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                <title>strategic affairs - दैनिक जागरण</title>
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                <title>अमेरिका ने इंडो-पैसिफिक कमांड से हटाया ‘इंडो’, भारत की भूमिका पर उठे सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[2018 में चीन को संतुलित करने की रणनीति के तहत जोड़ा गया था ‘इंडो’, अब नाम बदलकर फिर से यूएस पैसिफिक कमांड करने पर विशेषज्ञों के बीच नई बहस शुरू हो गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/america-removes-indo-from-indo-pacific-command-questions-raised-on-indias/article-56234"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/us-pacific-command.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिका ने अपनी सबसे महत्वपूर्ण सैन्य कमांड में से एक के नाम में बड़ा बदलाव करते हुए ‘इंडो’ शब्द हटा दिया है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि अब यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड (USINDOPACOM) को फिर से यूएस पैसिफिक कमांड (USPACOM) के नाम से जाना जाएगा। इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह कदम अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं का संकेत है और क्या इससे भारत की रणनीतिक भूमिका को लेकर कोई नया संदेश जा रहा है। वर्ष 2018 में तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन ने इस सैन्य कमांड का नाम बदलकर यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड किया था। उस समय यह फैसला केवल एक नाम परिवर्तन नहीं माना गया था, बल्कि इसे अमेरिका की नई एशिया रणनीति का अहम हिस्सा बताया गया था। अमेरिका ने तब स्पष्ट किया था कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर अब एक-दूसरे से जुड़े रणनीतिक क्षेत्र बन चुके हैं। ऐसे में भारत को क्षेत्रीय संतुलन और सुरक्षा व्यवस्था में प्रमुख भागीदार के रूप में देखा जा रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने नाम परिवर्तन की घोषणा करते हुए कहा था कि हिंद महासागर का महत्व लगातार बढ़ रहा है और वैश्विक व्यापार, समुद्री सुरक्षा तथा क्षेत्रीय स्थिरता के लिए इसकी भूमिका बेहद अहम हो चुकी है। इसी सोच के तहत कमांड के नाम में ‘इंडो’ शब्द जोड़ा गया था ताकि भारत और हिंद महासागर क्षेत्र की बढ़ती अहमियत को दर्शाया जा सके।अब आठ साल बाद इस फैसले को पलटते हुए अमेरिका ने फिर से पुराना नाम अपनाने का निर्णय लिया है। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि यूएस पैसिफिक कमांड नाम ऐतिहासिक रूप से जुड़ा हुआ है और इसका सैन्य विरासत से गहरा संबंध रहा है। मंत्रालय के अनुसार यह नाम कई महत्वपूर्ण अभियानों, युद्धों और सैन्य उपलब्धियों का प्रतीक है। इसलिए इसे वापस लाने का फैसला किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि पेंटागन ने साफ किया है कि केवल नाम बदला गया है। कमांड की जिम्मेदारियों, अधिकार क्षेत्र, सैन्य रणनीति और संचालन में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ इस कदम को केवल औपचारिक बदलाव मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि कूटनीति और सुरक्षा नीति में प्रतीकों का भी बड़ा महत्व होता है और ऐसे फैसले अक्सर व्यापक रणनीतिक संकेत देते हैं। जब 2018 में ‘इंडो’ शब्द जोड़ा गया था, तब अमेरिका चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर काफी चिंतित था। उस समय भारत को अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति का केंद्रीय साझेदार माना जा रहा था। क्वाड जैसे मंचों को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना गया, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इस समूह का उद्देश्य क्षेत्र में नियम आधारित व्यवस्था को मजबूत करना और चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन बनाना था।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान बदलाव से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अमेरिका अब अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव कर रहा है। कुछ विशेषज्ञ इसे ट्रम्प प्रशासन की नई विदेश नीति सोच से जोड़कर देख रहे हैं। माना जा रहा है कि अमेरिका अब अपने संसाधनों और सैन्य फोकस को अलग तरीके से व्यवस्थित करना चाहता है। हालांकि आधिकारिक तौर पर किसी रणनीतिक बदलाव की पुष्टि नहीं की गई है। इस फैसले पर भारत में भी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया पर अमेरिकी आदेश की तस्वीर साझा करते हुए सवाल उठाया कि क्या यह क्वाड के भविष्य के लिए कोई संकेत है। उन्होंने टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या यह क्वाड के ताबूत में एक और कील साबित हो सकती है। थरूर की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है जब इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा और सामरिक साझेदारियों पर लगातार चर्चा हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">यूएस पैसिफिक कमांड अमेरिका की सबसे बड़ी सैन्य कमांडों में गिनी जाती है। इसका क्षेत्र एशिया-प्रशांत के विशाल हिस्से तक फैला हुआ है। यह कमांड चीन, उत्तर कोरिया, दक्षिण चीन सागर, ताइवान जलडमरूमध्य और कई अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों की निगरानी करती है। इसी वजह से इसके नाम में होने वाला बदलाव भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रहा है। आने वाले महीनों में अमेरिका की विदेश और सुरक्षा नीति के अन्य फैसलों पर नजर रखनी होगी। तभी यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह कदम केवल ऐतिहासिक नाम की वापसी है या फिर इसके पीछे कोई व्यापक रणनीतिक सोच काम कर रही है। फिलहाल अमेरिका ने यह जरूर कहा है कि उसके सहयोगी देशों के साथ संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा प्रतिबद्धताओं में कोई बदलाव नहीं होगा। इसके बावजूद भारत, क्वाड और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से जुड़े देशों में इस फैसले को लेकर चर्चा जारी है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 18:39:40 +0530</pubDate>
