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                <title>Nutrition - दैनिक जागरण</title>
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                <title>सुबह उठते ही पानी पीने की आदत बदल सकती है आपकी सेहत, जानिए इसके बड़े फायदे</title>
                                    <description><![CDATA[दिन की शुरुआत पानी से करने पर शरीर को मिलता है हाइड्रेशन, मेटाबॉलिज्म होता है सक्रिय और पूरे दिन बनी रहती है ताजगी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/the-habit-of-drinking-water-as-soon-as-you-wake/article-58303"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-07/morning-water-benefits.jpg" alt=""></a><br /><p class="PDq2pG_selectionAnchorContainer" style="text-align:justify;">सुबह उठते ही अधिकांश लोग अपनी दिनचर्या की शुरुआत चाय या कॉफी से करते हैं, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दिन की शुरुआत एक या दो गिलास सादे पानी से की जाए तो इसका असर पूरे शरीर पर सकारात्मक रूप से दिखाई देता है। रातभर करीब 6 से 8 घंटे की नींद के दौरान शरीर को पानी नहीं मिलता, जिससे हल्का डिहाइड्रेशन होना सामान्य बात है। ऐसे में सुबह उठते ही पानी पीना शरीर में पानी की कमी को पूरा करने का सबसे आसान और प्रभावी तरीका माना जाता है।  रात के समय शरीर लगातार कई जैविक प्रक्रियाओं से गुजरता है। इस दौरान सांस लेने, पसीना आने और अन्य प्राकृतिक क्रियाओं के कारण शरीर से पानी की थोड़ी-बहुत मात्रा निकलती रहती है। सुबह उठने पर सबसे पहले पानी पीने से शरीर दोबारा हाइड्रेट होता है और दिनभर बेहतर तरीके से काम करने के लिए तैयार हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुबह पानी पीने से मेटाबॉलिज्म भी सक्रिय होने लगता है। मेटाबॉलिज्म वह प्रक्रिया है, जिसके जरिए शरीर भोजन को ऊर्जा में बदलता है। यदि दिन की शुरुआत पर्याप्त पानी से होती है तो शरीर ऊर्जा का बेहतर उपयोग करता है। यही वजह है कि फिटनेस एक्सपर्ट भी सुबह खाली पेट पानी पीने की सलाह देते हैं। कई लोग सुबह उठते ही थकान, भारीपन या सुस्ती महसूस करते हैं। इसका एक कारण शरीर में पानी की कमी भी हो सकती है। सुबह पानी पीने से शरीर को ताजगी मिलती है और दिमाग भी अधिक सतर्क महसूस करता है। इससे दिनभर काम करने की क्षमता बेहतर हो सकती है। पाचन तंत्र के लिए भी सुबह पानी पीना फायदेमंद माना जाता है। पर्याप्त पानी पेट और आंतों की कार्यप्रणाली को सामान्य बनाए रखने में मदद करता है। जिन लोगों को कब्ज की समस्या रहती है, उनके लिए सुबह खाली पेट पानी पीने की आदत लाभदायक हो सकती है। नियमित रूप से ऐसा करने पर पाचन संबंधी कई छोटी समस्याओं में राहत मिल सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">पानी शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किडनी शरीर के अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने का काम करती है और इसके लिए पर्याप्त मात्रा में पानी जरूरी होता है। सुबह पानी पीने से शरीर की प्राकृतिक डिटॉक्स प्रक्रिया को भी सहायता मिलती है। त्वचा की सेहत के लिए भी यह आदत लाभकारी मानी जाती है। शरीर में पर्याप्त पानी रहने पर त्वचा में नमी बनी रहती है, जिससे चेहरा अधिक ताजा और चमकदार दिखाई दे सकता है। हालांकि केवल पानी पीना ही पर्याप्त नहीं है, लेकिन संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली के साथ यह अच्छी त्वचा बनाए रखने में मददगार साबित हो सकता है। जो लोग वजन नियंत्रित करना चाहते हैं, उनके लिए भी सुबह पानी पीना उपयोगी माना जाता है। कई बार शरीर प्यास और भूख के संकेतों में भ्रम पैदा करता है। सुबह पानी पीने से अनावश्यक भूख कम महसूस हो सकती है और भोजन की मात्रा पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है। इसके अलावा सक्रिय मेटाबॉलिज्म भी वजन प्रबंधन में सहायक माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सलाह देते हैं कि सुबह पानी धीरे-धीरे और आराम से पीना चाहिए। एक साथ बहुत अधिक मात्रा में पानी पीने की बजाय एक या दो गिलास पानी पर्याप्त माना जाता है। पानी सामान्य तापमान का हो तो बेहतर रहता है। बहुत अधिक ठंडा पानी सुबह खाली पेट पीने से कुछ लोगों को असहजता महसूस हो सकती है। कुछ लोग सुबह गुनगुना पानी पीना पसंद करते हैं। आयुर्वेद में भी गुनगुने पानी को पाचन के लिए लाभकारी बताया गया है। हालांकि सामान्य तापमान का साफ पानी भी शरीर को समान रूप से हाइड्रेट करता है। यदि किसी व्यक्ति को किडनी, हृदय या अन्य गंभीर बीमारी है, तो उसे पानी की मात्रा डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही तय करनी चाहिए। इस बात पर भी जोर देते हैं कि केवल सुबह पानी पी लेना ही पर्याप्त नहीं है। पूरे दिन नियमित अंतराल पर पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी जरूरी है। गर्मी के मौसम, अधिक शारीरिक मेहनत या व्यायाम करने वाले लोगों को सामान्य से अधिक पानी की आवश्यकता हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में छोटी-छोटी अच्छी आदतें लंबे समय तक स्वास्थ्य पर बड़ा असर डालती हैं। सुबह उठते ही पानी पीना भी ऐसी ही एक आदत है, जिसे अपनाने में न तो अधिक समय लगता है और न ही कोई अतिरिक्त खर्च आता है। फिर भी इसके लाभ शरीर के कई अंगों और संपूर्ण स्वास्थ्य पर देखने को मिल सकते हैं। यदि आप अपनी दिनचर्या में सकारात्मक बदलाव लाना चाहते हैं, तो सुबह की शुरुआत एक गिलास पानी से करना एक आसान और प्रभावी कदम हो सकता है। नियमित रूप से इस आदत को अपनाने से शरीर बेहतर तरीके से हाइड्रेट रहता है, पाचन तंत्र को सहारा मिलता है, मेटाबॉलिज्म सक्रिय होता है और दिनभर ऊर्जा व ताजगी महसूस हो सकती है। हालांकि किसी भी स्वास्थ्य संबंधी सलाह को अपनाने से पहले अपनी व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना और आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सकीय परामर्श लेना भी जरूरी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 15:39:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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                <title>फ्रोजन फूड सेहत के लिए कितना सही? जानिए फायदे, नुकसान और कितनी मात्रा में खाना चाहिए</title>
