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                <title>DIA Alert - दैनिक जागरण</title>
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                <title>अमेरिका-इजराइल जासूसी विवाद से बढ़ा तनाव, DIA का अलर्ट ‘क्रिटिकल’ स्तर पर</title>
                                    <description><![CDATA[ट्रम्प सरकार और नेतन्याहू के बीच मतभेद गहराए, खुफिया एजेंसियों में असाधारण चेतावनी जारी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/tension-increases-due-to-us-israel-spying-dispute-dias-alert-at/article-55143"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-israel-spy-controversy.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">अमेरिका और इजराइल के बीच रिश्तों में एक बार फिर तनाव की स्थिति बनती दिखाई दे रही है। इस बार मामला सीधे जासूसी और खुफिया जानकारी से जुड़ा हुआ है, जिसने वॉशिंगटन और तेल अवीव दोनों में हलचल बढ़ा दी है। अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) के भीतर यह चिंता जताई जा रही है कि इजराइल अमेरिकी अधिकारियों और ट्रम्प सरकार की अंदरूनी जानकारियों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकता है। यह दावा एक अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट में सामने आया है, जिसके बाद सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी निगरानी और सतर्कता बढ़ा दी है। हालांकि इजराइल ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है और इसे पूरी तरह झूठा बताया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">NBC न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) ने हाल ही में इजराइल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस खतरे के स्तर को बढ़ाकर ‘क्रिटिकल’ कर दिया है। यह एजेंसी का सबसे गंभीर अलर्ट माना जाता है और आमतौर पर बेहद असाधारण परिस्थितियों में ही जारी किया जाता है। रिपोर्ट में दो मौजूदा और एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि यह फैसला अचानक नहीं बल्कि कई घटनाओं और आकलनों के आधार पर लिया गया है। हालांकि किसी एक बड़े सुरक्षा उल्लंघन की पुष्टि अब तक नहीं हुई है, लेकिन लगातार मिल रही सूचनाओं ने अमेरिकी एजेंसियों को सतर्क कर दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">सूत्रों के अनुसार, इस अलर्ट का सीधा असर उन अमेरिकी अधिकारियों पर पड़ सकता है जो इजराइल की यात्रा करते हैं या वहां के अधिकारियों से नियमित संपर्क में रहते हैं। ऐसे मामलों में सुरक्षा प्रोटोकॉल को और कड़ा किया गया है। बताया जा रहा है कि अमेरिकी अधिकारी विदेश यात्राओं के दौरान अपने निजी फोन और लैपटॉप का इस्तेमाल करने से बचते हैं और उनकी जगह अस्थायी डिवाइस का उपयोग किया जाता है। कई बार संवेदनशील बैठकों को भी ऐसे स्थानों पर रखा जाता है जहां निगरानी का जोखिम कम हो। यह स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि अमेरिका इजराइल की खुफिया क्षमता को लेकर सतर्क रुख अपना रहा है, भले ही दोनों देश लंबे समय से रणनीतिक साझेदार रहे हों।</p>
<p class="isSelectedEnd">इजराइली दूतावास ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उनका देश किसी भी सहयोगी देश की जासूसी नहीं करता। दूतावास का कहना है कि इजराइल की खुफिया एजेंसियां केवल उन देशों और समूहों पर नजर रखती हैं जिन्हें वह सुरक्षा खतरा मानता है। दूसरी तरफ अमेरिकी अधिकारी भी यह स्वीकार कर रहे हैं कि किसी एक घटना के कारण यह कदम नहीं उठाया गया, बल्कि कई सूचनाओं के आधार पर जोखिम का आकलन किया गया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और इजराइल के बीच ईरान को लेकर पहले से ही मतभेद बढ़े हुए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रम्प प्रशासन ईरान के साथ नए समझौते की कोशिश कर रहा है, जबकि इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस पर सख्त रुख अपनाए हुए हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह को लेकर भी दोनों देशों की रणनीति अलग-अलग मानी जा रही है। इसी बीच ट्रम्प और नेतन्याहू के बीच फोन पर हुई कथित तीखी बातचीत ने भी राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। इस विवाद में एक और परत तब जुड़ी जब यह जानकारी सामने आई कि ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि उन्होंने नेतन्याहू के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया था। इससे दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत और राजनीतिक तनाव की अटकलें और तेज हो गई हैं। यह स्थिति सिर्फ कूटनीतिक मतभेद नहीं बल्कि रणनीतिक असहमति का संकेत भी हो सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd">अमेरिका और इजराइल के बीच जासूसी के आरोप नए नहीं हैं। इतिहास में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिन्होंने दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित किया है। 1985 का जोनाथन पोलार्ड केस सबसे चर्चित उदाहरणों में से एक है, जिसमें एक अमेरिकी नौसेना अधिकारी पर इजराइल को गोपनीय जानकारी देने का आरोप लगा था। इस मामले ने दोनों देशों के बीच लंबे समय तक तनाव बनाए रखा था। इसी तरह 2008 में बेन-अमी कादिश केस में भी संवेदनशील रक्षा दस्तावेज लीक करने के आरोप लगे थे।</p>
<p class="isSelectedEnd">इसके अलावा 2019 में ‘स्टिंगरे डिवाइस’ को लेकर भी विवाद सामने आया था, जिसमें आशंका जताई गई थी कि व्हाइट हाउस के आसपास मोबाइल डेटा की निगरानी की गई। हालांकि उस समय भी इजराइल ने सभी आरोपों से इनकार किया था और किसी भी तरह की संलिप्तता से साफ इनकार किया गया था। मौजूदा विवाद ने एक बार फिर अमेरिका-इजराइल संबंधों की जटिलता को सामने ला दिया है। भले ही दोनों देश रणनीतिक साझेदार हों, लेकिन खुफिया और सुरक्षा मामलों में अविश्वास की परतें समय-समय पर उभरती रही हैं। DIA का यह नया अलर्ट आने वाले समय में दोनों देशों के बीच सहयोग और निगरानी दोनों को प्रभावित कर सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 17:38:05 +0530</pubDate>
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