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                <title>America News - दैनिक जागरण</title>
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                <title>ट्रम्प ने तेल कंपनियों को दी चेतावनी, पेट्रोल के दाम तुरंत घटाने की मांग</title>
                                    <description><![CDATA[कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का हवाला देते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि ग्राहकों से अब भी जरूरत से ज्यादा पैसे वसूले जा रहे हैं। उन्होंने तेल कंपनियों को जल्द कीमतें कम करने की चेतावनी दी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/trump-warns-oil-companies-demands-immediate-reduction-in-petrol-prices/article-57415"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/donald-trump-(6).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिका में पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पेट्रोल बेचने वाली कंपनियों से तुरंत कीमतें कम करने की मांग की है। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट आ चुकी है, लेकिन इसका फायदा आम ग्राहकों तक नहीं पहुंच रहा। ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि जब कच्चा तेल करीब 68 डॉलर प्रति बैरल तक आ गया है, तब भी उपभोक्ताओं से पहले जैसी ऊंची कीमत वसूली जा रही है। उनके मुताबिक यह स्थिति न केवल अनुचित है बल्कि आम लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी डाल रही है। डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने संदेश में कहा कि पेट्रोल की कीमतों में तुरंत कमी की जानी चाहिए ताकि लोग राहत महसूस कर सकें। उन्होंने तेल कंपनियों से अपील की कि पेट्रोल का दाम करीब 2.50 डॉलर प्रति गैलन तक लाया जाए। ट्रम्प का कहना है कि जब उत्पादन लागत और कच्चे तेल की कीमत घट रही है तो खुदरा कीमतों में भी उसी अनुपात में कमी दिखनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं हो रहा है तो इसका मतलब है कि कंपनियां ग्राहकों से जरूरत से ज्यादा पैसे वसूल रही हैं। उन्होंने इस तरह की स्थिति को गलत बताते हुए कंपनियों को जल्द कदम उठाने की सलाह दी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ट्रम्प ने अपने बयान में यह भी कहा कि ग्राहकों से जरूरत से ज्यादा कीमत वसूलना गैरकानूनी है और अगर तेल कंपनियों ने जल्द दाम कम नहीं किए तो उन्हें गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि सरकार इस दिशा में कौन से नए कदम उठा सकती है, लेकिन उन्होंने पहले भी अमेरिकी न्याय विभाग को बड़ी तेल कंपनियों की जांच के निर्देश दिए थे। माना जा रहा है कि यदि कीमतों में जल्द राहत नहीं मिलती है तो प्रशासन की ओर से जांच और निगरानी और सख्त की जा सकती है। पिछले कुछ महीनों में वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। खासतौर पर अमेरिका, इजराइल और ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेज उछाल आया था। उस समय कई देशों में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें भी बढ़ गई थीं। हालांकि अब हालात पहले की तुलना में कुछ सामान्य हुए हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता हुआ है। इसके बावजूद कई इलाकों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अपेक्षित कमी नहीं आई है। यही मुद्दा ट्रम्प ने अपने बयान में उठाया है। पेट्रोल की खुदरा कीमत केवल कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करती। इसमें रिफाइनिंग लागत, परिवहन खर्च, टैक्स, वितरण व्यवस्था और स्थानीय बाजार की स्थिति भी शामिल होती है। कई बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने के बावजूद खुदरा स्तर पर कीमतों में बदलाव आने में कुछ समय लग जाता है। इसके बावजूद यदि लंबे समय तक राहत नहीं मिलती है तो उपभोक्ताओं और सरकार दोनों की ओर से सवाल उठना स्वाभाविक माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमेरिका में ईंधन की कीमतें राजनीतिक मुद्दा भी बन