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                <title>Airline Industry - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Airline Industry RSS Feed</description>
                
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                <title>जेट फ्यूल महंगा होने से हवाई यात्रा पर असर, किराए बढ़ने के संकेत</title>
                                    <description><![CDATA[मैकिंजी की रिपोर्ट में दावा, वैश्विक सप्लाई दबाव और बढ़ती ईंधन लागत के चलते आने वाले महीनों में एयर टिकट 25% तक महंगे हो सकते हैं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/6a3ccd1c3b033/article-56883"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/air-travel-cost.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आने वाले समय में हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों को अपनी जेब कुछ ज्यादा ढीली करनी पड़ सकती है। वैश्विक कंसल्टिंग फर्म मैकिंजी की एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जेट फ्यूल की बढ़ती कीमतों और सप्लाई से जुड़ी चुनौतियों के कारण एयर टिकटों के दाम में 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के कई हिस्सों में जारी भू-राजनीतिक तनाव, रिफाइनरियों की सीमित उत्पादन क्षमता और ईंधन भंडारों को फिर से भरने की कोशिशों ने जेट फ्यूल बाजार पर दबाव बढ़ा दिया है। इसका सीधा असर एयरलाइंस कंपनियों की लागत पर पड़ रहा है और यदि हालात लंबे समय तक बने रहते हैं तो इसका बोझ यात्रियों तक पहुंच सकता है। एविएशन इंडस्ट्री में ईंधन सबसे बड़ा खर्च माना जाता है। आमतौर पर किसी भी हवाई टिकट की कुल कीमत में लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा केवल फ्यूल कॉस्ट का होता है। ऐसे में जेट फ्यूल के दाम बढ़ने का असर एयरलाइंस के परिचालन खर्च पर तुरंत दिखाई देता है। एयरलाइंस कंपनियां लगातार बढ़ती लागत को लंबे समय तक खुद वहन नहीं कर सकतीं, इसलिए अंततः किराए में बढ़ोतरी की संभावना बढ़ जाती है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की कीमतों को लेकर होने वाला हर बदलाव एयर ट्रैवल सेक्टर के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मैकिंजी की रिपोर्ट में ‘क्रैक स्प्रेड’ को भी प्रमुख कारण बताया गया है। क्रैक स्प्रेड वह अंतर होता है जो कच्चे तेल और उससे तैयार होने वाले रिफाइंड उत्पादों की कीमतों के बीच होता है। सामान्य परिस्थितियों में जेट फ्यूल का क्रैक स्प्रेड 20 डॉलर प्रति बैरल या उससे कम रहता है। हालांकि रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2026 के दौरान यह औसतन 50 डॉलर प्रति बैरल से अधिक तक पहुंच सकता है। यदि ऐसा होता है तो एयरलाइंस कंपनियों के लिए ईंधन खरीदना काफी महंगा हो जाएगा और परिचालन लागत में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल सकती है। खाड़ी क्षेत्र और प्रमुख एशियाई देशों से जेट फ्यूल की आपूर्ति में कमी भी बाजार को प्रभावित कर रही है। वैश्विक जेट फ्यूल सप्लाई का बड़ा हिस्सा इन्हीं क्षेत्रों से आता है। हाल के महीनों में कई देशों ने अपने रणनीतिक ईंधन भंडार को सुरक्षित रखने के लिए निर्यात पर सीमित नियंत्रण लगाए हैं। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध आपूर्ति घट गई है। भारत, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की नीतियों का असर भी वैश्विक ईंधन व्यापार पर पड़ता है, क्योंकि ये देश ऊर्जा क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मौजूदा स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि कई बड़ी रिफाइनरियां पहले से ही अपनी अधिकतम क्षमता के करीब काम कर रही हैं। ऐसे में मांग बढ़ने पर उत्पादन को तुरंत बढ़ा पाना आसान नहीं है। सप्लाई और मांग के बीच पैदा हो रहा यह असंतुलन कीमतों को ऊपर बनाए रख सकता है। फिलहाल कई देशों और कंपनियों द्वारा पुराने ईंधन भंडार का इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि