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                <title>Parliament - दैनिक जागरण</title>
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                <title>2029 तक ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ लागू करने की तैयारी तेज, जेपीसी अंतिम रिपोर्ट सौंपने की दिशा में आगे</title>
                                    <description><![CDATA[संयुक्त संसदीय समिति का दावा- अधिकांश लोगों ने किया समर्थन, राज्यों से सुझाव लेकर तैयार हो रहा रोडमैप; संवैधानिक संशोधन और राजनीतिक सहमति होगी सबसे बड़ी चुनौती]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/preparation-to-implement-one-nation-one-election-by-2029-intensifies/article-58506"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/one-nation-one-election-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">देश में लंबे समय से चर्चा का विषय बने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ यानी एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने की दिशा में केंद्र सरकार और संसद की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) तेजी से आगे बढ़ रही है। समिति का लक्ष्य वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव तक इस व्यवस्था को लागू करने की संभावनाओं को मजबूत करना है। समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने कहा है कि अब तक हुई बैठकों और विचार-विमर्श में शामिल लगभग 99 प्रतिशत लोगों, संगठनों और विशेषज्ञों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। </p>
<p style="text-align:justify;">जेपीसी ने हाल ही में गोवा का दौरा कर मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद के सदस्यों और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों से इस विषय पर चर्चा की। समिति के सदस्य और सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा कि बार-बार होने वाले चुनावों का प्रभाव छोटे राज्यों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यदि गोवा जैसे छोटे राज्य में चुनावी प्रक्रिया का प्रशासनिक और आर्थिक असर इतना अधिक है, तो बड़े राज्यों और पूरे देश पर इसका प्रभाव और भी व्यापक होता है। उन्होंने कहा कि एक साथ चुनाव कराने से प्रशासनिक संसाधनों की बचत होगी और सरकारें विकास कार्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकेंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">समिति का अगला दौरा उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में प्रस्तावित है। यहां मुख्यमंत्री, विपक्ष के नेताओं, विभिन्न राजनीतिक दलों, प्रशासनिक अधिकारियों और विशेषज्ञों से विस्तृत चर्चा की जाएगी। इसके बाद समिति 17 जुलाई को अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देकर संसद में पेश करने की तैयारी में है। माना जा रहा है कि इस रिपोर्ट के आधार पर सरकार आगे की रणनीति तय करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का मूल उद्देश्य लोकसभा, राज्य विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव अलग-अलग समय पर कराने के बजाय एक निर्धारित चुनावी चक्र के तहत एक साथ कराना है। समर्थकों का मानना है कि इससे चुनावों पर होने वाला भारी सरकारी खर्च कम होगा, बार-बार लागू होने वाली आदर्श आचार संहिता से विकास कार्य प्रभावित नहीं होंगे और प्रशासनिक मशीनरी का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि इस व्यवस्था को लागू करना आसान नहीं माना जा रहा है। इसके लिए संविधान के कई महत्वपूर्ण अनुच्छेदों में संशोधन करना होगा। विशेषज्ञों के अनुसार अनुच्छेद 83, 172 और 356 सहित कई संवैधानिक प्रावधानों में बदलाव आवश्यक होगा। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत के साथ-साथ देश के कम से कम आधे राज्यों की मंजूरी भी जरूरी होगी। यही कारण है कि सरकार राजनीतिक सहमति बनाने पर विशेष जोर दे रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे बड़ा सवाल उन राज्यों को लेकर है जिनकी विधानसभा का कार्यकाल वर्ष 2029 के बाद तक रहेगा। ऐसे राज्यों के कार्यकाल को समय से पहले समाप्त कर साझा चुनावी चक्र में शामिल करने का प्रस्ताव विचाराधीन है। वहीं जिन राज्यों का कार्यकाल 2029 से पहले समाप्त होगा, वहां सीमित अवधि के लिए चुनाव कराने या अन्य संवैधानिक विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। यदि किसी राज्य की सरकार बीच कार्यकाल में गिर जाती है, तो प्रस्तावित व्यवस्था के तहत मध्यावधि चुनाव केवल शेष कार्यकाल के लिए कराए जाने की संभावना है, ताकि निर्धारित चुनावी चक्र प्रभावित न हो।