जाती हैं। पेट्रोल और डीजल की कीमतों का सीधा असर आम लोगों की जेब, महंगाई और परिवहन लागत पर पड़ता है। यही वजह है कि सरकारें अक्सर ईंधन की कीमतों को लेकर सार्वजनिक रूप से अपनी राय रखती हैं। ट्रम्प का ताजा बयान भी ऐसे समय आया है जब महंगाई और ऊर्जा लागत को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। ऐसे में तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है कि वे कीमतों की समीक्षा करें और उपभोक्ताओं को राहत देने पर विचार करें। तेल कंपनियों की ओर से ट्रम्प के बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यह भी साफ नहीं है कि आने वाले दिनों में खुदरा पेट्रोल की कीमतों में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा या नहीं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 14:18:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>H-1B वीजा फीस पर ट्रंप प्रशासन को झटका, कोर्ट ने फैसला रद्द किया</title>
                                    <description><![CDATA[अमेरिकी अदालत ने 1 लाख डॉलर फीस बढ़ोतरी को अवैध बताया, भारतीय पेशेवरों और कंपनियों को मिल सकती है बड़ी राहत]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/shock-to-trump-administration-on-h-1b-visa-fees-court-cancels/article-55417"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/h-1b-visa-news.jpg" alt=""></a><br /><p>अमेरिका में काम करने और बसने का सपना देखने वाले हजारों भारतीय पेशेवरों के लिए बड़ी राहत की खबर सामने आई है। अमेरिकी संघीय अदालत ने H-1B वीजा से जुड़े उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसके तहत वीजा आवेदन की फीस को बढ़ाकर एक लाख डॉलर तक कर दिया गया था। यह फैसला ट्रंप प्रशासन की उन नीतियों में शामिल था, जिनका उद्देश्य अमेरिका में विदेशी कर्मचारियों की संख्या को सीमित करना और स्थानीय नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना बताया गया था। लेकिन अब अदालत ने इस फैसले को गैर-कानूनी मानते हुए इसे निरस्त कर दिया है। इस निर्णय को भारतीय आईटी पेशेवरों, इंजीनियरों, डॉक्टरों और उन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो बड़ी संख्या में विदेशी प्रतिभाओं को रोजगार देती हैं।</p>
<p>बोस्टन की डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज लियो सोरोकिन ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि H-1B वीजा फीस में इतनी बड़ी बढ़ोतरी के लिए आवश्यक विधायी मंजूरी नहीं ली गई थी। अदालत का मानना था कि ऐसा कोई भी बड़ा वित्तीय निर्णय कांग्रेस की स्वीकृति के बिना लागू नहीं किया जा सकता। यही वजह रही कि अदालत ने फीस बढ़ाने के आदेश को अवैध करार दिया। इस फैसले के बाद ट्रंप प्रशासन को कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तर पर झटका माना जा रहा है। पिछले साल जारी किए गए आदेश में H-1B वीजा की लागत कई गुना बढ़ाकर एक लाख डॉलर कर दी गई थी, जबकि पहले यह फीस विभिन्न श्रेणियों के आधार पर आमतौर पर दो हजार से पांच हजार डॉलर के बीच होती थी।</p>
<p>यदि यह बढ़ी हुई फीस लागू रहती तो हजारों कंपनियों और विदेशी कर्मचारियों के लिए अमेरिका में नौकरी हासिल करना काफी मुश्किल हो जाता। विशेष रूप से भारतीय पेशेवरों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ता क्योंकि H-1B वीजा का सबसे बड़ा लाभार्थी समुदाय भारतीयों का ही रहा है। हर साल बड़ी संख्या में भारतीय आईटी विशेषज्ञ, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, डेटा वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्र के अन्य पेशेवर इस वीजा के जरिए अमेरिका में रोजगार प्राप्त करते हैं। ऐसे में अदालत के इस फैसले को भारतीय समुदाय के लिए राहत भरा कदम माना जा रहा है।</p>
