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                <title>ElectionCommission - दैनिक जागरण</title>
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                <title>TMC में सियासी संकट गहराया, बागी गुट आज चुनाव आयोग से करेगा नई कार्यकारिणी को मान्यता देने की मांग</title>
                                    <description><![CDATA[58 विधायक और 20 सांसदों के समर्थन का दावा करने वाला तृणमूल कांग्रेस का बागी गुट नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी को मान्यता दिलाने के लिए चुनाव आयोग पहुंचेगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/election/political-crisis-deepens-in-tmc-rebel-group-will-demand-from/article-57603"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/tmc-.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी सियासी संकट अब एक नए चरण में प्रवेश कर गया है। पार्टी का बागी गुट गुरुवार को नई दिल्ली में चुनाव आयोग से मुलाकात करेगा और हाल ही में गठित नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी (नेशनल वर्किंग कमेटी) को आधिकारिक मान्यता देने की मांग करेगा। बागी नेताओं का दावा है कि पार्टी के भीतर संगठनात्मक बदलाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत किए गए हैं और उन्हें संवैधानिक मान्यता मिलनी चाहिए। इस घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी हलचल तेज कर दी है। बागी गुट के नेता और पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने बताया कि चुनाव आयोग ने प्रतिनिधिमंडल को दोपहर 12 बजे मिलने का समय दिया है। करीब 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल आयोग के सामने उन सभी दस्तावेजों को पेश करेगा, जिनमें नई कार्यकारिणी के गठन और संगठनात्मक बदलावों का उल्लेख है। उनके अनुसार 22 जून को कोलकाता में आयोजित प्रतिनिधि बैठक में पार्टी के नए अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और 30 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन किया गया था। इस बैठक की जानकारी पहले ही चुनाव आयोग को भेजी जा चुकी है और अब उसी के आधार पर औपचारिक मान्यता की मांग की जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">टीएमसी में यह संकट विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन के बाद खुलकर सामने आया। तीन जून को पार्टी के 80 में से 58 विधायकों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व से अलग होने का फैसला लिया। इसके बाद इन विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना और विधानसभा अध्यक्ष को समर्थन पत्र सौंपते हुए उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाने की मांग की। बाद में इस मांग को मंजूरी भी मिल गई। इसके कुछ दिनों बाद लोकसभा में भी बड़ा घटनाक्रम सामने आया, जब पार्टी के 28 सांसदों में से 20 सांसदों ने अलग रास्ता अपनाने का फैसला किया। बाद में इन सांसदों ने एक अलग राजनीतिक मंच के साथ विलय का निर्णय लिया, जिससे टीएमसी के भीतर संकट और गहरा गया। बागी गुट का कहना है कि उसके पास पार्टी के दो-तिहाई से अधिक विधायक और सांसदों का समर्थन है। दल-बदल कानून की दसवीं अनुसूची के तहत यदि किसी राजनीतिक दल के दो-तिहाई निर्वाचित सदस्य किसी अलग समूह का समर्थन करते हैं या विलय का फैसला लेते हैं, तो उन्हें कानूनी संरक्षण मिल सकता है। इसी आधार पर बागी गुट खुद को वैध संगठन बताते हुए चुनाव आयोग से नई कार्यकारिणी को मान्यता देने की मांग कर रहा है। हालांकि अंतिम निर्णय चुनाव आयोग, विधानसभा अध्यक्ष और आवश्यक होने पर न्यायपालिका के स्तर पर ही होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला केवल संगठनात्मक बदलाव तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले दिनों में पार्टी के नाम, चुनाव चिन्ह और संगठन पर अधिकार को लेकर भी कानूनी लड़ाई तेज हो सकती है। यदि दोनों पक्ष अपने-अपने दावों पर कायम रहते हैं तो मामला उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच सकता है। ऐसे में चुनाव आयोग की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। टीएमसी के भीतर पैदा हुआ यह संकट कई राजनीतिक विश्लेषकों को