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                <title>ReligiousNews - दैनिक जागरण</title>
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                <title>निर्जला एकादशी पर नर्मदा तटों पर उमड़ी आस्था, 20 हजार श्रद्धालुओं ने किया पवित्र स्नान</title>
                                    <description><![CDATA[अनूपपुर और अमरकंटक क्षेत्र के घाटों पर सुबह से रही भक्तों की भीड़, पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ की सुख-समृद्धि की कामना]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/faith-surged-on-the-banks-of-narmada-on-nirjala-ekadashi/article-56903"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/nirjala-ekadashi.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी पर गुरुवार को अनूपपुर जिले सहित अमरकंटक क्षेत्र के नर्मदा घाटों पर आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला। सुबह सूर्योदय से पहले ही श्रद्धालुओं का घाटों की ओर पहुंचना शुरू हो गया था। दिन चढ़ने के साथ श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती गई और नर्मदा तटों पर धार्मिक वातावरण पूरी तरह से भक्तिमय हो गया। अनुमान है कि दिनभर में 20 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने नर्मदा नदी में स्नान कर पुण्य लाभ अर्जित किया। श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान के बाद मंदिरों में दर्शन किए, पूजा-अर्चना की और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की। निर्जला एकादशी को हिंदू धर्म में विशेष महत्व प्राप्त है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और दान करने से वर्षभर की सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त होता है। यही वजह रही कि अनूपपुर, अमरकंटक और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु नर्मदा तटों पर पहुंचे। कई परिवार सुबह-सुबह ही घाटों पर पहुंच गए थे, जबकि दूरदराज से आने वाले श्रद्धालु देर रात और भोर के समय ही अमरकंटक पहुंचने लगे थे। घाटों पर महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं की अच्छी खासी मौजूदगी देखने को मिली।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अमरकंटक स्थित रामघाट, कोटितीर्थ कुंड, पुष्कर बांध, आरंडी संगम और अन्य प्रमुख धार्मिक स्थलों पर पूरे दिन श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहा। घाटों पर स्नान के बाद लोगों ने नर्मदा माता की पूजा की और धार्मिक परंपराओं का पालन किया। कई श्रद्धालु अपने परिवार के साथ पहुंचे थे और उन्होंने सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना की। घाटों पर जगह-जगह भजन, कीर्तन और धार्मिक मंत्रोच्चार सुनाई देते रहे, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। स्थानीय लोगों के अनुसार श्रद्धालु केवल अनूपपुर जिले से ही नहीं बल्कि आसपास के कई जिलों और राज्यों से भी पहुंचे थे। शहडोल, कोतमा, पुष्पराजगढ़, धनपुरी, बुढार और अनूपपुर के अलावा छत्तीसगढ़ के गौरेला, पेंड्रा, मरवाही, कोरबा, बिलासपुर, मुंगेली और लोरमी क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। कुछ श्रद्धालु राजस्थान और उत्तर प्रदेश से भी धार्मिक यात्रा पर आए थे। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं ने नर्मदा उद्गम क्षेत्र के दर्शन कर स्वयं को सौभाग्यशाली बताया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">निर्जला एकादशी के अवसर पर कई श्रद्धालुओं ने व्रत रखकर धार्मिक अनुष्ठान भी किए। नर्मदा स्नान के बाद लोगों ने जप, तप और ध्यान किया। मंदिरों में विशेष पूजन कार्यक्रम आयोजित किए गए थे, जिनमें बड़ी संख्या में भक्त शामिल हुए। कई लोगों ने जरूरतमंदों को दान भी दिया और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पुण्य अर्जित करने का प्रयास किया। धार्मिक आयोजनों के चलते मंदिर परिसरों में दिनभर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही। घाटों पर श्रद्धालुओं की सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन की ओर से विशेष इंतजाम किए गए थे। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस बल की तैनाती की गई थी। प्रमुख घाटों और मंदिर परिसरों में सुरक्षा कर्मी लगातार निगरानी करते रहे। प्रशासनिक अधिकारियों ने भी विभिन्न स्थानों का निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया। घाटों पर लोगों को सुरक्षित स्नान कराने और किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो, इसके लिए विशेष प्रबंध किए गए थे।