<p>अमेरिका का H-1B वीजा प्रोग्राम लंबे समय से दुनिया के सबसे लोकप्रिय रोजगार वीजा कार्यक्रमों में शामिल रहा है। इसके तहत हर साल 65,000 नए वीजा जारी किए जाते हैं। इसके अलावा उच्च शिक्षा प्राप्त और विशेष योग्यता रखने वाले आवेदकों के लिए अतिरिक्त 20,000 वीजा भी उपलब्ध होते हैं। यह वीजा आमतौर पर तीन से छह साल तक के लिए दिया जाता है। कई मामलों में यह अमेरिका में स्थायी निवास की दिशा में पहला कदम भी माना जाता है। यही कारण है कि दुनिया भर के कुशल पेशेवर, खासकर भारत से, इस वीजा को बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं।</p>
<p>हालांकि ट्रंप प्रशासन लंबे समय से इस कार्यक्रम की आलोचना करता रहा है। प्रशासन का तर्क रहा है कि विदेशी कर्मचारियों को नौकरी देने से अमेरिकी नागरिकों के रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं। इसी सोच के तहत इमिग्रेशन और वीजा नियमों को लगातार सख्त करने की कोशिश की गई। H-1B फीस बढ़ाने का फैसला भी उसी रणनीति का हिस्सा माना गया था। प्रशासन का कहना था कि ऊंची फीस लगाने से केवल वही कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करेंगी जिन्हें वास्तव में उनकी जरूरत होगी। लेकिन आलोचकों का कहना था कि इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था और तकनीकी क्षेत्र को नुकसान हो सकता है क्योंकि कई उद्योग विदेशी प्रतिभाओं पर निर्भर हैं।</p>
<p>अदालत के फैसले के बावजूद H-1B वीजा को लेकर बहस अभी खत्म नहीं हुई है। हाल ही में रिपब्लिकन सांसद चिप रॉय ने अमेरिकी संसद में एक नया विधेयक पेश किया है, जिसका उद्देश्य H-1B वीजा कार्यक्रम में और बदलाव करना है। प्रस्तावित कानून के तहत इस वीजा को स्थायी निवास का रास्ता बनने से रोकने और कुछ अन्य नियमों को सख्त करने की बात कही गई है। इसके अलावा ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग यानी OPT कार्यक्रम को भी समाप्त करने का प्रस्ताव रखा गया है। यह कार्यक्रम विदेशी छात्रों को पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में काम करने की अनुमति देता है। आने वाले समय में अमेरिका की इमिग्रेशन नीति राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बनी रहेगी। एक ओर उद्योग जगत और तकनीकी कंपनियां कुशल विदेशी कर्मचारियों की आवश्यकता पर जोर देती हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ राजनीतिक समूह अमेरिकी नागरिकों के लिए अधिक रोजगार अवसर सुरक्षित करने की मांग कर रहे हैं। ऐसे में H-1B वीजा से जुड़े नियमों में भविष्य में और बदलाव देखने को मिल सकते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 15:33:53 +0530</pubDate>
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                <title>अमेरिका में ट्रम्प की तस्वीर वाले 250 डॉलर नोट की तैयारी शुरू</title>
                                    <description><![CDATA[150 साल पुराने नियम में बदलाव की कोशिश, कांग्रेस की मंजूरी मिलने पर बनेगा नया इतिहास]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/preparation-of-250-dollar-note-with-trumps-picture-begins-in/article-54506"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/_donald-trump-note.jpg" alt=""></a><br /><p dir="ltr" style="text-align:justify;">अमेरिका में एक बार फिर डोनाल्ड ट्रम्प को लेकर बड़ी राजनीतिक और कानूनी बहस शुरू हो गई है। ट्रम्प प्रशासन अब 250 डॉलर का नया नोट जारी करने की तैयारी कर रहा है, जिस पर डोनाल्ड ट्रम्प की तस्वीर छापी जा सकती है। हालांकि इसके लिए अमेरिका के 150 साल पुराने कानून में बदलाव करना होगा। फिलहाल अमेरिका में ऐसा नियम लागू है जिसके तहत किसी जीवित व्यक्ति की तस्वीर अमेरिकी करेंसी पर नहीं छापी जा सकती। ट्रम्प सरकार अब इसी नियम को बदलने की कोशिश में जुटी हुई है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने व्हाइट हाउस ब्रीफिंग के दौरान इस प्रस्ताव की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि 2026 में अमेरिका अपनी स्थापना के 250 साल पूरे करेगा और इस मौके पर विशेष स्मारक नोट जारी करने का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। बेसेंट के मुताबिक अगर कांग्रेस इस प्रस्ताव को मंजूरी दे देती है तो ट्रम्प अमेरिकी इतिहास में 150 साल से ज्यादा समय बाद ऐसे पहले जीवित व्यक्ति बन जाएंगे जिनकी तस्वीर अमेरिकी नोट पर दिखाई देगी।