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                <title>Ghazal - दैनिक जागरण</title>
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                <title>बशीर बद्र नहीं रहे, गजल को आम आदमी तक पहुंचाने वाली आवाज थम गई</title>
                                    <description><![CDATA[भोपाल में 91 साल की उम्र में निधन, देशभर के शायरों और साहित्यकारों ने दी श्रद्धांजलि]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/bashir-badr-is-no-more-the-voice-that-brought-ghazal/article-54472"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/bashir-badr.jpg" alt=""></a><br /><p dir="ltr" style="text-align:justify;">मशहूर शायर बशीर बद्र का गुरुवार दोपहर भोपाल स्थित उनके निवास पर निधन हो गया। 91 वर्षीय बशीर बद्र लंबे समय से बीमार चल रहे थे। बताया जा रहा है कि पिछले कुछ वर्षों से उनकी याददाश्त भी काफी कमजोर हो गई थी। दोपहर करीब 12 बजकर 35 मिनट पर उन्होंने आखिरी सांस ली। शाम को भोपाल के बड़ा बाग कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उनके निधन की खबर सामने आते ही साहित्य, शायरी और कला जगत में शोक की लहर फैल गई। देशभर के कवियों, शायरों और साहित्य प्रेमियों ने उन्हें याद करते हुए श्रद्धांजलि दी।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">उर्दू शायरी को मुश्किल अल्फाजों से निकालकर आम आदमी की भाषा बनाने वाले बशीर बद्र उन चुनिंदा शायरों में गिने जाते थे, जिनके शेर सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहे। उनके अशआर लोगों की बातचीत, अखबारों की सुर्खियों, राजनीतिक भाषणों और मोहब्बत की कहानियों तक में शामिल हो गए। “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में…” और “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो…” जैसे शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं। कहा जाता है कि बशीर बद्र की शायरी में दर्द था, लेकिन वह दर्द बहुत सादगी से लोगों के दिल में उतर जाता था।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित बशीर बद्र ने अपने लंबे साहित्यिक सफर में करीब 700 गजलें और नज्में लिखीं। उनके चार हजार से ज्यादा शेर अलग-अलग मंचों और मुशायरों में पढ़े गए। भारत के अलावा पाकिस्तान, अमेरिका और ब्रिटेन तक में उन्होंने मुशायरों में हिस्सा लिया। उनकी लोकप्रियता सिर्फ उर्दू शायरी तक सीमित नहीं रही, हिंदी भाषी लोग भी उन्हें उतना ही पसंद करते थे।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">1987 के मेरठ दंगों का जिक्र किए बिना बशीर बद्र की जिंदगी को समझना अधूरा माना जाता है। उन्हीं दंगों में उनका घर जला दिया गया था। उस आग में सिर्फ मकान नहीं जला था, बल्कि उनकी किताबें, डिग्रियां, बरसों की मेहनत और निजी यादें भी खत्म हो गई थीं। इस हादसे के बाद वे भीतर से काफी टूट गए थे। बाद में उन्होंने भोपाल को अपना ठिकाना बनाया। उसी दर्द से निकला उनका मशहूर शेर “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में” लोगों के दिलों में हमेशा के लिए बस गया।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">मशहूर कवि कुमार विश्वास ने बशीर बद्र के निधन पर गहरा दुख जताया। उन्होंने कहा कि बहुत कम लोग भाषा को बदलते हैं और बशीर बद्र उन्हीं गिने-चुने लोगों में थे। कुमार विश्वास के मुताबिक बशीर साहब ने गजल को ड्रॉइंगरूम से निकालकर आम आदमी की जुबान बना दिया। उन्होंने कहा कि जब भी किसी मुशायरे में बशीर बद्र मौजूद होते थे तो पूरा माहौल अलग हो जाता था। “वे जहां खड़े हो जाते थे, मुशायरा वहीं से बड़ा हो जाता था।” कुमार विश्वास ने उन्हें भारतीय गजल का “गौतम बुद्ध” तक बताया।