                                    <description><![CDATA[फ्रोजन फूड पूरी तरह नुकसानदायक नहीं होता, लेकिन सही चुनाव, सीमित मात्रा और संतुलित आहार के साथ इसका सेवन करना स्वास्थ्य के लिए बेहतर माना जाता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/know-how-frozen-food-is-good-for-health-its-advantages/article-57447"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/frozen-food.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd">आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में फ्रोजन फूड लोगों की दिनचर्या का अहम हिस्सा बनता जा रहा है। कामकाजी लोग हों, छात्र हों या फिर छोटे परिवार, समय बचाने के लिए फ्रोजन फूड का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। बाजार में फ्रोजन मटर, कॉर्न, सब्जियां, चिकन, फिश, फ्रेंच फ्राइज, रेडी-टू-कुक पराठे, पिज्जा, नगेट्स और कई तरह के पैकेज्ड खाद्य पदार्थ आसानी से उपलब्ध हैं। हालांकि, अक्सर लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि क्या फ्रोजन फूड सेहत के लिए सुरक्षित है या नहीं। विशेषज्ञों के अनुसार इसका जवाब पूरी तरह "हां" या "नहीं" में नहीं दिया जा सकता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि फ्रोजन फूड किस प्रकार का है, उसे कैसे तैयार किया गया है और आप कितनी मात्रा में उसका सेवन करते हैं। फ्रोजन फूड तैयार करने की प्रक्रिया में खाद्य पदार्थों को बहुत कम तापमान पर तेजी से फ्रीज किया जाता है। इस प्रक्रिया से उनमें मौजूद अधिकांश पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं। खासतौर पर फ्रोजन फल और सब्जियां कई बार ताजी सब्जियों जितनी ही पौष्टिक हो सकती हैं, क्योंकि इन्हें तोड़ने के तुरंत बाद फ्रीज कर दिया जाता है। इसके विपरीत, बाजार में कई दिनों तक रखी ताजी सब्जियों में कुछ विटामिन धीरे-धीरे कम हो सकते हैं। इसलिए हर फ्रोजन फूड को नुकसानदायक मानना सही नहीं होगा।</p>
<p class="isSelectedEnd">फ्रोजन फूड का सबसे बड़ा फायदा इसकी सुविधा है। व्यस्त जीवनशैली में खाना बनाने का समय कम होने पर यह अच्छा विकल्प बन सकता है। यह लंबे समय तक खराब नहीं होता, जिससे भोजन की बर्बादी भी कम होती है। फ्रोजन सब्जियां पूरे साल उपलब्ध रहती हैं, चाहे उनका मौसम हो या नहीं। इसके अलावा इन्हें साफ करने, काटने और तैयार करने में समय नहीं लगता, जिससे खाना जल्दी बन जाता है। कई लोगों के लिए यह बजट के लिहाज से भी सुविधाजनक साबित होता है। हालांकि सभी फ्रोजन फूड एक जैसे नहीं होते। फ्रोजन मटर, पालक, कॉर्न, मिश्रित सब्जियां और बिना मसाले वाला फ्रोजन चिकन अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प माने जाते हैं। दूसरी ओर फ्रोजन पिज्जा, बर्गर पैटी, फ्रेंच फ्राइज, सॉसेज, नगेट्स और अधिक प्रोसेस्ड रेडी-टू-ईट उत्पादों में नमक, चीनी, ट्रांस फैट और प्रिजर्वेटिव की मात्रा काफी अधिक हो सकती है। ऐसे खाद्य पदार्थों का बार-बार सेवन स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd">अत्यधिक प्रोसेस्ड फ्रोजन फूड खाने से मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है। इनमें मौजूद अतिरिक्त सोडियम शरीर में पानी रोकता है, जिससे रक्तचाप बढ़ने की संभावना रहती है। कई उत्पादों में संतृप्त वसा और कृत्रिम स्वाद भी मिलाए जाते हैं, जो लंबे समय में नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए खरीदारी करते समय पैकेट पर लिखी पोषण संबंधी जानकारी पढ़ना जरूरी है। कितना फ्रोजन फूड खाना चाहिए, इसका कोई एक निश्चित नियम नहीं है। पोषण विशेषज्ञों की सलाह है कि यदि आपका आहार संतुलित है तो सप्ताह में एक-दो बार फ्रोजन रेडी-टू-कुक भोजन लेना सामान्य माना जा सकता है। वहीं फ्रोजन सब्जियों और फलों का उपयोग जरूरत के अनुसार नियमित रूप से भी किया जा सकता है, बशर्ते उनमें अतिरिक्त नमक, चीनी या मसाले न मिले हों। कोशिश करें कि आपकी थाली का अधिकांश हिस्सा ताजा और घर में बना भोजन ही हो।</p>
<p class="isSelectedEnd">बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के लिए भी फ्रोजन फूड चुनते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। उन्हें अधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की बजाय साधारण फ्रोजन सब्जियां, फल या बिना मसाले वाले खाद्य विकल्प देना बेहतर माना जाता है। जिन लोगों को हाई ब्लड प्रेशर, किडनी की बीमारी या हृदय संबंधी समस्याएं हैं, उन्हें ज्यादा सोडियम वाले फ्रोजन उत्पादों से बचना चाहिए। फ्रोजन फूड का उपयोग करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना भी जरूरी है। एक बार पिघलाए गए खाद्य पदार्थ को दोबारा फ्रीज नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे बैक्टीरिया पनपने का खतरा बढ़ सकता है। पैकेट पर लिखी एक्सपायरी डेट जरूर जांचें और उत्पाद को निर्देशानुसार ही स्टोर करें। खाना बनाते समय उसे पूरी तरह पकाना भी आवश्यक है ताकि किसी प्रकार के संक्रमण की संभावना कम हो।</p>
<p class="isSelectedEnd">यदि आप स्वस्थ जीवनशैली अपनाना चाहते हैं तो फ्रोजन फूड को सुविधा के रूप में देखें, भोजन का स्थायी विकल्प नहीं। ताजे फल, सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, दूध, अंडे और घर का बना भोजन अब भी सबसे बेहतर विकल्प माने जाते हैं। फ्रोजन फूड का उपयोग तभी करें जब समय की कमी हो या ताजे विकल्प उपलब्ध न हों। आखिरकार यह कहना गलत होगा कि फ्रोजन फूड हमेशा नुकसानदायक होता है। सही उत्पाद चुनकर, सीमित मात्रा में और संतुलित आहार के साथ इसका सेवन किया जाए तो यह व्यस्त जीवनशैली में उपयोगी साबित हो सकता है। वहीं अत्यधिक प्रोसेस्ड और जंक फ्रोजन फूड का नियमित सेवन लंबे समय में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का कारण बन सकता है। इसलिए खरीदारी करते समय लेबल पढ़ें, पोषण संबंधी जानकारी समझें और अपनी जरूरत के अनुसार समझदारी से चुनाव करें। संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली ही अच्छी सेहत की सबसे मजबूत नींव मानी जाती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 00:00:50 +0530</pubDate>
