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                <title>छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी, आपसी सहमति से बने संबंध को रेप नहीं माना</title>
                                    <description><![CDATA[लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले बालिगों के मामले में हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा, कहा- केवल शादी से इनकार करना दुष्कर्म नहीं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/important-comment-of-chhattisgarh-high-court-consensual-relationship-is-not/article-57417"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/chhattisgarh-high-court-(6).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुष्कर्म से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि यदि दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं और उनके बीच शारीरिक संबंध आपसी सहमति से बने हैं, तो बाद में पुरुष द्वारा शादी से इनकार करने मात्र से उसे दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों का निर्णय केवल किसी एक बयान या आरोप के आधार पर नहीं, बल्कि पूरे संबंध की प्रकृति, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। यह फैसला छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की खंडपीठ ने सुनाया, जिसमें जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास शामिल थे। अदालत ने सरगुजा की फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के आदेश को सही ठहराते हुए महिला की अपील खारिज कर दी। हाई कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक साथ रहने वाले बालिग व्यक्तियों के बीच बने शारीरिक संबंधों को सामान्य परिस्थितियों में सहमति से बना संबंध माना जा सकता है, जब तक कि उपलब्ध साक्ष्य इसके विपरीत स्पष्ट रूप से संकेत न दें। मामले के अनुसार शिकायतकर्ता महिला भिलाई नगर निगम में प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत थीं। उन्होंने अपनी शिकायत में बताया था कि वर्ष 2019 में रायपुर में एमबीए की पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात आरोपी से हुई थी। दोनों के बीच निकटता बढ़ी और बाद में वे लगभग दो वर्षों तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे। महिला का आरोप था कि आरोपी ने उनसे शादी करने का वादा किया था और इसी भरोसे पर दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">शिकायत में महिला ने आगे कहा कि एमबीए पूरा होने के बाद आरोपी ने शादी की बात टालनी शुरू कर दी। बाद में उसने कथित रूप से यह कहा कि उसके परिवार वाले इस विवाह के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि महिला उम्र में उससे बड़ी हैं, तलाकशुदा हैं और ईसाई समुदाय से संबंध रखती हैं। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि 28 नवंबर 2021 को जब वह शादी की बात करने आरोपी के घर पहुंचीं तो वहां उनके साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए गए। इसी आधार पर उन्होंने दुष्कर्म और अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज कराया। मामले की सुनवाई पहले सरगुजा की फास्ट ट्रैक कोर्ट में हुई थी। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयान के आधार पर आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। इसके बाद महिला ने इस फैसले को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड, गवाहों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों का विस्तृत परीक्षण किया। खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि केवल यह तथ्य कि दोनों विवाह करना चाहते थे, इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि उनके बीच बने शारीरिक संबंध केवल शादी के वादे के कारण ही स्थापित हुए थे। अदालत ने कहा कि जब दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक एक साथ रहते हैं तो यह माना जा सकता है कि वे अपने संबंधों और उनके संभावित परिणामों से पूरी तरह परिचित थे। ऐसे मामलों में प्रत्येक परिस्थिति का अलग-अलग मूल्यांकन करना आवश्यक होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि न्यायालयों को इस प्रकार के मामलों को केवल तकनीकी या संकीर्ण कानूनी दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए। किसी भी मामले में संबंध की अवधि, दोनों पक्षों का व्यवहार, परिस्थितियां और उपलब्ध साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अदालत ने कहा कि यदि लंबे समय तक दोनों की सहमति से संबंध रहे हों, तो बाद में विवाह न होने की स्थिति को स्वतः दुष्कर्म का मामला नहीं माना जा सकता। फैसले के दौरान हाई कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2013 के एक निर्णय का भी उल्लेख किया। अदालत ने कैनी राजन बनाम केरल राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि सहमति का अर्थ केवल मौन स्वीकृति या आत्मसमर्पण नहीं होता, बल्कि यह सोच-समझकर लिया गया स्वतंत्र निर्णय होता है। न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक मामले में यह देखना आवश्यक है कि सहमति किन परिस्थितियों में दी गई थी और क्या उसके पीछे किसी प्रकार का छल या दबाव था। हाई कोर्ट ने मेडिकल साक्ष्यों पर भी विचार किया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध चिकित्सकीय रिपोर्ट में दुष्कर्म की स्पष्ट पुष्टि नहीं हुई। साथ ही रिपोर्ट में दर्ज चोटों और कथित घटना के समय के बीच भी स्पष्ट सामंजस्य नहीं पाया गया। अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य अभियोजन के आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 15:41:57 +0530</pubDate>