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार इस व्यवस्था को लागू करने के लिए 'टू-फेज ट्रांजिशन मॉडल' पर भी विचार कर रही है। इस मॉडल के तहत पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने के बजाय इसे दो चरणों में लागू किया जाएगा। पहले चरण में वर्ष 2029 में लोकसभा चुनाव के साथ लगभग 20 राज्यों के विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं। इसके बाद वर्ष 2034 तक शेष राज्यों को भी इसी चुनावी चक्र में शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इस मॉडल से विधानसभाओं के कार्यकाल में अत्यधिक कटौती या विस्तार की आवश्यकता कम होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस विषय पर संवैधानिक विशेषज्ञ भी अपनी राय दे रहे हैं। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि संविधान में इस दिशा में बदलाव की पर्याप्त गुंजाइश मौजूद है, लेकिन व्यापक राजनीतिक सहमति के बिना इसे लागू करना कठिन होगा। अतीत में भी विशेष परिस्थितियों में लोकसभा और विधानसभा के कार्यकाल में परिवर्तन किए जा चुके हैं। इसलिए कानूनी दृष्टि से यह पूरी तरह असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए संसद और राज्यों के बीच सहमति आवश्यक होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने सितंबर 2023 में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था। इस समिति ने करीब 191 दिनों तक विभिन्न विशेषज्ञों, राजनीतिक दलों, संवैधानिक संस्थाओं और अन्य हितधारकों से चर्चा की। विस्तृत अध्ययन के बाद समिति ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी थी। अब उसी रिपोर्ट और जेपीसी की सिफारिशों के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय की जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में स्वतंत्रता के बाद शुरुआती चार आम चुनावों तक लोकसभा और अधिकांश राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते थे। वर्ष 1952, 1957, 1962 और 1967 में यह व्यवस्था बनी रही। लेकिन 1967 के बाद कई राज्यों में सरकारें समय से पहले गिरने लगीं। 1968 और 1969 में कई विधानसभाएं भंग हुईं, जबकि 1970 में लोकसभा भी अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग कर दी गई। इसके बाद चुनावों का साझा चक्र टूट गया और अलग-अलग समय पर चुनाव होने लगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 17:50:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>30 दिन जेल में रहने पर PM-CM को छोड़ना पड़ सकता पद</title>
                                    <description><![CDATA[130वें संविधान संशोधन बिल पर JPC की रिपोर्ट अंतिम चरण में, प्रावधान हटाने के पक्ष में नहीं समिति; मानसून सत्र में फिर पेश हो सकता है विधेयक]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/pm-cm-may-have-to-leave-post-if-he-stays-in/article-57579"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/constitutional-amendment-bill.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">देश की राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ा एक अहम मुद्दा इन दिनों चर्चा में है। 130वें संविधान संशोधन बिल को लेकर संसद की संयुक्त संसदीय समिति (JPC) अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार करने में जुटी है। प्रस्तावित प्रावधान के तहत यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या किसी केंद्रीय एवं राज्य मंत्री को किसी गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार कर 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रखा जाता है, तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है। इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक और कानूनी स्तर पर विचार-विमर्श जारी है और इसे आगामी मानसून सत्र में दोबारा पेश किए जाने की संभावना जताई जा रही है। समिति इस बात पर सहमति के करीब है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की जवाबदेही तय करने के लिए कुछ स्पष्ट नियम होने चाहिए। हालांकि इस विषय पर विभिन्न विचार सामने आ रहे हैं और सभी पक्षों की राय को रिपोर्ट में शामिल किया जा रहा है। समिति की रिपोर्ट 17 जुलाई के आसपास अंतिम रूप ले सकती है, जिसके बाद इसे संसद में प्रस्तुत किया जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस पूरे मामले का उद्देश्य संवैधानिक ढांचे में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करना बताया जा रहा है। सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया है कि यदि कोई व्यक्ति गंभीर आरोपों में लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो उससे प्रशासनिक कार्यों की निरंतरता और जनता के विश्वास पर असर पड़ सकता है। ऐसे में नियमों को स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है ताकि भविष्य में किसी प्रकार की अस्पष्टता न रहे। गौरतलब है कि पिछले मानसून सत्र में गृहमंत्री अमित शाह द्वारा इस विषय से जुड़े तीन विधेयक संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत किए गए थे। उस समय इन विधेयकों को विस्तृत विचार-विमर्श के लिए JPC को भेजने का निर्णय लिया गया था। समिति ने इसके बाद विभिन्न विशेषज्ञों, कानूनी जानकारों और संबंधित पक्षों से चर्चा की और अब रिपोर्ट अंतिम चरण में पहुंच चुकी है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सूत्र बताते हैं कि समिति इस बात के पक्ष में है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, इसलिए उनके लिए कुछ अतिरिक्त नैतिक और कानूनी मानदंड तय किए जा सकते हैं। हालांकि यह भी ध्यान रखा जा रहा है कि किसी भी प्रस्ताव से न्यायिक प्रक्रिया या व्यक्तिगत अधिकारों पर अनावश्यक प्रभाव न पड़े। इस मुद्दे पर राजनीतिक हलकों में भी चर्चा जारी है। विभिन्न दलों के नेताओं ने अलग-अलग दृष्टिकोण रखे हैं। कुछ का मानना है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को उच्च नैतिक मानदंडों पर खरा उतरना चाहिए, जबकि कुछ का कहना है कि केवल गिरफ्तारी के आधार पर किसी को पद से हटाना न्यायसंगत नहीं होगा जब तक अदालत में दोष सिद्ध न हो जाए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यह प्रस्ताव भारतीय लोकतंत्र और संविधान के संतुलन को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जा रहा है। यदि यह नियम लागू होता है तो भविष्य में प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर एक स्पष्ट ढांचा तैयार हो सकता है। हालांकि यह भी जरूरी होगा कि इसका दुरुपयोग न हो और निष्पक्ष प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए। इस बिल का उद्देश्य किसी व्यक्ति या दल विशेष को प्रभावित करना नहीं है, बल्कि शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और नैतिकता को मजबूत करना है। इसी कारण सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। सभी की नजरें 17 जुलाई को आने वाली जेपीसी रिपोर्ट और आगामी मानसून सत्र पर टिकी हैं। रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि प्रस्तावित संशोधन किस रूप में संसद में आगे बढ़ाया जाएगा और इस पर अंतिम निर्णय क्या होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 00:36:27 +0530</pubDate>
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                <title>उद्धव सेना में बगावत के संकेत, संसदीय बैठक से गायब रहे 6 सांसद</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली में हुई संसदीय दल की बैठक में सिर्फ तीन सांसद पहुंचे, छह सांसदों की गैरमौजूदगी से शिवसेना (यूबीटी) में नए राजनीतिक संकट के संकेत।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/signs-of-rebellion-in-uddhav-sena-6-mps-missing-from/article-56326"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/shiv-sena-ubt.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी घटनाक्रम सामने आया है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की दिल्ली में आयोजित संसदीय दल की बैठक में नौ में से केवल तीन सांसदों के पहुंचने से पार्टी के भीतर नए संकट की चर्चा तेज हो गई है। बैठक में लोकसभा सांसद अनिल देसाई, अरविंद सावंत और राजाभाऊ वाजे शामिल हुए, जबकि छह सांसदों की अनुपस्थिति ने राजनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी नेतृत्व ने बैठक से पहले सभी सांसदों को व्हिप जारी कर अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद बड़ी संख्या में सांसदों के नहीं पहुंचने को राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। बैठक के बाद सांसद अरविंद सावंत ने स्पष्ट किया कि अनुपस्थित सांसदों को नोटिस जारी किया जाएगा और उनसे जवाब मांगा जाएगा। उधर, राज्यसभा सांसद और पार्टी के प्रमुख प्रवक्ता संजय राउत ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी के सांसदों पर दबाव बनाया जा रहा है। राउत ने कहा कि जो सांसद बैठक में शामिल हुए हैं, वे पार्टी के साथ खड़े हैं, जबकि जो नहीं पहुंचे, उन्हें जनता जवाब देगी। लगातार दूसरे दिन उन्होंने बागी माने जा रहे सांसदों पर तीखे शब्दों में हमला बोला।