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">धार्मिक आयोजनों के दौरान स्थानीय व्यापारियों और दुकानदारों को भी अच्छी आमदनी होने की उम्मीद रही। घाटों और मंदिरों के आसपास प्रसाद, पूजन सामग्री, फल और अन्य धार्मिक वस्तुओं की दुकानों पर भी लोगों की भीड़ देखी गई। कई श्रद्धालुओं ने स्थानीय बाजारों से धार्मिक सामग्री खरीदी और पूजा-अर्चना में उसका उपयोग किया। इससे क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन की गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला। हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों की तुलना में इस बार श्रद्धालुओं की संख्या कुछ कम रही। ग्रामीण क्षेत्रों से आए लोगों का मानना है कि वर्तमान समय में खेती-किसानी के काम शुरू होने के कारण कई किसान धार्मिक आयोजनों में शामिल नहीं हो सके। इसके बावजूद नर्मदा तटों पर दिनभर श्रद्धालुओं की अच्छी मौजूदगी बनी रही और धार्मिक उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">निर्जला एकादशी का महत्व केवल व्रत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मसंयम, श्रद्धा और सेवा का भी पर्व माना जाता है। इस दिन किए गए स्नान, दान और पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। यही कारण है कि हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु नर्मदा तटों और मंदिरों में पहुंचकर धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करते हैं। दिनभर चले धार्मिक कार्यक्रमों और पूजा-अर्चना के बाद शाम के समय कई मंदिरों में विशेष आरती का आयोजन किया गया। श्रद्धालुओं ने आरती में शामिल होकर परिवार, समाज और देश की सुख-समृद्धि की कामना की। नर्मदा तटों पर गूंजते भजन और आरती के स्वर देर शाम तक धार्मिक वातावरण को जीवंत बनाए रहे। निर्जला एकादशी के इस पर्व ने एक बार फिर अनूपपुर और अमरकंटक क्षेत्र को आस्था और श्रद्धा के रंग में रंग दिया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 14:40:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>गुरुवार की भस्म आरती में राजा स्वरूप में सजे बाबा महाकाल, उमड़ा श्रद्धा का सैलाब</title>
                                    <description><![CDATA[भांग, ड्रायफ्रूट, रजत आभूषण और सुगंधित पुष्पों से हुआ दिव्य श्रृंगार, भस्म आरती में शामिल होकर श्रद्धालुओं ने प्राप्त किया आशीर्वाद]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/baba-mahakal-dressed-as-a-king-witnessed-a-flood-of/article-55594"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/mahakaleshwar-temple.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में गुरुवार तड़के आयोजित भस्म आरती के दौरान बाबा महाकाल का दिव्य और आकर्षक श्रृंगार श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना रहा। सुबह करीब 4 बजे मंदिर के पट खुलते ही धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूजन-अर्चन की प्रक्रिया शुरू हुई। गर्भगृह में विराजित सभी देव प्रतिमाओं का विधि-विधान से पूजन किया गया। इसके बाद भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया और दूध, दही, घी, शक्कर तथा विभिन्न फलों के रस से तैयार पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। मंदिर परिसर में गूंजते मंत्रोच्चार और घंटियों की ध्वनि के बीच श्रद्धालु आध्यात्मिक वातावरण में डूबे नजर आए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">प्रारंभिक धार्मिक अनुष्ठानों के बाद प्रथम घंटा बजाकर भगवान महाकाल को हरि-ओम का जल अर्पित किया गया। कर्पूर आरती के दौरान गर्भगृह का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया। इसके बाद जटाधारी भगवान महाकाल का विशेष श्रृंगार आरंभ हुआ। उनके मस्तक पर रजत चंद्र धारण कराया गया और भांग, चंदन तथा गुलाब के पुष्पों से अलंकरण किया गया। रजत मुकुट और त्रिपुंड के साथ भगवान महाकाल का स्वरूप अत्यंत मनोहारी दिखाई दिया। मंदिर में मौजूद श्रद्धालु इस दिव्य दृश्य को देखकर भावविभोर हो उठे। बताया जाता है कि भस्म आरती के दौरान होने वाला यह श्रृंगार भगवान शिव के महाकाल स्वरूप की विशेष अभिव्यक्ति माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">श्रृंगार पूर्ण होने के बाद ज्योतिर्लिंग को परंपरा अनुसार वस्त्र से ढंककर भस्म रमाई गई। यह प्रक्रिया भस्म आरती का सबसे महत्वपूर्ण और विशेष हिस्सा मानी जाती है। महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की गई। मान्यता है कि भस्म अर्पण के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। इसी विश्वास के कारण देश-दुनिया से बड़ी संख्या में श्रद्धालु भस्म आरती के दर्शन के लिए उज्जैन पहुंचते हैं। गुरुवार को भी मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की अच्छी खासी मौजूदगी देखने को मिली।