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                <title>folk music - दैनिक जागरण</title>
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                <title>पद्म विभूषण तीजन बाई नहीं रहीं, पंडवानी की अमर आवाज हमेशा गूंजती रहेगी</title>
                                    <description><![CDATA[70 वर्ष की आयु में रायपुर एम्स में ली अंतिम सांस, महाभारत की लोकगाथाओं को विश्व मंच तक पहुंचाने वाली महान लोक कलाकार के निधन से कला जगत में शोक]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/padma-vibhushan-tijan-bai-is-no-more-pandwanis-immortal-voice/article-57904"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/teejan-bai-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और पंडवानी गायन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली देश की महान लोक कलाकार, पद्म विभूषण तीजन बाई का शनिवार देर रात निधन हो गया। 70 वर्षीय तीजन बाई ने रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में रात करीब 3:15 बजे अंतिम सांस ली। वे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं और उनका इलाज जारी था। उनके निधन की खबर सामने आते ही कला, संस्कृति और साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई। देशभर के कलाकारों, राजनीतिक नेताओं और उनके प्रशंसकों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।</p>
<p style="text-align:justify;">रविवार सुबह उनके पार्थिव शरीर को उनके पैतृक गांव गनियारी लाया गया, जहां अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। गांव और आसपास के क्षेत्रों से आए लोगों ने अपनी प्रिय लोक कलाकार को नम आंखों से विदाई दी। यहीं पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>नाना से मिली महाभारत सुनाने की प्रेरणा</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">तीजन बाई का जन्म छत्तीसगढ़ के एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनका झुकाव लोककला और महाभारत की कथाओं की ओर था। उनके नाना उन्हें महाभारत की कहानियां सुनाया करते थे। इन्हीं कथाओं ने उनके मन में पंडवानी गायन के प्रति गहरी रुचि पैदा की। उन्होंने बचपन में ही इन कथाओं को याद करना शुरू कर दिया और बाद में अपनी विशिष्ट शैली में मंच पर प्रस्तुत करने लगीं।</p>
<p style="text-align:justify;">महज 13 वर्ष की आयु में उन्होंने पहली बार सार्वजनिक मंच पर पंडवानी का गायन किया। उनकी दमदार आवाज, प्रभावशाली अभिनय और भावपूर्ण प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>पंडवानी को दिलाई वैश्विक पहचान</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">तीजन बाई ने पंडवानी जैसी पारंपरिक लोककला को केवल गांवों और मेलों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। उन्होंने भारत सहित दुनिया के कई देशों में अपनी प्रस्तुतियां देकर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाई।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी प्रस्तुति की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे केवल गाती नहीं थीं, बल्कि महाभारत के पात्रों को अपने अभिनय, भाव-भंगिमा और आवाज के उतार-चढ़ाव से जीवंत कर देती थीं। दर्शक स्वयं को महाभारत के घटनाक्रम का हिस्सा महसूस करने लगते थे।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>संघर्षों से भरा रहा जीवन</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आज भले ही तीजन बाई को विश्वस्तरीय कलाकार के रूप में जाना जाता हो, लेकिन उनकी यात्रा आसान नहीं रही। सामाजिक परंपराओं और रूढ़ियों के कारण शुरुआती दौर में उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उस समय महिलाओं का पंडवानी की 'कापालिक शैली' में मंच पर प्रस्तुति देना सामान्य नहीं माना जाता था।