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                <title>Article 329 - दैनिक जागरण</title>
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                <title>राज्यसभा उम्मीदवारी पर सुप्रीम कोर्ट से मीनााक्षी नटराजन को झटका</title>
                                    <description><![CDATA[मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव में नामांकन खारिज होने के खिलाफ दायर याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज, चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप से किया इनकार]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/6a2bcf22157b3/article-55735"><img src="https://www.dainikjagranmpcg.com/media/400/2026-06/meenakshi-natarajan-(4).jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश की राज्यसभा सीटों को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद में कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सर्वोच्च अदालत ने शुक्रवार को उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन पत्र रद्द किए जाने को चुनौती दी थी। अदालत ने स्पष्ट कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद संविधान के अनुच्छेद 329 के तहत न्यायालय का हस्तक्षेप सीमित है और ऐसे मामलों में चुनावी प्रक्रिया के दौरान दखल नहीं दिया जा सकता। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब किसी उम्मीदवार का नामांकन रिटर्निंग अधिकारी द्वारा खारिज कर दिया जाता है, तब संविधान के प्रावधानों को देखते हुए अदालत सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती। पीठ ने कहा कि पहले भी कई मामलों में चुनाव प्रक्रिया के बीच अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के तहत अदालतों का दरवाजा खटखटाया गया, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए न्यायालयों ने हस्तक्षेप से परहेज किया है। सुनवाई के दौरान कांग्रेस नेता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि नामांकन पत्र खारिज करने में स्पष्ट और गंभीर त्रुटि हुई है। उनके अनुसार यह ऐसा मामला था जिसमें न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी था। सिंघवी ने यह भी सवाल उठाया कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में था, तब भी चुनाव आयोग ने राज्यसभा चुनाव के नतीजे घोषित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा दी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उन्होंने अदालत में कहा कि उनकी मुवक्किल केवल चुनाव लड़ने का अवसर चाहती थीं। उनका तर्क था कि किसी उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतरने का मौका मिलना चाहिए और अंतिम फैसला मतदाताओं या निर्वाचन प्रक्रिया पर छोड़ दिया जाना चाहिए। सिंघवी ने यह भी कहा कि कांग्रेस द्वारा चुनाव आयोग के समक्ष की गई शिकायत पर अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया था, इसके बावजूद परिणाम घोषित कर दिए गए। हालांकि अदालत ने इस दलील पर सहमति नहीं जताई। पीठ ने पूछा कि क्या ऐसा कोई उदाहरण मौजूद है जिसमें नामांकन खारिज होने के बाद चुनाव प्रक्रिया के बीच सर्वोच्च अदालत ने हस्तक्षेप किया हो। अदालत ने कहा कि चाहे रिटर्निंग अधिकारी का निर्णय गलत ही क्यों न हो, लेकिन कानून ने इसके लिए अलग उपचार का प्रावधान किया है और चुनाव प्रक्रिया के दौरान सीधे न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं माना जा सकता।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान भाजपा उम्मीदवारों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी भी उपस्थित रहे। उन्होंने याचिका की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव लड़ना कोई मौलिक अधिकार नहीं बल्कि एक वैधानिक अधिकार है। इसलिए अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च अदालत के कई पुराने फैसलों में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि चुनाव लड़ने का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों की श्रेणी में नहीं आता। मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो कांग्रेस ने मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीन सीटों में से एक के लिए मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाया था। उन्होंने अपना नामांकन दाखिल किया था, लेकिन भाजपा नेताओं ने उनके नामांकन पर आपत्ति दर्ज कराई। आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने चुनावी हलफनामे में हैदराबाद की एक अदालत से जुड़े मामले का पूरा विवरण नहीं दिया। आपत्तियों पर विचार करने के बाद रिटर्निंग अधिकारी और मध्य प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव अरविंद शर्मा ने नटराजन का नामांकन पत्र खारिज कर दिया। आदेश में कहा गया कि उनके द्वारा दाखिल किया गया फॉर्म-26 अधूरा था और उसमें एक न्यायिक नोटिस का उल्लेख नहीं किया गया था। रिटर्निंग अधिकारी ने इसे महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने की श्रेणी में माना।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इस निर्णय के बाद कांग्रेस ने इसे राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चुनौती दी। पार्टी का कहना था कि मीनाक्षी नटराजन किसी आपराधिक मामले में आरोपी नहीं हैं। कांग्रेस के अनुसार जिस मामले का हवाला दिया गया, उसमें उनका नाम केवल एक अलग निजी शिकायत में आया था और उनके खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई थी। पार्टी ने यह भी तर्क दिया कि प्रारंभिक नोटिस को लंबित आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता, इसलिए उसका खुलासा करना आवश्यक नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि इन दलीलों के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की। अदालत ने साफ किया कि उसके आदेश का असर भविष्य में दायर की जाने वाली किसी चुनाव याचिका पर नहीं पड़ेगा। यानी यदि मीनाक्षी नटराजन या कांग्रेस इस मामले को आगे चुनाव याचिका के रूप में संबंधित उच्च न्यायालय में ले जाना चाहें तो उनके लिए रास्ता खुला रहेगा। उधर, राज्यसभा चुनाव के परिणाम घोषित होने के बाद भाजपा के उम्मीदवार तरुण चुघ, रजनीश अग्रवाल और महेश केवट निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए जा चुके हैं। नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद चुनावी मुकाबले की संभावना लगभग समाप्त हो गई थी और भाजपा उम्मीदवारों का निर्विरोध निर्वाचन तय माना जा रहा था।</p>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>मध्य प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 15:20:38 +0530</pubDate>
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