इस फोन की खरीद से पहले दूरसंचार विभाग (DoT) से अधिकृत अनुमति प्राप्त करनी होगी। बिना सरकारी स्वीकृति के सैटेलाइट फोन खरीदना, रखना या उसका उपयोग करना कानून का उल्लंघन माना जाएगा और इसके लिए कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है। सैटेलाइट फोन की आवश्यकता विशेष परिस्थितियों में सबसे अधिक महसूस होती है। प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूकंप, बाढ़, चक्रवात या भूस्खलन के दौरान अक्सर मोबाइल नेटवर्क पूरी तरह बंद हो जाते हैं। ऐसे समय में राहत और बचाव कार्यों के लिए लगातार संपर्क बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। सैटेलाइट फोन इस समस्या का प्रभावी समाधान प्रदान करता है क्योंकि यह मोबाइल टावरों पर निर्भर नहीं रहता।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत जैसे विशाल और भौगोलिक रूप से विविध देश में ऐसे कई इलाके हैं जहां आज भी मोबाइल नेटवर्क सीमित है। हिमालयी क्षेत्र, घने जंगल, समुद्री सीमाएं और कई दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र संचार सुविधाओं के लिहाज से चुनौतीपूर्ण माने जाते हैं। इन क्षेत्रों में काम करने वाले सरकारी अधिकारी, वैज्ञानिक, इंजीनियर, सुरक्षा बल और शोधकर्ता इस तकनीक का लाभ उठा सकते हैं। हाल के वर्षों में दुनिया भर में सैटेलाइट आधारित संचार तकनीक तेजी से विकसित हुई है। कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भी सैटेलाइट कनेक्टिविटी को मोबाइल सेवाओं से जोड़ने की दिशा में काम कर रही हैं। भारत में BSNL का यह कदम भविष्य की संचार व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में सैटेलाइट कम्युनिकेशन तकनीक का दायरा और बढ़ सकता है तथा इसका उपयोग केवल विशेष संस्थानों तक सीमित न रहकर आम सेवाओं में भी दिखाई दे सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि वर्तमान समय में इसकी कीमत और कानूनी प्रक्रिया इसे सीमित उपयोग वाला उपकरण बनाती है। लगभग 1.34 लाख रुपये की कीमत होने के कारण यह सामान्य उपभोक्ताओं के लिए व्यावहारिक विकल्प नहीं माना जा रहा है। इसके अलावा सरकार से अनुमति लेने की अनिवार्यता भी स्पष्ट करती है कि यह फोन विशेष जरूरतों वाले उपयोगकर्ताओं के लिए ही तैयार किया गया है। BSNL का मानना है कि इस तकनीक के जरिए देश के उन हिस्सों तक भी भरोसेमंद संचार सुविधा पहुंचाई जा सकेगी, जहां पारंपरिक मोबाइल नेटवर्क स्थापित करना कठिन है। यह कदम न केवल आपदा प्रबंधन और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है, बल्कि भविष्य में डिजिटल कनेक्टिविटी को नई दिशा देने वाला भी साबित हो सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 10:57:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>हर दिन नया कौशल सीखने की आदत बदल सकती है आपकी जिंदगी, रोज़ 20 मिनट का निवेश देगा बड़ा फायदा</title>
                                    <description><![CDATA[नई भाषा, टेक्नोलॉजी या किसी उपयोगी स्किल पर रोज़ 15–20 मिनट देना भविष्य में करियर, आत्मविश्वास और व्यक्तित्व विकास के लिए साबित हो सकता है सबसे बड़ा निवेश।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/the-habit-of-learning-a-new-skill-every-day-can/article-58331"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/daily-learning.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">आज की तेज़ी से बदलती दुनिया में केवल डिग्री या पुराने अनुभव के भरोसे आगे बढ़ना आसान नहीं रह गया है। हर दिन नई तकनीकें आ रही हैं, काम करने के तरीके बदल रहे हैं और कंपनियां ऐसे लोगों को प्राथमिकता दे रही हैं जो लगातार सीखते रहते हैं। ऐसे समय में यदि कोई व्यक्ति रोज़ सिर्फ 15 से 20 मिनट किसी नई स्किल को सीखने के लिए निकालता है, तो यह छोटी-सी आदत आने वाले वर्षों में उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। सीखना केवल छात्रों तक सीमित नहीं होना चाहिए। नौकरी करने वाले, व्यवसायी, गृहिणियां, वरिष्ठ नागरिक और युवा—हर व्यक्ति के लिए नई चीज़ें सीखना जरूरी है। इससे न केवल ज्ञान बढ़ता है, बल्कि दिमाग सक्रिय रहता है और आत्मविश्वास भी मजबूत होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">नई स्किल सीखने का मतलब हमेशा कोई बड़ा या कठिन कोर्स करना नहीं होता। आप नई भाषा सीख सकते हैं, कंप्यूटर की कोई नई तकनीक समझ सकते हैं, वीडियो एडिटिंग, ग्राफिक डिजाइनिंग, पब्लिक स्पीकिंग, डिजिटल मार्केटिंग, कोडिंग, फोटोग्राफी, लेखन, संगीत या किसी भी उपयोगी कला पर रोज़ थोड़ा समय दे सकते हैं। लगातार अभ्यास के साथ यही छोटी शुरुआत भविष्य में बड़ी उपलब्धियों का आधार बन सकती है। आज इंटरनेट ने सीखना पहले से कहीं ज्यादा आसान बना दिया है। मोबाइल फोन और लैपटॉप के जरिए हजारों मुफ्त और पेड कोर्स उपलब्ध हैं। वीडियो, ई-बुक, पॉडकास्ट और ऑनलाइन क्लास के माध्यम से घर बैठे नई जानकारी हासिल की जा सकती है। यही कारण है कि अब सीखने के लिए उम्र, शहर या आर्थिक स्थिति जैसी सीमाएं पहले जितनी बड़ी बाधा नहीं रहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">करियर के लिहाज से भी नई स्किल सीखना बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आज कंपनियां केवल डिग्री नहीं, बल्कि व्यक्ति की वास्तविक क्षमता और नए कौशल को भी महत्व देती हैं। यदि किसी कर्मचारी के पास अतिरिक्त स्किल होती है, तो उसके प्रमोशन, बेहतर नौकरी और अधिक वेतन मिलने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। यही वजह है कि कई लोग अपनी नियमित नौकरी के साथ-साथ नई तकनीक और डिजिटल स्किल सीखने पर भी ध्यान दे रहे हैं। रोज़ 15–20 मिनट सीखने की आदत लंबे समय में हजारों घंटे के अनुभव में बदल जाती है। शुरुआत में भले ही प्रगति धीमी लगे, लेकिन कुछ महीनों बाद इसका असर स्पष्ट दिखाई देने लगता है। धीरे-धीरे व्यक्ति पहले से अधिक आत्मनिर्भर, सक्षम और आत्मविश्वासी बन जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">नई भाषा सीखना भी एक बेहतरीन विकल्प माना जाता है। अंग्रेज़ी के अलावा स्पेनिश, फ्रेंच, जर्मन, जापानी या किसी भारतीय भाषा का ज्ञान कई क्षेत्रों में नए अवसर खोल सकता है। इसी तरह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा एनालिटिक्स, साइबर सिक्योरिटी और क्लाउड टेक्नोलॉजी जैसी आधुनिक स्किल आने वाले वर्षों में सबसे अधिक मांग वाली क्षमताओं में शामिल रहने वाली हैं। नई चीज़ें सीखने का फायदा केवल नौकरी तक सीमित नहीं रहता। इससे सोचने की क्षमता विकसित होती है, समस्या समाधान की योग्यता बढ़ती है और रचनात्मकता में भी सुधार आता है। शोध बताते हैं कि लगातार सीखने वाले लोगों का मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है और उम्र बढ़ने के साथ उनकी याददाश्त भी अधिक सक्रिय बनी रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि नई आदत शुरू करने में सबसे बड़ी चुनौती निरंतरता बनाए रखना होती है। कई लोग उत्साह में शुरुआत तो करते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद समय की कमी या आलस के कारण छोड़ देते हैं। इसलिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि शुरुआत छोटे लक्ष्य से करें। रोज़ केवल 15 मिनट तय करें और उसी समय पर सीखने की आदत बनाएं। धीरे-धीरे यह आपकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाएगी। सीखने के दौरान अपनी प्रगति को नोट करना भी उपयोगी माना जाता है। हर सप्ताह यह देखें कि आपने क्या नया सीखा और अगले सप्ताह का लक्ष्य क्या होगा। इससे प्रेरणा बनी रहती है और सीखने की गति भी बेहतर होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज के प्रतिस्पर्धी दौर में जो व्यक्ति सीखना बंद कर देता है, वह धीरे-धीरे पीछे छूटने लगता है। वहीं, जो लगातार अपने ज्ञान और कौशल को अपडेट करता रहता है, उसके लिए नए अवसरों के दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं। यही वजह है कि सफल लोग पढ़ने, सीखने और खुद को बेहतर बनाने की आदत कभी नहीं छोड़ते। यदि आप भी अपने भविष्य को मजबूत बनाना चाहते हैं, तो आज से ही रोज़ 15–20 मिनट किसी नई स्किल के लिए तय करें। यह समय भले ही छोटा लगे, लेकिन आने वाले वर्षों में यही आदत आपके करियर, व्यक्तित्व और आत्मविश्वास में बड़ा बदलाव ला सकती है। सीखने की यह यात्रा धीरे-धीरे आपको उन लोगों की कतार में खड़ा कर सकती है जो बदलते समय के साथ खुद को लगातार बेहतर बनाते रहते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 10:07:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>रात को देर तक मोबाइल चलाना पड़ सकता है भारी, जानिए शरीर और दिमाग पर इसके गंभीर असर</title>
