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                <title>China - दैनिक जागरण</title>
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                <description>China RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>चीन के मिसाइल परीक्षण ने बढ़ाई हिंद-प्रशांत की चिंता, परमाणु पनडुब्बी से बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च के बाद भारत भी सतर्क</title>
                                    <description><![CDATA[चीन की समुद्र आधारित परमाणु क्षमता में बढ़ोतरी से क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण बदलने की आशंका, भारत के लिए समुद्री निगरानी और रक्षा तैयारियों को मजबूत करना होगा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/chinas-missile-test-increases-the-concern-of-indo-pacific-india-also/article-58131"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/china-missile-test.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक बार फिर रणनीतिक तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। चीन ने परमाणु ऊर्जा से संचालित अपनी पनडुब्बी से लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण कर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस परीक्षण को चीन ने नियमित सैन्य अभ्यास का हिस्सा बताया है, लेकिन अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड समेत कई देशों ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर संकेत माना है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल एक सैन्य परीक्षण नहीं, बल्कि चीन की बदलती रणनीति और समुद्र आधारित परमाणु शक्ति को मजबूत करने का स्पष्ट संदेश भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">जानकारों के अनुसार इस परीक्षण में चीन ने अपनी नई पीढ़ी की सबमरीन लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) का इस्तेमाल किया है, जिसे परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम माना जाता है। माना जा रहा है कि यह मिसाइल हजारों किलोमीटर दूर तक लक्ष्य भेदने की क्षमता रखती है। इसका सबसे बड़ा रणनीतिक महत्व यह है कि ऐसी मिसाइलें समुद्र में गहराई तक मौजूद परमाणु पनडुब्बियों से दागी जा सकती हैं, जिससे दुश्मन के लिए उनका पता लगाना बेहद कठिन हो जाता है। चीन लंबे समय से अपनी समुद्री परमाणु क्षमता को मजबूत करने पर काम कर रहा है। पहले उसका सैन्य फोकस मुख्य रूप से दक्षिण चीन सागर और ताइवान के आसपास देखा जाता था, लेकिन अब उसकी गतिविधियां हिंद महासागर और व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक फैल चुकी हैं। इसी वजह से भारत सहित कई देशों की रणनीतिक चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में चीनी नौसेना की पनडुब्बियां कई बार हिंद महासागर क्षेत्र में देखी गई हैं। इसके अलावा जिबूती में चीन का सैन्य अड्डा, पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में उसकी सक्रियता और श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह पर बढ़ता प्रभाव पहले से ही भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। यदि चीन अधिक आधुनिक, कम शोर वाली और लंबी दूरी की मिसाइलों से लैस परमाणु पनडुब्बियों की तैनाती बढ़ाता है तो हिंद महासागर में उसकी रणनीतिक मौजूदगी और मजबूत हो सकती है। समुद्र आधारित परमाणु हथियार किसी भी देश की रणनीतिक ताकत का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं। पनडुब्बी से छोड़ी गई बैलिस्टिक मिसाइलों का पता लगाना बेहद मुश्किल होता है और यही कारण है कि दुनिया की प्रमुख सैन्य शक्तियां अपनी नौसेना में इस क्षमता को लगातार विकसित कर रही हैं। चीन का हालिया परीक्षण इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत की परमाणु नीति "क्रेडिबल मिनिमम डेटेरेंस" और "नो फर्स्ट यूज" के सिद्धांत पर आधारित है। ऐसे में यदि चीन अपनी समुद्र आधारित परमाणु क्षमता तेजी से बढ़ाता है तो भारत को भी अपने रणनीतिक प्रतिरोधक तंत्र को और मजबूत करना पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भारत को अधिक परमाणु पनडुब्बियों के निर्माण, लंबी दूरी की K-4 और K-5 बैलिस्टिक मिसाइलों के विकास तथा समुद्री निगरानी प्रणाली के विस्तार पर और अधिक ध्यान देना होगा। चीन की बढ़ती समुद्री सक्रियता का असर केवल सैन्य संतुलन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की भू-राजनीति पर भी पड़ सकता है। भारत पहले से उत्तरी सीमा पर चीन और पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान जैसी दोहरी सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। यदि समुद्री क्षेत्र में भी चीन की मौजूदगी लगातार बढ़ती है तो भारत को भूमि, वायु और समुद्र—तीनों मोर्चों पर अपनी रक्षा तैयारियों को संतुलित तरीके से मजबूत करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बदलते परिदृश्य में अंडमान एवं निकोबार कमांड की रणनीतिक भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी। यह कमांड मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जहां से दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्ग गुजरते हैं। यदि चीन की पनडुब्बियों की गतिविधियां इस क्षेत्र में बढ़ती हैं तो भारत को पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता, समुद्री निगरानी ड्रोन, आधुनिक सोनार सिस्टम और P-8I समुद्री निगरानी विमानों की तैनाती और बढ़ानी पड़ सकती है। चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों का एक और बड़ा प्रभाव QUAD समूह पर भी पड़ सकता है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया पहले से ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त और सुरक्षित समुद्री मार्ग बनाए रखने के लिए सहयोग कर रहे हैं। ऐसे में समुद्री सुरक्षा, खुफिया जानकारी साझा करने और संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों की संख्या आने वाले समय में और बढ़ सकती है। मालाबार जैसे संयुक्त अभ्यास इस सहयोग को और मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाकर ताइवान पर दबाव बनाए रखना चाहता है। साथ ही वह प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की रणनीतिक बढ़त को चुनौती देने और वैश्विक स्तर पर अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन करने की कोशिश भी कर रहा है। समुद्र आधारित परमाणु क्षमता को मजबूत करना इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। दूसरी ओर भारत भी अपनी समुद्री शक्ति को लगातार मजबूत कर रहा है। भारतीय नौसेना के पास पहले से परमाणु पनडुब्बियां, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, आधुनिक समुद्री निगरानी विमान और मजबूत नौसैनिक कमांड मौजूद हैं। इसके अलावा मित्र देशों के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग और हिंद महासागर क्षेत्र में सक्रिय रणनीतिक निगरानी भारत की सुरक्षा नीति का अहम हिस्सा बन चुका है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 10:12:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>अमेरिका ने इंडो-पैसिफिक कमांड से हटाया ‘इंडो’, भारत की भूमिका पर उठे सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[2018 में चीन को संतुलित करने की रणनीति के तहत जोड़ा गया था ‘इंडो’, अब नाम बदलकर फिर से यूएस पैसिफिक कमांड करने पर विशेषज्ञों के बीच नई बहस शुरू हो गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/america-removes-indo-from-indo-pacific-command-questions-raised-on-indias/article-56234"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-pacific-command.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिका ने अपनी सबसे महत्वपूर्ण सैन्य कमांड में से एक के नाम में बड़ा बदलाव करते हुए ‘इंडो’ शब्द हटा दिया है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि अब यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड (USINDOPACOM) को फिर से यूएस पैसिफिक कमांड (USPACOM) के नाम से जाना जाएगा। इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह कदम अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं का संकेत है और क्या इससे भारत की रणनीतिक भूमिका को लेकर कोई नया संदेश जा रहा है। वर्ष 2018 में तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन ने इस सैन्य कमांड का नाम बदलकर यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड किया था। उस समय यह फैसला केवल एक नाम परिवर्तन नहीं माना गया था, बल्कि इसे अमेरिका की नई एशिया रणनीति का अहम हिस्सा बताया गया था। अमेरिका ने तब स्पष्ट किया था कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर अब एक-दूसरे से जुड़े रणनीतिक क्षेत्र बन चुके हैं। ऐसे में भारत को क्षेत्रीय संतुलन और सुरक्षा व्यवस्था में प्रमुख भागीदार के रूप में देखा जा रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने नाम परिवर्तन की घोषणा करते हुए कहा था कि हिंद महासागर का महत्व लगातार बढ़ रहा है और वैश्विक व्यापार, समुद्री सुरक्षा तथा क्षेत्रीय स्थिरता के लिए इसकी भूमिका बेहद अहम हो चुकी है। इसी सोच के तहत कमांड के नाम में ‘इंडो’ शब्द जोड़ा गया था ताकि भारत और हिंद महासागर क्षेत्र की बढ़ती अहमियत को दर्शाया जा सके।