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                <title>Green Policy - दैनिक जागरण</title>
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                <title>जंगलों के 10 किमी दायरे में आरा मिलों पर रोक बरकरार, हाईकोर्ट ने 19 याचिकाएं खारिज कीं</title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अधिसूचना को सही ठहराया, कहा- पर्यावरण और वन संरक्षण से कोई समझौता नहीं होगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/ban-on-saw-mills-within-10-km-radius-of-forests/article-58081"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/chhattisgarh-high-court-(9).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जंगलों और संरक्षित वन क्षेत्रों के आसपास पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने अधिसूचित जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों से 10 किलोमीटर के दायरे में आरा मिलों के संचालन पर लगी रोक को बरकरार रखा है। इस मामले में दायर 19 अलग-अलग याचिकाओं को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की 25 सितंबर 2025 की अधिसूचना को पूरी तरह वैध माना। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट कहा कि राज्य में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना सबसे जरूरी है और ऐसी परिस्थितियां नहीं बनने दी जा सकतीं, जिनसे भविष्य में बड़े शहरों जैसी गंभीर प्रदूषण की समस्या पैदा हो। अदालत की टिप्पणी रही कि प्रदेश को ऐसी स्थिति से बचाना जरूरी है जहां पर्यावरण को अपूरणीय नुकसान पहुंचे।</p>
<p>यह मामला उस अधिसूचना से जुड़ा है, जिसे राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ काष्ठ चिरान (विनियमन) अधिनियम, 1984 की धारा 5(1) के तहत जारी किया था। अधिसूचना के अनुसार अधिसूचित जंगलों और संरक्षित वन क्षेत्रों से हवाई दूरी के आधार पर 10 किलोमीटर तक के क्षेत्र को तीन वर्षों के लिए प्रतिबंधित घोषित किया गया। इसके बाद वन विभाग ने इस दायरे में संचालित आरा मिलों के संचालन और उनके लाइसेंस के नवीनीकरण पर रोक लगाने के आदेश जारी किए थे। इस फैसले से प्रभावित कई आरा मिल संचालकों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।</p>
<p>याचिकाकर्ताओं में शाही ट्रेडर्स, अग्रवाल सॉ मिल, पटेल सॉ मिल सहित कई लकड़ी उद्योग संचालक शामिल थे। उनका कहना था कि उनकी आरा मिलें वर्ष 1996 से पहले से वैध लाइसेंस के साथ संचालित हो रही हैं और वे सभी आवश्यक नियमों का पालन करते आए हैं। उन्होंने अदालत के सामने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुल्पद मामले का हवाला भी दिया। उनका तर्क था कि पुराने और वैध लाइसेंसधारी प्रतिष्ठानों को अचानक इस प्रकार बंद करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस फैसले से उनके व्यवसाय, कर्मचारियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।</p>
<p>मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि जंगलों के आसपास लकड़ी आधारित गतिविधियों पर नियंत्रण पर्यावरण संरक्षण के लिए आवश्यक है। सरकार ने अदालत को बताया कि वन क्षेत्रों के आसपास सुरक्षा दायरा तय करने का उद्देश्य केवल उद्योगों को सीमित करना नहीं बल्कि अवैध कटाई, जंगलों पर बढ़ते दबाव और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि औद्योगिक क्षेत्रों और नगर निगम या नगर पालिका की सीमाओं के भीतर आने वाले कुछ क्षेत्रों को इस प्रतिबंध से पहले ही छूट दी जा चुकी है, जिससे यह साबित होता है कि निर्णय संतुलित सोच के साथ लिया गया है।</p>
<p>जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राज्य सरकार के फैसले को उचित और तार्किक माना। अदालत ने कहा कि जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं हैं, बल्कि जलवायु संतुलन, जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यदि वन क्षेत्रों के आसपास अनियंत्रित औद्योगिक गतिविधियों की अनुमति दी जाती है तो उसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ेगा। इसलिए सरकार द्वारा तय किया गया 10 किलोमीटर का बफर जोन पर्यावरण संरक्षण की दिशा में आवश्यक कदम माना जा सकता है।</p>
<p>अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि सरकार वैज्ञानिक तथ्यों और सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए कोई नीति बनाती है तो उसमें न्यायालय तब तक हस्तक्षेप नहीं करेगा, जब तक वह कानून के विपरीत न हो। अदालत ने माना कि इस मामले में सरकार का फैसला सार्वजनिक हित और पर्यावरण सुरक्षा दोनों के अनुरूप है। इसलिए इसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।</p>