                                    <description><![CDATA[नींद की कमी से लेकर आंखों की समस्या, मानसिक तनाव और हार्मोन असंतुलन तक—विशेषज्ञ बताते हैं क्यों सोने से पहले मोबाइल से दूरी बनाना है जरूरी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/using-mobile-phone-till-late-at-night-can-be-harmful/article-58219"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/mobile-at-night.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">रात को सोने से पहले मोबाइल फोन चलाना आज की जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है। सोशल मीडिया स्क्रॉल करना, वीडियो देखना, चैटिंग करना या वेब सीरीज देखना कई लोगों की रोजमर्रा की आदत बन गई है। लेकिन यही आदत धीरे-धीरे सेहत पर भारी पड़ सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि देर रात तक मोबाइल स्क्रीन के सामने समय बिताने से न केवल नींद प्रभावित होती है, बल्कि इसका असर शरीर, दिमाग और मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज के समय में बच्चे, युवा और बुजुर्ग लगभग हर आयु वर्ग के लोग स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं। कई लोग बिस्तर पर जाने के बाद भी एक-दो घंटे तक मोबाइल देखते रहते हैं। शुरुआत में यह सामान्य आदत लगती है, लेकिन लंबे समय तक ऐसा करने से कई गंभीर समस्याएं जन्म ले सकती हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>नींद की गुणवत्ता पर पड़ता है सबसे ज्यादा असर</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों के अनुसार मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन को प्रभावित करती है। यही हार्मोन शरीर को यह संकेत देता है कि अब सोने का समय हो गया है। जब रात में लंबे समय तक मोबाइल का इस्तेमाल किया जाता है, तो मस्तिष्क सक्रिय बना रहता है और नींद आने में देरी होती है। इसका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति पर्याप्त नींद नहीं ले पाता और अगले दिन थकान महसूस करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लगातार कई दिनों तक नींद पूरी नहीं होने पर शरीर की कार्यक्षमता कम होने लगती है। इससे काम में मन नहीं लगता, याददाश्त कमजोर हो सकती है और दिनभर चिड़चिड़ापन बना रहता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>आंखों पर बढ़ता है दबाव</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">मोबाइल स्क्रीन को लगातार देखने से आंखों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इससे आंखों में जलन, सूखापन, धुंधला दिखाई देना और सिरदर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कई लोग देर रात तक अंधेरे कमरे में मोबाइल चलाते हैं, जिससे आंखों को और अधिक नुकसान पहुंच सकता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>मानसिक स्वास्थ्य भी हो सकता है प्रभावित</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">देर रात तक सोशल मीडिया का उपयोग मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है। लगातार नकारात्मक खबरें, तुलना की भावना और सोशल मीडिया का दबाव तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं को बढ़ा सकता है। कई बार लोग देर रात तक ऑनलाइन रहने के कारण मानसिक रूप से शांत नहीं हो पाते, जिससे दिमाग को आराम नहीं मिल पाता।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>बढ़ सकता है मोटापा</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">कम लोग जानते हैं कि देर रात तक जागने और मोबाइल चलाने का संबंध वजन बढ़ने से भी जुड़ा हो सकता है। पर्याप्त नींद नहीं मिलने पर शरीर में भूख नियंत्रित करने वाले हार्मोन प्रभावित होते हैं। इसके कारण व्यक्ति को बार-बार भूख लगती है और जंक फूड खाने की इच्छा बढ़ सकती है। इसके अलावा देर रात तक जागने वाले लोग अक्सर शारीरिक गतिविधियां कम करते हैं, जिससे मोटापे का खतरा भी बढ़ जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>गर्दन और पीठ में दर्द की समस्या</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">मोबाइल का लगातार उपयोग करते समय अधिकांश लोग गर्दन झुकाकर बैठते या लेटते हैं। लंबे समय तक इसी स्थिति में रहने से गर्दन, कंधे और पीठ में दर्द की शिकायत शुरू हो सकती है। इसे कई विशेषज्ञ "टेक्स्ट नेक" की समस्या भी मानते हैं।यदि यह आदत लंबे समय तक बनी रहती है तो रीढ़ की हड्डी पर भी असर पड़ सकता है और मांसपेशियों में खिंचाव की समस्या बढ़ सकती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>हार्मोन संतुलन पर असर</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार पर्याप्त नींद शरीर के हार्मोन संतुलन के लिए बेहद जरूरी होती है। लगातार देर रात तक मोबाइल चलाने और कम सोने से शरीर का जैविक चक्र प्रभावित होता है। इससे प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है और शरीर की रिकवरी प्रक्रिया भी धीमी पड़ सकती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>बच्चों और किशोरों के लिए ज्यादा नुकसानदायक</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों और किशोरों में मोबाइल की लत तेजी से बढ़ रही है। पढ़ाई के बाद भी घंटों मोबाइल देखने से उनकी नींद, पढ़ाई और मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है। कई बच्चों में ध्यान की कमी, व्यवहार में बदलाव और आंखों की समस्याएं भी देखने को मिल रही हैं। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखें और सोने से पहले मोबाइल के इस्तेमाल की आदत को सीमित करें।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>कैसे करें बचाव</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">कुछ आसान उपाय अपनाने की सलाह देते हैं। सोने से कम से कम 45 मिनट से एक घंटे पहले मोबाइल का उपयोग बंद कर दें। यदि जरूरी हो तो मोबाइल में ब्लू लाइट फिल्टर या नाइट मोड का इस्तेमाल करें। बिस्तर पर मोबाइल लेकर न जाएं और अलार्म के लिए अलग घड़ी का उपयोग करें। रात के समय किताब पढ़ना, हल्का संगीत सुनना या ध्यान करना बेहतर विकल्प हो सकते हैं। इसके अलावा दिनभर नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और समय पर सोने की आदत भी अच्छी नींद और बेहतर स्वास्थ्य के लिए जरूरी मानी जाती है। आज के डिजिटल दौर में मोबाइल हमारी जरूरत बन चुका है, लेकिन इसका सही समय और सीमित उपयोग ही स्वस्थ जीवन की कुंजी है। छोटी-सी सावधानी भविष्य में कई स्वास्थ्य समस्याओं से बचा सकती है। यदि आप भी रात को देर तक मोबाइल चलाने की आदत रखते हैं, तो समय रहते इस आदत में बदलाव करना आपके शरीर और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 17:37:01 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>बाल यौन शोषण कंटेंट पर सरकार सख्त, इंस्टाग्राम की पैरेंट कंपनी Meta को भेजा नोटिस</title>
                                    <description><![CDATA[7 दिन में मांगा जवाब, विवादित विज्ञापन तुरंत हटाने और ऐसे कंटेंट की पहुंच रोकने के निर्देश; सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही पर बढ़ी सख्ती]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/government-strict-on-child-sexual-abuse-content-sent-notice-to/article-57915"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/instagram-news.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर कथित तौर पर बच्चों के यौन शोषण (Child Sexual Abuse Material) से जुड़े विज्ञापनों के प्रसार को गंभीरता से लेते हुए उसकी पैरेंट कंपनी Meta को नोटिस जारी किया है। सरकार ने कंपनी से सात दिनों के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है और निर्देश दिया है कि ऐसे सभी विज्ञापनों और संबंधित कंटेंट को तत्काल प्रभाव से ब्लॉक और हटाया जाए। यह कार्रवाई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों की सुरक्षा और डिजिटल स्पेस को सुरक्षित बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (IT Ministry) ने 4 जुलाई को जारी नोटिस में स्पष्ट किया है कि यदि किसी भी प्रकार का ऐसा कंटेंट या विज्ञापन बच्चों के यौन शोषण को बढ़ावा देता है या उपयोगकर्ताओं को ऐसे अवैध कंटेंट तक पहुंचने में मदद करता है, तो उसे तत्काल हटाया जाना चाहिए। सरकार ने Meta से यह भी पूछा है कि ऐसे विज्ञापन प्लेटफॉर्म पर कैसे दिखाई दिए और भविष्य में इन्हें रोकने के लिए कंपनी क्या कदम उठाएगी।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>BBC की रिपोर्ट के बाद हुई कार्रवाई</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">यह पूरा मामला उस समय सामने आया जब एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत में इंस्टाग्राम पर ऐसे विज्ञापन चल रहे थे जिनमें बच्चों के यौन शोषण से जुड़े आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग किया गया। रिपोर्ट के अनुसार इन विज्ञापनों पर क्लिक करने के बाद उपयोगकर्ताओं को दूसरे प्लेटफॉर्म, विशेष रूप से टेलीग्राम चैनलों की ओर भेजा जाता था, जहां कथित तौर पर अवैध सामग्री बहुत कम कीमत पर उपलब्ध कराई जा रही थी। ऐसे विज्ञापन Meta के मॉडरेशन सिस्टम से स्वीकृति मिलने के बाद ही प्लेटफॉर्म पर दिखाई दे रहे थे। जब इस संबंध में शिकायत की गई तो शुरुआती स्तर पर संबंधित विज्ञापन को कंपनी की कम्युनिटी गाइडलाइन का उल्लंघन नहीं माना गया। बाद में मामला सार्वजनिक होने के बाद Meta ने कई विज्ञापन हटाने, संबंधित अकाउंट निलंबित करने और संदिग्ध लिंक हटाने की बात स्वीकार की।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>सरकार ने मांगा विस्तृत स्पष्टीकरण</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने Meta से यह स्पष्ट करने को कहा है कि उसके कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम में ऐसी चूक कैसे हुई। साथ ही यह भी पूछा गया है कि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए कौन-कौन से तकनीकी और प्रशासनिक उपाय किए जाएंगे। सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी केवल कंटेंट उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि उनके प्लेटफॉर्म का उपयोग किसी भी प्रकार की गैरकानूनी गतिविधियों के लिए न हो।</p>