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                <title>रात में चावल खाना सही या नहीं? जानिए खिचड़ी बेहतर विकल्प है या नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[रात के भोजन को लेकर लोगों में कई तरह की धारणाएं हैं। विशेषज्ञों के अनुसार चावल पूरी तरह नुकसानदायक नहीं, लेकिन मात्रा, समय और खाने का तरीका आपकी सेहत पर बड़ा असर डालता है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/is-it-right-to-eat-rice-at-night-or-not/article-57241"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/rice-at-night.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">दिनभर की भागदौड़ के बाद रात का खाना शरीर के लिए सबसे अहम भोजन में से एक माना जाता है। लेकिन अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या रात में चावल खाना चाहिए या नहीं। कई लोग मानते हैं कि रात में चावल खाने से वजन बढ़ता है, पेट निकलने लगता है और पाचन खराब हो जाता है। वहीं कुछ लोग बिना चावल के खाना अधूरा मानते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि सच्चाई क्या है और यदि रात में चावल नहीं खाना चाहिए तो क्या खिचड़ी बेहतर विकल्प हो सकती है। रात में चावल खाना पूरी तरह गलत नहीं है। असल फर्क इस बात से पड़ता है कि आप कितनी मात्रा में चावल खाते हैं, उसके साथ क्या खाते हैं और आपका रोजाना का शारीरिक गतिविधि स्तर कितना है। यदि कोई व्यक्ति दिनभर पर्याप्त मेहनत करता है या नियमित व्यायाम करता है तो सीमित मात्रा में चावल खाना उसके लिए सामान्य हो सकता है। दूसरी ओर जो लोग लंबे समय तक बैठे रहकर काम करते हैं और रात का खाना खाने के तुरंत बाद सो जाते हैं, उन्हें चावल की मात्रा पर ध्यान देना चाहिए।सफेद चावल जल्दी पच जाते हैं और इनमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है। अगर इन्हें अधिक मात्रा में खाया जाए और शरीर को ऊर्जा खर्च करने का मौका न मिले तो अतिरिक्त कैलोरी वसा के रूप में जमा हो सकती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति के लिए रात में चावल नुकसानदायक हैं। संतुलित भोजन के साथ सीमित मात्रा में चावल लेने से आमतौर पर कोई बड़ी समस्या नहीं होती।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यदि रात के खाने में चावल के साथ दाल, हरी सब्जियां, सलाद और दही जैसी चीजें शामिल की जाएं तो भोजन अधिक संतुलित बन जाता है। इससे पाचन भी बेहतर रहता है और शरीर को जरूरी पोषक तत्व भी मिलते हैं। केवल बड़ी मात्रा में चावल खाना या तली-भुनी चीजों के साथ खाना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना जाता। कई लोग रात में वजन कम करने के उद्देश्य से चावल पूरी तरह छोड़ देते हैं। लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि केवल चावल छोड़ देने से वजन कम नहीं होता। वजन घटाने के लिए पूरे दिन की कुल कैलोरी, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और संतुलित आहार ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि पूरे दिन असंतुलित भोजन लिया जाए और केवल रात में चावल न खाया जाए तो इससे विशेष लाभ नहीं मिलता।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">अब बात खिचड़ी की करें तो इसे हल्का और आसानी से पचने वाला भोजन माना जाता है। दाल और चावल से बनने वाली खिचड़ी में कार्बोहाइड्रेट के साथ प्रोटीन भी मिलता है। यदि इसमें हरी सब्जियां, हल्दी, जीरा और थोड़ा घी मिलाया जाए तो इसका पोषण मूल्य और बढ़ जाता है। बीमारी के दौरान या पाचन संबंधी परेशानी होने पर डॉक्टर भी अक्सर खिचड़ी खाने की सलाह देते हैं। हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि खिचड़ी भी चावल से ही बनती है। इसलिए यह मान लेना सही नहीं होगा कि खिचड़ी खाने से कैलोरी बिल्कुल नहीं बढ़ती। यदि बहुत अधिक मात्रा में घी या मक्खन डालकर खिचड़ी खाई जाए तो उसकी कैलोरी भी बढ़ सकती है। इसलिए खिचड़ी का सेवन भी संतुलित मात्रा में ही करना चाहिए। अगर किसी व्यक्ति को मधुमेह, मोटापा या फैटी लिवर जैसी समस्या है तो उसे अपने डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह के अनुसार भोजन चुनना चाहिए। ऐसे लोगों के लिए ब्राउन राइस, मिलेट्स या मल्टीग्रेन विकल्प अधिक लाभकारी हो सकते हैं। वहीं स्वस्थ व्यक्ति सप्ताह में कई दिन रात के भोजन में सीमित मात्रा में चावल या खिचड़ी आराम से खा सकता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">रात का भोजन हमेशा सोने से कम से कम दो से तीन घंटे पहले कर लेना चाहिए। खाना खाने के तुरंत बाद बिस्तर पर जाने की आदत पाचन को प्रभावित कर सकती है। भोजन के बाद कुछ देर टहलना भी फायदेमंद माना जाता है। इससे पाचन बेहतर होता है और शरीर भोजन का सही उपयोग कर पाता है। भोजन को लेकर किसी एक नियम को सभी पर लागू नहीं किया जा सकता। हर व्यक्ति की उम्र, वजन, स्वास्थ्य, दिनचर्या और शारीरिक गतिविधि अलग होती है। इसलिए किसी भी भोजन को पूरी तरह अच्छा या बुरा कहना उचित नहीं है। सही मात्रा, संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली ही बेहतर स्वास्थ्य की कुंजी है। आप स्वस्थ हैं और संतुलित मात्रा में खाते हैं तो रात में चावल खाना नुकसानदायक नहीं माना जाता। वहीं यदि हल्का भोजन करना चाहते हैं तो दाल और सब्जियों से बनी खिचड़ी एक अच्छा विकल्प हो सकती है। सबसे जरूरी बात यह है कि भोजन संतुलित हो, समय पर किया जाए और उसके साथ नियमित शारीरिक गतिविधि भी बनी रहे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 16:56:57 +0530</pubDate>
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                <title>100 साल तक स्वस्थ जीवन चाहते हैं? आज ही छोड़ दें ये 10 बुरी आदतें</title>