महाराष्ट्र में शिवसेना में हुई बगावत की याद दिला रहा है। वहां भी बड़ी संख्या में विधायक तत्कालीन नेतृत्व से अलग हो गए थे और बाद में संगठन, चुनाव चिन्ह और वैधता को लेकर लंबी कानूनी प्रक्रिया चली थी। आखिरकार चुनाव आयोग और विधानसभा अध्यक्ष के फैसलों ने राजनीतिक समीकरण बदल दिए थे। अब पश्चिम बंगाल में भी कुछ वैसी ही स्थिति बनने की चर्चा तेज हो गई है, हालांकि अंतिम फैसला संवैधानिक संस्थाओं के निर्णय पर निर्भर करेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो ममता बनर्जी के पास विधानसभा में केवल 22 विधायक बचे होने का दावा किया जा रहा है, जबकि लोकसभा में भी उनके साथ सांसदों की संख्या काफी कम हो गई है। राज्यसभा में भी कुछ सांसदों के इस्तीफे के बाद उनकी संसदीय ताकत पहले की तुलना में कमजोर बताई जा रही है। हालांकि ममता समर्थक गुट इन दावों से सहमत नहीं है और पूरे घटनाक्रम को कानूनी चुनौती देने की तैयारी में जुटा हुआ है। यदि चुनाव आयोग बागी गुट के दावों पर विचार करता है तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। दूसरी ओर यदि मामला अदालत तक जाता है तो अंतिम निर्णय आने में समय लग सकता है। इस दौरान दोनों गुट अपने-अपने समर्थकों को मजबूत करने और संगठन पर पकड़ बनाए रखने की कोशिश करेंगे। जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक कई नेताओं की भूमिका भी आने वाले दिनों में बदल सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल तृणमूल कांग्रेस तक सीमित नहीं रहेगा। विपक्षी दल भी इस स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। यदि पार्टी में टूट और गहराती है तो आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों, उपचुनावों और भविष्य की राजनीतिक रणनीतियों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही राष्ट्रीय राजनीति में भी ममता बनर्जी की भूमिका और विपक्षी गठबंधन में उनकी स्थिति को लेकर नए समीकरण बनने की संभावना जताई जा रही है। आयोग के सामने रखे जाने वाले दस्तावेज, दोनों पक्षों के दावे और आगे की कानूनी प्रक्रिया यह तय करेगी कि तृणमूल कांग्रेस के संगठनात्मक विवाद का अगला अध्याय किस दिशा में आगे बढ़ेगा। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                            <category>चुनाव</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 10:10:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>TMC ने चुनाव आयोग को भेजी नई सूची, ममता बनर्जी को फिर बताया पार्टी प्रमुख</title>
                                    <description><![CDATA[बागी गुट द्वारा समानांतर कार्यसमिति के गठन के एक दिन बाद तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग को पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्यसमिति की सूची सौंपी। सूची में ममता बनर्जी अध्यक्ष और अभिषेक बनर्जी राष्ट्रीय महासचिव बने हुए हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/tmc-sent-new-list-to-election-commission-and-again-declared/article-56718"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/tmc-.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) में संगठनात्मक विवाद के बीच पार्टी ने चुनाव आयोग को अपने पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्यसमिति की अद्यतन सूची भेज दी है। पार्टी द्वारा आयोग को उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों में ममता बनर्जी को अध्यक्ष, सुभ्रत बक्शी को उपाध्यक्ष और अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव के रूप में दर्शाया गया है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब एक दिन पहले पार्टी के बागी गुट ने समानांतर राष्ट्रीय कार्यसमिति बनाने और विधायक अरूप रॉय को अध्यक्ष घोषित करने का दावा किया था।</p>
<p class="isSelectedEnd">पार्टी सूत्रों के मुताबिक, चुनाव आयोग को भेजी गई सूची 20 जून 2026 तक की संगठनात्मक स्थिति के आधार पर तैयार की गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम पार्टी नेतृत्व की वैधता और संगठनात्मक संरचना को लेकर उठ रहे सवालों के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इधर, तृणमूल कांग्रेस ने बागी गुट से जुड़े आठ नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। पार्टी का आरोप है कि ये नेता संगठन विरोधी गतिविधियों में शामिल रहे हैं और आधिकारिक लाइन से अलग काम कर रहे हैं। हालांकि बागी गुट का दावा है कि उसने पार्टी संविधान के तहत संगठनात्मक रिक्तता को भरने के लिए नई कार्यसमिति गठित की है।</p>
