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                <title>HinduFestival - दैनिक जागरण</title>
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                <title>निर्जला एकादशी पर नर्मदा तटों पर उमड़ी आस्था, 20 हजार श्रद्धालुओं ने किया पवित्र स्नान</title>
                                    <description><![CDATA[अनूपपुर और अमरकंटक क्षेत्र के घाटों पर सुबह से रही भक्तों की भीड़, पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ की सुख-समृद्धि की कामना]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/faith-surged-on-the-banks-of-narmada-on-nirjala-ekadashi/article-56903"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/nirjala-ekadashi.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी पर गुरुवार को अनूपपुर जिले सहित अमरकंटक क्षेत्र के नर्मदा घाटों पर आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला। सुबह सूर्योदय से पहले ही श्रद्धालुओं का घाटों की ओर पहुंचना शुरू हो गया था। दिन चढ़ने के साथ श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती गई और नर्मदा तटों पर धार्मिक वातावरण पूरी तरह से भक्तिमय हो गया। अनुमान है कि दिनभर में 20 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने नर्मदा नदी में स्नान कर पुण्य लाभ अर्जित किया। श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान के बाद मंदिरों में दर्शन किए, पूजा-अर्चना की और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की। निर्जला एकादशी को हिंदू धर्म में विशेष महत्व प्राप्त है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और दान करने से वर्षभर की सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त होता है। यही वजह रही कि अनूपपुर, अमरकंटक और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु नर्मदा तटों पर पहुंचे। कई परिवार सुबह-सुबह ही घाटों पर पहुंच गए थे, जबकि दूरदराज से आने वाले श्रद्धालु देर रात और भोर के समय ही अमरकंटक पहुंचने लगे थे। घाटों पर महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं की अच्छी खासी मौजूदगी देखने को मिली।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमरकंटक स्थित रामघाट, कोटितीर्थ कुंड, पुष्कर बांध, आरंडी संगम और अन्य प्रमुख धार्मिक स्थलों पर पूरे दिन श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहा। घाटों पर स्नान के बाद लोगों ने नर्मदा माता की पूजा की और धार्मिक परंपराओं का पालन किया। कई श्रद्धालु अपने परिवार के साथ पहुंचे थे और उन्होंने सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना की। घाटों पर जगह-जगह भजन, कीर्तन और धार्मिक मंत्रोच्चार सुनाई देते रहे, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। स्थानीय लोगों के अनुसार श्रद्धालु केवल अनूपपुर जिले से ही नहीं बल्कि आसपास के कई जिलों और राज्यों से भी पहुंचे थे। शहडोल, कोतमा, पुष्पराजगढ़, धनपुरी, बुढार और अनूपपुर के अलावा छत्तीसगढ़ के गौरेला, पेंड्रा, मरवाही, कोरबा, बिलासपुर, मुंगेली और लोरमी क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। कुछ श्रद्धालु राजस्थान और उत्तर प्रदेश से भी धार्मिक यात्रा पर आए थे। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं ने नर्मदा उद्गम क्षेत्र के दर्शन कर स्वयं को सौभाग्यशाली बताया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">निर्जला एकादशी के अवसर पर कई श्रद्धालुओं ने व्रत रखकर धार्मिक अनुष्ठान भी किए। नर्मदा स्नान के बाद लोगों ने जप, तप और ध्यान किया। मंदिरों में विशेष पूजन कार्यक्रम आयोजित किए गए थे, जिनमें बड़ी संख्या में भक्त शामिल हुए। कई लोगों ने जरूरतमंदों को दान भी दिया और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पुण्य अर्जित करने का प्रयास किया। धार्मिक आयोजनों के चलते मंदिर परिसरों में दिनभर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही। घाटों पर श्रद्धालुओं की सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन की ओर से विशेष इंतजाम किए गए थे। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस बल की तैनाती की गई थी। प्रमुख घाटों और मंदिर परिसरों में सुरक्षा कर्मी लगातार निगरानी करते रहे। प्रशासनिक अधिकारियों ने भी विभिन्न स्थानों का निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया। घाटों पर लोगों को सुरक्षित स्नान कराने और किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो, इसके लिए विशेष प्रबंध किए गए थे।