अब आठ साल बाद इस फैसले को पलटते हुए अमेरिका ने फिर से पुराना नाम अपनाने का निर्णय लिया है। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि यूएस पैसिफिक कमांड नाम ऐतिहासिक रूप से जुड़ा हुआ है और इसका सैन्य विरासत से गहरा संबंध रहा है। मंत्रालय के अनुसार यह नाम कई महत्वपूर्ण अभियानों, युद्धों और सैन्य उपलब्धियों का प्रतीक है। इसलिए इसे वापस लाने का फैसला किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि पेंटागन ने साफ किया है कि केवल नाम बदला गया है। कमांड की जिम्मेदारियों, अधिकार क्षेत्र, सैन्य रणनीति और संचालन में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ इस कदम को केवल औपचारिक बदलाव मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि कूटनीति और सुरक्षा नीति में प्रतीकों का भी बड़ा महत्व होता है और ऐसे फैसले अक्सर व्यापक रणनीतिक संकेत देते हैं। जब 2018 में ‘इंडो’ शब्द जोड़ा गया था, तब अमेरिका चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर काफी चिंतित था। उस समय भारत को अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति का केंद्रीय साझेदार माना जा रहा था। क्वाड जैसे मंचों को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना गया, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इस समूह का उद्देश्य क्षेत्र में नियम आधारित व्यवस्था को मजबूत करना और चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन बनाना था।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान बदलाव से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अमेरिका अब अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव कर रहा है। कुछ विशेषज्ञ इसे ट्रम्प प्रशासन की नई विदेश नीति सोच से जोड़कर देख रहे हैं। माना जा रहा है कि अमेरिका अब अपने संसाधनों और सैन्य फोकस को अलग तरीके से व्यवस्थित करना चाहता है। हालांकि आधिकारिक तौर पर किसी रणनीतिक बदलाव की पुष्टि नहीं की गई है। इस फैसले पर भारत में भी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया पर अमेरिकी आदेश की तस्वीर साझा करते हुए सवाल उठाया कि क्या यह क्वाड के भविष्य के लिए कोई संकेत है। उन्होंने टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या यह क्वाड के ताबूत में एक और कील साबित हो सकती है। थरूर की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है जब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा और सामरिक साझेदारियों पर लगातार चर्चा हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">यूएस पैसिफिक कमांड अमेरिका की सबसे बड़ी सैन्य कमांडों में गिनी जाती है। इसका क्षेत्र एशिया-प्रशांत के विशाल हिस्से तक फैला हुआ है। यह कमांड चीन, उत्तर कोरिया, दक्षिण चीन सागर, ताइवान जलडमरूमध्य और कई अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों की निगरानी करती है। इसी वजह से इसके नाम में होने वाला बदलाव भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रहा है। आने वाले महीनों में अमेरिका की विदेश और सुरक्षा नीति के अन्य फैसलों पर नजर रखनी होगी। तभी यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह कदम केवल ऐतिहासिक नाम की वापसी है या फिर इसके पीछे कोई व्यापक रणनीतिक सोच काम कर रही है। फिलहाल अमेरिका ने यह जरूर कहा है कि उसके सहयोगी देशों के साथ संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा प्रतिबद्धताओं में कोई बदलाव नहीं होगा। इसके बावजूद भारत, क्वाड और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से जुड़े देशों में इस फैसले को लेकर चर्चा जारी है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 18:39:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>चीन-उत्तर कोरिया रिश्तों में नया मोड़, पुतिन-किम नजदीकी से जिनपिंग चिंतित</title>