<h2>कार्यसमिति पर विवाद</h2>
<p class="isSelectedEnd">चुनाव आयोग को भेजी गई सूची के अनुसार, राष्ट्रीय कार्यसमिति में कुल 24 नेताओं को शामिल किया गया है। इनमें डेरेक ओ'ब्रायन और डोला सेन को संयुक्त सचिव की जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा महुआ मोइत्रा, सौगत रॉय, कल्याण बनर्जी, मदन मित्रा, अमित मित्रा और चंद्रिमा भट्टाचार्य समेत कई वरिष्ठ नेताओं को कार्यसमिति में स्थान मिला है।</p>
<p class="isSelectedEnd">दूसरी ओर, विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने कोलकाता में बैठक कर समानांतर राष्ट्रीय कार्यसमिति के गठन का ऐलान किया था। इस गुट ने अरूप रॉय को अध्यक्ष तथा फिरहाद हकीम, अरूप बिस्वास, रथिन घोष और सबीना यास्मीन को उपाध्यक्ष घोषित किया था।</p>
<h2>नेतृत्व पर सियासी संदेश</h2>
<p class="isSelectedEnd">बागी नेताओं का कहना है कि फरवरी 2022 में गठित राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल फरवरी 2026 में समाप्त हो गया था और नई समिति का गठन नहीं होने के कारण उन्होंने यह कदम उठाया। वहीं, तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने इस दावे को खारिज कर दिया है।</p>
<p class="isSelectedEnd">पार्टी नेता कुणाल घोष ने कहा कि बागी गुट को तृणमूल कांग्रेस के नाम पर कोई समानांतर संगठन चलाने का अधिकार नहीं है। सांसद सौगत रॉय ने भी स्पष्ट किया कि ममता बनर्जी पार्टी की संस्थापक और सर्वोच्च नेता हैं तथा संगठन की पहचान उनके नेतृत्व से ही जुड़ी हुई है।</p>
<p class="isSelectedEnd">इस बीच हुगली जिले में तृणमूल कांग्रेस के एक स्थानीय नेता के खिलाफ प्रदर्शन की घटना भी चर्चा में रही। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने इसे स्थानीय स्तर का मामला बताया है और संगठनात्मक विवाद से जोड़ने से इनकार किया है।</p>
<p>राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, चुनाव आयोग को भेजी गई नई सूची तृणमूल कांग्रेस की ओर से संगठनात्मक स्थिति स्पष्ट करने का प्रयास है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बागी गुट की गतिविधियों पर पार्टी क्या अनुशासनात्मक कदम उठाती है और चुनाव आयोग के समक्ष संगठनात्मक विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समाचार, भारत समाचार अपडेट तथा ट्रेंडिंग न्यूज इंडिया में यह घटनाक्रम पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 13:54:42 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>आधार को नागरिकता का प्रमाण मानने पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से मांगा जवाब</title>
                                    <description><![CDATA[याचिका में कहा गया- आधार केवल पहचान का दस्तावेज, नागरिकता, निवास और जन्मतिथि के प्रमाण के रूप में इस्तेमाल करना कानून के खिलाफ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/question-on-considering-aadhaar-as-proof-of-citizenship-supreme-court/article-56124"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/aadhaar-card.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">देश में आधार कार्ड के इस्तेमाल को लेकर एक बार फिर कानूनी बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, सभी राज्यों और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में मांग की गई है कि आधार कार्ड का उपयोग केवल पहचान साबित करने के लिए किया जाए और इसे नागरिकता, निवास, पते या जन्मतिथि के प्रमाण के रूप में स्वीकार न किया जाए। अदालत के इस कदम ने आधार की कानूनी स्थिति और उसके विभिन्न सरकारी प्रक्रियाओं में उपयोग को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने की। याचिका अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि आधार अधिनियम, 2016 की धारा 9 स्पष्ट रूप से बताती है कि आधार संख्या किसी व्यक्ति को नागरिकता या निवास का अधिकार प्रदान नहीं करती और न ही इसे नागरिकता या डोमिसाइल का प्रमाण माना जा सकता है। याचिकाकर्ता ने भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) की अगस्त 2023 की अधिसूचना का भी उल्लेख किया है, जिसमें कहा गया था कि आधार केवल पहचान का प्रमाण है, न कि नागरिकता, पते या जन्मतिथि का प्रमाण।