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने तमाम विरोधों और सामाजिक चुनौतियों का डटकर सामना किया। अपनी प्रतिभा और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने यह साबित कर दिया कि कला की कोई सीमा नहीं होती। उनके संघर्ष ने आने वाली पीढ़ियों की महिला कलाकारों के लिए भी नए रास्ते खोले।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>देश के सर्वोच्च सम्मानों से हुईं सम्मानित</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">भारतीय लोककला में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए उन्हें समय-समय पर कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और बाद में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नृत्य शिरोमणि सम्मान और अनेक सांस्कृतिक संस्थानों द्वारा भी सम्मानित किया गया। उनके सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धियां नहीं थे, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का गौरव भी बने।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने जताया शोक</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीजन बाई के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि तीजन बाई ने अपनी अद्भुत प्रस्तुति से छत्तीसगढ़ की लोककला को पूरी दुनिया में नई पहचान दिलाई। उनका निधन कला और संस्कृति जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।</p>
<p style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी शोक व्यक्त करते हुए कहा कि तीजन बाई ने अपने जीवन को लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित किया। पंडवानी के माध्यम से उन्होंने राज्य का गौरव पूरी दुनिया में बढ़ाया और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन गईं।</p>
<p style="text-align:justify;">तीजन बाई का जीवन इस बात का उदाहरण है कि समर्पण, मेहनत और प्रतिभा के बल पर कोई भी कलाकार वैश्विक पहचान हासिल कर सकता है। उन्होंने न केवल लोककला को जीवित रखा, बल्कि उसे आधुनिक मंचों तक भी पहुंचाया। आज देश-विदेश के अनेक युवा कलाकार उनकी शैली से प्रेरणा लेकर पंडवानी और लोककला के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। उनकी आवाज, अभिनय और महाभारत के पात्रों को जीवंत करने की कला हमेशा लोगों की स्मृतियों में जीवित रहेगी। उनका योगदान भारतीय लोक संस्कृति के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">तीजन बाई का निधन केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि भारतीय लोक परंपरा के एक युग का अंत माना जा रहा है। उन्होंने अपने जीवन के कई दशक लोककला को समर्पित किए और पंडवानी को विश्व मंच पर स्थापित किया। उनके जाने से जो रिक्तता बनी है, उसे भर पाना आसान नहीं होगा। हालांकि उनकी प्रस्तुतियां, उनके गीत और उनकी कला आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेंगी। भारतीय लोक संगीत और पंडवानी की दुनिया में उनका नाम सदैव सम्मान और गर्व के साथ लिया जाएगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बालीवुड</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Jul 2026 12:53:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हरियाणवी लोक कलाकार पेप्सी शर्मा का निधन, 38 साल की उम्र में ली अंतिम सांस</title>
