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                <title>मोदी बने सबसे लंबे निर्वाचित पीएम, नेहरू का रिकॉर्ड टूटा</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/top-news/modi-becomes-longest-elected-pm-nehrus-record-broken/article-55464"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/narendra-modi.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">नई दिल्ली, 10 जून। राजधानी दिल्ली में आज का राजनीतिक माहौल सुबह से ही काफी गर्म है और हर तरफ एक ही चर्चा चल रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब देश के सबसे लंबे समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है। 26 मई 2014 को पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से उनका कार्यकाल अब 4399 दिनों तक पहुंच चुका है और इसी के साथ उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 4398 दिनों के निर्वाचित कार्यकाल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं माना जा रहा, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लंबे राजनीतिक सफर में एक बड़ा मोड़ बताया जा रहा है। सुबह से ही सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस बात की चर्चा तेज है कि यह उपलब्धि देश की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत है, हालांकि इस पर अलग-अलग राजनीतिक मत भी सामने आ रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">दिल्ली में आज दोपहर होने वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की अहम बैठक को लेकर भी हलचल तेज है। भारत मंडपम में होने वाली इस बैठक में केंद्र सरकार के सहयोगी दलों के साथ-साथ विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता शामिल हो रहे हैं। जहां आने वाले समय की नीतियों और विकास योजनाओं पर विस्तृत चर्चा होगी। बैठक में प्रधानमंत्री के इस नए रिकॉर्ड को लेकर एक औपचारिक प्रस्ताव के जरिए बधाई भी दी जाएगी। इसके साथ ही ‘विकसित भारत 2047’ के विजन डॉक्यूमेंट पर विस्तार से चर्चा होगी और केंद्र तथा राज्यों के बीच बेहतर समन्वय को लेकर भी कई सुझाव रखे जाएंगे। सुबह से ही भारत मंडपम के आसपास सुरक्षा व्यवस्था भी बढ़ा दी गई है और मीडिया की मौजूदगी लगातार बनी हुई है।</p>
<p class="isSelectedEnd">अगर पिछले बारह वर्षों के राजनीतिक घटनाक्रम को देखा जाए तो प्रधानमंत्री मोदी का कार्यकाल कई बड़े और ऐतिहासिक फैसलों के लिए जाना जाता है। डिजिटल सेवाओं का विस्तार, जीएसटी जैसी एकीकृत कर प्रणाली का लागू होना, नोटबंदी का फैसला, सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक जैसी सैन्य कार्रवाइयां, तीन तलाक कानून, अनुच्छेद 370 में बदलाव और कोरोना महामारी के दौरान बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान जैसे कदम देश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था पर गहरा असर डालते हैं। इन सभी फैसलों के बीच सरकार को कई बार आलोचनाओं और विरोध का भी सामना करना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद लगातार तीन आम चुनावों में सत्ता में वापसी ने राजनीतिक स्थिरता की एक अलग तस्वीर भी पेश की है। 2014, 2019 और 2024 के चुनावों में जनता के जनादेश ने इस नेतृत्व को लगातार मजबूत आधार दिया और इसी वजह से यह रिकॉर्ड और अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह उपलब्धि सिर्फ एक व्यक्तिगत रिकॉर्ड नहीं है बल्कि भारतीय लोकतंत्र में नेतृत्व की निरंतरता और जनसमर्थन की प्रवृत्ति को भी दर्शाती है। हालांकि इस पर विपक्ष का नजरिया अलग है और वह इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं और बहस के संदर्भ में देखता है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति किस दिशा में जाएगी। क्या यह नेतृत्व इसी तरह आगे भी मजबूत बना रहेगा या फिर राजनीतिक परिदृश्य में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। भाजपा के भीतर भी नए नेताओं के उभरने और राज्यों में नए चेहरों के सामने आने को लेकर चर्चाएं तेज हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अभी भी किसी एक स्पष्ट विकल्प की तस्वीर सामने नहीं आई है। ऐसे में आने वाले समय में नेतृत्व और संगठन दोनों की परीक्षा मानी जा रही है।</p>
<p>इसी बीच दिल्ली की सियासत में यह भी चर्चा है कि 2029 के आम चुनाव तक राजनीतिक समीकरण किस तरह बदल सकते हैं। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती नीतियों के क्रियान्वयन के साथ-साथ जनता के भरोसे को बनाए रखने की होगी। वहीं विपक्ष भी अपनी रणनीति को मजबूत करने में जुटा है। मौजूदा स्थिति को देखते हुए कहा जा सकता है कि भारतीय राजनीति एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है जहां नेतृत्व, नीतियां और जनभावनाएं सभी मिलकर भविष्य की दिशा तय करेंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 12:02:43 +0530</pubDate>
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