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी बीच गृह मंत्रालय द्वारा महाराष्ट्र पुलिस को छह सांसदों की सुरक्षा बढ़ाकर Y+ श्रेणी करने के निर्देश दिए जाने की खबर ने राजनीतिक हलचल और बढ़ा दी है। सूत्रों के अनुसार इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक पत्र भेजकर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट में शामिल होने या अलग समूह के गठन की इच्छा जताई है। हालांकि इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है। यदि छह सांसद एक साथ कोई निर्णय लेते हैं तो यह दल-बदल कानून के तहत महत्वपूर्ण स्थिति बन सकती है। लोकसभा में शिवसेना (यूबीटी) के कुल नौ सांसद हैं। संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार किसी भी दल में विभाजन के बाद अयोग्यता से बचने के लिए कम से कम दो-तिहाई सांसदों का समर्थन आवश्यक होता है। इस स्थिति में छह सांसदों का समूह कानूनी रूप से मजबूत दावा पेश कर सकता है। बीते कुछ दिनों की घटनाओं पर नजर डालें तो राजनीतिक हलचल लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है। 15 जून से ही ऐसी चर्चाएं शुरू हो गई थीं कि उद्धव ठाकरे गुट के कुछ सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं। इस संभावित अभियान को राजनीतिक गलियारों में ‘ऑपरेशन टाइगर’ नाम दिया गया। उस समय पार्टी नेताओं ने इन खबरों को अफवाह बताते हुए खारिज कर दिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके बाद 16 जून को संजय राउत ने सोशल मीडिया के माध्यम से दावा किया कि सांसदों को पार्टी छोड़ने के लिए भारी आर्थिक प्रलोभन दिया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ सांसदों को करोड़ों रुपये का प्रस्ताव दिया गया है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। 17 जून को घटनाक्रम और तेज हो गया जब शिंदे गुट के नेताओं ने दावा किया कि छह सांसदों ने अलग समूह बनाने से संबंधित दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके बाद उद्धव गुट के वरिष्ठ नेताओं ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर किसी भी निर्णय से पहले उनका पक्ष सुनने की मांग की। यह घटनाक्रम केवल शिवसेना तक सीमित नहीं है। आगामी मानसून सत्र और भविष्य में संभावित संवैधानिक एवं राजनीतिक बदलावों को देखते हुए विभिन्न दलों में राजनीतिक पुनर्संरचना की कोशिशें तेज हो सकती हैं। संसद में संख्या बल बढ़ाने को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक गतिविधियां बढ़ी हुई हैं। शिवसेना के इतिहास में यह पहली बार नहीं है जब पार्टी बड़े विभाजन का सामना कर रही है। जून 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायकों ने बगावत कर अलग गुट बनाया था। उस घटनाक्रम के बाद महाराष्ट्र की राजनीति पूरी तरह बदल गई थी। अब सांसदों के स्तर पर संभावित टूट की खबरें उद्धव ठाकरे के लिए नई चुनौती बनकर सामने आई हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 16:54:07 +0530</pubDate>
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                <title>टीएमसी को एक और झटका, राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बराइक ने दिया इस्तीफा</title>
                                    <description><![CDATA[एक हफ्ते में तीसरे सांसद ने छोड़ी पार्टी, बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल; ममता बनर्जी के नेतृत्व पर उठने लगे सवाल]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/6a2a563257bd5/article-55605"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/prakash-chik-baraik.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को एक और बड़ा झटका लगा है। पार्टी के राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बराइक ने अपने पद से इस्तीफा देकर राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। पिछले एक सप्ताह के भीतर टीएमसी छोड़ने वाले वे तीसरे राज्यसभा सांसद बन गए हैं। इससे पहले सुखेंदु शेखर रॉय और सुष्मिता देव के इस्तीफे ने भी पार्टी को असहज स्थिति में ला दिया था। लगातार हो रहे इन इस्तीफों को ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">जानकारी के मुताबिक प्रकाश चिक बराइक ने अपना इस्तीफा राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन को सौंप दिया है। अपने संक्षिप्त इस्तीफा पत्र में उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता तत्काल प्रभाव से समाप्त करने का अनुरोध किया है। साथ ही उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान मिले सहयोग के लिए सभापति और राज्यसभा सचिवालय का आभार भी व्यक्त किया। हालांकि इस्तीफे के पीछे की स्पष्ट वजह सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में बदले राजनीतिक समीकरणों का असर अब टीएमसी के संगठन और संसदीय दल पर भी दिखाई देने लगा है। राज्यसभा में पार्टी की ताकत लगातार घट रही है। प्रकाश चिक बराइक के इस्तीफे के बाद उच्च सदन में टीएमसी सांसदों की संख्या और कम हो गई है।</p>