<p style="text-align:justify;">यह पहली बार नहीं है जब केंद्र सरकार ने Meta को नोटिस जारी किया हो। इससे पहले 1 जुलाई को सरकार ने WhatsApp के यूजरनेम फीचर को लेकर भी कंपनी से जवाब मांगा था। लगातार दूसरी बार नोटिस जारी होने से स्पष्ट है कि सरकार डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही को लेकर अधिक सतर्क और सख्त रुख अपना रही है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भारत में क्या कहता है कानून</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">भारतीय कानून के अनुसार बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी किसी भी प्रकार की सामग्री का निर्माण, संग्रह, डाउनलोड, खरीद, बिक्री, प्रसारण या साझा करना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 67B के तहत ऐसे मामलों में कठोर दंड का प्रावधान किया गया है। पहली बार दोषी पाए जाने पर पांच वर्ष तक की कैद और आर्थिक दंड लगाया जा सकता है। दोबारा अपराध करने पर सात वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। इसके अलावा अन्य संबंधित कानूनों के तहत भी कठोर कार्रवाई की जा सकती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">भारत के सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत सोशल मीडिया कंपनियों पर यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वे अवैध और आपत्तिजनक सामग्री मिलने पर त्वरित कार्रवाई करें। इन नियमों के अनुसार कंपनियों को जांच एजेंसियों के साथ सहयोग करना, बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट की पहचान के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग करना और शिकायत मिलने पर समयबद्ध तरीके से सामग्री हटाना अनिवार्य है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>यदि ऐसा कंटेंट दिखे तो क्या करें</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों और साइबर सुरक्षा एजेंसियों की सलाह है कि यदि किसी उपयोगकर्ता को इस प्रकार का कोई भी संदिग्ध या अवैध कंटेंट दिखाई देता है तो उसे किसी भी स्थिति में डाउनलोड, शेयर या फॉरवर्ड नहीं करना चाहिए। ऐसे मामलों में संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तुरंत रिपोर्ट करना चाहिए। साथ ही राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल या स्थानीय साइबर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करानी चाहिए, ताकि समय रहते कार्रवाई की जा सके।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा बनी बड़ी चुनौती</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">डिजिटल प्लेटफॉर्म के तेजी से बढ़ते उपयोग के साथ बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। इंटरनेट और सोशल मीडिया का सकारात्मक उपयोग जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी है कि इन प्लेटफॉर्म पर मौजूद अवैध गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण रखा जाए।  केवल सरकार या सोशल मीडिया कंपनियां ही नहीं, बल्कि अभिभावकों, शिक्षकों और समाज की भी जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को सुरक्षित इंटरनेट उपयोग के बारे में जागरूक करें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी तुरंत संबंधित एजेंसियों को दें।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बढ़ेगी निगरानी</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">सरकार की इस कार्रवाई को डिजिटल सुरक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कंटेंट मॉडरेशन, विज्ञापन स्वीकृति प्रक्रिया और सुरक्षा तंत्र की अधिक सख्ती से निगरानी की जाएगी। यदि जांच में नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो संबंधित कंपनियों के खिलाफ आईटी कानूनों के तहत आगे की कार्रवाई भी की जा सकती है। सरकार का उद्देश्य डिजिटल प्लेटफॉर्म को सुरक्षित बनाना और बच्चों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करना है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 13:31:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अमेरिका आजादी के 250वें वर्ष पर दफन करेगा 408 किलो का टाइम कैप्सूल, 2276 में खुलेगा इतिहास का यह अनोखा संदेश</title>
                                    <description><![CDATA[फिलाडेल्फिया के इंडिपेंडेंस नेशनल हिस्टोरिकल पार्क में 10 फीट नीचे रखा जाएगा विशेष टाइम कैप्सूल, जिसमें AI की भविष्यवाणी, ऐतिहासिक दस्तावेज, व्हेल की हड्डी और 50 राज्यों से चुनी गई यादगार वस्तुएं शामिल हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/america-will-bury-a-408-kg-time-capsule-on-the/article-57815"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/america-time-capsule.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">अमेरिका अपनी आजादी के 250 वर्ष पूरे होने के अवसर पर एक ऐसा कदम उठाने जा रहा है, जो आने वाली कई पीढ़ियों के लिए इतिहास का अनमोल दस्तावेज बन सकता है। 4 जुलाई को फिलाडेल्फिया स्थित इंडिपेंडेंस नेशनल हिस्टोरिकल पार्क में करीब 408 किलो वजनी एक विशेष टाइम कैप्सूल जमीन के भीतर दफन किया जाएगा। इसे अब से ठीक 250 साल बाद यानी वर्ष 2276 में खोला जाएगा। इस परियोजना का उद्देश्य केवल कुछ वस्तुओं को सुरक्षित रखना नहीं है, बल्कि 2026 के अमेरिका की सोच, तकनीक, संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाना भी है। बताया जा रहा है कि इस टाइम कैप्सूल का रिकॉर्ड भी आधिकारिक रूप से दर्ज कर दिया गया है, ताकि आने वाले समय में इसकी सही पहचान और स्थान सुरक्षित रहे।</p>
<p>फिलाडेल्फिया को इस ऐतिहासिक पहल के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि यही वह शहर है, जहां 4 जुलाई 1776 को अमेरिका के स्वतंत्रता घोषणा पत्र को मंजूरी मिली थी। इसी कारण इस स्थान को अमेरिकी लोकतंत्र और आजादी का प्रतीक माना जाता है। अधिकारियों के अनुसार, टाइम कैप्सूल में रखी गई वस्तुएं केवल सरकारी संस्थानों ने नहीं चुनीं, बल्कि देश के सभी 50 राज्यों और आम नागरिकों की भागीदारी से उनका चयन किया गया है। इनमें व्हेल की हड्डी, दुनिया के सबसे बड़े जिप्सम रेगिस्तान की रेत, राइट बंधुओं के ऐतिहासिक विमान का कपड़ा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI से जुड़ी भविष्यवाणियां, महत्वपूर्ण दस्तावेज और कई ऐसी वस्तुएं शामिल हैं, जो वर्तमान समय की पहचान मानी जाती हैं।</p>
<p>टाइम कैप्सूल एक ऐसा बंद कंटेनर होता है, जिसमें किसी खास दौर की वस्तुओं को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाता है। इसका मकसद भविष्य के लोगों को यह बताना होता है कि उस समय समाज कैसा था, लोग किस तरह का जीवन जीते थे और विज्ञान तथा तकनीक किस स्तर पर पहुंच चुके थे। यही वजह है कि इस बार तैयार किया गया अमेरिकी टाइम कैप्सूल केवल इतिहास का संग्रह नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी की ओर से भविष्य के लोगों के लिए एक संदेश भी माना जा रहा है।</p>
<p>इस परियोजना की सबसे बड़ी चुनौती टाइम कैप्सूल को तैयार करना नहीं, बल्कि उसे पूरे 250 वर्षों तक सुरक्षित बनाए रखना था। वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने कई वर्षों तक शोध करने के बाद ऐसा डिजाइन तैयार किया, जो नमी, पानी, जंग और मौसम के प्रभाव से लंबे समय तक बचा रह सके। कैप्सूल को पारंपरिक चौकोर आकार की बजाय बेलनाकार बनाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि चौकोर कंटेनरों के कोनों पर समय के साथ दबाव अधिक पड़ता है और वहीं से पानी अंदर जाने की संभावना बढ़ जाती है। इसके विपरीत बेलनाकार संरचना अधिक मजबूत और टिकाऊ मानी जाती है।</p>
<p>कैप्सूल को विशेष गुणवत्ता वाले स्टेनलेस स्टील से तैयार किया गया है, जिसका उपयोग वैज्ञानिक उपकरणों और अत्यधिक सुरक्षित संरचनाओं में किया जाता है। इसे पहले ही पूरी तरह सील किया जा चुका है और 4 जुलाई को केवल जमीन के भीतर स्थापित किया जाएगा। सीलिंग के लिए इंडियम नाम की विशेष धातु का इस्तेमाल किया गया है। यह धातु बेहद मुलायम होती है और ढक्कन बंद करते समय सबसे छोटी दरार को भी भर देती है। इससे हवा और पानी के प्रवेश की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है।</p>