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">याचिका में आरोप लगाया गया है कि कानून और अधिसूचनाओं में स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद देश के कई हिस्सों में आधार कार्ड को उम्र, निवास और नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। इसके तहत स्कूलों में प्रवेश, संपत्ति की खरीद-बिक्री, जन्म प्रमाण पत्र बनवाने, राशन कार्ड हासिल करने और ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त करने जैसी प्रक्रियाओं में आधार का उपयोग किया जा रहा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे कानून की मूल भावना प्रभावित हो रही है और आधार की सीमाओं का उल्लंघन हो रहा है। याचिका में विशेष रूप से नए मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 का भी उल्लेख किया गया है। दावा किया गया है कि इस फॉर्म में आधार को जन्मतिथि और निवास के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 23(4) के तहत आधार का उपयोग केवल पहचान स्थापित करने के लिए किया जा सकता है, न कि उम्र या निवास साबित करने के लिए। इसलिए फॉर्म-6 में इस तरह का उपयोग कानून के अनुरूप नहीं है। याचिका में यह भी कहा गया है कि आधार कार्ड प्राप्त करने के लिए भारतीय नागरिक होना आवश्यक नहीं है। आधार अधिनियम के अनुसार कोई भी निवासी, जिसने एक निर्धारित अवधि तक भारत में निवास किया हो, आधार संख्या प्राप्त करने के लिए पात्र हो सकता है। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने चिंता जताई है कि विदेशी नागरिक, अवैध प्रवासी या घुसपैठिए भी आधार प्राप्त कर सकते हैं और बाद में अन्य दस्तावेज हासिल करने में इसका उपयोग कर सकते हैं। याचिका में दावा किया गया है कि इसी प्रक्रिया के जरिए कुछ लोग मतदाता पहचान पत्र और अन्य सरकारी दस्तावेज प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">याचिकाकर्ता ने अदालत से केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और चुनाव आयोग को निर्देश देने की मांग की है कि आधार कार्ड को केवल पहचान के दस्तावेज के रूप में ही इस्तेमाल किया जाए। इसके अलावा फॉर्म-6 में आधार को जन्मतिथि और निवास प्रमाण के रूप में स्वीकार करने की व्यवस्था को भी रद्द करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि यह व्यवस्था आधार अधिनियम, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और संविधान के अनुच्छेद 14 की भावना के विपरीत है। मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया गया है। याचिका के अनुसार अवैध आव्रजन और घुसपैठ का असर चुनावी व्यवस्था, जनसांख्यिकीय संतुलन और सुरक्षा संबंधी मामलों पर पड़ सकता है। इसी कारण आधार के उपयोग की सीमा को स्पष्ट रूप से तय करना जरूरी है। हालांकि इन दावों पर अंतिम निर्णय अभी अदालत को करना है और केंद्र तथा राज्यों के जवाब के बाद ही मामले की विस्तृत सुनवाई आगे बढ़ेगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद अब इस मामले पर सभी पक्षों की नजरें टिकी हुई हैं। आने वाले समय में अदालत का फैसला आधार कार्ड के उपयोग को लेकर महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकता है। यह मामला केवल एक दस्तावेज के उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि पहचान, नागरिकता, चुनावी प्रक्रिया और प्रशासनिक व्यवस्थाओं से जुड़े व्यापक सवालों को भी सामने ला रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 18:09:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मीनाक्षी नटराजन के नामांकन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट पहुंची कांग्रेस</title>