<p class="isSelectedEnd"> बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही थीं। कई नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने सार्वजनिक रूप से संगठन की कार्यशैली और नेतृत्व को लेकर नाराजगी जताई थी। अब सांसदों के इस्तीफे उस असंतोष को और स्पष्ट रूप से सामने ला रहे हैं। बताया जा रहा है कि राज्य में कई विधायक भी अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर नए विकल्प तलाश रहे हैं। इसी बीच कुछ नेताओं के दूसरे राजनीतिक समूहों के संपर्क में होने की चर्चाएं भी तेज हैं। हालांकि पार्टी की ओर से अभी तक इन अटकलों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। टीएमसी के लिए चिंता की बात केवल राज्यसभा तक सीमित नहीं है। बंगाल विधानसभा में भी पार्टी की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं मानी जा रही। राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच विपक्ष लगातार दावा कर रहा है कि टीएमसी के कई विधायक और नेता पार्टी नेतृत्व से संतुष्ट नहीं हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।</p>
<p class="isSelectedEnd">प्रकाश चिक बराइक के इस्तीफे ने ऐसे समय में राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है, जब राज्य में विपक्षी दल लगातार टीएमसी पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में और सांसद या विधायक पार्टी छोड़ते हैं तो इसका असर राष्ट्रीय राजनीति में टीएमसी की भूमिका पर भी पड़ सकता है। टीएमसी लंबे समय से खुद को राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत विपक्षी शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश करती रही है। लेकिन लगातार सामने आ रही अंदरूनी चुनौतियां उस रणनीति को प्रभावित कर सकती हैं। पार्टी नेतृत्व के सामने अब संगठन को एकजुट रखने और कार्यकर्ताओं का विश्वास बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है।</p>
<p class="isSelectedEnd">उधर, विपक्षी दल इन इस्तीफों को टीएमसी के कमजोर होते जनाधार और संगठनात्मक संकट से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि पार्टी के भीतर बढ़ती असहमति अब खुलकर सामने आने लगी है। हालांकि टीएमसी के नेताओं का दावा है कि पार्टी अभी भी मजबूत स्थिति में है और कुछ नेताओं के जाने से संगठन पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा। आने वाले सप्ताह टीएमसी के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। यदि पार्टी नेतृत्व असंतुष्ट नेताओं को मनाने में सफल रहता है तो स्थिति संभल सकती है, लेकिन यदि इस्तीफों का सिलसिला जारी रहा तो बंगाल की राजनीति में नए समीकरण बनते दिखाई दे सकते हैं। प्रकाश चिक बराइक के इस्तीफे ने इतना जरूर स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल अभी थमने वाली नहीं है। </p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 12:36:27 +0530</pubDate>
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                <title>वंदे मातरम विवाद पर शशि थरूर का सवाल, बोले- हर कार्यक्रम में पूरा राष्ट्रगीत गाना व्यावहारिक नहीं</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/shashi-tharoors-question-on-vande-mataram-controversy-said-singing/article-54754"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/shashi-tharoor.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम को लेकर जारी बहस के बीच एक बार फिर अपनी राय रखी है। उन्होंने सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम के सभी छंदों को अनिवार्य रूप से गाने या बजाने की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह व्यावहारिक रूप से लोगों के लिए बोझिल साबित हो सकता है। थरूर का कहना है कि राष्ट्रगीत के प्रति सम्मान को लेकर कोई विवाद नहीं है, लेकिन हर सार्वजनिक कार्यक्रम में इसके पूरे संस्करण को गाना और लोगों का बार-बार खड़े होना व्यवहारिक चुनौतियां पैदा कर सकता है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर नई चर्चा शुरू हो गई है।</p>