<p>वैज्ञानिकों ने कैप्सूल के भीतर नमी का स्तर भी सावधानी से नियंत्रित किया है। यदि नमी अधिक होती तो कागज और अन्य सामग्री खराब हो सकती थी, जबकि अत्यधिक सूखापन कुछ वस्तुओं को नुकसान पहुंचा सकता था। इसलिए इसके अंदर लगभग 35 प्रतिशत आर्द्रता बनाए रखी गई है। इसे करीब 10 फीट गहराई में दफनाया जाएगा, जहां तापमान अपेक्षाकृत स्थिर रहता है और मौसम के बदलाव का असर बहुत कम होता है।</p>
<p>इस टाइम कैप्सूल की सुरक्षा के लिए एक अतिरिक्त स्टील सिलेंडर भी लगाया जाएगा। दोनों परतों के बीच मौजूद हवा पानी को भीतर पहुंचने से रोकेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि भविष्य में भूजल का स्तर बढ़ भी जाए या बाढ़ जैसी स्थिति बन जाए, तब भी यह संरचना लंबे समय तक सुरक्षित रह सकती है। परियोजना से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि किसी दिन इस कैप्सूल तक पानी पहुंच गया, तो इसका मतलब होगा कि पूरा क्षेत्र गंभीर प्राकृतिक संकट का सामना कर रहा होगा।</p>
<p>अमेरिका इस पहल के जरिए केवल अपनी उपलब्धियों को संरक्षित नहीं करना चाहता, बल्कि यह भी दिखाना चाहता है कि वर्ष 2026 का समाज किस तरह सोचता था और किन तकनीकों का उपयोग कर रहा था। यही कारण है कि इसमें सरकारी दस्तावेजों के साथ आम लोगों की ओर से चुनी गई वस्तुओं को भी समान महत्व दिया गया है। इससे भविष्य की पीढ़ियां उस दौर को केवल किताबों के माध्यम से नहीं, बल्कि वास्तविक वस्तुओं के जरिए भी समझ सकेंगी।</p>
<p>दुनिया में इससे पहले भी कई प्रसिद्ध टाइम कैप्सूल बनाए जा चुके हैं। अमेरिका का 'क्रिप्ट ऑफ सिविलाइजेशन' सबसे चर्चित उदाहरणों में शामिल है, जिसे लगभग 6,000 वर्षों तक बंद रखने की योजना बनाई गई है और इसे वर्ष 8113 में खोला जाएगा। वहीं 1939 में न्यूयॉर्क में दफन किया गया वेस्टिंगहाउस टाइम कैप्सूल भी भविष्य के लिए सुरक्षित रखा गया है। भारत में भी 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान लाल किले के पास 'कलपात्र' नाम से टाइम कैप्सूल दफन किया गया था, जिसे बाद में नई सरकार बनने पर बाहर निकाल लिया गया। हालांकि उसमें मौजूद सामग्री को लेकर आज भी कई चर्चाएं होती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 11:14:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>चलते ई-रिक्शा को रोकने वाले 7 ऐप पर सरकार सख्त, बैटरी सुरक्षा में बड़ी खामी आई सामने</title>
                                    <description><![CDATA[ब्लूटूथ के जरिए ई-रिक्शा की बैटरी बंद करने की शिकायतों के बाद कार्रवाई, सरकार ने ऐप स्टोर से हटाने के दिए निर्देश; इलेक्ट्रिक कार और स्कूटर फिलहाल सुरक्षित।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/government-strict-on-7-apps-that-stop-e-rickshaws-from-moving/article-57821"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/e-rickshaw.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">दिल्ली समेत देश के कई शहरों में ई-रिक्शा चालकों के लिए परेशानी का कारण बने कुछ मोबाइल ऐप्स पर केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने ऐसे सात ऐप्स को ऐप स्टोर से हटाने के निर्देश दिए हैं, जिनका कथित तौर पर दुरुपयोग कर चलते हुए ई-रिक्शा की बैटरी को ब्लूटूथ के जरिए बंद किया जा रहा था। इनमें BAT-BMS, Smart BMS, Lossigy और Epoch Li-Ion जैसे ऐप शामिल हैं। हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो सामने आए थे, जिनमें चलते हुए ई-रिक्शा अचानक बीच सड़क पर रुक जाते थे। इसके बाद शिकायतें मिलने पर सरकार ने मामले का संज्ञान लिया। हालांकि रिपोर्ट्स के मुताबिक, निर्देश जारी होने के बावजूद कुछ ऐप्स अभी भी डाउनलोड के लिए उपलब्ध दिखाई दे रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि संबंधित प्लेटफॉर्म से इन्हें पूरी तरह हटाने की प्रक्रिया जारी है। इस पूरे मामले ने ई-रिक्शा में इस्तेमाल होने वाली कुछ लीथियम-आयन बैटरियों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या किसी एक ऐप की नहीं, बल्कि उन बैटरियों की है जिनके ब्लूटूथ बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम (BMS) में पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी गई। ऐसे सिस्टम बिना मजबूत पासवर्ड या एन्क्रिप्शन के खुले छोड़ दिए जाते हैं, जिससे कोई भी व्यक्ति सीमित दूरी के भीतर उनसे कनेक्ट होकर बैटरी की सेटिंग्स बदल सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार BAT-BMS जैसे ऐप मूल रूप से बैटरी की निगरानी और रखरखाव के लिए विकसित किए गए थे। इनका उद्देश्य बैटरी की चार्जिंग, तापमान, वोल्टेज, क्षमता और अन्य तकनीकी जानकारियों पर नजर रखना है। जरूरत पड़ने पर अधिकृत उपयोगकर्ता इन ऐप्स के जरिए बैटरी को ऑन या ऑफ भी कर सकता है। यही सुविधा कुछ मामलों में गलत तरीके से इस्तेमाल की गई। बताया जा रहा है कि जिन ई-रिक्शा में ब्लूटूथ आधारित लीथियम-आयन बैटरी लगी है और जिनका ब्लूटूथ बिना पासवर्ड के खुला छोड़ा गया है, वहां यह जोखिम ज्यादा है। ऐसे ऐप लगभग 10 से 15 मीटर की दूरी से बैटरी से कनेक्ट हो सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि सभी ई-रिक्शा इस समस्या से प्रभावित नहीं हैं। देश में बड़ी संख्या में ऐसे ई-रिक्शा अब भी चल रहे हैं जिनमें पारंपरिक लेड-एसिड बैटरियां लगी हैं। इनमें ब्लूटूथ आधारित बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम नहीं होता, इसलिए ऐसे वाहनों पर इन ऐप्स का कोई असर नहीं पड़ता। वहीं जिन लीथियम बैटरियों में निर्माता ने मजबूत और यूनिक पासवर्ड सेट किया है, उन्हें भी सामान्य तरीके से एक्सेस नहीं किया जा सकता। इलेक्ट्रिक कारों और स्कूटरों के बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि उनमें कहीं अधिक उन्नत साइबर सुरक्षा, एन्क्रिप्शन और मल्टी-लेयर ऑथेंटिकेशन का इस्तेमाल होता है। इसलिए किसी सामान्य मोबाइल ऐप के जरिए उन्हें नियंत्रित करना संभव नहीं है। यही वजह है कि फिलहाल यह खतरा मुख्य रूप से कुछ कम कीमत वाले ई-रिक्शा की बैटरियों तक सीमित माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">जांच में यह भी सामने आया है कि संबंधित ऐप्स को मूल रूप से ई-रिक्शा नियंत्रित करने के लिए नहीं बनाया गया था। इनका उपयोग सौर ऊर्जा प्रणाली, नावों और अन्य उपकरणों में लगी लीथियम बैटरियों की निगरानी के लिए किया जाता था। भारत में कुछ स्थानीय बैटरी असेंबलरों और कम लागत वाले निर्माताओं ने इन्हीं सिस्टम का उपयोग ई-रिक्शा में भी करना शुरू कर दिया, लेकिन कई मामलों में सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम में डिफॉल्ट पासवर्ड जैसे "1234" या "0000" ही छोड़ दिए जाएं या बिल्कुल पासवर्ड न लगाया जाए, तो कोई भी व्यक्ति आसानी से उससे कनेक्ट हो सकता है। इस समस्या का सबसे प्रभावी समाधान मजबूत और यूनिक पासवर्ड सेट करना है। सरकार और तकनीकी विशेषज्ञ ई-रिक्शा चालकों को सलाह दे रहे हैं कि वे अपने नजदीकी बैटरी डीलर या अधिकृत मैकेनिक से संपर्क कर यह सुनिश्चित करें कि उनकी बैटरी का ब्लूटूथ सिस्टम पासवर्ड से सुरक्षित है। यदि डिफॉल्ट पासवर्ड लगा हो तो उसे तुरंत बदल देना चाहिए। इसके अलावा यदि यात्रा के दौरान ई-रिक्शा अचानक बंद हो जाए तो घबराने के बजाय वाहन को सुरक्षित स्थान पर ले जाकर मुख्य बैटरी स्विच या एमसीबी को बंद करके दोबारा चालू करने की सलाह दी गई है। सरकार का मानना है कि तकनीकी सुरक्षा मानकों को मजबूत करने और ऐसे ऐप्स के दुरुपयोग पर रोक लगाने से भविष्य में इस तरह की घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकेगा। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 11:14:28 +0530</pubDate>
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                <title>अब घर बैठे Aadhaar में जोड़ें या बदलें Email ID, UIDAI ने शुरू की मुफ्त ऑनलाइन सुविधा</title>
                                    <description><![CDATA[1 जुलाई 2026 से छह महीने तक बिना किसी शुल्क के मिलेगी सेवा, Aadhaar App के जरिए मिनटों में होगा ईमेल अपडेट]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/now-add-or-change-email-id-in-aadhaar-sitting-at/article-57785"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/uidai.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">आधार कार्ड धारकों के लिए बड़ी राहत की खबर है। भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) ने आधार से जुड़ी डिजिटल सेवाओं का विस्तार करते हुए अब <strong>Aadhaar App</strong> के माध्यम से ईमेल आईडी जोड़ने और अपडेट करने की नई सुविधा शुरू कर दी है। इस नई व्यवस्था के तहत अब नागरिकों को आधार में ईमेल आईडी लिंक कराने या पुरानी ईमेल बदलवाने के लिए आधार सेवा केंद्र जाने की आवश्यकता नहीं होगी। पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन और मोबाइल ऐप के माध्यम से पूरी की जा सकेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">UIDAI ने इस सुविधा को 1 जुलाई 2026 से लागू कर दिया है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह सेवा अगले छह महीने तक पूरी तरह निशुल्क उपलब्ध रहेगी। यानी 1 जुलाई से लेकर दिसंबर 2026 के अंत तक आधार कार्ड धारक बिना किसी शुल्क के अपनी ईमेल आईडी अपडेट या नई ईमेल जोड़ सकते हैं। इस पहल का उद्देश्य आधार सेवाओं को अधिक डिजिटल, आसान और नागरिकों के लिए सुलभ बनाना है।</p>
