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                <title>Diabetes - दैनिक जागरण</title>
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                <description>Diabetes RSS Feed</description>
                
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                <title>भारत में लॉन्च हुई दुनिया की पहली साप्ताहिक बेसल इंसुलिन, डायबिटीज मरीजों को अब हफ्ते में सिर्फ एक इंजेक्शन</title>
                                    <description><![CDATA[नोवो नॉर्डिस्क की Awiqli (इंसुलिन आइकोडेक) से रोजाना इंजेक्शन की जरूरत होगी खत्म, टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज के वयस्क मरीजों के लिए नई उम्मीद। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/worlds-first-weekly-basal-insulin-launched-in-india-diabetes-patients/article-58315"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/awiqli.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer">भारत में डायबिटीज के इलाज के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है। डेनमार्क की दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क ने देश में Awiqli (इंसुलिन आइकोडेक) लॉन्च कर दी है। कंपनी का दावा है कि यह दुनिया की पहली ऐसी सप्ताह में एक बार दी जाने वाली बेसल इंसुलिन है, जिसे टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित वयस्क मरीजों के लिए विकसित किया गया है। इस नई तकनीक के आने से उन मरीजों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्हें अब तक हर दिन इंसुलिन का इंजेक्शन लगाना पड़ता था।</p>
<p>अब तक अधिकांश इंसुलिन पर निर्भर मरीजों को रोजाना बेसल इंसुलिन लेना पड़ता था। यानी पूरे साल में करीब 365 इंजेक्शन लगाने पड़ते थे। नई साप्ताहिक बेसल इंसुलिन के आने से यह संख्या घटकर केवल 52 इंजेक्शन सालाना रह जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल मरीजों की दिनचर्या आसान होगी, बल्कि इलाज को नियमित रूप से अपनाने की संभावना भी बढ़ेगी।</p>
<p>नोवो नॉर्डिस्क के अनुसार, भारत में इंसुलिन थेरेपी शुरू करने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक रोजाना इंजेक्शन लगाने का डर है। कई मरीज इंसुलिन शुरू करने से बचते रहते हैं और इलाज में सात से नौ साल तक की देरी हो जाती है। इस देरी के कारण ब्लड शुगर लंबे समय तक अनियंत्रित रहती है, जिससे हृदय, किडनी, आंखों और नसों से जुड़ी गंभीर जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है।</p>
<p>कंपनी ने Awiqli का 700 यूनिट पैक 2,611 रुपये में लॉन्च किया है। इस हिसाब से इसकी कीमत लगभग 3.73 रुपये प्रति यूनिट पड़ती है। कंपनी का दावा है कि यह मौजूदा दैनिक बेसल इंसुलिन की तुलना में 30 से 40 प्रतिशत तक अधिक किफायती है। यदि किसी मरीज को रोजाना 10 यूनिट इंसुलिन की आवश्यकता होती है, तो उसे सप्ताह में 70 यूनिट इंसुलिन लगेगी, जिसकी अनुमानित लागत लगभग 261 रुपये प्रति सप्ताह होगी।</p>
<p>नई इंसुलिन को FlexTouch पेन डिवाइस के जरिए सप्ताह में केवल एक बार लगाया जाएगा। यह पेन उपयोग में आसान है और मरीज स्वयं भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार इसे इस्तेमाल कर सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इंजेक्शन की संख्या कम होने से मरीज इलाज को बीच में छोड़ने की संभावना भी कम होगी।</p>
<p>मुंबई के वरिष्ठ डायबिटीज विशेषज्ञ डॉ. राजीव कोविल का कहना है कि इस दवा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रतिस्पर्धी कीमत और आसान उपयोग है। उनके अनुसार, क्लिनिकल ट्रायल में Awiqli ने कई मामलों में रोजाना दी जाने वाली बेसल इंसुलिन के बराबर या उससे बेहतर ब्लड शुगर नियंत्रण दिखाया है। इससे यह तकनीक केवल बड़े शहरों या सीमित मरीजों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अधिक लोगों तक पहुंच सकेगी।</p>