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">धार्मिक आयोजनों के दौरान स्थानीय व्यापारियों और दुकानदारों को भी अच्छी आमदनी होने की उम्मीद रही। घाटों और मंदिरों के आसपास प्रसाद, पूजन सामग्री, फल और अन्य धार्मिक वस्तुओं की दुकानों पर भी लोगों की भीड़ देखी गई। कई श्रद्धालुओं ने स्थानीय बाजारों से धार्मिक सामग्री खरीदी और पूजा-अर्चना में उसका उपयोग किया। इससे क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन की गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला। हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों की तुलना में इस बार श्रद्धालुओं की संख्या कुछ कम रही। ग्रामीण क्षेत्रों से आए लोगों का मानना है कि वर्तमान समय में खेती-किसानी के काम शुरू होने के कारण कई किसान धार्मिक आयोजनों में शामिल नहीं हो सके। इसके बावजूद नर्मदा तटों पर दिनभर श्रद्धालुओं की अच्छी मौजूदगी बनी रही और धार्मिक उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">निर्जला एकादशी का महत्व केवल व्रत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मसंयम, श्रद्धा और सेवा का भी पर्व माना जाता है। इस दिन किए गए स्नान, दान और पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। यही कारण है कि हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु नर्मदा तटों और मंदिरों में पहुंचकर धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करते हैं। दिनभर चले धार्मिक कार्यक्रमों और पूजा-अर्चना के बाद शाम के समय कई मंदिरों में विशेष आरती का आयोजन किया गया। श्रद्धालुओं ने आरती में शामिल होकर परिवार, समाज और देश की सुख-समृद्धि की कामना की। नर्मदा तटों पर गूंजते भजन और आरती के स्वर देर शाम तक धार्मिक वातावरण को जीवंत बनाए रहे। निर्जला एकादशी के इस पर्व ने एक बार फिर अनूपपुर और अमरकंटक क्षेत्र को आस्था और श्रद्धा के रंग में रंग दिया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 14:40:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>गुरुवार की भस्म आरती में राजा स्वरूप में सजे बाबा महाकाल, उमड़ा श्रद्धा का सैलाब</title>
                                    <description><![CDATA[भांग, ड्रायफ्रूट, रजत आभूषण और सुगंधित पुष्पों से हुआ दिव्य श्रृंगार, भस्म आरती में शामिल होकर श्रद्धालुओं ने प्राप्त किया आशीर्वाद]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/baba-mahakal-dressed-as-a-king-witnessed-a-flood-of/article-55594"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mahakaleshwar-temple.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में गुरुवार तड़के आयोजित भस्म आरती के दौरान बाबा महाकाल का दिव्य और आकर्षक श्रृंगार श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना रहा। सुबह करीब 4 बजे मंदिर के पट खुलते ही धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूजन-अर्चन की प्रक्रिया शुरू हुई। गर्भगृह में विराजित सभी देव प्रतिमाओं का विधि-विधान से पूजन किया गया। इसके बाद भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया और दूध, दही, घी, शक्कर तथा विभिन्न फलों के रस से तैयार पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। मंदिर परिसर में गूंजते मंत्रोच्चार और घंटियों की ध्वनि के बीच श्रद्धालु आध्यात्मिक वातावरण में डूबे नजर आए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रारंभिक धार्मिक अनुष्ठानों के बाद प्रथम घंटा बजाकर भगवान महाकाल को हरि-ओम का जल अर्पित किया गया। कर्पूर आरती के दौरान गर्भगृह का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया। इसके बाद जटाधारी भगवान महाकाल का विशेष श्रृंगार आरंभ हुआ। उनके मस्तक पर रजत चंद्र धारण कराया गया और भांग, चंदन तथा गुलाब के पुष्पों से अलंकरण किया गया। रजत मुकुट और त्रिपुंड के साथ भगवान महाकाल का स्वरूप अत्यंत मनोहारी दिखाई दिया। मंदिर में मौजूद श्रद्धालु इस दिव्य दृश्य को देखकर भावविभोर हो उठे। बताया जाता है कि भस्म आरती के दौरान होने वाला यह श्रृंगार भगवान शिव के महाकाल स्वरूप की विशेष अभिव्यक्ति माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">श्रृंगार पूर्ण होने के बाद ज्योतिर्लिंग को परंपरा अनुसार वस्त्र से ढंककर भस्म रमाई गई। यह प्रक्रिया भस्म आरती का सबसे महत्वपूर्ण और विशेष हिस्सा मानी जाती है। महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की गई। मान्यता है कि भस्म अर्पण के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। इसी विश्वास के कारण देश-दुनिया से बड़ी संख्या में श्रद्धालु भस्म आरती के दर्शन के लिए उज्जैन पहुंचते हैं। गुरुवार को भी मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की अच्छी खासी मौजूदगी देखने को मिली।