<p style="text-align:justify;">देशभर में करोड़ों आधार धारकों ने अब तक अपने मोबाइल नंबर तो आधार से लिंक करा लिए हैं, लेकिन बड़ी संख्या में लोगों की ईमेल आईडी अभी भी आधार रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है। ऐसे में कई ऑनलाइन सेवाओं, दस्तावेजों की डिजिटल पुष्टि और महत्वपूर्ण सूचनाएं प्राप्त करने में उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। नई सुविधा शुरू होने के बाद उपयोगकर्ता अब घर बैठे ही यह काम कुछ मिनटों में पूरा कर सकेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">UIDAI के अनुसार, आधार में ईमेल आईडी लिंक होने से कई डिजिटल सेवाओं का उपयोग और अधिक सुरक्षित एवं सुविधाजनक हो जाएगा। भविष्य में आधार से संबंधित नोटिफिकेशन, अपडेट, सुरक्षा अलर्ट और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी सीधे पंजीकृत ईमेल पर भेजी जा सकेगी। इससे उपयोगकर्ताओं को अपने आधार रिकॉर्ड की निगरानी करने और किसी भी अनधिकृत गतिविधि की जानकारी समय पर मिलने में मदद मिलेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">नई सुविधा का लाभ लेने के लिए सबसे पहले उपयोगकर्ता को अपने स्मार्टफोन में Aadhaar App इंस्टॉल करना होगा। ऐप में आधार संख्या और सत्यापन प्रक्रिया पूरी करने के बाद प्रोफाइल सेक्शन में ईमेल आईडी जोड़ने या अपडेट करने का विकल्प उपलब्ध रहेगा। यहां नई ईमेल आईडी दर्ज करने के बाद ओटीपी आधारित सत्यापन प्रक्रिया पूरी करनी होगी। सफल सत्यापन के बाद ईमेल आईडी आधार रिकॉर्ड में अपडेट हो जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि किसी व्यक्ति की पुरानी ईमेल आईडी बदल चुकी है या वह अब उसका उपयोग नहीं करता है, तो वह भी इसी प्रक्रिया के माध्यम से नई ईमेल आईडी दर्ज कर सकता है। इससे भविष्य में आधार से जुड़ी सभी डिजिटल सूचनाएं सही ईमेल पते पर प्राप्त होंगी। UIDAI ने नागरिकों को सलाह दी है कि वे केवल अपनी सक्रिय और व्यक्तिगत ईमेल आईडी ही आधार रिकॉर्ड में दर्ज करें।</p>
<p style="text-align:justify;">डिजिटल इंडिया अभियान के तहत यह सुविधा नागरिकों के लिए काफी उपयोगी साबित होगी। पहले आधार में ईमेल अपडेट कराने के लिए लोगों को आधार सेवा केंद्र जाकर आवेदन देना पड़ता था, जिससे समय और अतिरिक्त खर्च दोनों लगते थे। अब यह पूरी प्रक्रिया मोबाइल ऐप के माध्यम से घर बैठे पूरी की जा सकेगी, जिससे डिजिटल सेवाओं को और बढ़ावा मिलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">डिजिटल सुरक्षा के लिहाज से भी यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आधार से ईमेल लिंक होने पर उपयोगकर्ता को किसी भी अपडेट या बदलाव की जानकारी तुरंत मिल सकेगी। यदि किसी अनधिकृत व्यक्ति द्वारा आधार संबंधी कोई गतिविधि की जाती है, तो उसका अलर्ट भी ईमेल के माध्यम से प्राप्त हो सकता है। इससे पहचान संबंधी धोखाधड़ी को रोकने में भी सहायता मिलेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">UIDAI ने स्पष्ट किया है कि यह सेवा सीमित अवधि के लिए मुफ्त रखी गई है। अगले छह महीनों तक नागरिक बिना किसी शुल्क के इसका लाभ उठा सकते हैं। इसके बाद यदि शुल्क लागू किया जाता है, तो उसकी जानकारी अलग से जारी की जाएगी। इसलिए जिन लोगों ने अब तक आधार में ईमेल लिंक नहीं कराया है या पुरानी ईमेल बदलनी है, उनके लिए यह उचित समय माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार लगातार आधार सेवाओं को अधिक डिजिटल और उपयोगकर्ता अनुकूल बनाने की दिशा में काम कर रही है। पिछले कुछ वर्षों में आधार से जुड़ी कई सेवाएं ऑनलाइन उपलब्ध कराई गई हैं, जिनमें पता अपडेट, दस्तावेज अपलोड, पहचान सत्यापन और अन्य सुविधाएं शामिल हैं। अब ईमेल अपडेट की सुविधा भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 18:25:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मध्य प्रदेश पुलिस में अवकाश प्रक्रिया हुई डिजिटल, अब eHRMS से ऑनलाइन होगी छुट्टी मंजूर</title>
                                    <description><![CDATA[प्रदेश की सभी 120 पुलिस इकाइयों में ई-लीव मॉड्यूल लागू, एक लाख से अधिक अधिकारी-कर्मचारी घर बैठे कर सकेंगे ऑनलाइन अवकाश आवेदन]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/leave-process-in-madhya-pradesh-police-has-become-digital-now/article-57715"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/mp-police.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश पुलिस विभाग ने अपने प्रशासनिक कामकाज को पूरी तरह डिजिटल बनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है। अब प्रदेश के सभी पुलिस अधिकारी और कर्मचारी छुट्टी के लिए कागजी आवेदन देने की बजाय ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे। पुलिस मुख्यालय (PHQ) ने 1 जुलाई 2026 से eHRMS (इलेक्ट्रॉनिक ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट सिस्टम) का ई-लीव मॉड्यूल पूरे प्रदेश में लागू कर दिया है। इस नई व्यवस्था के तहत पुलिस विभाग की सभी 120 इकाइयों में कार्यरत अधिकारी और कर्मचारी eHRMS पोर्टल या मोबाइल एप के जरिए अवकाश के लिए आवेदन कर सकेंगे। छुट्टी की मंजूरी, उसकी स्थिति और पूरी प्रक्रिया अब एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध रहेगी। विभाग का मानना है कि इससे अवकाश स्वीकृति की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक पारदर्शी, तेज और सुविधाजनक बनेगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">नई व्यवस्था लागू होने के बाद पुलिस कर्मचारियों को छुट्टी के लिए अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। कर्मचारी अपने मोबाइल या कंप्यूटर से लॉगिन कर ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे। आवेदन जमा होने के बाद संबंधित लीव क्लर्क उसे डिजिटल माध्यम से सक्षम अधिकारी तक भेजेगा। इसके बाद अधिकारी भी ऑनलाइन ही आवेदन पर अनुशंसा और स्वीकृति देंगे। कर्मचारी अपने लॉगिन के माध्यम से यह भी देख सकेंगे कि उनका आवेदन किस स्तर पर लंबित है या उसे स्वीकृति मिल चुकी है। इससे पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी और अनावश्यक देरी की संभावना काफी कम हो जाएगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पुलिस मुख्यालय के अनुसार eHRMS के ई-लीव मॉड्यूल का उपयोग फिलहाल प्रदेश सरकार के कुछ विभागों में ही किया जा रहा है, लेकिन पुलिस विभाग इस प्रणाली का सबसे अधिक उपयोग करने वाले विभागों में शामिल हो गया है। वर्तमान में लगभग 1,01,928 पुलिस अधिकारी और कर्मचारी इस डिजिटल सुविधा से जुड़ चुके हैं। विभाग का कहना है कि सभी कर्मचारियों की सेवा संबंधी जानकारी पहले से ही सिस्टम में दर्ज की जा चुकी है। इसमें प्रत्येक कैडर के अनुसार अवकाश के प्रकार, पात्रता और उपलब्ध छुट्टियों का पूरा विवरण भी शामिल है। इससे आवेदन करते समय किसी प्रकार की भ्रम की स्थिति नहीं बनेगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस ऑनलाइन प्रणाली को सीधे पूरे प्रदेश में लागू नहीं किया गया था। पहले इसे कुछ चुनिंदा इकाइयों में परीक्षण के तौर पर शुरू किया गया। स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (SCRB), कार्मिक शाखा, विशेष शाखा, पुलिस अधीक्षक रेल भोपाल और 25वीं वाहिनी भोपाल में ई-लीव मॉड्यूल का ट्रायल किया गया। इन इकाइयों से मिले सुझावों और फीडबैक के आधार पर तकनीकी सुधार किए गए। परीक्षण सफल रहने के बाद अब इसे प्रदेश की सभी लगभग 120 पुलिस इकाइयों में लागू कर दिया गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पुलिस विभाग ने बताया कि सेवा प्रबंधन प्रणाली को पूरी तरह डिजिटल बनाने की प्रक्रिया जुलाई 2025 से ही शुरू कर दी गई थी। इस दौरान विभाग ने पुराने मैनुअल रिकॉर्ड को डिजिटल स्वरूप देने का अभियान चलाया। पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों की सेवा पुस्तिकाओं की स्कैनिंग कर उनका पूरा रिकॉर्ड ऑनलाइन सुरक्षित किया गया। इस काम में मध्य प्रदेश स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (MPSEDC) की भी मदद ली गई। विभाग के अनुसार एक लाख से अधिक सेवा पुस्तिकाओं का सफलतापूर्वक डिजिटलीकरण किया जा चुका है और लगभग सभी पुलिस अधिकारी-कर्मचारी eHRMS प्लेटफॉर्म पर ऑनबोर्ड हो चुके हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">केवल अवकाश प्रबंधन ही नहीं, बल्कि सेवा संबंधी अन्य