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                <title>Mahua Moitra - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Mahua Moitra RSS Feed</description>
                
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                <title>ममता के साथ खड़ी हुईं महुआ, बोलीं- वही असली तृणमूल</title>
                                    <description><![CDATA[पार्टी की वैधता, पहचान और जनाधार ममता बनर्जी से जुड़ा; अभिषेक बनर्जी का भी किया बचाव, बीजेपी पर साधा निशाना]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/mahua-stood-with-mamata-and-said-she-is-the/article-55667"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mahua-moitra.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी उथल-पुथल और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर बढ़ती अंदरूनी खींचतान के बीच कृष्णानगर से सांसद महुआ मोइत्रा ने पार्टी नेतृत्व के पक्ष में खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने साफ कहा कि तृणमूल कांग्रेस की असली पहचान, वैधता और राजनीतिक ताकत उसकी संस्थापक ममता बनर्जी से जुड़ी हुई है और कोई भी बागी या अलग गुट खुद को “असली तृणमूल” नहीं कह सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">एक साक्षात्कार के दौरान महुआ मोइत्रा ने पार्टी में चल रहे असंतोष और कुछ नेताओं द्वारा अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिशों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जब तक ममता बनर्जी सक्रिय राजनीति में हैं, तब तक तृणमूल कांग्रेस की असली पहचान उन्हीं के साथ रहेगी। उन्होंने कहा कि पार्टी की स्थापना ममता बनर्जी ने की थी और जनता का जनादेश भी उसी नेतृत्व को मिला है। ऐसे में किसी भी बागी गुट का दावा राजनीतिक रूप से स्वीकार्य नहीं माना जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">महुआ मोइत्रा का यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम बंगाल में बदलते राजनीतिक समीकरणों के कारण तृणमूल कांग्रेस लगातार चुनौतियों का सामना कर रही है। हाल के दिनों में पार्टी के कुछ सांसदों और नेताओं के इस्तीफों ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। विपक्षी दल इन घटनाओं को तृणमूल के कमजोर पड़ते जनाधार से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि पार्टी नेतृत्व इसे अस्थायी राजनीतिक परिस्थितियों का हिस्सा बता रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">महुआ ने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल की पहचान दो प्रमुख आधारों पर टिकी होती है—उसके संस्थापक नेता और चुनाव चिह्न। उनके अनुसार, बागी नेताओं के पास न तो पार्टी का मूल नेतृत्व है और न ही आधिकारिक चुनाव चिह्न, इसलिए वे तृणमूल कांग्रेस की वास्तविक विरासत का दावा नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि पार्टी का आकार छोटा या बड़ा होना अलग बात है, लेकिन इससे उसकी वैधता समाप्त नहीं होती।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने उन दावों को भी खारिज किया जिनमें कुछ नेताओं द्वारा अलग संसदीय समूह बनाने या बड़ी संख्या में सांसदों के समर्थन का दावा किया जा रहा है। महुआ ने संकेत दिया कि ऐसी गतिविधियां राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश हो सकती हैं, लेकिन इससे पार्टी की मूल पहचान प्रभावित नहीं होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">साक्षात्कार के दौरान महुआ मोइत्रा ने तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी का भी बचाव किया। हाल के समय में पार्टी की चुनौतियों और चुनावी झटकों के लिए अभिषेक बनर्जी को जिम्मेदार ठहराने वाली आलोचनाओं पर उन्होंने कहा कि यह एकतरफा दृष्टिकोण है। उनके मुताबिक अभिषेक ने संगठन को मजबूत करने के लिए कई संरचनात्मक बदलाव किए हैं और पार्टी के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।</p>
<p style="text-align:justify;">महुआ ने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल में कठिन समय आने पर नेतृत्व को निशाना बनाना आसान होता है, लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक जटिल होती है। उन्होंने दावा किया कि अभिषेक बनर्जी ने संगठनात्मक स्तर पर जो ढांचा तैयार किया है, उसने पार्टी को मजबूत बनाने में योगदान दिया है। इसलिए उन्हें केवल नकारात्मक दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस दौरान उन्होंने पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती सक्रियता पर भी टिप्पणी की। महुआ ने आरोप लगाया कि राज्य की राजनीति में कुछ नेताओं का मुख्य उद्देश्य अभिषेक बनर्जी को राजनीतिक रूप से कमजोर करना है। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ चल रहे राजनीतिक अभियानों के पीछे व्यक्तिगत और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी काम कर रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> उन्होंने स्पष्ट किया कि विचारधारात्मक स्तर पर वह बीजेपी को अपना प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानती हैं और भविष्य में भी उनकी राजनीति का केंद्र यही रहेगा। उनके अनुसार देश में लोकतांत्रिक मूल्यों और बहुलतावादी सोच की रक्षा के लिए मजबूत विपक्ष की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">महुआ ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस में चाहे जितनी भी चुनौतियां हों, फिर भी यह बीजेपी के खिलाफ संघर्ष का सबसे मजबूत मंच है। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीति में बने रहने का उनका उद्देश्य केवल सत्ता नहीं बल्कि वैचारिक संघर्ष है। इसलिए वे पार्टी छोड़ने या राजनीतिक जीवन से दूर होने की किसी संभावना को नहीं देखतीं।</p>