                                    <description><![CDATA[ कुछ आदतें बदलकर बढ़ाई जा सकती है उम्र और बेहतर बनाया जा सकता है स्वास्थ्य।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/if-you-want-a-healthy-life-for-100-years-leave/article-55757"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/longevity.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आज की तेज रफ्तार जिंदगी में हर व्यक्ति लंबा और स्वस्थ जीवन जीना चाहता है। केवल अच्छी चिकित्सा सुविधाएं या बेहतर जीन ही लंबी उम्र की गारंटी नहीं होते। हमारी रोजमर्रा की आदतें भी यह तय करती हैं कि हम कितने समय तक स्वस्थ, सक्रिय और ऊर्जावान बने रहेंगे। दुनिया के कई शोध बताते हैं कि कुछ सामान्य लेकिन नुकसानदायक आदतें समय के साथ शरीर और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकती हैं। यदि आप भी 100 साल तक स्वस्थ जीवन जीने का सपना देखते हैं, तो इन 10 आदतों को छोड़ना आपके लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>1. अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड खाना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">प्रोसेस्ड और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में अक्सर अधिक मात्रा में नमक, चीनी, ट्रांस फैट और कृत्रिम रसायन होते हैं। लगातार ऐसे भोजन का सेवन मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों का खतरा बढ़ा सकता है। विशेषज्ञ ताजा फल, सब्जियां, साबुत अनाज और घर का बना भोजन खाने की सलाह देते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>2. धूम्रपान करना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">धूम्रपान को दुनिया भर में समय से पहले मृत्यु के प्रमुख कारणों में गिना जाता है। यह फेफड़ों के कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक और सांस संबंधी कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। धूम्रपान छोड़ने के बाद शरीर धीरे-धीरे खुद को सुधारना शुरू कर देता है और स्वास्थ्य जोखिम कम होने लगते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>3. लंबे समय तक बैठे रहना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">आधुनिक जीवनशैली में घंटों कुर्सी पर बैठकर काम करना आम हो गया है। लेकिन लगातार बैठे रहने से मोटापा, मधुमेह और हृदय रोगों का खतरा बढ़ सकता है। विशेषज्ञ हर 30 से 60 मिनट में कुछ देर टहलने या हल्की शारीरिक गतिविधि करने की सलाह देते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>4. मन में नाराजगी और गुस्सा रखना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">किसी के प्रति लंबे समय तक गुस्सा या नाराजगी रखने से मानसिक तनाव बढ़ सकता है। इससे रक्तचाप बढ़ने, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं। माफ करना और सकारात्मक सोच विकसित करना मानसिक शांति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>5. खुद को सामाजिक रूप से अलग रखना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">अकेलापन सिर्फ भावनात्मक नहीं बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि सामाजिक संबंध मजबूत होने से मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है और जीवन संतुष्टि बढ़ती है। परिवार, मित्रों और समुदाय से जुड़े रहना लंबी उम्र के लिए लाभदायक माना जाता है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>6. यह सोचना कि केवल बड़े बदलाव ही मायने रखते हैं</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">कई लोग मानते हैं कि स्वास्थ्य सुधारने के लिए बड़े और कठिन बदलाव जरूरी हैं। जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि छोटी-छोटी सकारात्मक आदतें भी समय के साथ बड़ा प्रभाव डाल सकती हैं। रोजाना 15 मिनट की वॉक, अतिरिक्त पानी पीना या जंक फूड कम करना भी महत्वपूर्ण बदलाव साबित हो सकते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>7. डर या लापरवाही के कारण स्वास्थ्य जांच से बचना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">कई लोग बीमारी के डर से नियमित स्वास्थ्य जांच नहीं करवाते। कुछ लोग लक्षणों को नजरअंदाज करते रहते हैं। इससे कई बीमारियां गंभीर अवस्था में पहुंच जाती हैं। समय पर जांच और उपचार गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को रोकने में मदद कर सकते हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>8. पर्याप्त नींद नहीं लेना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">नींद शरीर और मस्तिष्क की मरम्मत का सबसे महत्वपूर्ण समय होती है। लगातार कम नींद लेने से प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है और हृदय रोग, मोटापा तथा मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। अधिकांश वयस्कों के लिए प्रतिदिन 7 से 9 घंटे की नींद जरूरी मानी जाती है।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>9. लगातार तनाव में रहना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">तनाव जीवन का हिस्सा है, लेकिन लगातार तनाव में रहना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है। इससे रक्तचाप बढ़ सकता है, नींद प्रभावित हो सकती है और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। योग, ध्यान, व्यायाम और समय प्रबंधन जैसी तकनीकें तनाव कम करने में मददगार साबित हो सकती हैं।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>10. हर चीज के लिए जीन को जिम्मेदार ठहराना</strong></h5>
<p style="text-align:justify;">बहुत से लोग मानते हैं कि उनकी सेहत पूरी तरह जीन पर निर्भर करती है। जीवनशैली और पर्यावरण भी स्वास्थ्य पर बड़ा प्रभाव डालते हैं। स्वस्थ खानपान, नियमित व्यायाम और सकारात्मक आदतें कई आनुवंशिक जोखिमों को कम करने में मदद कर सकती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लंबी उम्र का कोई जादुई फार्मूला नहीं है। लेकिन संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, तनाव नियंत्रण और मजबूत सामाजिक संबंध स्वस्थ जीवन की मजबूत नींव बन सकते हैं। छोटी-छोटी अच्छी आदतें समय के साथ बड़े बदलाव लाती हैं और जीवन को अधिक खुशहाल व सक्रिय बना सकती हैं। स्वस्थ और लंबा जीवन जीने का लक्ष्य केवल वर्षों की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि उन वर्षों को बेहतर स्वास्थ्य, ऊर्जा और मानसिक संतुलन के साथ जीना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसलिए यदि आप अपने भविष्य को बेहतर बनाना चाहते हैं, तो आज से ही इन 10 बुरी आदतों को छोड़ने की शुरुआत कर सकते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 16:51:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डायबिटीज मरीजों के लिए क्यों खास है जामुन? ब्लड शुगर कंट्रोल से लेकर दिल की सेहत तक पहुंचाता फायदे</title>