रिकॉर्ड को भी डिजिटल बनाया जा रहा है। इसी दिशा में 23 मार्च 2026 से eHRMS का ऑर्डर बुक (O.B.) मॉड्यूल भी लागू किया गया है। इसके माध्यम से पुलिस विभाग में जारी होने वाले सभी महत्वपूर्ण सेवा आदेश ऑनलाइन उपलब्ध रहेंगे। पहले कर्मचारियों को कई बार पुराने आदेशों या सेवा संबंधी दस्तावेजों के लिए कार्यालयों में संपर्क करना पड़ता था, लेकिन अब आवश्यक रिकॉर्ड डिजिटल रूप में सुरक्षित रहेगा और जरूरत पड़ने पर आसानी से देखा जा सकेगा। इससे दस्तावेजों के संरक्षण और रिकॉर्ड प्रबंधन में भी काफी सुधार आने की उम्मीद है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि डिजिटल व्यवस्था लागू होने से प्रशासनिक कार्यों में तेजी आएगी और कागजी प्रक्रिया पर निर्भरता कम होगी। ऑनलाइन सिस्टम के कारण आवेदन की निगरानी भी आसान होगी और किसी स्तर पर फाइल लंबे समय तक लंबित रहने की संभावना घटेगी। साथ ही कर्मचारियों को अपने अवकाश की स्थिति जानने के लिए अलग से कार्यालयों में संपर्क करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पूरी जानकारी उनके लॉगिन पर उपलब्ध रहेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 06:07:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, AI के फर्जी कानूनी उदाहरणों को बताया न्याय व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[एनसीएलटी का फैसला रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार किए गए झूठे कानूनी उदाहरण अदालतों में पेश करना न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर असर डाल सकता है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/supreme-courts-strict-comment-calls-fake-legal-examples-of-ai/article-57706"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/supreme-court-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार किए गए फर्जी कानूनी उदाहरणों के इस्तेमाल पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बताया है। अदालत ने कहा कि AI तकनीक अपने आप में समस्या नहीं है, लेकिन यदि उससे तैयार की गई गलत या मनगढ़ंत जानकारी को असली कानूनी मिसाल बताकर अदालत के सामने पेश किया जाता है तो इससे न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ता है। कोर्ट ने इस खतरे की गंभीरता समझाने के लिए भोपाल गैस त्रासदी में मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह जहरीली गैस का प्रभाव दूरगामी और विनाशकारी था, उसी तरह न्यायिक प्रक्रिया में झूठी कानूनी जानकारी का प्रवेश भी बेहद नुकसानदायक हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने यह टिप्पणी नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) मुंबई के एक आदेश को रद्द करते हुए की। मामला एस्सेल इन्फ्राप्रोजेक्ट लिमिटेड, जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड और पूजा रमेश सिंह से जुड़े दिवालियापन विवाद का था। एनसीएलटी ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की धारा-7 के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए अपने फैसले में कई ऐसे कानूनी मामलों का हवाला दिया था, जिनका वास्तविक अस्तित्व ही नहीं था। जांच के दौरान सामने आया कि आदेश में जिन फैसलों का उल्लेख किया गया, उनमें कुछ पूरी तरह मनगढ़ंत थे और उनकी कानूनी साइटेशन भी वास्तविक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाती थीं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों में किसी भी फैसले का आधार केवल प्रमाणिक और सत्यापित कानूनी सामग्री होनी चाहिए। यदि किसी आदेश में ऐसे मामलों का हवाला दिया जाए जो वास्तव में मौजूद ही नहीं हैं, तो यह केवल तकनीकी गलती नहीं बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की मूल भावना के खिलाफ है। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस तरह की चूक लोगों के न्यायपालिका पर भरोसे को कमजोर कर सकती है और भविष्य के मामलों में भी गलत कानूनी आधार तैयार कर सकती है। अदालत ने कहा कि न्याय व्यवस्था का पूरा ढांचा सत्य, पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर आधारित है, इसलिए इसमें किसी भी प्रकार की फर्जी जानकारी के लिए कोई जगह नहीं हो सकती।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मामले की सुनवाई के दौरान जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड ने शपथपत्र दाखिल कर कहा कि उसके वकीलों ने अपने तर्कों में इन कथित मामलों का कोई उल्लेख नहीं किया था। बैंक के अनुसार, एनसीएलटी ने अपने स्तर पर की गई कानूनी रिसर्च के दौरान इन उदाहरणों को आदेश में शामिल किया। इस दलील के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड की समीक्षा की और पाया कि आदेश में शामिल कुछ कानूनी संदर्भ वास्तविक न्यायिक अभिलेखों में उपलब्ध ही नहीं थे। इसके बाद अदालत ने एनसीएलटी का आदेश रद्द कर दिया और भविष्य के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश भी जारी किए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि वह AI तकनीक के उपयोग के खिलाफ नहीं है। अदालत ने कहा कि आधुनिक तकनीक न्यायिक शोध और दस्तावेजों की तैयारी में उपयोगी हो सकती है, लेकिन अंतिम जिम्मेदारी हमेशा इंसानों की ही रहेगी। यदि कोई वकील बिना तथ्य जांचे AI से प्राप्त जानकारी को अदालत में पेश करता है, तो यह उसकी गंभीर पेशेवर लापरवाही मानी जाएगी। इसी तरह यदि कोई न्यायिक अधिकारी या न्यायाधीश बिना सत्यापन के ऐसी सामग्री पर भरोसा करता है, तो यह भी न्यायिक जिम्मेदारी के अनुरूप नहीं माना जाएगा। अदालत ने कहा कि तकनीक केवल सहायक हो सकती है, लेकिन निर्णय और तथ्य सत्यापन का दायित्व मानव विवेक पर ही आधारित रहना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पीठ ने कहा कि केवल चेतावनी देना पर्याप्त नहीं होगा। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर या लापरवाही से अदालत में फर्जी AI-आधारित कानूनी सामग्री प्रस्तुत करता है, तो उसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। अदालत ने इस मुद्दे को भविष्य की न्यायिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि समय रहते स्पष्ट नियम बनाना आवश्यक है ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके। न्यायपालिका में विश्वास बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि अदालतों में प्रस्तुत हर कानूनी संदर्भ का स्वतंत्र सत्यापन किया जाए। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने की सिफारिश की है। अदालत का कहना है कि यह समिति अदालतों में AI के जिम्मेदार उपयोग के लिए दिशा-निर्देश तैयार करे और यह सुनिश्चित करे कि किसी भी वकील या पक्षकार द्वारा फर्जी अथवा भ्रामक AI सामग्री प्रस्तुत न की जाए। यदि ऐसे मामलों में नियमों का उल्लंघन होता है तो उसके लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी प्रावधान होना चाहिए। अदालत ने कहा कि तकनीक का उपयोग स्वागतयोग्य है, लेकिन न्याय की प्रक्रिया में सत्य और प्रमाणिकता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 06:06:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>रेलवे का रिजर्वेशन सिस्टम होगा हाईटेक, अब एक मिनट में 1.25 लाख टिकट होंगे बुक</title>
                                    <description><![CDATA[CRIS ने किया नए रिजर्वेशन सिस्टम का ऐलान, AI तकनीक से कम होगी सर्वर पर लोड और तत्काल टिकट बुकिंग के दौरान हैंग होने की समस्या से मिलेगी राहत।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/railways-reservation-system-will-be-hi-tech-now-125-lakh-tickets/article-57614"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/indian-railways.