                                    <description><![CDATA[सीने में दर्द की शिकायत के बाद अस्पताल ले जाया गया था। हरियाणवी रागिनी जगत के लोकप्रिय कलाकार पेप्सी शर्मा के निधन से संगीत और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/bollywood/haryanvi-folk-artist-pepsi-sharma-passes-away-breathed-his-last/article-55322"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/pepsi-sharma-death.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">हरियाणवी लोक संगीत और रागिनी जगत से सोमवार को एक दुखद खबर सामने आई। लोकप्रिय लोक कलाकार और रागिनी गायक पेप्सी शर्मा का 38 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके निधन की खबर सामने आते ही हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली-एनसीआर के लोक संगीत प्रेमियों के बीच शोक की लहर दौड़ गई। परिजनों के अनुसार उन्हें अचानक सीने में दर्द की शिकायत हुई थी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। उनके परिवार में पत्नी, 10 वर्षीय बेटी और 7 वर्षीय बेटा हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">परिवार के सदस्यों ने बताया कि रविवार सुबह ही पेप्सी शर्मा अपने पैतृक गांव पतला पहुंचे थे। गांव पहुंचने के बाद उन्होंने अपनी मां से मुलाकात की और कुछ समय परिवार के साथ बिताया। बाद में वह अपने दोस्तों के साथ बैठे हुए थे, तभी उन्हें सीने और शरीर में दर्द महसूस हुआ। शुरुआत में उन्हें नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने जांच के बाद दवा देकर घर भेज दिया। बताया जा रहा है कि कुछ देर बाद दर्द फिर बढ़ गया। इसके बाद उन्हें दोबारा अस्पताल ले जाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में ही उनकी मौत हो गई।</p>
<p class="isSelectedEnd">पेप्सी शर्मा का असली नाम यशपाल शर्मा था। हालांकि मंच और संगीत की दुनिया में वह पेप्सी शर्मा के नाम से ही पहचाने जाते थे। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के पतला गांव में जन्मे यशपाल ने अपनी पहचान हरियाणवी लोक संगीत के जरिए बनाई। उन्होंने हरियाणा की रागिनी परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अपनी अनूठी शैली के कारण लाखों लोगों के बीच लोकप्रिय बने।</p>
<p class="isSelectedEnd">उनकी पहचान केवल एक गायक के रूप में नहीं थी। मंच पर उनका अंदाज, कॉमिक टाइमिंग और दर्शकों से जुड़ने की कला उन्हें दूसरे कलाकारों से अलग बनाती थी। रागिनी कार्यक्रमों में जब वह मंच पर आते थे तो दर्शक देर रात तक उनकी प्रस्तुति का इंतजार करते थे। उनकी गायकी के साथ-साथ उनका हास्य और बातचीत का तरीका भी लोगों को खूब पसंद आता था।</p>
<p class="isSelectedEnd">हरियाणवी डांसर और गायिका सपना चौधरी के साथ उनकी जोड़ी विशेष रूप से चर्चित रही। दोनों ने कई बड़े मंचों पर एक साथ प्रस्तुति दी। एक कार्यक्रम में किए गए नागिन डांस ने उन्हें देशभर में नई पहचान दिलाई थी। इस प्रस्तुति का वीडियो बाद में एक म्यूजिक कंपनी द्वारा जारी किया गया था, जिसे करोड़ों बार देखा गया। यह वीडियो सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लंबे समय तक चर्चा में रहा। कई लोगों का मानना है कि इसी प्रस्तुति ने पेप्सी शर्मा को युवा दर्शकों के बीच और अधिक लोकप्रिय बना दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd">पेप्सी शर्मा ने हरियाणवी गायिका राजबाला के साथ भी कई सफल मंचीय कार्यक्रम किए। उनकी रागिनियां गांवों, कस्बों और बड़े सांस्कृतिक आयोजनों में खूब पसंद की जाती थीं। हरियाणा में आयोजित होने वाले रागिनी प्रतियोगिताओं और गोशालाओं के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी लगभग तय मानी जाती थी। वे अपनी दमदार आवाज और लोक शैली की प्रस्तुति के कारण दर्शकों की पहली पसंद बने हुए थे।</p>
<p class="isSelectedEnd">परिवार के अनुसार पेप्सी शर्मा को बचपन से ही गायन का शौक था। हालांकि उन्होंने अपने शुरुआती दिनों में घरवालों को इसकी जानकारी नहीं दी थी। करीब दो दशक पहले उन्होंने मंचीय कार्यक्रमों में भाग लेना शुरू किया। जब उनका एक कार्यक्रम पहली बार टेलीविजन पर प्रसारित हुआ, तब परिवार के लोगों को उनकी गायकी के बारे में पता चला। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और धीरे-धीरे हरियाणवी लोक संगीत के लोकप्रिय कलाकारों में शामिल हो गए।</p>