<p>क्लिनिकल ट्रायल के दौरान ONWARDS-1 प्रोग्राम के आंकड़ों में यह सामने आया कि Awiqli ने ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने और HbA1c स्तर कम करने में सकारात्मक परिणाम दिए। कंपनी के अनुसार, टाइप-2 डायबिटीज के अधिक मरीज बिना गंभीर हाइपोग्लाइसीमिया की समस्या के HbA1c को 7 प्रतिशत से नीचे लाने में सफल रहे। हालांकि, किसी भी मरीज के लिए दवा की उपयुक्तता का निर्णय उसके चिकित्सक द्वारा ही किया जाना चाहिए।</p>
<p>भारत में डायबिटीज तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है। अनुमान के अनुसार, देश में करीब 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं, जबकि लगभग 13.6 करोड़ लोग प्री-डायबिटीज की स्थिति में हैं। इसके अलावा 9 लाख से अधिक लोग टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित हैं, जिनके इलाज में इंसुलिन अनिवार्य है। वहीं टाइप-2 डायबिटीज के लगभग 10 प्रतिशत मरीजों को भी समय के साथ इंसुलिन थेरेपी की आवश्यकता पड़ती है।</p>
<p>नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. एस.के. वांगनू का कहना है कि इंसुलिन शुरू करने में देरी और इलाज का नियमित पालन न करना आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। उनके अनुसार, यदि मरीजों को कम इंजेक्शन लगाने पड़ें और उपचार सरल हो, तो अधिक लोग समय रहते इंसुलिन थेरेपी शुरू कर सकते हैं, जिससे भविष्य में जटिलताओं का खतरा कम होगा।</p>
<p>नोवो नॉर्डिस्क इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर विक्रांत श्रोत्रिया ने इसे भारत में डायबिटीज उपचार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है। उनका कहना है कि सप्ताह में केवल एक बार की डोज मरीजों पर मानसिक और शारीरिक दोनों तरह का बोझ कम करेगी। साथ ही इससे इलाज को नियमित रूप से जारी रखने में भी मदद मिलेगी। भारत में फिलहाल लगभग 60 लाख लोग इंसुलिन थेरेपी ले रहे हैं, </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 16:51:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>रायपुर में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग शुरू नहीं, डायबिटीज मरीजों को विशेषज्ञ इलाज का इंतजार</title>
                                    <description><![CDATA[डीकेएस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में शासन की मंजूरी के बावजूद एंडोक्राइनोलॉजी विभाग अब तक शुरू नहीं हो सका। आंबेडकर अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद होने के बावजूद डायबिटीज और हार्मोनल बीमारियों के मरीजों को अलग विशेषज्ञ सेवाएं नहीं मिल रही हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/raipur/endocrinology-department-not-started-in-raipur-diabetes-patients-wait-for/article-57779"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/dks-hospital.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राजधानी रायपुर के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थानों में शामिल डॉ. भीमराव आंबेडकर स्मृति चिकित्सालय और डीकेएस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में डायबिटीज और हार्मोन से जुड़ी बीमारियों के मरीजों को अब तक विशेषज्ञ उपचार की सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाई है। राज्य सरकार की मंजूरी मिलने के बाद भी डीकेएस अस्पताल में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग शुरू नहीं हो सका है, जबकि आंबेडकर अस्पताल में सुपर स्पेशलिटी डिग्रीधारी डॉक्टर होने के बावजूद मरीजों को इस विशेषज्ञता का लाभ नहीं मिल रहा। इससे प्रतिदिन सैकड़ों मरीज सामान्य विभागों में इलाज कराने को मजबूर हैं। मधुमेह और हार्मोनल रोगों की बढ़ती संख्या को देखते हुए एंडोक्राइनोलॉजी