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                <title>बालिग युवती को अपनी पसंद से रहने की आजादी, हाई कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला</title>
                                    <description><![CDATA[मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा कि बालिग महिला अपनी इच्छा से कहीं भी रह सकती है, लेकिन साथ रहने भर से संबंध को वैध विवाह का दर्जा नहीं दिया जा सकता।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/adult-girl-gets-freedom-to-live-as-per-her-choice/article-55505"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/madhya-pradesh-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए बालिग युवती की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई युवती बालिग है तो उसे अपनी इच्छा के अनुसार रहने और जीवन से जुड़े फैसले लेने का पूरा अधिकार है। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि किसी युवक के साथ रहने या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने मात्र से उस संबंध को कानूनी रूप से वैध विवाह नहीं माना जा सकता। विवाह की वैधता का फैसला केवल सक्षम न्यायालय ही कर सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">यह मामला एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा हुआ था, जिसे अभिषेक गुर्जर ने हाई कोर्ट में दायर किया था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि जिस युवती के साथ वह रहना चाहता है, उसे उसके पिता ने उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने पास रखा हुआ है। याचिकाकर्ता का कहना था कि युवती अपनी मर्जी से उसके साथ रहना चाहती है, लेकिन परिवार की ओर से उस पर दबाव बनाया जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने सुनवाई शुरू की और संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया।</p>
<p class="isSelectedEnd">सुनवाई के दौरान अभिषेक गुर्जर ने अदालत को बताया कि उसने 25 मार्च 2026 को धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार युवती से विवाह किया था। उसने यह भी दावा किया कि युवती लगभग ढाई महीने की गर्भवती है। याचिका में यह भी कहा गया कि एक जून को पुलिस की सहायता से युवती को उसके पास से हटाकर जबरन उसके पिता के घर भेज दिया गया था। इन आरोपों के बाद अदालत ने पूरे मामले की जानकारी मांगी और पुलिस को युवती को न्यायालय में पेश करने का निर्देश दिया। बाद में पुरानी छावनी थाना पुलिस युवती को अदालत में लेकर पहुंची।</p>
<p class="isSelectedEnd">मामले ने उस समय नया मोड़ ले लिया जब ब्रजेश गुर्जर नामक एक अन्य व्यक्ति ने अदालत में हस्तक्षेप याचिका दायर कर दी। उसने दावा किया कि युवती का विवाह पहले ही उसके साथ हो चुका है और इस संबंध में उसने कुछ फोटो तथा विवाह कार्ड भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए। तीसरे पक्ष के इस दावे ने मामले को और जटिल बना दिया। अदालत ने उसके आवेदन को स्वीकार करते हुए उसे भी मामले में पक्षकार बनने की अनुमति प्रदान कर दी, ताकि सभी तथ्यों को सामने रखकर निष्पक्ष निर्णय लिया जा सके।</p>
<p class="isSelectedEnd">सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने युवती से अलग कमरे में बातचीत की और उसकी इच्छा जानने का प्रयास किया। अदालत के समक्ष युवती ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह अभिषेक गुर्जर के साथ रहना चाहती है और किसी प्रकार के दबाव में नहीं है। राज्य सरकार की ओर से भी अदालत को बताया गया कि युवती बालिग है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार उसकी जन्मतिथि 1 जनवरी 2008 बताई गई, जिसके आधार पर अदालत ने माना कि वह अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने के लिए कानूनी रूप से सक्षम है।</p>
<p class="isSelectedEnd">सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति दीपक खोत की खंडपीठ ने कहा कि भारतीय कानून बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने का अधिकार देता है। अदालत ने माना कि किसी बालिग महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी स्थान पर रोककर नहीं रखा जा सकता। यदि वह अपनी मर्जी से किसी व्यक्ति के साथ रहना चाहती है तो उसे ऐसा करने की स्वतंत्रता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">हालांकि कोर्ट ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण बात भी जोड़ी। अदालत ने कहा कि युवती का किसी व्यक्ति के साथ रहना या उसके साथ जाने का निर्णय विवाह की वैधता को साबित नहीं करता। यदि विवाह को लेकर विवाद है या कई पक्ष अलग-अलग दावे कर रहे हैं, तो ऐसे मामलों में विवाह की वैधता का निर्धारण केवल सक्षम सिविल या पारिवारिक न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा। हाई कोर्ट ने इस याचिका की सुनवाई के दौरान केवल युवती की स्वतंत्रता और उसकी इच्छा को ध्यान में रखा</p>
<p class="isSelectedEnd">यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें बालिग युवक-युवतियों की पसंद और परिवार की इच्छा के बीच टकराव देखने को मिला है। अदालतें लगातार यह स्पष्ट करती रही हैं कि बालिग व्यक्ति को अपनी जिंदगी के फैसले लेने का अधिकार है, चाहे परिवार उसकी पसंद से सहमत हो या नहीं। इस मामले में भी हाई कोर्ट ने यही संदेश दिया कि किसी बालिग महिला की इच्छा सर्वोपरि है। साथ ही अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया कि विवाह की वैधता से जुड़े विवादों का निपटारा उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही किया जाए। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 14:19:28 +0530</pubDate>
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