<p style="text-align:justify;">पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीतिक वापसी को लेकर भी महुआ ने विश्वास जताया। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी एक बार फिर मजबूती हासिल कर सकती है और बंगाल की राजनीति में अपना प्रभाव कायम रख सकती है। उनके मुताबिक पार्टी के कार्यकर्ता और समर्थक अब भी ममता बनर्जी के नेतृत्व पर भरोसा रखते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">महुआ मोइत्रा का यह बयान केवल व्यक्तिगत निष्ठा का प्रदर्शन नहीं बल्कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर एक स्पष्ट संदेश भी है। ऐसे समय में जब पार्टी को अंदरूनी असंतोष और बाहरी राजनीतिक दबाव दोनों का सामना करना पड़ रहा है, वरिष्ठ नेताओं की सार्वजनिक एकजुटता संगठन के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। महुआ मोइत्रा के बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर एक बड़ा वर्ग अब भी ममता बनर्जी के नेतृत्व को ही पार्टी की असली पहचान और भविष्य का आधार मानता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 17:52:46 +0530</pubDate>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट ने SIR को माना वैध, कहा- EC अपने अधिकार क्षेत्र में काम कर रहा</title>
                                    <description><![CDATA[बिहार समेत कई राज्यों में वोटर लिस्ट पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, विपक्षी दलों की याचिकाओं पर फैसला]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/supreme-court-accepted-sir-as-legitimate-and-said-ec-is/article-54283"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/supreme-court-sir-verdict.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) की ओर से कराए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि इसे सिर्फ इसलिए गैरकानूनी नहीं माना जा सकता क्योंकि यह सामान्य प्रक्रिया से अलग है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया ऐसा नहीं कहा जा सकता कि चुनाव आयोग ने अपने संवैधानिक और कानूनी अधिकारों से बाहर जाकर यह प्रक्रिया शुरू की है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी बिहार सहित कई राज्यों में चल रही SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आई। इस मामले में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) समेत कई संगठनों और विपक्षी नेताओं ने याचिकाएं दायर की थीं।</p>
<p style="text-align:justify;">याचिकाकर्ताओं में आरजेडी सांसद मनोज झा, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल, सांसद पप्पू यादव और आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह समेत कई नेता शामिल हैं। उन्होंने चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया को चुनौती देते हुए आरोप लगाया था कि SIR के जरिए बड़ी संख्या में लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी बिहार में चल रही SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। हालांकि कोर्ट ने यह जरूर कहा था कि वह बाद में यह तय करेगा कि चुनाव आयोग को इस तरह का विशेष पुनरीक्षण अभियान चलाने का अधिकार है या नहीं। अब कोर्ट ने साफ संकेत दिए हैं कि आयोग के अधिकार क्षेत्र को लेकर तत्काल कोई असंवैधानिकता नहीं दिखती। कोर्ट के फैसला सुरक्षित रखने के बाद बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। वहीं उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और अन्य राज्यों में यह अभी जारी है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>चुनाव आयोग का पक्ष</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">चुनाव आयोग ने अदालत में SIR का बचाव करते हुए कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना उसका संवैधानिक दायित्व है। आयोग के अनुसार मतदाता सूची को अपडेट रखना और फर्जी या दोहराए गए नाम हटाना जरूरी प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग की ओर से पेश वकीलों ने दलील दी कि SIR के दौरान केवल चुनावी उद्देश्यों के लिए मतदाताओं का सत्यापन किया जा रहा है। यह प्रक्रिया किसी की कानूनी नागरिकता तय करने के लिए नहीं है। आयोग ने कहा कि मतदाता सूची में मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट नामों को हटाना जरूरी था ताकि चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष बनी रहे।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>बिहार में क्या हुआ</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">बिहार में SIR प्रक्रिया 24 जून 2025 को शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य फर्जी, दोहराए गए और स्थानांतरित मतदाताओं की पहचान कर मतदाता सूची को अपडेट करना था। निर्वाचन आयोग ने 1 अक्टूबर 2025 को बिहार की फाइनल वोटर लिस्ट जारी की थी। इसके बाद राज्य में मतदाताओं की संख्या लगभग 6 प्रतिशत घटकर 7.42 करोड़ रह गई। अंतिम सूची से 69.29 लाख नाम हटाए गए, जबकि 21.53 लाख नए मतदाताओं को जोड़ा गया। आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 22.34 लाख मतदाता मृत पाए गए। करीब 36.44 लाख लोग दूसरे स्थानों पर शिफ्ट हो चुके थे, जबकि 6.85 लाख लोगों के नाम दो जगह दर्ज मिले। फाइनल सूची में पटना जिले में मतदाताओं की संख्या बढ़ी, जबकि सारण जिले में बड़ी संख्या में नाम हटे। इससे SIR प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>आधार को लेकर भी निर्देश</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा था कि आधार पहचान का दस्तावेज है, नागरिकता का नहीं। इसके बाद आयोग को निर्देश दिया गया कि आधार को भी मतदाता सत्यापन के लिए मान्य दस्तावेजों की सूची में शामिल किया जाए। पहले बिहार SIR में 11 दस्तावेज मान्य थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद आधार को 12वें दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया गया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 11:52:07 +0530</pubDate>
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