<p>इस फैसले के बाद अब अधिसूचित जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों से 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाली आरा मिलों के संचालन और उनके लाइसेंस के नवीनीकरण पर रोक जारी रहेगी। जिन मिलों का संचालन इस प्रतिबंधित क्षेत्र में आता है, उन्हें वर्तमान नियमों का पालन करना होगा। वन विभाग भी इस संबंध में आगे की कार्रवाई जारी रख सकेगा। माना जा रहा है कि इस फैसले का असर प्रदेश के कई जिलों में संचालित लकड़ी उद्योगों पर पड़ सकता है, जहां बड़ी संख्या में आरा मिलें वन क्षेत्रों के आसपास स्थित हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 13:37:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>विकास परियोजनाओं में पेड़ों की कटाई पर सख्ती, हाईकोर्ट में पेश हुई ट्री ट्रांसलोकेशन पॉलिसी-2026</title>
                                    <description><![CDATA[एक पेड़ काटने पर लगाने होंगे 20 पौधे, 80% पेड़ों के वैज्ञानिक प्रत्यारोपण का प्रस्ताव]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/strictness-on-cutting-of-trees-in-development-projects-tree-translocation/article-56169"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/tree-translocation-policy-2026.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश में विकास कार्यों के नाम पर बड़ी संख्या में होने वाली पेड़ों की कटाई पर अब सख्ती दिखाई दे सकती है। राज्य सरकार ने 'ट्री ट्रांसलोकेशन पॉलिसी-2026' का मसौदा तैयार कर लिया है, जिसे मंगलवार को हाईकोर्ट की डबल बेंच के समक्ष पेश किया गया। प्रस्तावित नीति का मुख्य उद्देश्य सड़क, मेट्रो, रेलवे, फ्लाईओवर और अन्य बड़े निर्माण कार्यों के दौरान पेड़ों को काटने की बजाय उन्हें वैज्ञानिक तरीके से दूसरी जगह स्थानांतरित करना है। सरकार का कहना है कि तेजी से हो रहे शहरी विकास और आधारभूत संरचना परियोजनाओं के बीच पर्यावरण संरक्षण को भी समान महत्व देना जरूरी है। इसी सोच के तहत यह नीति तैयार की गई है, ताकि विकास और हरित संतुलन दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ा जा सके। किसी भी सरकारी या निजी निर्माण एजेंसी के लिए पेड़ों की कटाई अब पहला विकल्प नहीं होगी। एजेंसियों को पहले यह साबित करना होगा कि परियोजना के डिजाइन में बदलाव या अन्य तकनीकी विकल्पों के माध्यम से पेड़ों को बचाने की पूरी कोशिश की गई है। यदि इसके बावजूद पेड़ों को हटाना अपरिहार्य हो जाता है, तो प्रभावित पेड़ों में से कम से कम 80 प्रतिशत का वैज्ञानिक तरीके से प्रत्यारोपण करना अनिवार्य होगा। इसके अलावा यदि किसी पेड़ को काटने की अनुमति दी जाती है, तो उसके बदले 20 नए पौधे लगाने होंगे। इन पौधों के संरक्षण और विकास की जिम्मेदारी भी संबंधित एजेंसी की होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि इस नीति के पीछे ग्वालियर की थाटीपुर पुनर्विकास परियोजना एक बड़ा कारण बनी। उस परियोजना के दौरान कई पेड़ों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किया गया था, लेकिन बाद में उनकी उचित देखभाल नहीं हो सकी। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में पेड़ नष्ट हो गए। इस मामले ने पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कई सवाल खड़े किए थे। बाद में हाईकोर्ट ने इस पर संज्ञान लेते हुए सरकार से स्पष्ट और वैज्ञानिक नीति तैयार करने के निर्देश दिए थे। न्यायालय का मानना था कि केवल प्रत्यारोपण करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पेड़ों के जीवित रहने और उनकी निगरानी के लिए भी प्रभावी व्यवस्था जरूरी है। नई नीति में इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए तकनीक का व्यापक उपयोग करने का प्रस्ताव रखा गया है। प्रत्यारोपित किए गए पेड़ों और उनके बदले लगाए गए नए पौधों की जियो-टैगिंग की जाएगी। इसके लिए एक केंद्रीकृत ऑनलाइन डैशबोर्ड विकसित किया जाएगा, जहां प्रत्येक पेड़ की लोकेशन, तस्वीर, स्वास्थ्य स्थिति और रखरखाव से जुड़ी जानकारी दर्ज रहेगी। इससे न केवल निगरानी आसान होगी बल्कि पारदर्शिता भी बढ़ेगी। अधिकारियों के अनुसार, आम नागरिक और संबंधित विभाग भी इस डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से पेड़ों की स्थिति पर नजर रख सकेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से इस तरह की नीति की मांग कर रहे थे। उनका कहना है कि बड़े शहरों में तेजी से बढ़ते निर्माण कार्यों के कारण हर साल हजारों पेड़ काटे जाते हैं, जिससे स्थानीय पर्यावरण और जैव विविधता पर असर पड़ता है। गर्मी बढ़ने, भूजल स्तर में गिरावट और वायु प्रदूषण जैसी समस्याओं के पीछे हरित क्षेत्र में लगातार कमी भी एक प्रमुख कारण मानी जाती है। ऐसे में यदि पेड़ों को बचाने और उनके प्रत्यारोपण की प्रक्रिया को कानूनी रूप से मजबूत किया जाता है