                                    <description><![CDATA[चुनाव आयोग के फैसले का इंतजार, आज दिल्ली में कांग्रेस की अहम बैठक और राष्ट्रपति से मुलाकात प्रस्तावित]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/congress-reaches-supreme-court-on-meenakshi-natarajans-nomination-dispute/article-55599"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/meenakshi-natarajan-(2).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश की राज्यसभा सीट को लेकर चल रहा राजनीतिक घटनाक्रम अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। कांग्रेस ने अपनी उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। जानकारी के अनुसार यह याचिका बुधवार और गुरुवार की दरमियानी रात डिजिटल माध्यम से दाखिल की गई। पार्टी का कहना है कि नामांकन निरस्त करने का फैसला उचित नहीं है और मामले की न्यायिक समीक्षा की जानी चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस बीच चुनाव आयोग के रुख पर भी सभी की नजर बनी हुई है। कांग्रेस की ओर से आयोग के समक्ष अपना पक्ष रखा जा चुका है और अब फैसले का इंतजार किया जा रहा है। राजनीतिक हलकों में गुरुवार दोपहर 3 बजे तक की अवधि को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि राज्यसभा चुनाव प्रक्रिया में नाम वापसी की अंतिम समयसीमा इसी समय तक निर्धारित है। ऐसे में आयोग की ओर से आने वाला कोई भी निर्णय आगे की चुनावी तस्वीर को प्रभावित कर सकता है। फिलहाल आयोग की तरफ से सार्वजनिक रूप से कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मामले को लेकर कांग्रेस ने दिल्ली में भी गतिविधियां तेज कर दी हैं। पार्टी मुख्यालय में वरिष्ठ नेताओं की बैठक बुलाई गई है जिसमें मौजूदा स्थिति और आगे की रणनीति पर चर्चा होने की संभावना है। बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सहित कई वरिष्ठ नेता, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और संगठन के प्रभारी शामिल हो सकते हैं। बताया जा रहा है कि बैठक में कानूनी पहलुओं के साथ-साथ राजनीतिक स्थिति पर भी विचार किया जाएगा। इसी क्रम में कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात का कार्यक्रम भी तय किया गया है। पार्टी इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी राष्ट्रपति को देने और अपना पक्ष रखने की तैयारी में है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन 9 जून को जांच प्रक्रिया के दौरान निरस्त कर दिया गया था। नामांकन पत्रों की स्क्रूटनी के समय उनके हलफनामे से जुड़ी एक आपत्ति सामने आई थी। इसके बाद रिटर्निंग ऑफिसर ने उपलब्ध दस्तावेजों और आपत्तियों पर विचार करते हुए नामांकन रद्द करने का निर्णय लिया। यही फैसला अब विवाद का विषय बना हुआ है और कांग्रेस इसे चुनौती दे रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने चुनाव आयोग के समक्ष अपना पक्ष रखा। उनका कहना है कि जिस मामले का उल्लेख किया जा रहा है वह किसी आपराधिक मुकदमे की श्रेणी में नहीं आता। कांग्रेस का तर्क है कि संबंधित अदालत की ओर से केवल कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था और इसे लंबित आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर पार्टी का कहना है कि हलफनामे में उस जानकारी का उल्लेख अनिवार्य नहीं था। पार्टी का मानना है कि पूरे मामले की कानूनी स्थिति को देखते हुए नामांकन रद्द किए जाने के फैसले पर पुनर्विचार होना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अब आगे की स्थिति चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पर निर्भर करेगी। यदि आयोग किसी स्तर पर राहत देता है तो चुनाव प्रक्रिया में आगे बदलाव संभव हो सकता है। वहीं यदि आयोग अपने पूर्व निर्णय को बरकरार रखता है तो कानूनी लड़ाई अदालत में आगे बढ़ सकती है। दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका पर सुनवाई कब होगी, इसे लेकर अभी कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।</p>
<p style="text-align:justify;">गुरुवार का दिन इस मामले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि चुनावी प्रक्रिया की निर्धारित समयसीमाएं और संभावित कानूनी कदम आगे की दिशा तय कर सकते हैं। ऐसे में चुनाव आयोग और न्यायालय की अगली कार्रवाई का इंतजार किया जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>चुनाव</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 12:37:03 +0530</pubDate>
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