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">उन्होंने यह भी कहा कि बशीर बद्र ने कठिन बातों को बेहद आसान शब्दों में कहने की कला विकसित की थी। उनके शेरों में दिखावा नहीं होता था, लेकिन हर लाइन सीधे दिल में उतर जाती थी। संसद से लेकर सड़क तक और अखबारों से लेकर मोहब्बत की चिट्ठियों तक उनके शेर मौजूद रहते थे। भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर लिखा उनका मशहूर शेर “दिल मिले या न मिले, हाथ मिलाते रहिए…” दोनों देशों के बीच रिश्तों की भाषा बन गया था।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">प्रसून जोशी ने भी बशीर बद्र को याद करते हुए एक भावुक कविता साझा की। उन्होंने लिखा कि बशीर बद्र सिर्फ शायर नहीं थे, बल्कि लोगों की जिंदगी के एहसासों को शब्द देने वाले इंसान थे। साहित्य जगत के कई लोगों का मानना है कि बशीर बद्र की सबसे बड़ी ताकत उनकी सादगी थी। वे बड़े शायर जरूर थे, लेकिन उनके भीतर कभी बनावटीपन नहीं दिखा। मंच पर भी वे बहुत सहज नजर आते थे।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">भोपाल में रहने के दौरान भी उनका घर साहित्य प्रेमियों और शायरों के लिए खास जगह बना रहा। हालांकि आखिरी वर्षों में बीमारी की वजह से उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूरी बना ली थी। परिवार के करीबी लोगों के मुताबिक उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी। उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र ने लंबे समय तक उनकी देखभाल की। इस बात का जिक्र करते हुए कुमार विश्वास ने कहा कि जिस समर्पण से उन्होंने बशीर साहब की सेवा की, वह आज के समय में कम देखने को मिलता है।बशीर बद्र के जाने के बाद साहित्य जगत में एक बड़ा खालीपन महसूस किया जा रहा है। लेकिन उनके चाहने वालों का कहना है कि कोई शायर तब तक जिंदा रहता है, जब तक उसके शेर लोगों की जिंदगी में मौजूद रहते हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 29 May 2026 13:06:34 +0530</pubDate>
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                <title>बशीर बद्र बोले- मैं शोमैन हूं, एग्जिट भी अपनी शर्तों पर करूंगा</title>
                                    <description><![CDATA[मेरठ दंगों से भोपाल तक का सफर, मोहब्बत और उम्मीद लिखता रहा एक शायर]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/bashir-badr-said-i-am-a-showman-and-i-will/article-54474"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/_bashir-badr.jpg" alt=""></a><br /><p dir="ltr" style="text-align:justify;">ईद के दिन मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके जाने की खबर सामने आते ही अदबी दुनिया में सन्नाटा फैल गया। भोपाल स्थित घर में दोपहर के वक्त उन्होंने आखिरी सांस ली। परिवार के मुताबिक पिछले कई वर्षों से वे डिमेंशिया और बढ़ती उम्र से जुड़ी परेशानियों से जूझ रहे थे। हालत लगातार कमजोर हो रही थी, लेकिन उनके चेहरे की मुस्कान और बात करने का अंदाज आखिर तक वैसा ही रहा। बेटे तैयब बद्र ने नम आंखों से बताया कि बीमारी ने याददाश्त कमजोर कर दी थी, मगर शेर और गजलें जैसे उनकी रूह में बस चुकी थीं। कई बार वे लोगों के नाम भूल जाते थे, लेकिन कोई एक मिसरा पढ़ देता तो पूरा शेर खुद-ब-खुद जुबान पर आ जाता था।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">बशीर बद्र सिर्फ एक शायर नहीं थे, वे उस दौर की आवाज थे जब गजलें लोगों की जिंदगी का हिस्सा हुआ करती थीं। उन्होंने उर्दू शायरी को मुश्किल अल्फाजों से निकालकर आम आदमी तक पहुंचाया। यही वजह रही कि उनके शेर सिर्फ मुशायरों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि राजनीति, कूटनीति और भारत-पाक रिश्तों तक में गूंजते रहे। उनका मशहूर शेर “दुश्मनी जम के करो लेकिन ये गुंजाइश रहे...” आज भी दोनों देशों के रिश्तों की चर्चा में सुनाई दे जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा के दौरान भी उनके अशआर खूब चर्चित हुए थे।