बाजार में तत्काल कमी न दिखाई दे, लेकिन यह व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं मानी जा रही। हालांकि बाजार में कुछ राहत के संकेत भी दिखाई दे रहे हैं। पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही सामान्य होने से कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड के दाम हाल के दिनों में नीचे आए हैं, जिससे ऊर्जा क्षेत्र को कुछ राहत मिली है। जानकारों का मानना है कि यदि तेल आपूर्ति सामान्य बनी रहती है और बड़े भू-राजनीतिक संकट नहीं उभरते हैं तो जेट फ्यूल की कीमतों पर दबाव कुछ कम हो सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसके बावजूद विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि केवल कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से पूरी समस्या का समाधान नहीं होगा। जेट फ्यूल की कीमतें केवल क्रूड ऑयल पर निर्भर नहीं करतीं, बल्कि रिफाइनिंग क्षमता, लॉजिस्टिक्स, भंडारण और वैश्विक मांग जैसे कई कारकों से प्रभावित होती हैं। इसलिए निकट भविष्य में कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना बनी हुई है। एयरलाइंस कंपनियां भी बाजार की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और लागत प्रबंधन के लिए अलग-अलग रणनीतियों पर काम कर रही हैं। भारत जैसे तेजी से बढ़ते एविएशन बाजार के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण मानी जा रही है। देश में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में यदि एयर टिकट महंगे होते हैं तो इसका असर पर्यटन, व्यापारिक यात्राओं और आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। खासतौर पर त्योहारी सीजन और छुट्टियों के दौरान यात्रा की योजना बनाने वाले लोगों को अधिक खर्च का सामना करना पड़ सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 12:16:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>इंडिगो को चौथी तिमाही में ₹2,536 करोड़ का घाटा, किराए बढ़ाने के संकेत</title>
                                    <description><![CDATA[महंगे फ्यूल, रुपये की कमजोरी और परिचालन चुनौतियों से बढ़ा दबाव, यात्रियों पर पड़ सकता है अतिरिक्त बोझ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/business/indigos-loss-of-%E2%82%B9-2536-crore-in-the-fourth-quarter/article-54572"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/indigo-q4-loss-2026.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इंडिगो एयरलाइन की पैरेंट कंपनी इंटरग्लोब एविएशन ने वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही के नतीजे जारी कर दिए हैं और इस बार आंकड़ों ने बाजार का ध्यान अपनी ओर खींचा है। देश की सबसे बड़ी एयरलाइन को जनवरी से मार्च 2026 की तिमाही में 2,536 करोड़ रुपए का शुद्ध घाटा हुआ है। पिछले साल इसी अवधि में कंपनी ने 3,068 करोड़ रुपए का मुनाफा दर्ज किया था। एक साल के भीतर मुनाफे से घाटे में पहुंचना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि एविएशन सेक्टर इस समय कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है। हालांकि कंपनी का कुल कारोबार बढ़ा है, लेकिन बढ़ती लागत और बाहरी आर्थिक परिस्थितियों ने मुनाफे की तस्वीर पूरी तरह बदल दी। इंडिगो ने साफ संकेत दिए हैं कि बढ़ती फ्यूल लागत का असर अब यात्रियों की जेब पर भी पड़ सकता है और आने वाले समय में हवाई किरायों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">कंपनी के मुताबिक घाटे की सबसे बड़ी वजह एविएशन टरबाइन फ्यूल यानी एटीएफ की बढ़ती कीमतें रहीं। इसके अलावा भारतीय रुपए में आई कमजोरी ने भी कंपनी के खर्च को बढ़ाया। एयरलाइन उद्योग में विमान लीज, मेंटेनेंस और कई अन्य भुगतान डॉलर में किए जाते हैं, ऐसे में रुपए की गिरावट सीधे लागत बढ़ाती है। इस तिमाही में कंपनी पर लगभग 250 करोड़ रुपए का एकमुश्त शुल्क भी आया, जिससे वित्तीय परिणाम और प्रभावित हुए। इन चुनौतियों के