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                <title>Sushmita Dev - दैनिक जागरण</title>
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                <title>बंगाल की सियासत में बड़ा उलटफेर, TMC के तीन पूर्व राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल</title>
                                    <description><![CDATA[राज्यसभा उपचुनाव से पहले भाजपा ने सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बराइक को बनाया उम्मीदवार, टीएमसी में बढ़ी राजनीतिक हलचल।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/big-upheaval-in-bengal-politics-three-former-tmc-rajya-sabha/article-58360"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/tmc-(1).jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के तीन पूर्व राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बराइक ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया है। भाजपा ने पार्टी में शामिल होते ही तीनों नेताओं को राज्यसभा की रिक्त सीटों पर होने वाले उपचुनाव के लिए अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस राजनीतिक बदलाव को पश्चिम बंगाल की बदलती सियासी तस्वीर और आगामी राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है। राज्यसभा उपचुनाव से ठीक पहले हुए इस घटनाक्रम ने बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। तीनों नेताओं ने कुछ सप्ताह पहले ही राज्यसभा सदस्यता और तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा दिया था। उस समय उन्होंने पार्टी नेतृत्व पर मनमाने तरीके से फैसले लेने और वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी करने के आरोप लगाए थे। अब भाजपा में शामिल होने के बाद उनके राजनीतिक भविष्य को नई दिशा मिलने की संभावना जताई जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">भाजपा ने इन तीनों नेताओं को जिस तेजी से राज्यसभा उपचुनाव का उम्मीदवार बनाया है, उससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि पार्टी बंगाल में अपने संगठन को और मजबूत करने के लिए अनुभवी नेताओं पर भरोसा जता रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल राज्यसभा चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों की रणनीति का भी हिस्सा हो सकता है। राज्यसभा की इन तीन रिक्त सीटों के लिए 24 जुलाई को मतदान और मतगणना होगी। निर्वाचन कार्यक्रम के अनुसार 14 जुलाई तक नामांकन दाखिल किए जाएंगे, जबकि 15 जुलाई को नामांकन पत्रों की जांच होगी। ऐसे में अगले कुछ दिनों तक बंगाल की राजनीति पूरी तरह इन उपचुनावों और दल-बदल की चर्चाओं के इर्द-गिर्द घूमती रहेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">भाजपा में शामिल होने के बाद सुखेंदु शेखर राय ने अपने इस्तीफे के पीछे की वजह भी सार्वजनिक रूप से बताई। उन्होंने कहा कि आरजी कर अस्पताल रेप और हत्या मामले में उन्होंने सबूतों से कथित छेड़छाड़ और प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए थे। इसके बाद उन्हें लगातार जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं। उन्होंने दावा किया कि उनके परिवार के सदस्यों के अपहरण की धमकी भी दी गई। सुखेंदु के अनुसार उन्होंने पुलिस आयुक्त और अस्पताल प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग की थी, लेकिन उनकी बात पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया। यहां तक कि खराब स्वास्थ्य के बावजूद उन्हें पुलिस मुख्यालय बुलाया गया, जिसके बाद उन्हें न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;">सुष्मिता देव ने भी भाजपा में शामिल होने के बाद अपने बयान से राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा और त्रिपुरा जैसे राज्यों में भाजपा की लगातार बढ़ती ताकत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जनता के विश्वास को दर्शाती है। उन्होंने असम में लगातार तीसरी बार भाजपा सरकार बनने को इसकी बड़ी मिसाल बताया। साथ ही उन्होंने टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा पर भी निशाना साधते हुए कहा कि अन्य राजनीतिक दल उन्हें अपने साथ नहीं लेना चाहते, इसलिए वे अब भी टीएमसी में हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने इन इस्तीफों और भाजपा में शामिल होने की घटना को ज्यादा महत्व देने से इनकार किया है। टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने कहा कि तीनों नेता पहले से ही भाजपा के संपर्क में थे। उनके अनुसार अब भाजपा ने केवल अपनी राजनीतिक जरूरत के कारण उन्हें उम्मीदवार बनाया है। उन्होंने दावा किया कि इससे तृणमूल कांग्रेस को कोई राजनीतिक नुकसान नहीं होगा और भाजपा को भी कोई बड़ा लाभ मिलने वाला नहीं है। सौगत रॉय का कहना है कि दल बदलने वाले नेताओं का राजनीतिक प्रभाव सीमित होता है और जनता ऐसे नेताओं को अधिक महत्व नहीं देती।