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">तैयब बद्र बताते हैं कि उनके पिता ने बहुत पहले ही मुशायरों से दूरी बना ली थी। वे कहा करते थे, “मैं शोमैन हूं और एग्जिट भी अपनी शर्तों पर करूंगा।” यही वजह थी कि उन्होंने अपनी कमजोर हालत को मंच पर कभी दिखने नहीं दिया। पिछले 12-15 सालों से उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाना लगभग बंद कर दिया था। हालांकि घर में कभी-कभी परिवार वाले छोटा सा मुशायरा जैसा माहौल बना देते थे। उस दौरान भी वे अपनी मर्जी से ही कुछ सुनाते थे। अगर मूड हुआ तो देर तक बात करते, नहीं तो चुपचाप बैठे रहते।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">1987 के मेरठ दंगे उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा जख्म बनकर सामने आए थे। दंगों में उनका घर जला दिया गया था। सिर्फ मकान नहीं जला था, बल्कि उनकी किताबें, कागज, गजलें और जिंदगीभर की यादें भी राख हो गई थीं। उस दौर की एक तस्वीर काफी चर्चित हुई थी जिसमें वे हाथ में सूटकेस लिए मुस्कुराते नजर आए थे। तस्वीर के साथ लिखा गया था, “आप घर तोड़ सकते हैं, हौसला नहीं।” असल जिंदगी में भी वे बिल्कुल वैसे ही थे। टूटे जरूर, लेकिन बिखरे नहीं। बाद में उन्होंने भोपाल को अपना ठिकाना बनाया। ईदगाह इलाके में उनका घर लंबे समय तक साहित्य प्रेमियों का अड्डा बना रहा।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">जब वे अपना मशहूर शेर पढ़ते — “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में...” तो सुनने वाले सिर्फ तालियां नहीं बजाते थे, बल्कि उस दर्द को महसूस करते थे जो उन्होंने खुद जिया था। उनके करीबी बताते हैं कि मेरठ दंगों के बाद वे लंबे समय तक अवसाद में रहे। मगर शायरी ने उन्हें संभाला। यही वजह है कि उनकी गजलें मोहब्बत, उम्मीद और इंसानी रिश्तों से भरी नजर आती हैं।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">फिल्मकार विशाल भारद्वाज भी उनके करीबी लोगों में शामिल रहे। बताया जाता है कि मेरठ दंगों में बशीर बद्र की हजारों पंक्तियां जल गई थीं, लेकिन उनमें से कई गजलें विशाल भारद्वाज ने अपनी याददाश्त के सहारे दोबारा लिखकर उन्हें लौटाईं। विशाल उन्हें अपना उस्ताद मानते थे और अक्सर भोपाल जाकर मुलाकात किया करते थे। बाद में वे उन्हें हज यात्रा पर भी लेकर गए।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">बशीर बद्र की जिंदगी संघर्षों से भरी रही। पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी। आर्थिक हालात ऐसे थे कि उन्हें कम उम्र में नौकरी करनी पड़ी। बताया जाता है कि उन्होंने कुछ समय तक कांस्टेबल की नौकरी भी की। दिनभर ड्यूटी और रात में शायरी, यही उनकी जिंदगी बन गई थी। बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह अदब की दुनिया में उतर गए। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और वहीं उनकी शायरी सिलेबस तक में शामिल हो गई।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">मशहूर गजल गायक तलत अजीज ने उन्हें याद करते हुए कहा कि बशीर बद्र सिर्फ उर्दू के शायर नहीं थे, बल्कि पूरे मुल्क की रूह थे। उन्होंने बताया कि बशीर बद्र खतों में अपनी नई गजलें भेजा करते थे। वह दौर ऐसा था जब लोग गजल नहीं, भरोसा भेजते थे। तलत अजीज ने उनकी कई गजलें गाईं और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाया।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">आखिरी दिनों में बीमारी बढ़ गई थी। फिर भी परिवार कहता है कि उनकी आंखों में चमक बाकी थी। शायद इसलिए आज उनके चाहने वाले यही कह रहे हैं कि बशीर बद्र कहीं गए नहीं हैं। वे अपने शेरों में, अपनी आवाज में और लोगों की यादों में हमेशा जिंदा रहेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
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