बावजूद इंडिगो का परिचालन राजस्व बढ़कर 22,438 करोड़ रुपए पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की समान तिमाही में 22,152 करोड़ रुपए था। यानी यात्रियों की मांग बनी रही, लेकिन बढ़ती लागत ने कमाई का बड़ा हिस्सा खा लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव का असर पूरी दुनिया के एविएशन सेक्टर पर दिखाई दे रहा है। इंडिगो ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में आई अस्थिरता के कारण जेट फ्यूल महंगा हुआ है। ऐसे हालात में एयरलाइन अब घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों रूटों पर किरायों को समायोजित करने की तैयारी कर रही है। कंपनी का मानना है कि यदि लागत लगातार बढ़ती रही तो उसका कुछ हिस्सा टिकट कीमतों में शामिल करना जरूरी होगा। इसका असर आने वाले महीनों में यात्रियों को महसूस हो सकता है, खासकर व्यस्त यात्रा सीजन के दौरान।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी बीच इंडिगो अब फ्यूल हेजिंग की रणनीति पर भी विचार कर रही है। यह एक ऐसी व्यवस्था होती है जिसके जरिए एयरलाइंस भविष्य की ईंधन कीमतों को पहले से तय करके अचानक बढ़ने वाले खर्च से खुद को बचाने की कोशिश करती हैं। दुनिया की कई बड़ी एयरलाइंस लंबे समय से इस मॉडल का इस्तेमाल कर रही हैं। कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि ईंधन लागत सबसे बड़ा अनिश्चित कारक बनी हुई है और जोखिम कम करने के लिए विभिन्न विकल्पों का अध्ययन किया जा रहा है। यदि यह रणनीति लागू होती है तो भविष्य में कीमतों में अचानक उछाल का असर कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कंपनी ने वित्तीय मोर्चे पर एक और महत्वपूर्ण फैसला लिया है। इंडिगो के बोर्ड ने लगभग 450 मिलियन डॉलर के प्रीपेमेंट को मंजूरी दी है। यह राशि उसकी सहायक कंपनी इंटरग्लोब एविएशन फाइनेंशियल सर्विसेज को दी जाएगी। इस फंड का उपयोग विमान, इंजन और अन्य एविएशन उपकरण खरीदने में किया जाएगा। माना जा रहा है कि इससे कंपनी धीरे-धीरे अपने खुद के एविएशन एसेट्स बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ेगी और लंबे समय में लीज पर निर्भरता कम हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर राहुल भाटिया ने कहा कि बीता वित्त वर्ष बेहद चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन इसके बावजूद कारोबार की बुनियादी स्थिति मजबूत बनी हुई है। उनके अनुसार कंपनी की क्षमता में 9.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई और कुल आय में छह प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई। उन्होंने यह भी कहा कि यदि विदेशी मुद्रा के उतार-चढ़ाव और एकमुश्त खर्चों को अलग कर दिया जाए तो कंपनी ने लगभग 7,500 करोड़ रुपए का लाभ कमाया है। प्रबंधन का दावा है कि इंडिगो की बैलेंस शीट मजबूत है और कंपनी के पास पर्याप्त नकदी उपलब्ध है।</p>
<p style="text-align:justify;">परिचालन आंकड़ों में कुछ कमजोरी भी दिखाई दी है। तिमाही के दौरान यात्रियों की संख्या 1.1 प्रतिशत घटकर 31.6 मिलियन रह गई। प्रति किलोमीटर कमाई यानी यील्ड में भी 2.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई और यह 5.20 रुपए पर आ गई। वहीं पैसेंजर लोड फैक्टर 85.8 प्रतिशत रहा, जो पिछले साल की तुलना में कम है। इसका मतलब है कि उड़ानों में सीटों की भराव क्षमता थोड़ी घटी है। फिर भी एविएशन उद्योग के मानकों के अनुसार यह आंकड़ा अभी भी मजबूत माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">शेयर बाजार में भी नतीजों से पहले दबाव देखने को मिला। इंटरग्लोब एविएशन का शेयर कारोबार के अंत में गिरावट के साथ बंद हुआ। पिछले छह महीनों में शेयर में उल्लेखनीय कमजोरी दर्ज की गई है। हालांकि कंपनी का बाजार पूंजीकरण अब भी 1.71 लाख करोड़ रुपए के आसपास बना हुआ है, जो इसकी मजबूत बाजार स्थिति को दर्शाता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 14:57:02 +0530</pubDate>
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