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भस्म अर्पण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भगवान महाकाल का राजा स्वरूप में विशेष श्रृंगार किया गया। इस दौरान उन्हें भांग, ड्रायफ्रूट्स, रजत आभूषणों और सुगंधित पुष्पों से सजाया गया। भगवान को शेषनाग का रजत मुकुट, रजत मुंडमाला और रुद्राक्ष की मालाएं अर्पित की गईं। गुलाब और अन्य पुष्पों से तैयार विशेष मालाओं ने उनके स्वरूप को और भी आकर्षक बना दिया। गर्भगृह में उपस्थित पुजारियों और सेवकों ने पारंपरिक विधि से श्रृंगार को पूर्ण किया। जैसे-जैसे श्रृंगार आगे बढ़ता गया, श्रद्धालुओं में उत्साह भी बढ़ता गया। कई भक्त हाथ जोड़कर बाबा महाकाल का ध्यान करते दिखाई दिए, जबकि कुछ लोग आरती के दौरान मंत्रोच्चार में शामिल हुए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">श्रृंगार के बाद भगवान महाकाल को फल और मिष्ठान का भोग लगाया गया। मंदिर प्रशासन के अनुसार प्रतिदिन होने वाली भस्म आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं, लेकिन गुरुवार और विशेष पर्वों पर श्रद्धालुओं की संख्या और अधिक बढ़ जाती है। गुरुवार को भी देश के विभिन्न राज्यों से आए भक्तों ने बाबा महाकाल के दर्शन किए और परिवार की सुख-समृद्धि तथा मंगल कामना के लिए प्रार्थना की। मंदिर परिसर में सुरक्षा और दर्शन व्यवस्था को लेकर भी विशेष इंतजाम किए गए थे ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी न हो।</p>
<p style="text-align:justify;">श्री महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि उज्जैन की आध्यात्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हर दिन होने वाली यह आरती भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा और सनातन परंपराओं की जीवंत झलक प्रस्तुत करती है। बाबा महाकाल के राजा स्वरूप के दर्शन करने वाले श्रद्धालु इसे अपने जीवन का सौभाग्य मानते हैं। गुरुवार की भस्म आरती में भी यही दृश्य देखने को मिला, जहां भक्ति, आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम नजर आया और पूरा मंदिर परिसर शिवमय वातावरण में डूबा रहा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 11:51:09 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>कल रखा जाएगा श्री सत्यनारायण व्रत, पूर्णिमा पर पूजा का विशेष महत्व</title>
                                    <description><![CDATA[31 मई को ज्येष्ठ पूर्णिमा के साथ मनाया जाएगा श्री सत्यनारायण व्रत, श्रद्धालु करेंगे भगवान विष्णु की आराधना और कथा श्रवण]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/shri-satyanarayan-vrat-will-be-observed-tomorrow-special-importance-of/article-54624"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/shri-satyanarayan-vrat.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है और जब यह दिन श्री सत्यनारायण व्रत के साथ आता है तो इसकी पवित्रता और भी बढ़ जाती है। इस वर्ष 31 मई 2026, रविवार को ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर श्री सत्यनारायण व्रत रखा जाएगा। देशभर में लाखों श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की पूजा-अर्चना करेंगे और परिवार की सुख-समृद्धि, शांति तथा मंगल की कामना करेंगे।</p>
<p class="isSelectedEnd">धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्री सत्यनारायण व्रत भगवान विष्णु को समर्पित सबसे लोकप्रिय और फलदायी व्रतों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से इस व्रत को करने पर जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और घर में सुख-शांति का वास होता है। यही वजह है कि पूर्णिमा के दिन बड़ी संख्या में लोग अपने घरों और मंदिरों में सत्यनारायण कथा का आयोजन करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि 30 मई को सुबह 11 बजकर 58 मिनट से प्रारंभ होगी और 31 मई को दोपहर 2 बजकर 15 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर 31 मई को व्रत और पूजा की जाएगी। रविवार होने के कारण भी इस बार बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पूजा-पाठ में शामिल होने की संभावना है।</p>