<p class="isSelectedEnd">उनके नाम के पीछे की कहानी भी काफी दिलचस्प बताई जाती है। परिवार के अनुसार बचपन में उन्हें प्यार से "पैप्पी" कहा जाता था। बाद में एक अदालत में सुनवाई के दौरान एक जज ने मजाकिया अंदाज में उन्हें "पेप्सी" कह दिया। इसके बाद उन्होंने यही नाम अपना लिया और आगे चलकर पूरे हरियाणा में पेप्सी शर्मा के नाम से प्रसिद्ध हो गए। पेप्सी शर्मा ने कई लोकप्रिय मंचीय प्रस्तुतियां दीं, लेकिन "पतला दुपट्टा तेरा मुंह दिख्यै" रागिनी ने उन्हें खास पहचान दिलाई। इस गीत और उससे जुड़े मंचीय कार्यक्रमों को दर्शकों ने खूब पसंद किया। सपना चौधरी ने भी इस रागिनी पर कई बार प्रस्तुति दी, जिससे इसकी लोकप्रियता और बढ़ी। उनके कई वीडियो आज भी सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म पर लाखों लोगों द्वारा देखे जाते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के मंचों पर भी अपनी प्रतिभा दिखाई। टीवी कार्यक्रमों और सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी प्रस्तुतियों को सराहा गया। अपनी सादगी, लोक संस्कृति के प्रति समर्पण और दर्शकों से जुड़ाव की वजह से उन्होंने एक अलग स्थान बनाया। पेप्सी शर्मा के निधन के बाद हरियाणवी संगीत जगत के कई कलाकारों और प्रशंसकों ने शोक व्यक्त किया है। उनके जाने से लोक संगीत की दुनिया में एक ऐसा खालीपन पैदा हुआ है जिसे लंबे समय तक महसूस किया जाएगा। उनके गीत, रागिनियां और मंचीय प्रस्तुतियां आने वाले समय में भी लोगों की यादों में जीवित रहेंगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बालीवुड</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 18:04:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>वसीम बरेलवी की शायरी और मामे खान के सुरों में डूबा रायपुर</title>
                                    <description><![CDATA[काव्य कुंभ के अंतिम दिन साहित्य, शायरी और लोक संगीत का अनूठा संगम; देर रात तक जमे रहे श्रोता, ‘चौधरी’ पर झूम उठा पूरा सभागार]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/raipur-immersed-in-the-poetry-of-wasim-barelvi-and-the/article-55288"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/kavya-kumbh-raipur.jpg" alt=""></a><br /><p>रायपुर में आयोजित काव्य कुंभ का समापन इस बार यादगार अंदाज में हुआ। रविवार को कार्यक्रम के अंतिम दिन साहित्य, शायरी और लोक संगीत का ऐसा संगम देखने को मिला जिसने देर रात तक श्रोताओं को बांधे रखा। डूंडा स्थित स्कूल परिसर में आयोजित ‘संगम’ सत्र में देश के चर्चित शायर, कवि और लोक कलाकार एक मंच पर नजर आए। कार्यक्रम भले ही तय समय से करीब दो घंटे देरी से शुरू हुआ, लेकिन जैसे-जैसे रात आगे बढ़ी, दर्शकों का उत्साह भी बढ़ता चला गया। शुरुआत में इंतजार की वजह से लोगों के चेहरों पर थकान दिखाई दे रही थी, लेकिन मंच पर कलाकारों की मौजूदगी ने माहौल पूरी तरह बदल दिया।</p>
<p>कार्यक्रम में सबसे ज्यादा उत्सुकता मशहूर शायर वसीम बरेलवी को सुनने को लेकर थी। जैसे ही उनका नाम पुकारा गया, सभागार तालियों और वाहवाही से गूंज उठा। मंच संभालते ही उन्होंने साहित्य और जीवन के संबंध पर बात की। उन्होंने कहा कि अगर समाज में संतुलन बनाए रखना है तो साहित्य से जुड़ाव बेहद जरूरी है। साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि इंसान को बेहतर बनाने का माध्यम भी है। इसी दौरान उन्होंने कहा कि “अच्छे लोग मेरी कमजोरी भी हैं और मेरी ताकत भी।” उनकी यह बात सुनकर सभागार में मौजूद लोगों ने जोरदार तालियां बजाईं। वसीम बरेलवी ने अपनी चर्चित गजलों और शेरों का पाठ भी किया। उनकी शायरी में जीवन, रिश्तों और समय की गहरी समझ दिखाई दी। जब उन्होंने अपनी मशहूर पंक्तियां सुनाईं तो श्रोता मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे। कई बार ऐसा लगा जैसे पूरा सभागार उनकी आवाज और शब्दों के साथ बह रहा हो। उनकी प्रस्तुति के दौरान लगातार "वाह-वाह" और "मुकर्रर अर्ज है" की आवाजें सुनाई देती रहीं। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सेहत अब पहले जैसी नहीं रही, इसलिए लंबे समय तक मंच पर बैठना मुश्किल होता है, लेकिन श्रोताओं के प्रेम और सम्मान के कारण वह यहां पहुंचे हैं।</p>