                                    <description><![CDATA[शी जिनपिंग 7 साल बाद प्योंगयांग दौरे पर, रूस-उत्तर कोरिया की बढ़ती साझेदारी से एशिया की भू-राजनीति में बदलाव के संकेत]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/new-turn-in-china-north-korea-relations-jinping-worried-about-putin-kim/article-55142"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/xi-jinping-north-korea-visit.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">एशिया की भू-राजनीति में एक बार फिर बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले हफ्ते उत्तर कोरिया के दौरे पर जा रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात किम जोंग उन से होगी। यह यात्रा 8 से 9 जून के बीच प्रस्तावित है और करीब 7 साल बाद शी जिनपिंग प्योंगयांग पहुंचेंगे। यह दौरा ऐसे समय पर हो रहा है जब रूस, चीन और उत्तर कोरिया के बीच बदलते रिश्तों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। कुछ साल पहले तक उत्तर कोरिया पर चीन का लगभग पूर्ण प्रभाव माना जाता था, लेकिन हाल के वर्षों में स्थिति तेजी से बदली है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और उत्तर कोरिया के बीच सैन्य और आर्थिक सहयोग काफी बढ़ गया है। हथियारों की आपूर्ति, ऊर्जा सहायता और रणनीतिक समर्थन ने किम जोंग उन की स्थिति को पहले से कहीं मजबूत कर दिया है। अब उत्तर कोरिया केवल चीन पर निर्भर नहीं रहा, बल्कि रूस एक नए और प्रभावशाली साझेदार के रूप में उभरा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">चीन लंबे समय से उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा आर्थिक और राजनीतिक सहयोगी रहा है। दोनों देशों के बीच 1400 किलोमीटर लंबी सीमा और एक विशेष रक्षा संधि भी है, जिसे बीजिंग की एकमात्र सक्रिय सैन्य संधि माना जाता है। इस समझौते के अनुसार यदि किसी एक देश पर हमला होता है तो दूसरा उसकी मदद करेगा। इस साल इस संधि के 65 वर्ष पूरे हो रहे हैं, जिससे इस दौरे का महत्व और बढ़ जाता है। हालांकि हालिया घटनाक्रम चीन के लिए चिंता का विषय बन गए हैं। रूस और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ती नजदीकी ने बीजिंग की रणनीतिक स्थिति को चुनौती दी है। किम जोंग उन अब खुद को सिर्फ चीन पर निर्भर नेता के रूप में नहीं देखना चाहते। उनका झुकाव रूस की ओर बढ़ा है, जिससे उन्हें आर्थिक और सैन्य दोनों स्तरों पर अतिरिक्त लाभ मिला है। वहीं चीन इस स्थिति को अपने प्रभाव में कमी के रूप में देख रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">शी जिनपिंग का यह दौरा इसी संतुलन को दोबारा स्थापित करने की कोशिश माना जा रहा है। चीन चाहता है कि उत्तर कोरिया पर उसका प्रभाव बना रहे और वह क्षेत्रीय राजनीति में प्रमुख भूमिका में बना रहे। दूसरी ओर किम जोंग उन इस स्थिति का लाभ उठाकर चीन और रूस दोनों से अधिक रियायतें हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं। यूक्रेन युद्ध ने उत्तर कोरिया की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को भी बदल दिया है। रूस को हथियार और सैन्य सहयोग देने के बदले में उत्तर कोरिया को तेल, खाद्य सामग्री और तकनीकी सहायता मिल रही है। इस सहयोग ने किम जोंग उन को आर्थिक रूप से काफी राहत दी है। वहीं चीन इस बढ़ती साझेदारी को अपने प्रभाव के लिए चुनौती के रूप में देख रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">पिछले कुछ वर्षों में उत्तर कोरिया की परमाणु नीति पर भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है। रूस ने न केवल उत्तर कोरिया के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंधों पर नरम रुख अपनाया है, बल्कि कुछ मामलों में इन प्रतिबंधों को कमजोर भी किया है। चीन का रुख भी पहले की तुलना में अपेक्षाकृत नरम हुआ है और वह अब खुले तौर पर निंदा करने से बचता दिखाई देता है। इस पूरे घटनाक्रम में किम जोंग उन की स्थिति पहले से अधिक मजबूत नजर आती है। कोविड महामारी के बाद उत्तर कोरिया ने खुद को अलग-थलग रखा, लेकिन बाद में रूस के साथ साझेदारी ने उसकी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया। पर्यटन और सीमित व्यापार के माध्यम से भी उत्तर कोरिया नए राजस्व स्रोत तलाशने की कोशिश कर रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">दूसरी तरफ अमेरिका भी इस पूरे क्षेत्र पर नजर बनाए हुए है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कई बार किम जोंग उन से बातचीत की इच्छा जता चुके हैं, लेकिन परमाणु कार्यक्रम पर गतिरोध अभी भी बना हुआ है। किम जोंग उन स्पष्ट कर चुके हैं कि वे अपने परमाणु हथियारों को सुरक्षा की गारंटी मानते हैं और किसी भी बातचीत में उन्हें छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। इस पूरी स्थिति ने एशिया में शक्ति संतुलन को बदल दिया है। चीन, रूस और उत्तर कोरिया के बीच बनते-बिगड़ते समीकरण आने वाले समय में वैश्विक राजनीति पर गहरा असर डाल सकते हैं। शी जिनपिंग का यह दौरा न केवल एक कूटनीतिक मुलाकात है, बल्कि यह चीन की रणनीतिक स्थिति को फिर से मजबूत करने की कोशिश भी मानी जा रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 17:14:15 +0530</pubDate>
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