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                <title>मई 2026 में प्रदोष व्रत: महत्व, पूजा समय और संपूर्ण विधि</title>
                                    <description><![CDATA[28 मई 2026 को गुरुवार के दिन आने वाला प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने का विशेष अवसर है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/pradosh-vrat-importance-puja-time-and-complete-method-in-may/article-54348"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/pradosh-vrat-2026-(2).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"> </div>
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<p style="text-align:justify;">प्रदोष व्रत हिंदू धर्म में भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित एक अत्यंत पवित्र और फलदायी व्रत माना जाता है, जिसे हर महीने की त्रयोदशी तिथि को शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष दोनों में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। वर्ष 2026 में मई माह का प्रदोष व्रत 28 मई, गुरुवार के दिन पड़ रहा है, जो जेष्ठ माह के शुक्ल पक्ष का महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर माना जा रहा है। इस दिन देशभर के शिवभक्त विशेष रूप से उपवास रखते हैं और संध्या काल में भगवान शिव की आराधना कर उनके आशीर्वाद की प्राप्ति की कामना करते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार प्रदोष काल सूर्यास्त के बाद का वह समय होता है जिसे अत्यंत शुभ और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर माना गया है। मान्यता है कि इसी समय भगवान शिव और माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में होते हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं, इसलिए इस समय की गई पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">28 मई 2026 को प्रदोष व्रत के दिन सूर्यास्त लगभग शाम 07:02 बजे होगा, जिसके तुरंत बाद प्रदोष पूजा का शुभ मुहूर्त प्रारंभ होकर रात 09:11 बजे तक रहेगा। इसी संध्या काल में भक्तजन पूजा-अर्चना करते हैं, दीप प्रज्वलित करते हैं और भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत कथा का श्रवण करते हैं। त्रयोदशी तिथि इस दिन सुबह 07:57 बजे से प्रारंभ होकर अगले दिन 29 मई को सुबह 09:51 बजे तक रहेगी, लेकिन धार्मिक दृष्टि से संध्या काल का समय ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी कारण से भक्त विशेष रूप से सूर्यास्त के बाद शिव पूजा की तैयारी करते हैं और पूरे विधि-विधान के साथ आराधना करते हैं। यह व्रत न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह आत्मसंयम, भक्ति और आध्यात्मिक शुद्धि का भी मार्ग माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रदोष व्रत की पूजा विधि अत्यंत सरल होने के बावजूद गहरी आस्था और शुद्धता की मांग करती है। इस दिन श्रद्धालु प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और दिनभर उपवास का पालन करते हैं। कई भक्त निर्जला व्रत रखते हैं जबकि कुछ फलाहार या सात्विक भोजन का सेवन करते हैं। सूर्यास्त से लगभग एक घंटे पहले पूजा की तैयारी शुरू की जाती है। घर या मंदिर में पूजा स्थल को शुद्ध करके भगवान शिव के साथ माता पार्वती, भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय और नंदी की स्थापना की जाती है। इसके बाद शिवलिंग का अभिषेक दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से किया जाता है। बिल्वपत्र अर्पित करना इस व्रत का सबसे महत्वपूर्ण भाग माना जाता है क्योंकि इसे भगवान शिव को अत्यंत प्रिय बताया गया है। पूजा के दौरान भक्त “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते हैं और कई स्थानों पर महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार उच्चारण भी किया जाता है, जिसे जीवन में स्वास्थ्य, सुरक्षा और दीर्घायु प्रदान करने वाला माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पूजा के पश्चात प्रदोष व्रत कथा का श्रवण या पाठ किया जाता है, जिसमें इस व्रत के महत्व और इसके पालन से मिलने वाले लाभों का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि इस कथा को सुनने और सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करने से सभी प्रकार के पापों का नाश होता है और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। पूजा समाप्त होने के बाद भक्त अपने माथे पर भस्म या चंदन का तिलक लगाते हैं और कलश के पवित्र जल को ग्रहण करते हैं। इसके बाद कई श्रद्धालु शिव मंदिर जाकर दर्शन करते हैं और दीपदान करते हैं, जिसे अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। पूरे वातावरण में भक्ति, मंत्रोच्चार और दीपों की रोशनी से एक आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है, जो श्रद्धालुओं के मन को शांति और संतोष प्रदान करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">धार्मिक ग्रंथों विशेषकर स्कंद पुराण में प्रदोष व्रत का अत्यधिक महत्व बताया गया है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा और नियमों के साथ करता है, उसे भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत न केवल भौतिक सुख-संपत्ति और समृद्धि प्रदान करता है, बल्कि मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का भी माध्यम बनता है। गुरुवार को पड़ने के कारण यह व्रत “गुरुवारा प्रदोष” कहलाता है, जिसे विशेष रूप से ज्ञान, बाधाओं के निवारण और पूर्वजों के आशीर्वाद के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि इस दिन की गई साधना से जीवन की कठिनाइयाँ दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इस प्रकार 28 मई 2026 का प्रदोष व्रत शिवभक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर है, जो आस्था, भक्ति और आत्मिक शुद्धि का संदेश देता है और जीवन में सुख-शांति तथा कल्याण की कामना को पूर्ण करने वाला माना जाता है।</p>
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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 17:07:28 +0530</pubDate>
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