<p class="isSelectedEnd">धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार भगवान सत्यनारायण की पूजा करने से व्यक्ति को जीवन में सफलता, धन, वैभव और मानसिक शांति प्राप्त होती है। कहा जाता है कि जो लोग सच्चे मन से भगवान की आराधना करते हैं, उनके जीवन में आने वाली परेशानियां धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं। इस व्रत का मुख्य संदेश सत्य, श्रद्धा और धर्म के मार्ग पर चलना है।</p>
<p class="isSelectedEnd">व्रत के दिन श्रद्धालु सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और घर के पूजा स्थल को साफ-सुथरा बनाते हैं। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर पूजा की जाती है। पूजा में पंचामृत, तुलसी दल, फल, फूल, नारियल और प्रसाद अर्पित किया जाता है। कई परिवारों में केले के पत्तों और कलश की स्थापना भी की जाती है। इसके बाद श्री सत्यनारायण कथा का पाठ या श्रवण किया जाता है, जिसे इस व्रत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">सत्यनारायण कथा में भगवान विष्णु की महिमा और सत्य के महत्व का वर्णन मिलता है। कथा के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि जीवन में सत्य और धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति अंततः सफलता और सम्मान प्राप्त करता है। कथा सुनने के बाद आरती की जाती है और प्रसाद का वितरण किया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूर्णिमा का दिन आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर माना जाता है। इस दिन किए गए जप, तप, दान और पूजा का विशेष फल मिलता है। इसलिए कई लोग सत्यनारायण व्रत के साथ-साथ दान-पुण्य भी करते हैं। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुएं दान करना शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में सकारात्मकता बढ़ती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">ज्येष्ठ पूर्णिमा पर चंद्रमा अपने पूर्ण स्वरूप में दिखाई देता है। हिंदू मान्यता के अनुसार चंद्रमा मन और भावनाओं का कारक माना जाता है। इसलिए इस दिन चंद्र दर्शन और चंद्र देव को अर्घ्य देने की भी परंपरा है। श्रद्धालु शाम के समय चंद्रमा की पूजा कर मानसिक शांति और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">देश के विभिन्न हिस्सों में सत्यनारायण व्रत अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है। कहीं सामूहिक कथा का आयोजन होता है तो कहीं मंदिरों में विशेष भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम रखे जाते हैं। कई परिवार इस अवसर पर रिश्तेदारों और परिचितों को आमंत्रित कर सामूहिक पूजा का आयोजन करते हैं। धर्माचार्यों के अनुसार सत्यनारायण व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को सत्य, संयम और सेवा की भावना अपनाने की प्रेरणा भी देता है। आधुनिक जीवन की व्यस्तता और तनाव के बीच यह व्रत लोगों को आध्यात्मिक शांति और आत्मिक संतुलन प्रदान करता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इस बार ज्येष्ठ पूर्णिमा और श्री सत्यनारायण व्रत का शुभ संयोग श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। माना जा रहा है कि मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर सुबह से ही भक्तों की भीड़ देखने को मिलेगी। लोग भगवान सत्यनारायण की पूजा कर अपने परिवार के सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्रार्थना करेंगे। धार्मिक दृष्टि से देखा जाए तो 31 मई का दिन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक साधना का अवसर लेकर आ रहा है। ऐसे में श्रद्धालु पूरे उत्साह और आस्था के साथ इस पावन व्रत को मनाने की तैयारी कर रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 09:33:03 +0530</pubDate>
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                <title>संकष्टी चतुर्थी 4 जून को, भगवान गणेश की पूजा से दूर होती हैं बाधाएं</title>