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर लगातार असंतोष की खबरें सामने आती रही हैं। कई नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने पार्टी छोड़ दी या अलग गुट बना लिया। उपलब्ध राजनीतिक आंकड़ों के अनुसार लोकसभा में टीएमसी के सांसदों की संख्या में भी कमी आई है। राज्यसभा में भी कई सांसदों के इस्तीफे के बाद पार्टी की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रही।</p>
<p style="text-align:justify;">विधानसभा में भी पार्टी के सामने चुनौती बढ़ी है। चुनाव में बड़ी जीत हासिल करने के बावजूद कई विधायक अलग गुट का हिस्सा बन चुके हैं। इससे ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी के सामने संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने की चुनौती और बढ़ गई है। हालांकि पार्टी नेतृत्व लगातार दावा कर रहा है कि संगठन पूरी तरह मजबूत है और कुछ नेताओं के जाने से उसके जनाधार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। पश्चिम बंगाल में दल-बदल की राजनीति नई नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में इसकी रफ्तार काफी बढ़ी है। भाजपा और टीएमसी दोनों एक-दूसरे के नेताओं को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इससे राज्य की राजनीति लगातार अधिक प्रतिस्पर्धी होती जा रही है। राज्यसभा उपचुनाव के नतीजे भले ही सीमित सीटों तक हों, लेकिन उनका राजनीतिक संदेश आने वाले चुनावों के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाएगा। भाजपा बंगाल में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए ऐसे नेताओं को प्राथमिकता दे रही है जिनका प्रशासनिक अनुभव और राजनीतिक पहचान मजबूत हो। वहीं टीएमसी अपने संगठन को मजबूत रखने और असंतुष्ट नेताओं को रोकने की कोशिश में जुटी हुई है। आने वाले महीनों में दोनों दलों के बीच राजनीतिक संघर्ष और तेज होने की संभावना है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 10:41:51 +0530</pubDate>
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                <title>TMC में बढ़ी सियासी हलचल, एक और राज्यसभा सांसद ने दिया इस्तीफा</title>
                                    <description><![CDATA[सुष्मिता देव के इस्तीफे से तृणमूल कांग्रेस को नया झटका, सांसदों और विधायकों की बगावत के बीच ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी सक्रिय]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/political-stir-increases-in-tmc-another-rajya-sabha-mp-resigns/article-55548"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/sushmita-dev-resignation.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस के लिए मुश्किलों का दौर थमता नजर नहीं आ रहा है। पार्टी में लगातार जारी टूट के बीच बुधवार को राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी और संसद दोनों से इस्तीफा देकर राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी। राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन ने उनका इस्तीफा स्वीकार भी कर लिया है। पिछले तीन दिनों में यह दूसरा मौका है जब तृणमूल कांग्रेस के किसी राज्यसभा सांसद ने पार्टी से किनारा किया है। इससे पहले 8 जून को सुखेंदु शेखर ने भी पार्टी और राज्यसभा दोनों से इस्तीफा देकर राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">सुष्मिता देव के इस्तीफे ने ऐसे समय में तृणमूल कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है जब पार्टी पहले से ही सांसदों और विधायकों की बगावत का सामना कर रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं बल्कि पार्टी के भीतर चल रहे असंतोष की ओर भी संकेत करता है। हालांकि सुष्मिता देव ने अपने इस्तीफे को व्यक्तिगत और राजनीतिक कारणों से जुड़ा फैसला बताया है, लेकिन उनके इस कदम के दूरगामी राजनीतिक असर देखने को मिल सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">इस्तीफे के बाद मीडिया से बातचीत में सुष्मिता देव ने कहा कि राज्यसभा की सीट उन्हें पार्टी की ओर से मिली थी, इसलिए पार्टी छोड़ने के साथ उन्होंने संसद की सदस्यता छोड़ना भी उचित समझा। उन्होंने साफ किया कि फिलहाल वह किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल होने को लेकर कोई निर्णय नहीं ले रही हैं। भाजपा में शामिल होने की अटकलों पर उन्होंने कहा कि अभी वह कुछ समय आराम करना चाहती हैं और अपने परिवार के साथ समय बिताएंगी।</p>
<p class="isSelectedEnd">इस बीच तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी असंतोष लगातार बड़ा रूप लेता दिखाई दे रहा है। पार्टी के लोकसभा सांसदों और विधायकों के एक बड़े वर्ग ने अलग रुख अपनाया है। हाल के दिनों में बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ी हलचल तब देखने को मिली जब बड़ी संख्या में विधायकों ने अलग गुट बनाकर अपना नेता चुन लिया। बागी खेमे का दावा है कि उनके साथ और भी विधायक जुड़ सकते हैं। इससे पार्टी नेतृत्व की चिंताएं बढ़ गई हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">लोकसभा में भी पार्टी की स्थिति चुनौतीपूर्ण होती दिखाई दे रही है। हाल के घटनाक्रमों के बाद तृणमूल कांग्रेस के कई सांसदों ने अलग रुख अपनाया है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि आने वाले दिनों में कुछ और नेता भी अपना फैसला बदल सकते हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व सार्वजनिक रूप से स्थिति को नियंत्रण में बताने की कोशिश कर रहा है, लेकिन लगातार हो रहे इस्तीफे और बगावत के संकेत अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">इन घटनाक्रमों के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी लगातार सक्रिय नजर आ रहे हैं। दिल्ली में अभिषेक बनर्जी की कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मुलाकात को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार दोनों नेताओं के बीच विपक्षी एकजुटता और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा हुई। इससे एक दिन पहले ममता बनर्जी ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से मुलाकात की थी। दोनों नेताओं की बैठक करीब एक घंटे तक चली थी।</p>
<p class="isSelectedEnd"> तृणमूल कांग्रेस फिलहाल दोहरी चुनौती का सामना कर रही है। एक ओर पार्टी को अपने संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष को संभालना है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका भी मजबूत बनाए रखनी है। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व से लगातार हो रही मुलाकातों को विपक्षी राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। पार्टी में टूट के बाद कई राजनीतिक संभावनाओं पर चर्चा शुरू हो गई है। सबसे पहले कानूनी और संवैधानिक लड़ाई की संभावना जताई जा रही है। बागी गुट और मूल नेतृत्व दोनों अपने-अपने दावों को मजबूत करने की कोशिश करेंगे। विधानसभा, चुनाव आयोग और न्यायालयों में इस मामले को लेकर विवाद बढ़ सकता है। साथ ही दल-बदल कानून को लेकर भी कई सवाल खड़े हो सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd">यदि बागी नेताओं का प्रभाव बढ़ता है तो राज्य की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं। स्थानीय निकाय चुनावों और भविष्य के विधानसभा चुनावों पर भी इसका असर पड़ सकता है। कुछ विशेषज्ञ यह भी मान रहे हैं कि यदि मतभेद और गहरे हुए तो अलग राजनीतिक संगठन या स्थायी गुट के रूप में नई ताकत उभर सकती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि तृणमूल कांग्रेस का भविष्य किस दिशा में जाएगा। पार्टी के सामने संगठन को एकजुट रखने की चुनौती है, जबकि बागी गुट अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत करने की कोशिश में जुटा हुआ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 17:29:26 +0530</pubDate>
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