                                    <description><![CDATA[कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स, एंटीऑक्सीडेंट्स और प्राकृतिक यौगिकों से भरपूर जामुन को विशेषज्ञ मधुमेह नियंत्रण में सहायक मानते हैं, लेकिन इसे दवा का विकल्प नहीं माना जाता]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/6a2aa41c675a5/article-55674"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/jamun-benefits.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">गर्मियों के मौसम में बाजारों में नजर आने वाला जामुन केवल स्वाद और ताजगी के लिए ही नहीं, बल्कि अपने कई स्वास्थ्य लाभों के कारण भी लोगों के बीच लोकप्रिय है। गहरे बैंगनी रंग का यह फल वर्षों से आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। खासतौर पर डायबिटीज यानी मधुमेह के मरीजों के लिए जामुन को काफी फायदेमंद माना जाता है। जामुन में मौजूद कई प्राकृतिक तत्व रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद कर सकते हैं, हालांकि इसे किसी भी स्थिति में दवा का विकल्प नहीं समझना चाहिए। डायबिटीज आज दुनिया भर में तेजी से बढ़ने वाली बीमारियों में शामिल है। बदलती जीवनशैली, असंतुलित खानपान और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। ऐसे में ऐसे खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ रही है जो प्राकृतिक रूप से ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मदद कर सकें। जामुन उन्हीं फलों में से एक माना जाता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जामुन का सबसे महत्वपूर्ण गुण इसका कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स है। ग्लाइसेमिक इंडेक्स यह बताता है कि कोई खाद्य पदार्थ शरीर में जाकर रक्त शर्करा को कितनी तेजी से बढ़ाता है। कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले खाद्य पदार्थ धीरे-धीरे पचते हैं और ब्लड शुगर में अचानक वृद्धि नहीं होने देते। यही कारण है कि जामुन को मधुमेह रोगियों के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित फल माना जाता है। जामुन में जंबोलिन और जंबोसिन जैसे प्राकृतिक यौगिक पाए जाते हैं। कई शोधों और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इन तत्वों को ब्लड शुगर नियंत्रण से जोड़ा गया है। माना जाता है कि ये यौगिक शरीर में कार्बोहाइड्रेट के ग्लूकोज में बदलने की प्रक्रिया को धीमा कर सकते हैं। इससे रक्त में शर्करा का स्तर नियंत्रित रखने में सहायता मिल सकती है। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ये तत्व इंसुलिन की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जामुन में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स भी इसे स्वास्थ्य के लिए बेहद उपयोगी बनाते हैं। इसका गहरा बैंगनी रंग एंथोसायनिन नामक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट के कारण होता है। डायबिटीज के मरीजों में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन की समस्या अधिक देखी जाती है। एंटीऑक्सीडेंट शरीर की कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं और कई दीर्घकालिक बीमारियों के जोखिम को कम कर सकते हैं। जामुन का नियमित और संतुलित सेवन शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में योगदान दे सकता है। केवल जामुन का फल ही नहीं, बल्कि इसके बीज भी काफी उपयोगी माने जाते हैं। आयुर्वेद में जामुन के बीजों का विशेष महत्व बताया गया है। बीजों को सुखाकर तैयार किया गया पाउडर कई लोग ब्लड शुगर नियंत्रण के लिए इस्तेमाल करते हैं। माना जाता है कि सीमित मात्रा में इसका सेवन उपवास के दौरान बढ़े हुए शुगर स्तर को नियंत्रित रखने में मदद कर सकता है। हालांकि डॉक्टरों की सलाह के बिना किसी भी हर्बल उत्पाद का नियमित उपयोग नहीं करना चाहिए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जामुन का फायदा केवल डायबिटीज तक सीमित नहीं है। इसमें भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है, जो पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मदद करता है। फाइबर लंबे समय तक पेट भरा होने का एहसास कराता है, जिससे बार-बार भूख लगने की समस्या कम हो सकती है। यही वजह है कि वजन नियंत्रित रखने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए भी जामुन एक अच्छा विकल्प माना जाता है। इसके अलावा जामुन में पोटैशियम, आयरन और विटामिन सी जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं। पोटैशियम रक्तचाप को नियंत्रित रखने में मदद करता है, जबकि आयरन शरीर में हीमोग्लोबिन के स्तर को बनाए रखने में सहायक माना जाता है। विटामिन सी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है और शरीर में आयरन के अवशोषण को बेहतर करने में मदद करता है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">हृदय स्वास्थ्य के लिहाज से भी जामुन को लाभकारी माना जाता है। इसमें मौजूद फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित रखने में मदद कर सकते हैं। चूंकि डायबिटीज और हृदय रोगों का आपस में गहरा संबंध होता है, इसलिए ऐसे खाद्य पदार्थों का महत्व और बढ़ जाता है जो दोनों स्थितियों में लाभ पहुंचा सकें। जामुन का सेवन संतुलित मात्रा में किया जाना चाहिए। सामान्य तौर पर मौसम के दौरान प्रतिदिन 8 से 10 ताजे जामुन खाना पर्याप्त माना जाता है। इसे सुबह और दोपहर के भोजन के बीच या शाम के हल्के नाश्ते के रूप में खाया जा सकता है। वहीं बीजों के पाउडर का सेवन करने से पहले डॉक्टर या पोषण विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">केवल जामुन खाने से डायबिटीज पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो सकती। इसके लिए संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच भी जरूरी है। जामुन को एक सहायक खाद्य पदार्थ के रूप में देखा जाना चाहिए, जो स्वस्थ जीवनशैली को और बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। गर्मियों में उपलब्ध यह छोटा सा फल स्वाद के साथ-साथ कई स्वास्थ्य लाभ भी प्रदान करता है। यही वजह है कि जामुन को प्राकृतिक रूप से स्वास्थ्यवर्धक फलों की श्रेणी में शामिल किया जाता है और विशेषज्ञ भी इसे संतुलित आहार का हिस्सा बनाने की सलाह देते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 17:53:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कुपोषण पर सख्त हुए सीएम मोहन यादव, चार विभाग मिलकर बनाएंगे एक्शन प्लान</title>