<p>वसीम बरेलवी के बाद मंच पर आए लोकप्रिय शायर जुबैर अली ताबिश ने अपनी नई गजलों से लोगों का दिल जीत लिया। उनकी शायरी में संघर्ष, उम्मीद और संवेदनाओं का रंग दिखाई दिया। उन्होंने ऐसी पंक्तियां सुनाईं जिनसे युवा वर्ग खुद को जोड़ता नजर आया। उनकी गजल के दौरान सभागार कई बार तालियों से गूंज उठा। कवयित्री मनिका दुबे और मीर अली मीर ने भी अपनी रचनाओं का पाठ किया। दोनों की प्रस्तुतियों को भी दर्शकों ने खूब सराहा। रात गहराती जा रही थी, लेकिन कार्यक्रम स्थल पर मौजूद लोगों का उत्साह कम होने का नाम नहीं ले रहा था। इस बीच प्रसिद्ध कवि आलोक श्रीवास्तव भी मंच पर पहुंचे। समय की कमी के कारण उनका चर्चित ‘आलोकनामा’ प्रस्तुत नहीं हो सका, लेकिन उन्होंने शिव तांडव स्तोत्र के हिंदी अनुवाद का पाठ कर श्रोताओं का मन जीत लिया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि इसे एक तरह का "स्टार्टर" समझा जाए और अगली बार वह पूरी प्रस्तुति लेकर आएंगे। उनकी इस बात पर दर्शकों ने हंसते हुए उनका स्वागत किया।</p>
<p>रात करीब साढ़े बारह बजे कार्यक्रम का रंग एक बार फिर बदला। अब बारी थी राजस्थान के प्रसिद्ध लोक गायक मामे खान की, जिनका इंतजार पूरे कार्यक्रम के दौरान सबसे ज्यादा किया जा रहा था। जैसे ही वह मंच पर पहुंचे, पूरा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। उन्होंने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत "केसरिया बालम आवो सा पधारो म्हारे देश" से की। कुछ ही देर में दर्शक अपनी सीटों से उठकर झूमने लगे। लोक संगीत और सूफियाना रंग का ऐसा मेल देखने को मिला जिसने पूरे माहौल को उत्सव में बदल दिया। मामे खान ने अपने एक से बढ़कर एक लोकप्रिय गीत प्रस्तुत किए। रात बढ़ती गई और दर्शकों की ओर से लगातार एक ही फरमाइश सुनाई देने लगी—‘चौधरी’। आखिरकार जब उन्होंने इस गीत को गाने की घोषणा की तो सभागार में उत्साह चरम पर पहुंच गया। गीत शुरू करने से पहले उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “यह गाना मेरा आधार कार्ड बन गया है।” उनकी इस बात पर दर्शकों ने जोरदार तालियां बजाईं। इसके बाद जैसे ही ‘चौधरी’ की धुन शुरू हुई, पूरा परिसर झूम उठा।</p>
<p>युवा, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग सभी इस प्रस्तुति का हिस्सा बन गए। कई लोग अपनी जगह पर खड़े होकर नाचते नजर आए, जबकि कुछ मोबाइल फोन में इस पल को कैद करते दिखे। कार्यक्रम के दौरान मामे खान ने दर्शकों के बीच टी-शर्ट भी उछालीं, जिन्हें पकड़ने के लिए युवाओं में खास उत्साह देखने को मिला। मंच और दर्शकों के बीच का फासला पूरी तरह खत्म हो चुका था और पूरा सभागार एक साथ संगीत का आनंद ले रहा था। करीब रात 1:20 बजे मामे खान की प्रस्तुति समाप्त हुई। इसके साथ ही काव्य कुंभ के इस वर्ष के आयोजन का भी समापन हो गया। हालांकि कार्यक्रम खत्म हो गया, लेकिन शायरी, कविता और संगीत से सजी यह रात लोगों की यादों में लंबे समय तक बनी रहेगी। आयोजकों के अनुसार अंतिम दिन उम्मीद से ज्यादा लोगों की मौजूदगी रही और कार्यक्रम ने साहित्य तथा लोक संस्कृति के प्रति लोगों के प्रेम को एक बार फिर साबित कर दिया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 14:31:42 +0530</pubDate>
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