                                    <description><![CDATA[4 जून 2026 को मनाई जाएगी संकष्टी चतुर्थी, चंद्र दर्शन के बाद खुलेगा व्रत, गणपति उपासना का विशेष महत्व]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/6a1adee284235/article-54625"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/sankashti-chaturthi-2026.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनके स्मरण के बिना अधूरी मानी जाती है। ऐसे में संकष्टी चतुर्थी का पर्व भगवान गणेश के भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। जून माह की संकष्टी चतुर्थी 4 जून 2026, गुरुवार को मनाई जाएगी। देशभर में श्रद्धालु इस दिन भगवान गणपति की पूजा-अर्चना करेंगे और सुख, समृद्धि तथा जीवन की बाधाओं को दूर करने की कामना से व्रत रखेंगे।</p>
<p class="isSelectedEnd">धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संकष्टी चतुर्थी हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को आती है। 'संकष्टी' शब्द का अर्थ है संकटों से मुक्ति, जबकि 'चतुर्थी' भगवान गणेश को समर्पित तिथि मानी जाती है। यही कारण है कि इस दिन की गई पूजा को जीवन की परेशानियों और बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और उत्तर भारत के कई हिस्सों में यह पर्व बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">पंचांग के अनुसार जून 2026 की संकष्टी चतुर्थी तिथि 3 जून की रात 9 बजकर 21 मिनट से शुरू होगी और 4 जून की रात 11 बजकर 30 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर व्रत और पूजा 4 जून को की जाएगी। श्रद्धालु पूरे दिन उपवास रखेंगे और चंद्र दर्शन के बाद भगवान गणेश की पूजा कर व्रत का पारण करेंगे।</p>
<p class="isSelectedEnd">संकष्टी चतुर्थी का व्रत कठिन लेकिन अत्यंत फलदायी माना जाता है। कई श्रद्धालु निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। व्रत के दौरान अनाज और सामान्य भोजन का सेवन नहीं किया जाता। साबूदाना खिचड़ी, मूंगफली, फल, दूध और सूखे मेवे जैसे खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाता है। माना जाता है कि संयम और श्रद्धा के साथ रखा गया यह व्रत भगवान गणेश की विशेष कृपा दिलाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">व्रत के दिन सुबह स्नान के बाद भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाकर पूजा की जाती है। शाम के समय विशेष पूजा का आयोजन होता है। गणपति को दूर्वा घास, लाल फूल, सिंदूर और मोदक अर्पित किए जाते हैं। मोदक भगवान गणेश का प्रिय भोग माना जाता है और अधिकांश घरों में विशेष रूप से तैयार किया जाता है। पूजा के दौरान गणेश मंत्रों का जाप और आरती की जाती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">धार्मिक परंपरा के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दर्शन के बिना पूर्ण नहीं माना जाता। शाम को चंद्रमा निकलने के बाद श्रद्धालु चंद्र देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं। जल, अक्षत, चंदन और फूल चढ़ाकर चंद्रमा की पूजा की जाती है। इसके बाद भगवान गणेश की आरती कर व्रत खोला जाता है। मान्यता है कि इस विधि से पूजा करने पर जीवन के संकट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">संकष्टी चतुर्थी से जुड़ी कई धार्मिक कथाएं भी प्रचलित हैं। इनमें बताया गया है कि भगवान गणेश अपने भक्तों के कष्ट हरते हैं और उन्हें सफलता का मार्ग दिखाते हैं। इसलिए विद्यार्थी, नौकरीपेशा लोग, व्यापारी और परिवार की खुशहाली की कामना करने वाले श्रद्धालु इस व्रत को विशेष श्रद्धा से करते हैं। कई निःसंतान दंपति भी संतान प्राप्ति की इच्छा से यह व्रत रखते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">धर्माचार्यों के अनुसार इस दिन गणेश अष्टोत्तर शतनाम, संकट नाशन स्तोत्र और "वक्रतुंड महाकाय" मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। गणेश पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों के पाठ का भी विशेष महत्व बताया गया है। कई मंदिरों में सामूहिक पूजा, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">महाराष्ट्र में संकष्टी चतुर्थी का उत्साह सबसे अधिक देखने को मिलता है। मुंबई, पुणे, नागपुर और अन्य शहरों के प्रमुख गणेश मंदिरों में भक्तों की लंबी कतारें लगती हैं। दक्षिण भारत में इसे संकटहारा चतुर्थी के नाम से जाना जाता है और वहां भी गणपति मंदिरों में विशेष पूजा होती है। हालांकि अब देशभर में इस पर्व की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd">धार्मिक मान्यता है कि नियमित रूप से संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने वाले व्यक्ति के जीवन में आने वाली परेशानियां कम होती हैं और उसे मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मसंयम, धैर्य और सकारात्मक सोच का संदेश भी देता है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में यह दिन लोगों को आध्यात्मिक रूप से खुद से जुड़ने का अवसर देता है।</p>