                                    <description><![CDATA[बीमारू श्रेणी से बाहर निकला मध्यप्रदेश, लेकिन कुपोषण अब भी बड़ी चुनौती; पोषण आहार विवाद सुलझाने के भी निर्देश]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/cm-mohan-yadav-becomes-strict-on-malnutrition-four-departments-will/article-54706"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/madhya-pradesh-malnutrition.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश भले ही बीमारू राज्यों की श्रेणी से बाहर निकल चुका हो, लेकिन कुपोषण आज भी राज्य के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य, स्कूल शिक्षा तथा पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को संयुक्त रूप से काम करने के निर्देश दिए हैं। सोमवार को महिला एवं बाल विकास विभाग की समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा कि कुपोषण के खिलाफ लड़ाई केवल एक विभाग के भरोसे नहीं जीती जा सकती। इसके लिए सभी संबंधित विभागों को मिलकर समन्वित कार्ययोजना तैयार करनी होगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि मध्यप्रदेश सहित कई राज्य बीमारू श्रेणी से बाहर आ चुके हैं, लेकिन कुपोषण अब भी एक बड़ा दाग बना हुआ है। मुख्यमंत्री ने कहा कि विकास के अन्य मानकों पर राज्य ने अच्छी प्रगति की है, लेकिन जब तक बच्चों और महिलाओं का स्वास्थ्य बेहतर नहीं होगा, तब तक विकास अधूरा माना जाएगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बैठक में कुपोषण से जुड़े ताजा आंकड़ों की भी समीक्षा की गई। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएच) 2026 के अनुसार प्रदेश में पांच वर्ष से कम उम्र के 39.7 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं। वहीं 23.8 प्रतिशत बच्चे दुबलेपन की समस्या से जूझ रहे हैं। हालांकि ठिगनेपन यानी स्टंटिंग के मामलों में कुछ सुधार देखने को मिला है और यह आंकड़ा 35.7 प्रतिशत से घटकर 31.4 प्रतिशत पर पहुंचा है। इसके बावजूद विशेषज्ञ मानते हैं कि स्थिति अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सबसे ज्यादा चिंता इस बात को लेकर जताई गई कि छह से 23 माह तक की उम्र के केवल 12 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त और संतुलित पोषण मिल पा रहा है। यह आंकड़ा बताता है कि शुरुआती उम्र में बच्चों को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल रहे हैं, जिसका असर उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ सकता है। अधिकारियों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ कई शहरी इलाकों में भी पोषण संबंधी जागरूकता की कमी देखने को मिल रही है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री ने कहा कि स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों और स्वास्थ्य संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाना चाहिए। गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और छोटे बच्चों की नियमित निगरानी की व्यवस्था मजबूत करने पर भी जोर दिया गया। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि जिन जिलों में कुपोषण की दर अधिक है, वहां विशेष अभियान चलाए जाएं और परिणाम आधारित कार्ययोजना तैयार की जाए।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बैठक में लंबे समय से चल रहे पोषण आहार वितरण से जुड़े विवाद का मुद्दा भी सामने आया। मुख्यमंत्री ने इस मामले का जल्द समाधान निकालने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि यह तय किया जाए कि पोषण आहार का कार्य स्वयं सहायता समूहों को दिया जाएगा या निजी कंपनियों को। इस संबंध में विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर अगली कैबिनेट बैठक में प्रस्तुत किया जाए ताकि निर्णय लेकर टेंडर प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">पोषण आहार व्यवस्था को लेकर प्रदेश में लंबे समय से विभिन्न पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं। एक ओर स्वयं सहायता समूहों को स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय का माध्यम मानकर उन्हें प्राथमिकता देने की मांग की जाती रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ पक्ष बड़े स्तर पर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए निजी कंपनियों की भागीदारी की वकालत करते रहे हैं। ऐसे में सरकार का फैसला आने वाले समय में इस व्यवस्था की दिशा तय करेगा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">कुपोषण केवल भोजन की उपलब्धता का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, स्वच्छता, शिक्षा और जागरूकता जैसे कई कारण जुड़े होते हैं। यही वजह है कि मुख्यमंत्री ने चार विभागों को एक साथ काम करने की जिम्मेदारी सौंपी है। माना जा रहा है कि यदि विभागों के बीच बेहतर तालमेल बनता है तो कुपोषण की समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है। प्रदेश सरकार अब कुपोषण के खिलाफ बहुस्तरीय रणनीति पर काम करने की तैयारी में है। आने वाले महीनों में जिलों के प्रदर्शन की समीक्षा, पोषण योजनाओं की निगरानी और बच्चों तक गुणवत्तापूर्ण पोषण पहुंचाने के लिए नए कदम उठाए जा सकते हैं। फिलहाल सरकार का फोकस उन कमजोर कड़ियों की पहचान पर है, जिनकी वजह से वर्षों से चल रही योजनाओं के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                            <category>भोपाल</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 12:35:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>NFHS-6 रिपोर्ट: घरेलू हिंसा घटी, महिलाओं में मोटापा बढ़ा</title>