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि अमेरिकी करेंसी छापने वाली एजेंसी ब्यूरो ऑफ इंग्रेविंग एंड प्रिंटिंग यानी BEP को शुरुआती डिजाइन तैयार करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक प्रस्तावित डिजाइन में ट्रम्प की तस्वीर नोट के बीच में रखी गई है। साथ ही अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ का लोगो और अमेरिकी झंडे के रंग भी शामिल किए जा सकते हैं। हालांकि अभी यह सिर्फ शुरुआती तैयारी मानी जा रही है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">इस प्रस्ताव की शुरुआत पिछले साल रिपब्लिकन सांसद जो विल्सन ने की थी। साउथ कैरोलिना से सांसद विल्सन ने फरवरी 2025 में इस संबंध में एक बिल पेश किया था। इसके बाद बिल को हाउस फाइनेंशियल सर्विसेज कमेटी के पास भेजा गया। अब इसे कानून बनने के लिए अमेरिकी संसद के दोनों सदनों यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और सीनेट से मंजूरी लेनी होगी। उसके बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ही यह प्रस्ताव लागू हो सकेगा।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">ट्रम्प समर्थक इस कदम को अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि ट्रम्प ने अपने कार्यकाल में अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वैश्विक राजनीति में अहम भूमिका निभाई, इसलिए उन्हें इस तरह सम्मान देना गलत नहीं है। दूसरी तरफ विरोधी दल और कुछ कानूनी विशेषज्ञ इसे परंपरा तोड़ने वाला फैसला बता रहे हैं। उनका कहना है कि अमेरिकी करेंसी पर जीवित व्यक्ति की तस्वीर छापने की अनुमति देना भविष्य में व्यक्तिपूजा और राजनीतिक दुरुपयोग का रास्ता खोल सकता है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">दरअसल अमेरिका में 1866 से ऐसा कानून लागू है, जो किसी जीवित व्यक्ति की तस्वीर करेंसी पर छापने की अनुमति नहीं देता। यह नियम उस समय सत्ता के दुरुपयोग को रोकने और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए बनाया गया था। अमेरिकी नोटों पर आमतौर पर पूर्व राष्ट्रपति या ऐतिहासिक हस्तियों की तस्वीरें ही होती हैं। यही वजह है कि ट्रम्प की तस्वीर वाला नोट प्रस्तावित होने के बाद यह मामला केवल आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक बहस का भी विषय बन गया है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">सूत्रों के मुताबिक ट्रम्प ने खुद भी नोट के डिजाइन में रुचि दिखाई है। शुरुआती डिजाइन तैयार करने वाले ब्रिटिश कलाकार इयान एलेक्जेंडर ने दावा किया है कि ट्रम्प ने डिजाइन देखकर कुछ बदलाव सुझाए थे। ट्रम्प चाहते थे कि नोट में अमेरिकी राष्ट्रवाद और 250वीं वर्षगांठ का संदेश साफ दिखाई दे। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">इस बीच अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने मार्च में यह भी घोषणा की थी कि अमेरिकी नोटों पर ट्रम्प के हस्ताक्षर जोड़े जा सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो अमेरिकी इतिहास में पहली बार किसी मौजूदा राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करेंसी पर होंगे। हालांकि इस फैसले को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इससे अमेरिकी करेंसी की पारंपरिक निष्पक्षता पर असर पड़ सकता है।</p>
<p dir="ltr" style="text-align:justify;">नया नोट जारी करने की प्रक्रिया भी आसान नहीं मानी जा रही। ब्यूरो ऑफ इंग्रेविंग एंड प्रिंटिंग के अधिकारियों के मुताबिक किसी नए हाई-वैल्यू नोट को डिजाइन करने, सुरक्षा फीचर तैयार करने, कानूनी मंजूरी लेने और प्रिंटिंग शुरू करने में 6 से 8 साल तक लग सकते हैं। एजेंसी की पूर्व डायरेक्टर पैटी सोलिमेन ने पहले भी कहा था कि अमेरिकी करेंसी से जुड़ा कोई भी बदलाव लंबी तकनीकी और कानूनी प्रक्रिया से गुजरता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 29 May 2026 16:12:56 +0530</pubDate>
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