<p class="isSelectedEnd">तिरुवनंतपुरम में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान शशि थरूर ने कहा कि वंदे मातरम भारत का राष्ट्रगीत है और जब भी यह गाया जाता है तो लोग सम्मान के साथ खड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि देश के अधिकांश लोगों को वंदे मातरम के पहले एक या दो छंद ही याद हैं, जिन्हें वर्षों से सार्वजनिक आयोजनों में गाया जाता रहा है। थरूर के अनुसार यही परंपरा लंबे समय से स्वीकार की गई है और लोगों के बीच भी यही प्रचलन रहा है। ऐसे में पूरे गीत को हर कार्यक्रम में अनिवार्य बनाने पर पुनर्विचार की आवश्यकता हो सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">थरूर ने इसी वर्ष फरवरी में दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम का उदाहरण भी दिया। उन्होंने बताया कि उस आयोजन में कार्यक्रम की शुरुआत और समापन दोनों समय वंदे मातरम का पूरा संस्करण बजाया गया था। उनके अनुसार गीत की अवधि अपेक्षाकृत लंबी होने के कारण लोगों को दो बार लंबे समय तक खड़ा रहना पड़ा, जिससे असुविधा महसूस हुई। उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत के सम्मान पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन व्यवहारिक पक्ष को भी ध्यान में रखना जरूरी है।</p>
<p class="isSelectedEnd">कांग्रेस सांसद का कहना है कि संसद द्वारा ऐसा कोई कानून पारित नहीं किया गया है जो वंदे मातरम के सभी छंदों को हर कार्यक्रम में अनिवार्य रूप से गाने का निर्देश देता हो। उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे का समाधान टकराव के बजाय आपसी सहमति और संवाद से निकाला जाना चाहिए। उनके मुताबिक राष्ट्रगीत के प्रति सम्मान बनाए रखते हुए ऐसा रास्ता खोजा जा सकता है जो सभी पक्षों के लिए स्वीकार्य हो।</p>
<p class="isSelectedEnd">वंदे मातरम को लेकर हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के बाद यह विषय चर्चा में आया है। नए निर्देशों के अनुसार सरकारी कार्यक्रमों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य औपचारिक आयोजनों में वंदे मातरम का पूर्ण संस्करण प्रस्तुत किया जा सकता है। साथ ही इसके दौरान उपस्थित लोगों के सम्मानपूर्वक खड़े रहने की बात भी कही गई है। पहले अधिकांश स्थानों पर वंदे मातरम के शुरुआती दो छंद ही गाए जाते थे, जिन्हें सार्वजनिक रूप से स्वीकार्यता प्राप्त थी।</p>
<p class="isSelectedEnd">शशि थरूर ने अपने ताजा बयान में यह भी कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही वंदे मातरम के शुरुआती छंदों को गाने की परंपरा रही है। उनका मानना है कि यही हिस्सा सबसे अधिक लोकप्रिय है और लोगों की स्मृति में भी मौजूद है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मुद्दे को कुछ राजनीतिक दल अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग देने का प्रयास कर रहे हैं। थरूर ने यह भी कहा कि जो लोग सभी छंदों को अनिवार्य करने की बात कर रहे हैं, उन्हें पहले स्वयं पूरा गीत गाकर दिखाना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd">इस बीच वंदे मातरम के ऐतिहासिक महत्व को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। राष्ट्रगीत वंदे मातरम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा था। यह केवल एक गीत नहीं बल्कि आजादी की लड़ाई का प्रतीक बन गया था। ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलनों और जनसभाओं में इसका व्यापक उपयोग किया जाता था। यही कारण है कि स्वतंत्र भारत में भी इसे विशेष सम्मान प्राप्त है।</p>
<p class="isSelectedEnd">वंदे मातरम की रचना प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वर्ष 1875 में की थी। बाद में इसे उनके उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया। वर्ष 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार इसे राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया गया था। उस समय से लेकर आज तक यह गीत देशभक्ति और राष्ट्रीय गौरव का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा हैं। इसलिए इनके सम्मान को लेकर सभी पक्षों में एक समान भावना है। हालांकि इनके प्रस्तुतीकरण के तरीके और नियमों को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे मुद्दों पर संवाद और सहमति के माध्यम से समाधान निकालना ही सबसे बेहतर तरीका माना जाता है। शशि थरूर के बयान ने वंदे मातरम को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले दिनों में इस विषय पर राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों के बीच चर्चा जारी रहने की संभावना है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 15:08:57 +0530</pubDate>
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