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">भारतीय रेलवे जल्द ही अपने पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम (PRS) में बड़ा बदलाव करने जा रहा है। इस अपग्रेड के बाद टिकट बुकिंग की क्षमता मौजूदा व्यवस्था की तुलना में पांच गुना तक बढ़ जाएगी। नए सिस्टम के जरिए एक मिनट में करीब 1.25 लाख टिकट बुक किए जा सकेंगे, जबकि अभी यह क्षमता लगभग 25 हजार टिकट प्रति मिनट है। रेलवे का मानना है कि इस बदलाव से बढ़ती यात्री संख्या के बीच टिकट बुकिंग पहले से कहीं ज्यादा तेज और आसान होगी। खासकर तत्काल टिकट बुकिंग के दौरान वेबसाइट और मोबाइल ऐप पर आने वाली तकनीकी दिक्कतों में काफी कमी आने की उम्मीद है। इस नई व्यवस्था की जानकारी सेंटर फॉर रेलवे इंफॉर्मेशन सिस्टम्स (CRIS) ने अपने 41वें स्थापना दिवस के अवसर पर दी। अधिकारियों के अनुसार भारतीय रेलवे लगातार डिजिटल तकनीकों को अपनाकर अपनी सेवाओं को आधुनिक बना रहा है। टिकट बुकिंग सिस्टम का यह अपग्रेड भी उसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में ऑनलाइन टिकट बुक कराने वाले यात्रियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। ऐसे में कई बार सर्वर पर अचानक अधिक लोड आने से वेबसाइट धीमी पड़ जाती है या हैंग होने लगती है। सबसे ज्यादा परेशानी तत्काल टिकट बुकिंग के दौरान देखने को मिलती है, जब कुछ ही मिनटों में लाखों लोग एक साथ लॉग इन कर टिकट बुक करने की कोशिश करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">रेलवे अधिकारियों का कहना है कि नया सिस्टम इस बढ़ती मांग को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। इसकी प्रोसेसिंग क्षमता काफी अधिक होगी, जिससे एक साथ बड़ी संख्या में आने वाले अनुरोधों को बिना रुकावट के पूरा किया जा सकेगा। इससे टिकट बुकिंग का समय घटेगा और यात्रियों को बेहतर डिजिटल अनुभव मिलेगा। रेलवे को उम्मीद है कि नए सिस्टम के लागू होने के बाद तत्काल टिकट बुकिंग के दौरान वेबसाइट या ऐप के बार-बार क्रैश होने जैसी शिकायतें काफी हद तक खत्म हो जाएंगी। रेलवे ने डिजिटल सेवाओं को मजबूत करने के लिए पिछले वर्ष 'रेलवन' नाम से सुपर ऐप भी लॉन्च किया था। यह ऐप यात्रियों को एक ही प्लेटफॉर्म पर कई तरह की रेलवे सेवाएं उपलब्ध कराता है। अधिकारियों के अनुसार लॉन्च के बाद से इस ऐप को यात्रियों का अच्छा समर्थन मिला है। अब तक इसे 4.35 करोड़ से अधिक बार डाउनलोड किया जा चुका है और इसके माध्यम से हर दिन औसतन 10 लाख से ज्यादा ट्रांजैक्शन किए जा रहे हैं। रेलवे का कहना है कि ऐप का सरल इंटरफेस और तेज काम करने की क्षमता यात्रियों को बेहतर अनुभव दे रही है। आने वाले समय में नए रिजर्वेशन सिस्टम के साथ इस ऐप की कार्यक्षमता भी और बेहतर होने की संभावना है। भारतीय रेलवे अब केवल टिकट बुकिंग तक ही तकनीक का इस्तेमाल सीमित नहीं रखना चाहता। रेलवे अपने कई अहम कार्यों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का उपयोग तेजी से बढ़ा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक AI तकनीक की मदद से ट्रेनों और रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर की निगरानी पहले से अधिक प्रभावी होगी। इससे किसी तकनीकी खराबी का पता पहले ही लगाया जा सकेगा और समय रहते मरम्मत की जा सकेगी। इसका सीधा फायदा यात्रियों की सुरक्षा और ट्रेन संचालन की विश्वसनीयता पर पड़ेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">रेलवे का मानना है कि भविष्य में AI आधारित सिस्टम ट्रेनों के रखरखाव की प्रक्रिया को पूरी तरह बदल सकते हैं। अभी कई बार उपकरणों में खराबी आने के बाद मरम्मत की जाती है, लेकिन नई तकनीक संभावित खराबी का पहले ही संकेत दे सकेगी। इससे दुर्घटनाओं की संभावना कम होगी और ट्रेनों की समयबद्धता में भी सुधार आएगा। रेलवे के लिए यह बदलाव केवल तकनीकी उन्नयन नहीं बल्कि यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।सेंटर फॉर रेलवे इंफॉर्मेशन सिस्टम्स के प्रबंध निदेशक जीवीएल सत्य कुमार ने कहा कि रेलवे का उद्देश्य केवल नई तकनीक अपनाना नहीं है, बल्कि उसका लाभ सीधे आम नागरिकों तक पहुंचाना है। चाहे नया रेलवन ऐप हो, आधुनिक रिजर्वेशन सिस्टम हो या AI आधारित तकनीक, इन सभी का मकसद यात्रियों को बेहतर, तेज और भरोसेमंद सेवाएं उपलब्ध कराना है। उन्होंने कहा कि डिजिटल बदलाव के इस दौर में रेलवे लगातार ऐसे समाधान विकसित कर रहा है, जो भविष्य की जरूरतों को भी पूरा कर सकें। रेलवे के इस नए कदम को देश के करोड़ों यात्रियों के लिए राहत भरा माना जा रहा है। हर दिन लाखों लोग ऑनलाइन टिकट बुक करते हैं और त्योहारों, छुट्टियों या तत्काल बुकिंग के समय बढ़ते दबाव के कारण उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। नई तकनीक लागू होने के बाद टिकट बुकिंग प्रक्रिया पहले से अधिक तेज, स्थिर और भरोसेमंद होने की उम्मीद है। साथ ही AI आधारित सिस्टम रेलवे संचालन को अधिक सुरक्षित और आधुनिक बनाने में भी अहम भूमिका निभाएगा। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 11:27:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>क्या युवा अब दोस्तों से ज्यादा ChatGPT पर करने लगे हैं भरोसा?</title>
                                    <description><![CDATA[AI चैटबॉट्स से बढ़ती बातचीत केवल तकनीक का प्रभाव नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली, अकेलेपन, गोपनीयता और बिना जजमेंट के सुने जाने की चाह का भी संकेत है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/have-youth-now-started-trusting-chatgpt-more-than-friends/article-57470"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/ai-and-youth.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पिछले कुछ वर्षों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने लोगों के काम करने, सीखने और जानकारी हासिल करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। लेकिन अब एक नया बदलाव भी तेजी से देखने को मिल रहा है। कई युवा केवल पढ़ाई, नौकरी या जानकारी के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी भावनाएं, उलझनें, रिश्तों की समस्याएं और जीवन से जुड़े सवाल भी ChatGPT जैसे AI चैटबॉट्स से साझा कर रहे हैं। यह सवाल अब अक्सर उठने लगा है कि क्या आज की युवा पीढ़ी इंसानों से ज्यादा AI के साथ अपने मन की बात करने में सहज महसूस करती है? इसका जवाब पूरी तरह "हां" या "नहीं" में देना आसान नहीं है, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि AI ने युवाओं के लिए संवाद का एक नया माध्यम तैयार किया है। इसके पीछे कई सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और तकनीकी कारण हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>बिना जजमेंट के अपनी बात कहने की आजादी</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आज का युवा सबसे ज्यादा जिस चीज की तलाश में है, वह है ऐसा व्यक्ति या माध्यम जो उसकी बात बिना टोके, बिना आलोचना किए और बिना किसी पूर्वाग्रह के सुने। कई बार परिवार, दोस्त या रिश्तेदार सलाह देने से पहले ही निर्णय सुना देते हैं। इससे कई युवा अपनी भावनाएं दबाकर रखना बेहतर समझते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">AI के साथ बातचीत में उन्हें ऐसा महसूस होता है कि उनकी बात को बिना किसी व्यक्तिगत राय के सुना जा रहा है। यही कारण है कि वे कई बार ऐसी बातें भी लिख देते हैं, जो शायद किसी करीबी से कहने में हिचकिचाते।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>गोपनीयता का एहसास</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">डिजिटल युग में प्राइवेसी एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है। युवाओं को अक्सर यह चिंता रहती है कि कहीं उनकी निजी बातें किसी और तक न पहुंच जाएं। AI के साथ बातचीत करते समय उन्हें अपेक्षाकृत अधिक गोपनीयता का अनुभव होता है। यही वजह है कि वे रिश्तों, करियर, आत्मविश्वास, तनाव या भविष्य से जुड़े सवाल खुलकर पूछते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, यह भी जरूरी है कि उपयोगकर्ता किसी भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अत्यधिक संवेदनशील या व्यक्तिगत जानकारी साझा करते समय सावधानी बरतें।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>हर समय उपलब्ध रहने की सुविधा</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">इंसानी रिश्तों की अपनी सीमाएं होती हैं। हर दोस्त, परिवार का सदस्य या सलाहकार हर समय उपलब्ध नहीं हो सकता। लेकिन AI दिन हो या रात, किसी भी समय बातचीत के लिए तैयार रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">रात के दो बजे अगर कोई छात्र परीक्षा के तनाव में हो या कोई युवा अपने करियर को लेकर परेशान हो, तो उसे तुरंत बातचीत का अवसर मिल जाता है। यही सुविधा AI को अलग बनाती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>डिजिटल पीढ़ी की नई आदतें</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आज की पीढ़ी बचपन से ही इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बीच बड़ी हुई है। उनके लिए चैट करके अपनी बात कहना कई बार आमने-सामने बातचीत से भी आसान होता है। यही वजह है कि AI के साथ संवाद उन्हें स्वाभाविक लगता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह केवल तकनीक की आदत नहीं, बल्कि बदलती संचार शैली का भी हिस्सा है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>क्या AI सचमुच दोस्त बन सकता है?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। AI बातचीत कर सकता है, जानकारी दे सकता है, विचारों को व्यवस्थित करने में मदद कर सकता है और कई बार प्रेरित भी कर सकता है। लेकिन वह इंसान की तरह भावनाओं को महसूस नहीं करता।</p>