                                    <description><![CDATA[देश में साफ पानी और इंटरनेट पहुंच में सुधार, लेकिन बच्चों के पोषण और स्तनपान को लेकर चिंता बरकरार]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/nfhs-6-report-domestic-violence-decreased-obesity-increased-among-women/article-54574"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-05/nfhs-6-report.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-6) 2023-24 की रिपोर्ट शुक्रवार को जारी कर दी गई। देश के 715 जिलों और करीब 6.79 लाख परिवारों को शामिल करने वाले इस बड़े सर्वे ने भारत की सामाजिक, स्वास्थ्य और पोषण संबंधी तस्वीर को सामने रखा है। रिपोर्ट में कई ऐसे आंकड़े हैं जो राहत देने वाले हैं, वहीं कुछ संकेत चिंता बढ़ाने वाले भी हैं। घरेलू हिंसा, बाल विवाह और कुपोषण के मामलों में सुधार दर्ज किया गया है, लेकिन महिलाओं में तेजी से बढ़ता मोटापा और शिशुओं में स्तनपान की घटती दर स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बनकर उभरी है।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट के अनुसार देश में घरेलू हिंसा की दर में उल्लेखनीय कमी आई है। पिछले सर्वे में जहां 29.2 प्रतिशत महिलाओं ने घरेलू हिंसा का सामना करने की बात कही थी, वहीं अब यह आंकड़ा घटकर 22.3 प्रतिशत पर पहुंच गया है। इसी तरह बाल विवाह के मामलों में भी गिरावट दर्ज की गई है। पहले यह दर 23.3 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 20.1 प्रतिशत रह गई है। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी में भी बढ़ोतरी देखने को मिली है। कामकाजी महिलाओं की संख्या 25.4 प्रतिशत से बढ़कर 30.8 प्रतिशत तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा, जागरूकता और सरकारी योजनाओं के प्रभाव से इन क्षेत्रों में सुधार देखने को मिला है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि रिपोर्ट में महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर एक बड़ा संकेत भी सामने आया है। देश में महिलाओं में मोटापे की दर पिछले सर्वे की तुलना में लगभग 7 प्रतिशत बढ़ गई है। आंध्र प्रदेश, सिक्किम और केरल में यह समस्या सबसे अधिक देखी गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार बदलती जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियों में कमी और खानपान की आदतों में बदलाव इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं। दूसरी ओर मेघालय और झारखंड जैसे राज्यों में मोटापे की दर अपेक्षाकृत कम पाई गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति में भी सुधार दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक अब 98.3 प्रतिशत घरों तक बिजली पहुंच चुकी है, जबकि 96.5 प्रतिशत परिवारों को साफ पेयजल उपलब्ध हो रहा है। यह आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में आधारभूत ढांचे और सार्वजनिक सुविधाओं के विस्तार पर किए गए प्रयासों का असर जमीन पर दिखाई दे रहा है। महिलाओं के बीच इंटरनेट उपयोग में भी बड़ी बढ़ोतरी हुई है। पहले जहां सीमित संख्या में महिलाएं इंटरनेट का इस्तेमाल करती थीं, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर 64.3 प्रतिशत तक पहुंच गया है। डिजिटल पहुंच में आई यह वृद्धि शिक्षा, रोजगार और सूचना तक पहुंच के नए अवसर खोल सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट में महिलाओं की संपत्ति में हिस्सेदारी को लेकर भी सकारात्मक बदलाव दर्ज किया गया है। देश में अब 18.8 प्रतिशत महिलाओं के पास मकान या जमीन का मालिकाना हक है। पिछले सर्वे में यह आंकड़ा 14 प्रतिशत था। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में महिलाओं की संपत्ति पर हिस्सेदारी बढ़ी है। इसे महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी तरफ परिवार नियोजन को लेकर कुछ चिंताजनक आंकड़े भी सामने आए हैं। आधुनिक गर्भनिरोधक उपायों का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की संख्या घट गई है। पिछले सर्वे में जहां 56.4 प्रतिशत महिलाएं आधुनिक परिवार नियोजन साधनों का उपयोग कर रही थीं, वहीं अब यह संख्या घटकर 52.7 प्रतिशत रह गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस गिरावट के कारणों को समझने और जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े आंकड़े मिश्रित तस्वीर पेश करते हैं। अच्छी खबर यह है कि कुपोषित बच्चों में नाटेपन की समस्या में कमी आई है। वर्ष 2021 में यह आंकड़ा 35.5 प्रतिशत था, जो अब घटकर 29.3 प्रतिशत पर आ गया है। यह सुधार बाल स्वास्थ्य कार्यक्रमों और पोषण योजनाओं के असर को दर्शाता है। लेकिन दूसरी ओर छह महीने से दो वर्ष तक की आयु के केवल 15.3 प्रतिशत बच्चों को ही संतुलित और पर्याप्त आहार मिल पा रहा है। इसका मतलब है कि करीब 85 प्रतिशत बच्चे अभी भी जरूरी पोषण से वंचित हैं। यह स्थिति आने वाले वर्षों में बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित कर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">शिशुओं को जन्म के बाद शुरुआती छह महीनों तक केवल स्तनपान कराने की दर में भी गिरावट दर्ज की गई है। यह आंकड़ा पहले 63.7 प्रतिशत था, जो अब घटकर 55.8 प्रतिशत पर पहुंच गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि शिशु के शुरुआती विकास के लिए स्तनपान बेहद जरूरी है और इस क्षेत्र में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो बाल विवाह के मामले में केरल सबसे बेहतर स्थिति में है, जहां केवल 2.9 प्रतिशत मामले दर्ज किए गए। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल और बिहार में बाल विवाह की दर सबसे ज्यादा है। वैवाहिक हिंसा के मामले में हिमाचल प्रदेश सबसे सुरक्षित राज्य के रूप में सामने आया है, जबकि बिहार में महिलाओं को सबसे ज्यादा घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 15:59:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Vaishnavi.J]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गर्मी में दही के फायदे: पाचन से लेकर इम्यूनिटी तक वरदान</title>
