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                <title>Chhattisgarh Food - दैनिक जागरण</title>
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                <title>चिला (Chila) – छत्तीसगढ़ का पारंपरिक चावल से बना स्वादिष्ट और पौष्टिक व्यंजन</title>
                                    <description><![CDATA[देसी स्वाद, सादगी और सेहत का अनोखा मेल—जानिए चिला की रेसिपी, महत्व और पोषण गुण]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/chila-%E2%80%93-a-delicious-and-nutritious-dish-made-from-traditional/article-54368"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/chila-recipe.jpg" alt=""></a><br /><div class="qMYqUG_convSearchResultHighlightRoot">
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<p style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ की समृद्ध खाद्य संस्कृति में चिला एक बेहद लोकप्रिय और पारंपरिक व्यंजन माना जाता है। यह चावल के घोल से बनने वाला पतला और हल्का व्यंजन है, जिसे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बड़े चाव से खाया जाता है। सरल सामग्री, कम लागत और आसान विधि के कारण यह हर घर में बनने वाला आम नाश्ता या हल्का भोजन बन चुका है। आज भी छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में इसे रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा माना जाता है और यह राज्य की पारंपरिक खानपान शैली का महत्वपूर्ण प्रतीक है।</p>
<p style="text-align:justify;">चिला को बनाने के लिए मुख्य रूप से चावल को भिगोकर उसका घोल तैयार किया जाता है। कुछ लोग इसमें उड़द दाल या चना दाल भी मिलाते हैं ताकि इसका स्वाद और पौष्टिकता बढ़ सके। तैयार घोल को तवे पर पतला फैलाकर हल्के तेल में सेंका जाता है, जिससे यह बाहर से हल्का कुरकुरा और अंदर से नरम बन जाता है। इसे तुरंत परोसा जाता है और यह गर्मागर्म खाने पर सबसे ज्यादा स्वादिष्ट लगता है।</p>
<p style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में चिला केवल भोजन नहीं बल्कि एक परंपरा भी है। सुबह के नाश्ते में या शाम की हल्की भूख में इसे बड़े आराम से बनाया और खाया जाता है। खेतों में काम करने वाले लोग इसे ऊर्जा के स्रोत के रूप में उपयोग करते हैं क्योंकि यह हल्का होने के साथ-साथ पेट भरने वाला भोजन है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे बनाने में ज्यादा समय या सामग्री की आवश्यकता नहीं होती, जिससे यह हर वर्ग के लोगों के लिए सुलभ है।</p>
<p style="text-align:justify;">चिला का पोषण मूल्य भी इसे खास बनाता है। चावल से बनने के कारण इसमें कार्बोहाइड्रेट भरपूर मात्रा में होता है, जो शरीर को ऊर्जा देता है। जब इसमें दाल मिलाई जाती है तो यह प्रोटीन का भी अच्छा स्रोत बन जाता है। यह तैलीय और भारी भोजन की तुलना में अधिक हल्का और पचने में आसान होता है। इसलिए इसे बच्चों, बुजुर्गों और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों के लिए भी उपयुक्त माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ की खाद्य परंपरा में चिला का एक सांस्कृतिक महत्व भी है। यह व्यंजन पीढ़ियों से चला आ रहा है और आज भी लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा बना हुआ है। त्योहारों, पारिवारिक मेलजोल और विशेष अवसरों पर भी इसे बड़े प्रेम से बनाया जाता है। ग्रामीण संस्कृति में यह सादगी और देसी जीवनशैली का प्रतीक माना जाता है, जो यह दर्शाता है कि कम संसाधनों में भी स्वादिष्ट भोजन तैयार किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">चिला को आमतौर पर विभिन्न प्रकार की चटनी के साथ परोसा जाता है। हरी धनिया चटनी, टमाटर चटनी या लाल मिर्च की तीखी चटनी इसके स्वाद को और बढ़ा देती हैं। कुछ लोग इसे अचार या दही के साथ भी खाना पसंद करते हैं। इसके साथ इसका स्वाद और भी संतुलित और लाजवाब हो जाता है। यह संयोजन इसे और अधिक लोकप्रिय बनाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज के समय में जब फास्ट फूड का चलन बढ़ रहा है, चिला जैसे पारंपरिक व्यंजन लोगों को स्वस्थ जीवनशैली की ओर वापस लाने में मदद कर रहे हैं। यह न केवल स्वादिष्ट है बल्कि शरीर के लिए भी लाभकारी है। आधुनिक पोषण विशेषज्ञ भी इसे एक हेल्दी ब्रेकफास्ट विकल्प के रूप में देखते हैं। इसकी सादगी और पौष्टिकता इसे हर उम्र के लोगों के लिए उपयुक्त बनाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">कुल मिलाकर चिला छत्तीसगढ़ की पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह व्यंजन न केवल स्वाद में बेहतरीन है बल्कि स्वास्थ्य और परंपरा का भी अद्भुत मेल है। इसकी लोकप्रियता आज भी कम नहीं हुई है और यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण पारंपरिक भोजन बना रहेगा।</p>
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                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 28 May 2026 00:00:16 +0530</pubDate>
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                <title>बफौरी: छत्तीसगढ़ का हेल्दी और स्वादिष्ट पारंपरिक स्नैक</title>