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                <title>भारत के परमाणु हथियार बढ़े, SIPRI रिपोर्ट में बड़ा खुलासा</title>
                                    <description><![CDATA[SIPRI रिपोर्ट 2026 में दावा, भारत ने पहली बार 12 हथियार तैनात किए, वैश्विक परमाणु रेस तेज]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/indias-nuclear-weapons-increased-big-revelation-in-sipri-report/article-55368"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/india-nuclear-weapons.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">2026 की शुरुआत में वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य को लेकर सामने आई ताज़ा रिपोर्ट ने एक बार फिर परमाणु शक्ति संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">SIPRI</span></span> की नई इयरबुक में दावा किया गया है कि <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">भारत</span></span> ने पहली बार अपने परमाणु हथियारों में से 12 को ऑपरेशनल यानी मोर्चे पर तैनात किया है। यह वही हथियार हैं जिन्हें अब तक सिर्फ स्टॉक या भंडारण में रखा जाता था। रिपोर्ट के मुताबिक भारत का कुल परमाणु भंडार भी बढ़कर 180 से 190 तक पहुंच गया है, जिससे साफ संकेत मिलते हैं कि देश अब अपनी रणनीतिक क्षमता को एक नए स्तर पर ले जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह बदलाव अचानक नहीं है, बल्कि पिछले कुछ वर्षों से चल रही रणनीतिक तैयारी का हिस्सा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 की तुलना में 2026 में पहली बार वास्तविक तैनाती देखी गई है, जो क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को बदल सकती है। दूसरी ओर <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">पाकिस्तान</span></span> के पास लगभग 170 परमाणु हथियार बताए गए हैं, हालांकि उनमें से कितने तैनात हैं, इस पर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। वैश्विक स्तर पर कुल 9 देशों के पास 12,187 परमाणु हथियार मौजूद हैं, जिनमें से बड़ी संख्या अभी भी हाई अलर्ट स्थिति में रखी गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">दुनिया एक नए परमाणु प्रतिस्पर्धा के दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां बड़े देश अपने हथियारों को न सिर्फ बढ़ा रहे हैं बल्कि उन्हें आधुनिक भी बना रहे हैं। अमेरिका, रूस और चीन जैसी शक्तियां लगातार अपने डिलीवरी सिस्टम और मिसाइल टेक्नोलॉजी को अपग्रेड कर रही हैं। चीन का भंडार भी अब 600 से 620 हथियारों तक पहुंच चुका है, जिससे एशिया में शक्ति संतुलन और अधिक जटिल होता जा रहा है। इसी बीच भारत भी अपनी रणनीति को दो मोर्चों—पाकिस्तान और चीन—को ध्यान में रखकर आगे बढ़ा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत का रक्षा खर्च भी लगातार बढ़ता जा रहा है और रिपोर्ट के अनुसार यह 92.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जिससे भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश बन गया है। इसके साथ ही भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक भी बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह खर्च केवल रक्षा खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आधुनिक तकनीक, मिसाइल सिस्टम और परमाणु क्षमता के विस्तार की रणनीति भी शामिल है।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत अब मल्टीपल इंडिपेंडेन्टली टारगेटेबल रीएंट्री व्हीकल <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">MIRV technology</span></span> जैसी तकनीकों पर तेजी से काम कर रहा है। इस तकनीक के जरिए एक ही मिसाइल से कई लक्ष्यों पर हमला किया जा सकता है। साथ ही समुद्री क्षेत्र में भारत की ताकत भी बढ़ रही है, जहां परमाणु पनडुब्बियां जैसे <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">INS Arihant</span></span> और INS अरिघात देश की सेकेंड स्ट्राइक क्षमता का मजबूत आधार बन रही हैं। SIPRI का अनुमान है कि अब भारत सीमित संख्या में समुद्री प्लेटफॉर्म पर भी हथियार तैनात करने लगा है, जिससे किसी भी संभावित हमले के बाद जवाबी कार्रवाई की क्षमता बनी रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मई 2025 के दौरान भारत-पाकिस्तान तनाव का भी जिक्र किया गया है, जिसे बाद में दोनों देशों ने नियंत्रित कर लिया था। इसी अवधि में साइबर और डिजिटल ऑपरेशन्स का भी उपयोग हुआ, जिसे एक नए प्रकार का सैन्य प्रयोग माना जा रहा है। इसी संदर्भ में <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Operation Sindoor</span></span> का उल्लेख भी किया गया है, जिसने आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति को सामने रखा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 11:13:42 +0530</pubDate>
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