विभाग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। इसके बावजूद राजधानी के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में यह सुविधा शुरू नहीं होना मरीजों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आंबेडकर अस्पताल की ओपीडी में प्रतिदिन लगभग 2,500 से अधिक मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं। इनमें करीब 20 प्रतिशत यानी 500 से अधिक मरीज डायबिटीज, थायरॉयड, हार्मोन असंतुलन, पिट्यूटरी और अन्य अंतःस्रावी (एंडोक्राइन) रोगों से पीड़ित होते हैं। विशेषज्ञ विभाग नहीं होने के कारण इन मरीजों का इलाज फिलहाल मेडिसिन, जिरियाट्रिक और पीडियाट्रिक विभागों के चिकित्सकों द्वारा किया जा रहा है। हालांकि जटिल मामलों में एंडोक्राइनोलॉजिस्ट की विशेषज्ञ सलाह की जरूरत महसूस की जाती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">राज्य शासन ने डीकेएस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग स्थापित करने की मंजूरी पहले ही दे दी थी। इसके लिए आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी पूरी की जा चुकी हैं, लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति नहीं होने के कारण विभाग आज तक शुरू नहीं हो पाया। अस्पताल प्रबंधन नियमित रूप से विशेषज्ञ डॉक्टरों की भर्ती के लिए वॉक-इन इंटरव्यू आयोजित कर रहा है, लेकिन अब तक कोई योग्य चिकित्सक स्थायी रूप से नियुक्त नहीं हुआ है। इसका सीधा असर मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। आंबेडकर अस्पताल में डीएम एंडोक्राइनोलॉजी की डिग्री प्राप्त एक विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद हैं। इसके बावजूद वे एंडोक्राइनोलॉजी विभाग में सेवाएं नहीं दे रहे हैं। बताया जाता है कि उनकी वर्तमान पदस्थापना पीडियाट्रिक विभाग में है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">डॉक्टर का तर्क है कि उन्हें उनकी सुपर स्पेशलिटी योग्यता के अनुरूप पद और वेतनमान नहीं मिला है। इसी कारण वे अपनी विशेषज्ञता के अनुरूप सेवाएं नहीं दे रहे हैं। हालांकि प्रशासनिक जानकारी के अनुसार उन्हें डीएम डिग्री के आधार पर तीन अतिरिक्त वेतन वृद्धि (इंक्रीमेंट) का लाभ दिया जा चुका है। सरकारी प्रायोजन (स्पॉन्सरशिप) के तहत सुपर स्पेशलिटी की पढ़ाई करने वाले डॉक्टरों को निर्धारित अवधि तक उसी विषय में सरकारी सेवा देना अनिवार्य होता है। इसके लिए बांड भी भरवाया जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">ऐसे में स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकार सवाल उठा रहे हैं कि यदि किसी डॉक्टर ने सरकारी खर्च पर एंडोक्राइनोलॉजी की पढ़ाई की है तो उनकी विशेषज्ञता का उपयोग उसी विभाग में क्यों नहीं हो रहा। उनका मानना है कि इससे सरकारी संसाधनों का पूरा लाभ मरीजों तक नहीं पहुंच पा रहा है। डायबिटीज केवल रक्त में शुगर बढ़ने की बीमारी नहीं है। यदि समय पर उचित इलाज और निगरानी न मिले तो यह हृदय, किडनी, आंखों, नसों और मस्तिष्क पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसी वजह से कार्डियोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, न्यूरोलॉजी और न्यूरोसर्जरी विभागों में भी बड़ी संख्या में ऐसे मरीज पहुंचते हैं, जिनकी मूल समस्या डायबिटीज से जुड़ी होती है। एंडोक्राइनोलॉजी विशेषज्ञ इन जटिलताओं को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। डायबिटीज के अलावा थायरॉयड विकार, मोटापा, हार्मोन असंतुलन, बच्चों में ग्रोथ संबंधी समस्याएं, महिलाओं में हार्मोनल विकार और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारियों के मामलों में भी लगातार वृद्धि हो रही है। इन सभी बीमारियों के लिए एंडोक्राइनोलॉजी विशेषज्ञ की आवश्यकता होती है। लेकिन विशेषज्ञ विभाग उपलब्ध नहीं होने से मरीजों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जहां