                                    <description><![CDATA[चना दाल से बनने वाली स्टीम्ड बफौरी स्वाद, सेहत और पारंपरिक छत्तीसगढ़ी खानपान का बेहतरीन उदाहरण मानी जाती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/bafouri-healthy-and-delicious-traditional-snack-of-chhattisgarh/article-54298"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/bafauri.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत के हर राज्य की अपनी अलग खानपान संस्कृति है और यही विविधता भारतीय भोजन को खास बनाती है। छत्तीसगढ़ अपने सरल जीवन, लोक संस्कृति और पारंपरिक व्यंजनों के लिए जाना जाता है। यहां के कई व्यंजन स्वास्थ्य और स्वाद का अनोखा मेल माने जाते हैं। इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में एक बेहद लोकप्रिय नाम है बफौरी। यह चना दाल से बनने वाला स्टीम्ड स्नैक है, जिसे छत्तीसगढ़ के लोग बड़े चाव से खाते हैं। स्वादिष्ट होने के साथ-साथ यह पौष्टिक भी होता है, इसलिए आज के समय में हेल्दी फूड पसंद करने वाले लोगों के बीच इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">बफौरी को खास तौर पर छत्तीसगढ़ी पारंपरिक नाश्ते के रूप में जाना जाता है। यह तेल में तला हुआ नहीं होता, बल्कि भाप में पकाया जाता है। यही कारण है कि इसे हेल्दी स्नैक माना जाता है। चना दाल में प्रोटीन भरपूर मात्रा में पाया जाता है, जिससे यह शरीर को ऊर्जा देने का काम करता है। कम तेल और हल्के मसालों के कारण यह बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के लिए अच्छा भोजन माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">बफौरी बनाने की प्रक्रिया काफी आसान होती है, लेकिन इसका स्वाद बेहद खास होता है। इसे बनाने के लिए सबसे पहले चना दाल को कुछ घंटों तक पानी में भिगोया जाता है। इसके बाद दाल को पीसकर उसमें हरी मिर्च, लहसुन, अदरक, धनिया पत्ती, जीरा और हल्के मसाले मिलाए जाते हैं। तैयार मिश्रण को छोटे-छोटे आकार में बनाकर भाप में पकाया जाता है। स्टीम होने के बाद बफौरी नरम और स्वादिष्ट बन जाती है। कई लोग इसे हल्के तड़के के साथ भी परोसते हैं, जिससे इसका स्वाद और बढ़ जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के गांवों में बफौरी को पारंपरिक तरीके से बनाया जाता है। पहले के समय में लोग मिट्टी के बर्तनों और देसी चूल्हों पर इसे पकाते थे। आज भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में वही पुराना स्वाद देखने को मिलता है। यह व्यंजन खासतौर पर सुबह के नाश्ते या शाम की हल्की भूख के दौरान खाया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">बफौरी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह स्वादिष्ट होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद होती है। चना दाल में प्रोटीन, फाइबर और कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं। यह शरीर को ताकत देने के साथ पाचन को भी बेहतर बनाता है। जो लोग वजन कम करना चाहते हैं या हेल्दी डाइट फॉलो करते हैं, उनके लिए बफौरी एक अच्छा विकल्प मानी जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज के दौर में लोग फास्ट फूड की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं, लेकिन इसके कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी बढ़ रही हैं। ऐसे समय में बफौरी जैसे पारंपरिक और पौष्टिक व्यंजन लोगों के लिए बेहतर विकल्प बनकर सामने आ रहे हैं। हेल्थ कॉन्शियस लोग अब तली हुई चीजों की जगह स्टीम्ड फूड को ज्यादा पसंद कर रहे हैं और इसी वजह से बफौरी की लोकप्रियता बढ़ रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के कई शहरों और स्थानीय बाजारों में अब बफौरी आसानी से मिलने लगी है। फूड फेस्टिवल और पारंपरिक व्यंजन मेलों में भी यह खास आकर्षण का केंद्र बनती है। कई रेस्टोरेंट अब इसे अपने मेन्यू में शामिल कर रहे हैं। सोशल मीडिया और फूड ब्लॉग्स के जरिए भी लोग इस पारंपरिक व्यंजन के बारे में जान रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बफौरी को अलग-अलग तरीकों से परोसा जाता है। कुछ लोग इसे हरी चटनी के साथ खाना पसंद करते हैं, जबकि कुछ लोग टमाटर या लहसुन की चटनी के साथ इसका स्वाद लेते हैं। हल्की मसालेदार चाय के साथ बफौरी का स्वाद और भी बेहतर लगता है। कई घरों में इसे त्योहारों और खास अवसरों पर भी बनाया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ की खानपान संस्कृति में सादगी और पौष्टिकता दोनों देखने को मिलती हैं। बफौरी इसी परंपरा का शानदार उदाहरण है। कम मसालों और सरल सामग्री से बनने वाला यह व्यंजन यह साबित करता है कि स्वादिष्ट भोजन के लिए ज्यादा तेल और मसालों की जरूरत नहीं होती।</p>
<p style="text-align:justify;">आज बफौरी सिर्फ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रही, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में भी लोग इसे पसंद करने लगे हैं। हेल्दी और पारंपरिक भारतीय भोजन की बढ़ती मांग के कारण आने वाले समय में यह व्यंजन और ज्यादा लोकप्रिय हो सकता है। बफौरी छत्तीसगढ़ की संस्कृति, परंपरा और स्वास्थ्यवर्धक खानपान का प्रतीक बन चुकी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 12:25:35 +0530</pubDate>
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