<p style="text-align:justify;">AI के पास न व्यक्तिगत अनुभव होते हैं और न ही वास्तविक संवेदनाएं। वह आपके शब्दों को समझने की कोशिश करता है, लेकिन आपके जीवन को उसी तरह महसूस नहीं कर सकता, जैसे कोई करीबी मित्र या परिवार का सदस्य कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए AI को एक सहायक संवाद माध्यम माना जा सकता है, लेकिन वास्तविक रिश्तों का विकल्प नहीं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में AI</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आज मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता पहले की तुलना में काफी बढ़ी है। कई लोग शुरुआती स्तर पर अपनी चिंता, तनाव या भावनात्मक उलझनों को समझने के लिए AI से बातचीत करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आत्मचिंतन और अपनी भावनाओं को शब्द देने में मददगार हो सकता है। लेकिन यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय से अवसाद, अत्यधिक चिंता, आत्महत्या के विचार या गंभीर मानसिक परेशानी हो, तो केवल AI पर निर्भर रहना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक या भरोसेमंद व्यक्ति से संपर्क करना आवश्यक होता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>क्या युवा रिश्तों से दूर हो रहे हैं?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">कई लोगों का मानना है कि AI के बढ़ते उपयोग से इंसानी रिश्ते कमजोर हो रहे हैं। लेकिन इसे पूरी तरह सही नहीं कहा जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">असल में युवा ऐसे माहौल की तलाश में हैं जहां उन्हें बिना डर, बिना शर्म और बिना आलोचना के अपनी बात रखने का अवसर मिले। यदि परिवार, मित्र और समाज ऐसा सुरक्षित वातावरण प्रदान करें, तो शायद AI केवल एक सहायक माध्यम बनकर रह जाएगा, मुख्य सहारा नहीं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भविष्य में क्या होगा?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आने वाले समय में AI और इंसानी रिश्ते एक-दूसरे के विरोधी नहीं होंगे। AI जानकारी, मार्गदर्शन, योजना बनाने और शुरुआती भावनात्मक सहायता में उपयोगी साबित हो सकता है। वहीं, जीवन की वास्तविक खुशियां, अपनापन, विश्वास, प्रेम और कठिन समय में साथ केवल इंसानी रिश्ते ही दे सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">तकनीक जितनी भी विकसित हो जाए, एक सच्चे दोस्त की मुस्कान, माता-पिता का स्नेह, भाई-बहन का साथ या किसी प्रिय व्यक्ति का हौसला आज भी किसी मशीन से कहीं अधिक मूल्यवान है।</p>
<p style="text-align:justify;">AI ने युवाओं को अपनी बात कहने का एक नया और सुविधाजनक मंच दिया है। बिना जजमेंट के बातचीत, हर समय उपलब्धता और डिजिटल सहजता इसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि AI इंसानी भावनाओं का विकल्प नहीं बन सकता। सबसे बेहतर रास्ता यही है कि AI का उपयोग सीखने, समझने और आत्मचिंतन के लिए किया जाए, जबकि जीवन के सबसे महत्वपूर्ण रिश्तों को भी उतना ही समय और महत्व दिया जाए। आखिरकार, तकनीक सुविधा दे सकती है, लेकिन अपनापन, विश्वास और सच्चा साथ आज भी इंसानों से ही मिलता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 00:00:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तीन रॉकेट फेल, आखिरी दांव और फिर इतिहास; ऐसे बनी स्पेसएक्स की सफलता की कहानी</title>
                                    <description><![CDATA[लगातार असफलताओं, आर्थिक संकट और दिवालिया होने की कगार से उठकर इलॉन मस्क ने स्पेसएक्स को दुनिया की सबसे प्रभावशाली अंतरिक्ष कंपनियों में बदल दिया। 55वें जन्मदिन पर जानिए इस सफर की पूरी कहानी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/three-rockets-failed-the-last-bet-and-then-history-became/article-57192"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/elon-musk.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आज दुनिया के सबसे चर्चित उद्योगपतियों में शामिल इलॉन मस्क अपना 55वां जन्मदिन मना रहे हैं। उनकी कंपनी स्पेसएक्स का नाम अब अंतरिक्ष तकनीक की दुनिया में सबसे आगे गिना जाता है, लेकिन यहां तक पहुंचने का सफर बिल्कुल आसान नहीं था। एक समय ऐसा भी था जब लगातार तीन रॉकेट लॉन्च फेल हो चुके थे, टेस्ला आर्थिक संकट से जूझ रही थी और मस्क के पास बची हुई लगभग पूरी पूंजी चौथे लॉन्च पर लगी हुई थी। अगर वह मिशन भी असफल हो जाता तो स्पेसएक्स के साथ-साथ मस्क का कारोबारी भविष्य भी खत्म हो सकता था। लेकिन किस्मत और तकनीक दोनों ने साथ दिया और उसी लॉन्च ने इतिहास बदल दिया। आज स्पेसएक्स की सफलता ने मस्क को दुनिया के सबसे अमीर लोगों में सबसे आगे ला खड़ा किया है और उनकी संपत्ति ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े तक पहुंच चुकी है। इलॉन मस्क की कारोबारी यात्रा 1990 के दशक में शुरू हुई थी। उन्होंने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी छोड़कर Zip2 नाम का ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बनाया, जिसे बाद में कॉम्पैक ने खरीद लिया। इसके बाद उन्होंने X.com की शुरुआत की, जो आगे चलकर PayPal बना। जब eBay ने PayPal का अधिग्रहण किया तो मस्क को लगभग 180 मिलियन डॉलर मिले। आमतौर पर इतनी बड़ी रकम मिलने के बाद लोग सुरक्षित निवेश करते हैं, लेकिन मस्क ने इसके उलट पूरा पैसा ऐसे क्षेत्रों में लगाया, जिन्हें उस समय बेहद जोखिम भरा माना जाता था। उन्होंने स्पेसएक्स, टेस्ला और सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट्स में अपनी अधिकांश पूंजी निवेश कर दी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">स्पेसएक्स की शुरुआत के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। साल 2001 में मस्क रूस गए थे, जहां उनका मकसद पुराने रॉकेट खरीदना था। लेकिन बातचीत के दौरान उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया और कीमतें भी उनकी उम्मीद से कहीं ज्यादा बताई गईं। बताया जाता है कि इसी अनुभव के बाद उन्होंने फैसला किया कि अगर रॉकेट इतने महंगे हैं तो उन्हें खुद बनाना चाहिए। उन्होंने रॉकेट निर्माण की लागत का अध्ययन किया और पाया कि कच्चे माल की वास्तविक कीमत अंतिम कीमत का बहुत छोटा हिस्सा होती है। यहीं से कम लागत में अंतरिक्ष तकनीक विकसित करने का विचार जन्मा। स्पेसएक्स के शुरुआती साल बेहद कठिन रहे। पहला फाल्कन-1 रॉकेट मार्च 2006 में लॉन्च हुआ, लेकिन उड़ान भरने के कुछ समय बाद तकनीकी खराबी के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया। दूसरी उड़ान भी लक्ष्य हासिल नहीं कर सकी। तीसरे मिशन में भी रॉकेट ऑर्बिट तक पहुंचने से पहले नष्ट हो गया। लगातार तीन असफलताओं के बाद निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ने लगा था। कंपनी आर्थिक संकट में थी और मस्क भी निजी तौर पर लगभग दिवालिया होने की स्थिति में पहुंच गए थे। कई लोगों ने सलाह दी कि अब इस प्रोजेक्ट को बंद कर देना चाहिए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">28 सितंबर 2008 का दिन स्पेसएक्स के इतिहास का सबसे अहम मोड़ साबित हुआ। चौथा फाल्कन-1 मिशन सफल रहा और पहली बार किसी निजी कंपनी का रॉकेट पृथ्वी की कक्षा तक पहुंचने में कामयाब हुआ। इस उपलब्धि ने न सिर्फ स्पेसएक्स को बचा लिया बल्कि पूरी अंतरिक्ष इंडस्ट्री की सोच बदल दी। इसके बाद कंपनी को बड़े सरकारी और व्यावसायिक अनुबंध मिलने शुरू हुए और धीरे-धीरे उसका विस्तार तेज हो गया। स्पेसएक्स की सबसे बड़ी उपलब्धियों में फाल्कन-9 रॉकेट का विकास माना जाता है। पहले रॉकेट का पहला चरण मिशन पूरा होने के बाद समुद्र में गिरकर नष्ट हो जाता था, लेकिन स्पेसएक्स ने ऐसा सिस्टम विकसित किया जिसमें रॉकेट का पहला चरण वापस धरती पर सुरक्षित उतर सकता है और दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। दिसंबर 2015 में पहली बार फाल्कन-9 की सफल लैंडिंग हुई। इस तकनीक ने लॉन्च की लागत में भारी कमी लाई और अंतरिक्ष मिशनों को पहले की तुलना में काफी सस्ता बना दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसी रणनीति का असर यह हुआ कि स्पेसएक्स ने वैश्विक कमर्शियल लॉन्च बाजार में मजबूत पकड़ बना ली। आज दुनिया के कई देशों, निजी कंपनियों और अंतरिक्ष एजेंसियों के सैटेलाइट स्पेसएक्स के जरिए लॉन्च किए जाते हैं। कंपनी का ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक अंतरिक्ष यात्रियों और सामान को पहुंचाने का नियमित माध्यम बन चुका है। हाल के वर्षों में यह स्पेसक्राफ्ट कई महत्वपूर्ण मानव मिशनों का हिस्सा भी रहा है। स्पेसएक्स अब केवल रॉकेट लॉन्च करने वाली कंपनी नहीं रह गई है। कंपनी स्टारशिप जैसे पूरी तरह रीयूजेबल रॉकेट पर काम कर रही है, जिसे भविष्य में चंद्रमा और मंगल ग्रह के मिशनों के लिए इस्तेमाल करने की योजना है। इलॉन मस्क का कहना है कि उनका अंतिम लक्ष्य इंसानों को बहुग्रहीय सभ्यता बनाना है। इसी दिशा में कंपनी चंद्रमा पर औद्योगिक गतिविधियों और भविष्य की अंतरिक्ष तकनीकों को लेकर भी लंबे समय की योजनाओं पर काम कर रही है। आज जब इलॉन मस्क अपने 55वें जन्मदिन पर दुनिया के सबसे प्रभावशाली उद्यमियों में गिने जाते हैं, तब उनकी कहानी केवल सफलता की नहीं बल्कि लगातार असफलताओं के बाद भी हार न मानने की मिसाल बन चुकी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 13:56:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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