<p>4 जून को आने वाली संकष्टी चतुर्थी को लेकर मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर तैयारियां शुरू हो गई हैं। श्रद्धालु भगवान गणेश की पूजा कर परिवार के सुख, समृद्धि और सफलता की कामना करेंगे। माना जाता है कि सच्चे मन से किए गए गणेश पूजन से जीवन के बड़े से बड़े संकट भी दूर हो सकते हैं और व्यक्ति को नई ऊर्जा तथा आत्मविश्वास प्राप्त होता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 09:32:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जून में कालाष्टमी 8 जून को, भगवान काल भैरव की आराधना का विशेष महत्व</title>
                                    <description><![CDATA[कृष्ण पक्ष अष्टमी पर रखा जाएगा कालाष्टमी व्रत, भक्त करेंगे काल भैरव पूजा और रात्रि जागरण]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/kalashtami-in-june-special-importance-of-worshiping-lord-kaal-bhairav/article-54627"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/kalashtami-2026.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हिंदू धर्म में भगवान काल भैरव को भगवान शिव का रौद्र और शक्तिशाली स्वरूप माना जाता है। प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी या मासिक कालाष्टमी का व्रत रखा जाता है। जून 2026 की कालाष्टमी 8 जून, सोमवार को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान काल भैरव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और भक्त पूरे दिन व्रत रखकर उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि कालाष्टमी पर श्रद्धापूर्वक पूजा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा मिलती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि 8 जून को सुबह 3 बजकर 25 मिनट से शुरू होगी और 9 जून को सुबह 3 बजकर 24 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर कालाष्टमी का व्रत और पूजा 8 जून को की जाएगी। देशभर के शिव और भैरव मंदिरों में इस अवसर पर विशेष धार्मिक आयोजन किए जाएंगे। कई स्थानों पर भजन-कीर्तन, हवन और रात्रि जागरण का भी आयोजन होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">धार्मिक ग्रंथों में काल भैरव को समय का देवता बताया गया है। ‘काल’ का अर्थ समय और ‘भैरव’ भगवान शिव के उस स्वरूप को कहा जाता है जो धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए प्रकट हुआ। मान्यता है कि भगवान भैरव अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें भय, संकट तथा नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त करते हैं। यही कारण है कि कालाष्टमी का दिन विशेष रूप से शिव भक्तों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करने के बाद भक्त भगवान काल भैरव की पूजा का संकल्प लेते हैं। पूजा में दीपक, धूप, फूल, बेलपत्र, चंदन और प्रसाद अर्पित किया जाता है। कई श्रद्धालु दिनभर निर्जला या फलाहार व्रत रखते हैं। माना जाता है कि सच्चे मन और पूर्ण श्रद्धा से रखा गया यह व्रत विशेष फल प्रदान करता है। शाम के समय मंदिरों में भक्तों की भीड़ बढ़ जाती है और विशेष आरती का आयोजन किया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कालाष्टमी के दिन काल भैरव कथा और भैरव मंत्रों के जाप का भी विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन "ॐ काल भैरवाय नमः" मंत्र का जाप करने से व्यक्ति को मानसिक शक्ति और आत्मविश्वास प्राप्त होता है। कई श्रद्धालु भगवान शिव और काल भैरव से जुड़े स्तोत्रों का पाठ भी करते हैं। माना जाता है कि इससे जीवन में चल रही परेशानियों से राहत मिलती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कालाष्टमी से जुड़ी एक प्रमुख मान्यता भगवान शिव और ब्रह्मा के प्रसंग से संबंधित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। इसी दौरान भगवान शिव ने क्रोधित होकर काल भैरव का स्वरूप धारण किया। इसके बाद से काल भैरव को न्याय और धर्म की रक्षा करने वाला देवता माना जाने