तो इसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे सकता है। केवल नीति बनाना पर्याप्त नहीं होगा। उसके प्रभावी क्रियान्वयन और नियमित निगरानी पर भी उतना ही ध्यान देना होगा। कई बार प्रत्यारोपित पेड़ों की देखभाल शुरुआती महीनों में नहीं हो पाती, जिससे उनकी जीवित रहने की संभावना कम हो जाती है। इसलिए सरकार द्वारा प्रस्तावित डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम और जवाबदेही तय करने की व्यवस्था को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए गए ड्राफ्ट पर आगे विचार किया जाएगा। आवश्यक सुझावों और संशोधनों के बाद इसे अंतिम रूप दिया जा सकता है। यदि यह नीति लागू होती है तो मध्यप्रदेश उन राज्यों में शामिल हो जाएगा जहां विकास परियोजनाओं के साथ पर्यावरण संरक्षण को कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर अधिक मजबूती देने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 12:36:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पश्चिम बंगाल में सस्टेनेबिलिटी पर जोर, सरकारी दफ्तरों में खर्च कम करने के आदेश जारी</title>
                                    <description><![CDATA[पश्चिम बंगाल सरकार ने सस्टेनेबिलिटी को बढ़ावा देने के लिए दफ्तरों में बिजली, कागज और संसाधनों की खपत कम करने के नए निर्देश जारी किए हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/emphasis-on-sustainability-in-west-bengal-orders-issued-to-reduce/article-53761"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/west-bengal-sustainability-government-order.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार ने सस्टेनेबिलिटी को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। अब सरकारी दफ्तरों में बिजली</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">कागज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और अन्य संसाधनों के उपयोग पर बढ़ती सख्ती लागू होगी। हाल ही में दिए गए आदेशों में यह स्पष्ट किया गया है कि प्रशासनिक स्तर पर अनावश्यक खर्चों को कम करने और कार्य को ज्यादा प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल बनाने पर जोर दिया जाएगा। ये निर्देश कोलकाता समेत सभी विभागों तक पहुंचा दिए गए हैं। बताया जा रहा है कि इस पहल का उद्देश्य सिर्फ खर्चों में कटौती नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सरकारी सिस्टम की दक्षता बढ़ाना भी है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">सूत्रों के मुताबिक</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">कई विभागों में लंबे समय से बिजली की खपत और कागज के अति उपयोग को लेकर चिंता जताई जा रही थी। अब इस आदेश के बाद दफ्तरों में प्रिंटिंग को सीमित करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल फाइलिंग को बढ़ावा देने और बेवजह लाइट-एसी चलाने जैसी आदतों पर रोक लगाने की बात की गई है। आज सुबह से ही दफ्तरों में इस पर हलचल देखने को मिली। कुछ कर्मचारियों का कहना है कि यह बदलाव अचानक आया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन वे मानते हैं कि धीरे-धीरे इसकी आदत पड़ जाएगी। वहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासनिक स्तर पर इसे आवश्यक कदम माना जा रहा है ताकि सरकारी खर्चों पर नियंत्रण रखा जा सके।</span></span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अधिकारियों का कहना है कि पश्चिम बंगाल सस्टेनेबिलिटी अभियान के तहत आने वाले महीनों में और भी कड़े नियम लागू किए जा सकते हैं। खासकर बड़े सरकारी दफ्तरों में एनर्जी ऑडिट कराने की योजना भी बनाई जा रही है। यह भी बताया गया है कि जिन विभागों में संसाधनों की खपत अधिक मिलेगी</span><span style="font-size:12pt;line-height:115%;font-family:Mangal, serif;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां जिम्मेदारी तय की जाएगी। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभी यह सिर्फ एक दिशा-निर्देश के रूप में लागू किया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आगे इसे मॉनिटरिंग सिस्टम से जोड़ा जा सकता है। कुछ कर्मचारियों ने यह भी कहा कि डिजिटल सिस्टम के बढ़ने से काम करना आसान होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इंटरनेट और तकनीकी संसाधनों पर निर्भरता भी बढ़ेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे संभालना जरूरी होगा।</span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्पेशल खबरें</category>
                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 19 May 2026 12:19:28 +0530</pubDate>
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