इलाज का खर्च काफी अधिक होता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">डीकेएस अस्पताल प्रशासन का कहना है कि विभाग शुरू करने की पूरी तैयारी है। अस्पताल के उप अधीक्षक डॉ. हेमंत शर्मा के अनुसार हर महीने एंडोक्राइनोलॉजी विशेषज्ञों की भर्ती के लिए वॉक-इन इंटरव्यू आयोजित किए जा रहे हैं। जैसे ही योग्य डॉक्टर उपलब्ध होंगे, विभाग की शुरुआत कर दी जाएगी। प्रशासन का कहना है कि राज्य सरकार भी इस दिशा में लगातार प्रयास कर रही है ताकि मरीजों को जल्द से जल्द विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें।रायपुर जैसे बड़े चिकित्सा केंद्र में एंडोक्राइनोलॉजी विभाग का संचालन समय की आवश्यकता है। इससे न केवल राजधानी बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के मरीजों को बेहतर इलाज मिल सकेगा। वर्तमान में कई मरीजों को रायपुर से बाहर अन्य राज्यों के बड़े अस्पतालों में जाना पड़ता है, जिससे समय और धन दोनों की अतिरिक्त लागत आती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>रायपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 18:25:27 +0530</pubDate>
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                <title>डायबिटीज मरीजों के लिए क्यों खास है जामुन? ब्लड शुगर कंट्रोल से लेकर दिल की सेहत तक पहुंचाता फायदे</title>
                                    <description><![CDATA[कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स, एंटीऑक्सीडेंट्स और प्राकृतिक यौगिकों से भरपूर जामुन को विशेषज्ञ मधुमेह नियंत्रण में सहायक मानते हैं, लेकिन इसे दवा का विकल्प नहीं माना जाता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/6a2aa41c675a5/article-55674"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/jamun-benefits.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">गर्मियों के मौसम में बाजारों में नजर आने वाला जामुन केवल स्वाद और ताजगी के लिए ही नहीं, बल्कि अपने कई स्वास्थ्य लाभों के कारण भी लोगों के बीच लोकप्रिय है। गहरे बैंगनी रंग का यह फल वर्षों से आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। खासतौर पर डायबिटीज यानी मधुमेह के मरीजों के लिए जामुन को काफी फायदेमंद माना जाता है। जामुन में मौजूद कई प्राकृतिक तत्व रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद कर सकते हैं, हालांकि इसे किसी भी स्थिति में दवा का विकल्प नहीं समझना चाहिए। डायबिटीज आज दुनिया भर में तेजी से बढ़ने वाली बीमारियों में शामिल है। बदलती जीवनशैली, असंतुलित खानपान और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। ऐसे में ऐसे खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ रही है जो प्राकृतिक रूप से ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मदद कर सकें। जामुन उन्हीं फलों में से एक माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जामुन का सबसे महत्वपूर्ण गुण इसका कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स है। ग्लाइसेमिक इंडेक्स यह बताता है कि कोई खाद्य पदार्थ शरीर में जाकर रक्त शर्करा को कितनी तेजी से बढ़ाता है। कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले खाद्य पदार्थ धीरे-धीरे पचते हैं और ब्लड शुगर में अचानक वृद्धि नहीं होने देते। यही कारण है कि जामुन को मधुमेह रोगियों के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित फल माना जाता है। जामुन में जंबोलिन और जंबोसिन जैसे प्राकृतिक यौगिक पाए जाते हैं। कई शोधों और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इन तत्वों को ब्लड शुगर नियंत्रण से जोड़ा गया है। माना जाता है कि ये यौगिक शरीर में कार्बोहाइड्रेट के ग्लूकोज में बदलने की प्रक्रिया को धीमा कर सकते हैं। इससे रक्त में शर्करा का स्तर नियंत्रित रखने में सहायता मिल सकती है। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ये तत्व इंसुलिन की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जामुन में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स भी इसे स्वास्थ्य के लिए बेहद उपयोगी बनाते हैं। इसका गहरा बैंगनी रंग एंथोसायनिन नामक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट के कारण होता है। डायबिटीज के मरीजों में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन की समस्या अधिक देखी जाती है। एंटीऑक्सीडेंट शरीर की कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं और कई दीर्घकालिक बीमारियों के जोखिम को कम कर सकते हैं। जामुन का नियमित और संतुलित सेवन शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में योगदान दे सकता है। केवल जामुन का फल ही नहीं, बल्कि इसके बीज भी काफी उपयोगी माने जाते हैं। आयुर्वेद में जामुन के बीजों का विशेष महत्व बताया गया है। बीजों को सुखाकर तैयार किया गया पाउडर कई लोग ब्लड शुगर नियंत्रण के लिए इस्तेमाल करते हैं। माना जाता है कि सीमित मात्रा में इसका सेवन उपवास के दौरान बढ़े हुए शुगर स्तर को नियंत्रित रखने में मदद कर सकता है। हालांकि डॉक्टरों की सलाह के बिना किसी भी हर्बल उत्पाद का नियमित उपयोग नहीं करना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जामुन का फायदा केवल डायबिटीज तक सीमित नहीं है। इसमें भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है, जो पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मदद करता है। फाइबर लंबे समय तक पेट भरा होने का एहसास कराता है, जिससे बार-बार भूख लगने की समस्या कम हो सकती है। यही वजह है कि वजन नियंत्रित रखने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए भी जामुन एक अच्छा विकल्प माना जाता है। इसके अलावा जामुन में पोटैशियम, आयरन और विटामिन सी जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं। पोटैशियम रक्तचाप को नियंत्रित रखने में मदद करता है, जबकि आयरन शरीर में हीमोग्लोबिन के स्तर को बनाए रखने में सहायक माना जाता है। विटामिन सी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है और शरीर में आयरन के अवशोषण को बेहतर करने में मदद करता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हृदय स्वास्थ्य के लिहाज से भी जामुन को लाभकारी माना जाता है। इसमें मौजूद फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित रखने में मदद कर सकते हैं। चूंकि डायबिटीज और हृदय रोगों का आपस में गहरा संबंध होता है, इसलिए ऐसे खाद्य पदार्थों का महत्व और बढ़ जाता है जो दोनों स्थितियों में लाभ पहुंचा सकें। जामुन का सेवन संतुलित मात्रा में किया जाना चाहिए। सामान्य तौर पर मौसम के दौरान प्रतिदिन 8 से 10 ताजे जामुन खाना पर्याप्त माना जाता है। इसे सुबह और दोपहर के भोजन के बीच या शाम के हल्के नाश्ते के रूप में खाया जा सकता है। वहीं बीजों के पाउडर का सेवन करने से पहले डॉक्टर या पोषण विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">केवल जामुन खाने से डायबिटीज पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो सकती। इसके लिए संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच भी जरूरी है। जामुन को एक सहायक खाद्य पदार्थ के रूप में देखा जाना चाहिए, जो स्वस्थ जीवनशैली को और बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। गर्मियों में उपलब्ध यह छोटा सा फल स्वाद के साथ-साथ कई स्वास्थ्य लाभ भी प्रदान करता है। यही वजह है कि जामुन को प्राकृतिक रूप से स्वास्थ्यवर्धक फलों की श्रेणी में शामिल किया जाता है और विशेषज्ञ भी इसे संतुलित आहार का हिस्सा बनाने की सलाह देते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 17:53:41 +0530</pubDate>
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