                                    <description><![CDATA[गर्मी में दही खाना सेहत के लिए क्यों फायदेमंद है? जानें इसके प्रमुख लाभ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/benefits-of-curd-in-summer-from-digestion-to-immunity-a/article-52226"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-04/curd-benefits,.jpg" alt=""></a><br /><p> गर्मी के मौसम में शरीर को ठंडक देने और पाचन तंत्र को संतुलित रखने के लिए दही को सबसे प्रभावी खाद्य पदार्थों में गिना जाता है।  दही न केवल शरीर को हाइड्रेट रखता है, बल्कि कई मौसमी बीमारियों से बचाव में भी मदद करता है।</p>
<h5><span><strong>गर्मी में बढ़ती मांग</strong></span></h5>
<p>गर्मी बढ़ने के साथ ही दही की खपत भी तेजी से बढ़ जाती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि दही में मौजूद प्राकृतिक प्रोबायोटिक्स पेट की सेहत को बेहतर बनाते हैं और गर्मी से होने वाली परेशानियों को कम करते हैं।गर्मी के दिनों में लोग इसे भोजन के साथ या छाछ के रूप में अधिक उपयोग करते हैं।</p>
<h5><span><strong>पाचन तंत्र को लाभ</strong></span></h5>
<p>दही में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया आंतों के लिए बेहद फायदेमंद माने जाते हैं। यह पाचन प्रक्रिया को मजबूत बनाते हैं और गैस, एसिडिटी तथा कब्ज जैसी समस्याओं से राहत दिलाते हैं।पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, दही का नियमित सेवन पेट को ठंडा रखता है और भोजन को आसानी से पचाने में मदद करता है।इसके अलावा यह शरीर में पोषक तत्वों के अवशोषण को भी बेहतर बनाता है, जिससे समग्र स्वास्थ्य में सुधार होता है।</p>
<h5><span><strong>इम्यूनिटी और हड्डियां</strong></span></h5>
<p>दही कैल्शियम, प्रोटीन और विटामिन्स का अच्छा स्रोत है। यह हड्डियों को मजबूत करने के साथ-साथ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है।डॉक्टरों के मुताबिक, गर्मी में शरीर कमजोर महसूस करता है, ऐसे में दही ऊर्जा बनाए रखने में मदद करता है।दही का नियमित सेवन बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के लिए लाभकारी माना जाता है।</p>
<h5><span><strong>शरीर को ठंडक और हाइड्रेशन</strong></span></h5>
<p>गर्मी के मौसम में शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी आम समस्या है। दही इस कमी को पूरा करने में मदद करता है।<br />इसकी ठंडी तासीर शरीर के तापमान को नियंत्रित रखती है और लू जैसी समस्याओं से बचाव करती है।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 16:50:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Nitin Trivedi]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दूध नहीं पीते बच्चे? जानिए कैल्शियम के ये असरदार विकल्प</title>
                                    <description><![CDATA[जंक फूड और बदलती जीवनशैली के बीच जानिए कैसे दूध के बिना भी बच्चों की हड्डियों को मिल सकता है पूरा पोषण और पर्याप्त कैल्शियम।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/life-style/699316940aa55/article-46369"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-02/home.jpg" alt=""></a><br /><p>बढ़ती जंक फूड संस्कृति और घटती शारीरिक सक्रियता के बीच बच्चों में कैल्शियम की कमी एक गंभीर पब्लिक इंटरेस्ट स्टोरी बनती जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बच्चा दूध पीने में आनाकानी करता है, तो घबराने की जरूरत नहीं है। संतुलित और विविध आहार के जरिए कैल्शियम की पूर्ति संभव है। </p>
<h4><strong>क्यों बढ़ रही है समस्या?</strong></h4>
<p>पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, अनहेल्दी डाइट, फास्ट फूड का बढ़ता चलन और आउटडोर गतिविधियों में कमी बच्चों की हड्डियों पर असर डाल रही है। कैल्शियम की कमी से हड्डियां कमजोर हो सकती हैं और विकास प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि अभिभावक वैकल्पिक स्रोतों की तलाश कर रहे हैं।</p>
<h3><strong>दूध के विकल्प क्या हैं?</strong></h3>
<p><strong>दही और पनीर</strong><br />दूध नहीं पीने वाले बच्चों को दही, पनीर या छाछ दिया जा सकता है। दही में मौजूद प्रोबायोटिक बैक्टीरिया पाचन सुधारने में मदद करते हैं, जबकि पनीर कैल्शियम का अच्छा स्रोत है। इसे पराठा, सैंडविच या सब्जी में मिलाकर परोसा जा सकता है।</p>
<p><strong>हरी पत्तेदार सब्जियां:</strong><br />पालक, मेथी और सरसों का साग कैल्शियम से भरपूर होते हैं। इन्हें चीला, पराठा या सूप के रूप में शामिल किया जा सकता है।</p>
<p><strong>ड्राई फ्रूट्स और बीज</strong><br />बादाम, अंजीर, तिल और चिया सीड्स का पाउडर बनाकर दलिया, खीर या स्मूदी में मिलाया जा सकता है। यह तरीका स्वाद और पोषण दोनों को संतुलित करता है।</p>
<p><strong>फल भी सहायक</strong><br />संतरा, कीवी और अमरूद जैसे फल शरीर में कैल्शियम के अवशोषण में मदद करते हैं।</p>
<p><strong>रागी (मंडुआ)</strong><br />रागी को कैल्शियम का बेहतरीन स्रोत माना जाता है। रागी का दलिया, डोसा या लड्डू बच्चों के लिए पौष्टिक विकल्प हो सकते हैं।</p>
<p><strong>फोर्टिफाइड फूड्स</strong><br />बाजार में उपलब्ध कैल्शियम युक्त अनाज और प्लांट-बेस्ड मिल्क भी विकल्प हो सकते हैं। हालांकि, विशेषज्ञ लेबल पढ़कर सही उत्पाद चुनने की सलाह देते हैं।</p>
<h3><strong>विटामिन D क्यों जरूरी?</strong></h3>
<p>विशेषज्ञों का कहना है कि केवल कैल्शियम पर्याप्त नहीं है। शरीर में इसके अवशोषण के लिए विटामिन D आवश्यक है। बच्चों को रोज 15–20 मिनट धूप में खेलने देना चाहिए। अंडा और मशरूम भी इसके अच्छे स्रोत हैं।</p>
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                                                            <category>लाइफ स्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Feb 2026 16:21:13 +0530</pubDate>
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