लगा। श्रद्धालु इस कथा को सुनते और पढ़ते हैं तथा भगवान भैरव का स्मरण करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस दिन पितरों की शांति के लिए भी पूजा और तर्पण करने की परंपरा है। कई लोग अपने पूर्वजों की स्मृति में दान-पुण्य करते हैं और ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं। धार्मिक मान्यता है कि ऐसा करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। वाराणसी, उज्जैन और अन्य प्रमुख तीर्थ स्थलों में इस अवसर पर विशेष धार्मिक गतिविधियां देखने को मिलती हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कालाष्टमी का एक और महत्वपूर्ण पहलू कुत्तों को भोजन कराना माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार काला कुत्ता भगवान काल भैरव का वाहन माना जाता है। इसलिए इस दिन श्रद्धालु कुत्तों को दूध, रोटी, मिठाई और अन्य खाद्य पदार्थ खिलाते हैं। इसे पुण्यदायी कार्य माना जाता है और विश्वास किया जाता है कि इससे भगवान भैरव प्रसन्न होते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उज्जैन स्थित काल भैरव मंदिर, वाराणसी का काल भैरव धाम और देश के अन्य प्रसिद्ध भैरव मंदिरों में इस दिन विशेष भीड़ उमड़ती है। श्रद्धालु दूर-दूर से यहां दर्शन करने पहुंचते हैं। कई लोग पूरी रात जागकर भगवान भैरव के भजन सुनते हैं और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। वातावरण पूरी तरह भक्ति और श्रद्धा से भर जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">धर्माचार्यों के अनुसार कालाष्टमी केवल पूजा और व्रत का दिन नहीं है, बल्कि आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना का भी अवसर है। यह दिन व्यक्ति को अपने भीतर के भय, क्रोध और नकारात्मक विचारों पर विजय पाने की प्रेरणा देता है। भगवान काल भैरव की उपासना को साहस, अनुशासन और आत्मबल का प्रतीक माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">8 जून को आने वाली मासिक कालाष्टमी को लेकर भक्तों में उत्साह देखा जा रहा है। मंदिरों में तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और श्रद्धालु व्रत एवं पूजा की योजना बना रहे हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान काल भैरव की आराधना करने से जीवन के कष्ट कम होते हैं, बाधाएं दूर होती हैं और व्यक्ति को सुख, समृद्धि तथा सफलता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
                                            <category>धर्म</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 09:32:43 +0530</pubDate>
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                <title>ज्येष्ठ पूर्णिमा कल: वट पूर्णिमा व्रत, कबीर जयंती और विशेष पूजा का शुभ संयोग</title>
                                    <description><![CDATA[31 मई को मनाई जाएगी ज्येष्ठ पूर्णिमा, देशभर में श्रद्धालु करेंगे व्रत, दान-पुण्य और भगवान विष्णु की आराधना]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/jyeshtha-purnima-tomorrow-vat-purnima-fast-auspicious-combination-of-kabir/article-54623"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/jyeshtha-purnima-2026.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि को बेहद शुभ और पुण्यदायी माना जाता है। इस वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा 31 मई 2026, रविवार को पड़ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत, पूजा-पाठ, दान और आध्यात्मिक साधना का विशेष महत्व होता है। ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को कई महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजनों और पर्वों के साथ जोड़ा जाता है। इस बार ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर वट पूर्णिमा व्रत, कबीर जयंती और देव स्नान पूर्णिमा भी मनाई जाएगी। ऐसे में यह दिन धार्मिक दृष्टि से और भी खास माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पंचांग के अनुसार पूर्णिमा तिथि 30 मई को सुबह 11 बजकर 58 मिनट से शुरू होगी और 31 मई को दोपहर 2 बजकर 15 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर 31 मई को पूर्णिमा व्रत और पूजा का विधान किया जाएगा। देशभर के मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस दिन उपवास रखकर भगवान विष्णु, भगवान सत्यनारायण और चंद्र देव की पूजा करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">ज्येष्ठ पूर्णिमा को आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का दिन माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किए गए दान-पुण्य और पूजा-पाठ का कई गुना फल प्राप्त होता है। विशेष रूप से भगवान सत्यनारायण की पूजा करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कई घरों में इस अवसर पर सत्यनारायण कथा का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें परिवार और आसपास के लोग शामिल होकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस दिन वट पूर्णिमा व्रत का भी विशेष महत्व है। खासकर विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से वट वृक्ष की पूजा करती हैं। महिलाएं बरगद के पेड़ के चारों ओर धागा बांधकर पूजा-अर्चना करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और आज भी देश के कई राज्यों में बड़े श्रद्धाभाव के साथ निभाई जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">ज्येष्ठ पूर्णिमा पर संत कबीरदास की जयंती भी मनाई जाती है। कबीरदास भारतीय संत परंपरा के प्रमुख कवि और समाज सुधारक माने जाते हैं। उनके दोहे और विचार आज भी समाज को सादगी, समानता और मानवता का संदेश देते हैं। इस अवसर पर देशभर में कबीर पंथ से जुड़े आश्रमों और संस्थानों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। उनके जीवन और शिक्षाओं को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी दिन देव स्नान पूर्णिमा का पर्व भी मनाया जाएगा। यह पर्व विशेष रूप से ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर में महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का विशेष स्नान कराया जाता है। इसके बाद भगवान कुछ दिनों के लिए दर्शन नहीं देते और फिर रथ यात्रा के दौरान भक्तों को दर्शन होते हैं। इस परंपरा को देखने के लिए हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पूर्णिमा का संबंध चंद्रमा से भी माना जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार चंद्रमा मन और भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए पूर्णिमा की रात चंद्र दर्शन और चंद्र देव को अर्घ्य देने की परंपरा है। माना जाता है कि इससे मानसिक शांति, सकारात्मक सोच और जीवन में संतुलन बना रहता है। कई श्रद्धालु शाम के समय चंद्रमा को जल अर्पित कर विशेष प्रार्थना करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">धार्मिक ग्रंथों में पूर्णिमा के दिन दान का विशेष महत्व बताया गया है। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र, अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। कई लोग इस दिन गौ सेवा, गरीबों को भोजन वितरण और धार्मिक संस्थाओं में सहयोग भी करते हैं। मान्यता है कि ऐसे कार्यों से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि बढ़ती है और नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">व्रत रखने वाले श्रद्धालु आमतौर पर फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। इस दिन मांसाहार, तामसिक भोजन और नकारात्मक विचारों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। कई लोग दिनभर उपवास रखने के बाद शाम को पूजा और चंद्र दर्शन के पश्चात व्रत खोलते हैं। साथ ही विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता और अन्य धार्मिक ग्रंथों का पाठ भी किया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">धार्मिक जानकारों का कहना है कि पूर्णिमा का समय ध्यान और साधना के लिए भी अनुकूल माना जाता है। पूर्ण चंद्रमा की ऊर्जा मन को स्थिर करने और आत्मचिंतन में सहायता करती है। यही वजह है कि कई साधक और आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले लोग इस दिन विशेष ध्यान और जप करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ज्येष्ठ पूर्णिमा 2026 केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि श्रद्धा, सेवा, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक जागरूकता का अवसर भी है। वट पूर्णिमा, कबीर जयंती और देव स्नान पूर्णिमा जैसे महत्वपूर्ण पर्वों के एक साथ पड़ने से इस दिन का महत्व और बढ़ गया है। ऐसे में देशभर के श्रद्धालु पूरे उत्साह और आस्था के साथ इस शुभ अवसर को मनाने की तैयारी कर रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 09:32:36 +0530</pubDate>
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