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">भस्म अर्पण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भगवान महाकाल का राजा स्वरूप में विशेष श्रृंगार किया गया। इस दौरान उन्हें भांग, ड्रायफ्रूट्स, रजत आभूषणों और सुगंधित पुष्पों से सजाया गया। भगवान को शेषनाग का रजत मुकुट, रजत मुंडमाला और रुद्राक्ष की मालाएं अर्पित की गईं। गुलाब और अन्य पुष्पों से तैयार विशेष मालाओं ने उनके स्वरूप को और भी आकर्षक बना दिया। गर्भगृह में उपस्थित पुजारियों और सेवकों ने पारंपरिक विधि से श्रृंगार को पूर्ण किया। जैसे-जैसे श्रृंगार आगे बढ़ता गया, श्रद्धालुओं में उत्साह भी बढ़ता गया। कई भक्त हाथ जोड़कर बाबा महाकाल का ध्यान करते दिखाई दिए, जबकि कुछ लोग आरती के दौरान मंत्रोच्चार में शामिल हुए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">श्रृंगार के बाद भगवान महाकाल को फल और मिष्ठान का भोग लगाया गया। मंदिर प्रशासन के अनुसार प्रतिदिन होने वाली भस्म आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं, लेकिन गुरुवार और विशेष पर्वों पर श्रद्धालुओं की संख्या और अधिक बढ़ जाती है। गुरुवार को भी देश के विभिन्न राज्यों से आए भक्तों ने बाबा महाकाल के दर्शन किए और परिवार की सुख-समृद्धि तथा मंगल कामना के लिए प्रार्थना की। मंदिर परिसर में सुरक्षा और दर्शन व्यवस्था को लेकर भी विशेष इंतजाम किए गए थे ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी न हो।</p>
<p style="text-align:justify;">श्री महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि उज्जैन की आध्यात्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हर दिन होने वाली यह आरती भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा और सनातन परंपराओं की जीवंत झलक प्रस्तुत करती है। बाबा महाकाल के राजा स्वरूप के दर्शन करने वाले श्रद्धालु इसे अपने जीवन का सौभाग्य मानते हैं। गुरुवार की भस्म आरती में भी यही दृश्य देखने को मिला, जहां भक्ति, आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम नजर आया और पूरा मंदिर परिसर शिवमय वातावरण में डूबा रहा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 11:51:09 +0530</pubDate>
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                <title>जून में कालाष्टमी 8 जून को, भगवान काल भैरव की आराधना का विशेष महत्व</title>
                                    <description><![CDATA[कृष्ण पक्ष अष्टमी पर रखा जाएगा कालाष्टमी व्रत, भक्त करेंगे काल भैरव पूजा और रात्रि जागरण]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/religion/kalashtami-in-june-special-importance-of-worshiping-lord-kaal-bhairav/article-54627"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/kalashtami-2026.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हिंदू धर्म में भगवान काल भैरव को भगवान शिव का रौद्र और शक्तिशाली स्वरूप माना जाता है। प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी या मासिक कालाष्टमी का व्रत रखा जाता है। जून 2026 की कालाष्टमी 8 जून, सोमवार को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान काल भैरव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और भक्त पूरे दिन व्रत रखकर उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि कालाष्टमी पर श्रद्धापूर्वक पूजा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा मिलती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि 8 जून को सुबह 3 बजकर 25 मिनट से शुरू होगी और 9 जून को सुबह 3 बजकर 24 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर कालाष्टमी का व्रत और पूजा 8 जून को की जाएगी। देशभर के शिव और भैरव मंदिरों में इस अवसर पर विशेष धार्मिक आयोजन किए जाएंगे। कई स्थानों पर भजन-कीर्तन, हवन और रात्रि जागरण का भी आयोजन होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">धार्मिक ग्रंथों में काल भैरव को समय का देवता बताया गया है। ‘काल’ का अर्थ समय और ‘भैरव’ भगवान शिव के उस स्वरूप को कहा जाता है जो धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए प्रकट हुआ। मान्यता है कि भगवान भैरव अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें भय, संकट तथा नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त करते हैं। यही कारण है कि कालाष्टमी का दिन विशेष रूप से शिव भक्तों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करने के बाद भक्त भगवान काल भैरव की पूजा का संकल्प लेते हैं। पूजा में दीपक, धूप, फूल, बेलपत्र, चंदन और प्रसाद अर्पित किया जाता है। कई श्रद्धालु दिनभर निर्जला या फलाहार व्रत रखते हैं। माना जाता है कि सच्चे मन और पूर्ण श्रद्धा से रखा गया यह व्रत विशेष फल प्रदान करता है। शाम के समय मंदिरों में भक्तों की भीड़ बढ़ जाती है और विशेष आरती का आयोजन किया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कालाष्टमी के दिन काल भैरव कथा और भैरव मंत्रों के जाप का भी विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन "ॐ काल भैरवाय नमः" मंत्र का जाप करने से व्यक्ति को मानसिक शक्ति और आत्मविश्वास प्राप्त होता है। कई श्रद्धालु भगवान शिव और काल भैरव से जुड़े स्तोत्रों का पाठ भी करते हैं। माना जाता है कि इससे जीवन में चल रही परेशानियों से राहत मिलती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कालाष्टमी से जुड़ी एक प्रमुख मान्यता भगवान शिव और ब्रह्मा के प्रसंग से संबंधित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। इसी दौरान भगवान शिव ने क्रोधित होकर काल भैरव का स्वरूप धारण किया। इसके बाद से काल भैरव को न्याय और धर्म की रक्षा करने वाला देवता माना जाने लगा। श्रद्धालु इस कथा को सुनते और पढ़ते हैं तथा भगवान भैरव का स्मरण करते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस दिन पितरों की शांति के लिए भी पूजा और तर्पण करने की परंपरा है। कई लोग अपने पूर्वजों की स्मृति में दान-पुण्य करते हैं और ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं। धार्मिक मान्यता है कि ऐसा करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। वाराणसी, उज्जैन और अन्य प्रमुख तीर्थ स्थलों में इस अवसर पर विशेष धार्मिक गतिविधियां देखने को मिलती हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कालाष्टमी का एक और महत्वपूर्ण पहलू कुत्तों को भोजन कराना माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार काला कुत्ता भगवान काल भैरव का वाहन माना जाता है। इसलिए इस दिन श्रद्धालु कुत्तों को दूध, रोटी, मिठाई और अन्य खाद्य पदार्थ खिलाते हैं। इसे पुण्यदायी कार्य माना जाता है और विश्वास किया जाता है कि इससे भगवान भैरव प्रसन्न होते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उज्जैन स्थित काल भैरव मंदिर, वाराणसी का काल भैरव धाम और देश के अन्य प्रसिद्ध भैरव मंदिरों में इस दिन विशेष भीड़ उमड़ती है। श्रद्धालु दूर-दूर से यहां दर्शन करने पहुंचते हैं। कई लोग पूरी रात जागकर भगवान भैरव के भजन सुनते हैं और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। वातावरण पूरी तरह भक्ति और श्रद्धा से भर जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">धर्माचार्यों के अनुसार कालाष्टमी केवल पूजा और व्रत का दिन नहीं है, बल्कि आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना का भी अवसर है। यह दिन व्यक्ति को अपने भीतर के भय, क्रोध और नकारात्मक विचारों पर विजय पाने की प्रेरणा देता है। भगवान काल भैरव की उपासना को साहस, अनुशासन और आत्मबल का प्रतीक माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">8 जून को आने वाली मासिक कालाष्टमी को लेकर भक्तों में उत्साह देखा जा रहा है। मंदिरों में तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और श्रद्धालु व्रत एवं पूजा की योजना बना रहे हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान काल भैरव की आराधना करने से जीवन के कष्ट कम होते हैं, बाधाएं दूर होती हैं और व्यक्ति को सुख, समृद्धि तथा सफलता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राशिफल</category>
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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 09:32:43 +0530</pubDate>
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